शनिवार, 1 जनवरी 2011

गवाक्ष – जनवरी 2011



मित्रो, सर्वप्रथम आप सभी को नव वर्ष 2011 की बहुत बहुत शुभकामनाएँ ! हर वर्ष की भाँति इस वर्ष भी हम सबको यही कामना और प्रार्थना करनी चाहिए कि यह नया साल घृणा, द्बेष, नफ़रत, आतंक, विध्वंश से रहित हो और इसके स्थान पर प्रेम, सौहार्द, अमन-चैन और खुशहाली को स्थापित करने वाला हो। इस नये वर्ष में हम सब मिलकर प्रकृति और जीवन को नष्ट करने वाली हर गतिविधि का विरोध करें और इन्हें और अधिक बेहतर और खुशहाल बनाने की प्रक्रिया में संलग्न हों…

जनवरी 2008 में मैंने “गवाक्ष” ब्लॉग की शुरूआत की थी। दो वर्ष का सफ़र पूरा करके यह तीसरे वर्ष की यात्रा में प्रवेश कर रहा है। “गवाक्ष” ब्लॉग के पीछे मेरी मंशा यह थी कि इस ब्लॉग के माध्यम से हिन्दी ब्लॉग-प्रेमियों को हिन्दी/पंजाबी के उन प्रवासी लेखकों/कवियों की समकालीन रचनाओं से रू-ब-रू करवाया जाए जो अपने वतन हिन्दुस्तान से कोसों दूर बैठकर अपने समय और समाज के यथार्थ को अपनी रचनाओं में ईमानदारी से रेखांकित में लगे हुए हैं। “गवाक्ष” का यही उद्देश्य आगे भी जारी रहेगा। इसमें केवल उन्हीं रचनाकारों की रचनाएं प्रकाशित होंगी जो अपने वतन की मिट्टी से कोसों दूर बैठकर सृजनरत हैं। “गवाक्ष” में अब तक विशाल (इटली), दिव्या माथुर (लंदन), अनिल जनविजय (मास्को), देवी नागरानी(यू.एस.ए.), तेजेन्द्र शर्मा(लंदन), रचना श्रीवास्तव(लंदन), पूर्णिमा वर्मन(दुबई), इला प्रसाद(यू एस ए), भगत धवन (डेनमार्क), चाँद शुक्ला (डेनमार्क), वेद प्रकाश ‘वटुक’(यू एस ए), रेखा मैत्र (यू एस ए), तनदीप तमन्ना (कनाडा), प्राण शर्मा (यू के), सुखिन्दर (कनाडा), सुरजीत(कनाडा), डॉ सुधा धींगरा(अमेरिका), मिन्नी ग्रेवाल(कनाडा), बलविंदर चहल (न्यूजीलैंड), बलबीर कौर संघेड़ा(कनाडा), शैल अग्रवाल (इंग्लैंड), श्रद्धा जैन (सिंगापुर), डा. सुखपाल(कनाडा), प्रेम मान(यू.एस.ए.), (स्व.) इकबाल अर्पण, सुश्री मीना चोपड़ा (कनाडा), डा. हरदीप कौर संधु(आस्ट्रेलिया), डा. भावना कुँअर(आस्ट्रेलिया), अनुपमा पाठक (स्वीडन) आदि की रचनाएं और पंजाबी कथाकार-उपन्यासकार हरजीत अटवाल के उपन्यास “सवारी” के हिंदी अनुवाद की बत्तीसवीं किस्त आपने पढ़ीं। “गवाक्ष” के जनवरी 2011 अंक में प्रस्तुत हैं – संयुक्त अरब इमारात से पूर्णिमा वर्मन की कविताएं तथा हरजीत अटवाल के धारावाहिक पंजाबी उपन्यास “सवारी” की तैंतीसवीं किस्त का हिंदी अनुवाद…

संयुक्त अरब इमारात से
पूर्णिमा वर्मन की कविताएँ

सर्द मौसम- बारह क्षणिकाएँ
कविताओं के साथ सभी चित्र : पूर्णिमा वर्मन
1

धुंध बादल
और ये पेड़ों पे पतझड़
सर्दियों में डूबते दिखते हैं
दिन भी

2

एक हिम सागर
धरा पर
और पत्तों को उतारे
एक तरुवर
दूधिया सूरज नहाता

3

इस अकेली शाम का
मतलब न पूछो
सर्द मौसम
और फैला दूर तक
एकांत सागर
एक पुल
थामे हुए हमको हमेशा

4

धूप की खिड़की
और सर्दी से भरा दिन
बंद अलमारी दुखों की
और पर्दों से बरसती
आस खुशियों की

5

आज
फुर्सत का कोई पल
दूर सूरज गुनगुनाए
सर्द मौसम को थपक
जैसे सुलाए

6

हरी छाँहों में बसी है
गंध सर्दी की
बहुत नम
पारदर्शी याद जैसे
कनक शबनम

7

एक मेपल पात
पियरा
देस से परदेस तक
सर्दी का मौसम जोड़ता है
मुदित जियरा

8

खुशनुमा
सर्दी का मौसम
धरा सागर
और
हिम लिपटी ये बटियाँ
दूर खुलता बादलों में से उजाला

9

पाँव में पायल या सिर पर बोझ
मौसमों से
नहीं रुकते काम
समय को साँटना भी और
जीवन साधना भी है

10

आग है तो आस है
सर्द मौसम
पार करने की
जो मन में चाह है
एक प्याली चाह में वह ताप है

11

धूप नहाया शहर और
मौसम जाड़े का
आतप झरती काँच
और खिड़की मनभावन

12

देवदारों से
ढँकी यह राह
धुँध में घिरता हुआ दिन
सर्द सन्नाटा
और झरती डालियाँ धीमे
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जन्म : 27 जून 1955
शिक्षा : संस्कृत साहित्य में स्नातकोत्तर उपाधि, स्वातंत्र्योत्तर संस्कृत साहित्य पर शोध, पत्रकारिता और वेब डिज़ायनिंग में डिप्लोमा।
कार्यक्षेत्र : पीलीभीत (उत्तर प्रदेश, भारत) की सुंदर घाटियों जन्मी पूर्णिमा वर्मन को प्रकृति प्रेम और कला के प्रति बचपन से अनुराग रहा। मिर्ज़ापुर और इलाहाबाद में निवास के दौरान इसमें साहित्य और संस्कृति का रंग आ मिला। पत्रकारिता जीवन का पहला लगाव था जो आजतक साथ है। खाली समय में जलरंगों, रंगमंच, संगीत और स्वाध्याय से दोस्ती।
संप्रतिपिछले बीस-पचीस सालों में लेखन, संपादन, स्वतंत्र पत्रकारिता, अध्यापन, कलाकार, ग्राफ़िक डिज़ायनिंग और जाल प्रकाशन के अनेक रास्तों से गुज़रते हुए फिलहाल संयुक्त अरब इमारात के शारजाह नगर में साहित्यिक जाल पत्रिकाओं 'अभिव्यक्ति' और 'अनुभूति' के संपादन और कलाकर्म में व्यस्त।
प्रकाशित कृतियाँ : कविता संग्रह : वक्त के साथ (वेब पर उपलब्ध)ई मेल: abhi_vyakti@hotmail.com

धारावाहिक पंजाबी उपन्यास(किस्त- 33)



