शनिवार, 29 मई 2010

गवाक्ष – मई 2010



“गवाक्ष” ब्लॉग के माध्यम से हम हिन्दी ब्लॉग-प्रेमियों को हिन्दी/पंजाबी के उन प्रवासी लेखकों/कवियों की समकालीन रचनाओं से रू-ब-रू करवाने का प्रयास करते आ रहे हैं जो अपने वतन हिन्दुस्तान से कोसों दूर बैठकर अपने समय और समाज के यथार्थ को अपनी रचनाओं में रेखांकित कर रहे हैं। “गवाक्ष” में अब तक पंजाबी कवि विशाल (इटली) की कविताओं का हिन्दी अनुवाद, दिव्या माथुर (लंदन) की कहानी, अनिल जनविजय (मास्को) की कविताएं, न्यू जर्सी, यू।एस.ए. में रह रहीं देवी नागरानी की ग़ज़लें, लंदन निवासी कथाकार-कवि तेजेन्द्र शर्मा, रचना श्रीवास्तव, दिव्या माथुर की कविताएं, दुबई निवासी पूर्णिमा वर्मन की कविताएं, यू एस ए में रह रहीं हिन्दी कथाकार-कवयित्री इला प्रसाद, डेनमार्क निवासी कवि भगत धवन की कविताएँ और चाँद शुक्ला की ग़ज़लें, यू एस ए निवासी कवि वेद प्रकाश ‘वटुक’ तथा कवयित्री रेखा मैत्र की कविताएं, कनाडा अवस्थित पंजाबी कवयित्री तनदीप तमन्ना की कविताएं, यू के अवस्थित हिन्दी कवि-ग़ज़लकार प्राण शर्मा की ग़ज़लें, कैनेडा में अवस्थित पंजाबी कवि सुखिन्दर की कविताएं, कनाडा निवासी पंजाबी कवयित्री सुरजीत, अमेरिका अवस्थित डॉ सुधा धींगरा, कनाडा में अवस्थित हिंदी- पंजाबी कथाकार - कवयित्री मिन्नी ग्रेवाल की कविताएं, न्यूजीलैंड में रह रहे पंजाबी कवि बलविंदर चहल की कविता, कैनेडा में अवस्थित पंजाबी लेखिका बलबीर कौर संघेड़ा की कविताएं, इंग्लैंड से शैल अग्रवाल की पाँच कविताएं, सिंगापुर से श्रद्धा जैन की ग़ज़लें, इटली में रह रहे पंजाबी कवि विशाल की कविताएं, यू एस ए में रह रहीं हिन्दी कथाकार-कवयित्री इला प्रसाद की एक लघुकथा और पंजाबी कथाकार-उपन्यासकार हरजीत अटवाल के उपन्यास “सवारी” के हिंदी अनुवाद की चौबीसवीं किस्त आपने पढ़ीं। “गवाक्ष” के मई 2010 अंक में प्रस्तुत हैं – कैनेडा निवासी पंजाबी कवि डा. सुखपाल की कविता तथा पंजाबी कथाकार-उपन्यासकार हरजीत अटवाल के धारावाहिक पंजाबी उपन्यास “सवारी” की पचीसवीं किस्त का हिंदी अनुवाद…


कैनेडा से
डा. सुखपाल की पंजाबी कविता

शब्दो तुम आना
हिंदी रूपांतर : सुभाष नीरव

शब्दो तुम आना
चुपचाप, सहज-सहज
मुंडेर पर आ बैठे
और फिर उड़ गए कबूतरों की तरह
छोटी-छोटी 'गुटर-गूं' करते

आँधी की तरह न आना
कि मुझे किसी वाद की छत के तले छिपना पड़े
या किसी विवाद की डाल को पकड़ना पड़े

तुम आना हुमकती हवा की तरह
जो तन को लगे तो आँखें मुंद-मुंद जाएँ
मन की खिड़कियाँ खुल-खुल जाएँ
फूलों की महक को
मेरे अन्दर आने के लिए राह मिले...

तुम आना उस सुरूर की तरह
जिसके बाद जीने का डर नहीं रहता
जिसके बाद सहज हो जाता है
हर संध्या-समय
बालों को फूलों से गूंथ लेना
पर फूलों को व्यर्थ तोड़ने वाली
कलाई पकड़कर रोक लेना...

सुन्दर शब्दो !
तुम मात्राओं के फीतों से बंधे
मज़दूरों की भांति न आना
तुम 'गगनमै थाल'¹ गाते हुए आना
या आना किसी दिव्य-पुरुष के तीर की तरह...

तुम आना उस टहनी की तरह
जो बदन पर गहरे नील नहीं
बल्कि पीछे छोड़ जाती हैं फूल...

मेरे अपनो !
तुम ऐसे आना
कि तुम्हें गाते हुए
मैं अपने आप तक पहुँच जाऊँ।
0
1-श्रीगुरूग्रंथ साहिब में 'सोहिला' शीर्षक अधीन एक खास वाणी की पंक्ति 'गगनमै थालु रवि चंद दीपक बने'।
(तनदीप तमन्ना के पंजाबी ब्लॉग ''आरसी'' से साभार)


डा. सुखपाल
निवास : कैनेडा
शिक्षा : वेटरिनरी साइंस में पंजाब कृषि विश्वविद्यालय लुधियाना से डिग्री(1982)
और यूनिवर्सिटी ऑफ गुअलफ़, कैनेडा से डॉक्टरेट(1995)।
संप्रति : अध्यापन( एनिमल एनस्थीजिआ यूनिवर्सिटी आफ गुअलफ, कैनेडा)
पुस्तकें : चुप चुपीते चेतर चढ़िया(2003), रहणु किथाऊ नाहि( 2007 )

धारावाहिक पंजाबी उपन्यास(किस्त- 25)

