रविवार, 10 अक्टूबर 2010

धारावाहिक पंजाबी उपन्यास(किस्त- 30)



सवारी
हरजीत अटवाल
हिंदी अनुवाद : सुभाष नीरव

॥ पैंतीस ॥
बलदेव काम पर से बाहर निकला तो पानी बरस रहा था। बारिश के कारण ठंड भी बहुत थी। उसने सिर पर कैप लगा ली ताकि ऐनक बारिश से बची रहे। बड़ी जैकेट के कॉलर खड़े किए और थेम्ज़ के किनारे की तरफ चल पड़ा। थेम्ज़ के साथ-साथ चलता वह सोचने लगा कि यह दरिया इस समय चढ़ रहा था या उतर रहा था। एक तो वैसे ही अँधेरा अच्छी तरह उतर चुका था, फिर बारिश इर्द-गिर्द की रोशनियों को रोक रही थी। दरिया की गति का कुछ पता न चल सका। हल्की-सी लहरें चमकतीं और एक-दूसरी में समा जातीं। दरिया किनारे इस वक्त कोई भी नहीं था। कारें गुजर रही थीं जो कि थोड़ा हटकर थीं। और वह अपने आप को बहुत अकेला पा रहा था।
मैरी ने टैड और मिच्च के आने की ख़बर सुनाई तो वह उसी वक्त अगले पड़ाव के लिए तैयार होने लगा था। सारा दिन काम पर इन्हीं सोचों में गुम हुआ घूमता रहा था। मैरी का इसमें कोई कसूर नहीं था। वह तो आयरलैंड से लौटते ही उसे इशारे करने लग पड़ी थी। जैसे वह कई बार स्थिति को स्पष्ट करने से झिझकता था, इसी तरह मैरी ने किया। जो कुछ भी हुआ, पर एक बार फिर वह हार गया था। इस हार को लेकर वह कहाँ जाए। गुरां के पास तो वह जाएगा ही नहीं। गैरथ का फ्लैट उसे पसन्द नहीं था, बदबू जो मारता था। शौन भी यहाँ नहीं था। शौन ने तो पलटकर फोन तक नहीं किया था कि कहाँ था वह और किस हालत में था।
बारिश कुछ तेज हो गई। उसने वैस्ट मनिस्टर ब्रिज पार कर लिया और अंडर ग्राउंड स्टेशन में जा घुसा। यहाँ गरमाहट थी। जैकेट उतार कर पानी झाड़ा। कैप को भी उतार कर फटका। ऐनक साफ की और एस्कालेटर से नीचे उतर गया। ट्यूब पकड़कर वह टफनल पॉर्क आ गया। उसने डार्टमाउथ हाउस की तरफ चलना आरंभ कर दिया। बरसात थम चुकी थी। एस्टेट के अन्दर आकर उसने मैरी के फ्लैट की ओर देखा। बत्तियाँ जल रही थीं। टैड और मिच्च आ गए होंगे। वह शीघ्रता से अपनी कार में बैठ गया। यह शुक्र था कि किसी ने उसे देखा नहीं था। कार स्टार्ट करके वह मेन रोड पर आ गया। अब स्टेयरिंग किसी तरफ नहीं घूम रहा था। गर्मी के दिन होते तो वह पहले की भांति कार पॉर्क में जाकर सो जाता। उसे ख़याल आया कि कोई बैड एंड ब्रेकफास्ट ही खोजा जाना चाहिए। वह कैमडन रोड पर आ गया। यहाँ कुछ बैड और ब्रेकफास्ट थे। कई लोगों ने विक्टोरियन हाउसिज़ को तब्दील करके होटल बना लिए थे। कैमडन रोड के घर कुछ-कुछ क्लैपहम हाई रोड के घरों से मिलते जुलते थे। यहाँ एलीसन रहती थी। फिर उसने सोचा, क्यों न वह एलीसन को फोन करे। शौन के विषय में ही पूछे। उसने एक टेलीफोन बूथ के आगे कार रोकी। पहले कुछ 'बैड एंड ब्रेकफास्ट' को फोन करके उनसे रात के लिए कमरे का किराया पूछा और हफ्तेभर के किराये के बारे में भी पूछताछ की। सभी मंहगे थे। फिर उसने एलीसन को फोन घुमा दिया।
''एलीसन, मैं डेव, शौन का दोस्त।''
''हाँ, शौन का फोन आया था, तेरे बारे में पूछता था।''
''कहाँ है वो ?''
''अमेरिका में ही है अभी वह। न्यूजीलैंड जाने की तैयारी में है।''
''मैं शौन के बारे में सोच रहा था कि तेरा ख़याल आ गया।''
''मैं तो तेरे फोन का बहुत दिनों से इंतज़ार कर रही थी। अगर मेरे पास तेरा नंबर होता तो मैं कर लेती। एक तो तेरी डाक आई पड़ी है, दूसरा यदि तेरा रहने का इंतज़ाम अभी नहीं हुआ हो तो तू यहाँ अस्थायी तौर पर रह सकता है।''
''डाक लेने कब आऊँ ?''
''आज ही आ जा।''
''तेरे लिए अब लेट तो नहीं ?''
''नहीं, लेट कैसा... तेरी मर्जी है।''
फोन रखकर वह सोचने लग पड़ा कि नया दरवाजा खुलता प्रतीत हो रहा है। उसकी कार एलीसन के घर की तरफ दौड़ती रही और वह सोचता रहा कि वह एलीसन के यहाँ ही रुक जाए या कोई दूसरा प्रबंध करे। एलीसन के द्वार तक पहुँचते-पहुँचते वह पूरी तरह तय नहीं कर सका था कि उसे क्या करना चाहिए। उसने बेल बजाई। फेह ने दरवाजा खोला और पूछने लगी-
''तुम डेव हो ?''
''हाँ, तुम्हें कैसे पता ?''
''उस दिन शौन अंकल के साथ आए थे तो मम्मी भी तेरे बारे में बातें करती थी।”
तभी, रसोई में से एलीसन भी आ गई और टेलीविजन के सामने से उठकर नील भी। एलीसन बोली-
''तू तो बहुत ही थका थका-सा लगता है। ठीक तो है ?''
''हाँ, मैं ठीक हूँ। तू कैसी है ?''
''मैं भी ठीक हूँ। आ बैठ जा। मैं कैटल ऑन करती हूँ।''
कुछ ही मिनट में वह चाय बना लाई। कप उसके हाथ में थमाते हुए बोली-
''संग कुछ खाएगा ?''
''नहीं।''
''डिनर करेगा ?''
''तुमने खा लिया ?''
''बच्चे तो खा चुके हैं। तू बता, खाना है तो चिप्स और पाई हैं।''
''हाँ, खा लूँगा।''
बलदेव चाय की चुस्कियाँ लेने लगा। एलीसन ने पुन: पूछा-
''डेव, तू ठीक तो है ?''
बलदेव अपने हाथों की ओर देखता हुआ कहने लगा-
''हाँ, मैं ठीक हूँ। यह मौसम खराब है।''
''रहने की समस्या है तो एक कमरा खाली ही है।''
''एलीसन, मैं यहाँ सैटी पर ही काम चला लूँगा।''
''नहीं, तू ऊपर आराम से सोना। मैं तो पहले से ही बच्चों के कमरे में ही सोती हूँ।'' कहती हुई वह उठ कर ऊपर चली गई। कुछ देर बार लौटकर आई और बोली-
''तेरा कमरा तैयार है, तू जब चाहे जाकर सो सकता है।''
''और शौन क्या बात करता था फोन पर ?''
''कुछ खास नहीं, तेरे भाई के घर उसने फोन करके तेरे बारे में पूछा था। तेरी बहुत फिक्र करता था।''
''दोस्त जो हुआ, हम बहुत समय से इकट्ठे हैं।''
''डेव, देख उसकी बदकिस्मती... कैसी पत्नी मिली। कैरन तेरे मुल्क की ही है न ?''
''नहीं, मॉरीशस की है। हाँ, मेरे रंग की ज़रूर है।''
''एक ही बात है... शौन बताता था कि वहाँ भी सब इंडियन ही हैं।''
''हाँ।''
''डेव, असल में मैं कैरन की समस्या को थोड़ा-थोड़ा समझती हूँ, उसे शौन पर बहुत आशाएँ थीं।''
''हाँ, शौन ने भी उसके लिए बहुत कुछ किया है, उसकी हर ख्वाहिश पूरी करने की कोशिश की है।''
''डेव, मुझे लगता है, कैरन को इस विवाह से जो वह चाहती थी, उसे मिला नहीं।''
''एलीसन, यह भी हो सकता है पर दोनों के स्वभाव की समस्याएँ भी हैं।''
''जो भी हो, पर देख शौन की तकदीर, कहाँ-कहाँ भटकता घूम रहा है इस वक्त, अपना घरबार छोड़कर। उसकी बेटी की बेकद्री हो रही है।''
कहते हुए एलीसन ने आँखें भर लीं। वह शौन की चिंता करती जा रही थी या फिर पैटर्शिया की। कैरन से उसकी अधिक हमदर्दी नहीं थी। एलीसन पूछने लगी-
''तू कैरन से कभी मिला है ?''
''नहीं।''
''डेव, मैं कैरन से मिली थी। शौन कहता था कि सब कुछ देखकर आऊँ। फॉदर जॉअ उसकी मदद कर रहा है। शौन में ही सब लोग दोष निकाल रहे हैं। वह अपनी जिम्मेदारी से भाग गया, यह सच्चे क्रिश्चियन को शोभा नहीं देता। मैं तो यही प्रार्थना करती हूँ कि वह अपने घर लौट आए।''
कहकर वह उठी और बच्चों को सोने की हिदायतें देनी लगी। तीन चार बोतलें लाकर बलदेव के सामने रखते हुए कहने लगी-
''ये सब शौन की पड़ी हैं, मैं तो पीती नहीं, तूने जो पीनी है, पी ले।''
''मैं नहीं पीता, कोई साथ अगर दे तो कभी कुछ ले लेता हूँ।''
''तेरा साथ ज़रूर दूँगी पर बहुत छोटी ड्रिंक के साथ।''
गिलासों में वोदका उंडेलता बलदेव एलीसन के बारे में सोचने लगा। मैरी से काफ़ी भिन्न थी वह। शरीर उससे अधिक गुदगुदा था। पीछा भी मैरी जितना तराशा हुआ नहीं था। घुंघराले भूरे बालों को कर्ल डाले हुए थे। एक लट रह-रह कर उसके चेहरे पर गिर रही थी जिसे वह झटक देती। बलदेव उसकी तरफ चोर निगाहों से देखता तो उसे अपनी ओर गौर से देखता हुआ पाता। बलदेव के मन में बेचैनी-सी होने लगती। मैरी का चेहरा उसके मन में से गायब हो रहा था। उसकी जगह एलीसन की सूरत उभरने लगी। वह हैरान था कि यह तो स्विच ऑन-ऑफ़ करने भर की ही देर लगी थी। शायद, यह नशे का सुरूर भी हो। जो भी था उसे अच्छा लग रहा था। उसने एलीसन से कहा-
''मैं नहीं जानता था कि शौन की बहन इतनी खूबसूरत है।''
''तू तब आया तो था।''
''पर मैं तेरी तरफ ध्यान से देख नहीं सका था।''
एलीसन कुछ शरमाकर कहने लगी-
''शौन, मेरा भाई मुझ पर बहुत हुक्म चलाता है। जिस दिन तुम दोनों आकर लौट गए थे, उस दिन गुस्से से भरा फोन आया कि मैं तेरे लिए इतना सुन्दर मर्द खोजकर लाया और तूने उसे ठीक से बुलाया भी नहीं। अब फोन पर भी यही झगड़ा करता था कि मुझे तेरे से अच्छा मर्द नहीं मिल सकता।''
''तू क्या कहती है फिर ?''
''ठीक है, देखने में तो ठीक है, दिल को लुभाता है पर इतनी जल्दी मैं क्या कह सकती हूँ।''
बलदेव के वह एकदम सामने बैठी थी। बलदेव ने उसकी तरफ हाथ बढ़ाया। उसने उसके हाथ पर अपना हाथ रख दिया। बलदेव ने उसे खींच कर अपने संग बिठा लिया और कहा-
''एलीसन, अब बता मेरे बारे में और क्या सोचती है ?''
''अभी मेरा कोई तर्जुबा नहीं, कल बताऊँगी।''
(जारी…)
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साउथाल, मिडिलसेक्स
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शनिवार, 11 सितंबर 2010