सवारी
हरजीत अटवाल
हिंदी अनुवाद : सुभाष नीरव

॥ अड़तीस ॥
इंडिया में बैठा शिन्दा भाइयों के पास इंग्लैंड आने के लिए उतावला होता। पिता की मृत्यु पर जब आने की तैयारी कर रहा था तो उसका मन पूरी तरह उमंग से भरा हुआ था। घर में अफ़सोस करने आए लोगों की परवाह भी वह भूल जाता। यहाँ पहुँचकर भी वह खुश था। पिता की मृत्यु का दुख था जो शीघ्र ही खत्म हो गया और अंतिम संस्कार के बाद शिन्दा इंग्लैंड के आनन्द को महसूस करने की रौ में आ गया। उसका आनन्द पौंड कमाने में ही था। पौंडों के लिए काम ज़रूरी था।
दुकान में तो वह आते ही काम में हाथ डालने लगा था। दुकान का काम उसको बहुत बढ़िया लगा। इंडिया गए लोग अपने भारी कामों की कहानियाँ सुना सुनाकर यूँ ही डराते रहते थे। दुकान का काम कहीं से भी भारी नहीं था। घंटे ही ज्यादा होते, और कुछ नहीं। सोहन सिंह के संस्कार तक तो शिन्दा जैसे भीड़ में घिरा रहा। बलदेव आ जाता और सतनाम भी। दूसरे गाँवों के लोग अफ़सोस प्रकट करने के लिए आते और मिलते रहते। गाँवों की बातें चल पड़तीं। सब अच्छा लगता। संस्कार के बाद वह एकदम अकेला हो गया। बलदेव तो अब जैसे आता ही नहीं था। सतनाम भी इतवार को आता और अजमेर के संग पब में जा घुसता। गुरिंदर भी अधिक बात न करती। वह बच्चों के संग अपने बच्चों की तरह खेलना चाहता, पर वे उसे बुलाते ही नहीं थे। अपितु उसकी बात पर मजाकिया लहजे में हँसने लग पड़ते।
उसे शीघ्र ही महसूस होने लग पड़ा था कि वह घर का तुच्छ-सा जीव था जबकि इंडिया में वह घर का मुखिया था। उसे गागू बहुत याद आने लगता जो कि उसका बहुत कहना मानता था। इसी तरह दोनों बेटियाँ भी। मिन्दो कभी रूठती तो कभी मान जाती, पर वह एक दबका मारता तो पानी की तरह उसके आगे घूमती फिरती। कभी कभी सक्क का दातुन करती तो गोरे रंग पर लाल अधर बहुत उभरते। यदि कभी शिन्दा रूठ जाता तो उसे सौ सौ नखरे करके मनाती। अब यह सब बहुत पीछे रह गया था। हज़ारों मील दूर। पर वह सारे फ्रीज हुए क्षण उसके सपनों में या ख़यालों में पिघल कर बहते और उसको तंग करते। उसकी नींद टूट जाती। जागता होता तो मन उचाट हो जाता।
उसे अपना रोजाना का रूटीन जो उसे पहले अच्छा लगता था, अब उबाऊ लगने लग गया था। सवेरे उठकर दुकान खोलता और रात के ग्यारह बजे तक खड़ी टांग रहता। ज्यादातर वास्ता उसका टोनी के साथ पड़ता था। टोनी से वास्ता पड़ने के कारण ही अंग्रेजी भी जल्दी सीख गया। उसके रूटीन में उसकी अपनी कोई मर्जी नहीं होती थी। वह फिल्मों का शौकीन था। इंडिया में होता था तो वीडियो घर मंगवा कर फिल्म देखता। नई लगी फिल्म का पहला शो देखने जालंधर या होशियारपुर जा पहुँचता। लेकिन यहाँ कभी टेलीविज़न के आगे बैठ ही नहीं सका था। यदि कभी बैठता तो बच्चे अपना प्रोग्राम देख रहे होते। यदि कभी कुछ देख भी रहा होता तो बच्चे एकदम चैनल बदल देते।
इंडिया में उसे बढ़िया कपड़े पहनने का बहुत शौक था। कभी क्रीज़ नहीं मरने देता था। पर अब वही ट्राउजर सवेरे उठकर टांगों में फंसाता और दुकान में आ घुसता। इंडिया से आते वक्त वह सोचा करता कि इंग्लैंड में आकर अजमेर की तरह पगड़ी ही बांधा करेगा। जब से सिगरेट की लत पड़ी तो उसने बाल कटवा दिए थे। वैसे ही कभी कभी शौकिया पगड़ी बांध लेता। उसका पासपोर्ट भी पगड़ी वाला था, पर यहाँ आकर उसे सतनाम का चेहरा पसंद था, बिलकुल क्लीन शेव्ड। एक दिन उसने भी कुछ वक्त लगाकर शेव कर मारी। उस दिन सतनाम और बलदेव भी संयोग से आए हुए थे। सतनाम का स्वभाव पहले ही मखौल करने वाला था। वह कहने लगा-
''ओए, यह क्या खुसरे की ऐड़ी जैसा मुँह निकाले फिरता है।''
''क्यों, अच्छा नहीं लगता ?''
''अच्छा तो लगता है, बल्कि बहुत अच्छा लगता है, पर अगर किसी गोरे ने पप्पी मांग ली तो हमारी बेइज्ज़ती तो हो जाएगी न।''
उसकी बात सुनकर सभी हँस पड़े। बलदेव बोला-
''अगर गोरे ने मांग ली तो निभ जाएगा, पर अगर कोई काला पीछे पड़ गया तो इसका क्या बनेगा।''
इस बात पर सब तरफ हँसी दौड़ गई। शिन्दा शर्मिन्दा सा हो गया और उसने फिर से पहले जैसी चोंच दाढ़ी रख ली। इंडिया में वह ड्राइवरों जैसा चेहरा-मोहरा बनाकर रखता था। खड़े बाल और चोंचवाली दाढ़ी। खैणी भी खा लेता था और सिगरेटें भी पी लेता, पर जब धार्मिक लहर चली तो सब छोड़ दिया था। अब टोनी को पीते देख उसका दिल करने लगता था। अजमेर सिगरेटों के बहुत खिलाफ़ था। इसलिए शिन्दे की हिम्मत न पड़ती। उस दिन बलदेव की कार में भी डरते हुए ही स्मोक किया था कि घर जाने पर किसी किस्म की गंध के कारण कोई मुसीबत ही न खड़ी हो जाए।
बलदेव भी बहुत बदल गया था। उसे कभी बलदेव अपने बहुत करीब प्रतीत होता था। पर अब वह पहले जैसा नहीं रहा था। वैसे भी उसकी हरकतें शिन्दे को अजीब लगतीं। वह दरियाओं के बारे में ही बातें करता रहता। शिन्दे को लगता कि विवाह के टूट जाने के कारण वह मानसिक तौर पर हिल गया था। बलदेव का गोरी के साथ रहना भी उसको अच्छा नहीं लगा था। फिर जब वह गोरी किसी दूसरे आदमी के साथ दुकान में कुछ खरीदने आई तो शिन्दा बहुत दुखी हुआ था। लोगों का यह कहना था कि गोरी औरतें भरोसेवाली नहीं होतीं, बहुत सच लगा था। इस बात से सतनाम ठीक था। बाहर कहीं मुँह नहीं मारता था। जहाँ सतनाम हर वक्त मजाक के मूड में रहता, वहीं अजमेर सदैव रौब डालता रहता। उसका स्व उसे सजग करता रहता कि मैं ही मैं हूँ।
अजमेर जो कहता, वह सत्य वचन कहकर मान लेता था। उसकी बातें शिन्दे को तंग भी करती, पर वह उफ्फ नहीं करता था। जिस दिन उसने पचास पौंड हफ्ता देने की बात सुनाई, वह भी उस दिन से जबसे शिन्दा आया था तो उसे अजमेर से सारे गिले भूल गए।
अजमेर ने पूछा, ''तू खुश भी है... ये पचास तेरे बचेंगे ही, बाकी का तेरा सारा खर्चा मैंने ही करना है।''
''भाजी, जैसा आपने कर दिया, ठीक ही है। मुझे तुम्हारी बात पसन्द है। तुमने सदा मेरा भला ही सोचना है।''
सतनाम ने बताया हुआ था कि इसे मान देता रहा कर। अजमेर ने आगे कहा, ''यह अब तू देख कि पैसे तूने लेने हैं या सीधे मिन्दो को भेजें।''
''भाजी, उसे ही भेज दो।''
''ऐसा न हो कि यहाँ से पैसे जाते रहें और वो वहाँ खर्च करती रहे। मुझे पता है कि उसका हाथ ज़रा खुला है।''
''नहीं भाजी, वह ऐसी नहीं है। घर के खर्चे ही बहुत हैं। तीन बच्चे पढ़ते हैं। ज़मीन तुम्हें पता ही है कि कितनी है। हमारा घर तो तुम्हारे सिर पर ही चलता था, पहले भी और अब भी।''
अजमेर खुश हो गया। वह मिन्दो को पैसे भेजने के बारे में सोचने लगा। मिन्दो की चिट्ठी भी आई हुई थी। पैसों की मांग की थी।
शिन्दे को ख़त आते रहते थे। वह भी जवाब देता रहता। गागू उसे अलग चिट्ठी लिखता और दोनों लड़कियाँ अलग। कभी कभी शिन्दा फोन भी कर लेता। फोन मंहगा पड़ता था। अजमेर आँखें निकालने लगता था। फिर फोन करने -सुनने के लिए मिन्दो को बाहर आना पड़ता था। यह भी शिन्दे को पसन्द नहीं था।
अजमेर की अन्य किसी बात का तो वह बुरा न मनाता, पर उसका शकी स्वभाव उसे बहुत बुरा लगता था। टोनी पर शक करता, उसे अकेले गल्ले पर अकेला न छोड़ता। ऐसे ही बलदेव भी उससे खफ़ा था। शिन्दा गल्ले पर खड़ा होता तो टोनी के कान में कुछ कहने लगता। शिन्दा जला-भुना बियर का डिब्बा खोल लेता। कई बार बाहर से लौटा अजमेर पूछता कि उसके पीछे कौन कौन दुकान में आए थे। उसका अर्थ यह होता कि कहीं शिन्दा पैसे निकालकर ही न किसी को पकड़ाता रहा हो। बलदेव तो दुकान में आता ही कम था। उसका इशारा सतनाम की तरफ ही अधिक होता।
उस दिन शिन्दे को बहुत तकलीफ़ हुई थी जिस दिन बियर की छोटी सी बोतल की चोरी के कारण अजमेर ने उसे अपमानित किया था। दुकान में वह अकेला किधर किधर हो सकता था। उस दिन के बाद शिन्दे ने सोच लिया था कि छोटी मोटी चोरी के बारे में वह अजमेर को बताएगा ही नहीं। कई बार टोनी की गर्ल फ्रेण्ड आती तो टोनी बियर उसे देकर शिन्दे को पैसे देने लगता। शिन्दा अब लेने से इन्कार करने लगा था। ऐसे ही टोनी की बेटी भी अपने किसी न किसी ब्वॉय फ्रेण्ड को लेकर आ जाती, अब शिन्दा उसको थोड़ी-बहुत रियायत कर देता।
मुनीर और प्रेम शर्मा का दुकान में आना उसे अच्छा लगता था। मुनीर उससे खालिस्तान की बातें करने लगता। इस लहर के बारे में बात छेड़ते हुए मुनीर कहता-
''इसी तहरीक से सिक्खों का भला होसी।''
''भला तो पता नहीं किसका होगा, पर पंजाब मे आम बंदे की हालत बहुत बुरी है, अंधी को बहरा घसीटे फिरता है।''
''जो भी होसी, पर खालिस्तान तो बणसी।''
''मीआं, सब अखबारी रौले हैं।''
''शिन्दे, तुझे पता ना होसी, कभी साउथाल जाके देख, पूरा खालिस्तान बना है।''
''ये साउथाल कहाँ है ?''
शिन्दा कहता और फिर सोचने लगता कि अब बलदेव आया तो कहूँगा कि साउथाल लेकर चले। पर बलदेव लौटकर उसे चक्कर लगवाने के लिए लेकर ही न गया।
एक दिन प्रेम शर्मा उससे पूछने लगा-
''शिन्दे, कैसे स्टे मिल गई।''
''कैसी स्टे ?''
''यही, पुलिटिकल असाईलम की।''
''पता नहीं, भाजी को पता है।''
''अप्लाई तो कर रखा है ?''
''यह भी भाजी को ही पता है।''
''देखना कहीं....। यह तो जल्दी से जल्दी कर देना चाहिए।''
रात में उसने अजमेर से बात करते हुए कहा-
''आज प्रेम पूछ रहा था कि असाईलम के लिए अप्लाई किया कि नहीं। पक्के होने के बहुत चांस हैं।''
उसकी बात सुनकर अजमेर गुस्से में आकर बोला-
''जब हम खालिस्तानी है ही नहीं तो.... इस बामण की टांगें तो मैं चीरूंगा।''
(जारी…)
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लेखक संपर्क :
67, हिल साइड रोड,
साउथाल,
मिडिलसेक्स, इंग्लैंड
दूरभाष : 020-85780393,07782-265726(मोबाइल)