सवारी
हरजीत अटवाल
हिंदी अनुवाद : सुभाष नीरव




॥ तीस ॥
करीब ग्यारह बजे पॉल राइडर ने अपनी टोयटा वैन लाकर 'सिंह वाइन्ज़' के आगे खड़ी की और छोटा-सा हॉर्न बजाकर अन्दर की ओर झांकने लगा। अजमेर उसे देखकर तेजी से आया और वैन में उसके बराबर बैठ गया। पॉल पूछने लगा-
''हाउ यू डूइंग ?''
''फाइन।''
पॉल ने वैन राउंड अबाउट से घुमाकर हौलोवे रोड पर डाल ली। कुछ देर बाद उसने अजमेर से पूछा-
''ऐंडी, तू वैदरस्पून को जानता है ?''
''जिसकी पबों की चेन है।''
''हाँ, वह मेरा दोस्त है। किसी ज़माने में हम इकट्ठे बार मैन हुआ करते थे।''
''मुझे पता है जब उसने आर्चवे में पहला पब खरीदा था, अब वो मिलयनेअर है, कई सौ पब होगा उसका।''
''हाँ ऐंडी, बहुत लक्की है। मेरे से सलाह लेने आता रहा, बस मैंने टिक कर काम नहीं किया। कभी चिप्पी बन गया और कभी पलम्बर, पर वह मन मारकर लगा रहा।''
''बस, चांस मिलने की बात है पॉल।''
''हाँ, उसने हमेशा मैनेजरों के सिर पर काम चलाया और इस बरूरी को कोई मैनेजर ठीक नहीं मिला, नहीं तो यह पब भी ठिकाने का था।''
''बरूरी का पब था ?''
''हाँ, स्मूथ बिटर का, मैं तो इस पब में आता रहा हूँ।''
पॉल किसी पब के बिकने की खबर लाया था। अजमेर ने उसे कह रखा था कि ढंग का पब बिकाऊ हो तो बताये। फिंचली में लोंग लेन पर एक पब बन्द पड़ा था जो बिक रहा था। पॉल ने एजेंट से बारह बजे मिलने का समय तय कर रखा था। इस पब के लिए पॉल उसके साथ आधी हिस्सेदारी में खड़ा होने को तैयार था। इससे अजमेर की पब खरीदने की इच्छा को बल मिला। जब पॉल को इस पब के बिकाऊ होने का पता चला तो वह तुरन्त अजमेर के पास आया था और पब की तारीफें करने लगा था।
यह जो 'थेच्ड हाउस' पब था, यह सिर्फ़ शीला का था। पॉल उसका ब्वॉय फ्रेंड था, पर मालिक की भांति रहता था और इस्तेमाल करता था। शीला को यह पब उसके पहले पति रौबी से तलाक के समय हिस्से के रूप में मिला था। अजमेर को याद था कि पहले इसके मैनेजर जल्दी-जल्दी बदलते रहते थे। पब ढंग से चलता नहीं था। पॉल ने आकर इसे अच्छा-खासा बिजी कर दिया था। पब में उमड़ने वाली भीड़ से अजमेर के बिज़नेस को भी फायदा हुआ था। पब में आए लोग सिगरेट-कंडोम आदि लेने आ जाते। सभी यही कहते थे कि पॉल को बिज़नेस करना आता था।
वे बारह बजे से पहले ही पब के सामने पहुँच गए। एजेंट अभी आया नहीं था। पॉल अजमेर को पब के आसपास का इलाका दिखाने लगा। वैन को घुमाते हुए बोला-
''ऐंडी, देख कितने घर हैं। इनमें कितने लोग रहते हैं। इतनी लम्बी लोंग लेन है पर ये पब यहाँ एक ही था। पब के आगे पॉर्क देख कितना बड़ा... गर्मियों में तो यहाँ इतनी भीड़ होनी चाहिए कि खड़े होने को जगह न मिले। इतना बढ़िया ठिकाना है, पर अगर मैनेजमेंट खराब है तो ठिकाना क्या करेगा। मैं होता इसका मैनेजर तो देखता तू...।''
ऐसी बातें करते हुए वे पब के कार पॉर्क में आ गए। इस्टेट एजेंट भी पहुँच चुका था। उसने उन्हें सारा पब घुमा कर दिखलाया, अन्दर से, बाहर से, नीचे-ऊपर, सेलर और गार्डन। ऊपर फ्लैट में पूरे घर की रिहायश थी। नीचे सेलर इतना खुला था कि स्टॉक रूम बन सकता था। पब का खुला हॉल था। सीटें भी नई थीं। एजेंट हर चीज़ की तारीफ कर रहा था और एजेंट के साथ-साथ पॉल भी ताईद कर रहा था। पब की कीमत दो लाख पाउंड थी जबकि इस इलाके के घरों की कीमत ही ढाई लाख थी। कीमत इसलिए कम थी कि कुछेक काम होने वाला था। कंपनी को बेचने की भी जल्दी थी। कंपनी की नई पॉलिसी के अनुसार बन्द पड़े पब को जल्दी से जल्दी बेचना चाहते थे। एजेंट ने पॉल और अजमेर को सलाह करने के लिए अकेला छोड़ दिया। पॉल बोला-
''ऐंडी, कीमत बहुत जायज है। दो लाख में ऐसी बड़ी प्रॉपर्टी नहीं मिलेगी। यह बार यहाँ से हटा कर दीवार से लगा दी जाए, यहाँ एक तरफ डांस फ्लोर बन जाए, अधिक खर्च करने की ज़रूरत ही नहीं, यह बढ़ईगिरी का काम मैं खुद ही कर लूंगा, बहुत बढ़िया मौका है।''
अजेमर हाँ में सिर हिलाता रहा था। उसने एजेंट से कहा-
''पब हमें पसंद है, अभी और सलाह कर लें। तुम्हें फोन करेंगे।''
''ठीक है, पर कीमत बहुत जायज है। इसमें फ्लैक्सेबिलिटी नहीं है।'' कहता हुआ एजेंट एक तरफ चल दिया और पॉल और अजमेर वैन में आ बैठे। पॉल बोला-
''नो फ्लैक्सेबिलिटी, मॉय फुट। हमारी अपनी प्राइस है, हम अपनी ऑफर देंगे।''
थोड़ा और आगे आकर पॉल ने कहा-
''ऐंडी, पब मुझे चलाना आता है। पब में भीड़ उमड़ती है बैंड के कारण। बढ़िया बैंड हो तो लोग कैसे न आएं। नौजवानों को माडर्न बैंड पसंद है, अधेड़ लोग दूसरी तरह का संगीत पसंद करते हैं और आयरिश लोग कंटरी साइड संगीत को तरजीह देते हैं।''
अजमेर को पॉल की बातें अच्छी लग रही थीं। वह अपना विचार बताते हुए कहने लगा-
''कोई लक्की ड्रा शुरू कर लो, कोई कंपीटिशन आदि।''
''हाँ, बहुत कुछ हो सकता है। पब चलाना कभी भी मुश्किल नहीं। बस ठिकाना बढ़िया हो। चलाने के लिए एक नहीं तो दूसरा तरीका बरता जा सकता है। संगीत नहीं तो स्ट्रिपटीज, दोपहर का खाना भी सहायक होता है। ऐंडी, और भी बहुत से रास्ते हैं, तू मेरे संग खड़ा हो आधी हिस्सेदारी में, हम पब ले लेते हैं।''
''पॉल, सोचते हैं। कुछ और सोच कर इस स्कीम को मैच्योर करते हैं।''
अजमेर इतनी जल्दी हाँ करने वाला नहीं था। उसने पूछा-
''यह पब शीला की नज़र में नहीं पड़ा ?''
''शायद पड़ा हो, शीला में हिम्मत नहीं। उसके बेटा-बेटी तो साथ नहीं देते। ये पब भी मेरे कारण ही चलता है। तुझे बताया था कि मैं अपने भविष्य के बारे में सोचता हूँ, मुझे बच्चा चाहिए जो मेरे खानदान का नाम आगे चला सके और शीला अब इस काबिल नहीं रही।''
अजमेर इस पब की ओर खिंचा जा रहा था। पॉल की बातें उसे सही प्रतीत हो रही थीं। लोंग लेन काफी लम्बी सड़क थी जिस पर अन्य कोई पब भी नहीं था। इसके चल पड़ने के बहुत चांस थे लेकिन पॉल के संग आधे हिस्से वाली बात जच नहीं रही थी। व्यापार में आधा हिस्सा डालना बहुत बड़ी बात होती है। वह पॉल को जानता ही कितना था। पता नहीं, व्यापारिक संबंधों में वह कैसा हो। यह भी सच ही था कि पॉल के पास पब चलाने का हुनर था। यदि वह अकेला ही यह पब खरीद ले तो फिर शायद चले भी न। गोरों का इलाका था। पब का प्बलिक डीलिंग का बिज़नेस होता है। एशियन बन्दे को गोरे पब के मालिक के रूप में देखना पसंद भी करेंगे कि नहीं। कई तरह के ख़याल उसके मन में आ रहे थे। इन ख़यालों में से निकलकर उसने पॉल को कहा-
''दो लाख तो पब का हुआ, ऊपर और कितने लगेंगे ?''
''यही कोई दसेक ग्रैंड, और दो लाख तो वह मांग रहा है, हम ऑफर देंगे...कुछ तो घटायेंगे।''
''ठीक है, कल एक अस्सी की ऑफर दे दें ?''
''बिलकुल ठीक, एक नब्बे में सौदा हो जाने पर दो में पब तैयार।''
''ठीक है, हम वर्क आउट करते हैं कि पल्ले से कितने लगाने हैं और लोन कितना चाहिए।''
''ऐंडी, लोन की कोई प्रॉब्लम नहीं। फ्री होल्ड प्रॉपटी है। एक बैंक मैनेजर मेरा दोस्त है, सत्तर-अस्सी फीसदी कर्ज़ा दे देगा।''
''कर्ज़ा भी हिसाब से ही लेंगे पॉल, अगर डेढ़ लाख कर्ज़ा हुआ तो पचास हजार पास से डालना पड़ेगा।''
बातें करते हुए वे हाईब्री पहुँच गए। पॉल ने वैन अजमेर की दुकान के आगे रोक ली। पॉल ने कहा-
''ऐंडी, अच्छी तरह सोचकर फैसला कर ले। मैं तो बिलकुल तैयार हूँ। पब के काम का तू फिक्र न करना। सारा काम मैं करूँगा, तू बेशक आराम से यह दुकान चलाए जाना।''
''ठीक है पॉल, बाद में बात करते हैं।''
कहते हुए अजमेर उतर गया।
अब अजमेर के मन में हर वक्त पब का भूत सवार रहने लगा। जब से उनके एक गाँववाले ने पब खरीदा था, तब से ही अजमेर भी पब के बारे में सोचने लग पड़ा था। घर पहुँच कर उसने पॉल के संग देखे पब के बारे में बात की। गुरिंदर बेपरवाह-सी बोली-
''मुझे क्या, जैसा मर्जी हो करो। तुम चारो भाइयों ने खुद ही पिये जानी है। आने जाने वाला भी पब में ही उतरेगा।''
''ऐसा नहीं होगा, साथ में गोरा पार्टनर भी तो होगा।''
''गोरा पार्टनर क्यों ? ये गोरे भी कभी किसी के सगे होते हैं।''
यह गोरे पार्टनर वाली बात गुरिंदर को कुनैन की तरह लगी। अजमेर ने सोचा कि उसके संग बात करने का कोई फायदा नहीं। वह किसी न किसी के संग बात करनी चाहता था। अगर टोनी के साथ बात करता तो उसने सबको बताकर पहले ही शोर मचा देना था। शिन्दे के बारे में वह सोचता कि इसे यहाँ के व्यापार की क्या समझ हो सकती है। वह सतनाम की तरफ चल पड़ा। उसके संग यह सब साझा किया जा सकता था। वह कोई सलाह भी दे सकता था। रास्ते में जो भी पब आता, उसे वह बहुत गौर से देखता। लोंग लेन वाला पब इनमें से सबसे सुन्दर लगता।
जब वह पहुँचा, सतनाम फुरसत-सी में ही खड़ा मिला। अजमेर ने सारी कहानी बताई। वह उसके संग पब देखने के लिए लोंग लेन की तरफ चल पड़ा। पब उसे भी बहुत पसंद था। उसने कहा-
''भाई, बाकी तो सब ठीक है, पर यह पॉल के आधे वाली बात सही नहीं।''
''वह कैसे ?''
''मुझे यह आदमी ज़रा डौजी लगता है, उधर तो शीला रखी हुई है, इधर यह लिन के साथ रहता है। मैं उस लड़की को जानता हूँ। अब तो शायद प्रैगनेंट ही हो, कुछ दूसरे ढंग से ही चला करती है।''
''हो सकता है, शीला से इसकी बनती नहीं, बच्चे के लिए तरस रहा है।''
''बस फिर, शीला बांझ है और इसने लिन को रख लिया है और अब यह थैच्ड हाऊस में से मूव होने के चक्कर में है। और यह नया पब इसके लिए बढ़िया मौका है।''
''इससे हमें क्या मतलब। हमें तो यह देखना है कि यह अपने कितना काम आ सकता है, आ भी सकता है कि नहीं।''
''भाई, तू अकेला ले।''
''इस बारे में भी मैंने बहुत सोचा है। एक तो गोरों का इलाका है, दूसरा इस काम की हमें अभी समझ भी नहीं है।''
''बात तो ठीक है, डेढ़ लाख पाउंड की किस्त कितनी आएगी महीने की ?''
''पंद्रह सौ पाउंड के करीब आएगी। मैं सोचता हूँ कि अगर पब अपनी किस्त ही निकाले जाए तो बहुत है। बीच में पड़कर काम का भी पता चल जाएगा। अगर पॉल ठीक चला तो ठीक, नहीं तो उसका हिस्सा देकर एक तरफ करेंगे।''
''ठीक है फिर, ले लो रिस्क।'' सतनाम ने कहा।
अजमेर का पक्का मन बन गया। उसने एजेंट को फोन किया। जैसा पॉल और उसने सोचा था, एक लाख नब्बे हजार में सौदा हो गया। एजेंट ने सौदे के तय हो जाने के कारण हज़ार पाउंड डिपाज़िट के तौर पर मांग लिया और कहा कि जल्दी ही चैक भेज दो ताकि किसी दूसरे ग्राहक को यह पब न दिखाया जाए।
अजमेर अब स्वयं को पब का मालिक समझने लगा था। पब का मालिक बन जाने से उसका मान और बढ़ जाना था। पब का नाम ही बड़ा होता है। पब भी फिंचली में जहाँ के घरों की कीमत आम इलाकों से अधिक हैं। शाम को वह थैच्ड हाऊस में बैठा पॉल से बीयर पीता रहा और भविष्य के प्रोग्राम बनाता रहा।
अगली दोपहर वह काउंटर पर खड़ा था। शिन्दा ऊपर रोटी खाने गया हुआ था। शीला कुछ लेने के लिए दुकान में आई और व्यंग्य में बोली-
''ऐंडी, पब का सौदा हो गया ?''
''हाँ, हो गया। हज़ार पाउंड का चैक एजेंट को भेजना है, बस आज भेज देंगे।''
''ऐंडी, पब वह बढ़िया है, मैंने भी देखा था।''
''फिर तूने क्यों नहीं खरीद लिया ?''
''मैं अकेली हूँ, किधर-किधर होऊँगी। मेरा बेटा-बेटी तो चले गए, यह पॉल भी भरोसे वाला आदमी नहीं, तू भी इससे बचकर रहना।''
''वह कैसे ?''
''देख ऐंडी, तुझे बात साफ़ कर दूँ। इसके पास कोई पैसा-वैसा नहीं है, बिलकुल नंग है। यह चाहता है कि कैश में सारे पैसे तू दे और वह मुफ्त में ही आधे का मालिक बन जाए।''
''यह कैसे हो सकता है। अगर आधे की हिस्सेदारी करनी है तो कैश भी आधा देना पड़ेगा।''
''कितना कैश होगा ?''
''पच्चीस-पच्चीस हज़ार दोनों के हिस्से आएगा।''
''इसके पास तो पाँच सौ पाउंड भी नहीं होगा, इसने बाहर कोई औरत रख रखी है, अपनी सारी तनख्वाह और पब में से पैसे निकाल-निकाल कर उसे खिलाए जाता है... अगर इसके पास पच्चीस हज़ार हो तो मैं न इसे हिस्सेदार रख लेती।''
अजमेर को जैसे साँप सूंघ गया हो। शीला जाते हुए बोली-
''ऐंडी, तू मेरा अच्छा पड़ोसी है, मेरा फर्ज़ है - तुझे आगाह करना, बाकी तू अपनी मर्जी कर।''
शीला एक ही झटके से उसका पब का सपना चकनाचूर कर गई। वह ठगा हुआ खड़ा था। तब तक शिन्दा भी दुकान में आ गया। अजमेर को घबराया हुआ देखकर उसे चिंता हुई। उसने सोचा कि कोई दुकान में से चोरी करके भाग गया है। घंटेभर पहले जब वह दुकान में अकेला था तो एक गोरा लड़का बीयर की बोतल चुरा कर ले गया था। शिन्दा अजमेर को बताने लगा-
''भाजी, आज तो कमाल हो गई। एक गोरा आया, मैं गल्ले पर खड़ा था, उसने फुर्ती से बोतल उठाई और दरवाजा खोल कर भाग गया।''
अजमेर ने उसकी बात सुनी और गुस्से में उबलने लगा और बोला-
''और तू खड़ा देखता रहा ! तुझे तनख्वाह मैं ऐसी चोरियाँ करवाने की देता हूँ ?''
(जारी…)
00

