शुक्रवार, 6 नवंबर 2009

धारावाहिक पंजाबी उपन्यास(किस्त- 19)



सवारी
हरजीत अटवाल
हिंदी अनुवाद : सुभाष नीरव
चित्र : प्रो0 रमेश शर्मा

॥ चौबीस ॥
शौन बलदेव को अधिक फोन नहीं करता था। उसके पास वक्त की कमी नहीं थी पर वह हर समय अपने भविष्य को लेकर सोच में डूबा रहता था। कई तरह के प्रोग्राम बनाता, रद्द करता। आयरलैंड में जाकर बसने का विचार भी उसकी योजनाओं में आता था। लेकिन यह इतना आसान नहीं था। उसी आयरलैंड से भाग कर उसने लंदन में आकर शरण ली थी। वापस उन लोगों में जाकर बसना कठिन था। अगर बलदेव उसके संग साझा व्यापार करने के लिए राजी हो जाता तो यह काम कुछ आसान हो जाता, पर बलदेव तो लंदन को वापस इस तरह भागा जैसे कोई बच्चा माँ की तरफ भागता है।
आयरलैंड का विचार उसके मन में फादर जोय के साथ हुई बातचीत में उभरा था। वह कहता था कि कैरन ने उसके साथ विवाह सिर्फ़ पासपोर्ट के लिए किया था। फादर जोय कहता कि अगर ऐसा होता तो अब तक वह छोड़कर चली गई होती। उसे फादर जोय पर गुस्सा था कि उसने ही उसका विवाह किया था और अब उसके पक्ष में खड़ा नहीं हो रहा था। विवाह कैंसिल करवाने की उसकी कोशिश व्यर्थ गई थी। वह इस आस से वापस लंदन आया कि शायद अब तक कैरन बदल गई हो। कुछ सप्ताह दूर रहने के कारण उसके अन्दर प्यार जागा हो या उसकी आवश्यकता या महत्व का अहसास हुआ हो।
वापस लौटा तो कैरन वैसी की वैसी थी। एक दिन वे ठीक रहे और फिर वही फसाद शुरू हो गया। अब तो बलदेव भी उसके संग नहीं रहता था कि जिसकी कुछ शर्म करते या वह बीच में पड़ कर उन्हें शान्त करवा देता। उसने एक बार फिर कैरन को छोड़कर चले जाने के बारे में सोचना प्रारंभ कर दिया। अब आयरलैंड उसके मन में नहीं आ रहा था, वह किसी और देश के बारे में सोच रहा था। जहाँ उसको कोई जानता न हो। शायद वह एक नई ज़िन्दगी शुरू कर सके। उसके मन में आस्ट्रेलिया का विचार आया। वह इस देश के विषय में काफी कुछ पढ़ता रहता था। यह एक विकसित होता देश था जहाँ सैटल होना भी आसान था और भविष्य भी उज्जवल बन सकता था। लेकिन वहाँ उसका कोई परिचित नहीं था। वह जगह लंदन की तरह तो हो ही नहीं सकती थी कि अटैची उठाओ और जाकर बस जाओ। आस्ट्रेलिया के बाद दूसरे नंबर पर अमेरिका का नाम था उसके मन में। अमेरिका में वैलजी के कुछ लोग रहते थे जिनके सहारे पैर टिकाये जा सकते थे। लेकिन वहाँ उसे यह भय था कि अगर किसी को पता चल गया कि वह पत्नी और बच्चे को छोड़कर भागा है तो उसकी क्या इज्ज़त रह जाएगी। उसकी धार्मिक उलझने और बढ़ सकती थीं। वहाँ के चर्च वाले बॉयकाट करने तक पहुँच सकते थे। वह सोचता कि क्यों न बलदेव के साथ बात करके देखे, क्या मालूम उसका कोई परिचित आस्ट्रेलिया में रहता हो।
उसे यकीन था कि कैरन को एकबार पता चल जाए कि वह उसको सदा के लिए छोड़ गया है तो वह स्वयं ही कहीं ओर चली जाएगी। वापस अपने मुल्क अथवा कहीं ओर। कोई नया मर्द खोज लेगी क्योंकि अकेले रहना उसके लिए असंभव होगा। सोशल सिक्युरिटी के थोड़े से पैसों पर उसका खर्चीला स्वभाव टिक नहीं सकेगा।
दूसरी सोच जो उसको हर वक्त तंग किए रखती वह थी - बलदेव और ऐलिसन को मिलाना। शौन का ऐलिसन से गुस्सा कम नहीं हुआ था पर अब वह उसकी ज़रूरत थी। कैरन से लड़कर वह उसकी तरफ निकल जाया करता था। उसके पास रात भी बिता आता। उसके बच्चों को भी कुछ ले दिया करता। पर उसने दिल से बहन को पूरी तरह माफ नहीं किया था। उसे यह भी था कि बलदेव यदि ऐलिसन से जुड़ जाएगा तो वह कैरन की मदद नहीं कर सकेगा। जिसका उसे हर समय डर बना रहता था। उसने बलदेव को उसके काम पर फोन किया। वह किसी तरह के गिले-शिकवे करने-सुनने के मूड में नहीं था। उसने सीधे ही पूछा-
''तेरा आस्ट्रेलिया में कोई परिचित है ?''
''आस्ट्रेलिया में तो नहीं, न्यूजीलैंड में है, मेरे मामा का लड़का।''
''अच्छा आदमी है ?''
''बस, मेरे जैसा ही है। अच्छे-बुरे का तू खुद सोच। क्यों क्या काम पड़ गया ?''
''कोई खास नहीं। मिलूँगा तो बताऊँगा।''
शौन पल भर के लिए रुक कर बोला-
''डेव, तू मेरी बहन ऐलिसन से क्यों नहीं मिलता।''
''यूँ ही। मैं बहुत व्यस्त रहा हूँ।''
''डेव, मैं सच कहता हूँ, तू एकबार मिल कर देख। किसी एक्ट्रेस से कम नहीं। स्वभाव की भी अच्छी है। तू एकबार उसके संग बाहर जाकर तो देख, तेरे दिल में उतर जाएगी।''
''शौन, मैं अभी ऐसे मूड में नहीं हूँ।''
''मूड में नहीं है तो न सही, मिलने में क्या हर्ज़ है। आजकल वह अकेली रहती है, ब्वॉय फ्रेंड काफी समय से छोड़ रखा है उसने।''
बलदेव इस बारे में और अधिक न कह सका। शौन ने उससे शुक्रवार को क्लैपहम स्टेशन पर मिलने का वायदा ले लिया।
शौन ने ऐलिसन के साथ संबंध सुधारे तो सबसे पहले उसने उसका ब्वॉय फ्रेंड ही छुड़वाया। वह जेल भी जा चुका था। कैथोलिक भी नहीं था। जब शौन कहता कि डैरक प्रोटेस्टैंट है तो ऐलिसन को गुस्सा आने लगता। उसने कहा-
''शौन, तू डैरक को गुनहगार माने जा रहा है कि वह प्रोटेस्टैंट है, पर कैरन भी तो हमारे धर्म की नहीं।''
''कैरन तो क्रिश्चियन है ही नहीं, इसलिए उसका कोई कसूर नहीं पर डैरक तो क्रिश्चियन है और यह धर्म के गलत अर्थ निकाले जाता है, यह है असली गुनाह।''
ऐलिसन को शौन की बात बहुत वजनदार नहीं लगती थी पर शौन के बार बार उसके घर आने से डैरक से उसका झगड़ा रहने लगा था और डैरक को दूसरी लड़की मिल गई और वह चला गया था। एक दिन ऐलिसन ने बलदेव के बारे में भी सवाल किया था। उसने पूछा -
''शौन, तू कैरन को तो हर समय पाकि-पाकि कहता घूमता है कि पाकिस्तानी ने तेरी ज़िन्दगी खराब कर दी। अब एक पाकि को मेरे गले मढ़ना चाहता है।''
''जब कैरन के लिए पाकि शब्द इस्तेमाल करता हूँ, मैं गुस्से में होता हूँ। नहीं तो हमारा धर्म रंग में विश्वास नहीं करता।''
''फिर कालों के बारे में क्यों कहते हैं कि कोई माँ के संग सो गया था तो काले बच्चे पैदा हुए।''
''यह तो एक मिथ है जो कि काले रंग के धरती पर आने के कारण को बताती है। इसकी सच्चाई के बारे में भी भ्रम हैं, और फिर इस मिथ के बावजूद उन्हें कोई खराब या घटिया नहीं कहता। धर्म तो बिलकुल भी नहीं।''
शौन को जब भी समय मिलता, ऐलिसन के साथ धर्म को लेकर बातें करने लग जाता था। वह ऐलिसन से कन्फेशन करवाना चाहता था। उसने कन्फेशन तो नहीं किया था पर चर्च जाने लग पड़ी थी। शौन आता तो ले जाता। क्लैपहम के चर्च का पादरी फादर एडवर्ड उसके साथ बहुत प्यार से बात करता। फादर कहता कि बच्चों को धर्म से ज़रूर जोड़ो। इंग्लैंड में रहते बच्चे धर्म से दूर जा रहे थे। इस मुल्क में कैथलिक संस्थाओं की बहुत ज़रूरत थी।
बलदेव जानता था कि ऐलिसन क्लैपहम रहती थी। शौन के साथ आज उसके घर ही जाना होगा। या शौन ने ऐलिसन को बाहर बुलाया होगा। वह सातेक बजे क्लैपहम स्टेशन पर पहुँच गया। वह इस मुलाकात के लिए स्वयं को तैयार करने लगा। शौन बाहर कार में बैठा उसकी प्रतीक्षा कर रहा था। वे दोनों बहुत प्यार से मिले। शौन ने कार आगे बढ़ाई और कहा-
''तेरे साथ बहुत बातें करनी थीं पर वक्त ही नहीं मिला।''
''यह आस्ट्रेलिया, न्यूजीलैंड का क्या चक्कर है ?''
''वही बताता हूँ। मैं कैरन को छोड़ कर जा रहा हूँ। कहीं और सैटल हो जाऊँगा।''
''अच्छा ! सोच-समझ कर कदम उठाना।''
''सोच लिया, बहुत सोच लिया। यहाँ धर्म ने मुझे बांध कर रखा हुआ है।''
आगे जाकर ट्रैफिक लाइट्स पर दायें मुड़कर बायें हाथ दूसरे घर के सामने गाड़ी रोक शौन ने कहा -
''तू मेरी एक मदद करना, मेरे बाद।''
''बता, कैसी मदद ?''
''कैरन तुझसे कंटेक्ट करे तो इग्नोर कर देना। कुछ बताना नहीं।''
''तू फिक्र न कर। वायदा रहा।''
शौन को उसकी बात से कुछ तसल्ली हुई।
अन्दर आकर उसने बलदेव और ऐलिसन का एक दूसरे से परिचय कराया। ऐलिसन उनके संग ही आकर बैठ गई। शौन बच्चों के बारे में बताता हुआ कहने लगा-
''यह बड़ी है- फेह। और यह है छोटा- नील। दोनों ही ट्रबल हैं, निरे डैविल !'' कहते हुए वह उनके साथ खेलने लगा। ऐलिसन ने बलदेव से उसके बच्चों के बारे में पूछना शुरू कर दिया। उसे उस वक्त एनेबल और शूगर याद आईं। वे फेह और नील की उम्र की ही थीं। ऐलिसन उससे काम आदि की बातें पूछती रही। उसने उसके पिता के निधन का अफसोस भी प्रकट किया। बलदेव को उसकी शक्ल थोड़ी सी याद थी। शौन के विवाह पर उसको देखा हुआ था। वह चोरी-चोरी ऐलिसन की तरफ देखता था। फिर दो पैग पिये तो सीधे देखने लगा। वह मैरी से कुछ भिन्न थी। मैरी से ज़रा-सा मोटी थी। बाल भी घुंघराले थे। उसका लहजा लंदन वाला था। पहली दृष्टि में पता ही नहीं चलता था कि वह आयरश है। उसने भी मैरी की तरह स्कर्ट पहन रखी थी। स्कर्ट के नीचे से मजबूत पिंडलियाँ झांक रही थीं। उसे स्कर्ट पसन्द आ रही थी। मैरी की स्कर्ट तो अच्छी लगती ही थी, अब ऐलिसन की स्कर्ट भी उसे सुन्दर लग रही थी। वह मन ही मन हँसा कि यही स्कर्ट थी जिसे पहनने के बारे में कभी सिमरन से झगड़ा हो जाया करता था। लम्बे बालों की अपेक्षा कटे हुए बाल अब अधिक आकर्षक लग रहे थे।
शौन ने उसके कंधे पर हाथ रख कर पूछा-
''भाजी ठीक हो ?''
''हाँ, ठीक हूँ।''
''कहाँ गुम है, वापस आ, अपनी ड्रिंक उठा।''
''ज्यादा नहीं पीनी। वापस भी लौटना है। तुझे पता है, मैं अधिक नहीं पी सकता।''
''वापस नहीं जाना। हम यहीं सोएंगे। मैं अब ड्राइव नहीं कर सकूँगा। जितनी चाहे, पी। अगर पीकर खराब भी हो गया तो अपना ही घर है।''
''खराब क्या ज़रूर होना है !''
पास बैठी ऐलिसन ने कहा। बलदेव को महसूस हुआ जैसे वह उसे अधिक पीने से रोक रही हो। शौन कहने लगा-
''डेव, मेरी तरफ तेरा कुछ सामान पड़ा था, उसे मैं यहाँ ले आया हूँ। जब चाहे ले जाना। साथ ही तेरी डाक भी मैंने यहीं री-डायरेक्ट करवा दी है।''
''शुक्रिया, मैं सोच ही रहा था कि चिट्ठियाँ लेने मैं तेरी तरफ कैसे जाऊँगा।''
शौन ने ऐलिसन का फोन नंबर बलदेव को लिखवा दिया कि कभी भी आकर डाक ले जाया करे। ऐलिसन उठकर रसोई में जा चुकी थी। रसोई में बन रहे खाने से उठती महक उसकी भूख को बढ़ाने लगी।
00
(क्रमश: जारी…)