गवाक्ष – सितम्बर 2010



“गवाक्ष” ब्लॉग के माध्यम से हम हिन्दी ब्लॉग-प्रेमियों को हिन्दी/पंजाबी के उन प्रवासी लेखकों/कवियों की समकालीन रचनाओं से रू-ब-रू करवाने का प्रयास करते आ रहे हैं जो अपने वतन हिन्दुस्तान से कोसों दूर बैठकर अपने समय और समाज के यथार्थ को अपनी रचनाओं में रेखांकित कर रहे हैं। “गवाक्ष” में अब तक पंजाबी कवि विशाल (इटली) की कविताओं का हिन्दी अनुवाद, दिव्या माथुर (लंदन) की कहानी, अनिल जनविजय (मास्को) की कविताएं, न्यू जर्सी, यू.एस.ए. में रह रहीं देवी नागरानी की ग़ज़लें, लंदन निवासी कथाकार-कवि तेजेन्द्र शर्मा, रचना श्रीवास्तव, दिव्या माथुर की कविताएं, दुबई निवासी पूर्णिमा वर्मन की कविताएं, यू एस ए में रह रहीं हिन्दी कथाकार-कवयित्री इला प्रसाद, डेनमार्क निवासी कवि भगत धवन की कविताएँ और चाँद शुक्ला की ग़ज़लें, यू एस ए निवासी कवि वेद प्रकाश ‘वटुक’ तथा कवयित्री रेखा मैत्र की कविताएं, कनाडा अवस्थित पंजाबी कवयित्री तनदीप तमन्ना की कविताएं, यू के अवस्थित हिन्दी कवि-ग़ज़लकार प्राण शर्मा की ग़ज़लें, कैनेडा में अवस्थित पंजाबी कवि सुखिन्दर की कविताएं, कनाडा निवासी पंजाबी कवयित्री सुरजीत, अमेरिका अवस्थित डॉ सुधा धींगरा, कनाडा में अवस्थित हिंदी- पंजाबी कथाकार - कवयित्री मिन्नी ग्रेवाल की कविताएं, न्यूजीलैंड में रह रहे पंजाबी कवि बलविंदर चहल की कविता, कैनेडा में अवस्थित पंजाबी लेखिका बलबीर कौर संघेड़ा की कविताएं, इंग्लैंड से शैल अग्रवाल की पाँच कविताएं, सिंगापुर से श्रद्धा जैन की ग़ज़लें, इटली में रह रहे पंजाबी कवि विशाल की कविताएं, यू एस ए में रह रहीं हिन्दी कथाकार-कवयित्री इला प्रसाद की एक लघुकथा, कैनेडा निवासी पंजाबी कवि डा. सुखपाल की कविता, यू.एस.ए. में अवस्थित हिंदी कवयित्री डॉ. सुधा ओम ढींगरा की कविताएं, यू.एस.ए. में अवस्थित पंजाबी कवि-कथाकार प्रेम मान की पंजाबी कविताएं, इकबाल अर्पण की एक ग़ज़ल और पंजाबी कथाकार-उपन्यासकार हरजीत अटवाल के उपन्यास “सवारी” के हिंदी अनुवाद की अट्ठाइसवीं किस्त आपने पढ़ीं। “गवाक्ष” के सितम्बर 2010 अंक में प्रस्तुत हैं - कैनेडा निवासी सुश्री मीना चोपड़ा की कविताएं तथा यू.के. निवासी पंजाबी कथाकार-उपन्यासकार हरजीत अटवाल के धारावाहिक पंजाबी उपन्यास “सवारी” की उन्तीसवीं किस्त का हिंदी अनुवाद…
कैनेडा से
मीना चोपड़ा की तीन कविताएं
(कविताओं के संग सभी चित्र : मीना चोपड़ा)

दुशाला

अँधेरों का दुशाला
मिट्टी को मेरी ओढ़े
अपनी सिलवटों के बीच
खुद ही सिमटता चला गया
और कुछ झलकती
परछाइयों की सरसराहट,
सरकती हुई
इन सिलवटों में
गुम होती चली गयी
मेरी नज़रों में सोई हुई
सुबह के कुछ आंसू
आँखों के किनारों से छलक पड़े

देखो तो सही
पूरब की पेशानी से उगती
मखमली रोशनी के उस टुकड़े ने
हरियाली के हसीन चेहरे पर
यह कैसी शबनम बिखेर दी है?
शाम के वक़्त
जो शाम के प्याले में भरकर
अँधेरी रात के नशीले होंठों का
जादूई जाम बना करती है
०
सर्द सन्नाटा

सुबह के वक़्त
आँखें बंद कर के देखती हूँ जब
तो यह जिस्म के कोनो से
ससराता हुआ निकल जाता है
सूरज की किरणे चूमती हैं
जब भी इस को
तो खिल उठता है यह
फूल बनकर
और मुस्कुरा देता है
आँखों में मेरी झांक कर

सर्द सन्नाटा
कभी यह जिस्म के कोनो में
ठहर भी जाता है
कभी गीत बन कर
होठों पे रुक भी जाता है
और कभी
गले के सुरों को पकड़
गुनगुनाता है
फिर शाम के
रंगीन अँधेरों में घुल कर
सर्द रातों में गूंजता है अक्सर
सर्द सन्नाटा

मेरे करीब
आ जाता है बहुत
बरसों से मेरा हबीब
सन्नाटा
०
मुट्ठी भर आरज़ू

जीवन ने उठा दिया
चेहरे से अपने
शीत का वह ठिठुरता नकाब
फिर उसी गहरी धूप में
वही जलता सा शबाब
सूरज की गर्म साँसों में
उछलता है आज फिर से
छलकते जीवन का
उमड़ता हुआ रुआब

इन बहकते प्रतिबिम्बों के बीच
कहीं यह ज़िंदगी के आयने की
मचलती मृगतृष्णा तो नहीं?

किनारों को समेटे जीवन में अपने
कहीं यह मुट्ठी भर आरज़ू तो नहीं?
००
मीना चोपड़ा
जन्म : नैनीताल (उत्तर प्रदेश)।
शिक्षा : बी.एस सी. (लखनऊ), टेक्सटाइल डिज़ाइनिंग में शिक्षा ।
प्रकाशन : पहला अंग्रेज़ी कविताओं का संकलन ’इग्नाइटिड लाईन्स’ १९९६ में इंग्लैंड में लोकार्पित हुआ। कविताओं का अनुवाद जर्मन भाषा में । कविताएँ अनेक राष्ट्रीय एवं अन्तर्राष्ट्रीय साहित्यिक पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित।
कला और अन्य गतिविधियाँ : एक कवयित्री होने के साथ-साथ एक चित्रकार भी हैं। अब तक राष्ट्रीय एवं अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर २५ से अधिक कला-प्रदर्शनियाँ लगा चुकी हैं। इन्होंने २००२ में ’साऊथ एशियन ऐसोसिएशन ऑफ़ रीजनल कोऑपरेशन’ द्वारा आयोजित कलाकारों की सभा में भारत का प्रतिनिधित्व किया।
मीना चोपड़ा कला-क्षेत्र में हमेशा से ही बहुत क्रियाशील रही हैं। भारत में "पोइट्री क्लब" की सचिव रही हैं। इसके अतिरिक्त कई व्यापारिक एवं कला संस्थाओं की सदस्या भी रह चुकी हैं। भारतवर्ष में इनका व्यवसाय "एडवर्टाइज़िंग" रहा है, जहाँ यह अपनी एडवर्टाइज़िंग एजेन्सी का संचालन करती रही हैं।
कैनेडा आने के बाद इन्होंने कई कलाकारों और कला प्रेमियों को संगठित कर एक कला संस्था का निर्माण किया, जिसका उद्देश्य भिन्न-भिन्न, जन-जातियों के लोगों को कला के द्वार समान स्थल पर लाकर जोड़ना, आपस की भावनाओं और कामनाओं को कला के द्वारा समझना और बाँटना है। कला जो हमेशा से सीमाओं में बंधती नहीं, उसे सीमाओं से आगे ले जाना ही इस संस्था का उद्देश्य है। इस संस्था को "क्रॉस-करंट्स इंडो-कनेडियन इंटरनेशनल आर्टस’ के नाम से जाना जाता है। यह संस्था २००५ से लगभग दस से अधिक कला समारोह एवं प्रदर्शनियाँ आयोजित कर चुकी है।
मीना चोपड़ा के बनाये हुए चित्र भारत तथा कई अन्य देशों में सरकारी, व्यवसायिक तथा संग्रहकर्ताओं के कला संग्रहों में हैं।
टेलीफोन : 905 819 8142
वेबसाइट्स :
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धारावाहिक पंजाबी उपन्यास(किस्त- 29)