लेखक संपर्क :
67, हिल साइड रोड,
साउथाल, मिडिलसेक्स
इंग्लैंड
दूरभाष : 020-85780393
07782-265726(मोबाइल)

सोमवार, 12 अप्रैल 2010

गवाक्ष – अप्रैल 2010



“गवाक्ष” ब्लॉग के माध्यम से हम हिन्दी ब्लॉग-प्रेमियों को हिन्दी/पंजाबी के उन प्रवासी लेखकों/कवियों की समकालीन रचनाओं से रू-ब-रू करवाने का प्रयास करते आ रहे हैं जो अपने वतन हिन्दुस्तान से कोसों दूर बैठकर अपने समय और समाज के यथार्थ को अपनी रचनाओं में रेखांकित कर रहे हैं। “गवाक्ष” में अब तक पंजाबी कवि विशाल (इटली) की कविताओं का हिन्दी अनुवाद, दिव्या माथुर (लंदन) की कहानी, अनिल जनविजय (मास्को) की कविताएं, न्यू जर्सी, यू.एस.ए. में रह रहीं देवी नागरानी की ग़ज़लें, लंदन निवासी कथाकार-कवि तेजेन्द्र शर्मा, रचना श्रीवास्तव, दिव्या माथुर की कविताएं, दुबई निवासी पूर्णिमा वर्मन की कविताएं, यू एस ए में रह रहीं हिन्दी कथाकार-कवयित्री इला प्रसाद, डेनमार्क निवासी कवि भगत धवन की कविताएँ और चाँद शुक्ला की ग़ज़लें, यू एस ए निवासी कवि वेद प्रकाश ‘वटुक’ तथा कवयित्री रेखा मैत्र की कविताएं, कनाडा अवस्थित पंजाबी कवयित्री तनदीप तमन्ना की कविताएं, यू के अवस्थित हिन्दी कवि-ग़ज़लकार प्राण शर्मा की ग़ज़लें, कैनेडा में अवस्थित पंजाबी कवि सुखिन्दर की कविताएं, कनाडा निवासी पंजाबी कवयित्री सुरजीत, अमेरिका अवस्थित डॉ सुधा धींगरा, कनाडा में अवस्थित हिंदी- पंजाबी कथाकार - कवयित्री मिन्नी ग्रेवाल की कविताएं, न्यूजीलैंड में रह रहे पंजाबी कवि बलविंदर चहल की कविता, कैनेडा में अवस्थित पंजाबी लेखिका बलबीर कौर संघेड़ा की कविताएं, इंग्लैंड से शैल अग्रवाल की पाँच कविताएं, सिंगापुर से श्रद्धा जैन की ग़ज़लें, इटली में रह रहे पंजाबी कवि विशाल की कविताएं, यू एस ए में रह रहीं हिन्दी कथाकार-कवयित्री इला प्रसाद की एक लघुकथा और पंजाबी कथाकार-उपन्यासकार हरजीत अटवाल के उपन्यास “सवारी” के हिंदी अनुवाद की तेइसवीं किस्त आपने पढ़ीं। “गवाक्ष” के अप्रैल 2010 अंक में प्रस्तुत हैं – यू के में अवस्थित जाने-माने ग़ज़लकार प्राण शर्मा की नई ग़ज़लें तथा पंजाबी कथाकार-उपन्यासकार हरजीत अटवाल के धारावाहिक पंजाबी उपन्यास “सवारी” की चौबीसवीं किस्त का हिंदी अनुवाद…

यू.के. से
प्राण शर्मा की तीन ग़ज़लें
(1)
हाथ मिला लेने से यार नहीं होता
हर कोई अपना दिलदार नहीं होता

गंगा का जल पावन ही कहलाता है
सच्चे मन का झूठा प्यार नहीं होता

कैसे कह दूँ बेगानों को मैं अपना
सबसे इक जैसा व्यवहार नहीं होता

कितने हो अनजान कि ये भी जाना नहीं
कांटों का तो कारोबार नहीं होता

दिल चाहे कितना भी किसी का हो पक्का
कौन मुसीबत में लाचार नहीं होता

कुछ तो है संबंध हमारा सपनों से
माना हर सपना साकार नहीं होता

‘प्राण’ समर्पण करना पड़ता है खुद को
प्यार जताने से उपकार नहीं होता

(2)
बुरा-भला रिश्तों के बिगड़ते क्यों बोले
भेद किसी के यारो कोई क्यों खोले

कुछ तो लगे सच्चाई जैसा अय यारो
कोई मुँह से बोले या मन से बोले

क्यों न सुहायें हर मन को फूलों जैसे
लोग कि जिनके चेहरे हैं भोले-भोले

रोज़ नहीं चलती है फ़कीरी इनकी भी
रह जाते है खाली फ़कीरों के झोले

दूर जलाओ आग यहाँ से मतवालो
पड़ न कहीं जाएँ खलिहानों पर शोले

मिट्टी-मिट्टी ‘प्राण’ हुआ कमरा-कमरा
आँधी में दरवाजे मैंने क्या खोले

(3)
मेरी अच्छी किस्मत है कि मुझको अच्छे मीत मिले हैं
लगता है बगिया में केवल सुन्दर-सुन्दर फूल खिले है

ये भी सच है मेरे यारो अपने तो अपने होते हैं
ये भी सच है मेरे यारो अपनों के हर रोज़ गिले हैं

दो वक्तों की रोटी उसको मिली तो गुस्सा क्यों खाता है
शुक्र मना कि बेचारे के बरसों बाद अब होंठ हिले हैं

इतनी खुशी मिली है मुझको, अपनो से बेगानों से भी
लगता है, गुंचे और पत्थर दोनों मिलकर साथ खिले हैं

क्यों न रहो तुम जा के कहीं भी, मन में संशय पालने वालो
सब के सब है अपने यारो, भारत में जितने भी ज़िले हैं
00

