सोमवार, 16 सितंबर 2013

गवाक्ष – सितंबर, 2013



जनवरी 2008 गवाक्ष ब्लॉग के माध्यम से हम हिन्दी ब्लॉग-प्रेमियों को विदेशों में रह रहे हिन्दी/पंजाबी के उन लेखकों/कवियों की समकालीन रचनाओं से रू--रू करवाने का प्रयास करते आ रहे हैं जो अपने वतन हिन्दुस्तान से कोसों दूर रहकर अपने समय और समाज के यथार्थ को अपनी रचनाओं में रेखांकित कर रहे हैं। गवाक्ष में अब तक विशाल (इटली), दिव्या माथुर (लंदन), अनिल जनविजय (मास्को), देवी नागरानी(यू.एस..), तेजेन्द्र शर्मा(लंदन), रचना श्रीवास्तव(लंदन), पूर्णिमा वर्मन(दुबई), इला प्रसाद(यू एस ए), भगत धवन (डेनमार्क), चाँद शुक्ला (डेनमार्क), वेद प्रकाश वटुक’(यू एस ए), रेखा मैत्र (यू एस ए), तनदीप तमन्ना (कनाडा), प्राण शर्मा (यू के), सुखिन्दर (कनाडा), सुरजीत(कनाडा), डॉ सुधा धींगरा(अमेरिका), मिन्नी ग्रेवाल(कनाडा), बलविंदर चहल (न्यूजीलैंड), बलबीर कौर संघेड़ा(कनाडा), शैल अग्रवाल (इंग्लैंड), श्रद्धा जैन (सिंगापुर), डा. सुखपाल(कनाडा), प्रेम मान(यू.एस..), (स्व.) इकबाल अर्पण, सुश्री मीना चोपड़ा (कनाडा), डा. हरदीप कौर संधु(आस्ट्रेलिया), डा. भावना कुँअर(आस्ट्रेलिया), अनुपमा पाठक (स्वीडन), शिवचरण जग्गी कुस्सा(लंदन), जसबीर माहल(कनाडा), मंजु मिश्रा (अमेरिका), सुखिंदर (कनाडा), देविंदर कौर (यू के), नीरू असीम(कैनेडा), इला प्रसाद(अमेरिका), डा. अनिल प्रभा कुमार(अमेरिका) और डॉ. शैलजा सक्सेना (टोरंटो,कैनेडा), समीर लाल (टोरंटो, कनाडा), डॉक्टर गौतम सचदेव (ब्रिटेन), विजया सती(हंगरी), अनीता कपूर (अमेरिका), सोहन राही (ब्रिटेन), प्रो.(डॉ) पुष्पिता अवस्थी(नीदरलैंड) अमृत दीवाना(कैनेडा), परमिंदर सोढ़ी (जापान), प्राण शर्मा(लंदन) आदि की रचनाएं और पंजाबी कथाकार-उपन्यासकार हरजीत अटवाल के उपन्यास सवारी के हिंदी अनुवाद की 60वीं किस्त आप पढ़ चुके हैं।
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गवाक्ष के इस ताज़ा अंक में प्रस्तुत हैं अमेरिका से हिन्दी की सुपरिचित कवयित्री मंजू मिश्रा की सात कविताएँ और ब्रिटेन निवासी पंजाबी लेखक हरजीत अटवाल के धारावाहिक पंजाबी उपन्यास सवारी की 61वीं किस्त का हिंदी अनुवाद
-सुभाष नीरव