सवारी
हरजीत अटवाल
हिंदी अनुवाद : सुभाष नीरव

॥ चौंतीस ॥

लॉरी से सामान उतरवा कर सतनाम और शिन्दा खड़े हुए ही थे कि मगील आ गया। दूर से ही बोला-
''सॉरी सैम, आज मुझे पता था कि शैनी भी आ जाएगा, काम थोड़ा ही हिस्से में आएगा, पर मेरे से पहुँचा नहीं गया।''
''क्या बात हो गई ?''
''मरीना... मेरी बेटी मरीना ने सारी रात मुसीबत डाले रखी।''
''क्या ?''
''बगैर किसी बात के झगड़ा। तू तो जानता ही है न इन औरतों को... जिन दिनों में इन्हें गुस्सा आता है, बस वही दिन चल रहे हैं। और उसका ब्वॉय फ्रैंड कई दिन से आया ही नहीं, बस यही मुसीबत है।''
''यू आर बास्टर्ड लौरल !... गेट लॉस्ट एंड डू समथिंग।''
सतनाम ने उसे धमकाते हुए काम पर लगा दिया।
शिन्दे का आज पहला दिन था सतनाम की दुकान पर। मगील उसका गाईड बन गया। छुरियाँ तीखी करने से लेकर आरी चलाने तक की ट्रेनिंग देने लगा। उसे था कि शिन्दे को अंग्रेजी नहीं आती। वह मुँह से कम बोलता और इशारे ज्यादा करता। वह उंगलियाँ दिखाते हुए बोला-
''छुरी ध्यान से... नहीं तो ये गईं... ये दो उंगलियाँ बहुत ज़रूरी, किसी को 'फक ऑफ' कहने के लिए... बीचवाली उंगली गुदा दिखाने के लिए।''
शिन्दा उसकी एक्टिंग पर हँसने लगा। मगील ने कहा-
''हँस मत। ध्यान से समझ, नहीं तो ग्राहक लैंब के साथ-साथ तेरी उंगलियाँ भी पका लेंगे।''
''मगील, तू मेरी ज्यादा चिंता मत कर।''
शिन्दे ने अंग्रेजी में कहा। मगील भड़कता हुआ बोला-
''मेरी इतनी मगजमारी यूँ ही करवाई। अगर तू समझता था तो बताया क्यों नहीं?''
पैट्रो ने शिन्दे को अपने पास बुलाते हुए कहा-
''शैनी, तू इधर आ, एक दिन में कुछ नहीं सीखा जाता, जल्दी मचाने की कोई ज़रूरत नहीं।''
फिर पैट्रो उसे मीट काटने के प्रारंभिक गुण बताने लगा कि मीट जोड़ों पर से आसानी से काटा जाता है। हड्डी वाले मीट पर इस तरह वार करना है कि एक ही वार में हड्टी कट जाए। सूअर की कटाई अलग और बीफ़ तथा लैंब की कटाई अलग। चिकन अलग। गर्दन और पूछ की कटाई में कैसे फर्क होता है,आदि। शिन्दा कहने लगा-
''पैट्रो, यह तो बहुत कारीगिरी का काम है।''
''और नहीं तो क्या। आज कल बुच्चरों की कमी इसी कारण ही है। यह बहुत स्किल्ड जॉब है।''
शराब की दुकान से यह काम बिलकुल अलग था। शिन्दे को अच्छा नहीं लग रहा था। लहू-मांस की बदबू नाक को चढ़ रही थी। हाथ भी लिबड़े से रहते। सफ़ेद रंग का कोट जल्द ही लाल रंग से भर जाता। कुछ दिन घिन्न-सी आती रही और फिर सब कुछ ठीक हो गया। दुर्गन्ध आनी भी बन्द हो गई। काम हालांकि अजमेर की दुकान से अधिक था, पर माहौल बहुत बढ़िया था। कोई किसी को चुभती हुई बात नहीं कहता था। कोई रौब नहीं डालता था। दिन भर हँसी-मजाक चलता रहता।
दोपहर को जुआइश आकर अपनी ही हाय-तौबा मचाने लगी। पहले दिन शिन्दे को उसने गाहक ही समझा था। जुआइश को देखते ही मगील कहने लगा था-
''सैनोरीटा, तेरे दुख के दिन दूर हो गए, अब तू खुश हो जा।''
''सैनिओर, तू मेरे लिए क्या खोजकर लाया है ?''
''ये देख, जवान लड़का, शैनी, सिर्फ़ तेरे लिए मंगवाया है।''
''पर सैनिओर, मैं तो तुझे पसन्द करती हूँ।''
''पर मेरा हरम इस वक्त भरा पड़ा है, शैनी से ही काम चला। देख इसकी जवानी।''
कहते हुए मगील शिन्दे की बाजू की मछलियों पर हाथ फेरने लगा। जुआइश शिन्दे से बोली-
''मैंने तुझे ऐंडी की दुकान पर देखा हुआ है।''
''मेरा बड़ा भाई जो है।''
''पर उसका स्वभाव सैम से एक दिन उलट है, हर वक्त खीझा ही रहता है।''
शिन्दे ने जुआइश की इस बात का कोई जवाब नहीं दिया। जुआइश मिनट भर प्रतीक्षा करके बोली-
''मैं नोइल रोड पर रहती हूँ, होर्नज़ी रोड से ऑफ़ है, ब्रिज के बाद। दोपहर-शाम यहाँ सफाई करती हूँ, सवेरे भी।''
कहकर वह अपने काम में लग गई थी।
पहले दिन ही सतनाम ने शिन्दे का हाथ देख लिया था कि वह काम में तेज था। वह सोचने लग पड़ा था कि अगर शिन्दा दुकान संभाल ले तो वह काम को थोड़ा बढ़ा ले। कुछ और रेस्ट्रोरेंट वगैरह को माल सप्लाई करने लग पड़े। वह पूरा दिन ही डिलवरी कर सकता था। होलसेल के काम के विषय में भी सोचा जा सकता था। साथ ही फ्रोजन मीट का भी काम चल सकता था। अब उसे पीछे की चिंता सताने लगी थी कि दुकान में सब ठीक ही हो। माइको को जुआ खेलने की आदत होने के कारण उसके द्वारा टिल्ल में से पैसे निकाल लेने का डर बना रहता। यद्यपि पैट्रो वहाँ था, फिर भी सतनाम को पीछे की फिक्र रहती ही थी। शिन्दा अब टिल्ल संभाल सकता था। वह सोच रहा था कि यदि शिन्दा टिक जाए तो उसके कितने ही मसले हल हो जाएँ।
दुकान बन्द करके सतनाम शिन्दे को अजमेर की ओर छोड़ने चला गया। अजमेर के साथ यही फैसला हुआ था कि शिन्दा अजमेर के पास ही रहता रहेगा। इतवार को उसकी दुकान संभालेगा। सतनाम तो पहले ही शिन्दे को अपने पास नहीं रख सकता था। मनजीत इन्कार किए जाती थी। उसे पता था कि मनजीत आई पर आ जाए तो अपनी बात मनवा कर ही हटती थी। सतनाम की दुकान से ही शिन्दा थका हुआ था। लेकिन वह दुकान में घुसते ही शैल्फों को भरने लग पड़ा। फ्रिज को देखने लगा कि ड्रिंक का कौन सा डिब्बा बिका ताकि उसकी जगह नया रख दे। टोनी बोला-
''शैनी, तू फिक्र न कर। मैंने सारा काम किया हुआ है।''
अजमेर अधिक खुश नहीं था। शिन्दा भी जानता था कि वह उसे सतनाम की ओर भेजकर दुखी था। उसे पचास पाउंड में ही इस्तेमाल करना चाहता था। सतनाम उसके मूड को ठीक करने के मकसद से कहने लगा-
''भाई, शिन्दा पुत तो बन गया पूरा झटकई, अब बेशक माहिलपुर के अड्डे में दुकान डाल ले। भाइया आज होता तो कितना खुश होता। उस नज़ीर हुसैन ने ऊपरवाले का शुक्रिया अदा करने से ही बाज नहीं आना था।''
''हाँ, तुम मुझे झटकाई बनाकर ही खूब खुश किए जाओ।''
अजमेर का मूड ज़रा-सा बदला पर फिर सख्त हो गया। अब तक शिन्दा भी समझ चुका था कि अजमेर कैसी बातों से मूड में आया करता है। उसने कहा-
''झटकाई तो कोट वाला रतना बाज़ीगर है, कभी उसने बकरी नहीं बनाई, सदा बकरा ही झटकेगा... भाई के विवाह पर भी बकरे उससे ही लिए थे।''
''उस समय तो बताते हैं, तुमने बकरे ही कई झटक दिए थे।'' कहते हुए सतनाम ने अजमेर की तरफ देखा।
''भाई का विवाह था, झटकने ही थे, झटके भी हमने शर्तें लगा-लगा कर कि देखें एक ही वार में गर्दन कौन उतारता है।''
''उतारी किसी ने ?''
''नहीं, बलदेव ने कई वार किए, बकरा ‘में-में’ करके चीखे, मैंने दो वार करके उतार दिया था। इस भाई ने तो सींगों पर ही किरपाण जड़ दी।''
''यूँ ही शराबी हुए शरारतें करते थे, और क्या।'' अजमेर बोला।
सतनाम कहने लगा, ''तुमने विवाह पर खर्चा ही बहुत कर दिया। ड्रम शराब का निकाल लिया, ठेके से भी बोरियाँ मंगवा लीं, गाँव के सारे कुक्कड़ खत्म कर दिए। इतनी भी भला क्या ज़रूरत थी।''
''ओ एक ही बार तो विवाह करवाना था। अगर तू भी वहाँ विवाह करवाता तो ऐसे ही धूमधाम से करते। इस शिन्दे का ज़रा पहले करना पड़ा, नहीं तो उस वक्त भी पटाखे बजाने थे।''
अजमेर अब पूरे रौ में था। शिन्दा कहने लगा-
''मैंने तो उस वक्त भाई को कहा था भई गाने वाली बुला लेते हैं, ऐसी क्या बात है।''
अजमेर ने फ्रिज में से टेनंट का डिब्बा निकाला और सबको थमाते हुए बोला-
''अपना रेपुटेशन है यार, ताया ने नाम कमाया हुआ है, ये गाने वाली तो हल्का टेस्ट है।''
फिर वह शिन्दे से कहने लगा-
''तू जा कर सो जा, सवेरे फिर जल्दी उठेगा।''
''नहीं भाई, कुछ नहीं होता। घंटे भर बाद ठहर कर पड़ लूँगा।''
शिन्दे के कहने पर अजमेर और भी खुश हो गया। सतनाम को तसल्ली थी कि अजमेर ने सब मंजूर कर लिया था। अजमेर ने कहा-
''गिलास पीना है ?''
''नहीं भाई, चलता हूँ, वहाँ भी जनता पार्टी इंतज़ार करती होगी। श्रीदेवी तो ललिता पवार बन जाएगी।''
शिन्दा अभी भी अजमेर के विवाह में फंसा बैठा था। वह कहने लगा-
''मैंने तो बलदेव से कहा था कि भाई चल, इंडिया चल मेरे साथ, तेरा विवाह भी ऐसा करेंगे कि एक बार तो बल्ले-बल्ले हो जाएगी, पर वह मानता ही नहीं।''
सतनाम और अजमेर ने शिन्दे की बलदेव वाली बात नहीं सुनी थी। वे दोनों फिंचली वाले पब को लेकर बातें करने लगे थे।
(जारी…)
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मंगलवार, 17 अगस्त 2010

