शुक्रवार, 26 फ़रवरी 2010

धारावाहिक पंजाबी उपन्यास(किस्त- 22)


सवारी
हरजीत अटवाल
हिंदी अनुवाद : सुभाष नीरव
चित्र : रुचिरा


॥ सत्ताइस ॥

सुबह उठते ही बलदेव ने रोज़ की तरह पर्दे खींचे। उसने देखा कि बर्फ़ पड़ी हुई थी। उसका मन खिल उठा। बहुत वर्षों बाद बर्फ़ देखने को मिली थी। टेलीविजन वाले कहते थे कि लंदन में बर्फ़ न पड़ने का कारण 'ग्लोबल वार्मिंग' है। इस धरती नामक प्लैनट का मौसम गरम हो रहा है। गैसों का इतना धुआं बन बनकर आसमान की ओर उड़ता है कि आसमान में छेद हो रहे हैं। सूरज की गरमी ओजोन लेअर को चीरती हुई आसानी से धरती पर पहुँचने लगी है। पर आज इन सभी दावों को झुठलाती बर्फ़ अपनी सफ़ेदी बिखेरने आ पहुँची थी। डार्टमाउथ हाउस ऊँची जगह पर था और उसका यह फ्लैट भी तीसरी मंजिल पर था। खिड़की में से दूर तक देखा जा सकता था। बर्फ़ अभी भी पड़ रही थी। रूई के फाहे कभी चिंदी-चिंदी होकर गिरते तो कभी सघन हो जाते। एस्टेट का पॉर्क बर्फ़ से भरा हुआ था। कारें बर्फ़ के नीचे छिपी हुई थीं। घरों की छतों ने सफ़ेद लिहाफ ओढ़ रखे थे। दरख्तों को जैसे सफ़ेद फूल लगे हों।
वह वहाँ से हट कर फ्लैट की पिछली खिड़की में जा खड़ा हुआ। यहाँ से दूसरी खिड़की जैसा नज़ारा तो नहीं था पर चारों ओर बर्फ़ ही बर्फ़ थी, बर्फ़ के सिवा कुछ नहीं दिखता था। टफनल रोड को भी बर्फ़ ने इस तरह ढक रखा था मानो यह सड़क न होकर सफ़ेद रंग की नहर हो। कभी-कभी कोई कार गुजरती थी। सफेद रंग में कालिमा भर जाती, पर शीघ्र ही रूई के नये गोले कालिमा को मिटा देते।
बलदेव का मन हुआ कि वह नीचे जाए और बर्फ़ की गेंदें बना-बना कर खेले। फिर उसने सोचा कि गुरां करीब हो तो उसके साथ या शैरन के साथ खेलने लगे। उसे अनैबल और शूगर भी याद आने लगीं। इतवार का दिन होने के कारण वे तो अभी सो ही रही होंगी। एक पल के लिए उसके मन में ख़याल आया कि अब उन्हें भी मिलना चाहिए। बहुत समय हो गया था। गैप बड़ा होता जा रहा था। फिर सोचने लगा कि रहने का कोई सही ठिकाना हो तभी सोच सकेगा।
फिर उसे गैरथ डेवी का ख़याल आया। ऐसे मौसम में वह ज़रूर किसी तरफ़ फोटोग्राफी करने निकल जाएगा। फिर वह फोटो किसी लोकल अख़बार को देकर कुछ पैसे प्राप्त कर लेगा। कहने को तो वह लोकल अख़बार का फोटोग्राफर था, पर खर्च के मामले में वह हमेशा तंगहाल ही रहता। एक फोटो के बदले में उसे अधिक कुछ न मिलता। बलदेव सोच रहा था कि आज की खिंची फोटो ज़रूर मंहगी बिकेगी। उसका दिल हुआ कि क्यों न गैरथ को मिल आए। उसका पुराना मित्र था। उन दिनों का जब वह इंडिया से आया ही था और फरन-पॉर्क में रहा करता था। उसने घड़ी देखी। अभी आठ नहीं बजे थे। वह तैयार होने लगा।
गैरथ को वह अधिक नहीं मिला करता था। जब कभी उस तरफ जाना होता, तभी जाता था। अब जब वह टफनल पॉर्क आया था, उसकी तरफ़ नहीं गया था। उस दिन सोहन सिंह के फ्युनरल पर गैरथ आया था पर खास बातें नहीं हो सकी थीं। वह तो उससे उसकी बिल्ली टैग - लिली का हालचाल भी नहीं पूछ सका था। इस बिल्ली के साथ अनैबल और शूगर की कितने ही फोटो थे। गैरथ ने बलदेव की सिमरन के साथ भी फोटो खींची थीं। सिमरन से अलग होकर भी वह गैरथ के फ्लैट में जा बैठता। अपना गम हल्का करने के लिए भी चला जाता। यह गैरथ ही था जिसने उसे कुत्ते को काबू में रखने का गुर भी सिखाया था।
गैरथ को कुत्तों के साथ इतना प्यार था कि जब उसका अपनी पत्नी सिलविया से मुकदमा चल रहा था तो गैरथ अपने कुत्ते टाईगर के बदले अपने घर आदि छोड़ने तक के लिए तैयार था। सिलविया भी ऐसी निकली कि टाईगर गैरथ को नहीं दिया। गैरथ के पास उस वक्त एक कमरे का स्टुडिओ फ्लैट ही हुआ करता था और कोर्ट ने कुत्ते का हक उसे नहीं दिया था। उसे सिर्फ़ इतनी इजाज़त मिली थी कि वह सप्ताह में केवल एक घंटे के लिए जाकर कुत्ते से खेल सकता था। इस घटना से मायूस होकर उसने कुत्ते को तो क्या, अपने तीन बच्चों को भी कभी जाकर नहीं देखा था, घर में से भी कोई हिस्सा नहीं लिया था।
तैयार होता हुआ बलदेव सोच रहा था कि पिछले कुछ दिनों से गैरथ की याद उसे अक्सर आ रही थी, इसका क्या कारण हो सकता था। फिर उसे ख़याल आया कि गैरथ उसका इमरजेंसी का ठिकाना था। यदि कहीं दूसरी जगह रात बिताने का मन न हो या कोई इंतज़ाम न हो तो वह गैरथ के फ्लैट में आ सकता था। यह सोचता हुआ वह जल्दी-जल्दी तैयार होने लगा।
वह फ्लैट से बाहर निकला तो बर्फ़ पड़नी बन्द हो गई थी लेकिन ठंडी शीत लहर चल पड़ी थी जिसका अर्थ था कि यह बर्फ़ अब जम जाएगी। शीघ्र पिघलने वाली नहीं। इससे फिसलने का खतरा भी होगा। उसने इसी कारण ऐसे ट्रेनर्ज पहन लिए थे कि अगर जमी हुई बर्फ़ में चलना पड़ा तो आसानी रहेगी। कपड़े भी भारी ही पहने थे। असल में उसकी मंशा हाईगेट के पॉर्क में जाकर गैरथ के साथ मिलकर फोटोग्राफी करने की थी। फोटोग्राफी का उसे गैरथ जितना तो नहीं पर थोड़ा-बहुत शौक था।
सीढ़ियाँ उतरता हुआ वह सोचने लगा कि इतनी ठंड में कहीं कार की बैटरी ही डाउन न हो गई हो। कार स्टार्ट भी होगी या नहीं। एस्टेट के पॉर्क में पड़ी बर्फ़ पर कदमों का एक भी निशान नहीं था। मानो सभी अभी तक सो ही रहे थे। कोई उठकर किसी तरफ़ गया ही नहीं था। वह धीमे कदमों से चलकर कार तक पहुँचा। बर्फ़ इतनी थी कि कार को पहचानना कठिन हो रहा था। बर्फ़ हटाता वह कार के दरवाजे तक बमुश्किल पहुँचा। बड़ी कठिनाई से दरवाजा खोला। जैसे तैसे होकर कार में बैठ गया। चाबी डालकर घुमाई। इग्निशन ठीक ऑन हो गया। सैल्फ़ मारी तो इंजन नहीं घूमा। फिर कोशिश की। पहले से ज्यादा हिलजुल हुई। धीरे से उसने कार स्टार्ट कर ही ली। अब मसला था, कार को यहाँ से निकालकर मेन रोड पर ले जाने का। एक बार तो उसका दिल हुआ कि लौट कर बिस्तर में जा घुसे। फिर सोचने लगा कि तैयार होने में इतना समय लगाया था, अब चक्कर लगा कर तो देखना ही चाहिए। बर्फ़ के ऊपर कार चलाने का भी एक अलग ही मजा था। उसने धीरे धीरे कार खिसकाई। स्लिपरी से बचता-बचाता बाहर टफनल रोड पर ले आया। बाहर ट्रैफिक चल पड़ने के कारण बर्फ़ कीचड़ बन गई थी और कारों के लिए आसानी हो गई थी। और फिर, कौंसल वाली लॉरी नमक का छिड़काव भी कर गई थी। आगे जंक्शन रोड पर भी ट्रैफिक ठीक चल रहा था। होर्नज़ी रोड को वह आराम से क्रॉस कर गया, पर आगे ट्रैफिक का एरिया न होने के कारण फिर बर्फ़ ही बर्फ़ मिली। सड़क की चढ़ाई के कारण कार स्लिप भी होने लगी। जिस रोड पर गैरथ के फ्लैट वाला ब्लॉक था, वहाँ तक सड़क और भी ज्यादा खराब थी। उसे लगता था कि उसकी कार अभी आस पास खड़ी कारों में बजी कि बजी। बहुत ही कठिनाई से वह ब्लॉक के गेट के आगे पहुँचा।
उसने गैरथ के फ्लैट की घंटी बजाई। ऊपर से कोई उत्तर न आया। सिक्युरिटी गेट लगा होने के कारण वह ब्लॉक के गेट के अन्दर नहीं जा सकता था। अन्दर से ही फ्लैट का मालिक गेट खोलता, तभी जाना संभव हो सकता था। वह कितनी ही देर तक घंटी बजाता रहा। वह सोच रहा था कि गैरथ इतनी देर तक तो सोने वाला नहीं है और इतनी जल्दी उठकर बाहर फोटोग्राफी करने जाने वाला भी नहीं। वह काफी समय खराब करके वापस कार में आकर बैठ गया। कार स्टार्ट करके आगे बढ़ाने लगा तो देखा, सामने से गैरथ चला आ रहा था। सिर पर वही टोप, वही लम्बी दाढ़ी और लम्बा कोट पहने बर्फ़ को पांवों तले कुचलता, छोटे-छोटे डग भरता चला आ रहा था। बलदेव को देखकर वह दूर से ही हँसा और ऊँची आवाज़ में कहने लगा-
''यू बगर ! इतनी ठंड में तू किधर ?''
''मैंने सोचा, देखकर आऊँ, कहीं ठंड में जम न गया हो।''
''डेव, यह ठंड मुझे नहीं जमा सकती।''
बात करता वह उसके नज़दीक पहुँच गया और गर्मजोशी से हाथ मिलाया और बोला-
''तू अपने बारे में बता, तेरे साथ यह ठंड कैसा बर्ताव कर रही है।''
''गैरथ, तुझे तो मालूम ही है, अकेले मर्दों को ठंड कितना कुछ याद करवाने लगती है।''
''तू अभी तक अकेला ही है ?''
कह कर उसने बलदवे को संग आने का इशारा भी कर दिया। बलदेव ने कार लॉक की और उसके पीछे-पीछे चल पड़ा। गैरथ ने अपना सवाल फिर दोहराया तो बलदेव ने कहा-
''ऐसा ही समझ ले।''
''डेव, ये तू अपने संग बहुत ज्यादती कर रहा है। तू अभी नौजवान है, सुन्दर है, तू कम से कम अपने हिस्से की औरतें तो संभाल।''
गैरथ की फिलॉसफी थी कि हर मर्द के हिस्से में एक सौ औरतें होती हैं जिन्हें उसे सारी उम्र भोगना होता है। हर मर्द को अपना हिस्सा ज़रूर लेना चाहिए।
गैरथ ने अपना फ्लैट खोला। एक बदबू का भभका बलदेव के नाक में चढ़ गया। बलदेव को पता था कि यह उसकी बिल्ली की बदबू थी। वैसे फ्लैट अन्दर से गरमाहट से भरा था। कुछ देर बाद बदबू ठीक हो गई। गैरथ ने पूछा-
''क्या पियेगा ? कॉफी या फिर कुछ ठंडा ?''
''ठंडे में क्या है ?''
''बियर मैंने खुद बनाई हुई है। वाइन भी तैयार होने को है। वैसे मेरे पास कुछ ब्रांडी भी है और व्हिस्की भी, जो कहे...।''
''ब्रांडी ले आ।''
''तू ब्रांडी पी और मैं व्हिस्की पीता हूँ।''
उसने मैले से गिलासों में पैग बनाए। पैग क्या बनाए, सारी व्हिस्की एक गिलास में डाल ली और ब्रांडी दूसरे गिलास में। दो-दो गिलासों का पोज होगा। वे नीट ही पी लेंगे। बलदेव ने घूंट भर कर पूछा-
''अपनी लव लाइफ के बारे में बता।''
''हैज़ल है, कामचलाऊ सी। पर है बहुत मूडी। तब से तो बहुत ही मूडी हो गई है जब से मेनोपॉज आरंभ हुआ। पिछले हफ्ते उसका पचासवां बर्थ डे था, बहुत रोई कि मैं बूढ़ी हो गई हूँ।''
इतने में बिल्ली ने बलदेव की गोदी में छलांग लगाई। उसे बहुत घिन्न सी आई। उसने आहिस्ता से उसे उठाकर एक तरफ बिठा दिया। उसने बाहर झांका तो बर्फ़ फिर से पड़नी शुरू हो गई थी। बलदेव ने पूछा-
''गैरथ, बस एक ही कहानी है ?''
''इस उम्र में एक कहानी भी बहुत है। वैसे एक और भी है, पर वह लड़की अभी यंग है। नई-नई अफ्रीका से आई है। मेरे में बहुत दिलचस्पी लेती है। बहुत प्यारी चीज़ है, जवान, तरोताज़ा !''
''कितनी उम्र होगी उसकी ?''
''अट्ठारह साल की।''
''गैरथ इतनी जवान लड़की तेरे साथ ?''
''डेव, तू शायद नहीं जानता, काली लड़कियाँ गोरे रंग पर ही मरती है। वे उम्र नहीं देखा करतीं।''
कहते हुए गैरथ हँसने लगा। बलदेव ने कहा-
''गैरथ, किसी काले को पता चला तो बात उलटी भी पड़ सकती है।''
''यह खतरा तो है।''
वह फिर हँसा और साथ ही बलदेव भी। बाहर मौसम की ओर देखता गैरथ पूछने लगा-
''इतने खराब मौसम में तू किस मार में घूम रहा है ?''
''मैं सोच रहा था कि हाईगेट चलकर फोटोग्राफी करें।''
उसकी बात का गैरथ ने कोई उत्तर न दिया, अपितु उदास हो गया। बलदेव ने कहा-
''गैरथ, क्या बात हो गई ?''
''डेव, फोटोग्राफी तो गई अब... एक वीक मेरा चैक लेट हो गया और उधार मुझे किसी ने दिया नहीं, लिहाजा कैमरा बेचना पड़ा। बहुत बढ़िया कैमरा था वह। जान से भी प्यारा।''
कह कर गैरथ और भी ज्यादा उदास हो गया और बलदेव भी। गैरथ ने कुछ देर बाद पूछा-
''तू बता, किस काम से आया है मेरे पास ?''
''गैरथ, मैं इस काम से आया हूँ कि जहाँ मैं रहता हूँ, वहाँ कोई ट्रबल सी आ सकती है। हो सकता है, रात-बेरात किसी इमरजेंसी में मुझे तेरे पास रहने के लिए आना पड़ जाए।''
(जारी…)
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सोमवार, 25 जनवरी 2010

