हरजीत अटवाल
हिंदी अनुवाद : सुभाष नीरव
(चित्र : अर्पणा कौर)
॥ छत्तीस ॥
तड़के आँख खुलते ही बलदेव को अहसास हो गया था कि एलीसन उसके संग ही लेटी थी। मैरी के शरीर से एलीसन की भिन्नता कुछ पल के लिए महसूस हुई, फिर उसे लगा जैसे बस वह इसी जिस्म को ही जानता हो। उसने एलीसन के चेहरे पर से बाल एक तरफ किए। एलीसन बहुत सुन्दर दिख रही थी। शौन की बात सच थी कि उसकी बहन सूरत और सीरत दोनों पक्ष से खूबसूरत थी। उसने एलीसन को जगाया। वह मानो गहरे आनन्द में हो। फिर वह बातें करने लगी। वैलज़ी की, माँ, भाई और बहन की। बलदेव सबको जानता ही था। एलीसन अपने गाँव के बारे में बहुत कुछ तो भूल ही चुकी थी। सालों के साल गुजर गए थे उसे गाँव से आए हुए। वह बलदेव को वहाँ के बारे में सवाल पर सवाल पूछती जा रही थी। फिर वह अपने बचपन के विषय में बताने लगी। घर से भागने की कहानी उसने अपने हिसाब से सुनाई। वह सारा दोष अपनी माँ या शौन पर मढ़ रही थी। उसे अपना गाँव, अपना घर और आसपास का वातावरण बहुत याद आते थे। फॉर्म वाला केस जो वे हारे थे, उसका एलीसन को भी बहुत दुख था।
अचानक दरवाजा खुला। फेह और नील अन्दर आ घुसे। बलदेव ने पूछा-
''तूने दरवाजा अन्दर से बन्द नहीं किया था ?''
''नहीं, बच्चों के कारण। ये कभी भी जाग जाते हैं, बाथरूम जाना होता है या कई बार सपना आने पर उठ खड़े होते हैं।''
एलीसन ने बच्चों की तरफ देखा और फिर बलदेव की ओर और हँसने लगी। उसकी हँसी में ताज़गी थी मानो पहली बार हँसी हो। उसके बोलने के लहज़े में लंदन का स्पर्श था। नील पूछने लगा-
''डेव, तू और मम सैक्स करते थे ?''
बलदेव एकदम शर्मिन्दा हो गया। एलीसन ने हँसते हुए मुँह कम्बल के अन्दर दे लिया। फेह चुप खड़ी मुस्कराए जा रही थी। बलदेव को फेह की आँखों में से अनैबल और शूगर झांकती प्रतीत हुईं। उसका मन उतावला पड़ने लगा। उसने फेह और नील से कहा-
''चलो, तुम टेली देखो, तुम्हारी मम्मी अभी आती है।''
बच्चे चले गए। बलदेव उठकर कपडे पहनने लगा।
एलीसन बोली-
''अभी तो बहुत समय पड़ा है, पड़ा रहता।''
''एलीसन, मुझे ज़रा जल्दी जाना है।''
''ठीक है, चल मैं चाय बना देती हूँ।'' कहती हुई वह भी उठ खड़ी हुई।
चाय खत्म करके बलदेव उठकर चल पड़ा। एलीसन ने रोक कर घर की एक चाबी देते हुए कहा-
''डेव, फिक्र करना छोड़ दे, यहाँ मजे से रह, जब तक दिल करे, तनाव मुक्त हो।''
''एलीसन, मैं तनाव मुक्त ही ज्यादा रहता हूँ, बल्कि मेरी यही समस्या है कि मैं किसी बात को गंभीरता से नहीं लेता।''
''फिर, अब किधर भाग चला है ?''
''मुझे कोई बात याद आ गई।''
''शाम को आएगा ?''
''हाँ, एलीसन अब कुछ दिन तेरे पास रहूँगा।''
''कुछ दिन ही ?''
जवाब में बलदेव हँसा और बाहर निकल गया। कार में बैठते हुए उसने पीछे मुड़कर देखा। फेह और नील उसे हाथ हिला रहे थे। उससे उनकी तरफ देखा नही गया। पता नहीं कितनी बार अनैबल और
शूगर ऐसे ही सिमरन के कमरे में जाती होंगी। उसने तो कभी अपनी बेटियाँ देखने तक की कोशिश नहीं की थी। अब तक तो उन्हें याद भी नहीं रहा होगा कि उनका वह डैडी भी था कि नहीं। शायद किसी अन्य को डैडी कहने लग पड़ी हों। फिर वह अपने दिल को तसल्ली देने लगा कि सिमरन ऐसी नहीं थी। उसने घड़ी देखी। अभी सात ही बजे थे। उसका दफ्तर तो नौ बजे खुलना था। उसके मन में आया कि क्यों न एक नज़र दोनों लड़कियों को देख ही आए। फिर उसी वक्त उसे ख़याल आया कि वह इतना कमज़ोर नहीं। उसे अपनी मजबूती संभालकर रखनी चाहिए।
क्लैपहम के साथ ही वाटरलू था। मुश्किल से पन्द्रह मिनट की ड्राइव पर। ट्रफिक भी नहीं था। वह दफ्तर के आगे पहुँच गया। वहाँ कुछ भी नहीं था। अभी बहुत समय था। उसके मन में विचार आया कि क्यों न सिमरन से मिलकर बेटियों से मिलने के विषय में सोचे। यदि उनसे मिलेगा तो जान-पहचान बनी रहेगी। सिमरन से मिलने में कोई नुकसान नहीं था। उससे तो अब उसका कोई वास्ता नहीं था। कोई तेर-मेर नहीं रही थी। वह जो चाहे करती घूमे और बलदेव जहाँ चाहे जाता रहे। उसने कार आगे बढ़ाई और वॉलफोर्ड की ओर चल दिया। टॉवर ब्रिज पार करके सिटी एअरपोर्ट के साइन पकड़े। ब्लैकवैल टनल दायीं ओर रह गया। अब ट्रैफिक कुछ बढ़ना शुरू हो गया था।
सिमरन का स्वभाव था- सीधी बात करने का, बगैर किसी फ़रेब के। ली हारवे के संग संबंधों के विषय में भी वह संक्षिप्त-सा उत्तर देकर पीछा छुड़ाने लगती थी। शायद बात वैसी हो ही न जैसा कि बलदेव सोचे बैठा था। वह अब अपने काम पर भी देखा ही करता था कि स्त्रियाँ दूसरे पुरुषों के साथ कितनी छूट ले लिया करती थीं जब कि उनका कोई खास मतलब नहीं होता था। यदि किसी के संग टेबल अथवा ड्यूटी की निकटता हो, फिर तो अधिकांश समय इकट्ठे ही बीतता है। वह स्वयं भी पैम के साथ कितनी-कितनी देर बैठा बातें करता रहता था। लेकिन उसका कोई अर्थ नहीं निकलता था। ऐसी बातें सोचते हुए उसका दिल ज़ोर से धड़कने लग पड़ा। उसने घड़ी देखी। साढ़े आठ बजे थे। वह अंदाजा लगा रहा था कि सिमरन घर से निकल चुकी होगी। उसने अख़बार खरीदी और कार में बैठकर पढ़ते हुए सिमरन की प्रतीक्षा करने लगा। अख़बार में उसका ध्यान नहीं था। वह रह-रहकर बैंक के कार पॉर्क की तरफ़ देखता कि सिमरन अभी आई कि आई। एक बार कार पॉर्क का चक्कर भी लगा आया और फिर स्वयं ही अपने उतावलेपन पर हँसने लगा। उसने सोचा कि शायद सिमरन ने कार बदल ली हो। सिमरन को कारों से बेहद प्यार था। बलदेव के जन्म दिन पर उसने उसे यह वाली कार लेकर दी थी। याद आते ही बलदेव ने स्टेयरिंग पर हौले-हौले हाथ फेरना शुरू कर दिया।
वह इंतज़ार करता रहा। सिमरन कहीं भी आती हुई दिखाई न दी। शायद वह मिस कर गया हो। बहुत मुश्किल से साढ़े नौ बजे। बैंक खुला। ग्राहकों की लम्बी कतार थी। काउंटर के पीछे सिमरन उपस्थित नहीं थी। उसने इन्कुआरी पर जाकर घंटी बजाई। एक अधेड़ उम्र का व्यक्ति आया जिसके बैज पर लिखा हुआ था- याकूब सुमरो। बलदेव ने पूछा-
''कैन आई सी मिस बैन्ज़ ?''
''हैलो जी, आप मि. बैंस हैं ?''
याकूब सुमरो ने पंजाबी में बात की। बलदेव बोला-
''हाँ, आप सिमरन को बुला सकते हैं ?''
''आओ जी, बताओ क्या पियोगे ? चाय या ठंडा ?''
''शुक्रिया, अगर आप उसे बुला दें तो...''
''वो तो जी छुट्टियों पर गई हुई है, कनेरी आयलैंड, ली हारवे के साथ।''
बलदेव पर जैसे बिजली गिर पड़ी। वह संभलता हुआ बोला-
''कब वापस आ रही है, कुछ पता ?''
''एक मिनट जी, पूछ कर बताता हूँ।''
उसने वहीं खड़े होकर काउंटर पर बैठी गोरी से पूछा-
''बारबरा, सिम और ली छुट्टियों से कब वापस आ रहे हैं ?''
''अगले सोमवार।''
बारबरा ने याकूब की तरफ तिरछा-सा देखते हुए कहा।
याकूब व्यंग्य में मुस्कराते हुए बलदेव से बोला-
''जी नेक्सट मंडे, क्या हाल है आपका ? आप कभी आया करो टाइम निकाल कर।''
(जारी…)
लेखक संपर्क :
67, हिल साइड रोड,साउथाल, साउथाल, मिडिलसेक्स, इंग्लैंड, दूरभाष : 020-85780393,07782-265726(मोबाइल)
बुधवार, 3 नवंबर 2010
धारावाहिक पंजाबी उपन्यास(किस्त- 31)
रविवार, 10 अक्टूबर 2010
गवाक्ष – अक्तूबर 2010
“गवाक्ष” ब्लॉग के माध्यम से हम हिन्दी ब्लॉग-प्रेमियों को हिन्दी/पंजाबी के उन प्रवासी लेखकों/कवियों की समकालीन रचनाओं से रू-ब-रू करवाने का प्रयास करते आ रहे हैं जो अपने वतन हिन्दुस्तान से कोसों दूर बैठकर अपने समय और समाज के यथार्थ को अपनी रचनाओं में रेखांकित कर रहे हैं। “गवाक्ष” में अब तक विशाल (इटली), दिव्या माथुर (लंदन), अनिल जनविजय (मास्को), देवी नागरानी(यू.एस.ए.), तेजेन्द्र शर्मा(लंदन), रचना श्रीवास्तव(लंदन), पूर्णिमा वर्मन(दुबई), इला प्रसाद(यू एस ए), भगत धवन (डेनमार्क), चाँद शुक्ला (डेनमार्क), वेद प्रकाश ‘वटुक’(यू एस ए), रेखा मैत्र (यू एस ए), तनदीप तमन्ना (कनाडा), प्राण शर्मा (यू के), सुखिन्दर (कनाडा), सुरजीत(कनाडा), डॉ सुधा धींगरा(अमेरिका), मिन्नी ग्रेवाल(कनाडा), बलविंदर चहल (न्यूजीलैंड), बलबीर कौर संघेड़ा(कनाडा), शैल अग्रवाल (इंग्लैंड), श्रद्धा जैन (सिंगापुर), डा. सुखपाल(कनाडा), प्रेम मान(यू.एस.ए.), (स्व.) इकबाल अर्पण, सुश्री मीना चोपड़ा (कनाडा) आदि की रचनाएं और पंजाबी कथाकार-उपन्यासकार हरजीत अटवाल के उपन्यास “सवारी” के हिंदी अनुवाद की उन्तीसवीं किस्त आपने पढ़ीं। “गवाक्ष” के अक्तूबर 2010 अंक में प्रस्तुत हैं - डा. हरदीप कौर संधु(आस्ट्रेलिया) की कविताएं तथा हरजीत अटवाल के धारावाहिक पंजाबी उपन्यास “सवारी” की तीसवीं किस्त का हिंदी अनुवाद…
आस्ट्रेलिया से
डा. हरदीप कौर संधु की पाँच कविताएं
माँ मेरी ने चादर काढ़ी…
माँ मेरी ने
इक चादर काढ़ी
उस पर डालीं
फूल-पत्तियाँ
पलंग पर
जब बिछाऊँ चादर
माँ तुझको
तकती हैं अँखियाँ
फूल हैं चादर के
तेरा चेहरा माँ री
पत्तियाँ लगें तेरे पपोटे
बड़ी रीझ से चादर काढ़ी
दी बेटी को प्यार पिरोके
जब भी उठती हूक कलेजे
झट चादर पर जा बैठती
निहार-निहार कर फूल-पत्तियाँ
संग तेरे दो बातें कर लेती
खोल कर तुम भी बाहें अपनी
मुझे बुक्कल में हो भर लेती।
०
डा. हरदीप कौर संधु की पाँच कविताएं
माँ मेरी ने चादर काढ़ी…
माँ मेरी ने
इक चादर काढ़ी
उस पर डालीं
फूल-पत्तियाँ
पलंग पर
जब बिछाऊँ चादर
माँ तुझको
तकती हैं अँखियाँ
फूल हैं चादर के
तेरा चेहरा माँ री
पत्तियाँ लगें तेरे पपोटेबड़ी रीझ से चादर काढ़ी
दी बेटी को प्यार पिरोके
जब भी उठती हूक कलेजे
झट चादर पर जा बैठती
निहार-निहार कर फूल-पत्तियाँ
संग तेरे दो बातें कर लेती
खोल कर तुम भी बाहें अपनी
मुझे बुक्कल में हो भर लेती।
०
नन्हीं नन्हीं सी बातें
बचपन में
नन्हों की
नन्हीं नन्हीं सी बातें
टोकरी ले
छोटी सी छड़ी से
थोड़ा टेड़ा करते
छड़ी को
एक लम्बी रस्सी बाँधते
टोकरी के नीचे
रोटी का चूरा
मुट्ठी भर दाने
थोड़ा -सा पानी रखते
फिर किसी कोने में
चुपके से जा छुपते
शोर मत करना
साथियों को कहते
पक्षी उड़ते -उड़ते
देख कर रोटी
दाना..... पानी
बिन टोकरी देखे
जैसे ही करीब आते
अपनी समझ में
हम फुर्ती दिखाते
धीरे से...
