मंगलवार, 17 अगस्त 2010

धारावाहिक पंजाबी उपन्यास(किस्त- 28)



सवारी
हरजीत अटवाल
हिंदी अनुवाद : सुभाष नीरव

॥ तैंतीस ॥

सतनाम ने घर के आगे लाकर वैन खड़ी कर दी और आहिस्ता से उतरा। आहिस्ता से ही दरवाजा खोला। दरवाजे का खटका सुनते ही परमजोत और सरबजोत दौड़े आए। उसने उन्हें नित्य की तरह 'हैलो छांगू एंड मांगू' नहीं कहा और जल्दी से सैटी पर बैठ गया। परमजोत बोली-
''डैड, यू आलराइट ?''
''हाँ हाँ, ठीक हूँ। जाओ, बोतल लाओ। गिलास और पानी लाओ।''
उसने सरबजोत का कंधा थपथपाते हुए कहा। सरबजोत बोला-
''मैं बोतल लाऊँ कि पानी ?''
''जो मर्जी ले आ, पर हरी अप।''
रसोई में से मनजीत ने उसकी ओर देखा और पास आकर बोली-
''ज्यादा पी ली ?''
''नहीं सितारा बाई। आज तो वैसे ही हो गया, पता नहीं उम्र हो गई।''
''क्या हो गया ?''
''बहुत ही थकावट हो गई। शरीर गर्म-सा लगता है। सवेरे डिलीवरी आनी है।''
''फिर शराब न पियो, गोली खा लो और आराम करो।''
''अगर आराम आया तो शराब से आएगा, गोली से कभी आता है ?''
''तुम्हें दौड़भाग जो बहुत रहती है, आदमी कोई ढंग का तुम रखते नहीं।''
''आदमी मिलते ही कहाँ है, साले लौरल हार्डी जैसे ही घूमते फिरते हैं।''
''कोई अच्छा-सा बुच्चर देख लो और थोड़ी रैस्ट किया करो।''
''आज तो कुछ ज्यादा ही मीना कुमारी बनी फिरती हो... बुच्चर तो है एक आर्थर, पैसे बहुत मांगता है। इतने अफोर्ड नहीं होते।''
''तुम तो कहते थे कि इललीगल से बहुत मिल जाते हैं।''
''वो यहाँ नहीं, साउथाल में लगता है मेला, लुधियाने वाले लेबर चौक की तरह।''
एक पैग पीकर उसका मूड ठीक होने लगा और थकावट भी कम हो गई। बच्चे उसका मूड देखकर करीब आ बैठे।
परमजोत बोली-
''डैड, स्क्रैच माय बैक।''
''हाउ टू से ?''
''प्लीज डैड।''
''दैट्स बैटर।'' कहता हुआ वह उसकी पीठ पर खाज करने लगा। कुछ देर बाद परमजोत ने कहा-
''दैट्स इट।''
''वट ?''
''थैंक्यू डैडी।''
''दैट्स बैटर।''
वह बच्चों को 'प्लीज़' और 'थैंक्स' सिखाने के चक्कर में ही रहता है। परमजोत उठकर गई तो सरबजोत पीठ पर खाज करवाने आ बैठा। मनजीत बोली-
''तुम्हें तो कभी थकावट हुई नहीं, आज क्या हो गया ?''
''शायद मैंटली टायर्ड हो गया।''
''ऐसा क्या हो गया ?''
''आज प्रेम चोपड़ा ने मेरा बहुत सिर खाया, प्रैशर भी डाला, इसी कारण। जो वहाँ पेट्रो के साथ दो पैग लगाए उनका तो मेरे पर कोई असर हुआ ही नहीं था। यह काम करने लगी है।'' वह हाथ में पकड़े पैग की तरफ इशारा करते हुए बोला और फिर कहा-
''प्रेम चोपड़ा एक पब ले रहा था। किसी गोरे के साथ मिलकर। गोरा पॉल पार्टनर उसे सूट नहीं करता और अब वह मुझे अपने संग मिलाना चाहता है।''
''मिल जाओ।''
''मैं तो गोरे पॉल से दूसरे स्थान पर हो गया न, उसकी पहली च्वाइस पॉल था। पॉल के पास पैसे न होने के कारण अब मुझे कहता है कि आ जाऊँ।''
''तो क्या हुआ। आखिर उन्होंने तुम्हें अपने संग शेयर करने के लिए कहा है। पहले कह दिया या बाद में।''
''जानी, अपना भी कोई स्टैंडर्ड है।''
मनजीत को उसकी बात अधिक समझ में नहीं आई। उसकी दिलचस्पी भी नहीं थी। रोटी खाता सतनाम फिर कहने लगा-
''मैंने प्रेम चोपड़ा को कहा- भाई, तू अकेला ही ले ले, कौन सी ऐसी बात है। पता क्या कहता ?''
''क्या ?''
''कहता है कि मैं डरता हूँ, कहीं घाटा न पड़ जाए। मैंने दिल में सोचा कि रहा न - वही का वही। मुझे यह पार्टनर घाटे के सौदे का ही बनाना चाहता है। अगर इसे मालूम हो कि प्रोफिट होगा तो मुझे पार्टनर क्यों बनाए।''
''तुमने तोड़कर जवाब तो नहीं दे दिया ? आखिर भाई है।''
''नहीं, तोड़ कर देना ही पड़ेगा। वह तो कहे जाता था कि मैंने तुझे कभी कुछ करने को नहीं कहा, मेरे कहने पर इस पब में हिस्सा डाल।''
''तुम सोच लो। अगर ठीक लगता है तो डाल लो।''
''ठीक तो लगता है, मैं पब भी देख आया हूँ पर यह बिजनेस मेरे लिए बिलकुल नया है। और फिर इधर से ही फुर्सत नहीं मिलती। असल में असरानी जैसे के आ जाने से वो हो गया खाली-सा, अब ऐसी बातें सोचता रहता है। एक तरफ तो कहे जाता है कि शिन्दा किसी काम का नहीं, और दूसरी तरफ सारा दिन उसे रगड़े जाता है।''
''अगर शिन्दा भाजी उसके काम का नहीं तो तुम ले आओ।''
उस वक्त सतनाम कुछ न बोला पर सवेरे उठते ही कहने लगा-
''मेरी श्रीदेवी, बात तो तेरी बहुत बढ़िया है। रातोंरात मैंने सोच लिया कि क्या करना है। प्रेम चोपड़ा शिन्दे को पचास में रगड़ना चाहता है, क्यों न मैं सौ का ऑफर करूँ, उसे वही सुविधाएँ देकर।''
''देखो, मैंने घर में नहीं रखना किसी को।''
''क्यों ? मेरा भाई है।''
''ठीक है, भाई है, पर मेरे से गैर आदमी घर में नहीं रखा जाता। हमने घर में सौ बार लड़ना-झगड़ना, मर्जी से उठना-बैठना होता है। किसी दूसरे के होने पर आदमी बंध जाता है।''
''बन गई न मिनट भर में ही हीरोइन से वैम्प। अगर भाई ही भाई के घर में नहीं रहेगा तो कहाँ रहेगा।''
''रहेगा वो भाजी के घर में ही।''
''इसका मतलब, जट्टी तेरे से लाख दर्जे अच्छी है।''
''मुझे अच्छा बनने की ज़रूरत नहीं। मुझे अपना घर भी लुक-आफ्टर करना है। वह तो सारा दिन घर में ही रहती है और मुझे जॉब भी करनी होती है।''
''तू मेरी बनी-बनाई खेल खत्म करेगी। मैं साला मुफ्त में ही तुझे नंबर वन बनाए बैठा हूँ। शिन्दा आएगा और यहीं रहेगा, तू लिख ले कहीं।''
मनजीत कुछ न बोली। सतनाम कहने लगा-
''साला, एक प्रॉब्लम का हल खोजें तो दूसरी आ खड़ी होती है।''
फिर सतनाम सोचने लगा कि यह तो बाद की प्रॉब्लम है। पहले अजमेर को बातों में घेर कर शिन्दे को हथियाया जाये ताकि काम का बोझ कम हो।
सुबह दुकान में गया। दुकान शुरू करवा कर वह अजमेर की तरफ निकल गया। उसने बाहर से ही देखा कि दुकान में शिन्दा और टोनी खड़े थे। टोनी को जल्दी बुलाने का अर्थ था कि अजमेर कहीं गया हुआ होगा। फिर उसने घूमकर वैन देखी। वैन भी नहीं थी। वह दुविधा में ही था कि रुके या नहीं कि शिन्दे ने उसकी वैन देख ली और अन्दर आ जाने के लिए हाथ हिलाने लगा। उसके पहुँचने पर शिन्दा बोला-
''तू तो भाई मिलने से ही गया, उधर बलदेव कहीं छिप गया और इधर तू भी।''
''संडे को मैं आया करता हूँ, पर तू आसपास देखता ही नहीं।''
''क्या बताऊँ भाई, मेरा तो बुरा हाल है। बस, चलो ही चल है। ऊपर से भाई भी डांट मारने में मिनट नहीं लगाता। गिरेगा खोते(गधे) पर से और गुस्सा मेरे पर।''
''चल, अच्छा है। जट्टी का बचाव हो जाता होगा, नहीं तो हर वक्त उसकी ही जान के पीछे लगा रहता था।''
''भाई, वो भी कम नहीं, बस चुप ही भली है। तू बता, आज किधर ?''
''प्रेम चोपड़ा कहाँ है ?''
''बैंक गए हैं दोनों, क्या काम है ?''
''मैं तुझे मांगने आया हूँ।''
''फिर से ?''
''हाँ, फिर से, साला मुकरी न हो तो। तुझे एक बार मुश्किल से मांगा था। मैं तो कहता हूँ, अगर उसे तेरी ज़रूरत नहीं तो मेरे संग आ जा।''
''ले जा यार, मुझे इस नरक से भाई बनकर ले जा। वहाँ किसी से ओए नहीं कहवाई थी और यहाँ ओए के बग़ैर और कुछ कोई कहता ही नहीं।''
''वो तो कहता है कि तू निकम्मा है।''
''वो बड़ा भाई है, जो मर्जी कहे।''
''यह पचास देता है, मैं सो दूँगा।''
सौ सुनकर शिन्दे का चेहरा खिल उठा। बोला-
''तुम दोनों भाई आपस में सलाह कर लो, मेरा क्या है, बैल ने तो पट्ठे ही खाने हैं।''
तब तक अजमेर की वैन दुकान के सामने आ रुकी। गुरिंदर बाहर निकली और अजमेर गाड़ी खड़ी करने चला गया। सतनाम ने पूछा-
''जट्टिए, प्रेम चोपड़ा ने वापस आना है कि कहीं और चला गया ?''
''मेरा प्रेम चोपड़ा और तेरी परवीन बॉबी।''
''वो अब श्रीदेवी हो गई है, ज़रा-सी तरक्की कर गई।''
''तू आज दिन में कहाँ घूमता फिरता है ?''
''उसके साथ बात करने आया हूँ कोई। तुम किधर से आ रहे हो ?''
''बैंक जाना था इन्होंने, मुझे ज़रा घर की शॉपिंग करनी थी।''
अजमेर हाथ में दो बैग थामे आ गया। बैग गुरिंदर को पकड़ाते हुए सतनाम से बोला-
''कैसे, सलाह बदली फिर ?''
''किसकी ?''
''पब वाली।''
''नहीं भाई, मैंने सोचा, यह सब ठीक है, प्रोपर्टी मंहगी नहीं मिल रही पर इस वक्त रेट ऑफ इंटरेस्ट भी बहुत है, फिर प्राइज़िज का भी कुछ पता नहीं, अगर गिर पड़ीं तो ?... तुम्हारी दुकान तो बोझ उठा लेगी पर मेरी ने फालतू बोझ नहीं उठाना।''
अजमरे कुछ नहीं बोला और घड़ी देखने लगा। गुरिंदर बोली-
''टैम न देखो, ऊपर आ जाओ, चाय पियो, पब नहीं जाना अब।''
अजमेर ने गुरिंदर की बात का उत्तर नहीं दिया। कुछ देर की चुप के बाद कहने लगा-
''अगर तू साथ खड़ा हो जाता तो मैं भी रिस्क ले सकता था। न भी खोलते, बिल्डिंग ऐसे ही पड़ी रहती।''
''हाँ, पर किस्त तो देनी ही पड़ती।''
''किस्त तो देनी ही है। पर प्रापर्टी का मालिक भी तो बनेगा तू।''
''यही मैं कहता हूँ कि दुकान किस्त का बोझ नहीं उठा सकती। तुम्हारी दुकान फ्रीहोल्ड है, मुझे किराया भी देना पड़ता है और दुकानों की हालत यह है कि जितने ओवर हैड्ज़ कम हों, उतना ही ठीक है।''
गुरिंदर ऊपर चली गई और वे दोनों फिर पब में जा बैठे। पॉल राइडर उनसे उतने उत्साह से नहीं मिला। अजमेर सतनाम से पूछने लगा-
''शिन्दा कहता था कुछ ?''
''नहीं तो, क्यों ?''
''वैसे ही, ये टोनी से खीझता रहता है। टोनी ने तो एक दिन कह दिया था कि तुझे ये पचास भी मेरी तनख्वाह में से कट कर मिलते हैं।''
बात सुनकर सतनाम खुश हो गया। गाड़ी खुद-ब-खुद पटरी पर आ गई थी। सतनाम बोला-
''भाई, वैसे काम में वह अब कैसा है ?''
''निकम्मा !... मुझे तो इसकी ज़रूरत भी नहीं। टोनी पेपरों में काम करता है, उसे कैसे हटा दूँ ? मैं हूँ, गुरिंदर भी है, दुकान भला कितने बन्दे संभालेगी। इसलिए मैं तो पचास पाउंड ही दे सकता हूँ। वो भी तो इसके बचते ही हैं। सारा खर्चा मैंने उठा रखा है।''
''भाई, अगर शिन्दे की तुम्हें ज़रूरत नहीं तो मैं रख लूँ ?''
बात सुन कर अजमेर की हालत पतली हो गई। सतनाम ने फिर कहा-
''मुझे है आदमी की ज़रूरत।''
''तेरा काम तो चल ही रहा है। और फिर यह तेरे काम का नहीं। तेरा काम है हैवी, इससे नहीं होगा। भारी काम करने लायक यह है नहीं।''
''देखा जाएगा, मगील से तो बुरा नहीं यह।''
''वैसे, दुकानों में बन्दे कभी फालतू भी नहीं होते।''
अजमेर ने शिन्दे को देने से आनाकानी-सी करते हुए कहा। सतनाम बोला-
''मैं इसे पाउंड भी सौ देता रहूँगा।''
''यह सौ के लायक नहीं, सौ देकर इसकी आदत न बिगाड़।''
(जारी…)
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रविवार, 11 जुलाई 2010