गवाक्ष – जनवरी 2010


“गवाक्ष” ब्लॉग ने जनवरी 2008 में हिंदी ब्लॉग की दुनिया में पदार्पण किया था। जनवरी 2010 में इसने अपना दो वर्ष का सफ़र तय कर लिया है। इस ब्लॉग के माध्यम से हम हिन्दी ब्लॉग-प्रेमियों को हिन्दी/पंजाबी के उन प्रवासी लेखकों/कवियों की समकालीन रचनाओं से रू-ब-रू करवाने का प्रयास करते आ रहे हैं जो अपने वतन हिन्दुस्तान से कोसों दूर बैठकर अपने समय और समाज के यथार्थ को अपनी रचनाओं में रेखांकित कर रहे हैं। “गवाक्ष” में अब तक पंजाबी कवि विशाल (इटली) की कविताओं का हिन्दी अनुवाद, दिव्या माथुर (लंदन) की कहानी, अनिल जनविजय (मास्को) की कविताएं, न्यू जर्सी, यू।एस.ए. में रह रहीं देवी नागरानी की ग़ज़लें, लंदन निवासी कथाकार-कवि तेजेन्द्र शर्मा, रचना श्रीवास्तव, दिव्या माथुर की कविताएं, दुबई निवासी पूर्णिमा वर्मन की कविताएं, यू एस ए में रह रहीं हिन्दी कथाकार-कवयित्री इला प्रसाद, डेनमार्क निवासी कवि भगत धवन की कविताएँ और चाँद शुक्ला की ग़ज़लें, यू एस ए निवासी कवि वेद प्रकाश ‘वटुक’ तथा कवयित्री रेखा मैत्र की कविताएं, कनाडा अवस्थित पंजाबी कवयित्री तनदीप तमन्ना की कविताएं, यू के अवस्थित हिन्दी कवि-ग़ज़लकार प्राण शर्मा की ग़ज़लें, कैनेडा में अवस्थित पंजाबी कवि सुखिन्दर की कविताएं, कनाडा निवासी पंजाबी कवयित्री सुरजीत, अमेरिका अवस्थित डॉ सुधा धींगरा, कनाडा में अवस्थित हिंदी- पंजाबी कथाकार - कवयित्री मिन्नी ग्रेवाल की कविताएं, न्यूजीलैंड में रह रहे पंजाबी कवि बलविंदर चहल की कविता, कैनेडा में अवस्थित पंजाबी लेखिका बलबीर कौर संघेड़ा की कविताएं, इंग्लैंड से शैल अग्रवाल की पाँच कविताएं और पंजाबी कथाकार-उपन्यासकार हरजीत अटवाल के उपन्यास “सवारी” के हिंदी अनुवाद की बीसवीं किस्त आपने पढ़ीं। “गवाक्ष” के जनवरी 2010 अंक में प्रस्तुत हैं – सिंगापुर से श्रद्धा जैन की छह ग़ज़लें तथा पंजाबी कथाकार-उपन्यासकार हरजीत अटवाल के धारावाहिक पंजाबी उपन्यास “सवारी” की इकीसवीं किस्त का हिंदी अनुवाद…