मंगलवार, 7 दिसंबर 2010

गवाक्ष – दिसंबर 2010



“गवाक्ष” ब्लॉग के माध्यम से हम हिन्दी ब्लॉग-प्रेमियों को हिन्दी/पंजाबी के उन प्रवासी लेखकों/कवियों की समकालीन रचनाओं से रू-ब-रू करवाने का प्रयास करते आ रहे हैं जो अपने वतन हिन्दुस्तान से कोसों दूर बैठकर अपने समय और समाज के यथार्थ को अपनी रचनाओं में रेखांकित कर रहे हैं। “गवाक्ष” में अब तक विशाल (इटली), दिव्या माथुर (लंदन), अनिल जनविजय (मास्को), देवी नागरानी(यू.एस.ए.), तेजेन्द्र शर्मा(लंदन), रचना श्रीवास्तव(लंदन), पूर्णिमा वर्मन(दुबई), इला प्रसाद(यू एस ए), भगत धवन (डेनमार्क), चाँद शुक्ला (डेनमार्क), वेद प्रकाश ‘वटुक’(यू एस ए), रेखा मैत्र (यू एस ए), तनदीप तमन्ना (कनाडा), प्राण शर्मा (यू के), सुखिन्दर (कनाडा), सुरजीत(कनाडा), डॉ सुधा धींगरा(अमेरिका), मिन्नी ग्रेवाल(कनाडा), बलविंदर चहल (न्यूजीलैंड), बलबीर कौर संघेड़ा(कनाडा), शैल अग्रवाल (इंग्लैंड), श्रद्धा जैन (सिंगापुर), डा. सुखपाल(कनाडा), प्रेम मान(यू.एस.ए.), (स्व.) इकबाल अर्पण, सुश्री मीना चोपड़ा (कनाडा), डा. हरदीप कौर संधु(आस्ट्रेलिया), डा. भावना कुँअर(आस्ट्रेलिया) आदि की रचनाएं और पंजाबी कथाकार-उपन्यासकार हरजीत अटवाल के उपन्यास “सवारी” के हिंदी अनुवाद की इकत्तीसवीं किस्त आपने पढ़ीं। “गवाक्ष” के दिसंबर 2010 अंक में प्रस्तुत हैं – स्वीडन से अनुपमा पाठक की कविताएं तथा हरजीत अटवाल के धारावाहिक पंजाबी उपन्यास “सवारी” की बत्तीसवीं किस्त का हिंदी अनुवाद…

स्वीडन से
अनुपमा पाठक की कविताएँ


॥एक॥
इंसानियत का आत्मकथ्य


गुजरती रही सदियाँ
बीतते रहे पल
आये
कितने ही दलदल
पर झेल सबकुछ
अब तक अड़ी हूँ मैं!
अटल खड़ी हूँ मैं!

अट्टालिकाएं करें अट्टहास
गर्वित उनका हर उच्छ्वास
अनजान इस बात से कि
नींव बन पड़ी हूँ मैं!
अटल खड़ी हूँ मैं!

देख नहीं पाते तुम
दामन छुड़ा हो जाते हो गुम
पर मैं कैसे बिसार दूं
इंसानियत की कड़ी हूँ मैं!
अटल खड़ी हूँ मैं!

जब जब हारा तुम्हारा विवेक
आये राह में रोड़े अनेक
तब तब कोमल एहसास बन
परिस्थितियों सेलड़ी हूँ मैं!
अटल खड़ी हूँ मैं!

भूलते हो जब राह तुम
घेर लेते हैं जब सारे अवगुण
तब जो चोट कर होश में लाती है
वो मार्गदर्शिका छड़ी हूँ मैं!
अटल खड़ी हूँ मैं!

मैं नहीं खोयी खोया है तुमने वजूद
इंसान बनो इंसानियत हो तुममें मौजूद
फिर धरा पर ही स्वर्ग होगा
प्रभुप्रदत्त नेयमतों में, सबसे बड़ी हूँ मैं!
अटल खड़ी हूँ मैं!
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॥दो॥
ऐसा हो...!!!


मान-अभिमान से परे
रूठने-मनाने के सिलसिले सा
कुछ तो भावुक आकर्षण हो!

किनारे पर रेत से घर बनाता
और अगले पल उसे तोड़ छोड़
आगे बढ़ता सा
भोला भाला जीवन दर्शन हो!

नमी सुखाती हुई
रुखी हवा के विरुद्ध
नयनो से बहता निर्झर हो!