गवाक्ष – जुलाई 2010


“गवाक्ष” ब्लॉग के माध्यम से हम हिन्दी ब्लॉग-प्रेमियों को हिन्दी/पंजाबी के उन प्रवासी लेखकों/कवियों की समकालीन रचनाओं से रू-ब-रू करवाने का प्रयास करते आ रहे हैं जो अपने वतन हिन्दुस्तान से कोसों दूर बैठकर अपने समय और समाज के यथार्थ को अपनी रचनाओं में रेखांकित कर रहे हैं। “गवाक्ष” में अब तक पंजाबी कवि विशाल (इटली) की कविताओं का हिन्दी अनुवाद, दिव्या माथुर (लंदन) की कहानी, अनिल जनविजय (मास्को) की कविताएं, न्यू जर्सी, यू.एस.ए. में रह रहीं देवी नागरानी की ग़ज़लें, लंदन निवासी कथाकार-कवि तेजेन्द्र शर्मा, रचना श्रीवास्तव, दिव्या माथुर की कविताएं, दुबई निवासी पूर्णिमा वर्मन की कविताएं, यू एस ए में रह रहीं हिन्दी कथाकार-कवयित्री इला प्रसाद, डेनमार्क निवासी कवि भगत धवन की कविताएँ और चाँद शुक्ला की ग़ज़लें, यू एस ए निवासी कवि वेद प्रकाश ‘वटुक’ तथा कवयित्री रेखा मैत्र की कविताएं, कनाडा अवस्थित पंजाबी कवयित्री तनदीप तमन्ना की कविताएं, यू के अवस्थित हिन्दी कवि-ग़ज़लकार प्राण शर्मा की ग़ज़लें, कैनेडा में अवस्थित पंजाबी कवि सुखिन्दर की कविताएं, कनाडा निवासी पंजाबी कवयित्री सुरजीत, अमेरिका अवस्थित डॉ सुधा धींगरा, कनाडा में अवस्थित हिंदी- पंजाबी कथाकार - कवयित्री मिन्नी ग्रेवाल की कविताएं, न्यूजीलैंड में रह रहे पंजाबी कवि बलविंदर चहल की कविता, कैनेडा में अवस्थित पंजाबी लेखिका बलबीर कौर संघेड़ा की कविताएं, इंग्लैंड से शैल अग्रवाल की पाँच कविताएं, सिंगापुर से श्रद्धा जैन की ग़ज़लें, इटली में रह रहे पंजाबी कवि विशाल की कविताएं, यू एस ए में रह रहीं हिन्दी कथाकार-कवयित्री इला प्रसाद की एक लघुकथा, कैनेडा निवासी पंजाबी कवि डा. सुखपाल की कविता, यू.एस.ए. में अवस्थित हिंदी कवयित्री डॉ. सुधा ओम ढींगरा की कविताएं और पंजाबी कथाकार-उपन्यासकार हरजीत अटवाल के उपन्यास “सवारी” के हिंदी अनुवाद की छब्बीसवीं किस्त आपने पढ़ीं। “गवाक्ष” के जुलाई 2010 अंक में प्रस्तुत हैं – यू.एस.ए. में अवस्थित पंजाबी कवि-कथाकार प्रेम मान की पंजाबी कविताएं तथा यू.के. निवासी पंजाबी कथाकार-उपन्यासकार हरजीत अटवाल के धारावाहिक पंजाबी उपन्यास “सवारी” की सत्ताइसवीं किस्त का हिंदी अनुवाद…

यू.एस.ए. से
प्रेम मान की तीन पंजाबी कविताएं
हिंदी अनुवाद : सुभाष नीरव

रिश्ते

कुछ रिश्ते स्वयं ही उगते हैं
कुछ रिश्ते उगाये जाते हैं

रिश्ते स्वयं नहीं पलते
रिश्ते पाले जाते हैं

रिश्ते खुद नहीं समझते
इन्हें समझाना पड़ता है

रिश्तों को जिंदा रखने के लिए
लेने से अधिक
देना पड़ता है

रिश्ते आग हैं
ये जला भी सकते हैं
ये गर्मराहट भी देते हैं

रिश्ते बर्फ़ की तरह हैं
खूबसूरत भी लगते हैं
इस जिस्म को
जमा भी सकते हैं

रिश्ते दो-तरफा
सड़क की तरह हैं
इन्हें इकतरफा
समझकर
ज़लील होने वाली बात है

रिश्ते रूह की
खुराक भी बन सकते हैं
और ज़हर भी

रिश्ते खुदगर्ज भी
हो सकते हैं
और नाखुदगर्ज भी

रिश्ते वफ़ा भी
हो सकते हैं
और बेवफ़ा भी

रिश्ते निभाने ही कठिन नहीं
रिश्तों की बात करना भी
कठिन हो रहा है।
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भिन्नता

मेरे दोस्त कहते हैं
मैं दूसरों से
बहुत भिन्न हूँ

मुझे कच्चे अनार
अच्छे लगते हैं

मुझे धूपों से डर लगता है

मुझे मूसलाधार बारिश
तेज बहती हवायें
और आँधियों से
बहुत मोह है

मुझे पूरनमासी की रात से अधिक
अमावस्या की रात के गले लगकर
बहुत गर्माहट मिलती है

मुझे पक्के रास्तों से अधिक
कच्ची राहों की
उबलती धूलों पर
नंगे पैर चलना
और पैरों में पड़े
छालों की पीर में खुश होना
दिलचस्प लगता है

मुझे खूबसूरत लोगों से अधिक
बदसूरत लोगों को
आलिंगन में कस कर
अधिक आनन्द मिलता है

कुछ बिगड़ने पर
मैं किस्मत से अधिक
अपने आप को इल्ज़ाम देना
अधिक पसन्द करता हूँ

दोस्त कहते हैं
मैं अजीब इन्सान हूँ
पता नहीं क्यूँ
मैं बहुत से लोगों से
इतना भिन्न हूँ।
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पता

जब मैं
अपना घर
और देश छोड़कर
एक अनजाने और
बेगाने मुल्क में
किस्मत आजमाने के लिए चला था
तो मेरे एक दोस्त ने
कहा था
'अपनी नई जगह का
पता तो बता जा
चिट्ठी-पतरी के लिए।'
मैंने उसकी ओर
गहरी और उदास
नज़रों से देखकर
कहा था-
'दोस्त, बेघर लोगों का
कोई पता नहीं होता।'

आज अपने पुराने देश में
जाते समय सोचता हूँ-
बेघर लोगों का
सचमुच कोई भी
पता नहीं होता।
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प्रेम मान सन् 1970 से 1975 तक पंजाबी साहित्य में काफ़ी सक्रिय रहे। सन् 1970 में इनका कहानी संग्रह 'चुबारे की इट्ट' और सन् 1972 में ग़ज़ल संग्रह 'पलकां डक्के हंझु' प्रकाशित हुए। पंजाबी की मासिक पत्रिका 'कविता' का अप्रैल 1973 अंक दो जिल्दों में 'कहानी अंक' के रूप में इनके संपादन में प्रकाशित हुआ। पंजाब यूनिवर्सिटी से इकनॉमिक्स की एम.ए. करके इन्होंने गुरू गोबिंद सिंह कालेज, चंडीगढ़ में 1971 से 1975 तक अध्यापन किया। सितम्बर 1975 में जब हिंदुस्तान को अलविदा कहा तो पंजाबी साहित्य से भी विलग गए। इंग्लैंड में फिर इकनॉमिक्स की एम.ए. करने के बाद यूनिवर्सिटी ऑफ कैलीफोर्निया, लास ऐंजल से पी.एच.डी. की और संग-संग पाँच साल कैलीफोर्निया स्टेट युनिवर्सिटी में पढ़ाया। 1986 से यह ईस्टर्न कनैटीकट स्टेट युनिवर्सिटी में इकनॉमिक्स पढ़ा रहे हैं जहाँ वर्ष 1994 से विभागाध्यक्ष भी हैं। इन्होंने अपने विषय पर अनेक किताबें लिखी हैं जो कई देशों की बहुत सारी युनिवर्सिटीज़ में कोर्स के रूप में प्रयोग में लाई जाती है। वर्ष 2004 में यह न्यूयार्क के कुछ पंजाबी साहित्यकारों की संगत में आने पर पुन: साहित्य के जुड़े हैं।
वेब साइट : www.premmann.com, www.punjabiblog.com
ई मेल : prem@premmann.com