सिंगापुर से
श्रद्धा जैन की छह ग़ज़लें

1
घटा से घिर गयी बदली, नज़र नहीं आती
बहा ले नीर तू उजली, नज़र नहीं आती

हवा में शोर ये कैसा सुनाई देता है
कहीं पे गिर गयी बिजली नज़र नहीं आती

है चारों ओर नुमाइश के दौर जो यारो
दुआ भी अब यहाँ असली नज़र नहीं आती

चमन में खार ने पहने, गुलों के चेहरे हैं
कली कोई कहाँ, कुचली नज़र नही आती

पहाड़ों से गिरा झरना तो यूँ ज़मीं बोली
ये दिल की पीर थी पिघली नज़र नही आती

2

तना है दम चराग़ में तब ही पता चले
फानूस की न आस हो , उस पर हवा चले

लेना है इम्तिहान अगर सब्र दे मुझे
कब तक किसी के साथ कोई रहनुमा चले
नफ़रत की आँधियाँ कभी, बदले की आग है
अब कौन लेके झंडा –ए- अमनो-वफ़ा चले
चलना अगर गुनाह है, अपने उसूल पर
सारी उमर सज़ाओं का ही सिल सिला चले

खंजर लिये खड़ें हों अगर मीत हाथ में
“श्रद्धा” बताओ तुम वहाँ फ़िर क्या दुआ चले

3
च्छी है यही खुद्दारी क्या
रख जेब में दुनियादारी क्या
जो दर्द छुपा के हंस दे हम
अश्कों से हुई गद्दारी क्या
हंस के जो मिलो सोचे दुनिया
मतलब है, छुपाया भारी क्या
वे देह के भूखे क्या जाने
ये प्यार वफ़ा दिलदारी क्या
बातें तो कहे सच्ची "श्रद्धा"
वे सोचे मीठी खारी क्या

4
ल में जब प्यार का नशा छाया
पंछी पिंजरे में खुद चला आया

सह गया जो ख़िजां के ज़ोर–ओ-खम
गुल उसी पेड़ पर नया आया

सबको कह देगा, आँख का काजल
मेरे दिल ने कहाँ सकूँ पाया

क़ैद-ए-सरहद से है वफ़ा आज़ाद
राज़ ये बादलों ने समझाया
आके पहलू में बैठ जा मेरी
“श्रद्धा” अब तो है बस तेरा साया
5
किसने जाना कि कल है क्या होगा
कुरबतें या के फासला होगा
आज़ रोया है वो तो रोने दो
हो न हो खुद से वो मिला होगा
चाँद जो पल में बन गया मिट्टी,
रात दिन किस तरह जला होगा
ज़ुल्म करता नहीं वो बन्दों पर
आज दुनिया का रब जुदा होगा
यूँ न ढूँढों यहाँ वफा “श्रद्धा”
तन्हा तन्हा सा रास्ता होगा
6
अफ़साना –ए-उलफत है, इशारों से कहेंगे
गर तुम न सुनोगे तो सितारोँ से कहेंगे
हम सिद्क़-ओ-इबादत से कभी अज़म-ओ-अदा से
बस अहद -ए- मोह्ह्बत, इन्हीं चारों से कहेंगे
आगोश में मिल जाए समंदर जो वफ़ा का
हम अलविदा दुनिया के किनारों से कहेंगे
चेहरे से चुराओगे जो सुर्खी-ए-तब्ब्सुम
क़िस्सा उड़ी रंगत का बहारों से कहेंगे
आँखों में हैं जल जाते वफाओं के जो जुगनू,
जज़्बात ये “श्रद्धा” के हज़ारों से कहेंगे
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विदिशा एक छोटे से शहर में 8 नबम्बर 1977 को जन्मी श्रद्धा जैन ने केमिस्ट्री में अपनी शिक्षा पूरी की
ये पिछले नौ सालों से सिंगापुर में निवासित हैं और यहाँ पर एक भारतीय अंतर विद्यालय में हिन्दी अध्यापिका हैं
सम्पर्क : MS. Shrddha Jain, 86 Corporation Rd,#05-12 ,Lake Holmz Condo.
Singapore
H.P. - +65-81983705
ईमेल : shradha8@gmail.com

धारावाहिक पंजाबी उपन्यास(किस्त- 21)