परिस्थितियों की दुहाई न देकर
अन्तःस्थिति की बात हो
शाश्वत संघर्ष
आत्मशक्ति पर ही निर्भर हो!

भीतर बाहर
एक से...
कोई दुराव-छिपाव नहीं
व्यवहारगत सच्चाइयां
मन प्राण का दर्पण हो!

सच के लिए
लड़ाई में
निजी स्वार्थों के हाथों
कभी न आत्मसमर्पण हो!
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॥तीन॥
कविता
बनती रहे कविता
शब्द थिरकते रहे अपनी लय में
भाव नित परिमार्जित होता रहे अपने वेग से
लेखक और पाठक...संवेदना के एक ही धरातल पर हो खड़े
भेद ही मिट जाये...
फिर सौंदर्य ही सौंदर्य है इस विलय में!!!!

जीने के लिए जमीन के साथ-साथ
आसमान का होना भी जरूरी है
धरती पे रोपे कदम...सपने फ़लक पे भाग सकें
फिर सृजन की संभावनाएं पूरी हैं
हो विश्वास का आधार...हो स्नेह का अवलंब
नहीं तो नैया डूब जाती है संशय में!!!!

बहती रहे कविता सरिता की तरह
शब्द थिरकते रहे अपनी लय में
जीवन की आपाधापी में कुछ क्षणों का अवकाश हो
कुछ लम्हे एकाकी से पास हो
निहारने को आसपास बिखरी अद्भुत रश्मियाँ...
और डूब जाने को विष्मय में!!!!

यही तो सहेजा जायेगा...
और शब्दों में सजकर नयी आभा में प्रगट हो पायेगा
एक पल की अनुभूति का मर्म
विस्तार को प्राप्त हो नीलगगन की गरिमा पायेगा
ये कालजयी भावनाएं ही बच जाएँगी...
नहीं तो...यहाँ कहाँ कुछ भी बच पाता है प्रलय में!!!!
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अनुपमा पाठक जमशेदपुर से हैं और बचपन से कविताएँ लिखती रही हैं। रचनाओं का संकलन नहीं हो पाया। अभी कुछ समय से अपनी वेबसाइट “अनुशील” http://www.anusheel.in/ पर लिख रही हैं। शिक्षा जमशेदपुर में ही हुई, फिर वाराणसी से बोटनी में स्नातक की डिग्री ली और फिर बॉयो-इनफॉर्मेटिक में परास्नातक। एक वर्ष विद्यालय में अध्यापन कार्य भी किया। अध्ययन –अध्यापन में रूचि है। बॉयो-इनफार्मेटिक में पी.एचडी के लिए प्रयासरत। फिलहाल, गत एक वर्ष से स्टॉकहॉम ( स्वीडन ) में रह रही हैं।
ईमेल : anupama623@gmail.com
anushil623@rediffmail.com
वेब साइट : http://www.anusheel.in/

धारावाहिक पंजाबी उपन्यास(किस्त- 32)