कैलिफोर्निया(यू.एस.ए.) से
हिन्दी कवयित्री मंजु मिश्रा की सात कविताएँ

.
कश्मीर 

बंद कर दो
खिड़की दरवाजे
इन हवाओं में दम घुटता है
-:-
गए वो दिन
जब महका करती थीं
यहाँ फूलों की वादियाँ
अब तो बस हर और से
आती है एक ही गंध
बारूद की
-:-
गए वो दिन
जब होती थीं रंगों की बहारें
यहाँ के चप्पे-चप्पे पे
अब तो खून टपकता है
यहाँ कलियों से
-:-
गए वो दिन
जब गूंजते थे जर्रे-जर्रे से
मुहब्बत के तराने
अब तो बस आती हैं
मारो-मारो की आवाजें
यहाँ की गलियों से
-:-
गए वो दिन जब कश्मीर
हुआ करता था स्वर्ग जमीन का
होते थे हरसूं प्यार के मंजर
अब तो कश्मीर को
कश्मीर कहने में भी
डर लगता है
-:-
बंद कर दो
खिड़की दरवाजे
इन हवाओं में दम घुटता है

.  
बेपता ख़त 

चांदनी ने 
जाने कब 
ख़त लिखे थे 
ख्वाबों के नाम 
पर पता भूल गयी 
आज भी वो बेपता ख़त 
भटकते फिरते हैं 
मंजिल की तलाश में 

पुल

उछाल दो 
मुहब्बत के दो चार लफ्ज़ 
जिंदगी के दरिया में  
वो डूबेंगे नहीं 
तैरते रहेंगे और 
बन जायेंगे पुल 
हमारे  बीच 

दिल का कागज़  

दिल का कागज़  
संभाल कर रखना 
धूप बारिश हवा बहुत होगी 
यूँ तो कहने को छतरियां होंगी 
मगर फिर भी 
नमी जाये 
तो स्याही फ़ैल जाती है 

फ्रेम में जड़े रिश्ते

रिश्ते जो 
फ्रेम में जड़े हुए 
टंगे रहते हैं  दीवारों पर 
यूँ तो बहुत खूबसूरत लगते हैं 
देखने वालों को 
लेकिन अक्सर 
टंगे हुए रिश्ते 
बस टंगे ही रह जाते हैं 
जीते हैं मरते हैं 
अन्दर-ही-अन्दर घुटते हैं 
कभी कभार उनको 
बाहर निकाल कर 
धूप  और हवा भी लगानी चाहिए 
वर्ना कीड़े लग जाते हैं 
और अन्दर ही अन्दर छीज कर 
कब ख़त्म हो जाते हैं पता ही नहीं चलता…!

अनचीन्हे से लगते हो 

बूझ लिया करते थे तुम तो 
बिना कहे ही,  मेरी बातें 
आँखों-आँखों कहते सुनते 
कट जाया करती थीं रातें 

काँटा मुझको चुभता था  
तो पीड़ा, तुमको होती थी
मेरे हिस्से के आंसू ... ले 
आँख तुम्हारी रोती थी

आज वही हूँ मैं और तुम भी 
यूँ तो वैसे ही दिखते हो          
लेकिन कुछ तो बदल गया 
जो अनचीन्हे से लगते हो 

यादों की कतरनें 

देखो तो  
समय कैसे उड़ गया 
मेरे हाथों में 
ढेर सारी यादों की कतरनें 
थमाकर 
और मैं 
टुकड़ा टुकड़ा समेटते सहेजते
उलझाते-सुलझाते  
बैठी हूँ 
यहाँ जिंदगी की देहरी पर 
खुली आँखों से  उलटते-पुलटते 
अतीत के पन्ने !!!
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मंजु मिश्रा
जन्म : 28 जून 1959, लखनऊ(उत्तर प्रदेश)।
शिक्षा : एम। ए.(हिन्दी)
सृजन : कविताएँ, हाइकु, क्षणिकाएँ, मुक्तक और ग़ज़ल।
सम्प्रति : व्यापार विकास प्रबंधक, कैलिफोर्निया (यू.एस.ए.)
ब्लॉग : http://manukavya.wordpress.com
ईमेल : manjushishra@gmail.com