रस्सी खींचते
टोकरी गिरते ही
पक्षी उड़ते....
चिड़िया फुर्र....र..र
कबूतर फुर्र....र..र
पक्षी फु्र्र कर जाते
हाथ मलते हम रह जाते
बिन साहस हारे
दोस्तों के सहारे
फिर टोकरी रखते
कभी- न- कभी
कोई- न- कोई
कबूतर - चिड़िया
पकड़ी जाती
पंखों को कर
हरा गुलाबी
छोड़ देते
खुले आकाश में
लगा कर अपने-अपने
नाम की परची
ये मेरी चिड़िया.....
वो तेरा कबूतर....
०
रब न मिला
पूजा के उपरान्त
अगरबत्ती की राख ही
हाथ आई थी मेरे
बहुत ढूँढा....बहुत ही ढूँढा
रब न मिला मुझे
एक दिन मन में
रब को मिलने की ठानी
खाना न मैं खाऊँगी
मैं भूखी ही मर जाऊँगी
पूजा के उपरान्त
अगरबत्ती की राख ही
हाथ आई थी मेरे
बहुत ढूँढा....बहुत ही ढूँढा
रब न मिला मुझे
एक दिन मन में
रब को मिलने की ठानी
खाना न मैं खाऊँगी
मैं भूखी ही मर जाऊँगी
जब तक रब को न पाऊँगी
तभी एक भिखारी ने
मेरे द्वार आ दस्तक दी
भूखा था वो शायद
माँग रहा था वो खाना
मैने कहा अभी नहीं
मैं तो रब को खोज रही हूँ
थोड़ी देर बाद तुम आना
फिर एक कुतिया ने
मेरे सामने आ ‘चऊँ –चऊँ’ करने लगी
भूखी होगी वो भी शायद
पर मैने उसे भी फटकारा
थोड़ी देर बाद...
एक बूढ़ी अम्मा आकर बोली
बेटी रास्ता भूल गई हूँ
और सुबह से भूखी भी हूँ
क्या थोड़ा खाने को दोगी
मैने कहा .....
जा.. री.. जा...
जा... री... अम्मा
रास्ता नाप तू अपना
मैं तो कर रही हूँ

इन्तज़ार अपने रब का
तभी आसमान में
गूँजी एक आवाज़
किस रब का
है तुझे इन्तज़ार
मैं तो आया
तीन बार तेरे द्वार
पर तूने मुझे
ठुकराया बार-बार
तभी एक भिखारी ने
मेरे द्वार आ दस्तक दी
भूखा था वो शायद
माँग रहा था वो खाना
मैने कहा अभी नहीं
मैं तो रब को खोज रही हूँ
थोड़ी देर बाद तुम आना
फिर एक कुतिया ने
मेरे सामने आ ‘चऊँ –चऊँ’ करने लगी
भूखी होगी वो भी शायद
पर मैने उसे भी फटकारा
थोड़ी देर बाद...
एक बूढ़ी अम्मा आकर बोली
बेटी रास्ता भूल गई हूँ
और सुबह से भूखी भी हूँ
क्या थोड़ा खाने को दोगी
मैने कहा .....
जा.. री.. जा...
जा... री... अम्मा
रास्ता नाप तू अपना
मैं तो कर रही हूँ
इन्तज़ार अपने रब का
तभी आसमान में
गूँजी एक आवाज़
किस रब का
है तुझे इन्तज़ार
मैं तो आया
तीन बार तेरे द्वार
पर तूने मुझे
ठुकराया बार-बार
अगर रब को है तुमने पाना
छोड़ दे तू इधर-उधर भटकना
और रहता तेरे पास ही हूँ
ज़रा अपने मन की
खोल तू आँखें
पाओगी मुझे
हर प्राणी में
०
०
आटे की चिड़िया
मुन्नी जब रोए
आटे की चिड़िया से
माँ पुचकारे
चिड़िया जब मिली
मुन्नी के चेहरे पर
मुस्कान खिली
आँखें हैं भरी
अभी भी लबा-लब
हँसी भी छूटी
कोमल लबों पर
पकड़ कर चिड़िया
बोली नन्ही गुड़िया-
'' माँ...ओ...माँ...
ये तैसी है...
चिरिया छोती सी
न उदती है...
न करती चीं-चीं...
खाकर नोती
और.....दाने
पीकर दुधू
और....पानी
बदी हो जाएगी
चिरिया नानी
बदी होतर
फुर्र...र हो जाएगी
फिर तिसी के
हाथ न आएगी
जब मैं बुलाऊँ
उदती आएदी
मुन्नी जब रोए
आटे की चिड़िया से
माँ पुचकारे
चिड़िया जब मिली
मुन्नी के चेहरे पर
मुस्कान खिली
आँखें हैं भरी
अभी भी लबा-लब
हँसी भी छूटी
कोमल लबों पर
पकड़ कर चिड़िया
बोली नन्ही गुड़िया-
'' माँ...ओ...माँ...
ये तैसी है...
चिरिया छोती सी
न उदती है...
न करती चीं-चीं...
खाकर नोती
और.....दाने
पीकर दुधू
और....पानी
बदी हो जाएगी
चिरिया नानी
बदी होतर
फुर्र...र हो जाएगी
फिर तिसी के
हाथ न आएगी
जब मैं बुलाऊँ
उदती आएदी
मीथे-मीथे...
गीत सुनाएगी
चीं-चीं कर....
मुझे जगाएगी
दादी की कहानी वाली
चिरिया बन जाएगी!!''
०
दस हाइकु
माँ और बेटी
माँ और बेटी
दु:ख सुख टटोलें
टैलीफोन से ।
०
०
अँधेरी रात
देती सदा पहरा
बापू की खाँसी ।
०
कर्म से सजे
सबसे सुन्दर हैं
सर्जक हाथ
०
सबसे सुन्दर हैं
सर्जक हाथ
०
रक्षा का धागा
बहन ने भाई की
कलाई बाँधा।
०
कच्चा ये धागा
भाई-बहन बीच
प्रेम प्रतीक
०
भाई-बहन बीच
प्रेम प्रतीक
०
दादी का ख़त
कैसे वो पढ़ पाए
हिन्दी न आए
०
कैसे वो पढ़ पाए
हिन्दी न आए
०
चाटी की लस्सी
गाँव जाकर माँगी
गए बटोही
वे देश अनजान
छोड़ निशान
०
प्रवासी ढूँढ़े घर
धीरे धीरे जड़ जमाए
रोपा गया जो पौधा
०
धीरे धीरे जड़ जमाए
रोपा गया जो पौधा
०
डा. हरदीप कौर संधुजन्म: बरनाल़ा (पंजाब)
सम्प्रति निवास: सिडनी (आस्ट्रेलिया)
शिक्षा: बी.एससी., एम.एससी(बनस्पति विज्ञान), एम. फिल(प्लांट इकोलोजी), पी.एच-डी. (बनस्पति विज्ञान)
कार्य: अध्यापन
ई मेल :hindihaiku@gmail.com
हिंदी ब्लॉग : http://hindihaiku.wordpress.com/
पंजाबी ब्लॉग : http://punjabivehda.wordpress.com/
धारावाहिक पंजाबी उपन्यास(किस्त- 30)
हरजीत अटवाल
हिंदी अनुवाद : सुभाष नीरव
॥ पैंतीस ॥
बलदेव काम पर से बाहर निकला तो पानी बरस रहा था। बारिश के कारण ठंड भी बहुत थी। उसने सिर पर कैप लगा ली ताकि ऐनक बारिश से बची रहे। बड़ी जैकेट के कॉलर खड़े किए और थेम्ज़ के किनारे की तरफ चल पड़ा। थेम्ज़ के साथ-साथ चलता वह सोचने लगा कि यह दरिया इस समय चढ़ रहा था या उतर रहा था। एक तो वैसे ही अँधेरा अच्छी तरह उतर चुका था, फिर बारिश इर्द-गिर्द की रोशनियों को रोक रही थी। दरिया की गति का कुछ पता न चल सका। हल्की-सी लहरें चमकतीं और एक-दूसरी में समा जातीं। दरिया किनारे इस वक्त कोई भी नहीं था। कारें गुजर रही थीं जो कि थोड़ा हटकर थीं। और वह अपने आप को बहुत अकेला पा रहा था।
मैरी ने टैड और मिच्च के आने की ख़बर सुनाई तो वह उसी वक्त अगले पड़ाव के लिए तैयार होने लगा था। सारा दिन काम पर इन्हीं सोचों में गुम हुआ घूमता रहा था। मैरी का इसमें कोई कसूर नहीं था। वह तो आयरलैंड से लौटते ही उसे इशारे करने लग पड़ी थी। जैसे वह कई बार स्थिति को स्पष्ट करने से झिझकता था, इसी तरह मैरी ने किया। जो कुछ भी हुआ, पर एक बार फिर वह हार गया था। इस हार को लेकर वह कहाँ जाए। गुरां के पास तो वह जाएगा ही नहीं। गैरथ का फ्लैट उसे पसन्द नहीं था, बदबू जो मारता था। शौन भी यहाँ नहीं था। शौन ने तो पलटकर फोन तक नहीं किया था कि कहाँ था वह और किस हालत में था।
बारिश कुछ तेज हो गई। उसने वैस्ट मनिस्टर ब्रिज पार कर लिया और अंडर ग्राउंड स्टेशन में जा घुसा। यहाँ गरमाहट थी। जैकेट उतार कर पानी झाड़ा। कैप को भी उतार कर फटका। ऐनक साफ की और एस्कालेटर से नीचे उतर गया। ट्यूब पकड़कर वह टफनल पॉर्क आ गया। उसने डार्टमाउथ हाउस की तरफ चलना आरंभ कर दिया। बरसात थम चुकी थी। एस्टेट के अन्दर आकर उसने मैरी के फ्लैट की ओर देखा। बत्तियाँ जल रही थीं। टैड और मिच्च आ गए होंगे। वह शीघ्रता से अपनी कार में बैठ गया। यह शुक्र था कि किसी ने उसे देखा नहीं था। कार स्टार्ट करके वह मेन रोड पर आ गया। अब स्टेयरिंग किसी तरफ नहीं घूम रहा था। गर्मी के दिन होते तो वह पहले की भांति कार पॉर्क में जाकर सो जाता। उसे ख़याल आया कि कोई बैड एंड ब्रेकफास्ट ही खोजा जाना चाहिए। वह कैमडन रोड पर आ गया। यहाँ कुछ बैड और ब्रेकफास्ट थे। कई लोगों ने विक्टोरियन हाउसिज़ को तब्दील करके होटल बना लिए थे। कैमडन रोड के घर कुछ-कुछ क्लैपहम हाई रोड के घरों से मिलते जुलते थे। यहाँ एलीसन रहती थी। फिर उसने सोचा, क्यों न वह एलीसन को फोन करे। शौन के विषय में ही पूछे। उसने एक टेलीफोन बूथ के आगे कार रोकी। पहले कुछ 'बैड एंड ब्रेकफास्ट' को फोन करके उनसे रात के लिए कमरे का किराया पूछा और हफ्तेभर के किराये के बारे में भी पूछताछ की। सभी मंहगे थे। फिर उसने एलीसन को फोन घुमा दिया।
''एलीसन, मैं डेव, शौन का दोस्त।''
''हाँ, शौन का फोन आया था, तेरे बारे में पूछता था।''
''कहाँ है वो ?''
''अमेरिका में ही है अभी वह। न्यूजीलैंड जाने की तैयारी में है।''
''मैं शौन के बारे में सोच रहा था कि तेरा ख़याल आ गया।''
''मैं तो तेरे फोन का बहुत दिनों से इंतज़ार कर रही थी। अगर मेरे पास तेरा नंबर होता तो मैं कर लेती। एक तो तेरी डाक आई पड़ी है, दूसरा यदि तेरा रहने का इंतज़ाम अभी नहीं हुआ हो तो तू यहाँ अस्थायी तौर पर रह सकता है।''
''डाक लेने कब आऊँ ?''
''आज ही आ जा।''
''तेरे लिए अब लेट तो नहीं ?''
''नहीं, लेट कैसा... तेरी मर्जी है।''
फोन रखकर वह सोचने लग पड़ा कि नया दरवाजा खुलता प्रतीत हो रहा है। उसकी कार एलीसन के घर की तरफ दौड़ती रही और वह सोचता रहा कि वह एलीसन के यहाँ ही रुक जाए या कोई दूसरा प्रबंध करे। एलीसन के द्वार तक पहुँचते-पहुँचते वह पूरी तरह तय नहीं कर सका था कि उसे क्या करना चाहिए। उसने बेल बजाई। फेह ने दरवाजा खोला और पूछने लगी-
''तुम डेव हो ?''
''हाँ, तुम्हें कैसे पता ?''
''उस दिन शौन अंकल के साथ आए थे तो मम्मी भी तेरे बारे में बातें करती थी।”
तभी, रसोई में से एलीसन भी आ गई और टेलीविजन के सामने से उठकर नील भी। एलीसन बोली-
''तू तो बहुत ही थका थका-सा लगता है। ठीक तो है ?''
''हाँ, मैं ठीक हूँ। तू कैसी है ?''
''मैं भी ठीक हूँ। आ बैठ जा। मैं कैटल ऑन करती हूँ।''
कुछ ही मिनट में वह चाय बना लाई। कप उसके हाथ में थमाते हुए बोली-
''संग कुछ खाएगा ?''
''नहीं।''
''डिनर करेगा ?''
''तुमने खा लिया ?''
''बच्चे तो खा चुके हैं। तू बता, खाना है तो चिप्स और पाई हैं।''
''हाँ, खा लूँगा।''
बलदेव चाय की चुस्कियाँ लेने लगा। एलीसन ने पुन: पूछा-
''डेव, तू ठीक तो है ?''