लेखक संपर्क :
67, हिल साइड रोड,
साउथाल, मिडिलसेक्स
इंग्लैंडदूरभाष : 020-८५७८०३९३
07782-265726(मोबाइल)

शुक्रवार, 16 अक्टूबर 2009

गवाक्ष – अक्तूबर 2009



गवाक्ष” के माध्यम से हम हिन्दी ब्लॉग-प्रेमियों को हिन्दी/पंजाबी के उन प्रवासी लेखकों/कवियों की समकालीन रचनाओं से रू-ब-रू करवाने का प्रयास कर रहे हैं जो अपने वतन हिन्दुस्तान से कोसों दूर बैठकर अपने समय और समाज के यथार्थ को अपनी रचनाओं में रेखांकित कर रहे हैं। “गवाक्ष” के पिछ्ले तेरह अंकों में पंजाबी कवि विशाल (इटली) की कविताओं का हिन्दी अनुवाद, दिव्या माथुर (लंदन) की कहानी, अनिल जनविजय (मास्को) की कविताएं, न्यू जर्सी, यू.एस.ए. में रह रहीं देवी नागरानी की ग़ज़लें, लंदन निवासी कथाकार-कवि तेजेन्द्र शर्मा, रचना श्रीवास्तव, दिव्या माथुर की कविताएं, दुबई निवासी पूर्णिमा वर्मन की कविताएं, यू एस ए में रह रहीं हिन्दी कथाकार-कवयित्री इला प्रसाद, डेनमार्क निवासी कवि भगत धवन की कविताएँ और चाँद शुक्ला की ग़ज़लें, यू एस ए निवासी कवि वेद प्रकाश ‘वटुक’ तथा कवयित्री रेखा मैत्र की कविताएं, कनाडा अवस्थित पंजाबी कवयित्री तनदीप तमन्ना की कविताएं, यू के अवस्थित हिन्दी कवि-ग़ज़लकार प्राण शर्मा की ग़ज़लें, कैनेडा में अवस्थित पंजाबी कवि सुखिन्दर की कविताएं, कनाडा निवासी पंजाबी कवयित्री सुरजीत, अमेरिका अवस्थित डॉ सुधा धींगरा, कनाडा में अवस्थित हिंदी- पंजाबी कथाकार - कवयित्री मिन्नी ग्रेवाल की कविताएं और पंजाबी कथाकार-उपन्यासकार हरजीत अटवाल के उपन्यास “सवारी” के हिंदी अनुवाद की सत्रह किस्तें आपने पढ़ीं। “गवाक्ष” के अक्तूबर 2009 अंक में प्रस्तुत हैं –न्यूजीलैंड में रह रहे पंजाबी कवि बलविंदर चहल की कविता तथा यू के निवासी पंजाबी कथाकार-उपन्यासकार हरजीत अटवाल के धारावाहिक पंजाबी उपन्यास “सवारी” की अटठारहवीं किस्त का हिंदी अनुवाद…

न्यूजीलैंड से
बलविंदर चहल की कविता
हिन्दी अनुवाद : सुभाष नीरव
चित्र : देवेन्द्र पाल

मेरा सूरज बन

तू
मेरा पानी बन
पी लूँ
या फिर
तैर लूँ तेरे संग।

तू
मेरी हवा बन
सांस लूँ
या फिर
सन्देशा दूँ तेरे संग।

तू
मेरा तूफ़ान बन
फेंक दे कहीं
या फिर
तिनका-तिनका बिखेर दे।

तू
मेरा सूरज बन
रौशन कर दे
या फिर
भस्म कर दे सब कुछ।
0
(मूल पंजाबी में यह कविता तनदीप तमन्ना के पंजाबी ब्लाग “आरसी” में प्रकाशित हुई थी, वहीं से साभार लेकर इसका हिन्दी अनुवाद “गवाक्ष” में प्रकाशित किया गया है)

बलविंदर चहल
जन्म : मानसा, पंजाब
वर्तमान निवास : ऑकलैंड, न्यूजीलैंड
प्रकाशित पुस्तकें : प्रौ0अजमेर औलख दी नाटक कला(1988), सूरज फेर जगावेगा(2009), कविता राहीं विज्ञान(2008) एवं आखिर प्रवास क्यूँ(2009)।

धारावाहिक पंजाबी उपन्यास(किस्त- 18)