जन्म-१३ जून ,१९३७ , वजीराबाद (वर्तमान पाकिस्तान)
शिक्षा –एम ए(हिन्दी), पंजाब विश्वविद्यालय
१९६६ से यू.के में।
सम्मान-१९६१ में भाषा विभाग ,पटियाला ,पंजाब द्वारा आयोजित "टैगोरनिबंध प्रतियोगिता" में द्वितीय पुरस्कार। १९८३ में कादम्बिनी द्वारा आयोजित “अंतर्राष्ट्रीय कहानी प्रतियोगिता " में सांत्वना पुरस्कार। १९८६ में ईस्ट मिडलैंड आर्ट्स ,लेस्टर ,यूं,के द्वारा आयोजित कहानी प्रतियोगिता में प्रथम पुरकार। २००६ में हिन्दी समिति ,यूं .के द्बारा "हिन्दी साहित्य के कीर्तिपुरुष" के रूप में सम्मानित।लेखन- ग़ज़ल विधा पर कई लेख-कहानी और लघु कहानी लिखने में भी रूचि। यूँ तो गीत-कवितायें भी कहते हैं लेकिन गज़लकार के रूप में जाना जाते हैं। ग़ज़ल विधा पर इनके आलेखों की इन दिनों खूब चर्चा है।प्रकाशित कृतियाँ – ‘ग़ज़ल कहता हूँ’ और ‘सुराही’। ‘सुराही’ का धारावाहिक रूप में हिन्दी की वेब पत्रिका ‘साहित्य कुञ्ज’ और महावीर शर्मा के ब्लॉग पर प्रकाशन।
ई मेल : sharmapran4@gmail.com

धारावाहिक पंजाबी उपन्यास(किस्त- 24)



सवारी

हरजीत अटवाल
हिंदी अनुवाद : सुभाष नीरव


॥ उनतीस ॥

अजमेर को सोहन सिंह की मृत्यु के बाद ही पता चला कि वह कितना महत्वपूर्ण था उसकी दुकान के लिए। पूरा रखवाला था। उसके सिर पर ही दुकान को टोनी के आसरे छोड़ सकता था। उसके बाद एक बार तो सब कुछ बहुत ही मुश्किल लगा। न तो टोनी को अकेले छोड़ा जा सकता था इस डर से कि चोरी कर लेगा, न ही वह खुद या गुरिंदर हर वक्त दुकान में खड़े रह सकते थे। गुरिंदर को घर का भी काम करना होता था। अजमेर को भी कई अन्य दुकानों के काम होते। फिर ऊपर से अफ़सोस प्रकट करने वालों की भीड़ लगी रहती। बलदेव शाम को मुँह भर दिखाने आता था। जब शिन्दे को बुलाने की बात हो रही थी तो उसे लगा था कि वह ज़रूर सोहन सिंह वाली जगह की पूर्ति करेगा। वह शिन्दे को अपने संग ही काम पर रख लेगा और वह उसके पास ही रहता रहेगा। शिन्दे को उसके पास ही रहना चाहिए था। भाईचारे में भी उसके पास रहने की ही उसकी बात होनी थी। फिर वह सोचने लगता कि शिन्दा गाँव में निठल्ला ही रहता था। खाली रह कर लंबरदारी-जैसी आदत बन चुकी होगी। पता नहीं, काम में निकम्मा ही हो। उसने तय कर लिया कि शिन्दे के आने पर उसके काम को परख कर ही सोचेगा कि क्या करना है। अगर न हुआ तो वह उसे किसी अन्य जगह काम खोज देगा। कुछ न हुआ तो वापस इंडिया भेज देगा।
शिन्दा आ गया। पहले एअरपोर्ट से पीते हुए आए, फिर सभी पब में जा बैठे। अजमेर शराबी हो गया और ऊपर जाकर सो गया। पहले भी ऐसा ही किया करता था। ज्यादा शराबी हो जाता तो बैड पर गिरने की करता। सतनाम भी चला गया और बलदेव भी। दुकान बन्द करते समय तक टोनी ही रह गया। गुरिंदर उसके संग खड़ी थी। शिन्दे ने आकर टोनी को काम करते हुए देखा और फिर शटर बन्द करवाने में टोनी की मदद करने लगा। सवेरे उठकर शिन्दा शटर स्वयं ही खोलने लगा। उसने सोहन सिंह वाली जगह अच्छी तरह हथिया ली। गुरिंदर ने टिल्ल सिखाने की कोशिश की तो शिन्दे ने सहजता से सीख ली। अजमेर को खुशी थी कि शिन्दा काम में ठीक था। उसने टोनी को ओवरटाइम देना कम कर दिया। इतवार को उसने टोनी को बुलाना ही बन्द कर दिया। दो घंटे तो दुकान खुलती थी। शिन्दे के साथ गुरिंदर खड़ी हो जाती। काम चल जाता। शाम को भी साढ़े तीन घंटे के लिए ही दुकान खुलती थी। वे जैसे तैसे काम चला लेते।
अजमेर ने सोचकर शिन्दे से कहा-
''कहाँ काम करना चाहता है ? यहीं दुकान में या कहीं ओर ?''
''भाजी, मुझे जहाँ भेज दोगे मैं वहीं कर लूँगा, मेरा क्या है।''
''अगर बाहर करेगा तो किराये पर रहना पड़ेगा, रोटी भी खुद पकानी पड़ेगी, कपड़े भी खुद धोने पड़ेंगे। काम भी ऐसा-वैसा ही मिलेगा। यहाँ घर है और कोई प्राब्लम नहीं।''
''जैसा कहते हो, मैं यहीं कर लूँगा।''
''बुच्चड़ के साथ भी सलाह कर ले।''
''इसमें सलाह की क्या ज़रूरत है। जैसा तुमने कह दिया, वे कौन सा तुम्हारी बात काटने वाले हैं।''
''पता नहीं, उसे टंगड़ी-सी तो फंसाने की आदत है।''
अजमेर ने कहा। अगले दिन सतनाम से भी इस बारे में बात की। कहने लगा-
''मैंने शिन्दे से बात की थी कि रहना है या वापस जाना है। कहता था-यहीं रहना है। मैंने कहा- भई बाहर काम ढूँढ़ देते हैं, मेरे पास तो टोनी है ही। कहने लगा- मैंने यहीं दुकान में ही काम करना है। मैंने कहा- चल ठीक है। मैं पचास पाउंड हफ्ते के दिए जाऊँगा, बाहर रहकर पचास नहीं बचने वाले।''
सतनाम ने कोई उत्तर नहीं दिया। पर उसने इसके बारे में सोचना आरंभ कर दिया। शिन्दे को पचास पाउंड का पता चला तो वह खुश हो गया। उसने पाउंडों को रुपये में बदल कर देखा था। पचास हफ्ते की, दो सौ महीने के और ढाई हज़ार साल के। बात लाखों में पहुँचती थी। उसके तो धरती पर पैर ही नहीं लग रहे थे। उसने काम करते होने का दिखावा करना टोनी से सीख लिया था और वह हर वक्त हाथ चलाता ही रहता। उसकी तरफ देखता अजमेर सोचने लगा कि क्यों न कोई दुकान या कोई बिजनेस साथ के साथ फंसा लिया जाए। दुकान तो इस तरह शिन्दे द्वारा संभाली ही जानी थी।
अब मसला यह था कि शिन्दे का सैर का वीज़ा छह महीने का था। उसके बाद उसका क्या इंतज़ाम होना था। यह चिंता शिन्दे की नहीं थी। अजमेर की थी या थोड़ा-बहुत सतनाम की। अजमेर ने सतनाम से बात की तो वह बोला-
''इललीगल ही रहना पड़ेगा, अब और तो कोई रास्ता नहीं पक्का होने का।''
''राह तो है एक, खालिस्तानी बनकर पुलिटिकल स्टे की एप्लीकेशन दे दे।''
''दे दो फिर, देखी जाएगी। शायद बात बन जाए। जहाँ पहले ही हज़ारों-लाखों स्टे के लिए एप्लाई किए घूमते हैं, वहाँ इसकी एक एप्लीकेशन से होम ऑफिस भला कितना बिजी हो जाएगा।''
''पर लोग क्या कहेंगे कि कामरेड परगट सिंह के भतीजे ने खालिस्तानी बन कर...।''
''बात तो भाई ठीक है यह भी।''
''मैं सोचता हूँ कि इसी तरह रहे जाए, ज़रूरत पड़े तो मेरे वाली या बलदेव वाली अडेंटीफिकेशन इस्तेमाल कर कर ले।''
बात हो गई। शिन्दा सोहन सिंह की तरह दुकान का एक हिस्सा बन गया। शेष सब कुछ 'सिंह वाइन्ज़' में पहले की तरह ही था।
बलदेव और मनजीत इतवार को आ जाते। पहले की भांति मुनीर और प्रेम शर्मा भी आ जाया करते। पब में जा बैठते। गिलासों के गिलास खाली होते। अजमेर पब के व्यापार को बहुत गौर से देखता। कई बार पब के मालिक पॉल राइडर के साथ भी पब के कारोबार के बारे में बातें करने लगता।
पंजाब में गड़बड़ी ज़ोरों पर थी। कई बार अजमेर कहने लगता-
''यह तो शुक्र है, गागू अभी छोटा है, नहीं तो मुंढीर (लड़कों का समूह) के साथ बिगड़ जाता। पंजाब के लड़के पता नहीं क्या सोच रहे हैं।''
वह पंजाब के हालात को लेकर बहुत फिक्रमंद रहता था। वही नहीं, सतनाम और प्रेम भी वहाँ की बातें करते हुए जज्बाती हो जाते। रोज़ ही कितने-कितने बेगुनाह लोग मर रहे थे। मुनीर, इन बातों से अधिक बावास्ता नहीं था। वह छोटी-मोटी बात कर लेता। वह अभी भी बिहार के चांगलो कबीले के वांगली खेल के इर्दगिर्द ही उलझा हुआ था।
एक दिन सतनाम ने कहा-
''मियाँ, हम क्यों न वांगली के बारे में बीच का कोई समझौता कर लें।''
''कैसा समझौता ?''
''तेरी बात को थोड़ा-सा हम मान लेते हैं, थोड़ा-सा तू इधर सरक आ, इस कहानी में से थोड़ी-सी कहानी खारिज कर दे।''
''ओए सतनाम सिंघा, ऐ समझौता तां मैं करसी अगर झूठ होसी। ऐ गल्ल तां मैंनू इस तरहां होंट करसी कि सारी की सारी मेरे जेहन में संभाली पईऊ। अगर यकीन नहीं होसी तो जाके देख छड्डो।''
''तेरा मतलब इतनी सी बात के लिए इंडिया की टिकट खरीदें, फिर बिहार जाकर चांगलो खोजें।''
''तू सरदारा कुछ न कर, ऐह गल्ल यहीं छोड़ सू।''
''कैसे छोड़ दूँ। आदमी का आदमी के साथ मुकाबला तो है ही, पर एक नगाड़े से या तू जिसे वांगलू कहता है, से कैसा मुकाबला।''
''मुकाबला तो प्लेअरों में भी होसी पर दिखता नहीं ऊ। यकीन जाणो यारो।''
''यकीन ! क्यों करें तेरे पर यकीन ? कारण बता।''
''इस कारण कि मैं शरीफ बंदा, अगर नहीं करना सू तो भुला छड्ड।''
''अपनी शराफ़त की काई और बात सुना जो तेरी यह बात मान सकें।''
''की सुणा सां सतनाम सिंघ जी, की सुणां सां। मैं कभी कूकर के सोटी तक नहीं है मारी।''
''कुत्ते को गाली दी होगी।''
सतनाम भी मजे लेने के मूड में था। प्रेम और अजमेर दर्शक बने बैठे थे। मुनीर कुछ खीझकर ठीक होकर गया और बताने लगा-
''गालियों की गल्ल तों ऐह है कि मैनूं आउंदी ही नहीं ऊ। छोटा होता था तो मेरे वालिद साहिब ने एक बंदा मैनूं गालियाँ सिखावण खातिर रखिया होसी। एक गाली मैनूं याद होसी तो उसनूं एक छिल्लड़ मिल सी।''
''मियाँ, तू आगे ही बढ़ी जा रहा है।''
''खुदा कसम।''
मुनीर फिर अपनी बात पर अड़ गया। हँसी-ठट्ठा होता रहा। सतनाम ने कहा-
''तेरी बात का यकीन तो कर लें पर तू हमारी बात का नहीं करेगा।''
''तू बता तो सही।''
''वो जो सामने काला बैठा है, उसकी आँख बकरे की है।''
''यारा, तू मजाक उडा सैं। भला बकरे दी किंज लग सी। वैसे मैनूं तो इह वी नहीं सू पता कि अखियाँ चेंज होसी, इह तो मेरे बाबे ने बदलवाई तो यकीन आसी।''
''तेरा बाबा ने आँख बदलवाई ?... एक और गप्प।''
''यारा, तैनूं मेरी हर गल्ल गप्प लगसी... मेरे बाबे का इक सरदार दोस्त होसी, मरन लगा अखियाँ दान कर गिया, पर बाबे के साथ धोखा हो गया सू, बहुत बड़ा धोखा।''
''वह कैसे ?''
''मेरा बाबा पंज नवाजी और अखियाँ अधिया पी के खुल सण।''
सभी हँसने लगे। इतना हँसे कि आसपास बैठे लोग उनकी ओर देखने लग पड़े। जब तक पब बन्द होने की घंटी बजी, सभी उठकर चल पड़े। मुनीर और प्रेम -पने घर की ओर चल दिए। शिन्दा ग्राहकों को सर्व कर रहा था। सतनाम ने अजमेर से पूछा-
''शिन्दा, काम में कैसा है ?''
''महा लेज़ी...। इसका कोई फायदा नहीं, टोनी भी खीझा पड़ा है। मैं वायदा कर बैठा हूँ काम देने का। अब सोचता हूँ कि मेरे तो पचास भी पूरे नहीं होने वाले।''
(जारी…)
00