बलदेव अपने हाथों की ओर देखता हुआ कहने लगा-
''हाँ, मैं ठीक हूँ। यह मौसम खराब है।''
''रहने की समस्या है तो एक कमरा खाली ही है।''
''एलीसन, मैं यहाँ सैटी पर ही काम चला लूँगा।''
''नहीं, तू ऊपर आराम से सोना। मैं तो पहले से ही बच्चों के कमरे में ही सोती हूँ।'' कहती हुई वह उठ कर ऊपर चली गई। कुछ देर बार लौटकर आई और बोली-
''तेरा कमरा तैयार है, तू जब चाहे जाकर सो सकता है।''
''और शौन क्या बात करता था फोन पर ?''
''कुछ खास नहीं, तेरे भाई के घर उसने फोन करके तेरे बारे में पूछा था। तेरी बहुत फिक्र करता था।''
''दोस्त जो हुआ, हम बहुत समय से इकट्ठे हैं।''
''डेव, देख उसकी बदकिस्मती... कैसी पत्नी मिली। कैरन तेरे मुल्क की ही है न ?''
''नहीं, मॉरीशस की है। हाँ, मेरे रंग की ज़रूर है।''
''एक ही बात है... शौन बताता था कि वहाँ भी सब इंडियन ही हैं।''
''हाँ।''
''डेव, असल में मैं कैरन की समस्या को थोड़ा-थोड़ा समझती हूँ, उसे शौन पर बहुत आशाएँ थीं।''
''हाँ, शौन ने भी उसके लिए बहुत कुछ किया है, उसकी हर ख्वाहिश पूरी करने की कोशिश की है।''
''डेव, मुझे लगता है, कैरन को इस विवाह से जो वह चाहती थी, उसे मिला नहीं।''
''एलीसन, यह भी हो सकता है पर दोनों के स्वभाव की समस्याएँ भी हैं।''
''जो भी हो, पर देख शौन की तकदीर, कहाँ-कहाँ भटकता घूम रहा है इस वक्त, अपना घरबार छोड़कर। उसकी बेटी की बेकद्री हो रही है।''
कहते हुए एलीसन ने आँखें भर लीं। वह शौन की चिंता करती जा रही थी या फिर पैटर्शिया की। कैरन से उसकी अधिक हमदर्दी नहीं थी। एलीसन पूछने लगी-
''तू कैरन से कभी मिला है ?''
''नहीं।''
''डेव, मैं कैरन से मिली थी। शौन कहता था कि सब कुछ देखकर आऊँ। फॉदर जॉअ उसकी मदद कर रहा है। शौन में ही सब लोग दोष निकाल रहे हैं। वह अपनी जिम्मेदारी से भाग गया, यह सच्चे क्रिश्चियन को शोभा नहीं देता। मैं तो यही प्रार्थना करती हूँ कि वह अपने घर लौट आए।''
कहकर वह उठी और बच्चों को सोने की हिदायतें देनी लगी। तीन चार बोतलें लाकर बलदेव के सामने रखते हुए कहने लगी-
''ये सब शौन की पड़ी हैं, मैं तो पीती नहीं, तूने जो पीनी है, पी ले।''
''मैं नहीं पीता, कोई साथ अगर दे तो कभी कुछ ले लेता हूँ।''
''तेरा साथ ज़रूर दूँगी पर बहुत छोटी ड्रिंक के साथ।''
गिलासों में वोदका उंडेलता बलदेव एलीसन के बारे में सोचने लगा। मैरी से काफ़ी भिन्न थी वह। शरीर उससे अधिक गुदगुदा था। पीछा भी मैरी जितना तराशा हुआ नहीं था। घुंघराले भूरे बालों को कर्ल डाले हुए थे। एक लट रह-रह कर उसके चेहरे पर गिर रही थी जिसे वह झटक देती। बलदेव उसकी तरफ चोर निगाहों से देखता तो उसे अपनी ओर गौर से देखता हुआ पाता। बलदेव के मन में बेचैनी-सी
होने लगती। मैरी का चेहरा उसके मन में से गायब हो रहा था। उसकी जगह एलीसन की सूरत उभरने लगी। वह हैरान था कि यह तो स्विच ऑन-ऑफ़ करने भर की ही देर लगी थी। शायद, यह नशे का सुरूर भी हो। जो भी था उसे अच्छा लग रहा था। उसने एलीसन से कहा-
''मैं नहीं जानता था कि शौन की बहन इतनी खूबसूरत है।''
''तू तब आया तो था।''
''पर मैं तेरी तरफ ध्यान से देख नहीं सका था।''
एलीसन कुछ शरमाकर कहने लगी-
''शौन, मेरा भाई मुझ पर बहुत हुक्म चलाता है। जिस दिन तुम दोनों आकर लौट गए थे, उस दिन गुस्से से भरा फोन आया कि मैं तेरे लिए इतना सुन्दर मर्द खोजकर लाया और तूने उसे ठीक से बुलाया भी नहीं। अब फोन पर भी यही झगड़ा करता था कि मुझे तेरे से अच्छा मर्द नहीं मिल सकता।''
''तू क्या कहती है फिर ?''
''ठीक है, देखने में तो ठीक है, दिल को लुभाता है पर इतनी जल्दी मैं क्या कह सकती हूँ।''
बलदेव के वह एकदम सामने बैठी थी। बलदेव ने उसकी तरफ हाथ बढ़ाया। उसने उसके हाथ पर अपना हाथ रख दिया। बलदेव ने उसे खींच कर अपने संग बिठा लिया और कहा-
''एलीसन, अब बता मेरे बारे में और क्या सोचती है ?''
''अभी मेरा कोई तर्जुबा नहीं, कल बताऊँगी।''
(जारी…)
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हिंदी अनुवाद : सुभाष नीरव
॥ पैंतीस ॥
बलदेव काम पर से बाहर निकला तो पानी बरस रहा था। बारिश के कारण ठंड भी बहुत थी। उसने सिर पर कैप लगा ली ताकि ऐनक बारिश से बची रहे। बड़ी जैकेट के कॉलर खड़े किए और थेम्ज़ के किनारे की तरफ चल पड़ा। थेम्ज़ के साथ-साथ चलता वह सोचने लगा कि यह दरिया इस समय चढ़ रहा था या उतर रहा था। एक तो वैसे ही अँधेरा अच्छी तरह उतर चुका था, फिर बारिश इर्द-गिर्द की रोशनियों को रोक रही थी। दरिया की गति का कुछ पता न चल सका। हल्की-सी लहरें चमकतीं और एक-दूसरी में समा जातीं। दरिया किनारे इस वक्त कोई भी नहीं था। कारें गुजर रही थीं जो कि थोड़ा हटकर थीं। और वह अपने आप को बहुत अकेला पा रहा था।
मैरी ने टैड और मिच्च के आने की ख़बर सुनाई तो वह उसी वक्त अगले पड़ाव के लिए तैयार होने लगा था। सारा दिन काम पर इन्हीं सोचों में गुम हुआ घूमता रहा था। मैरी का इसमें कोई कसूर नहीं था। वह तो आयरलैंड से लौटते ही उसे इशारे करने लग पड़ी थी। जैसे वह कई बार स्थिति को स्पष्ट करने से झिझकता था, इसी तरह मैरी ने किया। जो कुछ भी हुआ, पर एक बार फिर वह हार गया था। इस हार को लेकर वह कहाँ जाए। गुरां के पास तो वह जाएगा ही नहीं। गैरथ का फ्लैट उसे पसन्द नहीं था, बदबू जो मारता था। शौन भी यहाँ नहीं था। शौन ने तो पलटकर फोन तक नहीं किया था कि कहाँ था वह और किस हालत में था।
बारिश कुछ तेज हो गई। उसने वैस्ट मनिस्टर ब्रिज पार कर लिया और अंडर ग्राउंड स्टेशन में जा घुसा। यहाँ गरमाहट थी। जैकेट उतार कर पानी झाड़ा। कैप को भी उतार कर फटका। ऐनक साफ की और एस्कालेटर से नीचे उतर गया। ट्यूब पकड़कर वह टफनल पॉर्क आ गया। उसने डार्टमाउथ हाउस की तरफ चलना आरंभ कर दिया। बरसात थम चुकी थी। एस्टेट के अन्दर आकर उसने मैरी के फ्लैट की ओर देखा। बत्तियाँ जल रही थीं। टैड और मिच्च आ गए होंगे। वह शीघ्रता से अपनी कार में बैठ गया। यह शुक्र था कि किसी ने उसे देखा नहीं था। कार स्टार्ट करके वह मेन रोड पर आ गया। अब स्टेयरिंग किसी तरफ नहीं घूम रहा था। गर्मी के दिन होते तो वह पहले की भांति कार पॉर्क में जाकर सो जाता। उसे ख़याल आया कि कोई बैड एंड ब्रेकफास्ट ही खोजा जाना चाहिए। वह कैमडन रोड पर आ गया। यहाँ कुछ बैड और ब्रेकफास्ट थे। कई लोगों ने विक्टोरियन हाउसिज़ को तब्दील करके होटल बना लिए थे। कैमडन रोड के घर कुछ-कुछ क्लैपहम हाई रोड के घरों से मिलते जुलते थे। यहाँ एलीसन रहती थी। फिर उसने सोचा, क्यों न वह एलीसन को फोन करे। शौन के विषय में ही पूछे। उसने एक टेलीफोन बूथ के आगे कार रोकी। पहले कुछ 'बैड एंड ब्रेकफास्ट' को फोन करके उनसे रात के लिए कमरे का किराया पूछा और हफ्तेभर के किराये के बारे में भी पूछताछ की। सभी मंहगे थे। फिर उसने एलीसन को फोन घुमा दिया।
''एलीसन, मैं डेव, शौन का दोस्त।''
''हाँ, शौन का फोन आया था, तेरे बारे में पूछता था।''
''कहाँ है वो ?''
''अमेरिका में ही है अभी वह। न्यूजीलैंड जाने की तैयारी में है।''
''मैं शौन के बारे में सोच रहा था कि तेरा ख़याल आ गया।''
''मैं तो तेरे फोन का बहुत दिनों से इंतज़ार कर रही थी। अगर मेरे पास तेरा नंबर होता तो मैं कर लेती। एक तो तेरी डाक आई पड़ी है, दूसरा यदि तेरा रहने का इंतज़ाम अभी नहीं हुआ हो तो तू यहाँ अस्थायी तौर पर रह सकता है।''
''डाक लेने कब आऊँ ?''
''आज ही आ जा।''
''तेरे लिए अब लेट तो नहीं ?''
''नहीं, लेट कैसा... तेरी मर्जी है।''
फोन रखकर वह सोचने लग पड़ा कि नया दरवाजा खुलता प्रतीत हो रहा है। उसकी कार एलीसन के घर की तरफ दौड़ती रही और वह सोचता रहा कि वह एलीसन के यहाँ ही रुक जाए या कोई दूसरा प्रबंध करे। एलीसन के द्वार तक पहुँचते-पहुँचते वह पूरी तरह तय नहीं कर सका था कि उसे क्या करना चाहिए। उसने बेल बजाई। फेह ने दरवाजा खोला और पूछने लगी-
''तुम डेव हो ?''
''हाँ, तुम्हें कैसे पता ?''
''उस दिन शौन अंकल के साथ आए थे तो मम्मी भी तेरे बारे में बातें करती थी।”
तभी, रसोई में से एलीसन भी आ गई और टेलीविजन के सामने से उठकर नील भी। एलीसन बोली-
''तू तो बहुत ही थका थका-सा लगता है। ठीक तो है ?''
''हाँ, मैं ठीक हूँ। तू कैसी है ?''
''मैं भी ठीक हूँ। आ बैठ जा। मैं कैटल ऑन करती हूँ।''
कुछ ही मिनट में वह चाय बना लाई। कप उसके हाथ में थमाते हुए बोली-
''संग कुछ खाएगा ?''
''नहीं।''
''डिनर करेगा ?''
''तुमने खा लिया ?''
''बच्चे तो खा चुके हैं। तू बता, खाना है तो चिप्स और पाई हैं।''
''हाँ, खा लूँगा।''
बलदेव चाय की चुस्कियाँ लेने लगा। एलीसन ने पुन: पूछा-
''डेव, तू ठीक तो है ?''
बलदेव अपने हाथों की ओर देखता हुआ कहने लगा-
''हाँ, मैं ठीक हूँ। यह मौसम खराब है।''
''रहने की समस्या है तो एक कमरा खाली ही है।''
''एलीसन, मैं यहाँ सैटी पर ही काम चला लूँगा।''
''नहीं, तू ऊपर आराम से सोना। मैं तो पहले से ही बच्चों के कमरे में ही सोती हूँ।'' कहती हुई वह उठ कर ऊपर चली गई। कुछ देर बार लौटकर आई और बोली-
''तेरा कमरा तैयार है, तू जब चाहे जाकर सो सकता है।''
''और शौन क्या बात करता था फोन पर ?''
''कुछ खास नहीं, तेरे भाई के घर उसने फोन करके तेरे बारे में पूछा था। तेरी बहुत फिक्र करता था।''
''दोस्त जो हुआ, हम बहुत समय से इकट्ठे हैं।''
''डेव, देख उसकी बदकिस्मती... कैसी पत्नी मिली। कैरन तेरे मुल्क की ही है न ?''
''नहीं, मॉरीशस की है। हाँ, मेरे रंग की ज़रूर है।''
''एक ही बात है... शौन बताता था कि वहाँ भी सब इंडियन ही हैं।''
''हाँ।''
''डेव, असल में मैं कैरन की समस्या को थोड़ा-थोड़ा समझती हूँ, उसे शौन पर बहुत आशाएँ थीं।''
''हाँ, शौन ने भी उसके लिए बहुत कुछ किया है, उसकी हर ख्वाहिश पूरी करने की कोशिश की है।''
''डेव, मुझे लगता है, कैरन को इस विवाह से जो वह चाहती थी, उसे मिला नहीं।''
''एलीसन, यह भी हो सकता है पर दोनों के स्वभाव की समस्याएँ भी हैं।''
''जो भी हो, पर देख शौन की तकदीर, कहाँ-कहाँ भटकता घूम रहा है इस वक्त, अपना घरबार छोड़कर। उसकी बेटी की बेकद्री हो रही है।''
कहते हुए एलीसन ने आँखें भर लीं। वह शौन की चिंता करती जा रही थी या फिर पैटर्शिया की। कैरन से उसकी अधिक हमदर्दी नहीं थी। एलीसन पूछने लगी-
''तू कैरन से कभी मिला है ?''