सवारी
हरजीत अटवाल
हिंदी अनुवाद : सुभाष नीरव
चित्र : प्रो0 रमेश शर्मा

॥ तेईस ॥

बलदेव वापस काम पर चला गया पर उसका मन नहीं कर रहा था। एक तो कई महीने खाली रह कर मन हरामी हो गया था और दूसरा, उसे उन लोगों का सामना करना पड़ना था जिनके कारण उसने सिक मारी थी। सिमरन से अलग होने पर बलदेव बहुत शर्मिन्दा था। जब यह खबर उसके दफ़्तर पहुँची तो वह काम पर जाने से झिझकने लगा था। साल में दो या तीन पारिवारिक महफ़िले सजती थीं, जिनमें सिमरन भी आया करती और काम पर बहुत सारे लोग सिमरन को जानते थे। उनकी अलहदगी का अफ़सोस करने उसके पास आ जाते। उसके अन्दर हीनभावना आने लगी थी। वहमी सा हो गया था। शौन उससे पहले ही सिक पर था। शौन को कैरन ने चेतावनी दी हुई थी कि वह उससे खर्चा क्लेम करेगी, इसलिए शौन ने काम पर जाना बन्द कर दिया था। उसी के नक्शेकदम पर बलदेव भी पीठ दर्द का बहाना करके घर में बैठ गया था। अब डॉक्टर से फिटनेस लेकर वापस काम पर जा रहा था।
काम पर जाते समय यद्यपि उसमें उत्साह भी था। उसे आवश्यकता भी थी कि उसके पास नौकरी होगी तभी मोर्टगेज मिलेगी और फ्लैट ले सकेगा। दफ्तर में वापस आकर बाकी तो सबकुछ सह लिया था, पर उससे यह नहीं सहा जाता था कि उसे नौसिखिये क्लर्कों या अस्थायी कर्मचारियों में रखा जाए।
दफ्तर को कई सेक्सनों में विभाजित किया हुआ था। जैसे कि ए, बी, सी, डी। डी सेक्शन में नए लोग ही होते। बलदेव के संगी-साथी तो बी सेक्शन में थे। उसे बी न भी मिले पर सी तो मिलता। दूसरी दुख देने वाली बात यह थी कि उसके पुराने दोस्त उसे अपने से घटिया समझने लग पड़े थे। वे हैलो-सी करके टरका देते। फिर काम शुरू करते ही जल्द ही भाइया गुजर गया जिसके कारण वह दबाव में रहने लगा। काम से लौटते ही उसे अजमेर की दुकान पर कुछ घंटे मदद करवाने के लिए जाना पड़ता। वीक एंड पर तो पूरा दिन ही टोनी के संग खड़ा रहता। सवेरे छह बजे उठता। तैयार होते-हवाते आठ बजे घर से निकलता। टफनल पॉर्क से नॉदर्न लाइन पकड़ता और वाटरलू जा उतरता। वहाँ से कुछ मिनट का रास्ता था। नौ बजे से पहले पहले वह दफ्तर में होता। पाँच बजे काम छोड़ कर छह बजे घर पहुँचता। मैरी घर पर ही होती। सात बजे हाईबरी चला जाता जहाँ से दस बजे लौटता। मैरी को भी वक्त न दे पाता।
दुकान में मदद करते हुए उसे कुछ खुशियाँ भी मिलतीं। गुरां उसके पास आ खड़ी होती। शैरन उसके गले से लटक कर झूलने लगती। अब हरविंदर भी शरारतें करने लगता। गुंरिंदर कहती -
''तेरे भाजी के साथ इतना नहीं खुलते जितना तेरे साथ करते हैं।''
बलदेव को यह सुनना अच्छा लगता पर कई बार अजमेर उसे बहुत दु:खी कर जाता। किसी के साथ बात करते करते कहने लगता-
''रात को सौ पोंड की सेल में फर्क़ था, चलो कोई बात नहीं। कहीं गलती लग गई होगी।''
पहले तो बलदेव ने इस ओर ध्यान नहीं दिया, जब नोटिस में यह बात आई तो उसे बहुत बुरी लगी कि उसे चोर बनाया जा रहा था। जब शिन्दा आया तो उसने हाथ एकदम पीछे खींच लिया। शिन्दे ने जल्दी ही सोहन सिंह वाली जगह संभाल ली थी, बल्कि वह उससे भी बढ़िया काम करता। टिल्ल को अच्छी तरह चला लेता। उसे ग्राहक सर्व करना आ गया था। फिर बलदेव ने दुकान में आना बन्द ही कर दिया था क्योंकि अब काम चल ही रहा था।
एक दिन वह मैरी को बाहर घुमाने ले गया। थेम्ज़ के किनारे जा बैठे। दरिया भरा पड़ा था। किनारों से बाहर उछल रहा था। भरे हुए दरिया को देख उसकी रूह निहाल हो गई। उसने मैरी से कहा-
''मेरा दिल करता है कि दरिया के किनारे पैर लटका कर बैठा रहूँ और यह इसी तरह मेरे पैरों को छोड़ते छोड़ते उतर जाए, इसी तरह छूता हुआ चढ़े।''
''यह टाईडल दरिया है, ये समुंदर से प्रभावित होते हैं, इनके किनारे बैठना ठीक नहीं होता। इन्हें बगैर छुए महसूस करना चाहिए।''
''मैं कई कई घंटे यहाँ खड़ा रह कर इसे देख सकता हूँ, इसे उतरते-चढ़ते को, मानो इसे उजड़ते-बसते देख रहा होऊँ।''
''इतना भी क्या लगाव इसके साथ। यह दरिया ही तो है।''
''मैरी, मुझे लगता है कि यह मेरे बारे में सोच रहा है।''
''डेव, कहीं पागल न हो जाना।''
''नहीं मैरी, मैं सच कह रहा हूँ। ज़रा सोच कर देख, थेम्ज़ के बगैर लंदन कैसा लगेगा। शायद थेम्ज़ न होता तो लंदन भी न होता।''
''पुराने शहर बसते ही दरियाओं के किनारे थे, आवाजाही की सुविधाओं के कारण।''
''यही तो मैं कहता हूँ कि थेम्ज़ के कारण ही लंदन है। इसी कारण मुझे यह बहुत खास लगता है। लंदन का हिस्सा बन कर मैं दरिया के साथ जुड़ा हुआ हूँ। मुझे तो यहाँ तक लगता है कि लंदन के बिना कहीं और रह ही नहीं सकता।''
''देव, तूने दरिया का दूसरा पहलू नहीं देखा होगा, लगता है, इनकी भयानकता से तेरा वास्ता नहीं पड़ा, मेरे साथ डैरी चल, तुझे रिवर फोइल दिखाऊँ, देखने में वह इससे भी सुन्दर होगी, पर बहुत करूप है, सरहद है फोइल। एक तरफ प्रोटैस्टेंट और दूसरी तरफ कैथोलिक, दरिया का पार करना मतलब मौत... कुछ गज का दरिया सचाई में सैकड़ों मील का अन्तर संभाले बैठा है, अस्थायी से पुल हैं, फोइल पर बनते रहते हैं... तुझे उत्तरी आयरलैंड की राजनीति का पता ही है।''
बात करते करते मैरी भावुक हो गई। बलदेव ने कहा-
''मैरी, तेरे साथ कभी डैरी भी चलूँगा, तेरा फोइल भी देखूँगा पर इस वक्त हम थेम्ज़ के किनारे खड़े हैं।''
''तेरे मुल्क में कोई दरिया नहीं ?''
''हैं, मेरे घर के पास ही है सतलज।''
''उसके किनारे खड़े होकर नहीं देखा कभी तुमने ?''
बलदेव सोचने लग पड़ा कि सतलज को कितनी बार देखा था उसने। थेम्ज़ तो छोटा ही था। सतलज तो बहुत बड़ा था। एकदम शिखर पर झील मानसरोवर में से निकलता और सिन्ध तक का सफ़र तय करता दरिया। अब तो बंधा पड़ा था और बरसातों में ही चढ़ता था और कई बार तबाही भी मचाता था। मैरी ने पूछा -
''सतलज कैसा लगता है ?''
उसने सतलज को याद किया। उसे सतलज हँसता हुआ दिखाई दिया जब कि थेम्ज़ अहंकार में रहता था। सतलज को वह थेम्ज़ से ज्यादा जानता था। फिर उसने सोचा कि किन चक्करों में पड़ गया था वह। मैरी ने उसे उलझा हुआ देख कर कहा-
''यहाँ ठंड हो गई है, चल किसी रेस्टोरेंट में चल कर बैठते हैं।''
मैरी आयरलैंड चली गई। उसकी अनुपस्थिति में बलदेव को सबकुछ सूना-सूना लगने लगा। मैरी के बग़ैर उसे इस फ्लैट में रहना ही अच्छा नहीं लगता था पर और करता भी क्या। उसने कुछ घरों और फ्लैटों की लिस्टें देखी थीं पर उसकी पसंद का कहीं कुछ नहीं था। दो बार लिस्टें देखने के पश्चात् वह फिर बैठ गया। कभी कभी उसे नाइजल वाली दुकान हाथ से निकल जाने का दुख होता। अगर दुकान मिल जाती तो उसे काम पर वापस न जाना पड़ता। दुकान में मैरी भी उसकी मदद कर सकती थी। अब तो शिन्दा भी आ गया था। उससे भी काम चला सकता था।
सोहन सिंह के फ्यूनरल के बाद वह शॉप पर बहुत कम जा सका था। शिन्दे को मिलने ही जाता। अजमेर उससे उसके रहने का ठिकाना पूछता तो उसे कई तरह का झूठ बोलना पड़ता था। फ्यूनरल पर आए शौन से पता चल गया था कि शौन को भी उसके पते की जानकारी नहीं थी। शौन से उसने अभी भी मैरी वाली कहानी छिपा रखी थी। फ्यूनरल वाले दिन शौन से उसकी काफी बातें हुई थीं। उसे फोन करने या मिलने का वायदा भी किया था उसने, लेकिन ऐसा कर नहीं सका था। उसका मूड ही नहीं बनता था। काम पर रहने वाली निराशा उसे उदास सा किए रखती। शौन लौट कर काम पर नहीं गया था। उसने घर बैठे ही इस्तीफ़ा भेज दिया था। बलदेव का भी मन होता था कि वह यह काम छोड़ कर दूसरा तलाश ले। इतनी नौकरियाँ थीं लंदन में, मिल ही जाती।
मैरी के बगैर डार्टमाउस हाऊस अलग सा दिखता था और इसके लोग भी। उस दिन जूडी तो उसकी कार के आगे ही आ खड़ी हुई। उसे इमरजेंसी ब्रेक लगानी पड़ी। उसने खीझ कर जूडी की तरफ देखा तो वह हँसने लग पड़ी थी। उसे भी हँसी आ गई थी। जूडी बलिंडा की छोटी बेटी थी। उसने शीशा नीचे किया और कहा -
''क्यों जूडी, मरने का इरादा है ?''
''डेव, मुझे तुझसे एक काम है, ज़रूरी।''
''बता।''
जूडी घूम कर दूसरी ओर गई और कार का दरवाजा खोल कर उसके बराबर आ बैठी और बोली-
''मैरी कब आ रही है ?''
''पता नहीं, सारी रस्में पूरी करके ही लौटेगी। ग्रांट के फ्यूनरल पर जो गई है।''
''उसके बिना अकेला महसूस नहीं कर रहा ?''
''नहीं तो, क्यों पूछ रही है ?''
''डेव, सच यह है कि मैं ब्रोक हूँ, मुझे पैसे की सख्त ज़रूरत है। मैं तुझे गुड टाइम दे सकती हूँ, मुझे कुछ पोंड दे दे।''
''जूडी, मैं ऐसा नहीं हूँ।''
''मैं कहाँ ऐसी हूँ, यह तो मेरा बैनेफिट नहीं आया इसलिए कह रही हूँ, प्लीज़ डेव।''
''जूडी, इस काम के लिए मैं तुझे पैसे नहीं दे सकता। मैं तुझे जानता भी तो नहीं अच्छी तरह।''
''मैं साफ हूँ, विश्वास कर मेरा।''
''सॉरी जूडी, मैं तेरे किसी काम नहीं आ सकता।''
''उधार ही दे दे, दस पोंड, वायदा रहा लौटा दूँगी, प्लीज़ डेव !''
जूडी ने अनुनय की। बलदेव ने जेब में से पाँच पोंड निकाल कर उसे दिए और कहा-
''यही हैं, फाइव ही।''
जूडी ने धन्यवाद कह कर पाँच का नोट पकड़ा। कार में से उतरी और कहने लगी-
''अगर मेरी ज़रूरत हो तो बताना।''
जूडी चली गई। उसके बैठने के साथ ही कार में बू सी बिखर गई थी। यह बू ड्रग पीने के कारण थी। बलदेव ने भी कुछेक बार लेकर देखा हुआ है। उसे उसकी बू बहुत बुरी लगती थी। बलिंडा की दूसरी बेटी पैंट हालांकि सुन्दर थी। वह कहीं काम भी करती थी। बन-संवर कर रहती थी। ग्रांट के मरने पर बलिंडा के सारे परिवार ने ही बारी बारी से उससे अफ़सोस प्रकट किया था। जबकि वह ग्रांट से कभी मिला भी नहीं था। उसकी बॉडी देखने भी नहीं गया था। यह सोच कर वह मन ही मन हँसता और स्वयं को दोषी-सा महसूस करने लगता। बलिंडा का बड़ा बेटा माइकल उसे एक दिन अजमेर की दुकान पर मिला था। वह गे था। उसका ब्वॉय फ्रेंड भी साथ ही था। बलदेव को दुकान में देख कर हैरान होता हुआ बोला-
''डेव, यह तेरी दुकान है ?''
''नहीं, मैं काम करता हूँ, यूँ ही टेम्परेरी ही।''
''हम अपनी संस्था के लिए चंदा इकट्ठा कर रहे हैं, कुछ दे।''
बलदेव ने ना कर दी थी पर टोनी ने दो पोंड दे दिए थे और आँख मारते हुए कहा था -
''ये भले लोग हैं, कठिन समय में काम आते हैं।''
बलिंडा का छोटा बेटा डगलस उसे अक्सर ही सड़क पर या पॉर्क में घूमता मिल जाता। वह लोफरों की भांति उल्टी टोपी पहनता और नाराज़ सा हुआ चलता, पर बलदेव के साथ बढ़िया तरीके से पेश आता था।
कई लोग बलदेव की तरफ अजीब नज़रों से देखते। कई बार उसने घूंट भर पी होती तो राह में खड़े होकर बातें करने लगता। कई बार वह यह भी सोचने लगता कि क्या ये लोग ही उसकी मंजिल हैं या ये फ्लैट या इन फ्लैटों की ज़िन्दगी। उसे अपने आप पर गुस्सा आने लगता कि वह अपने भविष्य के प्रति क्यों लापरवाह हुआ बैठा था।
एक दिन डूडू ने फिर उसे शाम डेसाई की दुकान पर रोक लिया।
वह कहने लगा-
''डेव, तुमने ग्रांट के फ्लैट पर कब्ज़ा कर लिया, यह बहुतों को पसन्द नहीं। इन फ्लैटों में कई नस्लवादी लोग रहते हैं जो बहुत खतरनाक हैं।''
''डूडू, इस फ्लैट से मेरा कोई संबंध नहीं, यह तो मैरी ने संभाल रखा है। मैरी ग्रांट की बहन है।''
''पर लोगों को तू ही दिखाई दे रहा है। तेरा रंग दिख रहा है। मैरी की कोई बात नहीं करता। अपना ध्यान रखना। दरवाजे-खिड़कियाँ अच्छी तरह बन्द करके सोया कर, कोई रात में ही तेरे पर हमला न कर दे। आगज़नी की भी वारदातें होती रहती हैं, मैं पैंतीस नंबर में हूँ।''
00
(क्रमश: जारी…)
लेखक संपर्क :
67, हिल साइड रोड,
साउथाल, मिडिलसेक्स
इंग्लैंड
दूरभाष : 020-८५७८०३९३
07782-265726(मोबाइल)