सवारी
हरजीत अटवाल
हिंदी अनुवाद : सुभाष नीरव
चित्र : रुचिरा
॥ छब्बीस ॥

बलदेव ने कार लंदन ब्रिज पर रोक ली। आठ बज रहे थे। अंधेरा पूरी तरह फैल चुका था, पर यहाँ सारा वातावरण रौशनियों ने जगमग-जगमग किया हुआ था। ट्रैफिक अभी भी काफी था। यहाँ कार रोकना मना था, पर बलदेव ने रोक ली। वह शिन्दे को दरिया बिलकुल ऊपर से दिखलाना चाहता थ। पंजाब में तो दरियाओं की कमी थी। शायद ही शिन्दे ने सतलुज या फिर बियास को ध्यान से देखा होगा। अगर उसने थेम्ज़ को उतरा हुआ देखा तो उसे अच्छा नहीं लगेगा।
''हम यहाँ गाड़ी खड़ी नहीं कर सकते, पर मैंने कर ली।''
''क्यों कर ली फिर ? कहते हैं पुलिस टिकट दे देती है।''
''हाँ, दे देती है। हमने दो मिनट ही रुकना है। पुलिस आ गई तो सॉरी कह देंगे।''
''अच्छा ! फिर तो यहाँ की पुलिस मास्टरों से भी गई गुजरी है, वे तो बच्चे के सॉरी कहते-कहते दो थप्पड़ लगा देते हैं।''
''तू जल्दी से आ, तुझे रिवर थेम्ज़ दिखाऊँ। इसीलिए इधर लाया हूँ तुझे।''
शिन्दा बाहर निकलते हुए बोला -
''यह तो भाई दिवाली बना हुआ है।''
फिर उसने पुल की ग्रिल पकड़ते हुए नीचे झांककर देखा और कहा-
''यह तो भाई बहुत खतरनाक है। बंदा गिर पड़े तो लाश भी न मिले।''
फिर शिन्दे ने आसपास देखते हुए कहा-
''हम तो बहुत दूर आ गए लगते हैं।''
''नहीं, बहुत भी नहीं। जितना गाँव से माहलपुर है, यह रोड सीधी हाईब्री को जाती है। पुल पार करके नजदीक ही मेरा दफ्तर है।''
वे पुन: कार में बैठ गए। बलदेव ने कार बढ़ा ली। आगे बायें मोड़कर वाटरलू का चक्कर लगाया। अपना दफ्तर बाहर से दिखाया। दफ्तर दिखाते हुए मन में ही सोचा कि पता नहीं जॉब बचेगी भी कि नहीं। उसकी लम्बी सिक को लेकर झगड़ा पड़ा हुआ था। आगे जाकर टौवर ब्रिज का भी चक्कर लगाया और बलदेव कहने लगा-
''यह दरिया अलग-अलग जगहों से अलग-अलग तरह का दिखाई देता है। कहीं भीड़ा, कहीं से चौड़ा, कहीं भयानक और कहीं भोला सा।''
कार चलाते हुए बलदेव दरिया की ही बातें किए जा रहा था। शिन्दा खीझ-सा गया और बोला-
''तू मुझे यह बता कि थेम्ज़ के पानी से कितने एकड़ खेती होती है ?''
''यह खेती के काम नहीं आता।''
''चल, यह बता कि पिछली बाढ़ में कितने बंदे मरे ?''
''बाढ़ भी नहीं आई कभी।''
''इसके पानी के बंटवारे के लिए कितने झगड़े होते हैं ?''
''तू यार, उलटी बातें करता है। यह साला लंदन है, हुशियारपुर नहीं।''
''वहीं तो मैं कहने जा रहा हूँ कि मैं लंदन में घूम रहा हूँ, कोई लंदन वाली बात कर, यूँ हीं मूर्खों सी बातें किए जा रहा है, पानी सा दिखा कर टैम निकाले जा रहा है।''
''और क्या दिखाऊँ, दिन के समय कुछ दिखा दूँगा।''
''मैंने तो सुना है, लंदन रात में सोहणा लगता है।''
''यह रात ही है, दिखा तो रहा हूँ।''
''छोड़ यार, चल घर को चलें। इससे से भाजी की दुकान में ही ज्यादा रौनक लगती है।''
''तू क्या देखना चाहता है ?''
''कोई गोरी दिखा, अलफ नंगी, जैसी फोटो होती हैं, जैसी फिल्मों में होती हैं।''
''मुल्ला की दौड़ मस्जिद तक।''
''ऐसा ही कह ले, अगर यह काम कर सकता है तो भाई बनकर कर दे।''
''यह काम मेरे वश का नहीं। मैं इस गाड़ी का सवार नहीं।'' हँसते हुए बलदेव कहने लगा।
शिन्दे ने कहा, ''तूने कभी खुद भी कुछ देखा है ?''
बलदेव फिर हँसने लगा। शिन्दा बोला-
''चल, तेरे लिए मैं काम बहुत आसान कर देता हूँ, कहीं से सिगरेट पिला दे। दुकान में पड़ी हुई देखकर तलब लगी हुई है। यह तो तेरे वश का ही काम है ?''
''यह काम आसान ही है।''
पास ही एक दुकान आई। बलदेव उतर कर थैम्सन एंड हैजज की बीस सिगरेटें ले आया। शिन्दे ने उतावली से कार के लाइटर से सिगरेट सुलगाई। कुछ गहरे कश भरे और आनन्दित होता हुआ बोला-
''आदत नहीं, बस हुड़क सी है। वहाँ मिन्दो से छिपकर धुआं निकाल लेता था, यहाँ अब तेरी जट्टी से बहुत डर लगता है।''
उसने जानबूझ कर 'तेरी जट्टी' शब्द का प्रयोग किया था। पर बलदेव ने जैसे सुना ही न हो। उसने एक पब के पॉर्क में ले जाकर गाड़ी खड़ी कर दी। शिन्दे ने कहा-
''बियर की तुम्हारी आदत खराब है, इससे तो थोड़ा-सा पेट भरना ही होता है। मुझे तो व्हिस्की ले देना, बेशक थोड़ी हो।'' पब में जाकर बलदेव भी अधिक खुश नहीं था। उसने वहाँ से कार आगे बढ़ाई और एक ऑफ़ लायसेंस में से बोतल ले ली। कार में बैठकर ही पीने लग पड़े। शिन्दे ने पूछा-
''यह तो बता, तू रहता कहाँ है ?''
''काम के नज़दीक ही कमरा ले रखा है।''
''भाजी है, सतनाम है, इनके पास क्यों नहीं रहता ?''
''भाजी की आदत के बारे में तो तू जानता ही है। उधर मनजीत... और फिर मैं अपना कमाता-खाता हूँ, किसी पर क्यों बोझ बनूँ।''
''जट्टी से डरता तो नहीं दौड़ता ?''
''उससे मुझे क्या डरना। मुझे वैसे ही किसी के बीच रहना अच्छा नहीं लगता।''
''वैसे बलदेव, लगता है तेरी जट्टी अब पहले जैसी नहीं रही। मैंने देखा है, तू उससे बचता घूमता है।''
''वह तो पहले भी मेरी नहीं थी।''
''मुझे बता रहा है... मुझे तो यही बहुत है कि बचाव हो गया। मैं बहुत डर गया था उस समय।''
''शिन्दे लगता है, तुझे शराब चढ़ गई है।'' बलदेव ज़रा सा गुस्से में आ गया।
''जो चाहे कह ले। तू मुझे बता, अपनी घरवाली और बेटियों से कब मिलवाएगा।''
''तुझे उनसे क्या लेना ?''
''वह यार हमारे घर की बहू है, बेटियाँ हैं। उनकी ख़ैर-खबर तो लेनी ही चाहिए।''
''जिस गाँव नहीं जाना उसका राह क्या पूछना, वहाँ की ख़बर क्या रखना। सच बात तो यह है कि जब से उधर से आया हूँ, लौटकर फिर उस इलाके में जाने को दिल नहीं किया।''
''फिर दूसरा विवाह करवा ले। चल इंडिया चलें। गाजे-बाजे से तुझे घोड़ी चढ़ाऊँगा।''
''तू भी यार, भाजी वाली बोली बोले जा रहा है।''
''सभी तेरी फिक्र करते हैं। तू अपनी जगह सैटिल हो जाए, मैं भी कहूँगा विवाह...।''
''विवाह करना आसान बात नहीं। पहले तलाक लूँगा। तलाक के लिए भी ग्राउन्ड चाहिए। और फिर, दूसरी औरत भी ऐसी-वैसी मिल गई तो...।''
बात करता बलदेव अपनी बात पर ज़ोर दे रहा था। शिन्दे ने कहा-
''जैसी तेरी मर्जी। असल में तेरी बात वो है कि दूध का जला, छाछ भी फूंक-फूंक कर पीता है।''
बातें करते हुए वे हाईब्री पहुँच गए। अजमेर ने ही बलदेव को कह रखा था कि शिन्दे को कहीं घुमा दे। बलदेव भी अकेला-सा था। शौन के जाने के बाद वह और अधिक अकेला महसूस करने लगा था। हालांकि शौन से उसकी अधिक बात नहीं होती थी पर किसी दोस्त की निकटता का अहसास ही बहुत था। मैरी भी अभी लौटी नहीं थी। उसे शिन्दे के संग वक्त गुजारना अच्छा लगा पर जब वह अजीब से सवाल करने लगा तो वह ऊब गया था।
दुकान में अजमेर काउंटर पर खड़े होकर ग्राहक सर्व कर रहा था। गुरां और बच्चे भी खड़े थे। उन्हें देखते ही शैरन बलदेव की ओर दौड़ती हुई आई और बोली-
''हैलो चाचा जी, व्हेयर यू बीन ? आय हैव नाट सीन यू फॉर लांग टाइम।''
''जस्ट अराउंड डार्लिंग, आय एम जस्ट अराउंड।''
कहते हुए बलदेव उनके साथ स्कूल की बातें करने लग पड़ा। शिन्दा बोला-
''मेरे साथ नहीं ऐसा बोलते।''
अजमेर भी शैरन और हरविंदर को बलदेव के साथ इतना खुलकर बातें करते देख खुश भी होता और हैरान भी। वह कहने लगा-
''तेरे साथ क्या, ये तो मेरे से भी आँख नहीं मिलाते।''
गुरिंदर भी तभी बोल उठी-
''तुम भी इनके बीच कभी बैठो।''
''यह इनके बीच बैठता है ?''
''यह इनकी बात सुनता तो है कम से कम।''
बलदेव बच्चों से फुर्सत पाकर वापस लौटने की तैयारी में अजमेर के पास आ खड़ा हुआ। गुरां के साथ सरसरी-सी बातें की और बोला-
''अच्छा, मैं चलता हूँ।''
''क्यों ? रोटी नहीं खाएगा ?'' गुरां ने गुस्से में कहा। उसने जवाब दिया-
''बहुत लेट हो गया हूँ, बैठ गया तो ड्रिंक भी हो जाएगी। मुझे गाड़ी भी चलानी है।''
''तू कौन सा दूर रहता है।''
अजमेर ने कहा। बलदेव समझ गया कि चोरी पकड़ी गई। उसे कुछ नहीं सूझा कि जवाब में क्या कहे। वह चुप रहा। अजमेर ने कहा-
''एक दिन माइकल बता रहा था कि तू डार्टमाउथ हाउस में रहता है।''
''हाँ, कोई फ्रेंड आयरलैंड गया हुआ है। उसका फ्लैट खाली था, बस अपना देख रहा हूँ, जल्दी ही ले लूँगा।''
''हम तेरी यह बात बहुत देर से सुनते आ रहे हैं। अगर लेना है तो ले ले।''
गुरां ने खीझ कर कहा। अजमेर ने गुरां की बात की ओर ध्यान दिए बग़ैर ही कहा-
''जानता है, माइकल के पास जो गे है, अरे वही जिसकी फोटो गार्जियन में आई थी।''
''माइकल को तो जानता हूँ, पर गार्जियन में छपी उसकी फोटो के बारे में नहीं जानता।''
''पिछले दिनों इसने क्लेम किया था कि इसे किसी ने रेप किया है। इस तरह गे-रेप शब्द इसी ने पोपुलर किया था।''
''मुझे इस ख़बर का नहीं पता, पर इसकी कोई आर्गनाइजेशन है, फंड इकट्ठा करता घूमता है।''
गुरां को उनकी बातों में दिलचस्पी नहीं थी। वह बोली-
''बात सुन ध्यान से... तू अब रोटी खाकर ही जाएगा। दुकान बन्द करने का टाइम भी हो चला है। अगर अभी खानी है तो इसी तरह ऊपर आ जा, नहीं तो वेट कर ले, सुनता है !''
(जारी…)
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शनिवार, 5 दिसंबर 2009

गवाक्ष – दिसम्बर 2009


“गवाक्ष” के माध्यम से हम हिन्दी ब्लॉग-प्रेमियों को हिन्दी/पंजाबी के उन प्रवासी लेखकों/कवियों की समकालीन रचनाओं से रू-ब-रू करवाने का प्रयास कर रहे हैं जो अपने वतन हिन्दुस्तान से कोसों दूर बैठकर अपने समय और समाज के यथार्थ को अपनी रचनाओं में रेखांकित कर रहे हैं। “गवाक्ष” के पिछ्ले तेरह अंकों में पंजाबी कवि विशाल (इटली) की कविताओं का हिन्दी अनुवाद, दिव्या माथुर (लंदन) की कहानी, अनिल जनविजय (मास्को) की कविताएं, न्यू जर्सी, यू.एस.ए. में रह रहीं देवी नागरानी की ग़ज़लें, लंदन निवासी कथाकार-कवि तेजेन्द्र शर्मा, रचना श्रीवास्तव, दिव्या माथुर की कविताएं, दुबई निवासी पूर्णिमा वर्मन की कविताएं, यू एस ए में रह रहीं हिन्दी कथाकार-कवयित्री इला प्रसाद, डेनमार्क निवासी कवि भगत धवन की कविताएँ और चाँद शुक्ला की ग़ज़लें, यू एस ए निवासी कवि वेद प्रकाश ‘वटुक’ तथा कवयित्री रेखा मैत्र की कविताएं, कनाडा अवस्थित पंजाबी कवयित्री तनदीप तमन्ना की कविताएं, यू के अवस्थित हिन्दी कवि-ग़ज़लकार प्राण शर्मा की ग़ज़लें, कैनेडा में अवस्थित पंजाबी कवि सुखिन्दर की कविताएं, कनाडा निवासी पंजाबी कवयित्री सुरजीत, अमेरिका अवस्थित डॉ सुधा धींगरा, कनाडा में अवस्थित हिंदी- पंजाबी कथाकार - कवयित्री मिन्नी ग्रेवाल की कविताएं, न्यूजीलैंड में रह रहे पंजाबी कवि बलविंदर चहल की कविता, कैनेडा में अवस्थित पंजाबी लेखिका बलबीर कौर संघेड़ा की कविताएं और पंजाबी कथाकार-उपन्यासकार हरजीत अटवाल के उपन्यास “सवारी” के हिंदी अनुवाद की उन्नीसवीं किस्त आपने पढ़ीं। “गवाक्ष” के दिसम्बर 2009 अंक में प्रस्तुत हैं – इंग्लैंड से शैल अग्रवाल की कविताएं तथा पंजाबी कथाकार-उपन्यासकार हरजीत अटवाल के धारावाहिक पंजाबी उपन्यास “सवारी” की बीसवीं किस्त का हिंदी अनुवाद…

इंग्लैंड से
शैल अग्रवाल की पाँच कविताएं

(1)

शब्द बनकर बह चले
देखो सब चन्दा और तारे
बहुत जतन से जो मैंने
अपनी चूनर पर थे टांके
पक्की गांठ लगाकर
टाँका वह जोड़ा था
सूई तो बहुत नुकीली थी
धागा ही कुछ छोटा था।

(2)