लेखक संपर्क :
67, हिल साइड रोड,
साउथाल, मिडिलसेक्स
इंग्लैंड
दूरभाष : 020-८५७८०३९३
07782-265726(मोबाइल)

शनिवार, 27 मार्च 2010

गवाक्ष – मार्च 2010


“गवाक्ष” ब्लॉग के माध्यम से हम हिन्दी ब्लॉग-प्रेमियों को हिन्दी/पंजाबी के उन प्रवासी लेखकों/कवियों की समकालीन रचनाओं से रू-ब-रू करवाने का प्रयास करते आ रहे हैं जो अपने वतन हिन्दुस्तान से कोसों दूर बैठकर अपने समय और समाज के यथार्थ को अपनी रचनाओं में रेखांकित कर रहे हैं। “गवाक्ष” में अब तक पंजाबी कवि विशाल (इटली) की कविताओं का हिन्दी अनुवाद, दिव्या माथुर (लंदन) की कहानी, अनिल जनविजय (मास्को) की कविताएं, न्यू जर्सी, यू.एस.ए. में रह रहीं देवी नागरानी की ग़ज़लें, लंदन निवासी कथाकार-कवि तेजेन्द्र शर्मा, रचना श्रीवास्तव, दिव्या माथुर की कविताएं, दुबई निवासी पूर्णिमा वर्मन की कविताएं, यू एस ए में रह रहीं हिन्दी कथाकार-कवयित्री इला प्रसाद, डेनमार्क निवासी कवि भगत धवन की कविताएँ और चाँद शुक्ला की ग़ज़लें, यू एस ए निवासी कवि वेद प्रकाश ‘वटुक’ तथा कवयित्री रेखा मैत्र की कविताएं, कनाडा अवस्थित पंजाबी कवयित्री तनदीप तमन्ना की कविताएं, यू के अवस्थित हिन्दी कवि-ग़ज़लकार प्राण शर्मा की ग़ज़लें, कैनेडा में अवस्थित पंजाबी कवि सुखिन्दर की कविताएं, कनाडा निवासी पंजाबी कवयित्री सुरजीत, अमेरिका अवस्थित डॉ सुधा धींगरा, कनाडा में अवस्थित हिंदी- पंजाबी कथाकार - कवयित्री मिन्नी ग्रेवाल की कविताएं, न्यूजीलैंड में रह रहे पंजाबी कवि बलविंदर चहल की कविता, कैनेडा में अवस्थित पंजाबी लेखिका बलबीर कौर संघेड़ा की कविताएं, इंग्लैंड से शैल अग्रवाल की पाँच कविताएं, सिंगापुर से श्रद्धा जैन की ग़ज़लें, इटली में रह रहे पंजाबी कवि विशाल की कविताएं और पंजाबी कथाकार-उपन्यासकार हरजीत अटवाल के उपन्यास “सवारी” के हिंदी अनुवाद की बाइसवीं किस्त आपने पढ़ीं। “गवाक्ष” के मार्च 2010 अंक में प्रस्तुत हैं - यू एस ए में रह रहीं हिन्दी कथाकार-कवयित्री इला प्रसाद की एक लघुकथा तथा पंजाबी कथाकार-उपन्यासकार हरजीत अटवाल के धारावाहिक पंजाबी उपन्यास “सवारी” की तेइसवीं किस्त का हिंदी अनुवाद…



यू.एस.ए. से
इला प्रसाद की लघुकथा

समुद्र : एक प्रेमकथा

उसने जीवन में कभी समुद्र नहीं देखा था। और देखा तो देखती ही चली गई। अपने छोटे-छोटे हाथ हिला-हिलाकर पास बुलाता समुद्र... किनारों से टकराता, सिर धुनता, अपनी बेबसी पर मानो पछाड़ खाता समुद्र और अंत में सब कुछ लील जाने को आतुर, पागल समुद्र !

उसे लगा, समुद्र तो उसकी सत्ता ही समाप्त कर देगा। वह घबराकर पीछे हट गई।
लेकिन, तब भी समुद्र के अपने आसपास ही कहीं होने का अहसास उसके मन में बना रहा। बरसों। उसे लगता, अब समुद्र कहीं बाहर न होकर उसके अंदर समा गया है और वह एक भंवर में चक्कर काट रही है... विवृति उसकी नियति नहीं है।

वह रह-रह कर चौंकती। समुद्र उसके आसपास ही है कहीं। वह लौट नहीं आई है और न समुद्र उससे दूर है।
फिर उसने पहचाना, समुद्र भयानक था लेकिन उसका उद्दाम आकर्षण अब भी उसे खींचता है। वह लौटने को बेचैन हो उठी।

उसने खुद को अर्घ्य-सा समर्पित करना चाहा।
लेकिन, ज्वार थम गया था। लौटती लहरें उसे भिगोकर किनारे पर ही छोड़ गईं। उसके पैर कीचड़ और बालू में सन गए।

समुद्र ने उसे कहीं नहीं पहुँचाया था। बस, मुक्त कर दिया था। मुक्ति का बोध उसे था लेकिन, उसने स्वीकारना नहीं चाहा। अब सचमुच समुद्र उसके अंदर भर गया था। वह चुपचाप, अकेले में लौटने को बेचैन, रोती-बिसूरती, अपने ही अंदर डूबती-उतराती, अपने पर पछाड़ खाती, किनारों से टकरा-टकराकर टूटती रही।

फिर एक दिन उसने सुना।
समुद्र में फिर तूफान आया था और किसी ने लहरों पर खुद को समर्पित कर अपनी नियति पा ली।