''नहीं।''
''डेव, मैं कैरन से मिली थी। शौन कहता था कि सब कुछ देखकर आऊँ। फॉदर जॉअ उसकी मदद कर रहा है। शौन में ही सब लोग दोष निकाल रहे हैं। वह अपनी जिम्मेदारी से भाग गया, यह सच्चे क्रिश्चियन को शोभा नहीं देता। मैं तो यही प्रार्थना करती हूँ कि वह अपने घर लौट आए।''
कहकर वह उठी और बच्चों को सोने की हिदायतें देनी लगी। तीन चार बोतलें लाकर बलदेव के सामने रखते हुए कहने लगी-
''ये सब शौन की पड़ी हैं, मैं तो पीती नहीं, तूने जो पीनी है, पी ले।''
''मैं नहीं पीता, कोई साथ अगर दे तो कभी कुछ ले लेता हूँ।''
''तेरा साथ ज़रूर दूँगी पर बहुत छोटी ड्रिंक के साथ।''
गिलासों में वोदका उंडेलता बलदेव एलीसन के बारे में सोचने लगा। मैरी से काफ़ी भिन्न थी वह। शरीर उससे अधिक गुदगुदा था। पीछा भी मैरी जितना तराशा हुआ नहीं था। घुंघराले भूरे बालों को कर्ल डाले हुए थे। एक लट रह-रह कर उसके चेहरे पर गिर रही थी जिसे वह झटक देती। बलदेव उसकी तरफ चोर निगाहों से देखता तो उसे अपनी ओर गौर से देखता हुआ पाता। बलदेव के मन में बेचैनी-सी
होने लगती। मैरी का चेहरा उसके मन में से गायब हो रहा था। उसकी जगह एलीसन की सूरत उभरने लगी। वह हैरान था कि यह तो स्विच ऑन-ऑफ़ करने भर की ही देर लगी थी। शायद, यह नशे का सुरूर भी हो। जो भी था उसे अच्छा लग रहा था। उसने एलीसन से कहा-''मैं नहीं जानता था कि शौन की बहन इतनी खूबसूरत है।''
''तू तब आया तो था।''
''पर मैं तेरी तरफ ध्यान से देख नहीं सका था।''
एलीसन कुछ शरमाकर कहने लगी-
''शौन, मेरा भाई मुझ पर बहुत हुक्म चलाता है। जिस दिन तुम दोनों आकर लौट गए थे, उस दिन गुस्से से भरा फोन आया कि मैं तेरे लिए इतना सुन्दर मर्द खोजकर लाया और तूने उसे ठीक से बुलाया भी नहीं। अब फोन पर भी यही झगड़ा करता था कि मुझे तेरे से अच्छा मर्द नहीं मिल सकता।''
''तू क्या कहती है फिर ?''
''ठीक है, देखने में तो ठीक है, दिल को लुभाता है पर इतनी जल्दी मैं क्या कह सकती हूँ।''
बलदेव के वह एकदम सामने बैठी थी। बलदेव ने उसकी तरफ हाथ बढ़ाया। उसने उसके हाथ पर अपना हाथ रख दिया। बलदेव ने उसे खींच कर अपने संग बिठा लिया और कहा-
''एलीसन, अब बता मेरे बारे में और क्या सोचती है ?''
''अभी मेरा कोई तर्जुबा नहीं, कल बताऊँगी।''
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07782-265726(मोबाइल)
शनिवार, 11 सितंबर 2010
गवाक्ष – सितम्बर 2010

“गवाक्ष” ब्लॉग के माध्यम से हम हिन्दी ब्लॉग-प्रेमियों को हिन्दी/पंजाबी के उन प्रवासी लेखकों/कवियों की समकालीन रचनाओं से रू-ब-रू करवाने का प्रयास करते आ रहे हैं जो अपने वतन हिन्दुस्तान से कोसों दूर बैठकर अपने समय और समाज के यथार्थ को अपनी रचनाओं में रेखांकित कर रहे हैं। “गवाक्ष” में अब तक पंजाबी कवि विशाल (इटली) की कविताओं का हिन्दी अनुवाद, दिव्या माथुर (लंदन) की कहानी, अनिल जनविजय (मास्को) की कविताएं, न्यू जर्सी, यू.एस.ए. में रह रहीं देवी नागरानी की ग़ज़लें, लंदन निवासी कथाकार-कवि तेजेन्द्र शर्मा, रचना श्रीवास्तव, दिव्या माथुर की कविताएं, दुबई निवासी पूर्णिमा वर्मन की कविताएं, यू एस ए में रह रहीं हिन्दी कथाकार-कवयित्री इला प्रसाद, डेनमार्क निवासी कवि भगत धवन की कविताएँ और चाँद शुक्ला की ग़ज़लें, यू एस ए निवासी कवि वेद प्रकाश ‘वटुक’ तथा कवयित्री रेखा मैत्र की कविताएं, कनाडा अवस्थित पंजाबी कवयित्री तनदीप तमन्ना की कविताएं, यू के अवस्थित हिन्दी कवि-ग़ज़लकार प्राण शर्मा की ग़ज़लें, कैनेडा में अवस्थित पंजाबी कवि सुखिन्दर की कविताएं, कनाडा निवासी पंजाबी कवयित्री सुरजीत, अमेरिका अवस्थित डॉ सुधा धींगरा, कनाडा में अवस्थित हिंदी- पंजाबी कथाकार - कवयित्री मिन्नी ग्रेवाल की कविताएं, न्यूजीलैंड में रह रहे पंजाबी कवि बलविंदर चहल की कविता, कैनेडा में अवस्थित पंजाबी लेखिका बलबीर कौर संघेड़ा की कविताएं, इंग्लैंड से शैल अग्रवाल की पाँच कविताएं, सिंगापुर से श्रद्धा जैन की ग़ज़लें, इटली में रह रहे पंजाबी कवि विशाल की कविताएं, यू एस ए में रह रहीं हिन्दी कथाकार-कवयित्री इला प्रसाद की एक लघुकथा, कैनेडा निवासी पंजाबी कवि डा. सुखपाल की कविता, यू.एस.ए. में अवस्थित हिंदी कवयित्री डॉ. सुधा ओम ढींगरा की कविताएं, यू.एस.ए. में अवस्थित पंजाबी कवि-कथाकार प्रेम मान की पंजाबी कविताएं, इकबाल अर्पण की एक ग़ज़ल और पंजाबी कथाकार-उपन्यासकार हरजीत अटवाल के उपन्यास “सवारी” के हिंदी अनुवाद की अट्ठाइसवीं किस्त आपने पढ़ीं। “गवाक्ष” के सितम्बर 2010 अंक में प्रस्तुत हैं - कैनेडा निवासी सुश्री मीना चोपड़ा की कविताएं तथा यू.के. निवासी पंजाबी कथाकार-उपन्यासकार हरजीत अटवाल के धारावाहिक पंजाबी उपन्यास “सवारी” की उन्तीसवीं किस्त का हिंदी अनुवाद…
मीना चोपड़ा की तीन कविताएं
(कविताओं के संग सभी चित्र : मीना चोपड़ा)
दुशाला
अँधेरों का दुशाला

मिट्टी को मेरी ओढ़े
अपनी सिलवटों के बीच
खुद ही सिमटता चला गया
और कुछ झलकती
परछाइयों की सरसराहट,
सरकती हुई
इन सिलवटों में
गुम होती चली गयी
मेरी नज़रों में सोई हुई
सुबह के कुछ आंसू
आँखों के किनारों से छलक पड़े
देखो तो सही
पूरब की पेशानी से उगती
मखमली रोशनी के उस टुकड़े ने
हरियाली के हसीन चेहरे पर
यह कैसी शबनम बिखेर दी है?
शाम के वक़्त
जो शाम के प्याले में भरकर
अँधेरी रात के नशीले होंठों का
जादूई जाम बना करती है
०
सर्द सन्नाटा
सुबह के वक़्त
आँखें बंद कर के देखती हूँ जब
तो यह जिस्म के कोनो से
ससराता हुआ निकल जाता है
सूरज की किरणे चूमती हैं
जब भी इस को
तो खिल उठता है यह
फूल बनकर
और मुस्कुरा देता है
आँखों में मेरी झांक कर
सर्द सन्नाटा
कभी यह जिस्म के कोनो में
ठहर भी जाता है
कभी गीत बन कर
होठों पे रुक भी जाता है
और कभी
गले के सुरों को पकड़
गुनगुनाता है
फिर शाम के
रंगीन अँधेरों में घुल कर
सर्द रातों में गूंजता है अक्सर
सर्द सन्नाटा
मेरे करीब
आ जाता है बहुत
बरसों से मेरा हबीब
सन्नाटा
०
सुबह के वक़्त
आँखें बंद कर के देखती हूँ जब
तो यह जिस्म के कोनो से
ससराता हुआ निकल जाता है
सूरज की किरणे चूमती हैं
जब भी इस को
तो खिल उठता है यह
फूल बनकर
और मुस्कुरा देता है
आँखों में मेरी झांक कर
सर्द सन्नाटा
कभी यह जिस्म के कोनो में
ठहर भी जाता हैकभी गीत बन कर
होठों पे रुक भी जाता है
और कभी
गले के सुरों को पकड़
गुनगुनाता है
फिर शाम के
रंगीन अँधेरों में घुल कर
सर्द रातों में गूंजता है अक्सर
सर्द सन्नाटा
मेरे करीब
आ जाता है बहुत
बरसों से मेरा हबीब
सन्नाटा
०
मुट्ठी भर आरज़ू
जीवन ने उठा दिया
चेहरे से अपने
शीत का वह ठिठुरता नकाब
फिर उसी गहरी धूप में
वही जलता सा शबाब
सूरज की गर्म साँसों में
उछलता है आज फिर से
छलकते जीवन का
उमड़ता हुआ रुआब
इन बहकते प्रतिबिम्बों के बीच
कहीं यह ज़िंदगी के आयने की
मचलती मृगतृष्णा तो नहीं?
किनारों को समेटे जीवन में अपने
कहीं यह मुट्ठी भर आरज़ू तो नहीं?
००
जीवन ने उठा दिया

चेहरे से अपने
शीत का वह ठिठुरता नकाब
फिर उसी गहरी धूप में
वही जलता सा शबाब
सूरज की गर्म साँसों में
उछलता है आज फिर से
छलकते जीवन का
उमड़ता हुआ रुआब
इन बहकते प्रतिबिम्बों के बीच
कहीं यह ज़िंदगी के आयने की
मचलती मृगतृष्णा तो नहीं?
किनारों को समेटे जीवन में अपने
कहीं यह मुट्ठी भर आरज़ू तो नहीं?
००
मीना चोपड़ाजन्म : नैनीताल (उत्तर प्रदेश)।
शिक्षा : बी.एस सी. (लखनऊ), टेक्सटाइल डिज़ाइनिंग में शिक्षा ।
प्रकाशन : पहला अंग्रेज़ी कविताओं का संकलन ’इग्नाइटिड लाईन्स’ १९९६ में इंग्लैंड में लोकार्पित हुआ। कविताओं का अनुवाद जर्मन भाषा में । कविताएँ अनेक राष्ट्रीय एवं अन्तर्राष्ट्रीय साहित्यिक पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित।
कला और अन्य गतिविधियाँ : एक कवयित्री होने के साथ-साथ एक चित्रकार भी हैं। अब तक राष्ट्रीय एवं अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर २५ से अधिक कला-प्रदर्शनियाँ लगा चुकी हैं। इन्होंने २००२ में ’साऊथ एशियन ऐसोसिएशन ऑफ़ रीजनल कोऑपरेशन’ द्वारा आयोजित कलाकारों की सभा में भारत का प्रतिनिधित्व किया।
मीना चोपड़ा कला-क्षेत्र में हमेशा से ही बहुत क्रियाशील रही हैं। भारत में "पोइट्री क्लब" की सचिव रही हैं। इसके अतिरिक्त कई व्यापारिक एवं कला संस्थाओं की सदस्या भी रह चुकी हैं। भारतवर्ष में इनका व्यवसाय "एडवर्टाइज़िंग" रहा है, जहाँ यह अपनी एडवर्टाइज़िंग एजेन्सी का संचालन करती रही हैं।
कैनेडा आने के बाद इन्होंने कई कलाकारों और कला प्रेमियों को संगठित कर एक कला संस्था का निर्माण किया, जिसका उद्देश्य भिन्न-भिन्न, जन-जातियों के लोगों को कला के द्वार समान स्थल पर लाकर जोड़ना, आपस की भावनाओं और कामनाओं को कला के द्वारा समझना और बाँटना है। कला जो हमेशा से सीमाओं में बंधती नहीं, उसे सीमाओं से आगे ले जाना ही इस संस्था का उद्देश्य है। इस संस्था को "क्रॉस-करंट्स इंडो-कनेडियन इंटरनेशनल आर्टस’ के नाम से जाना जाता है। यह संस्था २००५ से लगभग दस से अधिक कला समारोह एवं प्रदर्शनियाँ आयोजित कर चुकी है।
मीना चोपड़ा के बनाये हुए चित्र भारत तथा कई अन्य देशों में सरकारी, व्यवसायिक तथा संग्रहकर्ताओं के कला संग्रहों में हैं।
टेलीफोन : 905 819 8142
वेबसाइट्स :
http://meenasartworld.blogspot.com
http://childrens-art-competition.blogspot.com/
http://starbuzz-starbuzz.blogspot.com/
http://learnaheartland.blogspot.com/
धारावाहिक पंजाबी उपन्यास(किस्त- 29)
हरजीत अटवाल
हिंदी अनुवाद : सुभाष नीरव
॥ चौंतीस ॥
लॉरी से सामान उतरवा कर सतनाम और शिन्दा खड़े हुए ही थे कि मगील आ गया। दूर से ही बोला-
''सॉरी सैम, आज मुझे पता था कि शैनी भी आ जाएगा, काम थोड़ा ही हिस्से में आएगा, पर मेरे से पहुँचा नहीं गया।''
''क्या बात हो गई ?''
''मरीना... मेरी बेटी मरीना ने सारी रात मुसीबत डाले रखी।''
''क्या ?''