बेचैन ये तूलिका
ठहरे ना थमे
रंगों के मटमैले पानी में
आंसू और मुस्कान ज्यों
एक तुम्हारे
आने और जाने पर।

(3)

मन्दिर यह
उसने तो नहीं बनवाया था
हमने ही
सिंहासन पे बिठा
फूल माला चढ़ा
भगवान बनाया था
आलम अब यह है
कि डाली का वह फूल
चरणों पे चढ़कर
माथे से लगकर भी
बस सूखा ही सूखा
और मँदिर में
खड़ा भगवान फिर हँसा
एकनिष्ठ परवशता
असमर्थ आस्था
और हठी हमारी
मूर्खता पर।

(4)

अजीब तस्बीर थी वह
उदास और अस्पष्ट
रंगों की तहों में गुम
ढूंढती कुछ…
लाल पीले चंद छींटे
खुशी का लिबास ओढ़े
मचले बिखरे और बेतरतीब
जैसे नामुराद कोई जिन्दगी
डायरी के पन्नों सी
बेवजह ही खुद को
भरने की कोशिश में
छुप-छुप के रोए।
(5)

दोष किसी का नहीं
जब गति तेज हो
दृष्टि भटक जाती है
धुरी पर घूमती
एक अकेली तीली
सौ रूपों में नजर आती है
शेर की खाल ओढ़े
गीदड़ भी जंगल-जंगल
डर फैला आता है
दस्तानों के पीछे जादूगर
कबूतर उड़ा जाता है
पर जब तीली रुकी
खाल उघड़ी, जादू टूटा
बादलों के पीछे से
निकला फिर सूरज।
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जन्म: 21 जनवरी 1947, वाराणसी में। शिक्षा: बनारस हिंदू विश्वविद्यालय से प्रथम श्रेणी में आनर्स के साथ स्नातक संस्कृत, चित्रकला व अंग्रेज़ी साहित्य में और स्नातकोत्तर उपाधि अंग्रेज़ी साहित्य में। '
1968 से आज तक सपरिवार भारत से दूर इंग्लैंड में, एकांत में शब्दों, रंगों और स्वरलहरी में डूबना प्रिय, लिखने का शौक बचपन से, हिंदी और अंग्रेज़ी में निरंतर लेखन पिछले चंद वर्षों से। कविता, कहानी, लेख व नाटक चंद पत्रिकाओं और संकलनों में, कुछ रेडियो पर भी। '
प्रकाशित रचनाएँ :कहानी-संग्रह :'ध्रुव-तारा' काव्य-संग्रह 'समिधा' व 'नेति-नेति' '
शैल अग्रवाल अभिव्यक्ति में बर्तानिया का प्रतिनिधित्व करती हैं और परिक्रमा के अंतर्गत ‘लंदन पाती’ नाम से नियमित स्तंभ लिखती हैं। ' कई वर्षों से नेट पर हिन्दी-अंग्रेजी में द्विभाषिक वेब पत्रिका “लेखनी” का संचालन-संपादन।
संपर्क : shailagrawal@hotmail.com'

धारावाहिक पंजाबी उपन्यास(किस्त- 20)