धारावाहिक पंजाबी उपन्यास(किस्त- 27)


सवारी
हरजीत अटवाल
हिंदी अनुवाद : सुभाष नीरव

॥ बत्तीस॥

सिमरन दो सप्ताह की छुट्टियाँ बिता कर लौटी तो ऐसा महसूस करने लगी मानो गहरे स्वप्न में से उठी हो। चमकीला समंदर, दूर तक पसरा किनारा, किनारे पर रेत से चिपके लोग और उन्हें दबोचे खड़ी धूप। और अब वही डल सा मौसम, घसमैला सा लंदन, मैली दीवारें, पुरानी सड़कें, बेसब्र सी भीड़। वह सीधी अपने घर पहुँची। घर पहुँचकर तसल्ली हुई कि चोरी होने से बच गई थी। इतने दिन बन्द रहे घर का बचे रहना करिश्मा ही था। दोस्त कहते थे कि लंदन रहते हों और चोरी न हो, असंभव।
उसने अनैबल और शूगर की फोटो देखी। पहले सोचा कि फोन कर ले। वे दोनों ग्रेवजैंड़ में अवतार कौर के पास थीं। उसने कार ली और ग्रेवजैंड़ की ओर चल दी। वह उनके लिए कितना कुछ लाई थी। खिलौने, कपड़े, चाकलेट। सब साथ ही ले लिया। उसे डर था कि कहीं वे उससे रूठी होने के कारण बोले ही न। अब दोनों स्कूल जाती थीं। सब समझती थीं। सिमरन भी पहली बार घर से इतनी दूर गई थी। इतने लम्बे समय के लिए बेटियों से अलग रही थी। अब उसे बेटियों पर अधिक ही मोह आ रहा था। कभी कभी वह उन्हें बोझ भी समझने लगती कि वह उनके कारण फंस कर रह गई थी। कहीं जा भी नहीं सकती थी। अगर किसी बिजनेस डिनर पर जाना होता तो सबसे पहले इन लड़कियों को इंतज़ाम करना पड़ता। होलीडेज़ पर जाने के बारे में सोचना ही बड़ी बात होती।
ये उसकी ज़िन्दगी की पहली छुट्टियाँ थीं। सारी दुनिया छुट्टियों पर जाती। छुट्टियाँ बिता कर लौटे लोग वहाँ की रोमांटिक बातें करते। भांति-भांति के किस्से सुनाते। छुट्टियों पर जाने से पहले तरह-तरह की सलाहें बनतीं, जगहों का चुनाव किया जाता। तारीखें तय होंती। बलदेव के होते तो छुट्टियों का सपना भी नहीं लिया जा सकता था। इंडियन लोग इंडिया जाने को ही छुट्टियाँ कहा करते हैं। अधिक होता तो कैनेडा या अमेरिका किसी रिश्तेदार को मिल आते। उनके लिए होलीडेज़ के अर्थ ही ऐसे थे।
सिमरन तो इस बार भी न जाती, ली को टाल देती पर उनके एक क्लाइंट ने बहुत ही सस्ता इंतज़ाम करवा दिया था। एक ट्रैवल एजेंट को सिमरन ने एक साल फ्री बैंकिंग की सुविधा दी थी और बदले में उसने सस्ती छुट्टियाँ बुक करवा दी थीं। अनैबल और शूगर को रखने के लिए उसने मम्मी को राजी कर लिया था। दो सप्ताह वह इस ज़िन्दगी से कटी रही थी। दो हफ्ते उसने उस ज़िन्दगी को यहाँ के रूटीन से तोड़कर भरपूर जिया था। वह बहुत खुश थी। उसकी वर्षों की थकान उतर गई थी। वह सोच रही थी कि अब कोई जितना चाहे काम करवा ले। अब वह कितना भी बोझ सह सकती थी।
ग्रेवजैंड़ पहुँची तो दोनों लड़कियाँ उसे दौड़कर मिलीं। वे सिमरन से नाराज तो थीं पर तोहफ़ों को देखकर सारी नाराजगी दूर हो गई। अवतार कौर उसे देखकर खुश होते हुए बोली-
''ले री, संभाल अपनी लाडलियों को। टांग रखा है इन्होंने तो।''
मम्मी अवतार कौर और डैड निर्मल सिंह के लिए भी वह कुछ लाई हुई थी। अमरजीत और उसके पति जवैर और उनके बेटे लुक के लिए भी। निर्मल सिंह ने अपने तोहफ़े में कोई उत्साह नहीं दिखाया था। सिमरन समझ गई थी कि शायद डैडी शक होगा कि मैं अकेली नहीं गई थी। वह रात में ग्रेवजैंड़ ही रह गई। इतनी थकी हुई थी कि घर जाकर कोई काम करना उसके लिए कठिन होता।
रात में अवतार कौर ने उसे कुरेदते हुए कहा-
''सिमरन, आगे तेरा क्या प्रोग्राम है ?''
''मंडे से काम पर जाना है।''
''मेरा मतलब है, अपनी लाइफ़ के बारे में क्या सोचती है ? बलदेव तो अब गया, दूसरा विवाह करवा ले।''
''विवाह की क्या ज़रूरत है मोम ?''
''विवाह के बिना यह सब पाप है।''
सिमरन ने कोई जवाब नहीं दिया। अवतार कौर ने पुन: पूछा-
''कौन था जिसके साथ होलीडे पर गई थी ?''
''काम पर से सहेलियाँ गई थीं, डोंट यू वरी मोम।''
''चिंता क्यों न करूँ। अमरजीत की तरह मुल्ला न ले आना या कोई काला-गोरा।''
''मैं किसी को नहीं लाती, न मुझे किसी की ज़रूरत है, पर अमरजीत तो पहले से कहीं ज्यादा हैप्पी है।''
''कैसी हैप्पी है। हमारी तो लोगों में बेइज्ज़ती हो गई। तेरे डैडी किसी को मुँह दिखाने लायक नहीं रहे।''
''गुरुद्वारों के प्रैजीडेंट हैं, व्हट एल्ज़।''
''यह बात और है।''
''मोम, फिक्र न कर। मैं कहीं नहीं भागी जाती।''
''भागने को भागी जाती है। कहते हैं- मरा रोने-पीटने से रहता है !''
सिमरन उसकी बात पर हँसने लगी। अवतार कौर ने फिर कहा-
''अगर कहे तो बलदेव को अप्रोच करें ?''
''नहीं मोम, मैं ऐसे ही हैप्पी हूँ। तुम भी हैप्पी हो जाओ।''
अगले दिन वह अनैबल और शूगर को लेकर अपने घर लौट रही थी तो लड़कियाँ उससे छोटे छोटे सवाल उसकी छुट्टियों के बारे में पूछ रही थीं। अचानक शूगर ने पूछा-
''मोम, हैव यू सीन डैड देअर ?''
''व्हॉट ?''
''हैव यू सीन हिम ?''
''हू टोल्ड यू दिस ?''
''नो वन।''
सिमरन सोचने लगी कि यह सवाल कहाँ से आया हो सकता था। शायद मम्मी ने बलदेव के बारे में इनसे कोई बात की हो। नहीं तो इन्होंने कभी भी अपने डैडी के विषय में कुछ नहीं पूछा था। बलदेव ने भी अब कभी फोन नहीं किया था। पहले कभी कभार फोन आ जाया करता था। एक बार उसने फोन किया तो जवैर ने उठा लिया। सिमरन ली के साथ डिनर पर गई हुई थी। अमरजीत और जवैर लड़कियों को संभालने के लिए घर आए हुए थे। इसके बाद बलदेव ने कभी फोन नहीं किया और न ही कोई संबंध रखा।
साल से ऊपर हो गया था उसे घर से गए। उस दिन झगड़े के बाद उसने अपना कुछ सामान लपेटा और चलता बना था। सिमरन ने सोचा था कि भाइयों के पास ही गया होगा। उसने अगले दिन गुरिंदर को फोन किया। गुरिंदर आगे से उसे लड़ने को पड़ी। कुछ दिन बाद सिमरन को पता चल गया था कि वह शौन के घर रह रहा था। दोनों लड़कियों ने बलदेव को बहुत मिस किया था। अनैबल पूछने लगती-
''डैडी, आते क्यों नहीं ?''
''वह हमें लाइक नहीं करता।''
''क्यों ?''
''सम डैडीज़ आर लाइक दिस।''
फिर वे स्कूल से लौटकर कहने लगी-
''मैं डैडी मांगती हूँ। मैं डैडी लाइक करती हूँ।''
''सभी बच्चों के पास डैडी थोड़े ही होते हैं। तेरी क्लास के हाफ बच्चों के पास डैडी है ही नहीं।''
सिमरन उसे गोदी में बिठाकर समझाती। अनैबल समझ जाती थी। शूगर कई बार अचानक ही अजीब सा सवाल कर मारती। वैसे वह चुप-सी लगती थी। एक दिन वह कहने लगी-
''मोम, कैन वी हैव ऐन अदर डैड ?''
सिमरन पहले हैरान हुई, फिर हँसते हुए बोली-
''नो... एवरी बडी हैव ओनली वन डैड वन मोम, अदर आर नॉट रीयल वन्ज़।''
अगले दिन अनैबल ने कहा-
''मोम, अवर टीचर टोल्ड अस समथिंग न्यू।''
''क्या ?''
''वी कांट हैव अदर फादर, बिकॉज फादर इज़ ओनली वन। बट वी कैन हैव डैडी। देअर इज़ डिफरेंस बिटवीन डैडी एंड फादर।''
सिमरन ने उसे बांहों में कस लिया और आँखें भर लीं। वह सोचने लगी कि कहाँ से लाए इनके लिए डैडी। ली हारवे के साथ उसका वास्ता बाहर बाहर ही था। उस दिन उसे बलदेव की बहुत याद आई।
कई दिन तक वह काम पर सैटिल नहीं हो सकी थी। पहले छुट्टियों से लौटने के कारण सब पराया पराया लगता था। फिर लड़कियों के सवाल उसको तंग करने लगे थे। उसे परेशान देखकर एक दिन बारबरा ने कारण पूछा तो उसने सारी बात बता दी। बारबरा बोली-
''सिम, ये सवाल तो पीछा किया ही करते हैं। थोड़ा स्ट्रांग बनकर रह। यदि तू कमज़ोर पड़ी तो यह एक्स इनका सहारा लेकर तुझे तंग भी कर सकता है।''
सिमरन सोचने लगी कि बलदेव इन लड़कियों के सहारे उसे क्या तंग कर सकेगा। बहुत करेगा तो लड़कियों को मांग लेगा। वे हँसकर दे देगी और कहेगी कि इनके कारण तो उसकी ज़िन्दगी नरक बनी पड़ी है। कहीं जा नहीं सकती, किसी को घर बुला नहीं सकती।
एक दिन बलदेव का फोन आ गया। वह उससे मिलना चाहता था। उसके फोन ने सिमरन को बहुत उत्साहित किया था। लेकिन फिर उसकी पथरीली सी आवाज़ याद आती तो वह ढीली पड़ जाती। बलदेव के लहजे से जाहिर था कि वह किसी खास काम के कारण ही मिलना चाहता था। कोई जज्बाती कारण प्रतीत नहीं होता था। शायद तलाक लेना चाहता हो या फिर घर में से अपना हिस्सा मांगता हो। सिमरन उसके साथ हर किस्म का समझौता करने को तैयार थी। वह जो कुछ भी मांगता, सिमरन ने देने का फैसला कर लिया। दिल के किसी कोने में से आवाज़ आने लगती कि शायद वह वापस घर ही आना चाहता हो। यह आवाज़ पलभर के लिए उसे आनंदित कर जाती, पर फिर उदास होकर सोचने लगती कि नहीं, यह नहीं हो सकता। बलदेव की आवाज़ में ऐसा कोई सवाल नहीं था। वह उसकी प्रतीक्षा करने लगी।
जिस दिन बलदेव को आना था, वह जल्दी ही काम पर आ गई। बलदेव का कुछ पता नहीं था कि वह पहले ही आया खड़ा हो। काम करते हुए वह बार-बार काउंटर पर से बाहर की ओर देखने लगती। उसने छुट्टी कर ली और बैंक से बाहर निकल आई। बाहर बारिश हो रही थी। ठंड भी थी। वह फिर लौटकर बैंक में आ गई। बलदेव बारह बजे पहुँचा। उसके सिर के बाल गीले थे जिसका अर्थ था कि वह कार कहीं दूर खड़ी करके आया होगा, नज़दीक जगह नहीं मिली होगी। उसने बलदेव की आँखों में झांका। वह स्थिर-सी थीं। उसे देखते ही बोली-
''हाय डेव !''
''हाउ यू डूइंग ?''
''आयम फाइन, यू लुक वैल !''
''यू लुक बैटर दैन बिफोर ! मोर यंगर !''
''थैंक यू।''
वे एक दूसरे के सामने खड़े रहे, फिर सिमरन ने कहा-
''आ, रेस्ट्रोरेंट में बैठते हैं, वहीं बातें करेंगे।''
बलदेव कुछ कहे बग़ैर उसके पीछे चल पड़ा। रेस्ट्रोरेंट खाली सा था। सिमरन ने पहले ही इस रेस्ट्रोरेंट में बैठने का प्रोग्राम बना लिया था। वह सोच रही थी कि अवश्य बलदेव ने कोई खास बात करनी होगी, जिसे करने के लिए ठीक सी जगह चाहिए। इस रेस्ट्रोंरेंट में वह कई बार अपने स्टाफ के साथ आ जाया करती थी। आसपास के भारतीय रेस्ट्रोरेंटों में यह बहुत चलता था। उनके अन्दर प्रवेश करते ही वेटर ने दो सीटों वाले मेज की ओर इशारा करके उनके भीगे हुए कोट पकड़ लिए। कोट से बाहर आई सिमरन को देख बलदेव बोला-
''तूने तो अच्छा-खासा वेट लूज कर लिया।''
''थैंक्स... अपने आप हो गया, मैंने कुछ नहीं किया।''
बेयरा मेन्यू उनके हाथ में दे गया। सिमरन ने पूछा-
''डेव, लंच करना है कि चाय पीनी है ?''
बलदेव ने घड़ी देखकर कहा-
''ऐनीथिंग विल डू।''
सिमरन ने पहले चाय और फिर खाने का आर्डर दे दिया।
बलदेव पूछने लगा-
''फिर, कैसी रहीं तेरी कनेरी आईलैंड की छुट्टियाँ ?''
''तू मेरी स्पाई करता है ?''
''नहीं, मैं नहीं करता। पर अगर कोई खबर मेरी राह में आ खड़ी हो तो मैं क्या करूँ।''
सिमरन ने उसके सवाल की ओर ध्यान दिए बिना कहा-
''बता, किस बात के लिए मिलना चाहता था ?''
''मैं अनैबल और शूगर को देखना चाहता हूँ।''
''इतनी देर बाद ?''
''असल में मैं... मैं फ्लैट आदि नहीं ले पाया था।''
''अब ले लिया ?''
''नहीं, बस ले ही लूँगा।''
''डेव, तेरी बेटियाँ हैं, मेरी तरफ से तू ही अपने पास रख, आयम फैड अप। बट दा थिंग इज़ अगर लेकर जाना चाहता है या मिलना ही चाहता है तो रैगूलर बेस पर मिलना। ऐसा न हो कि एक बार मिल कर दोबारा मुँह ही न दिखाओ। अदरवाइज़ डोंट अपसैट दैम, लीव दैम अलोन। दे आर हैप्पी नाउ।''
बलदेव सोच में डूब गया। उसे सिमरन की बात सही प्रतीत हुई। उसने सोचकर देखा कि इन हालातों में वह यह निरंतरता कायम नहीं रख पाएगा। अभी तो उसका ही स्थायी ठिकाना नहीं था। सिमरन ने पूछा-
''क्या सोच रहा है ?''
''यू आर राइट। लैट मी सैटिल डाउन। मै फ्लैट ले रहा हूँ और फिर जॉब भी चेंज करनी है।''
''यह जॉब ठीक नहीं ?''
''मैं हैप्पी नहीं, शायद किसी बिजनेस में पड़ूँ।''
''तेरे ब्रदर्स हैं हैल्प के लिए।''
बलदेव ने कोई उत्तर न दिया। सिमरन ने फिर कहा-
''हाउ इज़ गुरां ?''
''ठीक है।'' वह संक्षिप्त का जवाब देकर चुप हो गया। सिमरन ने पूछा-
''डेव, इतनी देर हो गई, तेरा घर आने को दिल नहीं करता ?''
बलदेव खामोश रहा। सिमरन बोली-
''डेव, चल मेरे संग एक बार घर चल। एक बार फील करके देख घर को तुझे अच्छा लगेगा।''
''नहीं सिमरन, मैं बहुत खुश हूँ अब। मैं दोबारा उन्हीं फीलिंग्स में से नहीं गुजरना चाहता। वो फीलिंग्स बहुत पेनफुल होती हैं। आई नो, आई नो दैम।''
''डेव, दैट हाउस नीडज़ यू वैरी बैडली।''
''नहीं सिमरन, पता नहीं किस किस सायों का राज है उस घर पर अब।''
''डेव, यू आर रांग हियर, किसी साये का राज नहीं है वहाँ।''
''सिमरन, तू अभी भी ली हारवे के साथ अपने रीलेशन से मुकर रही है। अब तो अपने बीच कुछ नहीं, न ही मुझे तेरे साथ कोई हार्ड फीलिंग रही है। तेरी ज़िन्दगी है, कुछ भी कर। आई डोंट माइंड। आई जस्ट कम फॉर माई डॉटर्स।''
''डेव, मुकरने वाली कोई बात नहीं। मैं तुझे सिर्फ़ यह बता रही हूँ कि ली हारवे का वास्ता मेरे से या मेरी जॉब से हो सकता है, बट नॉट विद दैट हाउस... वो घर तेरा आज भी उतना ही है, जितना तेरा वहाँ रहते समय हुआ करता था। तू जब चाहे आकर रह, मेरे साथ न बोल। वहाँ आज तक कोई पराया मर्द नहीं आया और न आएगा। एक बार अमरजीत और जवैर आए थे, दोबारा वे भी नहीं... घर तेरा है और बेटियाँ तेरी हैं...।''
(जारी…)
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लेखक संपर्क :
67, हिल साइड रोड,साउथाल,
मिडिलसेक्स, इंग्लैंड
दूरभाष : 020-८५७८०३९३
07782-265726(मोबाइल)