''बगैर किसी बात के झगड़ा। तू तो जानता ही है न इन औरतों को... जिन दिनों में इन्हें गुस्सा आता है, बस वही दिन चल रहे हैं। और उसका ब्वॉय फ्रैंड कई दिन से आया ही नहीं, बस यही मुसीबत है।''
''यू आर बास्टर्ड लौरल !... गेट लॉस्ट एंड डू समथिंग।''
सतनाम ने उसे धमकाते हुए काम पर लगा दिया।
शिन्दे का आज पहला दिन था सतनाम की दुकान पर। मगील उसका गाईड बन गया। छुरियाँ तीखी करने से लेकर आरी चलाने तक की ट्रेनिंग देने लगा। उसे था कि शिन्दे को अंग्रेजी नहीं आती। वह मुँह से कम बोलता और इशारे ज्यादा करता। वह उंगलियाँ दिखाते हुए बोला-
''छुरी ध्यान से... नहीं तो ये गईं... ये दो उंगलियाँ बहुत ज़रूरी, किसी को 'फक ऑफ' कहने के लिए... बीचवाली उंगली गुदा दिखाने के लिए।''
शिन्दा उसकी एक्टिंग पर हँसने लगा। मगील ने कहा-
''हँस मत। ध्यान से समझ, नहीं तो ग्राहक लैंब के साथ-साथ तेरी उंगलियाँ भी पका लेंगे।''
''मगील, तू मेरी ज्यादा चिंता मत कर।''
शिन्दे ने अंग्रेजी में कहा। मगील भड़कता हुआ बोला-
''मेरी इतनी मगजमारी यूँ ही करवाई। अगर तू समझता था तो बताया क्यों नहीं?''
पैट्रो ने शिन्दे को अपने पास बुलाते हुए कहा-
''शैनी, तू इधर आ, एक दिन में कुछ नहीं सीखा जाता, जल्दी मचाने की कोई ज़रूरत नहीं।''
फिर पैट्रो उसे मीट काटने के प्रारंभिक गुण बताने लगा कि मीट जोड़ों पर से आसानी से काटा जाता है। हड्डी वाले मीट पर इस तरह वार करना है कि एक ही वार में हड्टी कट जाए। सूअर की कटाई अलग और बीफ़ तथा लैंब की कटाई अलग। चिकन अलग। गर्दन और पूछ की कटाई में कैसे फर्क होता है,आदि। शिन्दा कहने लगा-
''पैट्रो, यह तो बहुत कारीगिरी का काम है।''
''और नहीं तो क्या। आज कल बुच्चरों की कमी इसी कारण ही है। यह बहुत स्किल्ड जॉब है।''
शराब की दुकान से यह काम बिलकुल अलग था। शिन्दे को अच्छा नहीं लग रहा था। लहू-मांस की बदबू नाक को चढ़ रही थी। हाथ भी लिबड़े से रहते। सफ़ेद रंग का कोट जल्द ही लाल रंग से भर जाता। कुछ दिन घिन्न-सी आती रही और फिर सब कुछ ठीक हो गया। दुर्गन्ध आनी भी बन्द हो गई। काम हालांकि अजमेर की दुकान से अधिक था, पर माहौल बहुत बढ़िया था। कोई किसी को चुभती हुई बात नहीं कहता था। कोई रौब नहीं डालता था। दिन भर हँसी-मजाक चलता रहता।
दोपहर को जुआइश आकर अपनी ही हाय-तौबा मचाने लगी। पहले दिन शिन्दे को उसने गाहक ही समझा था। जुआइश को देखते ही मगील कहने लगा था-
''सैनोरीटा, तेरे दुख के दिन दूर हो गए, अब तू खुश हो जा।''
''सैनिओर, तू मेरे लिए क्या खोजकर लाया है ?''
''ये देख, जवान लड़का, शैनी, सिर्फ़ तेरे लिए मंगवाया है।''
''पर सैनिओर, मैं तो तुझे पसन्द करती हूँ।''
''पर मेरा हरम इस वक्त भरा पड़ा है, शैनी से ही काम चला। देख इसकी जवानी।''
कहते हुए मगील शिन्दे की बाजू की मछलियों पर हाथ फेरने लगा। जुआइश शिन्दे से बोली-
''मैंने तुझे ऐंडी की दुकान पर देखा हुआ है।''
''मेरा बड़ा भाई जो है।''
''पर उसका स्वभाव सैम से एक दिन उलट है, हर वक्त खीझा ही रहता है।''
शिन्दे ने जुआइश की इस बात का कोई जवाब नहीं दिया। जुआइश मिनट भर प्रतीक्षा करके बोली-
''मैं नोइल रोड पर रहती हूँ, होर्नज़ी रोड से ऑफ़ है, ब्रिज के बाद। दोपहर-शाम यहाँ सफाई करती हूँ, सवेरे भी।''
कहकर वह अपने काम में लग गई थी।
पहले दिन ही सतनाम ने शिन्दे का हाथ देख लिया था कि वह काम में तेज था। वह सोचने लग पड़ा था कि अगर शिन्दा दुकान संभाल ले तो वह काम को थोड़ा बढ़ा ले। कुछ और रेस्ट्रोरेंट वगैरह को माल सप्लाई करने लग पड़े। वह पूरा दिन ही डिलवरी कर सकता था। होलसेल के काम के विषय में भी सोचा जा सकता था। साथ ही फ्रोजन मीट का भी काम चल सकता था। अब उसे पीछे की चिंता सताने लगी थी कि दुकान में सब ठीक ही हो। माइको को जुआ खेलने की आदत होने के कारण उसके द्वारा टिल्ल में से पैसे निकाल लेने का डर बना रहता। यद्यपि पैट्रो वहाँ था, फिर भी सतनाम को पीछे की फिक्र रहती ही थी। शिन्दा अब टिल्ल संभाल सकता था। वह सोच रहा था कि यदि शिन्दा टिक जाए तो उसके कितने ही मसले हल हो जाएँ।
दुकान बन्द करके सतनाम शिन्दे को अजमेर की ओर छोड़ने चला गया। अजमेर के साथ यही फैसला हुआ था कि शिन्दा अजमेर के पास ही रहता रहेगा। इतवार को उसकी दुकान संभालेगा। सतनाम तो पहले ही शिन्दे को अपने पास नहीं रख सकता था। मनजीत इन्कार किए जाती थी। उसे पता था कि मनजीत आई पर आ जाए तो अपनी बात मनवा कर ही हटती थी। सतनाम की दुकान से ही शिन्दा थका हुआ था। लेकिन वह दुकान में घुसते ही शैल्फों को भरने लग पड़ा। फ्रिज को देखने लगा कि ड्रिंक का कौन सा डिब्बा बिका ताकि उसकी जगह नया रख दे। टोनी बोला-
''शैनी, तू फिक्र न कर। मैंने सारा काम किया हुआ है।''
अजमेर अधिक खुश नहीं था। शिन्दा भी जानता था कि वह उसे सतनाम की ओर भेजकर दुखी था। उसे पचास पाउंड में ही इस्तेमाल करना चाहता था। सतनाम उसके मूड को ठीक करने के मकसद से कहने लगा-
''भाई, शिन्दा पुत तो बन गया पूरा झटकई, अब बेशक माहिलपुर के अड्डे में दुकान डाल ले। भाइया आज होता तो कितना खुश होता। उस नज़ीर हुसैन ने ऊपरवाले का शुक्रिया अदा करने से ही बाज नहीं आना था।''
''हाँ, तुम मुझे झटकाई बनाकर ही खूब खुश किए जाओ।''
अजमेर का मूड ज़रा-सा बदला पर फिर सख्त हो गया। अब तक शिन्दा भी समझ चुका था कि अजमेर कैसी बातों से मूड में आया करता है। उसने कहा-
''झटकाई तो कोट वाला रतना बाज़ीगर है, कभी उसने बकरी नहीं बनाई, सदा बकरा ही झटकेगा... भाई के विवाह पर भी बकरे उससे ही लिए थे।''
''उस समय तो बताते हैं, तुमने बकरे ही कई झटक दिए थे।'' कहते हुए सतनाम ने अजमेर की तरफ देखा।
''भाई का विवाह था, झटकने ही थे, झटके भी हमने शर्तें लगा-लगा कर कि देखें एक ही वार में गर्दन कौन उतारता है।''
''उतारी किसी ने ?''
''नहीं, बलदेव ने कई वार किए, बकरा ‘में-में’ करके चीखे, मैंने दो वार करके उतार दिया था। इस भाई ने तो सींगों पर ही किरपाण जड़ दी।''
''यूँ ही शराबी हुए शरारतें करते थे, और क्या।'' अजमेर बोला।
सतनाम कहने लगा, ''तुमने विवाह पर खर्चा ही बहुत कर दिया। ड्रम शराब का निकाल लिया, ठेके से भी बोरियाँ मंगवा लीं, गाँव के सारे कुक्कड़ खत्म कर दिए। इतनी भी भला क्या ज़रूरत थी।''
''ओ एक ही बार तो विवाह करवाना था। अगर तू भी वहाँ विवाह करवाता तो ऐसे ही धूमधाम से करते। इस शिन्दे का ज़रा पहले करना पड़ा, नहीं तो उस वक्त भी पटाखे बजाने थे।''
अजमेर अब पूरे रौ में था। शिन्दा कहने लगा-
''मैंने तो उस वक्त भाई को कहा था भई गाने वाली बुला लेते हैं, ऐसी क्या बात है।''
अजमेर ने फ्रिज में से टेनंट का डिब्बा निकाला और सबको थमाते हुए बोला-
''अपना रेपुटेशन है यार, ताया ने नाम कमाया हुआ है, ये गाने वाली तो हल्का टेस्ट है।''
फिर वह शिन्दे से कहने लगा-
''तू जा कर सो जा, सवेरे फिर जल्दी उठेगा।''
''नहीं भाई, कुछ नहीं होता। घंटे भर बाद ठहर कर पड़ लूँगा।''
शिन्दे के कहने पर अजमेर और भी खुश हो गया। सतनाम को तसल्ली थी कि अजमेर ने सब मंजूर कर लिया था। अजमेर ने कहा-
''गिलास पीना है ?''
''नहीं भाई, चलता हूँ, वहाँ भी जनता पार्टी इंतज़ार करती होगी। श्रीदेवी तो ललिता पवार बन जाएगी।''
शिन्दा अभी भी अजमेर के विवाह में फंसा बैठा था। वह कहने लगा-
''मैंने तो बलदेव से कहा था कि भाई चल, इंडिया चल मेरे साथ, तेरा विवाह भी ऐसा करेंगे कि एक बार तो बल्ले-बल्ले हो जाएगी, पर वह मानता ही नहीं।''
सतनाम और अजमेर ने शिन्दे की बलदेव वाली बात नहीं सुनी थी। वे दोनों फिंचली वाले पब को लेकर बातें करने लगे थे।
(जारी…)
००
हिंदी अनुवाद : सुभाष नीरव
॥ चौंतीस ॥
लॉरी से सामान उतरवा कर सतनाम और शिन्दा खड़े हुए ही थे कि मगील आ गया। दूर से ही बोला-
''सॉरी सैम, आज मुझे पता था कि शैनी भी आ जाएगा, काम थोड़ा ही हिस्से में आएगा, पर मेरे से पहुँचा नहीं गया।''
''क्या बात हो गई ?''
''मरीना... मेरी बेटी मरीना ने सारी रात मुसीबत डाले रखी।''
''क्या ?''
''बगैर किसी बात के झगड़ा। तू तो जानता ही है न इन औरतों को... जिन दिनों में इन्हें गुस्सा आता है, बस वही दिन चल रहे हैं। और उसका ब्वॉय फ्रैंड कई दिन से आया ही नहीं, बस यही मुसीबत है।''
''यू आर बास्टर्ड लौरल !... गेट लॉस्ट एंड डू समथिंग।''
सतनाम ने उसे धमकाते हुए काम पर लगा दिया।
शिन्दे का आज पहला दिन था सतनाम की दुकान पर। मगील उसका गाईड बन गया। छुरियाँ तीखी करने से लेकर आरी चलाने तक की ट्रेनिंग देने लगा। उसे था कि शिन्दे को अंग्रेजी नहीं आती। वह मुँह से कम बोलता और इशारे ज्यादा करता। वह उंगलियाँ दिखाते हुए बोला-
''छुरी ध्यान से... नहीं तो ये गईं... ये दो उंगलियाँ बहुत ज़रूरी, किसी को 'फक ऑफ' कहने के लिए... बीचवाली उंगली गुदा दिखाने के लिए।''
शिन्दा उसकी एक्टिंग पर हँसने लगा। मगील ने कहा-
''हँस मत। ध्यान से समझ, नहीं तो ग्राहक लैंब के साथ-साथ तेरी उंगलियाँ भी पका लेंगे।''
''मगील, तू मेरी ज्यादा चिंता मत कर।''
शिन्दे ने अंग्रेजी में कहा। मगील भड़कता हुआ बोला-
''मेरी इतनी मगजमारी यूँ ही करवाई। अगर तू समझता था तो बताया क्यों नहीं?''
पैट्रो ने शिन्दे को अपने पास बुलाते हुए कहा-
''शैनी, तू इधर आ, एक दिन में कुछ नहीं सीखा जाता, जल्दी मचाने की कोई ज़रूरत नहीं।''
फिर पैट्रो उसे मीट काटने के प्रारंभिक गुण बताने लगा कि मीट जोड़ों पर से आसानी से काटा जाता है। हड्डी वाले मीट पर इस तरह वार करना है कि एक ही वार में हड्टी कट जाए। सूअर की कटाई अलग और बीफ़ तथा लैंब की कटाई अलग। चिकन अलग। गर्दन और पूछ की कटाई में कैसे फर्क होता है,आदि। शिन्दा कहने लगा-
''पैट्रो, यह तो बहुत कारीगिरी का काम है।''
''और नहीं तो क्या। आज कल बुच्चरों की कमी इसी कारण ही है। यह बहुत स्किल्ड जॉब है।''
शराब की दुकान से यह काम बिलकुल अलग था। शिन्दे को अच्छा नहीं लग रहा था। लहू-मांस की बदबू नाक को चढ़ रही थी। हाथ भी लिबड़े से रहते। सफ़ेद रंग का कोट जल्द ही लाल रंग से भर जाता। कुछ दिन घिन्न-सी आती रही और फिर सब कुछ ठीक हो गया। दुर्गन्ध आनी भी बन्द हो गई। काम हालांकि अजमेर की दुकान से अधिक था, पर माहौल बहुत बढ़िया था। कोई किसी को चुभती हुई बात नहीं कहता था। कोई रौब नहीं डालता था। दिन भर हँसी-मजाक चलता रहता।
दोपहर को जुआइश आकर अपनी ही हाय-तौबा मचाने लगी। पहले दिन शिन्दे को उसने गाहक ही समझा था। जुआइश को देखते ही मगील कहने लगा था-
''सैनोरीटा, तेरे दुख के दिन दूर हो गए, अब तू खुश हो जा।''
''सैनिओर, तू मेरे लिए क्या खोजकर लाया है ?''