सवारी
हरजीत अटवाल
हिंदी अनुवाद : सुभाष नीरव

॥ सैंतीस ॥
कॉफी टेबल पर लोकल पेपर पड़ा था जो घरों में मुफ्त फेंका जाता था। बलदेव उठाकर पन्ने पलटने लगा। ख़बर तो ख़ास नहीं थी, बस विज्ञापनों से ही भरा पड़ा था। कारों के, घरों के और अन्य छोटी-मोटी सर्विसों के विज्ञापन। वह क्लैपहम में घरों की कीमतों का जायजा लेने लगा। उसे व्यस्त देखकर नील ने ख़बरों वाला चैनल बदलकर कार्टून लगा लिए। नील को देखकर बलदेव हँसने लगा। एलीसन ने भी नील को चैनल बदलते देख लिया था। वह बलदेव के समीप बैठते हुए बोली-
''डैरक के साथ इतने नहीं खुले थे ये, उससे डरते थे। वह मार भी देता था, पर तेरे संग तो मिक्स हो गए हैं।''
बलदेव समझ गया कि डैरक उसके पहले प्रेमी का नाम होगा। उसका मन होता था कि वह डैरक के विषय में कुछ पूछे क्योंकि शौन उसके बहुत खिलाफ़ रहा करता था, पर उसने सोचा कि अतीत में जाने का अधिक लाभ नहीं होता। एलीसन बुरा भी मान सकती थी।
एलीसन ने लोकल अख़बार 'न्यू टाइम्ज़' की ओर देखते हुए उससे पूछा-
''डेव, क्या ढूँढ़ रहा है ?''
''घर खरीदना है, देख रहा हूँ कि इस इलाके में कैसे घर हैं।''
''यहाँ तो ये विक्टोरियन जैसे घर है, पर क्लैपहम कॉमन में बहुत खूबसूरत घर हैं।''
''मेरा दिल करता है, दरिया के करीब खरीदूँ।''
''आज अचानक घर की सोच कैसे आ गई ?''
''एलीसन, मैं ज़रा सैटिल होना चाहता हूँ, बहुत देर भटक लिया।''
असल बात उसने बताई नहीं कि फेह और नील को देखकर उसे अपने बच्चे याद आते थे और सिमरन ने कहा था कि यदि लगातार लड़कियों को लेकर जाया करेगा तभी लेकर जाना। लड़कियों को लाने के लिए अपना घर भी चाहिए था। दूसरा भय उसे अपनी नौकरी का था कि छूट ही न जाए। नौकरी छूटने से पहले पहले वह घर ले लेगा तो मोर्टगेज आसानी से मिल जाएगी, नौकरी के बिना बैंक मोर्टगेज नहीं देते।
उनके बातचीत करते समय ही फोन की घंटी बजी। बलदेव फोन के करीब बैठा था। एलीसन ने कहा-
''डेव, देख तो ज़रा।''
उसने झिझकते हुए फोन उठाया। शौन का था। वह बोला-
''मैं तुझे इतने दिनों से ढूँढ़ता घूम रहा हूँ, कितनी बार ऐंडी के घर फोन किया और शैम की शॉप पर भी... चल अच्छा हुआ तू यहाँ मिल गया। एलीसन से तेरे बारे में पूछने के लिए ही फोन किया था मैंने।''
''सुना, कहाँ है ?''
''न्यूज़ीलैंड, तेरे कज़न के पास, कैराफेई।''
''क्या हाल है ग्रेवाल का और तेरा भी।''
''बहुत अच्छा। शराब का दौर चल रहा है।''
''काम करता है ?''
''काम की समस्या नहीं, काम तो मिल जाएगा। फार्मिंग के काम बहुत आसानी से मिल जाते हैं।''
''दिल लगा हुआ है ?''
''हाँ, ग्रेवाल की कम्पनी में दिल न लगे !'' कहकर शौन हँसने लगा।
फिर बलदेव ने ग्रेवाल से भी बातें कीं। उसने फोन रखा तो एलीसन बोली-
''देख, अपने दोस्त की बात, मेरे घर फोन किया और मेरे से हैलो तक नहीं की। यह पहले से ही ऐसा रहा, ख़ुदगर्ज़।''
''वह जल्दी में था, वहाँ बिल भी बहुत आता होगा।''
''यह भी ठीक है पर मैं इसे बचपन से जानती हूँ। ऐसा ही रहा है। मेरी ज़रूरत होगी तो आएगा, नहीं तो तू कौन, मैं कौन।''
''एलीसन, यूँ ही न मन खराब कर, ज़िन्दगी ऐसे ही चलती है।''
''डेव, मेरा मन अब खराब नहीं होता, हो चुका जितना होना था। मैंने बहुत कठिन समय देखा है। किसी ने मेरी मदद नहीं की, बल्कि उल्टा लड़ने आ जाता था। यह मैं जानती हूँ, अपनी ज़रूरत के कारण मेरे साथ सुलह की है।'' कहती हुई वह अपने घर से भागने की, यहाँ आकर देखी तकलीफ़ों की कहानी फिर से सुनाने लगी। बलदेव ने पूछा-
''एलीसन, तेरा दिल नहीं करता वैलजी जाने को ?''
''बहुत करता है पर एक तो मेरे बच्चे कौन संभालेगा ? दूसरे वहाँ मेरा स्वागत बिलकुल नहीं होगा।''
''इन्हें तू संग ही ले जाना।''
''मुझे तो पता नहीं कि वे बुलाएँगे भी कि नहीं। मेरे बच्चों को देखकर वे वैसे ही मर जाएँगे। वे तो यह समझे बैठे हैं कि मैं उनके घर में कभी पैदा ही नहीं हुई थी।'' कहकर एलीसन चुप हो गई। वह दूर आयरलैंड जा पहुँची थी। कुछ देर बाद कहने लगी-
''डेव, वे लोग बहुत साधारण बुद्धि वाले हैं। मेरी छोटी-सी बात को इतना बड़ा हादास बनाये फिरते हैं। वे यह नहीं समझते कि लंदन में पिचहत्तर फीसदी बच्चे बिना विवाह के पैदा होते हैं। विवाह की अब कद्र ही नहीं, एक काग़ज़ का टुकड़ा हाथ में पकड़ भी लो तो बहुत जल्दी तुम उसे फाड़ने लगते हो। विवाह के बग़ैर जोड़ों में समझ अधिक बनती है।''
''एलीसन, जो कुछ भी है, यदि तेरा मन वैलज़ी जाने को करता है तो फेह और नील को मैं संभाल लूँगा।''
''यह तो तेरा बड़प्पन है। मैं तो तेरी वैसे ही बहुत शुक्रगुजार हूँ कि तू मेरी बातें सुन लेता है, इतने साल हो गए, ये बातें मैं किसी के साथ भी नहीं कर सकी। डेव, मेरा घर जाने को, सबको देखने को बहुत दिल करता है, पर वे नहीं चाहते कि मैं आऊँ। कई बार मैं फोन पर बात करना चाहती हूँ तो वे फोन कट कर देते हैं।''
''तेरी बहन है, आयरीन, वह तुझे शायद समझती हो।''
''हाँ डेव, वह समझदार है, पर उसका पति कट्टर कैथोलिक है।''
''तू तो चर्च जाती है, फॉदर एडवर्ड क्या कहता है ?''
''डेव, वह भी यही बोली बोलता है। असल में तो यह चर्च की ही शिक्षा है, वहीं से तो सारे हुक्मनामे चला करते हैं।''
बलदेव को एलीसन से बातें करना अच्छा लगता था। यद्यपि एलीसन को राजनीति की बहुत समझ नहीं थी, पर ज़िन्दगी की मारें काफ़ी खाई हुई थीं। बच्चों को स्कूल छोड़कर एक कॉफ़ी शॉप में काम करने जाया करती थी और स्कूल बन्द होने तक वहीं काम किया करती। कुछ पैसे सोशल सिक्युरिटी की तरफ़ से मिलते थे। उसका गुजारा ठीक हो रहा था। वह बलदेव को इतनी सहजता से पैसे खर्च करने नहीं देती थी।
बलदेव अब क्लैपहम से ही काम पर जाता था। यहाँ से ट्यूब का सफ़र टफनल पॉर्क से भी कम था। वही नॉर्दन लाइन पर छठा स्टेशन। काम पर वह जाता ज़रूर था पर दिल अभी भी नहीं लग सका था। अभी भी उसे स्थायी सीट नहीं मिली थी। जो भी कोई छुट्टी पर होता, उसे उसके स्थान पर ही भेज दिया जाता। उसकी लम्बी सिक का केस अभी चल रहा था। जो भी मिलता, उससे उसके केस के बारे में पूछने लगता। उसे शोकॉज़ नोटिस मिला था कि तुझे काम पर से हटा क्यों न दिया जाए। उसने यूनियन की मार्फ़त हैड ऑफिस में अपील की थी, जहाँ उसे आस थी कि मुआफ़ीनामा देकर नौकरी बच जाएगी। लेकिन उसे अब इस नौकरी में कोई दिलचस्पी नहीं थी। यदि घर लेने का विचार न होता तो वह कभी का इस्तीफ़ा दे चुका होता।
घर तलाशने के लिए उसने लंदन का नक्शा खोला और साँप जैसे थेम्ज़ पर हाथ फेरने लगा। वॉलफोर्ड को उंगलियों से दरिया को छूता हुआ वह ग्रीनिच आ गया। फिर धीरे-धीरे फुल्हम आ पहुँचा। एक दिन उसने एलीसन और बच्चों को कार में बिठाया और फुल्हम के चक्कर लगाने लगा। कितनी ही सड़कें देखीं, सब एक जैसी लग रही थीं।
अगले रोज़ वह अकेला ही फुल्हम आया और कार एक तरफ़ खड़ी करके पैदल चलने लगा। पैदल चलना उसे सदैव ही अच्छा लगा करता था। वह थेम्ज़ के किनारे आ गया। यहाँ थेम्ज़ कुछ और ही तरह का लगता था। घर दरिया से हटकर थे। वह चाहता था कि उसका घर दरिया से इतना भर दूर हो कि मिनट भर में ही चलकर वह दरिया पहुँच सकता हो। यदि खिड़की से दिखाई देता हो तो सोने पर सुहागे वाली बात होगी। वह चलता हुआ एक पब के पास आ गया। पब की दीवार दरिया के साथ जा लगती थी। पानी के चढ़ने-उतरने के निशान दीवार पर दिखाई देते थे। चढ़ा हुआ दरिया यूँ प्रतीत होता होगा कि बेशक पानी चुल्लू में भर लो। यही सोचता हुआ वह पब में प्रवेश कर गया।
काफ़ी बड़ा पब था। अधिक लोग नहीं थे। जो थे भी, वे सभी चढ़ी उम्र के थे। उसने मन ही मन सोचा कि जैंटिलमैन पब होगा। वह आसपास देखता हुआ समझ गया कि इस पब में लोकल लोग ही अधिक आते होंगे। उसने लागर का गिलास भरवाया और दरिया की ओर खिड़की के पास बैठ गया। दरिया के पार रौशनियाँ जगमग-जगमग कर रही थीं। एक बड़ी किश्ती दरिया में से गुजरी। यह रौशनियों से भरी हुई थी और लोग खड़े होकर ड्रिंक कर रहे थे, आपस में बातें कर रहे थे। इसमें कोई पार्टी चल रही थी। एक बोट कुछ ड्रम-से खींचती हुई गुजरी। जैसे-जैसे शाम ढल कर रात की ओर बढी, पब भी भरने लगा।
भारी कदकाठी का एक व्यक्ति उसके सामने वाली सीट की ओर इशारा करता हुआ पूछने लगा-
''यहाँ कोई बैठा तो नहीं ?''
''नहीं।''
''बैठ सकता हूँ ?''
''क्यों नहीं।''
कहकर बलदेव उसकी ओर देखकर मुस्कराने लगा। वह व्यक्ति अपनी दाढ़ी पर हाथ फेरता हुआ बोला-
''मैं जैरी स्टोन हूँ।''
''और मैं डेव बैंज।''
''मैं तुम्हें पहली बार देख रहा हूँ, इसी इलाके में रहते हो ?''
''नहीं, इस इलाके में रहने की कोशिश कर रहा हूँ। इधर कहीं घर की तलाश कर रहा हूँ इसीलिए इलाका देखने आया रिवरसाइड आर्मज में आ बैठा।''
''यह बात बहुत अच्छी है, कोई इलाका देखने के लिए लोकल पब में चला जाए तो सब पता चल जाएगा। पर यहाँ लोग अन्य दूर-दराज इलाकों से भी आ जाते हैं।''
''जैरी, तुम इसी इलाके में रहते हो ?''
''हाँ, यहीं जन्मा, जवान हुआ और बूढ़ा हो रहा हूँ।'' कहकर जैरी हँसा।
बलदेव ने कहा, ''मैं दरिया के किनारे घर लेने का इच्छुक हूँ। दरिया किनारे ही मेरा काम है, ब्रिटिश रेल का हैड ऑफिस। और मेरा पहला घर जहाँ मेरी पत्नी बच्चों के संग अलहदगी के बाद रहती है, ग्रीनिच है, वो भी दरिया के बहुत करीब है।''
''हाँ डेव... पर इससे क्या फ़र्क़ पड़ता है। तुम दो दिन में तो दरिया के आदी हो जाते हो। हमारा मेन डीपू दरिया के ऐन किनारे पर है, मैं तो वहाँ बोर होने लगता हूँ।''
''क्या काम करते हो जैरी ?''
''मैं सेंट्रल गैस में साउथ ईस्ट का एरिया मैनेजर हूँ।''
''सेंट्रल गैस कौन सी ? सिलंडरगैस ?''
''हाँ, जो पेट्रोल पम्पों पर पड़े होते हैं।''
''मैं जानता हूँ। पहले मैं सोचा करता था कि घरों में तो नेचुरल गैस की सप्लाई है, ये सिलंडर कौन लेता होगा।''
''सभी ऐसा ही सोचते हैं, पर यह बिजनेस बहुत बड़ी स्केल पर चल रही है। हर एरिये में डीपू हैं इसके।''
''यहाँ किस रोड पर रहते हो ?''
''हार्ट ग्रोव पर... मेरे पिता का घर है यह। अब तो वह नहीं रहा और मैं ही मालिक हूँ। कैमला कहती है कि सफाई नहीं की जाती, घर बेचकर फ्लैट ले लेना है। और फिर मेरे सारे बच्चे चले गए, लड़की ही रहती है।''
''कितने बच्चे हैं ?''
''तीन। बड़ा लड़का, उसने अपना घर ले लिया है, काम करता है। छोटी लड़की है, वह अपने ब्वॉय फ्रेंड के साथ हमारे पास रहती है। उसका यह ब्वॉय फ्रेंड अच्छा नहीं है, मुझे नहीं पसन्द इसलिए मैंने उन्हें घर से चले जाने के लिए कह दिया है। इससे पहले वाला ब्वॉय फ्रेंड बहुत अच्छा था, मेरे साथ पब में भी आता था। सबसे छोटा मेरा लड़का है, उसे भी हमने घर से निकाल दिया है।''
''क्यों ?''
''क्योंकि वह सोलह साल का हो गया था, न तो वह हमें किराया देता था और न ही पढ़ता था। कैमला ने उसे चलता कर दिया।''
(जारी…)
००
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बुधवार, 3 नवंबर 2010