मंगलवार, 22 जून 2010

गवाक्ष – जून 2010


“गवाक्ष” ब्लॉग के माध्यम से हम हिन्दी ब्लॉग-प्रेमियों को हिन्दी/पंजाबी के उन प्रवासी लेखकों/कवियों की समकालीन रचनाओं से रू-ब-रू करवाने का प्रयास करते आ रहे हैं जो अपने वतन हिन्दुस्तान से कोसों दूर बैठकर अपने समय और समाज के यथार्थ को अपनी रचनाओं में रेखांकित कर रहे हैं। “गवाक्ष” में अब तक पंजाबी कवि विशाल (इटली) की कविताओं का हिन्दी अनुवाद, दिव्या माथुर (लंदन) की कहानी, अनिल जनविजय (मास्को) की कविताएं, न्यू जर्सी, यू.एस.ए. में रह रहीं देवी नागरानी की ग़ज़लें, लंदन निवासी कथाकार-कवि तेजेन्द्र शर्मा, रचना श्रीवास्तव, दिव्या माथुर की कविताएं, दुबई निवासी पूर्णिमा वर्मन की कविताएं, यू एस ए में रह रहीं हिन्दी कथाकार-कवयित्री इला प्रसाद, डेनमार्क निवासी कवि भगत धवन की कविताएँ और चाँद शुक्ला की ग़ज़लें, यू एस ए निवासी कवि वेद प्रकाश ‘वटुक’ तथा कवयित्री रेखा मैत्र की कविताएं, कनाडा अवस्थित पंजाबी कवयित्री तनदीप तमन्ना की कविताएं, यू के अवस्थित हिन्दी कवि-ग़ज़लकार प्राण शर्मा की ग़ज़लें, कैनेडा में अवस्थित पंजाबी कवि सुखिन्दर की कविताएं, कनाडा निवासी पंजाबी कवयित्री सुरजीत, अमेरिका अवस्थित डॉ सुधा धींगरा, कनाडा में अवस्थित हिंदी- पंजाबी कथाकार - कवयित्री मिन्नी ग्रेवाल की कविताएं, न्यूजीलैंड में रह रहे पंजाबी कवि बलविंदर चहल की कविता, कैनेडा में अवस्थित पंजाबी लेखिका बलबीर कौर संघेड़ा की कविताएं, इंग्लैंड से शैल अग्रवाल की पाँच कविताएं, सिंगापुर से श्रद्धा जैन की ग़ज़लें, इटली में रह रहे पंजाबी कवि विशाल की कविताएं, यू एस ए में रह रहीं हिन्दी कथाकार-कवयित्री इला प्रसाद की एक लघुकथा, कैनेडा निवासी पंजाबी कवि डा. सुखपाल की कविता और पंजाबी कथाकार-उपन्यासकार हरजीत अटवाल के उपन्यास “सवारी” के हिंदी अनुवाद की पचीसवीं किस्त आपने पढ़ीं। “गवाक्ष” के जून 2010 अंक में प्रस्तुत हैं –यू.एस.ए. में अवस्थित हिंदी की जानी-मानी कवयित्री डॉ. सुधा ओम ढींगरा की कविताएं तथा पंजाबी कथाकार-उपन्यासकार हरजीत अटवाल के धारावाहिक पंजाबी उपन्यास “सवारी” की छब्बीसवीं किस्त का हिंदी अनुवाद…