सवारी
हरजीत अटवाल
हिंदी अनुवाद : सुभाष नीरव
चित्र : रुचिरा

॥ पच्चीस ॥
शौन की दो बजे की फ्लाइट थी। बारह बजे तक बलदेव को पहुँचना था। उसे शौन को एअरपोर्ट छोड़कर आना था। शौन ने अपना सामान पहले ही तैयार करके दरवाजे के नज़दीक रख लिया था। वह कमरे में घूम रहा था। कैरन एक ओर बैठी रो रही थी। वह सारी रात उसे रोकने की कोशिशें करती रही। बेटी की ज़िन्दगी का वास्ता देती रही थी। शौन उसे छोड़कर जाने को तुला हुआ था। कमरे में इधर-उधर घूमता शौन कभी घड़ी देखता और कभी खिड़की में से बाहर झांकने लगता। कैरन कुछ कह नहीं रही थी। वह सोच रही थी कि उसने जितना कहना था, कह लिया था। सारी रात कहती रही थी। बलदेव की कार को आता देख शौन उससे कहने लगा-
''लुक आफ्टर माय डॉटर।''
कैरन उठी और उसकी ओर झपटी। उसके थप्पड़ मारने लगी और कहने लगी-
''फक्क ऑफ़ यू बास्टर्ड ! गैट आउट फ्राम हेयर... यू रूइंड माय लाइफ ! यू मौंकी फेस, आय हेट यू बास्टर्ड, आय हेट यू अपटू योर डैथ।''
वह तब तक मारती रही जब तक थक न गई। शौन अपने मुँह को बचाता ज्यूं का त्यूं खड़ा रहा और फिर सामान उठाकर बाहर की ओर दौड़ पड़ा।
कैरन सिर पकड़कर बैठ गई और फिर से रोने लगी। वह कहती जा रही थी- ''मैं कहाँ गलत थी। मैं कहाँ गलत थी।''
शोर सुनकर साथ वाले कमरे में सो रही पैटर्शिया उठ गई। कैरन थपथपा कर उसे पुन: सुलाने लगी। फिर रसोई में जाकर उसके लिए दूध बनाया। बोतल उसे पकड़ाकर खिड़की में आ खड़ी हुई। सड़क खाली थी।
शौन को जाना था। बहुत समय से जाने की बात कर रहा था। सो चला गया। उसे तो फॉदर जोय ने रोक रखा था। अपने आप को धार्मिक कहने वाला शौन धर्म को ठेंगा दिखाता चला गया था। कैरन उसके धार्मिक पाखण्ड पर मन ही मन हँसने लगी।
शौन उसे तब मिला था जब वह पढ़ाई खत्म करके छुट्टियाँ बिताने लंदन आई थी। एक डिस्को पर वह मिला। डेटिंग होने लगी। शौन ने विवाह का प्रस्ताव रखा। वह विवाह के लिए अभी तैयार नहीं थी। हालांकि पढ़ाई में वह किसी किनारे नहीं लगी थी पर उसका भविष्य उजला था। उसका पिता अभी-अभी मॉरीशश का मंत्री बना था। वैसे भी उसके बिंगोहाल और सिनमा थे, जिनको संभालने में उसने पिता की मदद करनी थी। फिर उसे अच्छे से अच्छा लड़का मिलने की उम्मीद थी। उसकी बहन गायत्री कुछ वर्ष पहले लंदन आई थी तो उसने एक साधारण से लड़के के साथ विवाह करवा लिया था। लड़का यद्यपि उनके शहर का ही था, पर रुतबे में छोटे परिवार से था। पिता बहुत खीझा-खीझा रहने लगा था। कैरन पर पिता को बहुत आशाएँ थीं। जब शौन ने विवाह का प्रस्ताव रखा तो कैरन अपने पिता के बारे में सोचने लगी थी। शौन विवाह के लिए कुछ अधिक ही पीछे पड़ गया था। उसने अपने पिता को शौन के विषय में काफी कुछ बढ़ा-चढ़ा कर बताया। कितना कुछ झूठ बोलकर पिता को विवाह के लिए मनाया था।
वह माना तो शौन इंडिया चला गया। कैरन का मन बहुत दुखी हुआ। वह सबकुछ कैंसिल करके वापस मॉरीशश चली गई। शौन इंडिया से लौटकर फिर उसे खोजने लगा। उसे मॉरीशश फोन करता रहता। जब कैरन नहीं मानी तो वह स्वयं मॉरीशश पहुँच गया। शौन का इतना प्यार देखकर कैरन को पुन: मन बदलना पड़ा।
विवाह के बाद शौन अच्छा-भला था। कुछ धार्मिक अधिक था, पर कैरन को इससे कोई फर्क नहीं पड़ता था। वह उसके संग चर्च चली जाती। उनके घर में धर्म को अधिक महत्व नहीं दिया जाता था। हिन्दू पृष्ठभूमि होने के कारण कुछ रस्म-रिवाज़ अलग थे, नहीं तो शौन के धर्म में कैरन को कुछ भी पराया नहीं लगा था। बल्कि फॉदर जोय उससे बहुत प्यार करता था। उसकी ओर विशेष ध्यान देता था। वह शौन के साथ आयरलैंड भी गई। वहाँ जाकर उसका मन बहुत खराब हुआ। बहुत ही साधारण से अनपढ़ परिवार में से था शौन। वैलज़ी के लोग एकदम गंवार से थे। उसके सामने ही उसके रंग की बातें करने लगते और कई तो नफ़रत का इज़हार भी कर जाते।
कैरन को बड़े-बड़े सपने दिखाने वाला शौन जल्द ही उसे झूठा-झूठा लगने लग पड़ा। उसकी नौकरी भी साधारण क्लर्की थी। उसका फ्लैट भी कौंसल का ही था। वह कंजूस भी हद दर्जे का था। कैरन को घूमने-फिरने का शौक था। अपने देश में हर वीक एंड उसका कहीं बाहर ही बीतता था, पर शौन तो घर में ही बैठा रहता। वह ज्यादा कहती तो झगड़ा हो जाता। फिर शौन ने हेराफेरी से उसे गर्भवती बना डाला ताकि बाहर आने-जाने के योग्य ही न रहे। कैरन अभी बच्चा नहीं चाहती थी। उसने गर्भपात करवाना चाहा तो शौन ने आसमान सिर पर उठा लिया। गर्भपात शौन के धर्म में महापाप था। शौन उसको चर्च में ले गया। फॉदर जोय ने गर्भपात के खिलाफ़ भाषण दे मारा।
इसके पश्चात् शौन उसे बुरा लगने लग पड़ा। उसने उसे एक तरह से कैदी बना रखा था। उसके सारे सपने किसी खाई में जा गिरे थे। वह विवाह के चक्कर में फंस कर रह गई थी। नहीं तो उसकी ज़िन्दगी कुछ और ही होती। किसी बड़े आदमी से ब्याही जानी थी वह। नौकर-चाकर होते। बड़ा-सा कारोबार होता। अब यहाँ छोटे से फ्लैट में फंसी बैठी थी। अपने पिता को अपनी असलीयत भी नहीं बता सकती थी। वह उससे धन लेकर कोई कारोबार आरंभ कर सकती थी, पर शौन ऐसा व्यक्ति नहीं था जो उसके कहने के अनुसार चल सके। अमीर बनने का सपना लिए वह घूमता था, पर काम करके वह खुश नहीं था। उसकी तनख्वाह से घर का खर्च बमुश्किल चलता था। फिर पैटर्शिया आ गई तो उनके खर्चे बढ़ गए। पैटर्शिया की क्रिश्चियनिंग के समय उन्हें किसी से पैसे पकड़ने पड़े थे। फिर तो उसने काम भी छोड़ दिया था और सोशल सिक्युरिटी लेने लगा था। पैसे की तंगी के कारण झगड़ा और बढ़ने लगा था। कैरन को अपनी ख्वाहिशें तो भूल ही गई थीं, उसे तो अपनी ज़रूरतें पूरी करने की चिंता सताती रहती थी। फिर बलदेव को एक कमरा किराये पर दिया तो कुछ मदद होने लगी थी। शौन का धार्मिक होना भी अब चुभने लगा था। कैरन को उसका धर्म में यकीन एक ढोंग प्रतीत होता। वह स्वयं सबकुछ धर्म के विपरीत करता था।
एक दिन चर्च गई तो फॉदर जोय उसे शौन से अकेला करके एक कमरे में ले गया और बोला-
''मेरी बच्ची, कन्फैशन करना चाहेगी।''
''कैसा कन्फैशन फॉदर ?''
''मेरी बच्ची, कन्फैशन कर लेगी तो जीसस माफ़ कर देंगे। सारे गुनाह बख्से जाएंगे।''
''कैसे गुनाह फॉदर, मैंने कोई गुनाह नहीं किया, मैं किसी के गुनाह की शिकार अवश्य बनी हुई हूँ।''
कन्फैशन वाली बात शौन ने भी उससे कही थी। कई बार घर में झगड़ा होता। शौन उसे सॉरी कहने के लिए कहता। वह सॉरी कह देती तो शौन कहता कि ऐसे नहीं, जाकर कन्फैशन बॉक्स में माफ़ी मांग। उसने सोचा कि ज़रूर शौन ने ऐसी कोई बात फॉदर को कही होगी। उसने फॉदर से पूछा-
''फॉदर, क्या शौन मेरे पर कोई इल्ज़ाम लगा रहा है ?''
''हाँ, कि तूने सिर्फ़ पासपोर्ट के लिए उससे विवाह करवाया है।''
''यह बिलकुल झूठ है फॉदर, बिलकुल झूठ ! मैं तो हर हालत में इसके साथ रहने को तैयार हूँ। इसके साथ रहने में मेरी और मेरे परिवार की इज्ज़त है। गुनाहगार तो शौन है फॉदर।''
फिर उसने शौन के प्रति अपने सभी गिले-शिकवे बता दिए कि कैसे अपनी अमीरी के बारे में झूठ बोला। कैसे घर की हालत बुरी कर रखी थी। कैसे उसके साथ हर वक्त झगड़ा किया करता था। उसे पाकि(पाकिस्तानी) कहकर नस्लवादी फ़र्क पैदा करता था और कैसे अपने धर्म पर पछता रहा था, जिसमें तलाक की सुविधा ही नहीं थी। इस विवाह से छुटकारा शौन चाहता था न कि वह। अपनी बात पूरी सही सिद्ध करने के लिए उसने पैटर्शिया का सहारा भी लिया। उसने शौन को ज़ालिम बनाने में अपनी पूरी ताकत लगा दी। फॉदर पर उसकी बातों का असर हो गया। उसने आशीर्वाद देते हुए उसे वापस भेज दिया था। उस दिन के बाद उसकी हर बात बहुत ध्यान से सुनने लगा था।
शौन के चले जाने के बाद उसने पैटर्शिया को बग्घी में डाला और फॉदर जोय को बताने चल पड़ी। उसने फॉदर से कहा-
''फॉदर, शौन मुझे छोड़कर चला गया है।''
''कहाँ गया ?''
''पता नहीं, यह देश ही छोड़ गया, किसी दूसरी देश में...।''
फॉदर मन ही मन कोई प्रार्थना करने लगा और फिर बोला-
''मेरी बच्ची, ज़िन्दगी में ऐसे इम्तिहान इन्सान को परखने के लिए आया ही करते हैं। तुम्हारी ज़िन्दगी में भी आया है। हौसला रखो, अगर वह सच्चा क्रिश्चियन हुआ तो ज़रूर लौटेगा। उसे आना पड़ेगा।''
''फॉदर, यह गुनाह नहीं ?''
''बेशक गुनाह है, वह कन्फैशन करेगा।''
''फॉदर, मैं बहुत अकेली रह गई हूँ।''
''नहीं, तू अकेली नहीं। जीसस तेरे संग है। यहाँ आया कर। देख, यहाँ कितने तेरे ब्रदर-सिसटर्स आते हैं, कोई जिम्मेदारी संभाल ले। मैं शौन को तलाशूँगा और वापस तेरे पास लौटने के लिए मज़बूर करूँगा।''
''फॉदर, मुझे आर्थिक सहायता की भी ज़रूरत पड़ेगी।''
''मेरी बच्ची, इस बारे में हमारे पास कोई सुविधा नहीं है पर सरकार कर ही रही है। यहाँ ब्रदर सिसल डौनोमोर है जो ऐसे मामलों में माहिर है, वह तेरी हर मदद करेगा, उसे मिल लेना।''
उस दिन के बाद कैरन हर रोज़ चर्च जाने लगी। वह सवेरे ही पैटर्शिया को तैयार करके संग ले जाती। बड़े-बड़े स्टोरों से बहुत सारा सामान चर्च के लिए आया करता था। जिस सामान की तारीख छोटी होती, वह दूसरे चर्चों या चैरिटेबल संस्थाओं को भेज दिया जाता। कैरन की खाने-पीने की समस्या हल हो गई। ऐसे सामान से उसका फ्रिज भरा रहता था। सोशल सिक्युरिटी की ओर से फ्लैट का किराया और उसके अपने और पैटर्शिया के पैसे निरंतर लग गए थे। उसकी ज़िंदगी पहले से अच्छी और आसान हो गई।
उसे यकीन था कि शौन नहीं लौटेगा। लेकिन फॉदर उसे विश्वास दिलाये रहता। उसे शौन के लौटने की चाहत भी नहीं थी। कई बार बैठकर सोचने लगती कि अब वह क्या करे। उसका दिल करता कि डिस्को आदि जाए, पर पैटर्शिया के कारण बंधी बैठी थी। इन दिनों में ही उसका अपनी बहन गायत्री से फोन पर सम्पर्क हो गया। गायत्री उसे मिलने आने लगी। उसका अपने पति से झगड़ा चल रहा था। बात तलाक तक पहुँची हुई थी। तलाक के बाद गायत्री ने अपने घर में से आधा हिस्सा लिया और कैरन के पास आकर रहने लगी। गायत्री के आने से उसको बहुत फायदा हुआ। अकेलापन भी कम हुआ और अब वह बच्ची को उसके पास छोड़कर बाहर भी जा सकती थी। गायत्री के तलाक से उनके बाप पर ऐसा असर हुआ कि उसे हार्ट अटैक हो गया। बड़ा हार्ट अटैक था और वह लम्बे समय के लिए बिस्तर पर पड़ गया। कई बार कैरन सोचा करती थी कि वापस पिता के पास ही चली जाए, पर अब उसने वापस जाने का विचार ही छोड़ दिया था। उसके पिता को अब उसकी ज़रूरत भी नहीं थी। उसका कारोबार लड़के ने संभाल लिया था। फिर कैरन अपनी समस्याएँ बताकर पिता की बीमारी में वृद्धि नहीं करना चाहती थी।
एक शाम वह बाहर जाने के लिए तैयार हो रही थी। उसने बढ़िया से बढ़िया ड्रैस पहनी। उससे मेल खाता मेकअप किया। चमकीला-सा पर्स हाथ में पकड़ा। नए ढंग से संवारे बालों को ठीक करती हुई वह गायत्री से हंसकर बोली-
''आज मेरी अच्छी किस्मत की कामना कर कि शिकार के बग़ैर वापस न आऊँ।''
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(क्रमश: जारी…)