गवाक्ष – अगस्त 2010


“गवाक्ष” ब्लॉग के माध्यम से हम हिन्दी ब्लॉग-प्रेमियों को हिन्दी/पंजाबी के उन प्रवासी लेखकों/कवियों की समकालीन रचनाओं से रू-ब-रू करवाने का प्रयास करते आ रहे हैं जो अपने वतन हिन्दुस्तान से कोसों दूर बैठकर अपने समय और समाज के यथार्थ को अपनी रचनाओं में रेखांकित कर रहे हैं। “गवाक्ष” में अब तक पंजाबी कवि विशाल (इटली) की कविताओं का हिन्दी अनुवाद, दिव्या माथुर (लंदन) की कहानी, अनिल जनविजय (मास्को) की कविताएं, न्यू जर्सी, यू.एस.ए. में रह रहीं देवी नागरानी की ग़ज़लें, लंदन निवासी कथाकार-कवि तेजेन्द्र शर्मा, रचना श्रीवास्तव, दिव्या माथुर की कविताएं, दुबई निवासी पूर्णिमा वर्मन की कविताएं, यू एस ए में रह रहीं हिन्दी कथाकार-कवयित्री इला प्रसाद, डेनमार्क निवासी कवि भगत धवन की कविताएँ और चाँद शुक्ला की ग़ज़लें, यू एस ए निवासी कवि वेद प्रकाश ‘वटुक’ तथा कवयित्री रेखा मैत्र की कविताएं, कनाडा अवस्थित पंजाबी कवयित्री तनदीप तमन्ना की कविताएं, यू के अवस्थित हिन्दी कवि-ग़ज़लकार प्राण शर्मा की ग़ज़लें, कैनेडा में अवस्थित पंजाबी कवि सुखिन्दर की कविताएं, कनाडा निवासी पंजाबी कवयित्री सुरजीत, अमेरिका अवस्थित डॉ सुधा धींगरा, कनाडा में अवस्थित हिंदी- पंजाबी कथाकार - कवयित्री मिन्नी ग्रेवाल की कविताएं, न्यूजीलैंड में रह रहे पंजाबी कवि बलविंदर चहल की कविता, कैनेडा में अवस्थित पंजाबी लेखिका बलबीर कौर संघेड़ा की कविताएं, इंग्लैंड से शैल अग्रवाल की पाँच कविताएं, सिंगापुर से श्रद्धा जैन की ग़ज़लें, इटली में रह रहे पंजाबी कवि विशाल की कविताएं, यू एस ए में रह रहीं हिन्दी कथाकार-कवयित्री इला प्रसाद की एक लघुकथा, कैनेडा निवासी पंजाबी कवि डा. सुखपाल की कविता, यू.एस.ए. में अवस्थित हिंदी कवयित्री डॉ. सुधा ओम ढींगरा की कविताएं, यू.एस.ए. में अवस्थित पंजाबी कवि-कथाकार प्रेम मान की पंजाबी कविताएं और पंजाबी कथाकार-उपन्यासकार हरजीत अटवाल के उपन्यास “सवारी” के हिंदी अनुवाद की सत्ताइसवीं किस्त आपने पढ़ीं। “गवाक्ष” के अगस्त 2010 अंक में प्रस्तुत हैं –(स्व.) इकबाल अर्पण की एक ग़ज़ल तथा यू.के. निवासी पंजाबी कथाकार-उपन्यासकार हरजीत अटवाल के धारावाहिक पंजाबी उपन्यास “सवारी” की अट्ठाइसवीं किस्त का हिंदी अनुवाद…

कैनेडा से
(स्व.) इकबाल अर्पण की एक ग़ज़ल


हम दुआ मांगे जिनकी ख़ुशी के लिए
वो ही बोलें हमें ख़ुदकुशी के लिए

सांस रुक रुक के चलती रही उम्र भर
बहुत तरसा हूँ मैं ज़िन्दगी के लिए

ग़म के सांचे में ढलकर जीएं किस तरह
कुछ तो सामने हो दिलकशी के लिए

नस्ले-आदम के खूं पे आमादा हैं क्यूँ
हाथ उठते थे जो बन्दगी के लिए

शहर आ कर अँधेरों में जो खो गया
निकला गाँव से था रोशनी के लिए

सब के पीने के पीछे कोई राज़ है
कोई पीता नहीं मयकशी के लिए

आदमी बहुत कुछ बन गया है मगर
ना बना आदमी आदमी के लिए।
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इकबाल अर्पण
जन्म : 15 जून 1938, निधन : 15 जून 2006
जगराओं(पंजाब) छोड़कर इकबाल अर्पण अफ्रीका, इंग्लैंड, अमेरिका में रहे और बाद में वह कैलगरी, कैनेडा में बस गए थे। वह पंजाबी के बहुत अच्छे कवि और कथाकार रहे। उनके दो कविता संग्रह ‘सुनत्था दर्द’(1977), ‘कब्र दा फुल’(1980), चार कहानी-संग्रह –‘गुआचे राह’(1980), ‘मौत दा सुपना’(1983)। ‘आफ़रे होये लोक’(1984) और ‘चानण दे वणजारे’(2006), एक उपन्यास – ‘पराई धरती’ (1980) छप चुके हैं।

धारावाहिक पंजाबी उपन्यास(किस्त- 28)