उसने महसूसा, उसके अंदर कुछ मर गया।
वह जानती थी, समुद्र में अब कभी तूफान नहीं आएगा...।
00
झारखंड की राजधानी राँची में जन्म। काशी हिन्दू विश्वविद्यालय से सी. एस. आई. आर. की रिसर्च फ़ेलॊशिप के अन्तर्गत भौतिकी(माइक्रोइलेक्ट्रानिक्स) में पी.एच. डी एवं आई आई टी मुम्बई में सी एस आई आर की ही शॊध वृत्ति पर कुछ वर्षों तक शोध कार्य । राष्ट्रीय एवं अन्तर-राष्ट्रीय शोध पत्रिकाओं में शोध पत्र प्रकाशित । भौतिकी विषय से जुड़ी राष्ट्रीय एवं अन्तरराष्ट्रीय कार्यशालाओं/ सम्मेलनों में भागीदारी एवं शोध पत्र का प्रकाशन/प्रस्तुतीकरण।
कुछ समय अमेरिका के कालेजों में अध्यापन।
कृतियाँ : "धूप का टुकड़ा " (कविता संग्रह) एवं "इस कहानी का अंत नहीं" ( कहानी- संग्रह) । एक कहानी संग्रह शीघ्र प्रकाश्य्।
सम्प्रति :स्वतंत्र लेखन ।
सम्पर्क : ILA PRASAD
12934, MEADOW RUN
HOUSTON, TX-77066
USA
ई मेल ;
ila_prasad1@yahoo.com

धारावाहिक पंजाबी उपन्यास(किस्त- 23)