यू.एस.ए. से
डॉ. सुधा ओम ढींगरा की चार कविताएं
अपेक्षा

पूनी की तरह
गृहस्थी की तक़ली पर
सुती गई…

अपेक्षाओं का सूत
गदरा ही रहा
आकाँक्षाओं के
महीन सूत के लिए
ना जाने
कितनी बार और
मेरी भावनाएँ
तक़ली पर
कती जाती रहेंगी…

मन को अटेरनी बना
इच्छाओं को कस दिया

गृहस्थी का खेस
फिर भी पूरा न हुआ…
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बेबसी

चाँद से
मुट्ठी भर चाँदनी
उधार ले आई
हृदय के उन कोनों को
उजागर करने के लिए
जहाँ भावनाएँ
रावण बन
सामाजिक मर्यादाओं की
लक्ष्मण-रेखा पार करना चाहती है
और मन सीता-सा
इन्कार करता हुआ भी
छ्ला जाता है।
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खिलवाड़ –एक

दिन की आड़ में
किरणों का सहारा ले
सूर्य ने सारी ख़ुदाई
झुलसा दी

धीरे से रात ने
चाँद का मरहम लगा
तारों के फाहे रख
चाँदनी की पट्टी कर
सुला दी।
0

खिलवाड़ – दो

किरणों के फावड़ों से
सूर्य ने
सारी ख़ुदाई
खोद डाली

रात उतरी
मेढ़ से औ’
चाँद तारे
बो गई।
००
उक्त चारों कविताएं डॉ. सुधा ओम ढींगरा के सद्य प्रकाशित कविता संग्रह “धूप से रूठी चाँदनी” से ली गई हैं जो शिवना प्रकाशन, पी सी लैब, सम्राट कॉम्प्लैक्स बेसमेंट, बस स्टैंड, सीहोर-466001(मध्य प्रदेश) से अभी हाल ही में प्रकाशित हुआ है।

धारावाहिक पंजाबी उपन्यास(किस्त- 26)