सवारी
हरजीत अटवाल
हिंदी अनुवाद : सुभाष नीरव

॥ तैंतीस ॥

सतनाम ने घर के आगे लाकर वैन खड़ी कर दी और आहिस्ता से उतरा। आहिस्ता से ही दरवाजा खोला। दरवाजे का खटका सुनते ही परमजोत और सरबजोत दौड़े आए। उसने उन्हें नित्य की तरह 'हैलो छांगू एंड मांगू' नहीं कहा और जल्दी से सैटी पर बैठ गया। परमजोत बोली-
''डैड, यू आलराइट ?''
''हाँ हाँ, ठीक हूँ। जाओ, बोतल लाओ। गिलास और पानी लाओ।''
उसने सरबजोत का कंधा थपथपाते हुए कहा। सरबजोत बोला-
''मैं बोतल लाऊँ कि पानी ?''
''जो मर्जी ले आ, पर हरी अप।''
रसोई में से मनजीत ने उसकी ओर देखा और पास आकर बोली-
''ज्यादा पी ली ?''
''नहीं सितारा बाई। आज तो वैसे ही हो गया, पता नहीं उम्र हो गई।''
''क्या हो गया ?''
''बहुत ही थकावट हो गई। शरीर गर्म-सा लगता है। सवेरे डिलीवरी आनी है।''
''फिर शराब न पियो, गोली खा लो और आराम करो।''
''अगर आराम आया तो शराब से आएगा, गोली से कभी आता है ?''
''तुम्हें दौड़भाग जो बहुत रहती है, आदमी कोई ढंग का तुम रखते नहीं।''
''आदमी मिलते ही कहाँ है, साले लौरल हार्डी जैसे ही घूमते फिरते हैं।''
''कोई अच्छा-सा बुच्चर देख लो और थोड़ी रैस्ट किया करो।''
''आज तो कुछ ज्यादा ही मीना कुमारी बनी फिरती हो... बुच्चर तो है एक आर्थर, पैसे बहुत मांगता है। इतने अफोर्ड नहीं होते।''
''तुम तो कहते थे कि इललीगल से बहुत मिल जाते हैं।''
''वो यहाँ नहीं, साउथाल में लगता है मेला, लुधियाने वाले लेबर चौक की तरह।''
एक पैग पीकर उसका मूड ठीक होने लगा और थकावट भी कम हो गई। बच्चे उसका मूड देखकर करीब आ बैठे।
परमजोत बोली-
''डैड, स्क्रैच माय बैक।''
''हाउ टू से ?''
''प्लीज डैड।''
''दैट्स बैटर।'' कहता हुआ वह उसकी पीठ पर खाज करने लगा। कुछ देर बाद परमजोत ने कहा-
''दैट्स इट।''
''वट ?''
''थैंक्यू डैडी।''
''दैट्स बैटर।''
वह बच्चों को 'प्लीज़' और 'थैंक्स' सिखाने के चक्कर में ही रहता है। परमजोत उठकर गई तो सरबजोत पीठ पर खाज करवाने आ बैठा। मनजीत बोली-
''तुम्हें तो कभी थकावट हुई नहीं, आज क्या हो गया ?''
''शायद मैंटली टायर्ड हो गया।''
''ऐसा क्या हो गया ?''
''आज प्रेम चोपड़ा ने मेरा बहुत सिर खाया, प्रैशर भी डाला, इसी कारण। जो वहाँ पेट्रो के साथ दो पैग लगाए उनका तो मेरे पर कोई असर हुआ ही नहीं था। यह काम करने लगी है।'' वह हाथ में पकड़े पैग की तरफ इशारा करते हुए बोला और फिर कहा-
''प्रेम चोपड़ा एक पब ले रहा था। किसी गोरे के साथ मिलकर। गोरा पॉल पार्टनर उसे सूट नहीं करता और अब वह मुझे अपने संग मिलाना चाहता है।''
''मिल जाओ।''
''मैं तो गोरे पॉल से दूसरे स्थान पर हो गया न, उसकी पहली च्वाइस पॉल था। पॉल के पास पैसे न होने के कारण अब मुझे कहता है कि आ जाऊँ।''
''तो क्या हुआ। आखिर उन्होंने तुम्हें अपने संग शेयर करने के लिए कहा है। पहले कह दिया या बाद में।''
''जानी, अपना भी कोई स्टैंडर्ड है।''
मनजीत को उसकी बात अधिक समझ में नहीं आई। उसकी दिलचस्पी भी नहीं थी। रोटी खाता सतनाम फिर कहने लगा-
''मैंने प्रेम चोपड़ा को कहा- भाई, तू अकेला ही ले ले, कौन सी ऐसी बात है। पता क्या कहता ?''
''क्या ?''
''कहता है कि मैं डरता हूँ, कहीं घाटा न पड़ जाए। मैंने दिल में सोचा कि रहा न - वही का वही। मुझे यह पार्टनर घाटे के सौदे का ही बनाना चाहता है। अगर इसे मालूम हो कि प्रोफिट होगा तो मुझे पार्टनर क्यों बनाए।''
''तुमने तोड़कर जवाब तो नहीं दे दिया ? आखिर भाई है।''
''नहीं, तोड़ कर देना ही पड़ेगा। वह तो कहे जाता था कि मैंने तुझे कभी कुछ करने को नहीं कहा, मेरे कहने पर इस पब में हिस्सा डाल।''
''तुम सोच लो। अगर ठीक लगता है तो डाल लो।''
''ठीक तो लगता है, मैं पब भी देख आया हूँ पर यह बिजनेस मेरे लिए बिलकुल नया है। और फिर इधर से ही फुर्सत नहीं मिलती। असल में असरानी जैसे के आ जाने से वो हो गया खाली-सा, अब ऐसी बातें सोचता रहता है। एक तरफ तो कहे जाता है कि शिन्दा किसी काम का नहीं, और दूसरी तरफ सारा दिन उसे रगड़े जाता है।''
''अगर शिन्दा भाजी उसके काम का नहीं तो तुम ले आओ।''
उस वक्त सतनाम कुछ न बोला पर सवेरे उठते ही कहने लगा-
''मेरी श्रीदेवी, बात तो तेरी बहुत बढ़िया है। रातोंरात मैंने सोच लिया कि क्या करना है। प्रेम चोपड़ा शिन्दे को पचास में रगड़ना चाहता है, क्यों न मैं सौ का ऑफर करूँ, उसे वही सुविधाएँ देकर।''
''देखो, मैंने घर में नहीं रखना किसी को।''
''क्यों ? मेरा भाई है।''
''ठीक है, भाई है, पर मेरे से गैर आदमी घर में नहीं रखा जाता। हमने घर में सौ बार लड़ना-झगड़ना, मर्जी से उठना-बैठना होता है। किसी दूसरे के होने पर आदमी बंध जाता है।''
''बन गई न मिनट भर में ही हीरोइन से वैम्प। अगर भाई ही भाई के घर में नहीं रहेगा तो कहाँ रहेगा।''
''रहेगा वो भाजी के घर में ही।''
''इसका मतलब, जट्टी तेरे से लाख दर्जे अच्छी है।''
''मुझे अच्छा बनने की ज़रूरत नहीं। मुझे अपना घर भी लुक-आफ्टर करना है। वह तो सारा दिन घर में ही रहती है और मुझे जॉब भी करनी होती है।''
''तू मेरी बनी-बनाई खेल खत्म करेगी। मैं साला मुफ्त में ही तुझे नंबर वन बनाए बैठा हूँ। शिन्दा आएगा और यहीं रहेगा, तू लिख ले कहीं।''
मनजीत कुछ न बोली। सतनाम कहने लगा-
''साला, एक प्रॉब्लम का हल खोजें तो दूसरी आ खड़ी होती है।''
फिर सतनाम सोचने लगा कि यह तो बाद की प्रॉब्लम है। पहले अजमेर को बातों में घेर कर शिन्दे को हथियाया जाये ताकि काम का बोझ कम हो।
सुबह दुकान में गया। दुकान शुरू करवा कर वह अजमेर की तरफ निकल गया। उसने बाहर से ही देखा कि दुकान में शिन्दा और टोनी खड़े थे। टोनी को जल्दी बुलाने का अर्थ था कि अजमेर कहीं गया हुआ होगा। फिर उसने घूमकर वैन देखी। वैन भी नहीं थी। वह दुविधा में ही था कि रुके या नहीं कि शिन्दे ने उसकी वैन देख ली और अन्दर आ जाने के लिए हाथ हिलाने लगा। उसके पहुँचने पर शिन्दा बोला-
''तू तो भाई मिलने से ही गया, उधर बलदेव कहीं छिप गया और इधर तू भी।''
''संडे को मैं आया करता हूँ, पर तू आसपास देखता ही नहीं।''
''क्या बताऊँ भाई, मेरा तो बुरा हाल है। बस, चलो ही चल है। ऊपर से भाई भी डांट मारने में मिनट नहीं लगाता। गिरेगा खोते(गधे) पर से और गुस्सा मेरे पर।''
''चल, अच्छा है। जट्टी का बचाव हो जाता होगा, नहीं तो हर वक्त उसकी ही जान के पीछे लगा रहता था।''
''भाई, वो भी कम नहीं, बस चुप ही भली है। तू बता, आज किधर ?''
''प्रेम चोपड़ा कहाँ है ?''
''बैंक गए हैं दोनों, क्या काम है ?''
''मैं तुझे मांगने आया हूँ।''
''फिर से ?''
''हाँ, फिर से, साला मुकरी न हो तो। तुझे एक बार मुश्किल से मांगा था। मैं तो कहता हूँ, अगर उसे तेरी ज़रूरत नहीं तो मेरे संग आ जा।''
''ले जा यार, मुझे इस नरक से भाई बनकर ले जा। वहाँ किसी से ओए नहीं कहवाई थी और यहाँ ओए के बग़ैर और कुछ कोई कहता ही नहीं।''
''वो तो कहता है कि तू निकम्मा है।''
''वो बड़ा भाई है, जो मर्जी कहे।''
''यह पचास देता है, मैं सो दूँगा।''
सौ सुनकर शिन्दे का चेहरा खिल उठा। बोला-
''तुम दोनों भाई आपस में सलाह कर लो, मेरा क्या है, बैल ने तो पट्ठे ही खाने हैं।''
तब तक अजमेर की वैन दुकान के सामने आ रुकी। गुरिंदर बाहर निकली और अजमेर गाड़ी खड़ी करने चला गया। सतनाम ने पूछा-
''जट्टिए, प्रेम चोपड़ा ने वापस आना है कि कहीं और चला गया ?''
''मेरा प्रेम चोपड़ा और तेरी परवीन बॉबी।''
''वो अब श्रीदेवी हो गई है, ज़रा-सी तरक्की कर गई।''
''तू आज दिन में कहाँ घूमता फिरता है ?''
''उसके साथ बात करने आया हूँ कोई। तुम किधर से आ रहे हो ?''
''बैंक जाना था इन्होंने, मुझे ज़रा घर की शॉपिंग करनी थी।''
अजमेर हाथ में दो बैग थामे आ गया। बैग गुरिंदर को पकड़ाते हुए सतनाम से बोला-
''कैसे, सलाह बदली फिर ?''
''किसकी ?''
''पब वाली।''
''नहीं भाई, मैंने सोचा, यह सब ठीक है, प्रोपर्टी मंहगी नहीं मिल रही पर इस वक्त रेट ऑफ इंटरेस्ट भी बहुत है, फिर प्राइज़िज का भी कुछ पता नहीं, अगर गिर पड़ीं तो ?... तुम्हारी दुकान तो बोझ उठा लेगी पर मेरी ने फालतू बोझ नहीं उठाना।''
अजमरे कुछ नहीं बोला और घड़ी देखने लगा। गुरिंदर बोली-
''टैम न देखो, ऊपर आ जाओ, चाय पियो, पब नहीं जाना अब।''
अजमेर ने गुरिंदर की बात का उत्तर नहीं दिया। कुछ देर की चुप के बाद कहने लगा-
''अगर तू साथ खड़ा हो जाता तो मैं भी रिस्क ले सकता था। न भी खोलते, बिल्डिंग ऐसे ही पड़ी रहती।''
''हाँ, पर किस्त तो देनी ही पड़ती।''
''किस्त तो देनी ही है। पर प्रापर्टी का मालिक भी तो बनेगा तू।''
''यही मैं कहता हूँ कि दुकान किस्त का बोझ नहीं उठा सकती। तुम्हारी दुकान फ्रीहोल्ड है, मुझे किराया भी देना पड़ता है और दुकानों की हालत यह है कि जितने ओवर हैड्ज़ कम हों, उतना ही ठीक है।''
गुरिंदर ऊपर चली गई और वे दोनों फिर पब में जा बैठे। पॉल राइडर उनसे उतने उत्साह से नहीं मिला। अजमेर सतनाम से पूछने लगा-
''शिन्दा कहता था कुछ ?''
''नहीं तो, क्यों ?''
''वैसे ही, ये टोनी से खीझता रहता है। टोनी ने तो एक दिन कह दिया था कि तुझे ये पचास भी मेरी तनख्वाह में से कट कर मिलते हैं।''
बात सुनकर सतनाम खुश हो गया। गाड़ी खुद-ब-खुद पटरी पर आ गई थी। सतनाम बोला-
''भाई, वैसे काम में वह अब कैसा है ?''
''निकम्मा !... मुझे तो इसकी ज़रूरत भी नहीं। टोनी पेपरों में काम करता है, उसे कैसे हटा दूँ ? मैं हूँ, गुरिंदर भी है, दुकान भला कितने बन्दे संभालेगी। इसलिए मैं तो पचास पाउंड ही दे सकता हूँ। वो भी तो इसके बचते ही हैं। सारा खर्चा मैंने उठा रखा है।''
''भाई, अगर शिन्दे की तुम्हें ज़रूरत नहीं तो मैं रख लूँ ?''
बात सुन कर अजमेर की हालत पतली हो गई। सतनाम ने फिर कहा-
''मुझे है आदमी की ज़रूरत।''
''तेरा काम तो चल ही रहा है। और फिर यह तेरे काम का नहीं। तेरा काम है हैवी, इससे नहीं होगा। भारी काम करने लायक यह है नहीं।''
''देखा जाएगा, मगील से तो बुरा नहीं यह।''
''वैसे, दुकानों में बन्दे कभी फालतू भी नहीं होते।''
अजमेर ने शिन्दे को देने से आनाकानी-सी करते हुए कहा। सतनाम बोला-
''मैं इसे पाउंड भी सौ देता रहूँगा।''
''यह सौ के लायक नहीं, सौ देकर इसकी आदत न बिगाड़।''
(जारी…)
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रविवार, 11 जुलाई 2010