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शुक्रवार, 6 नवंबर 2009

गवाक्ष – नवम्बर 2009


“गवाक्ष” के माध्यम से हम हिन्दी ब्लॉग-प्रेमियों को हिन्दी/पंजाबी के उन प्रवासी लेखकों/कवियों की समकालीन रचनाओं से रू-ब-रू करवाने का प्रयास कर रहे हैं जो अपने वतन हिन्दुस्तान से कोसों दूर बैठकर अपने समय और समाज के यथार्थ को अपनी रचनाओं में रेखांकित कर रहे हैं। “गवाक्ष” के पिछ्ले तेरह अंकों में पंजाबी कवि विशाल (इटली) की कविताओं का हिन्दी अनुवाद, दिव्या माथुर (लंदन) की कहानी, अनिल जनविजय (मास्को) की कविताएं, न्यू जर्सी, यू.एस.ए. में रह रहीं देवी नागरानी की ग़ज़लें, लंदन निवासी कथाकार-कवि तेजेन्द्र शर्मा, रचना श्रीवास्तव, दिव्या माथुर की कविताएं, दुबई निवासी पूर्णिमा वर्मन की कविताएं, यू एस ए में रह रहीं हिन्दी कथाकार-कवयित्री इला प्रसाद, डेनमार्क निवासी कवि भगत धवन की कविताएँ और चाँद शुक्ला की ग़ज़लें, यू एस ए निवासी कवि वेद प्रकाश ‘वटुक’ तथा कवयित्री रेखा मैत्र की कविताएं, कनाडा अवस्थित पंजाबी कवयित्री तनदीप तमन्ना की कविताएं, यू के अवस्थित हिन्दी कवि-ग़ज़लकार प्राण शर्मा की ग़ज़लें, कैनेडा में अवस्थित पंजाबी कवि सुखिन्दर की कविताएं, कनाडा निवासी पंजाबी कवयित्री सुरजीत, अमेरिका अवस्थित डॉ सुधा धींगरा, कनाडा में अवस्थित हिंदी- पंजाबी कथाकार - कवयित्री मिन्नी ग्रेवाल की कविताएं, न्यूजीलैंड में रह रहे पंजाबी कवि बलविंदर चहल की कविता और पंजाबी कथाकार-उपन्यासकार हरजीत अटवाल के उपन्यास “सवारी” के हिंदी अनुवाद की अटठारहवीं किस्त आपने पढ़ीं। “गवाक्ष” के नवम्बर 2009 अंक में प्रस्तुत हैं – कैनेडा में अवस्थित पंजाबी लेखिका बलबीर कौर संघेड़ा की कविताएं तथा यू के निवासी पंजाबी कथाकार-उपन्यासकार हरजीत अटवाल के धारावाहिक पंजाबी उपन्यास “सवारी” की उन्नीसवीं किस्त का हिंदी अनुवाद…
कैनेडा से
बलबीर कौर संघेड़ा की दो कविताएं
मैं और वह
(अपनी पोती कमील के नाम)

वह जब मेरे पास आकर बैठती
एकटक मुझे निहारती
और कहती-
मैं तेरे आदि की
तेरे अन्त की
तेरे अनन्त की
सीमा भी हूँ
और -
तेरी सोटी भी
मैं तुझे पढ़ना चाहती हूँ
मैं तुझे पढ़ रही हूँ
मैं तुझे सुन रही हूँ
ताकि मैं स्वयं को जान सकूँ
तुझे पहचान सकूँ।

आज मैं सीख रही हूँ तुझसे
कैसे हँसी-ठहाकों की किलकारियों में
धुएं के गुबार निकाल दिए जाते हैं
कैसे सतरंगी पींग के रंग
हवा में उड़ाये जाते हैं
कैसे केसर के फूलों को
मन-मस्तक पर रचाया जाता है
और कैसे उजड़े घर
तिनका-तिनका एकत्र करके
बसाये जाते हैं
कैसे समय के दैत्य के हाथों
मर मरा जाते हैं
कैसे भूख की खातिर
स्वयं को खोया जाता है।

मैं सुन रही हूँ सब
मैं देख रही हूँ सब
पर मैं किसी भूख से
नहीं करूँगी समझौता
नहीं करूँगी मनफ़ी
सतरंगी पींग के रंग
अपने जीवन में से।

समय के पैरों में
जंजीर मेरी अपनी होगी
और मैं जानती हूँ
हर दैत्य को
पैरों तले रौंद कर
कैसे मारा जाता है।

मैं सब देख रही हूँ
और पहचान रही हूँ।

मैं रखूँगी अपना अस्तित्व
भोगूँगी हर ऋतु को
गर्व करूँगी अपनी कोख पर
दुलारूँगी उसे पल पल
रखूँगी स्मरण यह सब
जो तेरी नज़र में सवाल लटकता है
अम्बर मेरी उड़ान होगा
और मैं उन तारों की ओर हाथ बढ़ाऊँगी
जो तूने सपनों में सिरजे थे।

तोड़ लाऊँगी वह चमक
जो तेरी छाती में दफ़न है।
पर दादी -
जब तक तेरी नज़र में
सवाल जागता रहेगा
मैं हिम्मत नहीं हारूँगी।
00

ज़ब्त

उसने कहा-
लगाना है तेरे ज़ब्त का अंदाजा
खुले आम
साँसों का शोर उठेगा ही कभी

और मैंनें-
आँखों की नदी में
आँसुओं का आना ही रोक लिया
घुट घुटकर पी लिया उसका सितम

सोचा -
मेरी हार का नंगा नाच
देखेंगे वे
चमकती आँखों से
और मैंने-
ज़ब्त कर लिया
हर वह लफ्ज
जो उनकी छाती से उठा
जो जुबान ने उगला

सोचा- मैं ?
मैं तो वह औरत हूँ
जिसे धरती की कोख ने जन्मा
और जो
धरती का सीना चीर
भस्म हो गई
कोई राम भी नहीं तोड़ सका
सीता के हठ की सीमा
ज़ब्त उसने तब भी किया
और आज भी कर रही है
अपनी सोच के अन्दर
घुट घुटकर मर रही है
उसकी एक आँख में
टपकता आँसू है
और दूसरी में
तीसरे नेत्र की लौ !
00
(पंजाबी से हिंदी रूपांतर : सुभाष नीरव)
कैनेडा में अवस्थित पंजाबी की एक संवेदनशील लेखिका। पंजाबी में दो उपन्यास -''हक दी मंग'' और ''इक ख़त नां सजणां दे'', तीन कहानी संग्रह - ''आपणे ही ओहले'', ''खंभे'' और ''ठंडी हवा'' तथा यादों की एक पुस्तक -''परछाइयां दे ओहले परिक्रमा'' प्रकाशित।
सम्पर्क : 1266, Roper Drive, Milton.L9T 6E6, Ont. Canada
ई मेल : balbirsanghera@yahoo.com

धारावाहिक पंजाबी उपन्यास(किस्त- 19)