गवाक्ष – नवंबर 2010


“गवाक्ष” ब्लॉग के माध्यम से हम हिन्दी ब्लॉग-प्रेमियों को हिन्दी/पंजाबी के उन प्रवासी लेखकों/कवियों की समकालीन रचनाओं से रू-ब-रू करवाने का प्रयास करते आ रहे हैं जो अपने वतन हिन्दुस्तान से कोसों दूर बैठकर अपने समय और समाज के यथार्थ को अपनी रचनाओं में रेखांकित कर रहे हैं। “गवाक्ष” में अब तक विशाल (इटली), दिव्या माथुर (लंदन), अनिल जनविजय (मास्को), देवी नागरानी(यू।एस.ए.), तेजेन्द्र शर्मा(लंदन), रचना श्रीवास्तव(लंदन), पूर्णिमा वर्मन(दुबई), इला प्रसाद(यू एस ए), भगत धवन (डेनमार्क), चाँद शुक्ला (डेनमार्क), वेद प्रकाश ‘वटुक’(यू एस ए), रेखा मैत्र (यू एस ए), तनदीप तमन्ना (कनाडा), प्राण शर्मा (यू के), सुखिन्दर (कनाडा), सुरजीत(कनाडा), डॉ सुधा धींगरा(अमेरिका), मिन्नी ग्रेवाल(कनाडा), बलविंदर चहल (न्यूजीलैंड), बलबीर कौर संघेड़ा(कनाडा), शैल अग्रवाल (इंग्लैंड), श्रद्धा जैन (सिंगापुर), डा. सुखपाल(कनाडा), प्रेम मान(यू.एस.ए.), (स्व.) इकबाल अर्पण, सुश्री मीना चोपड़ा (कनाडा), डा. हरदीप कौर संधु(आस्ट्रेलिया) आदि की रचनाएं और पंजाबी कथाकार-उपन्यासकार हरजीत अटवाल के उपन्यास “सवारी” के हिंदी अनुवाद की तीसवीं किस्त आपने पढ़ीं। “गवाक्ष” के नवंबर 2010 अंक में प्रस्तुत हैं - डा. भावना कुँअर(आस्ट्रेलिया) की कविताएं तथा हरजीत अटवाल के धारावाहिक पंजाबी उपन्यास “सवारी” की इकत्तीसवीं किस्त का हिंदी अनुवाद…

आस्ट्रेलिया(सिडनी) से
डा. भावना कुँअर की कविताएँ

॥एक॥
दीये की व्यथा
(दीपावली पर विशेष)

शाम के वक्त
घर लौटते हुए
चौंका दिया मुझे एक
दर्द भरी आवाज़ ने
मैं नहीं रोक पाई स्वयं को
उसके करीब जाने से
पास जाकर देखा तो
बड़ी दयनीय अवस्था में
पड़ा हुआ था एक "मिट्टी का दीया"
मैंने उसको उठाकर
अपनी हथेली पर रखा
और प्यार से सहलाकार पूछा
उसकी कराहट का मर्म?
उसकी इस अवस्था का जिम्मेदार?
वह सिसक पड़ा
और टूटती साँसों को जोड़ता हुआ -सा
बहुत छटपटाहट से बोला-
मैं भी होता था बहुत खुश
जब किसी मन्दिर में जलता था
मैं भी होता था खुश जब
दीपावली से पहले लोग मुझे ले जाते थे अपने घर
और पानी से नहला-धुलाकर
बड़े प्यार से कपड़े से पौंछकर
सजाते थे मुझे तेल और बाती से
और फिर मैं
देता था भरपूर रोशनी उनको
झूमता था अपनी लौ के साथ
करता था बातें अँधियारों से
जाने कहाँ-कहाँ की मिट्टी को
एक साथ लाकर
कारीगर देता था एक पहचान हमें
"दीये की शक्ल"
और हम सब मिलजुलकर
फैलाते थे एक सुनहरा प्रकाश
पर अब
हमारी जगह ले ली है
सोने, चाँदी और मोम के दीयों ने
अब तो दीपावली पर भी लोग दीये नहीं
लगातें हैं रंग बिरंगी लड़ियाँ
और मिटा डाला हमारा अस्तित्व
एक ही पल में
तो फिर अब भी क्यों रखा है
नाम "दीपावली" यानी
दीयों की कतार?
आज फेंक दिया हमें
इन झाड़ियों में
तुम आगे बढ़ोगी
तो मिलेंगे तुम्हें मेरे संगी साथी
इसी अवस्था में
अपनी व्यथा सुनाने को
पर तुमसे पहले नहीं जाना किसी ने भी
हमारा दर्द, हमारी तड़प
आज वही भुला बैठे हैं हमें
जिन्हें स्वयं जलकर
दी थी रोशनी हमने
0

॥दो॥
आँखें जाने क्यों

आँखें जाने क्यों
भूल गई पलकों को झपकना...
क्यों पसंद आने लगा इनको
आँखों में जीते-जागते
सपनों के साथ खिलवाड़ करना …
क्यों नहीं हो जाती बंद
सदा के लिए
ताकि ना पड़े इन्हें किसी
असम्भव को रोकना ।
०
॥तीन॥
स्याह धब्बे ...

आँखों के नीचे
दो काले स्याह धब्बे ...