रविवार, 6 सितंबर 2009

गवाक्ष – सितम्बर 2009



“गवाक्ष” के माध्यम से हम हिन्दी ब्लॉग-प्रेमियों को हिन्दी/पंजाबी के उन प्रवासी लेखकों/कवियों की समकालीन रचनाओं से रू-ब-रू करवाने का प्रयास कर रहे हैं जो अपने वतन हिन्दुस्तान से कोसों दूर बैठकर अपने समय और समाज के यथार्थ को अपनी रचनाओं में रेखांकित कर रहे हैं। “गवाक्ष” के पिछ्ले तेरह अंकों में पंजाबी कवि विशाल (इटली) की कविताओं का हिन्दी अनुवाद, दिव्या माथुर (लंदन) की कहानी, अनिल जनविजय (मास्को) की कविताएं, न्यू जर्सी, यू.एस.ए. में रह रहीं देवी नागरानी की ग़ज़लें, लंदन निवासी कथाकार-कवि तेजेन्द्र शर्मा, रचना श्रीवास्तव, दिव्या माथुर की कविताएं, दुबई निवासी पूर्णिमा वर्मन की कविताएं, यू एस ए में रह रहीं हिन्दी कथाकार-कवयित्री इला प्रसाद, डेनमार्क निवासी कवि भगत धवन की कविताएँ और चाँद शुक्ला की ग़ज़लें, यू एस ए निवासी कवि वेद प्रकाश ‘वटुक’ तथा कवयित्री रेखा मैत्र की कविताएं, कनाडा अवस्थित पंजाबी कवयित्री तनदीप तमन्ना की कविताएं, यू के अवस्थित हिन्दी कवि-ग़ज़लकार प्राण शर्मा की ग़ज़लें, कैनेडा में अवस्थित पंजाबी कवि सुखिन्दर की कविताएं, कनाडा निवासी पंजाबी कवयित्री सुरजीत, अमेरिका अवस्थित डॉ सुधा धींगरा और पंजाबी कथाकार-उपन्यासकार हरजीत अटवाल के उपन्यास “सवारी” के हिंदी अनुवाद की सोलह किस्तें आपने पढ़ीं। “गवाक्ष” के सित्म्बर 2009 अंक में प्रस्तुत हैं – कनाडा में अवस्थित हिंदी- पंजाबी कथाकार - कवयित्री मिन्नी ग्रेवाल की कविताएं तथा यू के निवासी पंजाबी कथाकार-उपन्यासकार हरजीत अटवाल के धारावाहिक पंजाबी उपन्यास “सवारी” की सत्रहवीं किस्त का हिंदी अनुवाद…

कनाडा से
मिन्नी ग्रेवाल की कविताएँ
पंजाबी से अनुवाद : सुभाष नीरव
कविताओं के साथ चित्र : रुचिरा

(१)
तेरे साथ की प्रतीक्षा
तेरे साथ की प्रतीक्षा करते करते
मैं थक गयी हूँ
नज़रें धुंधला गयी हैं
और इस
धुंधलके के कारण
हर अँधेरे पर
तेरे नक्श उभर आते हैं
हर गले में
मैंने बांहें डाल दी हैं.

तेरे स्पर्श का अहसास
अभी तक है
प्यार गुनाह है
तेरा नाम ले नहीं सकती
इस प्यार के अहसास को
घर के पीछे
गड्ढा खोद कर
दबा दिया है
हाथों में कुछ मिटटी
फिर भी
लगी रह गयी है.