गवाक्ष – जुलाई 2010


“गवाक्ष” ब्लॉग के माध्यम से हम हिन्दी ब्लॉग-प्रेमियों को हिन्दी/पंजाबी के उन प्रवासी लेखकों/कवियों की समकालीन रचनाओं से रू-ब-रू करवाने का प्रयास करते आ रहे हैं जो अपने वतन हिन्दुस्तान से कोसों दूर बैठकर अपने समय और समाज के यथार्थ को अपनी रचनाओं में रेखांकित कर रहे हैं। “गवाक्ष” में अब तक पंजाबी कवि विशाल (इटली) की कविताओं का हिन्दी अनुवाद, दिव्या माथुर (लंदन) की कहानी, अनिल जनविजय (मास्को) की कविताएं, न्यू जर्सी, यू.एस.ए. में रह रहीं देवी नागरानी की ग़ज़लें, लंदन निवासी कथाकार-कवि तेजेन्द्र शर्मा, रचना श्रीवास्तव, दिव्या माथुर की कविताएं, दुबई निवासी पूर्णिमा वर्मन की कविताएं, यू एस ए में रह रहीं हिन्दी कथाकार-कवयित्री इला प्रसाद, डेनमार्क निवासी कवि भगत धवन की कविताएँ और चाँद शुक्ला की ग़ज़लें, यू एस ए निवासी कवि वेद प्रकाश ‘वटुक’ तथा कवयित्री रेखा मैत्र की कविताएं, कनाडा अवस्थित पंजाबी कवयित्री तनदीप तमन्ना की कविताएं, यू के अवस्थित हिन्दी कवि-ग़ज़लकार प्राण शर्मा की ग़ज़लें, कैनेडा में अवस्थित पंजाबी कवि सुखिन्दर की कविताएं, कनाडा निवासी पंजाबी कवयित्री सुरजीत, अमेरिका अवस्थित डॉ सुधा धींगरा, कनाडा में अवस्थित हिंदी- पंजाबी कथाकार - कवयित्री मिन्नी ग्रेवाल की कविताएं, न्यूजीलैंड में रह रहे पंजाबी कवि बलविंदर चहल की कविता, कैनेडा में अवस्थित पंजाबी लेखिका बलबीर कौर संघेड़ा की कविताएं, इंग्लैंड से शैल अग्रवाल की पाँच कविताएं, सिंगापुर से श्रद्धा जैन की ग़ज़लें, इटली में रह रहे पंजाबी कवि विशाल की कविताएं, यू एस ए में रह रहीं हिन्दी कथाकार-कवयित्री इला प्रसाद की एक लघुकथा, कैनेडा निवासी पंजाबी कवि डा. सुखपाल की कविता, यू.एस.ए. में अवस्थित हिंदी कवयित्री डॉ. सुधा ओम ढींगरा की कविताएं और पंजाबी कथाकार-उपन्यासकार हरजीत अटवाल के उपन्यास “सवारी” के हिंदी अनुवाद की छब्बीसवीं किस्त आपने पढ़ीं। “गवाक्ष” के जुलाई 2010 अंक में प्रस्तुत हैं – यू.एस.ए. में अवस्थित पंजाबी कवि-कथाकार प्रेम मान की पंजाबी कविताएं तथा यू.के. निवासी पंजाबी कथाकार-उपन्यासकार हरजीत अटवाल के धारावाहिक पंजाबी उपन्यास “सवारी” की सत्ताइसवीं किस्त का हिंदी अनुवाद…

यू.एस.ए. से
प्रेम मान की तीन पंजाबी कविताएं
हिंदी अनुवाद : सुभाष नीरव

रिश्ते

कुछ रिश्ते स्वयं ही उगते हैं
कुछ रिश्ते उगाये जाते हैं

रिश्ते स्वयं नहीं पलते
रिश्ते पाले जाते हैं

रिश्ते खुद नहीं समझते
इन्हें समझाना पड़ता है

रिश्तों को जिंदा रखने के लिए
लेने से अधिक
देना पड़ता है

रिश्ते आग हैं
ये जला भी सकते हैं
ये गर्मराहट भी देते हैं

रिश्ते बर्फ़ की तरह हैं
खूबसूरत भी लगते हैं
इस जिस्म को
जमा भी सकते हैं

रिश्ते दो-तरफा
सड़क की तरह हैं
इन्हें इकतरफा
समझकर
ज़लील होने वाली बात है

रिश्ते रूह की
खुराक भी बन सकते हैं
और ज़हर भी

रिश्ते खुदगर्ज भी
हो सकते हैं
और नाखुदगर्ज भी

रिश्ते वफ़ा भी
हो सकते हैं
और बेवफ़ा भी

रिश्ते निभाने ही कठिन नहीं
रिश्तों की बात करना भी
कठिन हो रहा है।
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भिन्नता

मेरे दोस्त कहते हैं
मैं दूसरों से
बहुत भिन्न हूँ

मुझे कच्चे अनार
अच्छे लगते हैं

मुझे धूपों से डर लगता है

मुझे मूसलाधार बारिश
तेज बहती हवायें
और आँधियों से
बहुत मोह है

मुझे पूरनमासी की रात से अधिक
अमावस्या की रात के गले लगकर
बहुत गर्माहट मिलती है

मुझे पक्के रास्तों से अधिक
कच्ची राहों की
उबलती धूलों पर
नंगे पैर चलना
और पैरों में पड़े
छालों की पीर में खुश होना
दिलचस्प लगता है

मुझे खूबसूरत लोगों से अधिक
बदसूरत लोगों को
आलिंगन में कस कर
अधिक आनन्द मिलता है

कुछ बिगड़ने पर
मैं किस्मत से अधिक
अपने आप को इल्ज़ाम देना
अधिक पसन्द करता हूँ

दोस्त कहते हैं
मैं अजीब इन्सान हूँ
पता नहीं क्यूँ
मैं बहुत से लोगों से
इतना भिन्न हूँ।
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पता

जब मैं
अपना घर
और देश छोड़कर
एक अनजाने और
बेगाने मुल्क में
किस्मत आजमाने के लिए चला था
तो मेरे एक दोस्त ने
कहा था
'अपनी नई जगह का
पता तो बता जा
चिट्ठी-पतरी के लिए।'
मैंने उसकी ओर
गहरी और उदास
नज़रों से देखकर
कहा था-
'दोस्त, बेघर लोगों का
कोई पता नहीं होता।'