सवारी
हरजीत अटवाल
हिंदी अनुवाद : सुभाष नीरव


॥ छियासठ॥
स्टैग हिल आकर कैरन की सबसे पहली दोस्ती बीटर्स के साथ हुई। बीटर्स का घर उनके घर से पहले पड़ता था। कैरन गुज़रते हुए उसको ‘हैलो’ कहती। फिर पैटर्शिया भी उसी नर्सरी में जाने लगी जहाँ बीटर्स का बेटा जाता था। कई बार कैरन अपनी कार में बीटर्स और उसके बेटे को लिफ्ट दे देती और उनके साथ चली जाती। फिर, दिनभर बीटर्स भी फुर्सत में थी और कैरन भी। बीटर्स का पति जरमी होगन शहर का नामी बैरिस्टर था। कैरन को यह भी अच्छा लगता था कि वह एक बड़े आदमी की पत्नी की सहेली है। वे इकट्ठी चर्च चली जातीं और क्लब या शॉपिंग आदि भी।
     उस सड़क पर या पूरे इलाके में ही कैरन पहली एशियन औरत थी, इसलिए भी कइयों के लिए वह आकर्षण का कारण बन रही थी। फिर लंदन से आई होने के कारण भी उसको विशेष समझा जाने लगा था। कई स्त्रियाँ अपनी पार्टी पर कैरन को बुलाकर खुश होतीं। जितने समय शॉन यहाँ था तो कैरन झिझकती थी। जब शॉन लंदन चला गया तो उसको जैसे किसी का भय न रहा था।
     शॉन ने लंदन पहुँचकर न तो कैरन को कोई फोन किया, न ही चिट्ठी लिखी, रुपया-पैसा भेजना तो दूर की बात थी। कैरन के लिए घर चलाना बहुत कठिन होने लगा। यदि कुछ पास था भी, वह भी खत्म हो गया। बीटर्स कैरन की ओर देख पूछने लगी-
     “क्या बात है कैरन ?“
     “लगता है, शॉन दगा दे गया। जाकर पैसे नहीं भेजे। मेरी किस्त भी रुकी पड़ी है।“
     “तू क्लेम कर, इन्कम सपोर्ट वाले किस काम के लिए हैं। हम लोग टैक्स इसीलिए देते हैं कि कठिन समय में इनसे कुछ भी ले सकें। तेरा हक़ है, हक़ न छोड़।“
     “बीटर्स, शायद मेरा क्लेम से भी गुज़ारा न हो। शॉन तो अब गया। तुझे उसकी सारी कहानी बताई थी, इतनी बार छोड़ चुका है। लंदन में इतनी तकलीफ़ नहीं थी, पर यहाँ ये घर की किस्त भी सिर पर डाल गया।“
     “कैरन, तेरी गलती है। तूने उसको इतने अवसर दिए ही क्यों ?“
     “क्या करती। इस विवाह को किसी तरह बचाना था, और क्या। बीटर्स, मैं सोचती हूँ कि लंदन वापस चली जाऊँ।“
     “लंदन क्यों जाना है अब। मैं जर्मी से बात करुँगी, तू घबरा न। क्लेम फार्म भर के आ। अगर कहे तो मैं तेरे संग चलूँगी।“
     बीटर्स को कैरन से बहुत हमदर्दी हो रही थी। बीटर्स का पति देर से ही घर लौटता था। उसने शॉन को एक बार ही देखा था। कैरन किसी किसी सुबह उसको दिखाई देती तो वह दूर से ही ‘हैलो’ कह देता। बीटर्स ने गाय भी रखी हुई थी जो कि कैरन के एकड़ वाले अहाते में भी चुगने के लिए आ जाया करती। डबलिन की सीमा से बाहर होने के कारण कुछ लोगों ने गऊएँ रखी हुई थीं। इन घरों के साथ एक-एक एकड़ जगह थी और एक गाय के पीछे एक एकड़ जगह सरकारी सीमा थी। बीटर्स ने कैरन के एक एकड़ के पीछे भी एक गाय रख ली। इस कारण भी बीटर्स उसकी बहुत चिंता करती।