(२)
आज फिर
तड़पें लहरें
चीखे हवा
तूफानों से
घिरी यह फिजा
उम्र पुकारती
मंझदार मंझदार

आज फिर
तेरा ख्याल
आता है
बार बार

(३)
चाहतें
उम्र की भट्टी
मोहब्बत की आग
अरमानों के दानें
शर्म की झोली में से
भुन भुन कर
बाहर गिर रहे हैं.

लोक लज्जा के पैमानें
चाहतों की कब्र पर
छलकते ढुलकते
सांसों को दबोच रहे हैं.

(४)
साझा पल
चौराहे पर लोगों का शोर
खंभे की पीली रोशनी
शाम के साये ढल गए.

तेरी प्रतीक्षा में मैं खड़ी हूँ
कि चौराहे से घर तक के
कुछ पल साझे हो सकें

पुराने कपड़े गर्माहट नहीं देते
ठण्ड से दांत बज रहे हैं
काम के बाद बहुत थक गयी हूँ.

कुछ रुपये, ओवर टाइम
गरीबी का लालच, और तू
हमेशा देर से आता है.

अपनी उम्र की पता नहीं
कितनी जवान शामें
इस चौराहे पर ढल जाएँगी.


(५)
रात ने

रात ने आकाश की चादर ओढी
और सो रही
चादर के माथे पर चाँद चमका
और चांदनी बरस पड़ी
चांदनी ने आँखों के दीये जलाये
और लौ हंस पड़ी

उस रात, पर उस रात
न रात सोयी, न चाँद सोया, न सोये तारे
एक अजीब-सा सवाल मुझसे पूछते रहे सारे
जज्बों का मचलना
खुशबुओं का महकना
दूर कहीं किसी की आहट

पत्तों का सरकना, होठों का फड़कना
यह कैसी जिस्म की थरथराहट
थके भंवरे, मदहोश कलियाँ
यह फिजा
रह रह कर मुझको
राज़ कोई समझा रही है.
0

पिछले ३० वर्षों से कैनेडा में रह रहीं सुश्री मिन्नी ग्रेवाल पंजाबी की जानी-मानी लेखिका हैं. इनके अबतक पंजाबी में तीन कहानी संग्रह "कैक्टस दे फुल्ल", "फानूस" और "चांदी डा गेट" तथा हिंदी में "दो आसमान" प्रकाशित हो चुके हैं. इसके अतिरिक्त पंजाबी में एक कविता संग्रह "फुल्ल-पत्तियां" प्रकाशित हो चूका है और एक पुस्तक "सरहदों पार मील" प्रकाशनाधीन है.
संपर्क : 5, Sylvid Court, Loretto On LoG ILO, CANADA
ई-मेल : minniegrewal@sympatico.ca

धारावाहिक पंजाबी उपन्यास(किस्त- 17)



सवारी
हरजीत अटवाल
हिंदी अनुवाद : सुभाष नीरव
चित्र : रुचिरा

॥ बाईस ॥
तीनों भाई ही शिन्दे को एअरपोर्ट से लेने गए थे. बलदेव की कार थी. सतनाम और बलदेव पब में जा बैठे और अजमेर हांक लगने की प्रतीक्षा करता रिसेप्शनिस्ट के पास खडा हो गया, जहाँ इमिग्रेशन ऑफिसर ने शिन्दे की शिनाख्त और जिम्मेवारी के लिए आना था. अजमेर थोडा नर्वस हो रहा था की कहीं लौटा ही न दें. अभी वीज़ा सिस्टम शुरू नहीं हुआ था. शोर था कि जल्द ही दिल्ली से ही वीज़ा लेकर आना पड़ा करेगा. अभी सिर्फ एंट्री ही हुआ करती थी और एंट्री में स्पांसरशिप भेजने वाले की जिम्मेवारी अहम् होती थी.

सतनाम अपनी मस्ती में बैठा बियर पीता रहा. बलदेव ने हाफ बियर ही ली थी. कुछ देर बाद शिन्दा अजमेर के पीछे रोता हुआ चला आ रहा था. उनके पास पहुँच कर उसका रोना और तेज़ हो गया. आस पास के लोगों ने उनकी तरफ देखना शुरू कर दिया. सतनाम गुस्से में बोला -
"गला क्यों फाड़ रहा है ?... साला राजिंदर कुमार !"
शिन्दा थोडा शांत हुआ. जब वह उनके गले मिला तो फिर उसने पुकारा -
"हाय भाइया !"
"ओय तू चुप कर, अपने हिस्से का ही रो, हमारा भी टैम न उठाये जा."
बलदेव ने उसका कन्धा थपथपा कर उसे हौसला दिया. कार में बैठने तक शिन्दा सिसकता रहा था. सतनाम ने कहा-
"शिन्दे, रुमाल है ?"
"हाँ, है. चाहिए ?"
"नहीं, अपना ही नाक साफ़ कर ले."
शिन्दा शर्मिंदा सा होकर मुस्कराया और नाक और आँखें साफ़ करने लगा. थोडा और आगे पहुंचे तो शिन्दा बलदेव से बोला-
"बलदेव, कहीं राह में रेहड़ी के पास रोकना, बच्चों के लिए केले ले चलें."
"साले, तूने लन्दन को चबेयाल का अड्डा समझ लिया है क्या ?"
सभी हंसने लगे. शिन्दा शर्मिंदा सा हो गया. फिर अजमेर ने मिन्दो और बच्चों का हाल चाल पूछा. शिन्दा राह में आयी मुश्किलों के बारे में बताने लगा. सतनाम उससे जहाज़ में बैठने के तजुर्बे के बारे में पूछ रहा था. बात घूम कर फिर सोहन सिंह पर आ गयी. शिन्दा फिर रोने लगा. सतनाम ने अजमेर से पूछा-
"भाई, मोर्चरी कितने बजे बंद करते हैं ?"
"मेरे हिसाब से तो चौबीस घंटे खुली रहती है. हम तो रात में आठ - नौ बजे ही जाया करते हैं."
“फिर शिन्दे पुत्त को भाइये के दर्शन करवा कर ही चलें. कहीं रो रो कर यह भी हार्ट अटैक न करा बैठे."
बलदेव ने कार अस्पताल की तरफ मोड़ ली. वो भी भाइये को देखना चाहता था. सिर्फ एकबार ही आया था. मन में खुद को बस यही दलील देता रहता की भाइया तो अब मिटटी है. मिटटी का क्या देखना ? मैरी ग्रांट को देख कर लौटने के बाद रोती रहती थी. उसे अधिक रोना बुरा लगता था. मैरी ग्रांट की देह को आयरलैंड लेकर गयी थी. सारी कागजी कारवाई के दौरान वह मैरी के संग रहा था इसी शर्त पर कि वह रोएगी नहीं. मैरी फिर भी अपना और ग्रांट का बचपन याद करके सिसकने लगती. भाइये का फ्यूनरल शिन्दे के इंतजार में बहुत लेट हो गया था. बलदेव को कोफ्त सी होने लगती थी कि इस कारण कितने ही काम रुके पड़े थे.

विटिंगटन हॉस्पिटल के ऐन पीछे बड़ी सी शैड नुमा ईमारत थी, जहाँ लाशें अंडरटेकर द्वारा ले जाने कि प्रतीक्षा कर रही होती थीं. और जहाँ आगे उनका संस्कार होना होता था.

उस दिन सभी जज्बाती हो गए जब वे सोहन सिंह को स्नान करवाने गए थे. अजमेर कहने लगा-
"तुम लोग जाओ, मुझे तो कुछ हो जायेगा, मेरा तो दिल है नहीं, कमज़ोर है."
"हमने कौन सा दिल को रिबटें लगवा रखी हैं."
सतनाम ने उसे संग ले जाते हुए कहा. अजमेर ने दिल मज़बूत करने के लिए एक पैग लगा लिया. फिर बाकी के भी पीछे न रहे. टोटनहैम हाई रोड पर अंडरटेकर का दफ्तर था. दफ्तर के पीछे कफ़न बनाने वालों का कारखाना था और उसके पीछे लाशों को नहलाने का प्रबंध था. प्लेटफोर्म के ऊपर देह को डाला हुआ था. साथ ही शावर लगा हुआ था.बिज़ली की शक्ति से प्लेटफोर्म आडा -तिरछा हो जाता था ताकि देह को इधर उधर पलटा जा सके. उन सबने सोहन सिंह की देह को दही से नहलाया. नए कपडे पहनाये. शिन्दे ने उसके सिर पर पगडी बाँधी. वे सभी ये सब काम चुपचाप करते रहे. शिन्दे के साथ साथ अजमेर भी हल्का-सा रोता रहा. सतनाम और बलदेव भी खुद को रोक न पाए. जब तैयार करके उसे कफ़न में लपेटा तब सभी रोने लग पड़े. आँखे पौंछते हुए सतनाम ने कहा-
"बच गए. कहीं भाइया वस्मा लगता होता तो इसकी दाढी भी काली करनी पड़ती."
वे सभी हंस पड़े. हँसे भी इतनी जोर से कि अंडरटेकर का एक कर्मचारी उन्हें देखने आ गया. उनका मूड अब कुछ बदला. शिन्दा बोला -
"यह तो भाई तुम्हारा सिस्टम बढ़िया है. वहां इंडिया में तो कुछ नहीं, ऊँचे खू (कुएं) वालों का बूढा मर गया, साले का सवा क्विंटल भार, दस बन्दों से भी ना संभाला जाए."
सतनाम ने अजमेर से कहा -
"भाई, आज तो हमें भाइये वाली ब्रांडी पीनी चाहिए थी, उसके नाम पर. और फिर ठण्ड भी है."
"अब जाकर पी लेते हैं."
अजमेर ने उत्तर दिया और कल के बारे में सोचने लगा. कल फ्यूनरल था. फ्यूनरल उसके लिए बहुत बड़े दिन की तरह था. इस दिन की उसने बहुत तैयारी कर रखी थी. दूर-दूर तक इसके खबर भेजी थी. पंजाबी की साप्ताहिक अख़बार में भी निकाला था. वह सबके कार्य व्यवहारों में पहुंचा करता था. उसे आस थी कि सभी आयेंगे और आये भी सब. मंजीत के रिश्तेदार, गुरिंदर की मौसी और दूर का लगता एक मामा. अजमेर के गाँव के लोग भी पहुंचे.