''ये देख, जवान लड़का, शैनी, सिर्फ़ तेरे लिए मंगवाया है।''
''पर सैनिओर, मैं तो तुझे पसन्द करती हूँ।''
''पर मेरा हरम इस वक्त भरा पड़ा है, शैनी से ही काम चला। देख इसकी जवानी।''
कहते हुए मगील शिन्दे की बाजू की मछलियों पर हाथ फेरने लगा। जुआइश शिन्दे से बोली-
''मैंने तुझे ऐंडी की दुकान पर देखा हुआ है।''
''मेरा बड़ा भाई जो है।''
''पर उसका स्वभाव सैम से एक दिन उलट है, हर वक्त खीझा ही रहता है।''
शिन्दे ने जुआइश की इस बात का कोई जवाब नहीं दिया। जुआइश मिनट भर प्रतीक्षा करके बोली-
''मैं नोइल रोड पर रहती हूँ, होर्नज़ी रोड से ऑफ़ है, ब्रिज के बाद। दोपहर-शाम यहाँ सफाई करती हूँ, सवेरे भी।''
कहकर वह अपने काम में लग गई थी।
पहले दिन ही सतनाम ने शिन्दे का हाथ देख लिया था कि वह काम में तेज था। वह सोचने लग पड़ा था कि अगर शिन्दा दुकान संभाल ले तो वह काम को थोड़ा बढ़ा ले। कुछ और रेस्ट्रोरेंट वगैरह को माल सप्लाई करने लग पड़े। वह पूरा दिन ही डिलवरी कर सकता था। होलसेल के काम के विषय में भी सोचा जा सकता था। साथ ही फ्रोजन मीट का भी काम चल सकता था। अब उसे पीछे की चिंता सताने लगी थी कि दुकान में सब ठीक ही हो। माइको को जुआ खेलने की आदत होने के कारण उसके द्वारा टिल्ल में से पैसे निकाल लेने का डर बना रहता। यद्यपि पैट्रो वहाँ था, फिर भी सतनाम को पीछे की फिक्र रहती ही थी। शिन्दा अब टिल्ल संभाल सकता था। वह सोच रहा था कि यदि शिन्दा टिक जाए तो उसके कितने ही मसले हल हो जाएँ।
दुकान बन्द करके सतनाम शिन्दे को अजमेर की ओर छोड़ने चला गया। अजमेर के साथ यही फैसला हुआ था कि शिन्दा अजमेर के पास ही रहता रहेगा। इतवार को उसकी दुकान संभालेगा। सतनाम तो पहले ही शिन्दे को अपने पास नहीं रख सकता था। मनजीत इन्कार किए जाती थी। उसे पता था कि मनजीत आई पर आ जाए तो अपनी बात मनवा कर ही हटती थी। सतनाम की दुकान से ही शिन्दा थका हुआ था। लेकिन वह दुकान में घुसते ही शैल्फों को भरने लग पड़ा। फ्रिज को देखने लगा कि ड्रिंक का कौन सा डिब्बा बिका ताकि उसकी जगह नया रख दे। टोनी बोला-
''शैनी, तू फिक्र न कर। मैंने सारा काम किया हुआ है।''
अजमेर अधिक खुश नहीं था। शिन्दा भी जानता था कि वह उसे सतनाम की ओर भेजकर दुखी था। उसे पचास पाउंड में ही इस्तेमाल करना चाहता था। सतनाम उसके मूड को ठीक करने के मकसद से कहने लगा-
''भाई, शिन्दा पुत तो बन गया पूरा झटकई, अब बेशक माहिलपुर के अड्डे में दुकान डाल ले। भाइया आज होता तो कितना खुश होता। उस नज़ीर हुसैन ने ऊपरवाले का शुक्रिया अदा करने से ही बाज नहीं आना था।''
''हाँ, तुम मुझे झटकाई बनाकर ही खूब खुश किए जाओ।''
अजमेर का मूड ज़रा-सा बदला पर फिर सख्त हो गया। अब तक शिन्दा भी समझ चुका था कि अजमेर कैसी बातों से मूड में आया करता है। उसने कहा-
''झटकाई तो कोट वाला रतना बाज़ीगर है, कभी उसने बकरी नहीं बनाई, सदा बकरा ही झटकेगा... भाई के विवाह पर भी बकरे उससे ही लिए थे।''
''उस समय तो बताते हैं, तुमने बकरे ही कई झटक दिए थे।'' कहते हुए सतनाम ने अजमेर की तरफ देखा।
''भाई का विवाह था, झटकने ही थे, झटके भी हमने शर्तें लगा-लगा कर कि देखें एक ही वार में गर्दन कौन उतारता है।''
''उतारी किसी ने ?''
''नहीं, बलदेव ने कई वार किए, बकरा ‘में-में’ करके चीखे, मैंने दो वार करके उतार दिया था। इस भाई ने तो सींगों पर ही किरपाण जड़ दी।''
''यूँ ही शराबी हुए शरारतें करते थे, और क्या।'' अजमेर बोला।
सतनाम कहने लगा, ''तुमने विवाह पर खर्चा ही बहुत कर दिया। ड्रम शराब का निकाल लिया, ठेके से भी बोरियाँ मंगवा लीं, गाँव के सारे कुक्कड़ खत्म कर दिए। इतनी भी भला क्या ज़रूरत थी।''
''ओ एक ही बार तो विवाह करवाना था। अगर तू भी वहाँ विवाह करवाता तो ऐसे ही धूमधाम से करते। इस शिन्दे का ज़रा पहले करना पड़ा, नहीं तो उस वक्त भी पटाखे बजाने थे।''
अजमेर अब पूरे रौ में था। शिन्दा कहने लगा-
''मैंने तो उस वक्त भाई को कहा था भई गाने वाली बुला लेते हैं, ऐसी क्या बात है।''
अजमेर ने फ्रिज में से टेनंट का डिब्बा निकाला और सबको थमाते हुए बोला-
''अपना रेपुटेशन है यार, ताया ने नाम कमाया हुआ है, ये गाने वाली तो हल्का टेस्ट है।''
फिर वह शिन्दे से कहने लगा-
''तू जा कर सो जा, सवेरे फिर जल्दी उठेगा।''
''नहीं भाई, कुछ नहीं होता। घंटे भर बाद ठहर कर पड़ लूँगा।''
शिन्दे के कहने पर अजमेर और भी खुश हो गया। सतनाम को तसल्ली थी कि अजमेर ने सब मंजूर कर लिया था। अजमेर ने कहा-
''गिलास पीना है ?''
''नहीं भाई, चलता हूँ, वहाँ भी जनता पार्टी इंतज़ार करती होगी। श्रीदेवी तो ललिता पवार बन जाएगी।''
शिन्दा अभी भी अजमेर के विवाह में फंसा बैठा था। वह कहने लगा-
''मैंने तो बलदेव से कहा था कि भाई चल, इंडिया चल मेरे साथ, तेरा विवाह भी ऐसा करेंगे कि एक बार तो बल्ले-बल्ले हो जाएगी, पर वह मानता ही नहीं।''
सतनाम और अजमेर ने शिन्दे की बलदेव वाली बात नहीं सुनी थी। वे दोनों फिंचली वाले पब को लेकर बातें करने लगे थे।
(जारी…)
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लेखक संपर्क :
67, हिल साइड रोड,
साउथाल, मिडिलसेक्स
इंग्लैंड
दूरभाष : 020-८५७८०३९३
07782-265726(मोबाइल)
मंगलवार, 17 अगस्त 2010
गवाक्ष – अगस्त 2010

“गवाक्ष” ब्लॉग के माध्यम से हम हिन्दी ब्लॉग-प्रेमियों को हिन्दी/पंजाबी के उन प्रवासी लेखकों/कवियों की समकालीन रचनाओं से रू-ब-रू करवाने का प्रयास करते आ रहे हैं जो अपने वतन हिन्दुस्तान से कोसों दूर बैठकर अपने समय और समाज के यथार्थ को अपनी रचनाओं में रेखांकित कर रहे हैं। “गवाक्ष” में अब तक पंजाबी कवि विशाल (इटली) की कविताओं का हिन्दी अनुवाद, दिव्या माथुर (लंदन) की कहानी, अनिल जनविजय (मास्को) की कविताएं, न्यू जर्सी, यू.एस.ए. में रह रहीं देवी नागरानी की ग़ज़लें, लंदन निवासी कथाकार-कवि तेजेन्द्र शर्मा, रचना श्रीवास्तव, दिव्या माथुर की कविताएं, दुबई निवासी पूर्णिमा वर्मन की कविताएं, यू एस ए में रह रहीं हिन्दी कथाकार-कवयित्री इला प्रसाद, डेनमार्क निवासी कवि भगत धवन की कविताएँ और चाँद शुक्ला की ग़ज़लें, यू एस ए निवासी कवि वेद प्रकाश ‘वटुक’ तथा कवयित्री रेखा मैत्र की कविताएं, कनाडा अवस्थित पंजाबी कवयित्री तनदीप तमन्ना की कविताएं, यू के अवस्थित हिन्दी कवि-ग़ज़लकार प्राण शर्मा की ग़ज़लें, कैनेडा में अवस्थित पंजाबी कवि सुखिन्दर की कविताएं, कनाडा निवासी पंजाबी कवयित्री सुरजीत, अमेरिका अवस्थित डॉ सुधा धींगरा, कनाडा में अवस्थित हिंदी- पंजाबी कथाकार - कवयित्री मिन्नी ग्रेवाल की कविताएं, न्यूजीलैंड में रह रहे पंजाबी कवि बलविंदर चहल की कविता, कैनेडा में अवस्थित पंजाबी लेखिका बलबीर कौर संघेड़ा की कविताएं, इंग्लैंड से शैल अग्रवाल की पाँच कविताएं, सिंगापुर से श्रद्धा जैन की ग़ज़लें, इटली में रह रहे पंजाबी कवि विशाल की कविताएं, यू एस ए में रह रहीं हिन्दी कथाकार-कवयित्री इला प्रसाद की एक लघुकथा, कैनेडा निवासी पंजाबी कवि डा. सुखपाल की कविता, यू.एस.ए. में अवस्थित हिंदी कवयित्री डॉ. सुधा ओम ढींगरा की कविताएं, यू.एस.ए. में अवस्थित पंजाबी कवि-कथाकार प्रेम मान की पंजाबी कविताएं और पंजाबी कथाकार-उपन्यासकार हरजीत अटवाल के उपन्यास “सवारी” के हिंदी अनुवाद की सत्ताइसवीं किस्त आपने पढ़ीं। “गवाक्ष” के अगस्त 2010 अंक में प्रस्तुत हैं –(स्व.) इकबाल अर्पण की एक ग़ज़ल तथा यू.के. निवासी पंजाबी कथाकार-उपन्यासकार हरजीत अटवाल के धारावाहिक पंजाबी उपन्यास “सवारी” की अट्ठाइसवीं किस्त का हिंदी अनुवाद…
कैनेडा से
(स्व.) इकबाल अर्पण की एक ग़ज़ल
हम दुआ मांगे जिनकी ख़ुशी के लिए
वो ही बोलें हमें ख़ुदकुशी के लिए
सांस रुक रुक के चलती रही उम्र भर
बहुत तरसा हूँ मैं ज़िन्दगी के लिए
कुछ तो सामने हो दिलकशी के लिए
नस्ले-आदम के खूं पे आमादा हैं क्यूँ
हाथ उठते थे जो बन्दगी के लिए
शहर आ कर अँधेरों में जो खो गया
निकला गाँव से था रोशनी के लिए
सब के पीने के पीछे कोई राज़ है
कोई पीता नहीं मयकशी के लिए
आदमी बहुत कुछ बन गया है मगर
ना बना आदमी आदमी के लिए।
00
इकबाल अर्पण
जन्म : 15 जून 1938, निधन : 15 जून 2006
जगराओं(पंजाब) छोड़कर इकबाल अर्पण अफ्रीका, इंग्लैंड, अमेरिका में रहे और बाद में वह कैलगरी, कैनेडा में बस गए थे। वह पंजाबी के बहुत अच्छे कवि और कथाकार रहे। उनके दो कविता संग्रह ‘सुनत्था दर्द’(1977), ‘कब्र दा फुल’(1980), चार कहानी-संग्रह –‘गुआचे राह’(1980), ‘मौत दा सुपना’(1983)। ‘आफ़रे होये लोक’(1984) और ‘चानण दे वणजारे’(2006), एक उपन्यास – ‘पराई धरती’ (1980) छप चुके हैं।
धारावाहिक पंजाबी उपन्यास(किस्त- 28)
सवारी
हरजीत अटवाल
हिंदी अनुवाद : सुभाष नीरव
॥ तैंतीस ॥
सतनाम ने घर के आगे लाकर वैन खड़ी कर दी और आहिस्ता से उतरा। आहिस्ता से ही दरवाजा खोला। दरवाजे का खटका सुनते ही परमजोत और सरबजोत दौड़े आए। उसने उन्हें नित्य की तरह 'हैलो छांगू एंड मांगू' नहीं कहा और जल्दी से सैटी पर बैठ गया। परमजोत बोली-
''डैड, यू आलराइट ?''
''हाँ हाँ, ठीक हूँ। जाओ, बोतल लाओ। गिलास और पानी लाओ।''
उसने सरबजोत का कंधा थपथपाते हुए कहा। सरबजोत बोला-
''मैं बोतल लाऊँ कि पानी ?''