सवारी

हरजीत अटवाल
हिंदी अनुवाद : सुभाष नीरव


॥ इकत्तीस॥

सिमरन ने बैंक के कर्मचारियों के लिए बने कार-पॉर्क में कार खड़ी की। अपना पर्स उठाते हुए बाहर निकली। सीधी खड़ी होकर स्कर्ट के ऊपर आए बल को आगे-पीछे हाथ मारते हुए सीधा करने लगी। फिर कार की पिछली सीट पर से अपनी जैकेट उठाई और आसपास की कारों पर नज़र दौड़ाती अंदाजा लगाने लगी कि कौन कौन आ चुके थे। लगभग सारी ही कारें खड़ी थीं। इसका अर्थ था कि वह लेट थी। आज फैरी ने उसे लेट करवा दिया था। कभी कभी ऐसा हो जाता। अगर वह कुछ मिनट पहले चलती तो बैंक बहुत जल्दी पहुँच जाती, उस समय तक कोई आया ही न होता। उसका घर तो काम पर से इतनी दूर नहीं था लेकिन बीच में थेम्ज़ पड़ता था। यहाँ पर आकर थेम्ज़ कुछ अधिक चौड़ा हो जाता था।
वह ग्रीनिच से चलती। वूलिच आकर फैरी पकड़ती। दरिया पार करते ही वौलफोर्ड है जहाँ उसका बैंक था। दरिया ब्लैकविल टनल के रास्ते भी पार किया जा सकता है, पर टनल थोड़ा दूर पड़ता था और ट्रैफिक भी खूब हो जाता। यह फैरी ही ठीक थी। कई बार उसका दिल करता कि घर ही वौलफोर्ड में ले ले, पर फिर सोचती कि अगर यहाँ से बदली किसी दूसरे बैंक में हो गई तो फिर क्या करेगी। काम तो बदलते ही रहते हैं, पर घर बदलने बहुत कठिन होते हैं। इसलिए वह इस तरह आने-जाने की तकलीफ़ झेले जाती थी। पाँच-सात सौ गज चौड़े दरिया को पार करते हुए अधिक समय तो न लगता, पर उबाऊ-सा होता। फैरी की प्रतीक्षा भी लम्बी होती।
उसने बैंक के पिछले दरवाजे से लगे अलार्म का कोड नंबर दबाया और दरवाजा खोल कर अन्दर प्रवेश कर गई। वह करीब पंद्रह मिनट ही लेट थी। वह सबको 'हैलो' कहती और साथ ही कह देती -'सॉरी, फिर लेट।' मैनेजर सैंडी हैरिस ने हँसते हुए कहा-
''हम तो सोच रहे थे कि थेम्ज़ ने कोई गड़बड़ी कर दी।''
''हाँ सैंडी, यह थेम्ज़ बहुत खराब है। कहाँ बह रहा है, मेरे घर और मेरे आफिस के बीचोबीच।''
''मिस, यह तो सदियों से बह रहा है।''
''हाँ, पर तकलीफ़देह अब हुआ है।'' कहकर हँसती हुई वह जूली की मदद करने लगी। जूली काउंटर खोलने की तैयारी कर रही थी। वे बाहर खड़े ग्राहकों की लाइन का हिसाब लगाकर देखने लगीं कि कितने काउंटर खोले जाएँ। ठीक साढ़े नौ बजे तीन काउंटर खोल दिए गए। बारबरा उनके साथ आ गई थी। लाइन छोटी हुई तो सिमरन अपना काउंटर बन्द करके पिछले डैस्क पर जा बैठी। दस बजे उसकी किसी क्लाइंट से मुलाकात थी। किसी छोटे बिज़नेसमैन ने अपना ओवर-ड्राफ्ट बढ़ाना था लेकिन वह बैंकिंग पूरी नहीं कर रहा था। सिमरन ने एक दिन पहले ही क्लाइंट की फाइल पर बिज़नेस मैनेजर के संग विचार कर लिया था और मन बना रखा था कि उसके ओवर ड्राफ्ट की लिमिट तब तक नहीं बढ़ाई जाएगी, जब तक वह पूरी बैंकिंग करने का वायदा नहीं करता। मैनेजर सैंडी हैरिस को सिमरन पर पूरा विश्वास था, इसलिए बहुत सारे क्लाइंटों को सिमरन अपने हिसाब से डील कर लेती थी। बहुत सारे क्लाइंट भी ऐसे थे जो कि सिमरन पर ज्यादा भरोसा करते। फिर कम अंग्रेजी जानने वाले लोग तो सिमरन के साथ बात करके ही खुश रहते। कुछ एशियन क्लाइंट्स उसके कारण ही बैंक से बंधे हुए थे। मैनेजर उसे बैंक की खास ताकत मानता था। उसके कारण बैंक की टर्न-ओवर बढ़ी थी।
एशियन तो वहाँ एक और था- याकूब सुमरो। पाकिस्तानी था। याकूब सिमरन को कतई नहीं भाता था। कई बार मसखरी-सी के साथ बात करता, खास तौर पर तब से जब से वह बलदेव से अलग हुई थी। सबको पता था। सभी थोड़ी-बहुत हमदर्दी दिखा रहे थे। लेकिन याकूब ज्यादा ही हमदर्द बनता जा रहा था। यहाँ तक कि सिमरन को आँखें दिखानी पड़ी थीं। फिर जब सिमरन की ली हारवे के संग निकटता बढ़ी तो याकूब ने एक बार फिर अंदाज बदला था और सिमरन को उसे डांटना पड़ा था। अब सिमरन उसे नहीं बुलाया करती थी। काम से संबंधित बात भी सीमित शब्दों में करती।
लंच ब्रेक से पहले याकूब सुमरो उसके पास आया और कहने लगा-
''मिसेज बैंस, मैं तुमसे बात करना चाहता हूँ।''
उसने पंजाबी में कहा था और सिमरन अंग्रेजी में बोली-
''मिस्टर सुमरो, मेरे साथ अंग्रेजी में बात करो। यह बैंक है, कोई पॉर्क नहीं।''
याकूब ज़रा-सा झेंपा और फिर बोला-
''मिसेज बैंस, मुझे तुम्हारी मदद की ज़रूरत है।''
''मैं क्या कर सकती हूँ ?''
''स्टैनले स्लेटर मुझसे जूनियर है और उसे प्रोमोशन मिल रहा है। मुझे इग्नोर कर दिया गया है। मैं केस को यूनियन में ऊपर तक ले जाना चाहता हूँ। मुझे शायद तुम्हारी गवाही की ज़रूरत पड़े। यह सब मेरे रंग के कारण हो रहा है।''
''कैसी गवाही ? यह रंग के फ़र्क़ के बारे में मैं क्या कह सकती हूँ ? क्या गवाही दूँगी ?''
''यही मेरे काम के बारे में, मेरे बर्ताव के बारे में। मेरे साथ तो निरी रेशियल डिसक्रिमिनेशन हो रही है।''
''तुम्हारी मदद तो तुम्हारे काम ने करनी है। तुम्हारा काम तुम्हारे पेपरों में बोलेगा, तुम्हें मेरी गवाही की ज़रूरत नहीं पड़ेगी। नस्लवादी कारणों का भी पता चल जाएगा।''
''फिर भी तुम्हें पता ही है गोरों का, हमारे साथ फ़र्क क़रते हैं। अगर तुम इजाज़त दो तो तुम्हारा नाम भर दूँ।''
सिमरन ने मिनट भर के लिए सोचा और कहा-
''भर दो, जो कुछ मेरी जानकारी में होगा, मैं कह दूँगी।''
''थैंक यू। मैं तो सदैव ही तुम्हें बहनों की तरह समझता हूँ।''
सिमरन ने प्रत्युत्तर में कुछ न कहा, पर मन ही मन हँसी। वह सोच रही थी कि याकूब ने उसके बलदेव से अलहदा होने को किस प्रकार मजाक में लिया था। फिर उसे अकेली समझ कर फायदा उठाने की कोशिश की थी। ऐसे ही होते हैं एशियन मर्द। ऐसा ही बलदेव था, पूरा हिप्पोक्रेट। औरत को वस्तु समझने वाला। बलदेव का ख़याल आते ही उसका चेहरा उसके सामने आ गया। बलदेव अच्छा-भला था। उसने बलदेव से कभी नफ़रत नहीं की थी। बस, उससे वह झेला नहीं जाता था। उसे तो सिमरन चाहिए ही नहीं थी, उसे तो गुरिंदर की ज़रूरत थी। बात-बात पर कहने लगता कि गुरिंदर यह पहनती है, गुरिंदर कैसे बोलती है, गुरिंदर ऐसा मेकअप करती है।
बलदेव और सिमरन का विवाह ठीक हो गया था। पहली झड़प उनके बीच रहने के बारे में फैसला करने को लेकर हुई थी। सिमरन ग्रेवज़ैड में रहना चाहती थी और बलदेव फर्न पॉर्क में, उत्तरी लंदन में जहाँ अजमेर रहता था। कुछ समय वे अजमेर के घर में भी रहे, फिर सिमरन को बैंक में नौकरी मिल गई और पहली पोस्टिंग ग्रीनिच में हुई। उसने वहीं घर ले लिया। सो, 'रहना कहाँ है' वाला झगड़ा खत्म हो गया। दूसरी झड़प सिमरन के कपड़ों और बालों को लेकर थी। पहले बलदेव मन में कुढ़ता रहता था, फिर वह सिमरन को टोकने लग पड़ा। वह चाहता था कि गुरिंदर की तरह वह सादे कमीज़-सलवार पहने, उसकी तरह थोड़ा-सा मेकअप करे और धीमे स्वर में बोले। सिमरन को बहुत बुरा लगता। एक दिन तो वह खीझ उठी और ऊँचे स्वर में बोली-
''बलॅडी, वाय नॉट यू अंडरस्टैंड, आय एम फकिन ब्रिटिश एंड शी इज़ फकिन फ्रैशी। डोंट यू डेअर टू कम्पेयर हर विद मी।''
बलदेव को यह वार्तालाप बहुत बड़ा लगा था। कई दिन इसी को लेकर लड़ाई-झगड़ा चलता रहा कि सिमरन ने 'एफ' लफ्ज़ का प्रयोग किया था। गाली निकाली थी। जब कुछ शांति हुई तो बलदेव ने उसे कहा-
''मैं मर्द होकर कभी गाली नहीं निकालता और तू औरत होकर निकालती है। शेम की बात है।''
''वाट वाज़ फकिन डिफरेंस ? तू आदमी है और मैं औरत हूँ, स्टॉप दिस रबिस।''
इस बात पर फिर झगड़ा हो गया। इस झगड़े को सामान्य हालात में लाने के लिए फिर कितने ही दिन लग गए। सिमरन बलदेव से इतनी ऊब गई थी कि उसका दिल करता था कि घर छोड़कर कहीं भाग जाए। उसकी माँ उसे रोकते हुए कहती-
''बेटी, थोड़ा समय और देख ले। यह अभी इंडिया में ही बैठा है, थोड़े समय जब यहाँ की आदत पड़ गई तो ठीक हो जाएगा।''
''मोम, और कितनी देर टोलरेट करूँ इसे ?''
''ऐसा होता है बेटी, इंडिया से आए लड़कों को घटियापन का अहसास होता है, इसलिए भी वह ट्रबल करता होगा। जैसे ठिगने आदमी को बराबर होने के लिए लड़ना पड़ता है, तेरे डैडी की तरह।''
''मोम, डैड तो जैंटिल था, तेरा कहना मानते हैं, तेरी सुनते हैं, पर यह डेव ऐसा नहीं है, ही इज़ टू मच हिप्पोक्रेट।''
''जिस दिन अच्छी जॉब मिल गई, ठीक हो जाएगा। अभी फैक्टरी वर्कर है न।''
बलदेव को रेलवे में क्लर्की मिली तो बहुत खुश था। तनख्वाह बेशक कम थी उसकी फैक्टरी वाली जॉब से, पर बढ़िया नौकरी होने का अहसास था। घर में वह पहले से अधिक प्रसन्न रहने लगा। उसे अच्छे रौ में देखकर सिमरन कहने लगी, ''अपनी हिप्पोक्रेसी को ज़रा नरम कर।''
''नहीं सिमरन, मेरी वैल्यूज़ और तेरी वैल्यूज़ में फ़र्क है।''
''सिर्फ़ हिप्पोक्रेसी का ही फ़र्क़ है। एंड वी आर मैरिड नाउ, वी शुड एडजस्ट।''
''यही तो कर रहा हूँ।''
फिर सिमरन की प्रोमशन होकर वौलफोर्ड वाली ब्राँच में बदली हो गई। वौलफोर्ड दरिया के दूसरी ओर था। कुछ हफ्ते काम पर गई और फिर गर्भवती होने के कारण छुट्टी मिल गई। आठवां महीना चल रहा था। अनैबल का जन्म हुआ। जब अनैबल महीने भर की हुई तो वह दुबारा काम पर जाना आरंभ कर दिया। बेबी को आया के पास छोड़ कर। घर में फिर झगड़ा रहने लगा। बलदेव बच्चे को आया के आसरे नहीं रखना चाहता था। वह चाहता था कि सिमरन काम छोड़ दे। जब वह ग्रीनिच में काम करती थी तो बलदेव को लगता था कि वह आँखों के सामने तो थी, पर वौलफोर्ड बहुत दूर प्रतीत होता। वहाँ तक पहुँचने की तकलीफ़ भी उसे बहुत बड़ी दिखाई देती। बलदेव उसे तरह-तरह की दलीलें देकर काम छोड़ देने के लिए तैयार करता। कभी बच्ची के लालन-पालन को लेकर, कभी वौलफोर्ड के इलाके का रफ एरिया होने की, कभी दरिया के खतरनाक रास्ते की। सिमरन कहती -
''डेव, मैं अपनी जॉब नहीं छोड़ सकती। तू तो इस जॉब की इम्पोर्टेंस समझता ही है। अगर ज्यादा ही है तो तू काम छोड़कर घर संभाल।''
''मैं मर्द हूँ मर्द, समझी।''
इसी खींचतान में शूगर भी आ गई। अब तक बलदेव भी सहनशील हो गया था। वह सवेरे जल्दी काम पर निकल जाता। सिमरन बाद में बच्चों को बेवी मांइडर के पास छोड़कर जाती और बलदेव से पहले घर लौट आती। बच्चियाँ बड़ी हो रही थीं। बड़ी ने बातें करना शुरू कर दिया था, फिर छोटी ने भी। अब वे पहले से अधिक जुड़ गए थे। सिमरन पहले गुस्से में आकर कंधे उचकाकर कह दिया करती थी कि इन बातों की मुझे कोई परवाह नहीं, लेकिन अब यह रवैया उसने छोड़ दिया था। बलदेव ने भी बात-बात में उसकी तुलना गुरिंदर से करना बन्द कर दी थी। वह समझ चुका था कि हर औरत गुरां नहीं होती। लड़ाई-झगड़ा उनका अब भी हो जाया करता। कई-कई दिन बिना बोले बीत जाते। लेकिन दोनों में से कोई न कोई झुक जाता। अब दोनों ने ही झुकना सीख लिया था।
बलदेव का स्वभाव कुछ-कुछ मनमौजी-सा होने लगा था कि जो होता है, होता रहे लेकिन सिमरन ज्यादा प्रैशर में रहने लगी। काम पर अधिक काम का बोझ ओर घर आकर घर का, बच्चों का बोझ। बलदेव ने कभी घर के काम में हाथ नहीं लगाया था। काम पर से लौटता तो सैटी पर जा बैठता और मेज पर टांगें रखकर टेलीविजन देखता रहता या फिर बच्चों के संग खेलता रहता। काम पर उसकी मित्रता शौन से हो गई थी। कई बार उसके संग पब-क्लब में चला जाता तो देर से घर लौटता। सिमरन अकेली बैठी कलपती रहती। सिमरन की बड़ी बहन अमरजीत की अपने घरवाले के साथ अनबन चल रही थी। सिमरन उसके बारे में सोचकर भी अपने मन पर एक बोझ-सा लिए रहती। फिर बहन का तलाक हो गया। इस तलाक का असर सिमरन पर भी हुआ। वह सोचती कि बलदेव के संग और झुककर रह लेगी पर विवाह टूटने नहीं देगी। बलदेव की हर नाराज़गी झेलती रहेगी।
लेकिन हालात सिमरन के हक में नहीं, विरोध में खड़े होने लगे। अमरजीत ने एक मुसलमान लड़का जवैर ढूँढ़ लिया और उसके संग रहने लग पड़ी। इसी बात पर बलदेव गुस्से में रहने लगा। वह सिमरन के पूरे खानदान को ही अबा-तबा बोलने लगा। तभी, ली हारवे सिमरन का इमीजिएट अफ़सर बनकर ब्रांच में आ गया। बैंक के कारोबारी कामों के कारण वह सिमरन को अक्सर शाम को भी फोन करता और घर भी आ जाता। बैंक की नई पॉलिसी से अनुसार एशियन व्यापारियों तक पहुँच बनानी थी। ली हारवे की यही प्रमुख डयूटी थी और सिमरन की उसे ज़रूरत होती। वह शाम की गई कई बार देर से लौटती। क्लाइंट्स के साथ डिनर पर भी जाना पड़ता। बलदेव के सब्र का प्याला जल्द ही छलक गया। एक दिन उसने कहा-
''सिमरन, सब कुछ टॉलरेट कर सकता हूँ, पर यह नहीं किया जाता।''
''डेव, यह मेरी जॉब है।''
''मुझे नहीं चाहिए, ऐसी जॉब।''
''पर मुझे चाहिए। मेरी अब आगे प्रोमोशन के चांस हैं। हो सकता है, मैं बिजनेस कंट्रोलर ही बन जाऊँ।''
''मुझे नहीं चाहिए बिजनेस कंट्रोलर, मुझे वाइफ़ चाहिए। मुझे तेरा वो बन्दा भी पसंद नहीं। मुझे तेरा किसी पराये बन्दे के साथ इस तरह जाना भी पसंद नहीं।''
''इट्स पार्ट ऑफ माय जॉब।''
''छोड़ दे ऐसे जॉब।''
''जॉब मैं नहीं छोड़ सकती।''
''फिर मुझे छोड़ दे।''
सिमरन सिर पकड़कर बैठ गई। फिर कितना कुछ सोचती मन को समझाने लगी।
अगली बार ली हारवे का फोन आया तो बलदेव फिर वही बर्ताव करने लग पड़ा-
''सिमरन, मी ओर दिस मैन एंड जॉब ?''
''डेव, यू आर टू मच फार मी। आय कांट टेक इट।''
''मी टू, आय कांट टेक इट टू।''
''डेव, दैन फक्क ऑफ फ्राम माई लाईफ़।''
(जारी…)
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शनिवार, 29 मई 2010