     कैरन को इन्कम सपोर्ट के कुछ पैसे मिलने लग पड़े। किस्त में भी मदद हो गई। उसका गुज़ारा चल पड़। बीटर्स ने उससे कहा -
     “देख, हौसला रख। धीरे-धीरे सब ठीक हो जाएगा। जर्मी कह रहा था कि कैरन कहीं प्राइवेट नौकरी कर ले।“
     “बीटर्स, मैं भी यही चाहती हूँ। पैटर्शिया अब फुल टाइम नर्सरी जाने लग पड़ेगी, मैं कुछ न कुछ कर सकती हूँ।“
     “मैं जर्मी को कहूँगी कि दफ़्तर में कुछ मालूम करे। मेरे भाई रौन की कारों की गैराज है। शोरूम भी। उसके साथ भी बात करुँगी।“
     कैरन को बीटर्स का बहुत आसरा था। एकदम अजनबी देश, अजनबी लोग, फिर ऊपर से शॉन गायब हो गया। उसी हफ़्ते बीटर्स ने उसके लिए अपने भाई के शोरूम में काम दिला दिया। साथ ही, पैटर्शिया को स्कूल छोड़ने और लाने की जिम्मेदारी भी अपने ऊपर ले ली। और उसको क्या चाहिए था।
     रौन को कैरन ने पहले देखा हुआ था। कभी कभी वह बीटर्स के घर आया करता। पतला लम्बा रौन चालीस की आयु का हो रहा था, पर उसने अभी विवाह नहीं करवाया था। उसको रिसेप्शनिस्ट की कोई बहुत ज़रूरत नहीं थी, यह तो बीटर्स ने ही उस पर ज़ोर डालकर कहा था कि किसी तरह उसको वह काम दे दे। यह नौकरी उसके लिए ही घड़ी गई थी।
     कैरन पहले दिन काम पर गई तो परी की तरह तैयार होकर। तैयार होना तो उसको आता ही था। शॉन के साथ रहकर उसका तैयार होने का शोक भी ख़त्म हो रहा था। शॉन को बाहर जाना अच्छा नहीं लगता, इसलिए वह घर में बैठी रहती। एक लम्बे समय तक शॉन जब दूसरे देशों में रहा तो कैरन ने तैयार होना ही छोड़ दिया था। कभी-कभार ही अवसर मिलता था डिस्को पर जाने का। नहीं तो चर्च से घर और घर से चर्च तक का सफ़र ही करती थी वह। मंहगे-मंहगे खरीदे परफ्यूम भी इस्तेमाल किए बिना पड़े थे। वह तैयार होकर रौन के शोरूम में पहुँची तो रौन देखता ही रह गया। कुछ देर के लिए तो उससे बोला ही नहीं गया। फिर उठकर उसके साथ हाथ मिलाया और कहने लगा -
     “तू कैरन मरफ़ी है ?“
     “हाँ।“
     “मैं रौन चैलवे, बीटर्स ने भेजा तुझे ?“
     “हाँ।“
     कैरन संक्षेप-से उत्तर दे रही थी। फिर रौन ने रिसेप्शन पर काम करती लड़की नोरीन को पुकारा और उसको काम समझाने के लिए कह दिया। कैरन सहजता से काम समझ गई। रिसेप्शनिस्ट का काम कोई खास नहीं था। आए ग्राहक से बातचीत ही करनी होती। उसको अपनी कंपनी की जानकारी देनी होती। कारों के बारे में कुछ बताना होता। वैसे ग्राहक से बात करने के लिए सेल्समैन भी कोई न कोई हर वक़्त शोरूम में होता ही था। कैरन को कारों में दिलचस्पी जागने लगी थी। आए हुए ग्राहक को किसी कार के बारे में बताना उसको बहुत अच्छा लगता।