आज अपने पुराने देश में
जाते समय सोचता हूँ-
बेघर लोगों का
सचमुच कोई भी
पता नहीं होता।
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प्रेम मान सन् 1970 से 1975 तक पंजाबी साहित्य में काफ़ी सक्रिय रहे। सन् 1970 में इनका कहानी संग्रह 'चुबारे की इट्ट' और सन् 1972 में ग़ज़ल संग्रह 'पलकां डक्के हंझु' प्रकाशित हुए। पंजाबी की मासिक पत्रिका 'कविता' का अप्रैल 1973 अंक दो जिल्दों में 'कहानी अंक' के रूप में इनके संपादन में प्रकाशित हुआ। पंजाब यूनिवर्सिटी से इकनॉमिक्स की एम.ए. करके इन्होंने गुरू गोबिंद सिंह कालेज, चंडीगढ़ में 1971 से 1975 तक अध्यापन किया। सितम्बर 1975 में जब हिंदुस्तान को अलविदा कहा तो पंजाबी साहित्य से भी विलग गए। इंग्लैंड में फिर इकनॉमिक्स की एम.ए. करने के बाद यूनिवर्सिटी ऑफ कैलीफोर्निया, लास ऐंजल से पी.एच.डी. की और संग-संग पाँच साल कैलीफोर्निया स्टेट युनिवर्सिटी में पढ़ाया। 1986 से यह ईस्टर्न कनैटीकट स्टेट युनिवर्सिटी में इकनॉमिक्स पढ़ा रहे हैं जहाँ वर्ष 1994 से विभागाध्यक्ष भी हैं। इन्होंने अपने विषय पर अनेक किताबें लिखी हैं जो कई देशों की बहुत सारी युनिवर्सिटीज़ में कोर्स के रूप में प्रयोग में लाई जाती है। वर्ष 2004 में यह न्यूयार्क के कुछ पंजाबी साहित्यकारों की संगत में आने पर पुन: साहित्य के जुड़े हैं।
वेब साइट : www.premmann.com, www.punjabiblog.com
ई मेल : prem@premmann.com

धारावाहिक पंजाबी उपन्यास(किस्त- 27)