''जो मर्जी ले आ, पर हरी अप।''
रसोई में से मनजीत ने उसकी ओर देखा और पास आकर बोली-
''ज्यादा पी ली ?''
''नहीं सितारा बाई। आज तो वैसे ही हो गया, पता नहीं उम्र हो गई।''
''क्या हो गया ?''
''बहुत ही थकावट हो गई। शरीर गर्म-सा लगता है। सवेरे डिलीवरी आनी है।''
''फिर शराब न पियो, गोली खा लो और आराम करो।''
''अगर आराम आया तो शराब से आएगा, गोली से कभी आता है ?''
''तुम्हें दौड़भाग जो बहुत रहती है, आदमी कोई ढंग का तुम रखते नहीं।''
''आदमी मिलते ही कहाँ है, साले लौरल हार्डी जैसे ही घूमते फिरते हैं।''
''कोई अच्छा-सा बुच्चर देख लो और थोड़ी रैस्ट किया करो।''
''आज तो कुछ ज्यादा ही मीना कुमारी बनी फिरती हो... बुच्चर तो है एक आर्थर, पैसे बहुत मांगता है। इतने अफोर्ड नहीं होते।''
''तुम तो कहते थे कि इललीगल से बहुत मिल जाते हैं।''
''वो यहाँ नहीं, साउथाल में लगता है मेला, लुधियाने वाले लेबर चौक की तरह।''
एक पैग पीकर उसका मूड ठीक होने लगा और थकावट भी कम हो गई। बच्चे उसका मूड देखकर करीब आ बैठे।
परमजोत बोली-
''डैड, स्क्रैच माय बैक।''
''हाउ टू से ?''
''प्लीज डैड।''
''दैट्स बैटर।'' कहता हुआ वह उसकी पीठ पर खाज करने लगा। कुछ देर बाद परमजोत ने कहा-
''दैट्स इट।''
''वट ?''
''थैंक्यू डैडी।''
''दैट्स बैटर।''
वह बच्चों को 'प्लीज़' और 'थैंक्स' सिखाने के चक्कर में ही रहता है। परमजोत उठकर गई तो सरबजोत पीठ पर खाज करवाने आ बैठा। मनजीत बोली-
''तुम्हें तो कभी थकावट हुई नहीं, आज क्या हो गया ?''
''शायद मैंटली टायर्ड हो गया।''
''ऐसा क्या हो गया ?''
''आज प्रेम चोपड़ा ने मेरा बहुत सिर खाया, प्रैशर भी डाला, इसी कारण। जो वहाँ पेट्रो के साथ दो पैग लगाए उनका तो मेरे पर कोई असर हुआ ही नहीं था। यह काम करने लगी है।'' वह हाथ में पकड़े पैग की तरफ इशारा करते हुए बोला और फिर कहा-
''प्रेम चोपड़ा एक पब ले रहा था। किसी गोरे के साथ मिलकर। गोरा पॉल पार्टनर उसे सूट नहीं करता और अब वह मुझे अपने संग मिलाना चाहता है।''
''मिल जाओ।''
''मैं तो गोरे पॉल से दूसरे स्थान पर हो गया न, उसकी पहली च्वाइस पॉल था। पॉल के पास पैसे न होने के कारण अब मुझे कहता है कि आ जाऊँ।''
''तो क्या हुआ। आखिर उन्होंने तुम्हें अपने संग शेयर करने के लिए कहा है। पहले कह दिया या बाद में।''
''जानी, अपना भी कोई स्टैंडर्ड है।''
मनजीत को उसकी बात अधिक समझ में नहीं आई। उसकी दिलचस्पी भी नहीं थी। रोटी खाता सतनाम फिर कहने लगा-
''मैंने प्रेम चोपड़ा को कहा- भाई, तू अकेला ही ले ले, कौन सी ऐसी बात है। पता क्या कहता ?''
''क्या ?''
''कहता है कि मैं डरता हूँ, कहीं घाटा न पड़ जाए। मैंने दिल में सोचा कि रहा न - वही का वही। मुझे यह पार्टनर घाटे के सौदे का ही बनाना चाहता है। अगर इसे मालूम हो कि प्रोफिट होगा तो मुझे पार्टनर क्यों बनाए।''
''तुमने तोड़कर जवाब तो नहीं दे दिया ? आखिर भाई है।''
''नहीं, तोड़ कर देना ही पड़ेगा। वह तो कहे जाता था कि मैंने तुझे कभी कुछ करने को नहीं कहा, मेरे कहने पर इस पब में हिस्सा डाल।''
''तुम सोच लो। अगर ठीक लगता है तो डाल लो।''
''ठीक तो लगता है, मैं पब भी देख आया हूँ पर यह बिजनेस मेरे लिए बिलकुल नया है। और फिर इधर से ही फुर्सत नहीं मिलती। असल में असरानी जैसे के आ जाने से वो हो गया खाली-सा, अब ऐसी बातें सोचता रहता है। एक तरफ तो कहे जाता है कि शिन्दा किसी काम का नहीं, और दूसरी तरफ सारा दिन उसे रगड़े जाता है।''
''अगर शिन्दा भाजी उसके काम का नहीं तो तुम ले आओ।''
उस वक्त सतनाम कुछ न बोला पर सवेरे उठते ही कहने लगा-
''मेरी श्रीदेवी, बात तो तेरी बहुत बढ़िया है। रातोंरात मैंने सोच लिया कि क्या करना है। प्रेम चोपड़ा शिन्दे को पचास में रगड़ना चाहता है, क्यों न मैं सौ का ऑफर करूँ, उसे वही सुविधाएँ देकर।''
''देखो, मैंने घर में नहीं रखना किसी को।''
''क्यों ? मेरा भाई है।''
''ठीक है, भाई है, पर मेरे से गैर आदमी घर में नहीं रखा जाता। हमने घर में सौ बार लड़ना-झगड़ना, मर्जी से उठना-बैठना होता है। किसी दूसरे के होने पर आदमी बंध जाता है।''
''बन गई न मिनट भर में ही हीरोइन से वैम्प। अगर भाई ही भाई के घर में नहीं रहेगा तो कहाँ रहेगा।''
''रहेगा वो भाजी के घर में ही।''
''इसका मतलब, जट्टी तेरे से लाख दर्जे अच्छी है।''
''मुझे अच्छा बनने की ज़रूरत नहीं। मुझे अपना घर भी लुक-आफ्टर करना है। वह तो सारा दिन घर में ही रहती है और मुझे जॉब भी करनी होती है।''
''तू मेरी बनी-बनाई खेल खत्म करेगी। मैं साला मुफ्त में ही तुझे नंबर वन बनाए बैठा हूँ। शिन्दा आएगा और यहीं रहेगा, तू लिख ले कहीं।''
मनजीत कुछ न बोली। सतनाम कहने लगा-
''साला, एक प्रॉब्लम का हल खोजें तो दूसरी आ खड़ी होती है।''
फिर सतनाम सोचने लगा कि यह तो बाद की प्रॉब्लम है। पहले अजमेर को बातों में घेर कर शिन्दे को हथियाया जाये ताकि काम का बोझ कम हो।
सुबह दुकान में गया। दुकान शुरू करवा कर वह अजमेर की तरफ निकल गया। उसने बाहर से ही देखा कि दुकान में शिन्दा और टोनी खड़े थे। टोनी को जल्दी बुलाने का अर्थ था कि अजमेर कहीं गया हुआ होगा। फिर उसने घूमकर वैन देखी। वैन भी नहीं थी। वह दुविधा में ही था कि रुके या नहीं कि शिन्दे ने उसकी वैन देख ली और अन्दर आ जाने के लिए हाथ हिलाने लगा। उसके पहुँचने पर शिन्दा बोला-
''तू तो भाई मिलने से ही गया, उधर बलदेव कहीं छिप गया और इधर तू भी।''
''संडे को मैं आया करता हूँ, पर तू आसपास देखता ही नहीं।''
''क्या बताऊँ भाई, मेरा तो बुरा हाल है। बस, चलो ही चल है। ऊपर से भाई भी डांट मारने में मिनट नहीं लगाता। गिरेगा खोते(गधे) पर से और गुस्सा मेरे पर।''
''चल, अच्छा है। जट्टी का बचाव हो जाता होगा, नहीं तो हर वक्त उसकी ही जान के पीछे लगा रहता था।''
''भाई, वो भी कम नहीं, बस चुप ही भली है। तू बता, आज किधर ?''
''प्रेम चोपड़ा कहाँ है ?''
''बैंक गए हैं दोनों, क्या काम है ?''
''मैं तुझे मांगने आया हूँ।''
''फिर से ?''
''हाँ, फिर से, साला मुकरी न हो तो। तुझे एक बार मुश्किल से मांगा था। मैं तो कहता हूँ, अगर उसे तेरी ज़रूरत नहीं तो मेरे संग आ जा।''
''ले जा यार, मुझे इस नरक से भाई बनकर ले जा। वहाँ किसी से ओए नहीं कहवाई थी और यहाँ ओए के बग़ैर और कुछ कोई कहता ही नहीं।''
''वो तो कहता है कि तू निकम्मा है।''
''वो बड़ा भाई है, जो मर्जी कहे।''
''यह पचास देता है, मैं सो दूँगा।''
सौ सुनकर शिन्दे का चेहरा खिल उठा। बोला-
''तुम दोनों भाई आपस में सलाह कर लो, मेरा क्या है, बैल ने तो पट्ठे ही खाने हैं।''
तब तक अजमेर की वैन दुकान के सामने आ रुकी। गुरिंदर बाहर निकली और अजमेर गाड़ी खड़ी करने चला गया। सतनाम ने पूछा-
''जट्टिए, प्रेम चोपड़ा ने वापस आना है कि कहीं और चला गया ?''
''मेरा प्रेम चोपड़ा और तेरी परवीन बॉबी।''
''वो अब श्रीदेवी हो गई है, ज़रा-सी तरक्की कर गई।''
''तू आज दिन में कहाँ घूमता फिरता है ?''
''उसके साथ बात करने आया हूँ कोई। तुम किधर से आ रहे हो ?''
''बैंक जाना था इन्होंने, मुझे ज़रा घर की शॉपिंग करनी थी।''
अजमेर हाथ में दो बैग थामे आ गया। बैग गुरिंदर को पकड़ाते हुए सतनाम से बोला-
''कैसे, सलाह बदली फिर ?''
''किसकी ?''
''पब वाली।''
''नहीं भाई, मैंने सोचा, यह सब ठीक है, प्रोपर्टी मंहगी नहीं मिल रही पर इस वक्त रेट ऑफ इंटरेस्ट भी बहुत है, फिर प्राइज़िज का भी कुछ पता नहीं, अगर गिर पड़ीं तो ?... तुम्हारी दुकान तो बोझ उठा लेगी पर मेरी ने फालतू बोझ नहीं उठाना।''
अजमरे कुछ नहीं बोला और घड़ी देखने लगा। गुरिंदर बोली-
''टैम न देखो, ऊपर आ जाओ, चाय पियो, पब नहीं जाना अब।''
अजमेर ने गुरिंदर की बात का उत्तर नहीं दिया। कुछ देर की चुप के बाद कहने लगा-
''अगर तू साथ खड़ा हो जाता तो मैं भी रिस्क ले सकता था। न भी खोलते, बिल्डिंग ऐसे ही पड़ी रहती।''
''हाँ, पर किस्त तो देनी ही पड़ती।''
''किस्त तो देनी ही है। पर प्रापर्टी का मालिक भी तो बनेगा तू।''
''यही मैं कहता हूँ कि दुकान किस्त का बोझ नहीं उठा सकती। तुम्हारी दुकान फ्रीहोल्ड है, मुझे किराया भी देना पड़ता है और दुकानों की हालत यह है कि जितने ओवर हैड्ज़ कम हों, उतना ही ठीक है।''
गुरिंदर ऊपर चली गई और वे दोनों फिर पब में जा बैठे। पॉल राइडर उनसे उतने उत्साह से नहीं मिला। अजमेर सतनाम से पूछने लगा-
''शिन्दा कहता था कुछ ?''
''नहीं तो, क्यों ?''
''वैसे ही, ये टोनी से खीझता रहता है। टोनी ने तो एक दिन कह दिया था कि तुझे ये पचास भी मेरी तनख्वाह में से कट कर मिलते हैं।''
बात सुनकर सतनाम खुश हो गया। गाड़ी खुद-ब-खुद पटरी पर आ गई थी। सतनाम बोला-
''भाई, वैसे काम में वह अब कैसा है ?''
''निकम्मा !... मुझे तो इसकी ज़रूरत भी नहीं। टोनी पेपरों में काम करता है, उसे कैसे हटा दूँ ? मैं हूँ, गुरिंदर भी है, दुकान भला कितने बन्दे संभालेगी। इसलिए मैं तो पचास पाउंड ही दे सकता हूँ। वो भी तो इसके बचते ही हैं। सारा खर्चा मैंने उठा रखा है।''
''भाई, अगर शिन्दे की तुम्हें ज़रूरत नहीं तो मैं रख लूँ ?''
बात सुन कर अजमेर की हालत पतली हो गई। सतनाम ने फिर कहा-
''मुझे है आदमी की ज़रूरत।''
''तेरा काम तो चल ही रहा है। और फिर यह तेरे काम का नहीं। तेरा काम है हैवी, इससे नहीं होगा। भारी काम करने लायक यह है नहीं।''
''देखा जाएगा, मगील से तो बुरा नहीं यह।''
''वैसे, दुकानों में बन्दे कभी फालतू भी नहीं होते।''
अजमेर ने शिन्दे को देने से आनाकानी-सी करते हुए कहा। सतनाम बोला-
''मैं इसे पाउंड भी सौ देता रहूँगा।''
''यह सौ के लायक नहीं, सौ देकर इसकी आदत न बिगाड़।''
(जारी…)
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67, हिल साइड रोड,
साउथाल, मिडिलसेक्सहिंदी अनुवाद : सुभाष नीरव
॥ तैंतीस ॥
सतनाम ने घर के आगे लाकर वैन खड़ी कर दी और आहिस्ता से उतरा। आहिस्ता से ही दरवाजा खोला। दरवाजे का खटका सुनते ही परमजोत और सरबजोत दौड़े आए। उसने उन्हें नित्य की तरह 'हैलो छांगू एंड मांगू' नहीं कहा और जल्दी से सैटी पर बैठ गया। परमजोत बोली-
''डैड, यू आलराइट ?''