सवारी
हरजीत अटवाल

हिंदी अनुवाद : सुभाष नीरव

॥ अट्ठाइस ॥

बलदेव काम पर जाने के लिए तैयार हो रहा होता तो उसका मन साथ न देता। शाम को जल्दी में वापस भागता। टफनल रोड पर पहुँचता तो फ्लैट में जाने को दिल न करता। काम पर अभी भी वह किसी स्थायी सीट पर नहीं बैठ सका था। हर रोज़ नये टेबुल पर जाना पड़ता। वह यूनियन में गया तो यूनियन वाले उसके पीछे ही पड़ गए कि इतनी लम्बी बीमारी की छुट्टी क्यों ली थी। छुट्टी न लेकर कोई हल्की ड्यूटी कर लेता तो भी रिकार्ड ठीक रह सकता था। उसका रैप कहता था कि करीब छह महीने लगातार बगैर छुट्टी के काम करे तभी यूनियन उसकी तरफ से कुछ करेगी।
फ्लैट में लौटते हुए पहले तरह-तरह की नज़रों में से होकर गुजरना पड़ता था। कई बार उसे झगड़ा बहुत करीब-सा प्रतीत होता। एक दिन एक आदमी उसे रोक कर खड़ा हो गया और कहने लगा-
''डेव, मुझे जानता है ?... मेरा नाम पैडी है, मैं ग्रांट का खास दोस्त हूँ।''
''पैडी, मैं तुझे नहीं जानता।''
''तू तो ग्रांट को भी नहीं जानता, पर उसके फ्लैट पर कब्ज़ा कर लिया।''
''पैडी, मैंने कोई कब्ज़ा नहीं किया, मैरी का ही है यह।''
''वो तो चली गई, तू ही रहता है।''
बलदेव को लगा कि बात गालियों तक पहुँचनी ही है, शायद हाथापाई तक भी। वह तैयार होता हुआ बोला-
''पैडी, यह कौंसल का फ्लैट है, मेरे लिए इसकी कोई अहमियत नहीं।''
''अगर नहीं, तो यहाँ से दफ़ा हो जा और चाबी मेरे हाथ में दे।''
''पैडी, इस वक्त तो तू ही यहाँ से दफ़ा हो जा... फिर न कहते घूमना कि लोग तेरी शक्ल पहचानना ही भूल गए। इतना मारूँगा कि सारी उम्र नहीं भूलेगा।'' बलदेव ने मुट्ठियाँ भींचते हुए कहा।
पैडी पैर मलता चला गया, पर बलदेव की नींद हराम हो गई। उसे डूडू की बातें पहले से भी ज्यादा परेशान करने लगीं। इमरजेंसी में वह गैरथ के फ्लैट में जा सकता था, पर वहाँ इतनी दुर्गन्ध आती थी कि आदमी बीमार हो जाए। दुर्गन्ध तो ग्रांट के फ्लैट में से भी आती थी, तम्बाकू की। इसकी मैरी ने भी सफाई की थी और वह भी करता था, पर अभी भी किसी न किसी कोने से तम्बाकू की चुटकी हाथ लग ही जाती। जब तक पूरी कारपेट नहीं बदली जाती, दीवारों में नया पेपर नहीं लगता, ऐसे ही रहना था। वह मैरी की प्रतीक्षा कर रहा था कि वह आए और जो करना है, करे।
एक दिन मैरी का फोन आ गया कि वह आ रही है। आज ही शाम की फ्लाइट लेने की कोशिश कर रही थी। डैरी से हीथ्रो के लिए हर घंटे जहाज चलते थे। घंटे भर का ही रास्ता था। आम तौर पर लोग एअरपोर्ट से ही टिकट खरीद लेते थे, पर रश होने के कारण कई बार टिकट न भी मिलती। खास तौर पर शाम की फ्लाइटें पहले ही बुक होतीं। टिकट मिलते ही मैरी ने बलदेव को फोन कर दिया। बलदेव दौड़ता हुआ एअरपोर्ट गया। उसके पहुँचते-पहुँचते मैरी की फ्लाइट को पहुँच जाना था। वह इसी हिसाब से घर से चला था।
मैरी को देखते ही उसका मन खुशी से भर उठा। वह बांहें फैलाकर मैरी की तरफ दौड़ा, पर मैरी ने कोई उत्साह नहीं दिखाया। फिर उसे एक ओर ले जाकर आलिंगनबद्ध करते हुए बोली-
''डेव, मेरे साथ ही इस फ्लाइट में बहुत सारे लोग आए हैं डैरी से, कोई भी परिचित हो सकता है।''
''तेरे हसबैंड का परिचित होगा ?''
''हो सकता है, या फिर हमारे परिवार का ही।''
''टैंड से मिलकर आई लगती हो।''
''हाँ मिली थी। मैं घर गई थी, रात में रही भी थी, पर टैंड तो अभी भी वैसा ही है, लूना बिच अभी भी उसके संग ही है।''
''मिच कैसा है ?''
''वह ठीक है, मुझे बहुत मिस करता है।''
फिर वह अपना अटैची घसीटते हुए बलदेव के साथ-साथ कार पॉर्क की ओर चल पड़ी। कार में बैठती हुई बताने लगी-
''डेव, तू भूल रहा है कि हम कैथोलिक हैं।''
''सॉरी !''
''हाँ, टैंड के साथ कई बैठकें हुईं, पादरी ने भी हमें एक करने की कोशिश की, हमारे परिवार वाले भी यही चाहते थे। टैंड कन्फेशन बॉक्स में जाकर लौट आया और मैंने कह दिया कि यह अन्त है।''
बलदेव कुछ न बोला। चुपचाप कार चलाता रहा। मैरी ने फ्लैट के बारे में कुछ बातें पूछीं और कहने लगी-
''यह फ्लैट अब मैंने अपने नाम करवाना है। सारे बिल अपने नाम करवाकर रैगुलर पे करती रहूँगी और साल भर बाद अप्लाई करूँगी कि अपने भाई के साथ ही रहती रही हूँ यहाँ। कइयों ने यही सलाह दी है।''
बलदेव को यह बात वह पहले भी बता चुकी थी। बलदेव को इस बात की भी खीझ-सी थी कि वह उसके जाने के बाद फ्लैट का किराया देता रहा था जो कि ज्यादा था। शौन के घर में वह थोड़े से किराये में ही रहे जा रहा था। मैरी आगे कहने लगी-
''यह बातें छोड़, कभी याद भी किया मुझे ?''
''मैरी, तुझे बहुत मिस किया। पहले अकेला रहने की आदत बन गई थी, अब तेरी आदत पड़ गई है। अच्छा हुआ तू वापस आ गई।''
मैरी खुश हो गई। फिर फ्यूनरल पर इकट्ठा हुए लोगों के बारे में बताने लगी। अगली सवेर बलदेव से उठा नहीं जा रहा था। दिल ही नहीं कर रहा था। मैरी के साथ से अभी उसका मन नहीं भरा था। वह उससे बातें भी पूरी नहीं कर सका था। उसने काम पर से छुट्टी कर ली। छुट्टी के लिए फोन करते हुए उसका मन भी कांप रहा था कि बिना कारण छुट्टी से उसका नुकसान होगा। वह सारा दिन मैरी के साथ पड़ा रहा। मैरी ने कुछ सिगरेट पीं। उसने कहा-
''मैरी, तू तो बहुत टेंशन में स्मोक करती है, क्या हुआ ?''
''डेव, फ्यूनरल की भाग-दौड़ ने आदत-सी बना दी, मैं कंट्रोल कर लूँगी।''
बलदेव का हाईब्री की तरफ का भी चक्कर लग जाता, पर वह दुकान में नहीं जाता थ। उस रात उसे गुरां के बारे में बुरा-सा सपना आया तो उसका मन हुआ कि एक नज़र देख ही आए। वे उधर से गुजर रहे थे। मैरी जानती थी कि यह बलदेव के भाई की दुकान है। बलदेव ने कार को पिछली रोड पर खड़ा किया। मैरी कार में ही बैठी रही और बलदेव दुकान में आ गया। काउंटर पर खड़े शिन्दे ने कहा-
''बड़ी उम्र है भई तेरी, अभी भाजी ऊपर गया है, तेरी ही बातें कर रहा था।''
''मेरी तुमने चुगलियाँ ही करनी हैं, और क्या करना है।''
''भाजी कह रहा था, तू गोरी के साथ रहता है, सच ?''
बलदेव हँसने लगा। शिन्दे ने कहा-
''हँस रहा है, ज़रूर दाल में काला है...इतने दिनों बाद कैसे ?''
''मैं तुझे घुमाने ले जाने के लिए आया हूँ। मैंने सोचा जंग न लग जाए।''
''फिर से पानी दिखाना है ?''
''ओ यार...कहीं बैठेंगे, दारू का घूंट भरेंगे, पर तू तो बिज़ी लगता है।''
''भाजी से पूछ ले, ऊपर ही है, जा, मिल आ।''
बलदेव ऊपर की ओर चल दिया। स्टॉक रूम के बड़े शीशे के सामने खड़े होकर ऐनक ठीक की। बाल संवारे। सीढ़ियाँ चढ़ गया। सीढ़ियाँ चढ़ते सामने रसोई में गुरां खड़ी थीं। वह न मुस्कराई और न कुछ बोली। बलदेव को पता था कि उसका यह गुस्सा दिखाने का अंदाज है। उस दिन शिन्दे को छोड़ने के बाद वह नहीं आया था। उसने गुरां के पास जाकर पूछा-
''तू ठीक भी है ?''
''तुझे क्या ?''
तभी, फ्रंट रूम से अजमेर भी निकल आया। उसने पूछा-
''अब तो नज़दीक ही रहता है, अब न आने का क्या बहाना है?''
''काम पर ही होता हूँ।''
''वीक एंड ?''
''नहाना-धोना।''
गुरां जो चुप थी, कहने लगी-
''धोने वाले कपड़े यहाँ दे जाया कर।''
बलदेव ने इस बात का कोई उत्तर न दिया और अजमेर से पूछने लगा-
''काम काज कैसा है ?''
''काम ठीक ठाक ही है।''
कहता हुआ वह सीढ़ियाँ उतर गया। बलदेव वहीं खड़ा रहा। उसकी आवाज़ सुनकर शैरन भी अपने कमरे में से निकल आई और उसने उससे 'हैलो' की। बलदेव ने गुरां को धीमे से कहा-
''मैं जल्दी में हूँ, सिर्फ़ तुझे ही देखने आया हूँ।''
''झूठा... इतने करीब रह कर भी।''
उसका दिल भर आया। बलदेव ने पूछा-
''सब ठीक है ? मुझे सपने ठीक नहीं आते।''
''मैं ठीक हूँ, मुझे कुछ नहीं हुआ। तेरे सपनों की जड़ें कहीं ओर होंगी।''
बलदेव घड़ी देखता हुआ बोला-
''गुरां, मुझे कहीं जाना है, लौटकर आता हूँ, आज या कल।''
वह चलने लगा तो शैरन बोल उठी-
''बाय-बाय चाचा जी, सी यू अगेन।''
वह शैरन को हाथ हिलाता हुआ नीचे उतर गया। उसके नीचे पहुँचते ही शिन्दा जैकेट उठाये खड़ा था। अजमेर ने पूछा-
''कहाँ ले जाना चाहता है इसे ?''
''कहीं खास नहीं, मैंने सोचा, चक्कर-सा लगवा दूँ, कहीं बैठकर बीयर-सोडा पिला दूँ।''
''बीयर तो यहाँ पॉल के पी आते हैं।''
''यहाँ तो पीते ही हैं, उधर वैस्ट एंड का चक्कर लगा आते हैं। मेरे काम पर पार्टी-सी है। मैंने सोचा, इसे भी ले चलूँ।''
बलदेव ने बहाना घड़ दिया। अजमेर ने कहा-
''एक बात का ध्यान रखना, इसे अपनी राहों पर न लगा लेना, तू तो बच्चों को छोड़े बैठा है, पर इसका सब कुछ है अभी... तेरे वाले उलटे कामों में पड़ गया तो गया, न ये घर का रहेगा, न घाट का।''
उसकी यह बात बलदेव को सीने में बजी। वह चुपचाप चल दिया। शिन्दा उसके पीछे ही था। उसने शिन्दे से कहा-
''तूने अच्छी तरह पूछ लिया। उस दिन कह रहा था कि क्यों लेकर गया।''
''तू चला चल, यह मुझे हर वक्त नाईयों की बछिया की तरह तो बांधे रखता है दुकान में। और फिर बड़े भाई की बात ऐसी ही होती है, ज्यादा बोदर नहीं किया करते। देख, मैं कभी गुस्सा नहीं करता।''
''पर देख ले, बात कहते समय मिनट नहीं लगाता। एकबार भी नहीं सोचता कि किसी के कहाँ मार करेगी।''
''बलदेव, यह गोरी वाली बात सच है ?''
बलदेव कुछ न बोला और चलता रहा। आगे जा कर कार के पिछले दरवाजे की ओर इशारा किया। कार में बैठी मैरी को देखकर शिन्दे की आँखें चमक उठीं और शरारती लहजे में सिर मारते हुए बोला-
''मैं जाऊ ?... वापस लौट जाऊँ ?''
''आ जा अब, अगर कबाब में हड्डी बनना ही है तो... इससे मिलाने ही तो तुझे लाया हूँ।''
''पर यह है कौन ?''
''भरजाई समझ इस वक्त तो।'' बलदेव के मन में मैरी को शिन्दे से मिलवाने का विचार अचानक ही आया था।
''फिर तू देवर-भरजाई के बीच में न बोलना।''
''नहीं बोलता, तू जो छीनना चाहता है, छीन ले।''
''मेरी इंट्रोडक्शन करा दे ज़रा।''
कार में बैठते ही शिन्दे ने मैरी से हैलो कहा। बलदेव ने दोनों का परिचय करा दिया। उसने शिन्दे को शैनी बना दिया ताकि मैरी को बोलने में आसानी हो। बलदेव ने कार में पड़ी शिन्दे वाली सिगरेटों की डिब्बी उसे थमा दी। शिन्दे ने ना करते हुए वापस कर दी। बलदेव ने कहा-
''मैरी, शैनी तेरे सामने सिगरेट पीने से झिझक रहा है।''
''इसमें झिझक कैसी ?'' कहकर मैरी ने एक सिगरेट खुद सुलगा ली और एक शिन्दे के मुँह से लगा दी और लाइटर से जलाते हुए बोली-
''वैसे मेरा ब्रांड सिलेक्ट है।''
उसका शुक्रिया करते हुए शिन्दा बोला-
''मेरी आदत तो नहीं, पर कभी-कभी हॉबी के तौर पर स्मोक करता हूँ।''
उसे अंग्रेजी में बोलते देख बलदेव हैरान हो गया और बोला-
''तू तो छा गया, बड़ी जल्दी अंग्रेजी पिक कर ली।''
''टोनी के साथ हर समय लगा जो रहता हूँ। ग्राहकों के साथ भी वास्ता पड़ता है। और तू अपने आप को क्या समझता है ! मौका मिलने पर मेरे और भी हाथ देखना।''
बात करते हुए शिन्दे सीट पर से थोड़ा ऊपर उठ रहा था।
बलदेव ने उसका जवाब देने के बजाय मैरी से पूछा-
''अगर शैनी अपने साथ थोड़ी देर बैठ ले तो तुझे कोई एतराज़ तो नहीं ?''
''नहीं-नहीं डेव, मैं तो बल्कि ज्यादा इन्जाय करूँगी।''
तब तक वे फ्लैट में पहुँच गए। बलदेव ने तीन बड़े पैग बनाकर बांट दिए। जब दूसरा पैग बनाया तो बलदेव बोला-
''मैरी, शैनी ने बहुत देर से नंगी औरत नहीं देखी।''
''दिखा दे, कहीं स्ट्रिपटीज़ पर ले जाकर। तुम मर्दों का यही तो शौक है।''
''मैं कभी नहीं गया। और फिर वे औरतें ठीक नहीं होतीं।''
''तुमने तो जिस्म ही देखना है। या यूँ कह कि भाई के लिए पैसे खर्च करने से डरता है।''
''यह भी ठीक है, पैसे मेरे पास है ही कहाँ।''
''सीधा कह कि कंजूस हूँ... इंडियन तो होते ही पैसे वाले हैं।''
''सभी इंडियन नहीं होते, कई मेरे जैसे पैनीलैस भी हैं।''
कहते हुए बलदेव और पैग बनाने लगा। शिन्दा बोला-
''कहीं जाना है ?''
''नहीं, जाना कहाँ है ?''
''फिर जल्दी क्यों मचा रहा है ?''
''मैंने सोचा, ज़रा किक लगे, सरूर आए।''
वह फिर मैरी को बताने लगा-
''ये जल्दबाजी के पैग मैंने एक्सीलेटर देने के लिए डाले हैं।''
''डेव, मुझे तो कुछ ज्यादा ही एक्सीलेटर दे दिया।''
मैरी नशे में हुई पड़ी थी। बलदेव बोला-
''मैरी, नशे में तू बहुत प्यारी लगने लगती है।''
''सच !''
''हाँ मैरी, तेरा जिस्म और ज्यादा कस जाता है और बहुत खूबसूरत लगने लगता है।''
''थैंक्यू डेव।''
''इसमें थैंक्यू वाली बात नहीं है, मैं तुझे कोई कम्पीलेंट नहीं दे रहा।''
मस्ती में आई मैरी उठकर उसे चूमने लग पड़ी। बलदेव खड़ा हो गया, उसने मैरी को भी खड़ा किया और शिन्दे से कहने लगा-
''शैनी, मैरी दिल की बहुत सुन्दर है, इसकी ठोड़ी बहुत सुन्दर है, इसका एक-एक अंग, इसकी छातियाँ तो जैसे पत्थर की हों, तू देखेगा तो सोचेगा कि नकली हैं या फिर कुछ करा रखा हो।''
मैरी गर्व में भरी खड़ी थी। वह हँसे भी जा रही थी। बलदेव उसकी छातियों पर हाथ फेरने लगा। बलदेव ने उसका टॉप उतार दिया और फिर ब्रा भी। मैरी उसी तरह खड़ी हँसती रही। बीच-बीच में कहती रही, ''डेव, यू आर बास्टर्ड !''
बलदेव उसकी छातियों को तोलता हुआ शिन्दे से बोला-
''शैनी, ये मेरी किस्मत में हैं, तू सिर्फ एक बार छू सकता है।''
मैरी अभी भी हँसी जा रही थी। शिन्दा कहने लगा-
''कोई शर्म कर, देख लेगा कोई।''
कहते हुए उसने मुँह दूसरी तरफ घुमा लिया। मैरी ने बलदेव को आलिंगन में ले लिया और अपना चेहरा उसकी गर्दन में छिपा लिया।
वे देर तक बैठे हँसी-मजाक करते रहे। शिन्दा कहने लगा-
''तू तो निकल चला, तभी किसी के हाथ में नहीं आ रहा।''
शिन्दे को घर जाने के लिए उन्होंने टैक्सी बुला दी। बलदेव कार चलाने योग्य नहीं रहा था। टैक्सी में चढ़ाने के लिए वे नीचे आए। स्टेशन पर टैक्सी वालों का दफ्तर था। जल्दी में भारी कपड़ा दोनों ने ही नहीं उठाया था। ठंड बहुत थी। वापस लौटते समय पैडी मिल गया। यही पैडी आज बलदेव को बहुत प्यार से मिला। वैसे भी बलदेव ने नोट किया था कि मैरी के आने के बाद लोगों का व्यवहार कुछ ठीक हो गया था।
बलदेव को मैरी की एक बात कुछ-कुछ चुभती आ रही थी कि वह टैंड और मिच्च की बहुत बातें करने लगी थी। एक दिन उसने कहा-
''डेव, अगर मिच मेरे पास आया तो हमें कुछ ध्यान से रहना पड़ेगा। दस साल का हो गया है। सब समझता है। लूना के बारे में सारी खबर मुझे वही देता है।''
बलदेव सोचने लगा कि हालात बदलने के आसार दिख रहे थे। एक दिन शराबी हुई मैरी बताने लगी-
''मैं टैंड को खुली ऑफर दे आई हूँ। यहाँ लंदन में आ जाए तो ठीक है।''
बलदेव अपने बारे में सोचने लगा कि अचानक सब कुछ बदल गया तो उसका क्या होगा। जब वह सिमरन से अलग हुआ तो रात के बारह बजे घर से निकल पड़ा था। रात को कार एक पॉर्क में खड़ी की थी और वहीं सो गया था। पर अब सर्दियाँ थीं और कार में रात नहीं काटी जा सकती थी। गैरथ भी ज्यादा शराब पीकर सो जाए तो दरवाजा नहीं खोला करता।
एक दिन वह काम से लौटा तो मैरी का चेहरा उतरा-उतरा-सा था।
बलदेव ने पूछा तो बोली-
''शाम की फ्लाइट में टैंड आ रहा है।''
(जारी…)
00