सवारी
हरजीत अटवाल
हिंदी अनुवाद : सुभाष नीरव
चित्र : प्रो0 रमेश शर्मा

॥ चौबीस ॥
शौन बलदेव को अधिक फोन नहीं करता था। उसके पास वक्त की कमी नहीं थी पर वह हर समय अपने भविष्य को लेकर सोच में डूबा रहता था। कई तरह के प्रोग्राम बनाता, रद्द करता। आयरलैंड में जाकर बसने का विचार भी उसकी योजनाओं में आता था। लेकिन यह इतना आसान नहीं था। उसी आयरलैंड से भाग कर उसने लंदन में आकर शरण ली थी। वापस उन लोगों में जाकर बसना कठिन था। अगर बलदेव उसके संग साझा व्यापार करने के लिए राजी हो जाता तो यह काम कुछ आसान हो जाता, पर बलदेव तो लंदन को वापस इस तरह भागा जैसे कोई बच्चा माँ की तरफ भागता है।
आयरलैंड का विचार उसके मन में फादर जोय के साथ हुई बातचीत में उभरा था। वह कहता था कि कैरन ने उसके साथ विवाह सिर्फ़ पासपोर्ट के लिए किया था। फादर जोय कहता कि अगर ऐसा होता तो अब तक वह छोड़कर चली गई होती। उसे फादर जोय पर गुस्सा था कि उसने ही उसका विवाह किया था और अब उसके पक्ष में खड़ा नहीं हो रहा था। विवाह कैंसिल करवाने की उसकी कोशिश व्यर्थ गई थी। वह इस आस से वापस लंदन आया कि शायद अब तक कैरन बदल गई हो। कुछ सप्ताह दूर रहने के कारण उसके अन्दर प्यार जागा हो या उसकी आवश्यकता या महत्व का अहसास हुआ हो।
वापस लौटा तो कैरन वैसी की वैसी थी। एक दिन वे ठीक रहे और फिर वही फसाद शुरू हो गया। अब तो बलदेव भी उसके संग नहीं रहता था कि जिसकी कुछ शर्म करते या वह बीच में पड़ कर उन्हें शान्त करवा देता। उसने एक बार फिर कैरन को छोड़कर चले जाने के बारे में सोचना प्रारंभ कर दिया। अब आयरलैंड उसके मन में नहीं आ रहा था, वह किसी और देश के बारे में सोच रहा था। जहाँ उसको कोई जानता न हो। शायद वह एक नई ज़िन्दगी शुरू कर सके। उसके मन में आस्ट्रेलिया का विचार आया। वह इस देश के विषय में काफी कुछ पढ़ता रहता था। यह एक विकसित होता देश था जहाँ सैटल होना भी आसान था और भविष्य भी उज्जवल बन सकता था। लेकिन वहाँ उसका कोई परिचित नहीं था। वह जगह लंदन की तरह तो हो ही नहीं सकती थी कि अटैची उठाओ और जाकर बस जाओ। आस्ट्रेलिया के बाद दूसरे नंबर पर अमेरिका का नाम था उसके मन में। अमेरिका में वैलजी के कुछ लोग रहते थे जिनके सहारे पैर टिकाये जा सकते थे। लेकिन वहाँ उसे यह भय था कि अगर किसी को पता चल गया कि वह पत्नी और बच्चे को छोड़कर भागा है तो उसकी क्या इज्ज़त रह जाएगी। उसकी धार्मिक उलझने और बढ़ सकती थीं। वहाँ के चर्च वाले बॉयकाट करने तक पहुँच सकते थे। वह सोचता कि क्यों न बलदेव के साथ बात करके देखे, क्या मालूम उसका कोई परिचित आस्ट्रेलिया में रहता हो।
उसे यकीन था कि कैरन को एकबार पता चल जाए कि वह उसको सदा के लिए छोड़ गया है तो वह स्वयं ही कहीं ओर चली जाएगी। वापस अपने मुल्क अथवा कहीं ओर। कोई नया मर्द खोज लेगी क्योंकि अकेले रहना उसके लिए असंभव होगा। सोशल सिक्युरिटी के थोड़े से पैसों पर उसका खर्चीला स्वभाव टिक नहीं सकेगा।
दूसरी सोच जो उसको हर वक्त तंग किए रखती वह थी - बलदेव और ऐलिसन को मिलाना। शौन का ऐलिसन से गुस्सा कम नहीं हुआ था पर अब वह उसकी ज़रूरत थी। कैरन से लड़कर वह उसकी तरफ निकल जाया करता था। उसके पास रात भी बिता आता। उसके बच्चों को भी कुछ ले दिया करता। पर उसने दिल से बहन को पूरी तरह माफ नहीं किया था। उसे यह भी था कि बलदेव यदि ऐलिसन से जुड़ जाएगा तो वह कैरन की मदद नहीं कर सकेगा। जिसका उसे हर समय डर बना रहता था। उसने बलदेव को उसके काम पर फोन किया। वह किसी तरह के गिले-शिकवे करने-सुनने के मूड में नहीं था। उसने सीधे ही पूछा-
''तेरा आस्ट्रेलिया में कोई परिचित है ?''
''आस्ट्रेलिया में तो नहीं, न्यूजीलैंड में है, मेरे मामा का लड़का।''
''अच्छा आदमी है ?''
''बस, मेरे जैसा ही है। अच्छे-बुरे का तू खुद सोच। क्यों क्या काम पड़ गया ?''
''कोई खास नहीं। मिलूँगा तो बताऊँगा।''
शौन पल भर के लिए रुक कर बोला-
''डेव, तू मेरी बहन ऐलिसन से क्यों नहीं मिलता।''
''यूँ ही। मैं बहुत व्यस्त रहा हूँ।''
''डेव, मैं सच कहता हूँ, तू एकबार मिल कर देख। किसी एक्ट्रेस से कम नहीं। स्वभाव की भी अच्छी है। तू एकबार उसके संग बाहर जाकर तो देख, तेरे दिल में उतर जाएगी।''
''शौन, मैं अभी ऐसे मूड में नहीं हूँ।''
''मूड में नहीं है तो न सही, मिलने में क्या हर्ज़ है। आजकल वह अकेली रहती है, ब्वॉय फ्रेंड काफी समय से छोड़ रखा है उसने।''
बलदेव इस बारे में और अधिक न कह सका। शौन ने उससे शुक्रवार को क्लैपहम स्टेशन पर मिलने का वायदा ले लिया।
शौन ने ऐलिसन के साथ संबंध सुधारे तो सबसे पहले उसने उसका ब्वॉय फ्रेंड ही छुड़वाया। वह जेल भी जा चुका था। कैथोलिक भी नहीं था। जब शौन कहता कि डैरक प्रोटेस्टैंट है तो ऐलिसन को गुस्सा आने लगता। उसने कहा-
''शौन, तू डैरक को गुनहगार माने जा रहा है कि वह प्रोटेस्टैंट है, पर कैरन भी तो हमारे धर्म की नहीं।''
''कैरन तो क्रिश्चियन है ही नहीं, इसलिए उसका कोई कसूर नहीं पर डैरक तो क्रिश्चियन है और यह धर्म के गलत अर्थ निकाले जाता है, यह है असली गुनाह।''
ऐलिसन को शौन की बात बहुत वजनदार नहीं लगती थी पर शौन के बार बार उसके घर आने से डैरक से उसका झगड़ा रहने लगा था और डैरक को दूसरी लड़की मिल गई और वह चला गया था। एक दिन ऐलिसन ने बलदेव के बारे में भी सवाल किया था। उसने पूछा -
''शौन, तू कैरन को तो हर समय पाकि-पाकि कहता घूमता है कि पाकिस्तानी ने तेरी ज़िन्दगी खराब कर दी। अब एक पाकि को मेरे गले मढ़ना चाहता है।''
''जब कैरन के लिए पाकि शब्द इस्तेमाल करता हूँ, मैं गुस्से में होता हूँ। नहीं तो हमारा धर्म रंग में विश्वास नहीं करता।''
''फिर कालों के बारे में क्यों कहते हैं कि कोई माँ के संग सो गया था तो काले बच्चे पैदा हुए।''
''यह तो एक मिथ है जो कि काले रंग के धरती पर आने के कारण को बताती है। इसकी सच्चाई के बारे में भी भ्रम हैं, और फिर इस मिथ के बावजूद उन्हें कोई खराब या घटिया नहीं कहता। धर्म तो बिलकुल भी नहीं।''
शौन को जब भी समय मिलता, ऐलिसन के साथ धर्म को लेकर बातें करने लग जाता था। वह ऐलिसन से कन्फेशन करवाना चाहता था। उसने कन्फेशन तो नहीं किया था पर चर्च जाने लग पड़ी थी। शौन आता तो ले जाता। क्लैपहम के चर्च का पादरी फादर एडवर्ड उसके साथ बहुत प्यार से बात करता। फादर कहता कि बच्चों को धर्म से ज़रूर जोड़ो। इंग्लैंड में रहते बच्चे धर्म से दूर जा रहे थे। इस मुल्क में कैथलिक संस्थाओं की बहुत ज़रूरत थी।
बलदेव जानता था कि ऐलिसन क्लैपहम रहती थी। शौन के साथ आज उसके घर ही जाना होगा। या शौन ने ऐलिसन को बाहर बुलाया होगा। वह सातेक बजे क्लैपहम स्टेशन पर पहुँच गया। वह इस मुलाकात के लिए स्वयं को तैयार करने लगा। शौन बाहर कार में बैठा उसकी प्रतीक्षा कर रहा था। वे दोनों बहुत प्यार से मिले। शौन ने कार आगे बढ़ाई और कहा-
''तेरे साथ बहुत बातें करनी थीं पर वक्त ही नहीं मिला।''
''यह आस्ट्रेलिया, न्यूजीलैंड का क्या चक्कर है ?''
''वही बताता हूँ। मैं कैरन को छोड़ कर जा रहा हूँ। कहीं और सैटल हो जाऊँगा।''
''अच्छा ! सोच-समझ कर कदम उठाना।''
''सोच लिया, बहुत सोच लिया। यहाँ धर्म ने मुझे बांध कर रखा हुआ है।''
आगे जाकर ट्रैफिक लाइट्स पर दायें मुड़कर बायें हाथ दूसरे घर के सामने गाड़ी रोक शौन ने कहा -
''तू मेरी एक मदद करना, मेरे बाद।''
''बता, कैसी मदद ?''
''कैरन तुझसे कंटेक्ट करे तो इग्नोर कर देना। कुछ बताना नहीं।''
''तू फिक्र न कर। वायदा रहा।''
शौन को उसकी बात से कुछ तसल्ली हुई।
अन्दर आकर उसने बलदेव और ऐलिसन का एक दूसरे से परिचय कराया। ऐलिसन उनके संग ही आकर बैठ गई। शौन बच्चों के बारे में बताता हुआ कहने लगा-
''यह बड़ी है- फेह। और यह है छोटा- नील। दोनों ही ट्रबल हैं, निरे डैविल !'' कहते हुए वह उनके साथ खेलने लगा। ऐलिसन ने बलदेव से उसके बच्चों के बारे में पूछना शुरू कर दिया। उसे उस वक्त एनेबल और शूगर याद आईं। वे फेह और नील की उम्र की ही थीं। ऐलिसन उससे काम आदि की बातें पूछती रही। उसने उसके पिता के निधन का अफसोस भी प्रकट किया। बलदेव को उसकी शक्ल थोड़ी सी याद थी। शौन के विवाह पर उसको देखा हुआ था। वह चोरी-चोरी ऐलिसन की तरफ देखता था। फिर दो पैग पिये तो सीधे देखने लगा। वह मैरी से कुछ भिन्न थी। मैरी से ज़रा-सा मोटी थी। बाल भी घुंघराले थे। उसका लहजा लंदन वाला था। पहली दृष्टि में पता ही नहीं चलता था कि वह आयरश है। उसने भी मैरी की तरह स्कर्ट पहन रखी थी। स्कर्ट के नीचे से मजबूत पिंडलियाँ झांक रही थीं। उसे स्कर्ट पसन्द आ रही थी। मैरी की स्कर्ट तो अच्छी लगती ही थी, अब ऐलिसन की स्कर्ट भी उसे सुन्दर लग रही थी। वह मन ही मन हँसा कि यही स्कर्ट थी जिसे पहनने के बारे में कभी सिमरन से झगड़ा हो जाया करता था। लम्बे बालों की अपेक्षा कटे हुए बाल अब अधिक आकर्षक लग रहे थे।
शौन ने उसके कंधे पर हाथ रख कर पूछा-
''भाजी ठीक हो ?''
''हाँ, ठीक हूँ।''
''कहाँ गुम है, वापस आ, अपनी ड्रिंक उठा।''
''ज्यादा नहीं पीनी। वापस भी लौटना है। तुझे पता है, मैं अधिक नहीं पी सकता।''
''वापस नहीं जाना। हम यहीं सोएंगे। मैं अब ड्राइव नहीं कर सकूँगा। जितनी चाहे, पी। अगर पीकर खराब भी हो गया तो अपना ही घर है।''
''खराब क्या ज़रूर होना है !''
पास बैठी ऐलिसन ने कहा। बलदेव को महसूस हुआ जैसे वह उसे अधिक पीने से रोक रही हो। शौन कहने लगा-
''डेव, मेरी तरफ तेरा कुछ सामान पड़ा था, उसे मैं यहाँ ले आया हूँ। जब चाहे ले जाना। साथ ही तेरी डाक भी मैंने यहीं री-डायरेक्ट करवा दी है।''
''शुक्रिया, मैं सोच ही रहा था कि चिट्ठियाँ लेने मैं तेरी तरफ कैसे जाऊँगा।''
शौन ने ऐलिसन का फोन नंबर बलदेव को लिखवा दिया कि कभी भी आकर डाक ले जाया करे। ऐलिसन उठकर रसोई में जा चुकी थी। रसोई में बन रहे खाने से उठती महक उसकी भूख को बढ़ाने लगी।
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(क्रमश: जारी…)

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