''हाँ हाँ, ठीक हूँ। जाओ, बोतल लाओ। गिलास और पानी लाओ।''
उसने सरबजोत का कंधा थपथपाते हुए कहा। सरबजोत बोला-
''मैं बोतल लाऊँ कि पानी ?''
''जो मर्जी ले आ, पर हरी अप।''
रसोई में से मनजीत ने उसकी ओर देखा और पास आकर बोली-
''ज्यादा पी ली ?''
''नहीं सितारा बाई। आज तो वैसे ही हो गया, पता नहीं उम्र हो गई।''
''क्या हो गया ?''
''बहुत ही थकावट हो गई। शरीर गर्म-सा लगता है। सवेरे डिलीवरी आनी है।''
''फिर शराब न पियो, गोली खा लो और आराम करो।''
''अगर आराम आया तो शराब से आएगा, गोली से कभी आता है ?''
''तुम्हें दौड़भाग जो बहुत रहती है, आदमी कोई ढंग का तुम रखते नहीं।''
''आदमी मिलते ही कहाँ है, साले लौरल हार्डी जैसे ही घूमते फिरते हैं।''
''कोई अच्छा-सा बुच्चर देख लो और थोड़ी रैस्ट किया करो।''
''आज तो कुछ ज्यादा ही मीना कुमारी बनी फिरती हो... बुच्चर तो है एक आर्थर, पैसे बहुत मांगता है। इतने अफोर्ड नहीं होते।''
''तुम तो कहते थे कि इललीगल से बहुत मिल जाते हैं।''
''वो यहाँ नहीं, साउथाल में लगता है मेला, लुधियाने वाले लेबर चौक की तरह।''
एक पैग पीकर उसका मूड ठीक होने लगा और थकावट भी कम हो गई। बच्चे उसका मूड देखकर करीब आ बैठे।
परमजोत बोली-
''डैड, स्क्रैच माय बैक।''
''हाउ टू से ?''
''प्लीज डैड।''
''दैट्स बैटर।'' कहता हुआ वह उसकी पीठ पर खाज करने लगा। कुछ देर बाद परमजोत ने कहा-
''दैट्स इट।''
''वट ?''
''थैंक्यू डैडी।''
''दैट्स बैटर।''
वह बच्चों को 'प्लीज़' और 'थैंक्स' सिखाने के चक्कर में ही रहता है। परमजोत उठकर गई तो सरबजोत पीठ पर खाज करवाने आ बैठा। मनजीत बोली-
''तुम्हें तो कभी थकावट हुई नहीं, आज क्या हो गया ?''
''शायद मैंटली टायर्ड हो गया।''
''ऐसा क्या हो गया ?''
''आज प्रेम चोपड़ा ने मेरा बहुत सिर खाया, प्रैशर भी डाला, इसी कारण। जो वहाँ पेट्रो के साथ दो पैग लगाए उनका तो मेरे पर कोई असर हुआ ही नहीं था। यह काम करने लगी है।'' वह हाथ में पकड़े पैग की तरफ इशारा करते हुए बोला और फिर कहा-
''प्रेम चोपड़ा एक पब ले रहा था। किसी गोरे के साथ मिलकर। गोरा पॉल पार्टनर उसे सूट नहीं करता और अब वह मुझे अपने संग मिलाना चाहता है।''
''मिल जाओ।''
''मैं तो गोरे पॉल से दूसरे स्थान पर हो गया न, उसकी पहली च्वाइस पॉल था। पॉल के पास पैसे न होने के कारण अब मुझे कहता है कि आ जाऊँ।''
''तो क्या हुआ। आखिर उन्होंने तुम्हें अपने संग शेयर करने के लिए कहा है। पहले कह दिया या बाद में।''
''जानी, अपना भी कोई स्टैंडर्ड है।''
मनजीत को उसकी बात अधिक समझ में नहीं आई। उसकी दिलचस्पी भी नहीं थी। रोटी खाता सतनाम फिर कहने लगा-
''मैंने प्रेम चोपड़ा को कहा- भाई, तू अकेला ही ले ले, कौन सी ऐसी बात है। पता क्या कहता ?''
''क्या ?''
''कहता है कि मैं डरता हूँ, कहीं घाटा न पड़ जाए। मैंने दिल में सोचा कि रहा न - वही का वही। मुझे यह पार्टनर घाटे के सौदे का ही बनाना चाहता है। अगर इसे मालूम हो कि प्रोफिट होगा तो मुझे पार्टनर क्यों बनाए।''
''तुमने तोड़कर जवाब तो नहीं दे दिया ? आखिर भाई है।''
''नहीं, तोड़ कर देना ही पड़ेगा। वह तो कहे जाता था कि मैंने तुझे कभी कुछ करने को नहीं कहा, मेरे कहने पर इस पब में हिस्सा डाल।''
''तुम सोच लो। अगर ठीक लगता है तो डाल लो।''
''ठीक तो लगता है, मैं पब भी देख आया हूँ पर यह बिजनेस मेरे लिए बिलकुल नया है। और फिर इधर से ही फुर्सत नहीं मिलती। असल में असरानी जैसे के आ जाने से वो हो गया खाली-सा, अब ऐसी बातें सोचता रहता है। एक तरफ तो कहे जाता है कि शिन्दा किसी काम का नहीं, और दूसरी तरफ सारा दिन उसे रगड़े जाता है।''
''अगर शिन्दा भाजी उसके काम का नहीं तो तुम ले आओ।''
उस वक्त सतनाम कुछ न बोला पर सवेरे उठते ही कहने लगा-
''मेरी श्रीदेवी, बात तो तेरी बहुत बढ़िया है। रातोंरात मैंने सोच लिया कि क्या करना है। प्रेम चोपड़ा शिन्दे को पचास में रगड़ना चाहता है, क्यों न मैं सौ का ऑफर करूँ, उसे वही सुविधाएँ देकर।''
''देखो, मैंने घर में नहीं रखना किसी को।''
''क्यों ? मेरा भाई है।''
''ठीक है, भाई है, पर मेरे से गैर आदमी घर में नहीं रखा जाता। हमने घर में सौ बार लड़ना-झगड़ना, मर्जी से उठना-बैठना होता है। किसी दूसरे के होने पर आदमी बंध जाता है।''
''बन गई न मिनट भर में ही हीरोइन से वैम्प। अगर भाई ही भाई के घर में नहीं रहेगा तो कहाँ रहेगा।''
''रहेगा वो भाजी के घर में ही।''
''इसका मतलब, जट्टी तेरे से लाख दर्जे अच्छी है।''
''मुझे अच्छा बनने की ज़रूरत नहीं। मुझे अपना घर भी लुक-आफ्टर करना है। वह तो सारा दिन घर में ही रहती है और मुझे जॉब भी करनी होती है।''
''तू मेरी बनी-बनाई खेल खत्म करेगी। मैं साला मुफ्त में ही तुझे नंबर वन बनाए बैठा हूँ। शिन्दा आएगा और यहीं रहेगा, तू लिख ले कहीं।''
मनजीत कुछ न बोली। सतनाम कहने लगा-
''साला, एक प्रॉब्लम का हल खोजें तो दूसरी आ खड़ी होती है।''
फिर सतनाम सोचने लगा कि यह तो बाद की प्रॉब्लम है। पहले अजमेर को बातों में घेर कर शिन्दे को हथियाया जाये ताकि काम का बोझ कम हो।
सुबह दुकान में गया। दुकान शुरू करवा कर वह अजमेर की तरफ निकल गया। उसने बाहर से ही देखा कि दुकान में शिन्दा और टोनी खड़े थे। टोनी को जल्दी बुलाने का अर्थ था कि अजमेर कहीं गया हुआ होगा। फिर उसने घूमकर वैन देखी। वैन भी नहीं थी। वह दुविधा में ही था कि रुके या नहीं कि शिन्दे ने उसकी वैन देख ली और अन्दर आ जाने के लिए हाथ हिलाने लगा। उसके पहुँचने पर शिन्दा बोला-
''तू तो भाई मिलने से ही गया, उधर बलदेव कहीं छिप गया और इधर तू भी।''
''संडे को मैं आया करता हूँ, पर तू आसपास देखता ही नहीं।''
''क्या बताऊँ भाई, मेरा तो बुरा हाल है। बस, चलो ही चल है। ऊपर से भाई भी डांट मारने में मिनट नहीं लगाता। गिरेगा खोते(गधे) पर से और गुस्सा मेरे पर।''
''चल, अच्छा है। जट्टी का बचाव हो जाता होगा, नहीं तो हर वक्त उसकी ही जान के पीछे लगा रहता था।''
''भाई, वो भी कम नहीं, बस चुप ही भली है। तू बता, आज किधर ?''
''प्रेम चोपड़ा कहाँ है ?''
''बैंक गए हैं दोनों, क्या काम है ?''
''मैं तुझे मांगने आया हूँ।''
''फिर से ?''
''हाँ, फिर से, साला मुकरी न हो तो। तुझे एक बार मुश्किल से मांगा था। मैं तो कहता हूँ, अगर उसे तेरी ज़रूरत नहीं तो मेरे संग आ जा।''
''ले जा यार, मुझे इस नरक से भाई बनकर ले जा। वहाँ किसी से ओए नहीं कहवाई थी और यहाँ ओए के बग़ैर और कुछ कोई कहता ही नहीं।''
''वो तो कहता है कि तू निकम्मा है।''
''वो बड़ा भाई है, जो मर्जी कहे।''
''यह पचास देता है, मैं सो दूँगा।''
सौ सुनकर शिन्दे का चेहरा खिल उठा। बोला-
''तुम दोनों भाई आपस में सलाह कर लो, मेरा क्या है, बैल ने तो पट्ठे ही खाने हैं।''
तब तक अजमेर की वैन दुकान के सामने आ रुकी। गुरिंदर बाहर निकली और अजमेर गाड़ी खड़ी करने चला गया। सतनाम ने पूछा-
''जट्टिए, प्रेम चोपड़ा ने वापस आना है कि कहीं और चला गया ?''
''मेरा प्रेम चोपड़ा और तेरी परवीन बॉबी।''
''वो अब श्रीदेवी हो गई है, ज़रा-सी तरक्की कर गई।''
''तू आज दिन में कहाँ घूमता फिरता है ?''
''उसके साथ बात करने आया हूँ कोई। तुम किधर से आ रहे हो ?''
''बैंक जाना था इन्होंने, मुझे ज़रा घर की शॉपिंग करनी थी।''
अजमेर हाथ में दो बैग थामे आ गया। बैग गुरिंदर को पकड़ाते हुए सतनाम से बोला-
''कैसे, सलाह बदली फिर ?''
''किसकी ?''
''पब वाली।''
''नहीं भाई, मैंने सोचा, यह सब ठीक है, प्रोपर्टी मंहगी नहीं मिल रही पर इस वक्त रेट ऑफ इंटरेस्ट भी बहुत है, फिर प्राइज़िज का भी कुछ पता नहीं, अगर गिर पड़ीं तो ?... तुम्हारी दुकान तो बोझ उठा लेगी पर मेरी ने फालतू बोझ नहीं उठाना।''
अजमरे कुछ नहीं बोला और घड़ी देखने लगा। गुरिंदर बोली-
''टैम न देखो, ऊपर आ जाओ, चाय पियो, पब नहीं जाना अब।''
अजमेर ने गुरिंदर की बात का उत्तर नहीं दिया। कुछ देर की चुप के बाद कहने लगा-
''अगर तू साथ खड़ा हो जाता तो मैं भी रिस्क ले सकता था। न भी खोलते, बिल्डिंग ऐसे ही पड़ी रहती।''
''हाँ, पर किस्त तो देनी ही पड़ती।''
''किस्त तो देनी ही है। पर प्रापर्टी का मालिक भी तो बनेगा तू।''
''यही मैं कहता हूँ कि दुकान किस्त का बोझ नहीं उठा सकती। तुम्हारी दुकान फ्रीहोल्ड है, मुझे किराया भी देना पड़ता है और दुकानों की हालत यह है कि जितने ओवर हैड्ज़ कम हों, उतना ही ठीक है।''
गुरिंदर ऊपर चली गई और वे दोनों फिर पब में जा बैठे। पॉल राइडर उनसे उतने उत्साह से नहीं मिला। अजमेर सतनाम से पूछने लगा-
''शिन्दा कहता था कुछ ?''
''नहीं तो, क्यों ?''
''वैसे ही, ये टोनी से खीझता रहता है। टोनी ने तो एक दिन कह दिया था कि तुझे ये पचास भी मेरी तनख्वाह में से कट कर मिलते हैं।''
बात सुनकर सतनाम खुश हो गया। गाड़ी खुद-ब-खुद पटरी पर आ गई थी। सतनाम बोला-
''भाई, वैसे काम में वह अब कैसा है ?''
''निकम्मा !... मुझे तो इसकी ज़रूरत भी नहीं। टोनी पेपरों में काम करता है, उसे कैसे हटा दूँ ? मैं हूँ, गुरिंदर भी है, दुकान भला कितने बन्दे संभालेगी। इसलिए मैं तो पचास पाउंड ही दे सकता हूँ। वो भी तो इसके बचते ही हैं। सारा खर्चा मैंने उठा रखा है।''
''भाई, अगर शिन्दे की तुम्हें ज़रूरत नहीं तो मैं रख लूँ ?''
बात सुन कर अजमेर की हालत पतली हो गई। सतनाम ने फिर कहा-
''मुझे है आदमी की ज़रूरत।''
''तेरा काम तो चल ही रहा है। और फिर यह तेरे काम का नहीं। तेरा काम है हैवी, इससे नहीं होगा। भारी काम करने लायक यह है नहीं।''
''देखा जाएगा, मगील से तो बुरा नहीं यह।''
''वैसे, दुकानों में बन्दे कभी फालतू भी नहीं होते।''
अजमेर ने शिन्दे को देने से आनाकानी-सी करते हुए कहा। सतनाम बोला-
''मैं इसे पाउंड भी सौ देता रहूँगा।''
''यह सौ के लायक नहीं, सौ देकर इसकी आदत न बिगाड़।''
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