लेखक संपर्क :
67, हिल साइड रोड,साउथाल,
साउथाल, मिडिलसेक्स
इंग्लैंड
दूरभाष : 020-८५७८०३९३
07782-265726(मोबाइल)

शुक्रवार, 26 फ़रवरी 2010

गवाक्ष – फरवरी 2010


“गवाक्ष” ब्लॉग के माध्यम से हम हिन्दी ब्लॉग-प्रेमियों को हिन्दी/पंजाबी के उन प्रवासी लेखकों/कवियों की समकालीन रचनाओं से रू-ब-रू करवाने का प्रयास करते आ रहे हैं जो अपने वतन हिन्दुस्तान से कोसों दूर बैठकर अपने समय और समाज के यथार्थ को अपनी रचनाओं में रेखांकित कर रहे हैं। “गवाक्ष” में अब तक पंजाबी कवि विशाल (इटली) की कविताओं का हिन्दी अनुवाद, दिव्या माथुर (लंदन) की कहानी, अनिल जनविजय (मास्को) की कविताएं, न्यू जर्सी, यू.एस.ए. में रह रहीं देवी नागरानी की ग़ज़लें, लंदन निवासी कथाकार-कवि तेजेन्द्र शर्मा, रचना श्रीवास्तव, दिव्या माथुर की कविताएं, दुबई निवासी पूर्णिमा वर्मन की कविताएं, यू एस ए में रह रहीं हिन्दी कथाकार-कवयित्री इला प्रसाद, डेनमार्क निवासी कवि भगत धवन की कविताएँ और चाँद शुक्ला की ग़ज़लें, यू एस ए निवासी कवि वेद प्रकाश ‘वटुक’ तथा कवयित्री रेखा मैत्र की कविताएं, कनाडा अवस्थित पंजाबी कवयित्री तनदीप तमन्ना की कविताएं, यू के अवस्थित हिन्दी कवि-ग़ज़लकार प्राण शर्मा की ग़ज़लें, कैनेडा में अवस्थित पंजाबी कवि सुखिन्दर की कविताएं, कनाडा निवासी पंजाबी कवयित्री सुरजीत, अमेरिका अवस्थित डॉ सुधा धींगरा, कनाडा में अवस्थित हिंदी- पंजाबी कथाकार - कवयित्री मिन्नी ग्रेवाल की कविताएं, न्यूजीलैंड में रह रहे पंजाबी कवि बलविंदर चहल की कविता, कैनेडा में अवस्थित पंजाबी लेखिका बलबीर कौर संघेड़ा की कविताएं, इंग्लैंड से शैल अग्रवाल की पाँच कविताएं, सिंगापुर से श्रद्धा जैन की ग़ज़लें और पंजाबी कथाकार-उपन्यासकार हरजीत अटवाल के उपन्यास “सवारी” के हिंदी अनुवाद की इकीसवीं किस्त आपने पढ़ीं। “गवाक्ष” के फरवरी 2010 अंक में प्रस्तुत हैं – इटली में रह रहे पंजाबी कवि विशाल की नई कविताओं का हिन्दी अनुवाद तथा पंजाबी कथाकार-उपन्यासकार हरजीत अटवाल के धारावाहिक पंजाबी उपन्यास “सवारी” की बाईसवीं किस्त का हिंदी अनुवाद…
होली 2010 की शुभकामनाएं !

इटली से
विशाल की तीन पंजाबी कविताएँ
हिंदी रूपांतर : सुभाष नीरव
कविताओं के संग चित्र : रुचिरा

एक रिश्ता

अगर उन्होंने लौटना होता
तो इस तरह न जाते
जा कर सुख-सन्देशा भेजते
लौट आने का कोई बहाना घड़ते
ज़रूर भीतर की बात कुछ और होगी
नहीं तो किसके अन्दर
घरों का मोह नहीं जागता।

जाते समय, न आँख उठाकर देखा
न चेहरे पर कोई शिकन आभा
और न ही जाने की कोई उतावली
मोड़ मुड़ते हुए मुड़कर नहीं देखा
नहीं तो एक रिश्ता तो होता ही है
अन्दर-बाहर चलता हिलोरा देता
जीने की चाहत भरता, आलिंगन बनता
पर वे तो सब कुछ तोड़ कर
संयम-सलीकों से भरे
रिश्तों से किनारा कर चलते बनें
तनिक भी ज़ाहिर नहीं किया
हलचल नहीं कोई
नहीं तो, किसी एक को तो
निहारता ही है आदमी
यह किस तरह का जाना था उनका...

वैसे जाने से पहले
उनकी कई बातों की चर्चा भी थी
तितलियों के परों जैसे शोख रंग
उनकी आँखों में दिखाई देते
गरम हो जातीं महफ़िलें उनके साथ
बेपरवाह बनजारे, अस्थिर से
जिधर से भी गुजरते, हवाएँ नाच उठतीं।

पर पता नहीं अचानक क्या हो गया
सब कुछ फिसल सा गया
छिपा गए वे सारी बातें
गहरी-सी चुप
गहरी-सी रात का पहरा हो गया
धरे-धराये रह गए सारे चाव
वे अचानक चले गए।

क्या मालूम
ऐसा अधिक मोह के कारण ही हुआ हो
नहीं तो किसके अन्दर
घरों के लिए मोह नहीं जागता
लौट आने का
कोई बहाना तो होता ही है

क्या पता, क्या हो अन्दर की बात ?
0

रहस्य

मैं तो बहुत पहले आ गया था
तेरा सपना
अपनी आँखों में धर कर लाया था
तुझसे ही पहचाना नहीं गया
न मैं और न ही तेरा अपना सपना।

तू पूछ बैठी-
कौन हो ऋषि ?
मैंने अपनी आँखें तेरी हथेलियों पर रख दीं
कि तू अपना सपना चुन ले
पर तू खोल कर बैठ गई
अपने फलसफों की अधूरी यात्रा
अपनी डायरी के उखड़े हुए पन्नों को तरतीब देती
'कौन तू', 'कौन मैं' के शोर में उलझी
न हुंकारा भरा
न ही शोर खत्म हुआ

पहचान के मेलों में एक बार फिर गुम हो गए
वो तेरे मेरे दरम्यान कैसी घड़ी थी
और मिले या और बिछुड़ गए
ये रहस्य और गहरे हो गए।
0
तेरा अपूर्ण

कई जन्मों से
तेरा नाम जप रहा हूँ
पर हर बार तू अजप हो गई
मेरी महायात्रा
मैं फिर आया हूँ
तू एक श्राप और दे दे
मेरी कोई भी सतर पूरी न हो
मेरी यात्रा टूट जाए अधबीच में
मेरा कभी भी सृजन न हो
कुछ गूंध ही इस तरह मेरे मिट्टी को
कि कोई मूरत न बने
कोई बहाना घड़
अपने हाथों से गिराने का
मैं आधा-अधूरा
कभी भी न होऊँ पूरा
मैं अधूरा, तेरा अपूर्ण
तुझ अजप को जपता
तिड़क जाए मेरी यात्रा।
0
पंजाबी के बहु चर्चित कवि। कविता की अनेक पुस्तकें प्रकाशित। पिछ्ले कई वर्षों से इटली मे।

सम्पर्क :
PZA, MATTEOTTI-34
46020-PEGOGNAGA(MN)
ITALY
मोबाइल नं0 : 0039-3495172262, 0039-3280516081
ई मेल : vishal_beas@yahoo.com