गवाक्ष – मई 2010



“गवाक्ष” ब्लॉग के माध्यम से हम हिन्दी ब्लॉग-प्रेमियों को हिन्दी/पंजाबी के उन प्रवासी लेखकों/कवियों की समकालीन रचनाओं से रू-ब-रू करवाने का प्रयास करते आ रहे हैं जो अपने वतन हिन्दुस्तान से कोसों दूर बैठकर अपने समय और समाज के यथार्थ को अपनी रचनाओं में रेखांकित कर रहे हैं। “गवाक्ष” में अब तक पंजाबी कवि विशाल (इटली) की कविताओं का हिन्दी अनुवाद, दिव्या माथुर (लंदन) की कहानी, अनिल जनविजय (मास्को) की कविताएं, न्यू जर्सी, यू।एस.ए. में रह रहीं देवी नागरानी की ग़ज़लें, लंदन निवासी कथाकार-कवि तेजेन्द्र शर्मा, रचना श्रीवास्तव, दिव्या माथुर की कविताएं, दुबई निवासी पूर्णिमा वर्मन की कविताएं, यू एस ए में रह रहीं हिन्दी कथाकार-कवयित्री इला प्रसाद, डेनमार्क निवासी कवि भगत धवन की कविताएँ और चाँद शुक्ला की ग़ज़लें, यू एस ए निवासी कवि वेद प्रकाश ‘वटुक’ तथा कवयित्री रेखा मैत्र की कविताएं, कनाडा अवस्थित पंजाबी कवयित्री तनदीप तमन्ना की कविताएं, यू के अवस्थित हिन्दी कवि-ग़ज़लकार प्राण शर्मा की ग़ज़लें, कैनेडा में अवस्थित पंजाबी कवि सुखिन्दर की कविताएं, कनाडा निवासी पंजाबी कवयित्री सुरजीत, अमेरिका अवस्थित डॉ सुधा धींगरा, कनाडा में अवस्थित हिंदी- पंजाबी कथाकार - कवयित्री मिन्नी ग्रेवाल की कविताएं, न्यूजीलैंड में रह रहे पंजाबी कवि बलविंदर चहल की कविता, कैनेडा में अवस्थित पंजाबी लेखिका बलबीर कौर संघेड़ा की कविताएं, इंग्लैंड से शैल अग्रवाल की पाँच कविताएं, सिंगापुर से श्रद्धा जैन की ग़ज़लें, इटली में रह रहे पंजाबी कवि विशाल की कविताएं, यू एस ए में रह रहीं हिन्दी कथाकार-कवयित्री इला प्रसाद की एक लघुकथा और पंजाबी कथाकार-उपन्यासकार हरजीत अटवाल के उपन्यास “सवारी” के हिंदी अनुवाद की चौबीसवीं किस्त आपने पढ़ीं। “गवाक्ष” के मई 2010 अंक में प्रस्तुत हैं – कैनेडा निवासी पंजाबी कवि डा. सुखपाल की कविता तथा पंजाबी कथाकार-उपन्यासकार हरजीत अटवाल के धारावाहिक पंजाबी उपन्यास “सवारी” की पचीसवीं किस्त का हिंदी अनुवाद…


कैनेडा से
डा. सुखपाल की पंजाबी कविता

शब्दो तुम आना
हिंदी रूपांतर : सुभाष नीरव

शब्दो तुम आना
चुपचाप, सहज-सहज
मुंडेर पर आ बैठे
और फिर उड़ गए कबूतरों की तरह
छोटी-छोटी 'गुटर-गूं' करते

आँधी की तरह न आना
कि मुझे किसी वाद की छत के तले छिपना पड़े
या किसी विवाद की डाल को पकड़ना पड़े

तुम आना हुमकती हवा की तरह
जो तन को लगे तो आँखें मुंद-मुंद जाएँ
मन की खिड़कियाँ खुल-खुल जाएँ
फूलों की महक को
मेरे अन्दर आने के लिए राह मिले...

तुम आना उस सुरूर की तरह
जिसके बाद जीने का डर नहीं रहता
जिसके बाद सहज हो जाता है
हर संध्या-समय
बालों को फूलों से गूंथ लेना
पर फूलों को व्यर्थ तोड़ने वाली
कलाई पकड़कर रोक लेना...

सुन्दर शब्दो !
तुम मात्राओं के फीतों से बंधे
मज़दूरों की भांति न आना
तुम 'गगनमै थाल'¹ गाते हुए आना
या आना किसी दिव्य-पुरुष के तीर की तरह...

तुम आना उस टहनी की तरह
जो बदन पर गहरे नील नहीं
बल्कि पीछे छोड़ जाती हैं फूल...

मेरे अपनो !
तुम ऐसे आना
कि तुम्हें गाते हुए
मैं अपने आप तक पहुँच जाऊँ।
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1-श्रीगुरूग्रंथ साहिब में 'सोहिला' शीर्षक अधीन एक खास वाणी की पंक्ति 'गगनमै थालु रवि चंद दीपक बने'।
(तनदीप तमन्ना के पंजाबी ब्लॉग ''आरसी'' से साभार)


डा. सुखपाल
निवास : कैनेडा
शिक्षा : वेटरिनरी साइंस में पंजाब कृषि विश्वविद्यालय लुधियाना से डिग्री(1982)
और यूनिवर्सिटी ऑफ गुअलफ़, कैनेडा से डॉक्टरेट(1995)।
संप्रति : अध्यापन( एनिमल एनस्थीजिआ यूनिवर्सिटी आफ गुअलफ, कैनेडा)
पुस्तकें : चुप चुपीते चेतर चढ़िया(2003), रहणु किथाऊ नाहि( 2007 )

धारावाहिक पंजाबी उपन्यास(किस्त- 25)