ग्यारह बजे लाश को लेकर काली लम्बी कार उनके घर आ पहुंची. सारा हाईबरी कोर्नर ही लोगों से भर गया. कारें खडीं करने के लिए तो जगह ही नहीं बची. ट्रैफिक रुक गया. पुलिस को आकर लोगों की मदद करनी पड़ी. आधा घंटा भर लाश घर में रही. बॉक्स को स्टैंड पर रखा हुआ था. इस काम के लिए उन्होंने पिछला स्टोर रूम खाली कर लिया था. एक एक करके लोग आते और सोहन सिंह का दर्शन करके आगे बढ़ जाते. भाई ने अरदास की. बॉक्स को कार में रखा. दो और लम्बी कारें थीं जिनमें परिवार और अन्य करीबी औरतें -बच्चे बैठे. यह काफिला साउथ गेट गुरूद्वारे की तरफ रवाना हो लिया. पूरे उत्तरी लन्दन को यही गुरुद्वारा लगता था. वहां पहुँच कर फिर बक्से को कार में से उतार कर स्टैंड पर टिकाया गया. अन्दर भाई ने अरदास की. बक्से का ढक्कन खोल दिया गया. जिन्होंने सोहन सिंह के दर्शन नहीं किये थे, उन्होंने भी कर लिए. आधा घंटा वहां रुके. यहाँ से फिर एक लम्बे काफिले के रूप में फिंचले कैरीटोरियम की ओर चल दिए. वे चारों भाई एक ही कार में थे. सतनाम कहने लगा-
"ले भाई भाइया खट गया . इतने लोग, इतनी कारें कि सडकों का ट्रैफिक जाम हो गया. मानो भाइया ना हुआ, कोई हीरो हो गया."
"यही तो मैं तुमसे कहा करता हूँ कि भाई बना कर रखो. अब इतने लोगों के आने से अपनी कितनी इज्ज़त बढ़ी. हम इक्कठे चलते हैं तो शोभा होती है."
"भा, ठीक है तेरी बात, पर यह सब तेरे कारण ही है. भाइया तो सांई लोक था. यह सब तेरे कारण ही आये हैं." सतनाम ने कहा. अजमेर यही सुनना चाहता था. बलदेव को चुप देख कर सतनाम ने उसे छुआ. वह भी सतनाम की हाँ में हाँ मिलाने लगा. कार में से निकल कर सतनाम बलदेव से धीमे से बोला-
"तूने मुंह को क्यों ताला लगा रखा था, अगर प्रेम चोपडा की बडाई हो जाती है तो फ्युनरल पर खर्च किये गए उसके पैसे हरे हो जायेंगे."
"सारा टब्बर ही मरासियों का हो जाए तो अच्छी बात नहीं."
"बाहर जाकर तो नहीं करते हम किसी की चमचागिरी. बड़े भाई की ही करते हैं. और एक बात तुझे भी बताऊँ, तू कुछ ज्यादा ही चुप रहने लगा है, जल्दी ही कोई औरत ढूंढ ले अपने लिए."
औरत के नाम पर शिन्दा भी उनके पास आ खडा हुआ. सतनाम ने कहा-
"इसे देख कैसे टोह लेता फिरता है कुत्ते की तरह."

बातें करते हुए वे हाल के अन्दर जा घुसे. हाल बहुत छोटा रह गया था. इतनी भीड़ के आगे. सोहन सिंह का बक्सा मंच पर रखा गया. भाई ने फिर अरदास की. अजमेर ने बटन दबाया. बॉक्स धीरे धीरे अन्दर जाने लगा. फिर परदे की ओट हो गया. कुछेक लोग सबूत के लिए बॉक्स को बिजली से जलता देखने के लिए अन्दर चले गए. शेष लोग बाहर निकल कर चिमनी की ओर देखने लगे, जहाँ से धुंआ निकलना था.
कैरीटोरियम से सब लोग गुरूद्वारे में आ गए. जहाँ भोग पड़ना था. लोगों ने रोटी खाकर अपने घरों को वापस लौट जाना था. कुछ लोग पब को जाने वाले थे, ख़ास तौर पर पैट्रो, माइको, जुआइस, मगील आदि. कुछ और अजमेर के गौरे ग्राहक भी थे, जिन्होंने रस्म के बाद बियर पीनी थी. साउथ गेट के गुरूद्वारे के साथ ही पब था. बलदेव की ड्यूटी सब को पब में ले जाने की लगी हुई थी. शौन और गैरथ के आने के कारण उसे पब में वैसे भी जाना ही था.
00
(क्रमश: जारी…)

लेखक संपर्क :
67, हिल साइड रोड,
साउथहाल, मिडिलसेक्स
इंग्लैंड
दूरभाष : 020-85780393
07782-265726(मोबाइल)

शुक्रवार, 24 जुलाई 2009

गवाक्ष – जुलाई 2009


“गवाक्ष” के माध्यम से हम हिन्दी ब्लॉग-प्रेमियों को हिन्दी/पंजाबी के उन प्रवासी लेखकों/कवियों की समकालीन रचनाओं से रू-ब-रू करवाने का प्रयास कर रहे हैं जो अपने वतन हिन्दुस्तान से कोसों दूर बैठकर अपने समय और समाज के यथार्थ को अपनी रचनाओं में रेखांकित कर रहे हैं। “गवाक्ष” के पिछ्ले तेरह अंकों में पंजाबी कवि विशाल (इटली) की कविताओं का हिन्दी अनुवाद, दिव्या माथुर (लंदन) की कहानी, अनिल जनविजय (मास्को) की कविताएं, न्यू जर्सी, यू.एस.ए. में रह रहीं देवी नागरानी की ग़ज़लें, लंदन निवासी कथाकार-कवि तेजेन्द्र शर्मा, रचना श्रीवास्तव, दिव्या माथुर की कविताएं, दुबई निवासी पूर्णिमा वर्मन की कविताएं, यू एस ए में रह रहीं हिन्दी कथाकार-कवयित्री इला प्रसाद, डेनमार्क निवासी कवि भगत धवन की कविताएं, डेनमार्क निवासी चाँद शुक्ला की ग़ज़लें, यू एस ए निवासी कवि वेद प्रकाश ‘वटुक’ तथा कवयित्री रेखा मैत्र की कविताएं, कनाडा अवस्थित पंजाबी कवयित्री तनदीप तमन्ना की कविताएं, यू के अवस्थित हिन्दी कवि-ग़ज़लकार प्राण शर्मा की ग़ज़लें, कैनेडा में अवस्थित पंजाबी कवि सुखिन्दर की कविताएं, कैनडा निवासी पंजाबी कवयित्री सुरजीत की कविताएं और पंजाबी कथाकार-उपन्यासकार हरजीत अटवाल के उपन्यास “सवारी” के हिंदी अनुवाद की पन्द्रह किस्तें आपने पढ़ीं। “गवाक्ष” के जुलाई 2009 अंक में प्रस्तुत हैं – अमेरिका में अवस्थित हिंदी- पंजाबी कथाकार - कवयित्री सुधा ओम ढींगरा की कविताएं तथा यू के निवासी पंजाबी कथाकार-उपन्यासकार हरजीत अटवाल के धारावाहिक पंजाबी उपन्यास “सवारी” की सोलहवीं किस्त का हिंदी अनुवाद…


अमेरिका से
डॉ0 सुधा ओम ढींगरा की दो पंजाबी कविताएं
हिंदी रूपांतर : सुभाष नीरव


(1) माँ मैं खुश हूँ

परदेस से चिट्ठी आई
माँ की आँख भर आई
बेटी ब्याही
परदेस गई
बरस बीते, लौट कर न आई
चिट्ठी खोली,
पढ़ न पाई
ऑंसुओं ने झड़ी लगाई।

लिखा था-
माँ, मैं खुश हूँ
चिंता न करना
घर ले लिया है किस्तों पर
कार ले ली है किस्तों पर
फर्नीचर ले लिया किस्तों पर
यहाँ तो सब कुछ
खरीदा जाता है किस्तों पर।

आगे लिखा था-
घर के सारे काम
मैं करती हूँ
खानसामा यहाँ मैं
सफाईवाली यहाँ मैं
हलवाई यहाँ मैं
सब कुछ मैं ही हूँ माँ।
न रोक, न टोक
सवेर से शाम तक बिजी।

और लिखा था-
ना शोर, ना शराबा
हवा तक न कुसकती
परिन्दों की आवाज़
भी नहीं आती
साफ-सुथरा है यह देश
मुझे भाता है इसका वेश
लम्बा पहनो या छोटा पहनो
कुछ भी पहनो या ना पहनो
कोई परवाह नहीं किया करते।

माँ तू कहा करती थी
चादर देख पैर पसारो
पर यहाँ रिवाज निराला
चादर के बाहर पैर पसारो
इसी में देश की खुशहाली है
क्रैडिट कार्ड पर खर्चा करो
बैंकों से कर्ज़ा लो...