आकर ठहर गए

और नाम ही नहीं लेते जाने का...
न जाने क्यों उनको
पसंद आया ये अकेलापन।
0

॥चार॥
दस हाइकु

1-भटका मन
गुलमोहर वन
बन हिरन।

2-नन्ही चिरैया
गुलमोहर पर
फुदकी फिरे।

3-जुगनुओं से
गुलमोहर वृक्ष
हैं झिलमिल।

4-था पल्लवित
मन मेरा -देखा जो
गुलमोहर।

5-मखमली सा
शृंगार किये,खिले
गुलाबी फूल।

6-झूम ‍ गाते हैं
खेत खलिहान भी
आया बंसत।

7-नटखट -सी
चंचला,लुभावनी
ऋतु बसन्त ।

8-दुल्हन बनी
पृथ्वी रानी,पहने
फूलों के हार।

9-खेत है वधू
सरसों हैं गहने
स्वर्ण के जैसे ।

10-रंग बिरंगी
तितलियों का दल
झूमता फिरे ।

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डॉ० भावना कुँअर
शिक्षा - हिन्दी व संस्कृत में स्नातकोत्तर उपाधि, बी० एड०, पी-एच०डी० (हिन्दी)
शोध-विषय - ' साठोत्तरी हिन्दी गज़लों में विद्रोह के स्वर व उसके विविध आयाम'।
विशेष - टेक्सटाइल डिजाइनिंग, फैशन डिजाइनिंग एवं अन्य विषयों में डिप्लोमा।
प्रकाशित पुस्तकें - 1. तारों की चूनर ( हाइकु संग्रह)
2. साठोत्तरी हिन्दी गज़ल में विद्रोह के स्वर
प्रकाशन - स्तरीय पत्र-पत्रिकाओं में कविता, कहानी, गीत, हाइकु, बालगीत, लेख, समीक्षा, आदि का अनवरत प्रकाशन। अनेक राष्ट्रीय एवं अन्तर्राष्ट्रीय अंतर्जाल पत्रिकाओं में रचनाओं एवं लेखों का नियमित प्रकाशन, अपने ब्लॉग http://dilkedarmiyan.blogspot.com पर अपनी नवीन-रचनाओं का नियमित प्रकाशन तथा http://drbhawna.blogspot.com/ पर कला का प्रकाशन अन्य योगदान
स्वनिर्मित जालघर - http://drkunwarbechain.blogspot.com/
http://leelavatibansal.blogspot.com/
सिडनी से प्रकाशित "हिन्दी गौरव" पत्रिका की सम्पादन समिति में
संप्रति - सिडनी यूनिवर्सिटी में अध्यापन
अभिरुचि- साहित्य लेखन, अध्ययन,चित्रकला एवं देश-विदेश की यात्रा
करना।
सम्पर्क - bhawnak2002@yahoo.co.in

धारावाहिक पंजाबी उपन्यास(किस्त- 31)



सवारी

हरजीत अटवाल
हिंदी अनुवाद : सुभाष नीरव
(चित्र : अर्पणा कौर)

॥ छत्तीस ॥
तड़के आँख खुलते ही बलदेव को अहसास हो गया था कि एलीसन उसके संग ही लेटी थी। मैरी के शरीर से एलीसन की भिन्नता कुछ पल के लिए महसूस हुई, फिर उसे लगा जैसे बस वह इसी जिस्म को ही जानता हो। उसने एलीसन के चेहरे पर से बाल एक तरफ किए। एलीसन बहुत सुन्दर दिख रही थी। शौन की बात सच थी कि उसकी बहन सूरत और सीरत दोनों पक्ष से खूबसूरत थी। उसने एलीसन को जगाया। वह मानो गहरे आनन्द में हो। फिर वह बातें करने लगी। वैलज़ी की, माँ, भाई और बहन की। बलदेव सबको जानता ही था। एलीसन अपने गाँव के बारे में बहुत कुछ तो भूल ही चुकी थी। सालों के साल गुजर गए थे उसे गाँव से आए हुए। वह बलदेव को वहाँ के बारे में सवाल पर सवाल पूछती जा रही थी। फिर वह अपने बचपन के विषय में बताने लगी। घर से भागने की कहानी उसने अपने हिसाब से सुनाई। वह सारा दोष अपनी माँ या शौन पर मढ़ रही थी। उसे अपना गाँव, अपना घर और आसपास का वातावरण बहुत याद आते थे। फॉर्म वाला केस जो वे हारे थे, उसका एलीसन को भी बहुत दुख था।
अचानक दरवाजा खुला। फेह और नील अन्दर आ घुसे। बलदेव ने पूछा-
''तूने दरवाजा अन्दर से बन्द नहीं किया था ?''
''नहीं, बच्चों के कारण। ये कभी भी जाग जाते हैं, बाथरूम जाना होता है या कई बार सपना आने पर उठ खड़े होते हैं।''
एलीसन ने बच्चों की तरफ देखा और फिर बलदेव की ओर और हँसने लगी। उसकी हँसी में ताज़गी थी मानो पहली बार हँसी हो। उसके बोलने के लहज़े में लंदन का स्पर्श था। नील पूछने लगा-
''डेव, तू और मम सैक्स करते थे ?''
बलदेव एकदम शर्मिन्दा हो गया। एलीसन ने हँसते हुए मुँह कम्बल के अन्दर दे लिया। फेह चुप खड़ी मुस्कराए जा रही थी। बलदेव को फेह की आँखों में से अनैबल और शूगर झांकती प्रतीत हुईं। उसका मन उतावला पड़ने लगा। उसने फेह और नील से कहा-
''चलो, तुम टेली देखो, तुम्हारी मम्मी अभी आती है।''
बच्चे चले गए। बलदेव उठकर कपडे पहनने लगा।
एलीसन बोली-
''अभी तो बहुत समय पड़ा है, पड़ा रहता।''
''एलीसन, मुझे ज़रा जल्दी जाना है।''
''ठीक है, चल मैं चाय बना देती हूँ।'' कहती हुई वह भी उठ खड़ी हुई।
चाय खत्म करके बलदेव उठकर चल पड़ा। एलीसन ने रोक कर घर की एक चाबी देते हुए कहा-
''डेव, फिक्र करना छोड़ दे, यहाँ मजे से रह, जब तक दिल करे, तनाव मुक्त हो।''
''एलीसन, मैं तनाव मुक्त ही ज्यादा रहता हूँ, बल्कि मेरी यही समस्या है कि मैं किसी बात को गंभीरता से नहीं लेता।''
''फिर, अब किधर भाग चला है ?''
''मुझे कोई बात याद आ गई।''
''शाम को आएगा ?''
''हाँ, एलीसन अब कुछ दिन तेरे पास रहूँगा।''
''कुछ दिन ही ?''
जवाब में बलदेव हँसा और बाहर निकल गया। कार में बैठते हुए उसने पीछे मुड़कर देखा। फेह और नील उसे हाथ हिला रहे थे। उससे उनकी तरफ देखा नही गया। पता नहीं कितनी बार अनैबल और शूगर ऐसे ही सिमरन के कमरे में जाती होंगी। उसने तो कभी अपनी बेटियाँ देखने तक की कोशिश नहीं की थी। अब तक तो उन्हें याद भी नहीं रहा होगा कि उनका वह डैडी भी था कि नहीं। शायद किसी अन्य को डैडी कहने लग पड़ी हों। फिर वह अपने दिल को तसल्ली देने लगा कि सिमरन ऐसी नहीं थी। उसने घड़ी देखी। अभी सात ही बजे थे। उसका दफ्तर तो नौ बजे खुलना था। उसके मन में आया कि क्यों न एक नज़र दोनों लड़कियों को देख ही आए। फिर उसी वक्त उसे ख़याल आया कि वह इतना कमज़ोर नहीं। उसे अपनी मजबूती संभालकर रखनी चाहिए।
क्लैपहम के साथ ही वाटरलू था। मुश्किल से पन्द्रह मिनट की ड्राइव पर। ट्रफिक भी नहीं था। वह दफ्तर के आगे पहुँच गया। वहाँ कुछ भी नहीं था। अभी बहुत समय था। उसके मन में विचार आया कि क्यों न सिमरन से मिलकर बेटियों से मिलने के विषय में सोचे। यदि उनसे मिलेगा तो जान-पहचान बनी रहेगी। सिमरन से मिलने में कोई नुकसान नहीं था। उससे तो अब उसका कोई वास्ता नहीं था। कोई तेर-मेर नहीं रही थी। वह जो चाहे करती घूमे और बलदेव जहाँ चाहे जाता रहे। उसने कार आगे बढ़ाई और वॉलफोर्ड की ओर चल दिया। टॉवर ब्रिज पार करके सिटी एअरपोर्ट के साइन पकड़े। ब्लैकवैल टनल दायीं ओर रह गया। अब ट्रैफिक कुछ बढ़ना शुरू हो गया था।
सिमरन का स्वभाव था- सीधी बात करने का, बगैर किसी फ़रेब के। ली हारवे के संग संबंधों के विषय में भी वह संक्षिप्त-सा उत्तर देकर पीछा छुड़ाने लगती थी। शायद बात वैसी हो ही न जैसा कि बलदेव सोचे बैठा था। वह अब अपने काम पर भी देखा ही करता था कि स्त्रियाँ दूसरे पुरुषों के साथ कितनी छूट ले लिया करती थीं जब कि उनका कोई खास मतलब नहीं होता था। यदि किसी के संग टेबल अथवा ड्यूटी की निकटता हो, फिर तो अधिकांश समय इकट्ठे ही बीतता है। वह स्वयं भी पैम के साथ कितनी-कितनी देर बैठा बातें करता रहता था। लेकिन उसका कोई अर्थ नहीं निकलता था। ऐसी बातें सोचते हुए उसका दिल ज़ोर से धड़कने लग पड़ा। उसने घड़ी देखी। साढ़े आठ बजे थे। वह अंदाजा लगा रहा था कि सिमरन घर से निकल चुकी होगी। उसने अख़बार खरीदी और कार में बैठकर पढ़ते हुए सिमरन की प्रतीक्षा करने लगा। अख़बार में उसका ध्यान नहीं था। वह रह-रहकर बैंक के कार पॉर्क की तरफ़ देखता कि सिमरन अभी आई कि आई। एक बार कार पॉर्क का चक्कर भी लगा आया और फिर स्वयं ही अपने उतावलेपन पर हँसने लगा। उसने सोचा कि शायद सिमरन ने कार बदल ली हो। सिमरन को कारों से बेहद प्यार था। बलदेव के जन्म दिन पर उसने उसे यह वाली कार लेकर दी थी। याद आते ही बलदेव ने स्टेयरिंग पर हौले-हौले हाथ फेरना शुरू कर दिया।
वह इंतज़ार करता रहा। सिमरन कहीं भी आती हुई दिखाई न दी। शायद वह मिस कर गया हो। बहुत मुश्किल से साढ़े नौ बजे। बैंक खुला। ग्राहकों की लम्बी कतार थी। काउंटर के पीछे सिमरन उपस्थित नहीं थी। उसने इन्कुआरी पर जाकर घंटी बजाई। एक अधेड़ उम्र का व्यक्ति आया जिसके बैज पर लिखा हुआ था- याकूब सुमरो। बलदेव ने पूछा-
''कैन आई सी मिस बैन्ज़ ?''
''हैलो जी, आप मि. बैंस हैं ?''
याकूब सुमरो ने पंजाबी में बात की। बलदेव बोला-
''हाँ, आप सिमरन को बुला सकते हैं ?''
''आओ जी, बताओ क्या पियोगे ? चाय या ठंडा ?''
''शुक्रिया, अगर आप उसे बुला दें तो...''
''वो तो जी छुट्टियों पर गई हुई है, कनेरी आयलैंड, ली हारवे के साथ।''
बलदेव पर जैसे बिजली गिर पड़ी। वह संभलता हुआ बोला-
''कब वापस आ रही है, कुछ पता ?''
''एक मिनट जी, पूछ कर बताता हूँ।''
उसने वहीं खड़े होकर काउंटर पर बैठी गोरी से पूछा-
''बारबरा, सिम और ली छुट्टियों से कब वापस आ रहे हैं ?''
''अगले सोमवार।''
बारबरा ने याकूब की तरफ तिरछा-सा देखते हुए कहा।
याकूब व्यंग्य में मुस्कराते हुए बलदेव से बोला-
''जी नेक्सट मंडे, क्या हाल है आपका ? आप कभी आया करो टाइम निकाल कर।''
(जारी…)