सवारी
हरजीत अटवाल
हिंदी अनुवाद : सुभाष नीरव

॥ बत्तीस॥

सिमरन दो सप्ताह की छुट्टियाँ बिता कर लौटी तो ऐसा महसूस करने लगी मानो गहरे स्वप्न में से उठी हो। चमकीला समंदर, दूर तक पसरा किनारा, किनारे पर रेत से चिपके लोग और उन्हें दबोचे खड़ी धूप। और अब वही डल सा मौसम, घसमैला सा लंदन, मैली दीवारें, पुरानी सड़कें, बेसब्र सी भीड़। वह सीधी अपने घर पहुँची। घर पहुँचकर तसल्ली हुई कि चोरी होने से बच गई थी। इतने दिन बन्द रहे घर का बचे रहना करिश्मा ही था। दोस्त कहते थे कि लंदन रहते हों और चोरी न हो, असंभव।
उसने अनैबल और शूगर की फोटो देखी। पहले सोचा कि फोन कर ले। वे दोनों ग्रेवजैंड़ में अवतार कौर के पास थीं। उसने कार ली और ग्रेवजैंड़ की ओर चल दी। वह उनके लिए कितना कुछ लाई थी। खिलौने, कपड़े, चाकलेट। सब साथ ही ले लिया। उसे डर था कि कहीं वे उससे रूठी होने के कारण बोले ही न। अब दोनों स्कूल जाती थीं। सब समझती थीं। सिमरन भी पहली बार घर से इतनी दूर गई थी। इतने लम्बे समय के लिए बेटियों से अलग रही थी। अब उसे बेटियों पर अधिक ही मोह आ रहा था। कभी कभी वह उन्हें बोझ भी समझने लगती कि वह उनके कारण फंस कर रह गई थी। कहीं जा भी नहीं सकती थी। अगर किसी बिजनेस डिनर पर जाना होता तो सबसे पहले इन लड़कियों को इंतज़ाम करना पड़ता। होलीडेज़ पर जाने के बारे में सोचना ही बड़ी बात होती।
ये उसकी ज़िन्दगी की पहली छुट्टियाँ थीं। सारी दुनिया छुट्टियों पर जाती। छुट्टियाँ बिता कर लौटे लोग वहाँ की रोमांटिक बातें करते। भांति-भांति के किस्से सुनाते। छुट्टियों पर जाने से पहले तरह-तरह की सलाहें बनतीं, जगहों का चुनाव किया जाता। तारीखें तय होंती। बलदेव के होते तो छुट्टियों का सपना भी नहीं लिया जा सकता था। इंडियन लोग इंडिया जाने को ही छुट्टियाँ कहा करते हैं। अधिक होता तो कैनेडा या अमेरिका किसी रिश्तेदार को मिल आते। उनके लिए होलीडेज़ के अर्थ ही ऐसे थे।
सिमरन तो इस बार भी न जाती, ली को टाल देती पर उनके एक क्लाइंट ने बहुत ही सस्ता इंतज़ाम करवा दिया था। एक ट्रैवल एजेंट को सिमरन ने एक साल फ्री बैंकिंग की सुविधा दी थी और बदले में उसने सस्ती छुट्टियाँ बुक करवा दी थीं। अनैबल और शूगर को रखने के लिए उसने मम्मी को राजी कर लिया था। दो सप्ताह वह इस ज़िन्दगी से कटी रही थी। दो हफ्ते उसने उस ज़िन्दगी को यहाँ के रूटीन से तोड़कर भरपूर जिया था। वह बहुत खुश थी। उसकी वर्षों की थकान उतर गई थी। वह सोच रही थी कि अब कोई जितना चाहे काम करवा ले। अब वह कितना भी बोझ सह सकती थी।
ग्रेवजैंड़ पहुँची तो दोनों लड़कियाँ उसे दौड़कर मिलीं। वे सिमरन से नाराज तो थीं पर तोहफ़ों को देखकर सारी नाराजगी दूर हो गई। अवतार कौर उसे देखकर खुश होते हुए बोली-
''ले री, संभाल अपनी लाडलियों को। टांग रखा है इन्होंने तो।''
मम्मी अवतार कौर और डैड निर्मल सिंह के लिए भी वह कुछ लाई हुई थी। अमरजीत और उसके पति जवैर और उनके बेटे लुक के लिए भी। निर्मल सिंह ने अपने तोहफ़े में कोई उत्साह नहीं दिखाया था। सिमरन समझ गई थी कि शायद डैडी शक होगा कि मैं अकेली नहीं गई थी। वह रात में ग्रेवजैंड़ ही रह गई। इतनी थकी हुई थी कि घर जाकर कोई काम करना उसके लिए कठिन होता।
रात में अवतार कौर ने उसे कुरेदते हुए कहा-
''सिमरन, आगे तेरा क्या प्रोग्राम है ?''
''मंडे से काम पर जाना है।''
''मेरा मतलब है, अपनी लाइफ़ के बारे में क्या सोचती है ? बलदेव तो अब गया, दूसरा विवाह करवा ले।''
''विवाह की क्या ज़रूरत है मोम ?''
''विवाह के बिना यह सब पाप है।''
सिमरन ने कोई जवाब नहीं दिया। अवतार कौर ने पुन: पूछा-
''कौन था जिसके साथ होलीडे पर गई थी ?''
''काम पर से सहेलियाँ गई थीं, डोंट यू वरी मोम।''
''चिंता क्यों न करूँ। अमरजीत की तरह मुल्ला न ले आना या कोई काला-गोरा।''
''मैं किसी को नहीं लाती, न मुझे किसी की ज़रूरत है, पर अमरजीत तो पहले से कहीं ज्यादा हैप्पी है।''
''कैसी हैप्पी है। हमारी तो लोगों में बेइज्ज़ती हो गई। तेरे डैडी किसी को मुँह दिखाने लायक नहीं रहे।''
''गुरुद्वारों के प्रैजीडेंट हैं, व्हट एल्ज़।''
''यह बात और है।''
''मोम, फिक्र न कर। मैं कहीं नहीं भागी जाती।''
''भागने को भागी जाती है। कहते हैं- मरा रोने-पीटने से रहता है !''
सिमरन उसकी बात पर हँसने लगी। अवतार कौर ने फिर कहा-
''अगर कहे तो बलदेव को अप्रोच करें ?''
''नहीं मोम, मैं ऐसे ही हैप्पी हूँ। तुम भी हैप्पी हो जाओ।''
अगले दिन वह अनैबल और शूगर को लेकर अपने घर लौट रही थी तो लड़कियाँ उससे छोटे छोटे सवाल उसकी छुट्टियों के बारे में पूछ रही थीं। अचानक शूगर ने पूछा-
''मोम, हैव यू सीन डैड देअर ?''
''व्हॉट ?''
''हैव यू सीन हिम ?''
''हू टोल्ड यू दिस ?''
''नो वन।''
सिमरन सोचने लगी कि यह सवाल कहाँ से आया हो सकता था। शायद मम्मी ने बलदेव के बारे में इनसे कोई बात की हो। नहीं तो इन्होंने कभी भी अपने डैडी के विषय में कुछ नहीं पूछा था। बलदेव ने भी अब कभी फोन नहीं किया था। पहले कभी कभार फोन आ जाया करता था। एक बार उसने फोन किया तो जवैर ने उठा लिया। सिमरन ली के साथ डिनर पर गई हुई थी। अमरजीत और जवैर लड़कियों को संभालने के लिए घर आए हुए थे। इसके बाद बलदेव ने कभी फोन नहीं किया और न ही कोई संबंध रखा।
साल से ऊपर हो गया था उसे घर से गए। उस दिन झगड़े के बाद उसने अपना कुछ सामान लपेटा और चलता बना था। सिमरन ने सोचा था कि भाइयों के पास ही गया होगा। उसने अगले दिन गुरिंदर को फोन किया। गुरिंदर आगे से उसे लड़ने को पड़ी। कुछ दिन बाद सिमरन को पता चल गया था कि वह शौन के घर रह रहा था। दोनों लड़कियों ने बलदेव को बहुत मिस किया था। अनैबल पूछने लगती-
''डैडी, आते क्यों नहीं ?''
''वह हमें लाइक नहीं करता।''
''क्यों ?''
''सम डैडीज़ आर लाइक दिस।''
फिर वे स्कूल से लौटकर कहने लगी-
''मैं डैडी मांगती हूँ। मैं डैडी लाइक करती हूँ।''
''सभी बच्चों के पास डैडी थोड़े ही होते हैं। तेरी क्लास के हाफ बच्चों के पास डैडी है ही नहीं।''
सिमरन उसे गोदी में बिठाकर समझाती। अनैबल समझ जाती थी। शूगर कई बार अचानक ही अजीब सा सवाल कर मारती। वैसे वह चुप-सी लगती थी। एक दिन वह कहने लगी-
''मोम, कैन वी हैव ऐन अदर डैड ?''
सिमरन पहले हैरान हुई, फिर हँसते हुए बोली-
''नो... एवरी बडी हैव ओनली वन डैड वन मोम, अदर आर नॉट रीयल वन्ज़।''
अगले दिन अनैबल ने कहा-
''मोम, अवर टीचर टोल्ड अस समथिंग न्यू।''
''क्या ?''
''वी कांट हैव अदर फादर, बिकॉज फादर इज़ ओनली वन। बट वी कैन हैव डैडी। देअर इज़ डिफरेंस बिटवीन डैडी एंड फादर।''
सिमरन ने उसे बांहों में कस लिया और आँखें भर लीं। वह सोचने लगी कि कहाँ से लाए इनके लिए डैडी। ली हारवे के साथ उसका वास्ता बाहर बाहर ही था। उस दिन उसे बलदेव की बहुत याद आई।
कई दिन तक वह काम पर सैटिल नहीं हो सकी थी। पहले छुट्टियों से लौटने के कारण सब पराया पराया लगता था। फिर लड़कियों के सवाल उसको तंग करने लगे थे। उसे परेशान देखकर एक दिन बारबरा ने कारण पूछा तो उसने सारी बात बता दी। बारबरा बोली-
''सिम, ये सवाल तो पीछा किया ही करते हैं। थोड़ा स्ट्रांग बनकर रह। यदि तू कमज़ोर पड़ी तो यह एक्स इनका सहारा लेकर तुझे तंग भी कर सकता है।''
सिमरन सोचने लगी कि बलदेव इन लड़कियों के सहारे उसे क्या तंग कर सकेगा। बहुत करेगा तो लड़कियों को मांग लेगा। वे हँसकर दे देगी और कहेगी कि इनके कारण तो उसकी ज़िन्दगी नरक बनी पड़ी है। कहीं जा नहीं सकती, किसी को घर बुला नहीं सकती।
एक दिन बलदेव का फोन आ गया। वह उससे मिलना चाहता था। उसके फोन ने सिमरन को बहुत उत्साहित किया था। लेकिन फिर उसकी पथरीली सी आवाज़ याद आती तो वह ढीली पड़ जाती। बलदेव के लहजे से जाहिर था कि वह किसी खास काम के कारण ही मिलना चाहता था। कोई जज्बाती कारण प्रतीत नहीं होता था। शायद तलाक लेना चाहता हो या फिर घर में से अपना हिस्सा मांगता हो। सिमरन उसके साथ हर किस्म का समझौता करने को तैयार थी। वह जो कुछ भी मांगता, सिमरन ने देने का फैसला कर लिया। दिल के किसी कोने में से आवाज़ आने लगती कि शायद वह वापस घर ही आना चाहता हो। यह आवाज़ पलभर के लिए उसे आनंदित कर जाती, पर फिर उदास होकर सोचने लगती कि नहीं, यह नहीं हो सकता। बलदेव की आवाज़ में ऐसा कोई सवाल नहीं था। वह उसकी प्रतीक्षा करने लगी।
जिस दिन बलदेव को आना था, वह जल्दी ही काम पर आ गई। बलदेव का कुछ पता नहीं था कि वह पहले ही आया खड़ा हो। काम करते हुए वह बार-बार काउंटर पर से बाहर की ओर देखने लगती। उसने छुट्टी कर ली और बैंक से बाहर निकल आई। बाहर बारिश हो रही थी। ठंड भी थी। वह फिर लौटकर बैंक में आ गई। बलदेव बारह बजे पहुँचा। उसके सिर के बाल गीले थे जिसका अर्थ था कि वह कार कहीं दूर खड़ी करके आया होगा, नज़दीक जगह नहीं मिली होगी। उसने बलदेव की आँखों में झांका। वह स्थिर-सी थीं। उसे देखते ही बोली-
''हाय डेव !''
''हाउ यू डूइंग ?''
''आयम फाइन, यू लुक वैल !''
''यू लुक बैटर दैन बिफोर ! मोर यंगर !''
''थैंक यू।''
वे एक दूसरे के सामने खड़े रहे, फिर सिमरन ने कहा-
''आ, रेस्ट्रोरेंट में बैठते हैं, वहीं बातें करेंगे।''
बलदेव कुछ कहे बग़ैर उसके पीछे चल पड़ा। रेस्ट्रोरेंट खाली सा था। सिमरन ने पहले ही इस रेस्ट्रोरेंट में बैठने का प्रोग्राम बना लिया था। वह सोच रही थी कि अवश्य बलदेव ने कोई खास बात करनी होगी, जिसे करने के लिए ठीक सी जगह चाहिए। इस रेस्ट्रोंरेंट में वह कई बार अपने स्टाफ के साथ आ जाया करती थी। आसपास के भारतीय रेस्ट्रोरेंटों में यह बहुत चलता था। उनके अन्दर प्रवेश करते ही वेटर ने दो सीटों वाले मेज की ओर इशारा करके उनके भीगे हुए कोट पकड़ लिए। कोट से बाहर आई सिमरन को देख बलदेव बोला-
''तूने तो अच्छा-खासा वेट लूज कर लिया।''
''थैंक्स... अपने आप हो गया, मैंने कुछ नहीं किया।''
बेयरा मेन्यू उनके हाथ में दे गया। सिमरन ने पूछा-
''डेव, लंच करना है कि चाय पीनी है ?''
बलदेव ने घड़ी देखकर कहा-
''ऐनीथिंग विल डू।''
सिमरन ने पहले चाय और फिर खाने का आर्डर दे दिया।
बलदेव पूछने लगा-
''फिर, कैसी रहीं तेरी कनेरी आईलैंड की छुट्टियाँ ?''
''तू मेरी स्पाई करता है ?''
''नहीं, मैं नहीं करता। पर अगर कोई खबर मेरी राह में आ खड़ी हो तो मैं क्या करूँ।''
सिमरन ने उसके सवाल की ओर ध्यान दिए बिना कहा-
''बता, किस बात के लिए मिलना चाहता था ?''
''मैं अनैबल और शूगर को देखना चाहता हूँ।''
''इतनी देर बाद ?''
''असल में मैं... मैं फ्लैट आदि नहीं ले पाया था।''
''अब ले लिया ?''
''नहीं, बस ले ही लूँगा।''
''डेव, तेरी बेटियाँ हैं, मेरी तरफ से तू ही अपने पास रख, आयम फैड अप। बट दा थिंग इज़ अगर लेकर जाना चाहता है या मिलना ही चाहता है तो रैगूलर बेस पर मिलना। ऐसा न हो कि एक बार मिल कर दोबारा मुँह ही न दिखाओ। अदरवाइज़ डोंट अपसैट दैम, लीव दैम अलोन। दे आर हैप्पी नाउ।''
बलदेव सोच में डूब गया। उसे सिमरन की बात सही प्रतीत हुई। उसने सोचकर देखा कि इन हालातों में वह यह निरंतरता कायम नहीं रख पाएगा। अभी तो उसका ही स्थायी ठिकाना नहीं था। सिमरन ने पूछा-
''क्या सोच रहा है ?''
''यू आर राइट। लैट मी सैटिल डाउन। मै फ्लैट ले रहा हूँ और फिर जॉब भी चेंज करनी है।''
''यह जॉब ठीक नहीं ?''
''मैं हैप्पी नहीं, शायद किसी बिजनेस में पड़ूँ।''
''तेरे ब्रदर्स हैं हैल्प के लिए।''
बलदेव ने कोई उत्तर न दिया। सिमरन ने फिर कहा-
''हाउ इज़ गुरां ?''
''ठीक है।'' वह संक्षिप्त का जवाब देकर चुप हो गया। सिमरन ने पूछा-
''डेव, इतनी देर हो गई, तेरा घर आने को दिल नहीं करता ?''
बलदेव खामोश रहा। सिमरन बोली-
''डेव, चल मेरे संग एक बार घर चल। एक बार फील करके देख घर को तुझे अच्छा लगेगा।''
''नहीं सिमरन, मैं बहुत खुश हूँ अब। मैं दोबारा उन्हीं फीलिंग्स में से नहीं गुजरना चाहता। वो फीलिंग्स बहुत पेनफुल होती हैं। आई नो, आई नो दैम।''
''डेव, दैट हाउस नीडज़ यू वैरी बैडली।''
''नहीं सिमरन, पता नहीं किस किस सायों का राज है उस घर पर अब।''
''डेव, यू आर रांग हियर, किसी साये का राज नहीं है वहाँ।''
''सिमरन, तू अभी भी ली हारवे के साथ अपने रीलेशन से मुकर रही है। अब तो अपने बीच कुछ नहीं, न ही मुझे तेरे साथ कोई हार्ड फीलिंग रही है। तेरी ज़िन्दगी है, कुछ भी कर। आई डोंट माइंड। आई जस्ट कम फॉर माई डॉटर्स।''
''डेव, मुकरने वाली कोई बात नहीं। मैं तुझे सिर्फ़ यह बता रही हूँ कि ली हारवे का वास्ता मेरे से या मेरी जॉब से हो सकता है, बट नॉट विद दैट हाउस... वो घर तेरा आज भी उतना ही है, जितना तेरा वहाँ रहते समय हुआ करता था। तू जब चाहे आकर रह, मेरे साथ न बोल। वहाँ आज तक कोई पराया मर्द नहीं आया और न आएगा। एक बार अमरजीत और जवैर आए थे, दोबारा वे भी नहीं... घर तेरा है और बेटियाँ तेरी हैं...।''
(जारी…)
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