     रौन दूर खड़ा कैरन की ओर देखता रहा। वह देखता कि वह काम करने के लिए कितनी उतावली है। जो काम दो, कैसे जल्दी जल्दी और मन लगाकर करती है। जो ग्राहक आते, वे नोरीन से अधिक कैरन के पास जाते। रौन समझता था कि ग्राहकों को उसका अजनबी रंग भी आकर्षित करता था, पर उसके साथ बात करते ग्राहक की तसल्ली भी होती। रौन कई साल से इस कारोबार में था और वह अपने काम में माहिर था। शोरूम में कारें पुरानी अवश्य होती थीं, पर ज्यादा पुरानी नहीं थीं। वर्ष या दो वर्ष पुरानी ही, जो थोड़ा ही चली होतीं। अधिक चली कारों को बेचना कठिन होता था। जब कभी कैरन ग्राहक को कार दिखा रही होती तो वह स्वयं कार के स्टेयरिंग पर बैठकर दिखाती। इससे ग्राहक और अधिक खिंच जाता। रौन को उसकी यह बात बहुत पसंद आई। रौन ने कुछ सप्ताह में ही कैरन को सेल्सगर्ल के तौर पर ट्रेंड करना शुरू कर दिया।
     कैरन काम करके बहुत खुश थी। वेतन भले ही कम मिलता, पर उसको अपने अस्तित्व के कुछ अर्थ महसूस होने लगते। कि वह भी कुछ थी, कुछ कर रही थी। पैसे कमा रही थी। सुबह बन-संवर कर काम के लिए निकलती तो उसको अपने आप पर गर्व-सा अनुभव होता। करीब पंद्रह मिनट की ड्राइव पर ‘अपोलो कार्स’ का शोरूम था। यह पंद्रह मिनट बड़े ठाठ से कार चलाते हुए बीतते। उसको लगता, जैसे लोग उसकी ओर ही देख रहे हों।
     कोई दूसरा उसकी ओर देखता या न देखता, पर रौन हर समय देखता रहता था। रौन को उसकी हर अदा अच्छी लगती। उसका चलना, उसका बैठना, उसका ग्राहकों के साथ बातचीत करना। रौन कभी कभी उसको कोई मज़ाक करने लगता। कैरन भी मज़ाक में ही जवाब देती। रौन कैरन की तरफ देखकर मुस्कराता तो कैरन समझ जाती थी कि वह क्या चाह रहा है, पर एक सीमा में ही वह रहती। वह सोचती थी कि उसने पहले भी शॉन के बिना इतना कठिन समय बिताया था, अब भी गुज़र ही जाएगा। जब बीटर्स रौन की तारीफें करने लगती तो कैरन के मन को कुछ होने लगता। रौन बेचने के लिए कारें ऑक्शन से उठाता था। वह कैरन को अपने संग ले जाने लग पड़ा। उसको अपने कारोबार की बारीक बातें बताने लगा। फिर वह उसके साथ उसके परिवार की, शॉन की, उसकी ज़िन्दगी की और उसके उतार-चढ़ाव की बातें करने लगता। एक दिन उसने कहा -
     “कैरन, मेरे साथ डिनर पर चलोगी ?“
     “नहीं, मैं नहीं जा सकती।“
     “क्यों ?“
     “मेरी बच्ची है, छोटी-सी।“
     “उसको बीटर्स रख लेगी। पहले भी तो वही स्कूल से लाती-छोड़ती है।“
     “नहीं, मैं नहीं जा सकूँगी रौन।“
     “क्यों ? कब तक अतीत को लेकर बैठी रहेगी। आ नई ज़िन्दगी शुरू कर मेरे साथ... तुझे फूलों की तरह रखूँगा।“
     “मैं फूलों की आदी नहीं रौन, कांटों से ही खुश हूँ।“
     “इसलिए खुश है कि तुझे फूलों की ज़िन्दगी के महत्व का पता नहीं। कल शाम को तैयार रहना, बाहर चलेंगे।“
(जारी…)

लेखक संपर्क :
67, हिल साइड रोड,
साउथाल, मिडिलसेक्स, इंग्लैंड
दूरभाष : 020-85780393,07782-265726(मोबाइल)
 

1 टिप्पणी:

Manju Mishra ने कहा…

सुभाष जी …. गवाक्ष के इस अंक में मेरी रचनाओं को स्थान देने के लिए हार्दिक धन्यवाद !