माँ पढ़ती गई...

पाँच दिन खूब काम करते हैं
रात में जल्दी सो जाते हैं
हफ्ते के अन्त में
पार्टियाँ किया करते हैं
बात बात पर बस
देश को याद करते हैं।

यह पढ़ माँ उदास हो गई...

देश बहुत याद आता है माँ
यहाँ की खुशहाली
सजावट, दिखावट में
वह रस नहीं
जो अभावों के मारे
अपने देश में है
यहाँ की रंगीनी में
वे रंग नहीं जो
अपने सरल देश में हैं
यहाँ की सुन्दरता, तरक्की में
वो प्यार अपनापन नहीं
जो मेरे गरीब देश में है
माँ मैं खुश हूँ
तुम चिंता न करना
दो बरस और नहीं आ पाऊँगी
ग्रीन कार्ड मिलने में
अभी टाइम है।

(2) दिल

अनेक भावों को इकट्ठा करके
कुदरत ने जब
नौ रस में मिलाया
फिर नौ रसों को एक रस करके
एक आकार बनाया
जब आई प्रियतम की याद
लगा वह फड़कने
यह फड़कन जब बन गई धड़कन
तब यह ‘दिल’ कहलाया।
00


सुधा ओम ढींगरा
जन्मस्थान : जालंधर, पंजाब (भारत)
शिक्षा : बी.ए.आनर्ज़, एम.ए. ,पीएच.डी ( हिंदी ), पत्रकारिता में डिप्लोमा.
विधायें : कविता, कहानी, उपन्यास, इंटरव्यू, लेख एवं रिपोतार्ज.

प्रकाशित साहित्य : मेरा दावा है (काव्य संग्रह-अमेरिका के कवियों का संपादन),तलाश पहचान की (काव्य संग्रह) ,परिक्रमा (पंजाबी से अनुवादित हिन्दी उपन्यास), वसूली (कथा- संग्रह हिन्दी एवं पंजाबी), सफर यादों का (काव्य संग्रह हिन्दी एवं पंजाबी), माँ ने कहा था (काव्य सी .डी ). पैरां दे पड़ाह , (पंजाबी में काव्य संग्रह), संदली बूआ (पंजाबी में संस्मरण). १२ प्रवासी संग्रहों में कविताएँ, कहानियाँ प्रकाशित.

अन्य गतिविधियाँ एवं विशेष : विभौम एंटर प्राईसिस की अध्यक्ष, हिन्दी विकास मंडल (नार्थ कैरोलाइना) के न्यास मंडल में हैं. अंतर्राष्ट्रीय हिन्दी समिति (अमेरिका) के कवि सम्मेलनों की राष्ट्रीय संयोजक हैं. 'प्रथम' शिक्षण संस्थान की कार्यकारिणी सदस्या एवं उत्पीड़ित नारियों की सहायक संस्था 'विभूति' की सलाहकार हैं. हिन्दी चेतना (उत्तरी अमेरिका की त्रैमासिक पत्रिका) की सह- संपादक हैं. पत्रकार हैं -अमेरिका से भारत के बहुत से पत्र -पत्रिकाओं एवं वेब पत्रिकाओं के लिए लिखतीं हैं. अमेरिका में हिन्दी के प्रचार-प्रसार के लिए अनगिनत कार्य किये हैं. हिन्दी पाठशालाएं खोलने से ले कर यूनिवर्सिटी में हिन्दी पढ़ाई. इंडिया आर्ट्स ग्रुप की स्थापना कर हिन्दी के बहुत से नाटकों का मंचन कर लोगों को हिन्दी भाषा के प्रति प्रोत्साहित कर अमेरिका में हिन्दी भाषा की गरिमा को बढ़ाया है. अनगिनत कवि सम्मेलनों का सफल संयोजन एवं संचालन किया है. रेडियो सबरंग (डेनमार्क) की संयोजक. टी.वी , रेडियो एवं रंगमंच की प्रतिष्ठित कलाकार. पंजाबी एवं हिन्दी में लेखन.
पुरस्कार- सम्मान : १) अमेरिका में हिन्दी के प्रचार -प्रसार एवं सामाजिक कार्यों के लिए वाशिंगटन डी.सी में तत्कालीन राजदूत श्री नरेश चंदर द्वारा सम्मानित. २) चतुर्थ प्रवासी हिन्दी उत्सव २००६ में ''अक्षरम प्रवासी मीडिया सम्मान.'' ३) हैरिटेज सोसाइटी नार्थ कैरोलाईना (अमेरिका ) द्वारा ''सर्वोतम कवियत्री २००६'' से सम्मानित , ४) ट्राईएंगल इंडियन कम्युनिटी, नार्थ - कैरोलाईना (अमेरिका) द्वारा ''२००३ नागरिक अभिनन्दन''. हिन्दी विकास मंडल , नार्थ -कैरोलाईना(अमेरिका), हिंदू- सोसईटी , नार्थ कैरोलाईना (अमेरिका), अंतर्राष्ट्रीय हिन्दी समिति (अमेरिका) द्वारा हिन्दी के प्रचार-प्रसार एवं सामाजिक कार्यों के लिए कई बार सम्मानित.
संपर्क--101 Guymon Ct., Morrisville, NC-27560. U.S.A.
E-mail-sudhaom9@gmail .com
Phone-(919) 678-9056

धारावाहिक पंजाबी उपन्यास(किस्त- 16)