सवारी
हरजीत अटवाल
हिंदी अनुवाद : सुभाष नीरव




॥ तीस ॥
करीब ग्यारह बजे पॉल राइडर ने अपनी टोयटा वैन लाकर 'सिंह वाइन्ज़' के आगे खड़ी की और छोटा-सा हॉर्न बजाकर अन्दर की ओर झांकने लगा। अजमेर उसे देखकर तेजी से आया और वैन में उसके बराबर बैठ गया। पॉल पूछने लगा-
''हाउ यू डूइंग ?''
''फाइन।''
पॉल ने वैन राउंड अबाउट से घुमाकर हौलोवे रोड पर डाल ली। कुछ देर बाद उसने अजमेर से पूछा-
''ऐंडी, तू वैदरस्पून को जानता है ?''
''जिसकी पबों की चेन है।''
''हाँ, वह मेरा दोस्त है। किसी ज़माने में हम इकट्ठे बार मैन हुआ करते थे।''
''मुझे पता है जब उसने आर्चवे में पहला पब खरीदा था, अब वो मिलयनेअर है, कई सौ पब होगा उसका।''
''हाँ ऐंडी, बहुत लक्की है। मेरे से सलाह लेने आता रहा, बस मैंने टिक कर काम नहीं किया। कभी चिप्पी बन गया और कभी पलम्बर, पर वह मन मारकर लगा रहा।''
''बस, चांस मिलने की बात है पॉल।''
''हाँ, उसने हमेशा मैनेजरों के सिर पर काम चलाया और इस बरूरी को कोई मैनेजर ठीक नहीं मिला, नहीं तो यह पब भी ठिकाने का था।''
''बरूरी का पब था ?''
''हाँ, स्मूथ बिटर का, मैं तो इस पब में आता रहा हूँ।''
पॉल किसी पब के बिकने की खबर लाया था। अजमेर ने उसे कह रखा था कि ढंग का पब बिकाऊ हो तो बताये। फिंचली में लोंग लेन पर एक पब बन्द पड़ा था जो बिक रहा था। पॉल ने एजेंट से बारह बजे मिलने का समय तय कर रखा था। इस पब के लिए पॉल उसके साथ आधी हिस्सेदारी में खड़ा होने को तैयार था। इससे अजमेर की पब खरीदने की इच्छा को बल मिला। जब पॉल को इस पब के बिकाऊ होने का पता चला तो वह तुरन्त अजमेर के पास आया था और पब की तारीफें करने लगा था।
यह जो 'थेच्ड हाउस' पब था, यह सिर्फ़ शीला का था। पॉल उसका ब्वॉय फ्रेंड था, पर मालिक की भांति रहता था और इस्तेमाल करता था। शीला को यह पब उसके पहले पति रौबी से तलाक के समय हिस्से के रूप में मिला था। अजमेर को याद था कि पहले इसके मैनेजर जल्दी-जल्दी बदलते रहते थे। पब ढंग से चलता नहीं था। पॉल ने आकर इसे अच्छा-खासा बिजी कर दिया था। पब में उमड़ने वाली भीड़ से अजमेर के बिज़नेस को भी फायदा हुआ था। पब में आए लोग सिगरेट-कंडोम आदि लेने आ जाते। सभी यही कहते थे कि पॉल को बिज़नेस करना आता था।
वे बारह बजे से पहले ही पब के सामने पहुँच गए। एजेंट अभी आया नहीं था। पॉल अजमेर को पब के आसपास का इलाका दिखाने लगा। वैन को घुमाते हुए बोला-
''ऐंडी, देख कितने घर हैं। इनमें कितने लोग रहते हैं। इतनी लम्बी लोंग लेन है पर ये पब यहाँ एक ही था। पब के आगे पॉर्क देख कितना बड़ा... गर्मियों में तो यहाँ इतनी भीड़ होनी चाहिए कि खड़े होने को जगह न मिले। इतना बढ़िया ठिकाना है, पर अगर मैनेजमेंट खराब है तो ठिकाना क्या करेगा। मैं होता इसका मैनेजर तो देखता तू...।''
ऐसी बातें करते हुए वे पब के कार पॉर्क में आ गए। इस्टेट एजेंट भी पहुँच चुका था। उसने उन्हें सारा पब घुमा कर दिखलाया, अन्दर से, बाहर से, नीचे-ऊपर, सेलर और गार्डन। ऊपर फ्लैट में पूरे घर की रिहायश थी। नीचे सेलर इतना खुला था कि स्टॉक रूम बन सकता था। पब का खुला हॉल था। सीटें भी नई थीं। एजेंट हर चीज़ की तारीफ कर रहा था और एजेंट के साथ-साथ पॉल भी ताईद कर रहा था। पब की कीमत दो लाख पाउंड थी जबकि इस इलाके के घरों की कीमत ही ढाई लाख थी। कीमत इसलिए कम थी कि कुछेक काम होने वाला था। कंपनी को बेचने की भी जल्दी थी। कंपनी की नई पॉलिसी के अनुसार बन्द पड़े पब को जल्दी से जल्दी बेचना चाहते थे। एजेंट ने पॉल और अजमेर को सलाह करने के लिए अकेला छोड़ दिया। पॉल बोला-
''ऐंडी, कीमत बहुत जायज है। दो लाख में ऐसी बड़ी प्रॉपर्टी नहीं मिलेगी। यह बार यहाँ से हटा कर दीवार से लगा दी जाए, यहाँ एक तरफ डांस फ्लोर बन जाए, अधिक खर्च करने की ज़रूरत ही नहीं, यह बढ़ईगिरी का काम मैं खुद ही कर लूंगा, बहुत बढ़िया मौका है।''
अजेमर हाँ में सिर हिलाता रहा था। उसने एजेंट से कहा-
''पब हमें पसंद है, अभी और सलाह कर लें। तुम्हें फोन करेंगे।''
''ठीक है, पर कीमत बहुत जायज है। इसमें फ्लैक्सेबिलिटी नहीं है।'' कहता हुआ एजेंट एक तरफ चल दिया और पॉल और अजमेर वैन में आ बैठे। पॉल बोला-
''नो फ्लैक्सेबिलिटी, मॉय फुट। हमारी अपनी प्राइस है, हम अपनी ऑफर देंगे।''
थोड़ा और आगे आकर पॉल ने कहा-
''ऐंडी, पब मुझे चलाना आता है। पब में भीड़ उमड़ती है बैंड के कारण। बढ़िया बैंड हो तो लोग कैसे न आएं। नौजवानों को माडर्न बैंड पसंद है, अधेड़ लोग दूसरी तरह का संगीत पसंद करते हैं और आयरिश लोग कंटरी साइड संगीत को तरजीह देते हैं।''
अजमेर को पॉल की बातें अच्छी लग रही थीं। वह अपना विचार बताते हुए कहने लगा-
''कोई लक्की ड्रा शुरू कर लो, कोई कंपीटिशन आदि।''
''हाँ, बहुत कुछ हो सकता है। पब चलाना कभी भी मुश्किल नहीं। बस ठिकाना बढ़िया हो। चलाने के लिए एक नहीं तो दूसरा तरीका बरता जा सकता है। संगीत नहीं तो स्ट्रिपटीज, दोपहर का खाना भी सहायक होता है। ऐंडी, और भी बहुत से रास्ते हैं, तू मेरे संग खड़ा हो आधी हिस्सेदारी में, हम पब ले लेते हैं।''
''पॉल, सोचते हैं। कुछ और सोच कर इस स्कीम को मैच्योर करते हैं।''
अजमेर इतनी जल्दी हाँ करने वाला नहीं था। उसने पूछा-
''यह पब शीला की नज़र में नहीं पड़ा ?''
''शायद पड़ा हो, शीला में हिम्मत नहीं। उसके बेटा-बेटी तो साथ नहीं देते। ये पब भी मेरे कारण ही चलता है। तुझे बताया था कि मैं अपने भविष्य के बारे में सोचता हूँ, मुझे बच्चा चाहिए जो मेरे खानदान का नाम आगे चला सके और शीला अब इस काबिल नहीं रही।''
अजमेर इस पब की ओर खिंचा जा रहा था। पॉल की बातें उसे सही प्रतीत हो रही थीं। लोंग लेन काफी लम्बी सड़क थी जिस पर अन्य कोई पब भी नहीं था। इसके चल पड़ने के बहुत चांस थे लेकिन पॉल के संग आधे हिस्से वाली बात जच नहीं रही थी। व्यापार में आधा हिस्सा डालना बहुत बड़ी बात होती है। वह पॉल को जानता ही कितना था। पता नहीं, व्यापारिक संबंधों में वह कैसा हो। यह भी सच ही था कि पॉल के पास पब चलाने का हुनर था। यदि वह अकेला ही यह पब खरीद ले तो फिर शायद चले भी न। गोरों का इलाका था। पब का प्बलिक डीलिंग का बिज़नेस होता है। एशियन बन्दे को गोरे पब के मालिक के रूप में देखना पसंद भी करेंगे कि नहीं। कई तरह के ख़याल उसके मन में आ रहे थे। इन ख़यालों में से निकलकर उसने पॉल को कहा-
''दो लाख तो पब का हुआ, ऊपर और कितने लगेंगे ?''
''यही कोई दसेक ग्रैंड, और दो लाख तो वह मांग रहा है, हम ऑफर देंगे...कुछ तो घटायेंगे।''
''ठीक है, कल एक अस्सी की ऑफर दे दें ?''
''बिलकुल ठीक, एक नब्बे में सौदा हो जाने पर दो में पब तैयार।''
''ठीक है, हम वर्क आउट करते हैं कि पल्ले से कितने लगाने हैं और लोन कितना चाहिए।''
''ऐंडी, लोन की कोई प्रॉब्लम नहीं। फ्री होल्ड प्रॉपटी है। एक बैंक मैनेजर मेरा दोस्त है, सत्तर-अस्सी फीसदी कर्ज़ा दे देगा।''
''कर्ज़ा भी हिसाब से ही लेंगे पॉल, अगर डेढ़ लाख कर्ज़ा हुआ तो पचास हजार पास से डालना पड़ेगा।''
बातें करते हुए वे हाईब्री पहुँच गए। पॉल ने वैन अजमेर की दुकान के आगे रोक ली। पॉल ने कहा-
''ऐंडी, अच्छी तरह सोचकर फैसला कर ले। मैं तो बिलकुल तैयार हूँ। पब के काम का तू फिक्र न करना। सारा काम मैं करूँगा, तू बेशक आराम से यह दुकान चलाए जाना।''
''ठीक है पॉल, बाद में बात करते हैं।''
कहते हुए अजमेर उतर गया।
अब अजमेर के मन में हर वक्त पब का भूत सवार रहने लगा। जब से उनके एक गाँववाले ने पब खरीदा था, तब से ही अजमेर भी पब के बारे में सोचने लग पड़ा था। घर पहुँच कर उसने पॉल के संग देखे पब के बारे में बात की। गुरिंदर बेपरवाह-सी बोली-
''मुझे क्या, जैसा मर्जी हो करो। तुम चारो भाइयों ने खुद ही पिये जानी है। आने जाने वाला भी पब में ही उतरेगा।''
''ऐसा नहीं होगा, साथ में गोरा पार्टनर भी तो होगा।''
''गोरा पार्टनर क्यों ? ये गोरे भी कभी किसी के सगे होते हैं।''
यह गोरे पार्टनर वाली बात गुरिंदर को कुनैन की तरह लगी। अजमेर ने सोचा कि उसके संग बात करने का कोई फायदा नहीं। वह किसी न किसी के संग बात करनी चाहता था। अगर टोनी के साथ बात करता तो उसने सबको बताकर पहले ही शोर मचा देना था। शिन्दे के बारे में वह सोचता कि इसे यहाँ के व्यापार की क्या समझ हो सकती है। वह सतनाम की तरफ चल पड़ा। उसके संग यह सब साझा किया जा सकता था। वह कोई सलाह भी दे सकता था। रास्ते में जो भी पब आता, उसे वह बहुत गौर से देखता। लोंग लेन वाला पब इनमें से सबसे सुन्दर लगता।
जब वह पहुँचा, सतनाम फुरसत-सी में ही खड़ा मिला। अजमेर ने सारी कहानी बताई। वह उसके संग पब देखने के लिए लोंग लेन की तरफ चल पड़ा। पब उसे भी बहुत पसंद था। उसने कहा-
''भाई, बाकी तो सब ठीक है, पर यह पॉल के आधे वाली बात सही नहीं।''
''वह कैसे ?''
''मुझे यह आदमी ज़रा डौजी लगता है, उधर तो शीला रखी हुई है, इधर यह लिन के साथ रहता है। मैं उस लड़की को जानता हूँ। अब तो शायद प्रैगनेंट ही हो, कुछ दूसरे ढंग से ही चला करती है।''
''हो सकता है, शीला से इसकी बनती नहीं, बच्चे के लिए तरस रहा है।''
''बस फिर, शीला बांझ है और इसने लिन को रख लिया है और अब यह थैच्ड हाऊस में से मूव होने के चक्कर में है। और यह नया पब इसके लिए बढ़िया मौका है।''
''इससे हमें क्या मतलब। हमें तो यह देखना है कि यह अपने कितना काम आ सकता है, आ भी सकता है कि नहीं।''
''भाई, तू अकेला ले।''
''इस बारे में भी मैंने बहुत सोचा है। एक तो गोरों का इलाका है, दूसरा इस काम की हमें अभी समझ भी नहीं है।''
''बात तो ठीक है, डेढ़ लाख पाउंड की किस्त कितनी आएगी महीने की ?''
''पंद्रह सौ पाउंड के करीब आएगी। मैं सोचता हूँ कि अगर पब अपनी किस्त ही निकाले जाए तो बहुत है। बीच में पड़कर काम का भी पता चल जाएगा। अगर पॉल ठीक चला तो ठीक, नहीं तो उसका हिस्सा देकर एक तरफ करेंगे।''
''ठीक है फिर, ले लो रिस्क।'' सतनाम ने कहा।
अजमेर का पक्का मन बन गया। उसने एजेंट को फोन किया। जैसा पॉल और उसने सोचा था, एक लाख नब्बे हजार में सौदा हो गया। एजेंट ने सौदे के तय हो जाने के कारण हज़ार पाउंड डिपाज़िट के तौर पर मांग लिया और कहा कि जल्दी ही चैक भेज दो ताकि किसी दूसरे ग्राहक को यह पब न दिखाया जाए।
अजमेर अब स्वयं को पब का मालिक समझने लगा था। पब का मालिक बन जाने से उसका मान और बढ़ जाना था। पब का नाम ही बड़ा होता है। पब भी फिंचली में जहाँ के घरों की कीमत आम इलाकों से अधिक हैं। शाम को वह थैच्ड हाऊस में बैठा पॉल से बीयर पीता रहा और भविष्य के प्रोग्राम बनाता रहा।
अगली दोपहर वह काउंटर पर खड़ा था। शिन्दा ऊपर रोटी खाने गया हुआ था। शीला कुछ लेने के लिए दुकान में आई और व्यंग्य में बोली-
''ऐंडी, पब का सौदा हो गया ?''
''हाँ, हो गया। हज़ार पाउंड का चैक एजेंट को भेजना है, बस आज भेज देंगे।''
''ऐंडी, पब वह बढ़िया है, मैंने भी देखा था।''
''फिर तूने क्यों नहीं खरीद लिया ?''
''मैं अकेली हूँ, किधर-किधर होऊँगी। मेरा बेटा-बेटी तो चले गए, यह पॉल भी भरोसे वाला आदमी नहीं, तू भी इससे बचकर रहना।''
''वह कैसे ?''
''देख ऐंडी, तुझे बात साफ़ कर दूँ। इसके पास कोई पैसा-वैसा नहीं है, बिलकुल नंग है। यह चाहता है कि कैश में सारे पैसे तू दे और वह मुफ्त में ही आधे का मालिक बन जाए।''
''यह कैसे हो सकता है। अगर आधे की हिस्सेदारी करनी है तो कैश भी आधा देना पड़ेगा।''
''कितना कैश होगा ?''
''पच्चीस-पच्चीस हज़ार दोनों के हिस्से आएगा।''
''इसके पास तो पाँच सौ पाउंड भी नहीं होगा, इसने बाहर कोई औरत रख रखी है, अपनी सारी तनख्वाह और पब में से पैसे निकाल-निकाल कर उसे खिलाए जाता है... अगर इसके पास पच्चीस हज़ार हो तो मैं न इसे हिस्सेदार रख लेती।''
अजमेर को जैसे साँप सूंघ गया हो। शीला जाते हुए बोली-
''ऐंडी, तू मेरा अच्छा पड़ोसी है, मेरा फर्ज़ है - तुझे आगाह करना, बाकी तू अपनी मर्जी कर।''
शीला एक ही झटके से उसका पब का सपना चकनाचूर कर गई। वह ठगा हुआ खड़ा था। तब तक शिन्दा भी दुकान में आ गया। अजमेर को घबराया हुआ देखकर उसे चिंता हुई। उसने सोचा कि कोई दुकान में से चोरी करके भाग गया है। घंटेभर पहले जब वह दुकान में अकेला था तो एक गोरा लड़का बीयर की बोतल चुरा कर ले गया था। शिन्दा अजमेर को बताने लगा-
''भाजी, आज तो कमाल हो गई। एक गोरा आया, मैं गल्ले पर खड़ा था, उसने फुर्ती से बोतल उठाई और दरवाजा खोल कर भाग गया।''
अजमेर ने उसकी बात सुनी और गुस्से में उबलने लगा और बोला-
''और तू खड़ा देखता रहा ! तुझे तनख्वाह मैं ऐसी चोरियाँ करवाने की देता हूँ ?''
(जारी…)
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