सवारी
हरजीत अटवाल
हिंदी अनुवाद : सुभाष नीरव

॥ इक्कीस ॥

दुकान में से निकलकर उसने पीछे की ओर देखा। उसे लगा मानो वहाँ भाइया खड़ा हो और उसने हँसते हुए उससे कुछ कहने के लिए मुँह खोला हो। वह सोचने लगा कि वह अभी पत्थर नहीं हुआ जैसा कि सभी कह रहे थे। उसके अन्दर अभी भी भावनाएँ जिन्दा थीं। वह पिता को याद करता हुआ कार की तरफ चल पड़ा। न-न करने के बावजूद सतनाम ने उसे दो भारी पैग पिला ही दिए थे। उसके लिए ये काफी थे। कार चलाने के लिए भी खतरनाक थे। वह अपने लायसेंस को लेकर बहुत भयभीत रहता था। आजकल रोका भी बहुत जाता था। राहों में पुलिसवाले स्पॉट चैक के लिए खड़े हो जाते थे। उसने डरते हुए ही कार स्टार्ट की। कार आगे बढ़ी तो उसे यकीन हो गया कि वह कार ठीक चला रहा था, कोई खतरा नहीं था। हौलो वे रोड तक वह बिलकुल ठीक आया। आगे सिनेमा के पास से सीधी टफनल पार्क की ओर मोड़ ली। सामने से पुलिस की कार आ रही थी। एक बार तो वह सिर से पांव तक कांप उठा। लेकिन पुलिस आगे बढ़ गई। उसकी सांस में सांस आया। जब से उसके एक परिचित का लायसेंस गया था, वह स्वयं डर-डर कर कार चलाने लगा था।
स्टेशन के साथ लगने वाले ऑफ़ लायसेंस के सामने कार रोक ली। घर के लिए उसे ड्रिंक चाहिए थी। वह मैरी का खर्चा नहीं करवाना चाहता था इसलिए घर का सारा सामान स्वयं ही लाता। मैरी के नाम पर फोन भी लगवा दिया था। घर की कुछ और भी वस्तुएं ली थीं। उसने वोदका की बड़ी बोतल और जूस के डिब्बे लिए। वह व्हिस्की पीता आया था, पर मैरी वोदका पसंद करती थी। दुकान का मालिक शाम देसाई कुछ ही दिनों में उसका परिचित बन गया था। वह उसका बड़ा ग्राहक था। पन्द्रह बीस पौंड की शॉपिंग कर लेता। शाम देसाई उसको देखते ही खुश हो जाता, पर आज बलदेव की आँखें चढ़ी होने के कारण चुप रहा। उसे अनुभव था कि शराबी आदमी के साथ अधिक बात नहीं करते।
दुकान में खड़े एक अन्य ग्राहक ने उससे कहा-
''हैलो मिस्टर, हाउ आर यू ?''
''फाइन...फाइन।'' कह कर बलदेव ने उसकी तरफ देखा। वह व्यक्ति न तो काला था, न ही इंडियन। वह उसे पहचानने की कोशिश करने लगा कि उसने हैलो क्यों कहा होगा। उस व्यक्ति ने बलदेव के मन की बात समझते हुए कहा-
''मेरा नाम डूडू है। मैं पैंतीस नंबर में रहता हूँ। तू ग्रांट वाले फ्लैट में आया है ना ?''
''नहीं डूडू, वहाँ मेरी गर्ल फ्रेंड मैरी रहती है।''
''उसका तो मुझे पता है, पर सभी कहते हैं कि तू ही रहता है।''
''नहीं डूडू, मेरा कुछ पता नहीं। पर तू क्यों फिक्र कर रहा है ?''
''क्योंकि मैं तेरा शुभचिंतक हूँ, तेरा भला सोचता हूँ। इस जगह तू नया है, मैं बहुत समय से रह रहा हूँ। अगर कोई ज़रूरत पड़े तो पैंतीस नंबर याद रखना।''
''शुक्रिया डूडू, जो भी तुझे हमदर्दी मेरे साथ है, उसके लिए शुक्रिया।''
''पाकिस्तानी है ?''
''नहीं, इंडियन।''
''मैंने तो यूँ ही मूंछें देख कर पूछ लिया... मैं भी इंडियन ही हूँ, पर मेरे बड़े बुजुर्ग़ वैस्ट इंडीज जा कर बस गए थे, अब वैस्ट इंडियन ही हूँ।''
बलदेव उसे बॉय-बॉय कह कर चल पड़ा। उसने पैंतीस नंबर एक बार फिर याद करवाया। बलदेव कार में बैठा डूडू के बारे में सोचने लगा कि उसने ऐसा क्यों कहा। शायद लोग उसके बारे में बातें करते हों। नये आए व्यक्ति के बारे में किया ही करते हैं। लोग सोचते होंगे कि मैं ग्रांट वाला फ्लैट हथियाना चाहता हूँ। अपनी ओर अजीब नज़रों से झांकते लोग तो उसने कई बार देखे थे। कोई उसे खतरा समझेगा, ऐसा उसने कभी नहीं सोचा था। उसने कार खड़ी की। बैग उठा कर फ्लैट की सीढ़ियाँ चढ़ने के लिए आगे बढ़ा। ग्राउंड फ्लोर वाले फ्लैट में हमेशा की तरह कुत्ते के भौंकने की आवाज़ आई। यहाँ एक स्कॉटिश परिवार रहता था। माँ और चार जवान बच्चे। दो लड़कियाँ और दो लड़के। कई बार उनसे हैलो-हैलो हो जाया करती थी। दरवाजा खुला होने के कारण कुत्ता बाहर की ओर दौड़ा आया। बलदेव की ओर झपटने ही लगा था कि बलदेव ने उसे डांटा और उंगली दिखाते हुए कहा-
''क्वाइट एंड सिट डाउन।''
कुत्ता पूंछ हिलाता हुआ बैठ गया। फिर उसने इशारा करते हुए कहा- ''गो इन साइड।''
कुत्ता अन्दर की ओर दौड़ गया। कुत्ते को काबू में करने का यह गुर उसे गैरथ डेवी ने सिखाया था। उसने कहा था, ''कुत्ता तुम्हें अजनबी समझ कर भौंकेगा, हुक्म मानेगा अपना समझ कर। कुत्ते को आर्डर दो, वह तुम्हें अपना नया मालिक समझ कर कहना मानेगा। कुत्ते के दो ही प्रमुख काम होते हैं, एक भौंकना और दूसरा कहना मानना।''
गैरथ की बातें सुन कर बलदेव कह उठा था-
''वाह गैरथ ! क्या साइंटेफिक उदाहरण दी है, बहुत सारी फिलॉसफी से भरी हुई। कुत्ता भले ही आदमी के भेस में ही क्यों न हो, उसके दो ही काम है- भौंकना और सुनना।''
वह गैरथ के विषय में सोच रहा था कि बूढ़ी बलिंडा का छोटा बेटा डगलस दरवाजे में आ खड़ा हुआ। वह भी कुत्ते को झिड़कता हुआ बोला-
''सॉरी डेव, यह खतरनाक नहीं है।''
''कोई बात नहीं डग्गी, खतरनाक भी हो तो कोई बात नहीं, कुत्तों को संभालना मुझे आता है।''
कह कर वह हँसा। डगलस उससे बातें करना चाहता था, पर बलदेव अलविदा कहते हुए सीढ़ियाँ चढ़ गया। वह सोच रहा था कि अब तक तो सारी एस्टेट ही उसका नाम जान गई होगी। इस कम्युनिटी का हिस्सा ही बन गया था वह हालांकि कई लोग उसे पसंद भी नहीं करते होंगे। उसे इस बात की खुशी थी कि मैरी के साथ उसकी ठीक ठाक निभ रही थी। इतने दिन हो गए थे एक साथ रहते, वे खुश थे। कितने दिन और खुश रहेंगे, इसका उसे पता नहीं था। फिर उसे चिंता सताने लगी कि अपना फ्लैट खरीदने के बारे में वह देर किए जा रहा था। उसे चाहिए था कि जल्दी ही कुछ करे।
उसने दरवाजा खोला। मैरी अभी तक लौटी नहीं थी। अवश्य कहीं बैठ गई होगी। अस्पताल का विजिटिंग टाइम आठ बजे तक का था। वह आठ बजे तक बैठने वाली नहीं थी और अब नौ बजने को थे। उसने बोतल, जूस और गिलास मेज पर रखे और मैरी का इंतज़ार करने लगा। मैरी की प्रतीक्षा करते हुए वह सोच रहा था कि उसे उसके साथ मोह हो गया था। उसके अन्दर मोह की भावना बहुत प्रबल थी। उसे गुरां के साथ कितना मोह था, फिर शैरन के साथ, फिर अपनी दोनों बेटियों के साथ। सिमरन ही थी जिससे उसका मोह नहीं हो सका था। भाइये के साथ भी उसका बहुत प्यार था। भाइया भी उसकी तरह बहुत खुल कर बात नहीं करता था। उसे पहले ताया ने दबाये रखा और फिर अजमेर ने। उसे अपने फैसले करने का अवसर ही नहीं मिला। यही हालत उसकी अपनी थी। भाइये की तरह उसमें भी कहीं आत्म-विश्वास की कमी रह गई होगी। उसे भाइया अपने आस पास महसूस होने लगा।
उसने उठ कर अपने लिए पैग बना लिया। मैरी जब आएगी, तब आएगी। वह क्यों ऐसे ही बैठा रहे। मैरी के साथ बैठ कर उसे शराब पीना अच्छा लगता था। मैरी के साथ वह बहुत सारी बातें खुल कर करता। वह जल्दी ही समझ गया था कि एक मुद्दत से ढकी हुई रूह को वह मैरी के सामने किसी भी हद तक नंगा कर सकता था। कभी कभी वह हैरान भी होने लगता कि जो अपने हैं, उनसे पर्दे रखने पड़ते हैं, पर बेगानों से कैसा पर्दा !
उसे फिर भाइया की याद आने लगी। उसे लग रहा था कि वह कहीं अनावश्यक रूप से भावुक न हो बैठे। भावुक होना उसे अच्छा नहीं लगता था।
वह फिर से मैरी के विषय में सोचने लगा कि कहाँ रह गई वह। एक बार तो दिल किया कि उठ कर नॉर्थ स्टार पब में ही देख आए, पर वह बैठा रहा।
उसे पता था कि मैरी अभी आ जाएगी। अपने कपड़े इस तरह उतार कर फेंकेगी मानो वे उसके लिए जंजीरें हों और आस पास इस तरह फेंकेगी मानो दुबारा उनकी ज़रूरत ही नहीं पडेग़ी। वैसे भी घर में वह अधिकांश समय अंडी में ही रहती। उसकी छातियाँ बहुत खूबसूरत थीं। बलदेव तारीफ करने लगता तो वह कहती-
''अभी तो मिच ने इन्हें चूसा है, टैंड ने भी शेप खराब की है, नहीं तो मेरी छातियों की सही शेप और सही जगह...।''
वह सोच ही रहा था कि वह आ गई। बलदेव ने मैरी की ओर गौर से देखा। उसका चेहरा उतरा हुआ था। वह नशे में थी। बलदेव ने उसकी तरफ देख कर मुस्कराने की कोशिश की और कहा -
''बहुत लेट हो गई ?''
''हाँ, पीने बैठ गई थी।''
कह कर वह कपड़े उतारने लगी जैसे वह प्राय: उतारा करती थी और फिर बलदेव के पास आ बैठी। बलदेव ने उसे पैग पकड़ाया और पूछा-
''आज का दिन कैसा रहा ?''
''ठीक था।'' उसने अपने पैग में से बड़ा सा घूंट भरा और एक ओर रख दिया। उसने बलदेव को चूमा और कहा-
''डेव, आय लव यू।''
''मी टू डार्लिंग।''
बलदेव ने कहा। मैरी उसकी कमीज के बटन खोलने लगी और बैड पर ले गई। उसके अंगों को सहलाते हुए उसने उसे कस कर आलिंगन में भर लिया और रोने लगी। बोली-
''डेव, ग्रांट मर गया है।'' और फिर उसे बेतहाशा चूमते हुए कहने लगी-
''कम ऑन माई लव ! कम ऑन !''
00
(क्रमश: जारी…)

लेखक संपर्क :
67, हिल साइड रोड,
साउथहाल, मिडिलसेक्स
इंग्लैंड
दूरभाष : 020-85780393
07782-265726(मोबाइल)




अनुरोध
“गवाक्ष” में उन सभी प्रवासी लेखकों/कवियों की समकालीन रचनाओं का स्वागत है जो अपने वतन हिंदुस्तान की मिट्टी से कोसों दूर बैठ अपने समय और समाज के यथार्थ को हिंदी अथवा पंजाबी भाषा में अपनी रचनाओं के माध्यम से रेखांकित कर रहे हैं। रचनाएं ‘कृतिदेव’ अथवा ‘शुषा’ फोन्ट में हों या फिर यूनीकोड में। रचना के साथ अपना परिचय, फोटो, पूरा पता, टेलीफोन नंबर और ई-मेल आई डी भी भेजें। रचनाएं ई-मेल से भेजने के लिए हमारा ई-मेल आई डी है- gavaaksh@gmail.com