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रविवार, 10 अक्टूबर 2010

गवाक्ष – अक्तूबर 2010


“गवाक्ष” ब्लॉग के माध्यम से हम हिन्दी ब्लॉग-प्रेमियों को हिन्दी/पंजाबी के उन प्रवासी लेखकों/कवियों की समकालीन रचनाओं से रू-ब-रू करवाने का प्रयास करते आ रहे हैं जो अपने वतन हिन्दुस्तान से कोसों दूर बैठकर अपने समय और समाज के यथार्थ को अपनी रचनाओं में रेखांकित कर रहे हैं। “गवाक्ष” में अब तक विशाल (इटली), दिव्या माथुर (लंदन), अनिल जनविजय (मास्को), देवी नागरानी(यू.एस.ए.), तेजेन्द्र शर्मा(लंदन), रचना श्रीवास्तव(लंदन), पूर्णिमा वर्मन(दुबई), इला प्रसाद(यू एस ए), भगत धवन (डेनमार्क), चाँद शुक्ला (डेनमार्क), वेद प्रकाश ‘वटुक’(यू एस ए), रेखा मैत्र (यू एस ए), तनदीप तमन्ना (कनाडा), प्राण शर्मा (यू के), सुखिन्दर (कनाडा), सुरजीत(कनाडा), डॉ सुधा धींगरा(अमेरिका), मिन्नी ग्रेवाल(कनाडा), बलविंदर चहल (न्यूजीलैंड), बलबीर कौर संघेड़ा(कनाडा), शैल अग्रवाल (इंग्लैंड), श्रद्धा जैन (सिंगापुर), डा. सुखपाल(कनाडा), प्रेम मान(यू.एस.ए.), (स्व.) इकबाल अर्पण, सुश्री मीना चोपड़ा (कनाडा) आदि की रचनाएं और पंजाबी कथाकार-उपन्यासकार हरजीत अटवाल के उपन्यास “सवारी” के हिंदी अनुवाद की उन्तीसवीं किस्त आपने पढ़ीं। “गवाक्ष” के अक्तूबर 2010 अंक में प्रस्तुत हैं - डा. हरदीप कौर संधु(आस्ट्रेलिया) की कविताएं तथा हरजीत अटवाल के धारावाहिक पंजाबी उपन्यास “सवारी” की तीसवीं किस्त का हिंदी अनुवाद…
आस्ट्रेलिया से
डा. हरदीप कौर संधु की पाँच कविताएं

माँ मेरी ने चादर काढ़ी…

माँ मेरी ने
इक चादर काढ़ी
उस पर डालीं
फूल-पत्तियाँ
पलंग पर
जब बिछाऊँ चादर
माँ तुझको
तकती हैं अँखियाँ

फूल हैं चादर के
तेरा चेहरा माँ री
पत्तियाँ लगें तेरे पपोटे
बड़ी रीझ से चादर काढ़ी
दी बेटी को प्यार पिरोके

जब भी उठती हूक कलेजे
झट चादर पर जा बैठती
निहार-निहार कर फूल-पत्तियाँ
संग तेरे दो बातें कर लेती
खोल कर तुम भी बाहें अपनी
मुझे बुक्कल में हो भर लेती।
०

नन्हीं नन्हीं सी बातें

बचपन में
नन्हों की
नन्हीं नन्हीं सी बातें
टोकरी ले
छोटी सी छड़ी से
थोड़ा टेड़ा करते
छड़ी को
एक लम्बी रस्सी बाँधते
टोकरी के नीचे
रोटी का चूरा
मुट्ठी भर दाने
थोड़ा -सा पानी रखते
‌फिर किसी कोने में
चुपके से जा छुपते
शोर मत करना
साथियों को कहते
पक्षी उड़ते -उड़ते
देख कर रोटी
दाना..... पानी
बिन टोकरी देखे
जैसे ही करीब आते
अपनी समझ में
हम फुर्ती दिखाते
धीरे से...
रस्सी खींचते
टोकरी गिरते ही
पक्षी उड़ते....
चिड़िया फुर्र....र..र
कबूतर फुर्र....र..र
पक्षी फु्र्र कर जाते
हाथ मलते हम रह जाते
बिन साहस हारे
दोस्तों के सहारे
फिर टोकरी रखते
कभी- न- कभी
कोई- न- कोई
कबूतर - चिड़िया
पकड़ी जाती
पंखों को कर
हरा गुलाबी
छोड़ देते
खुले आकाश में
लगा कर अपने-अपने
नाम की परची
ये मेरी चिड़िया.....
वो तेरा कबूतर....
०


रब न मिला

पूजा के उपरान्त
अगरबत्ती की राख ही
हाथ आई थी मेरे

बहुत ढूँढा....बहुत ही ढूँढा
रब न मिला मुझे
एक दिन मन में
रब को मिलने की ठानी

खाना न मैं खाऊँगी
मैं भूखी ही मर जाऊँगी
जब तक रब को न पाऊँगी

तभी एक भिखारी ने
मेरे द्वार आ दस्तक दी
भूखा था वो शायद
माँग रहा था वो खाना
मैने कहा अभी नहीं
मैं तो रब को खोज रही हूँ
थोड़ी देर बाद तुम आना

फिर एक कुतिया ने
मेरे सामने आ ‘चऊँ –चऊँ’ करने लगी
भूखी होगी वो भी शायद
पर मैने उसे भी फटकारा

थोड़ी देर बाद...
एक बूढ़ी अम्मा आकर बोली
बेटी रास्ता भूल गई हूँ
और सुबह से भूखी भी हूँ
क्या थोड़ा खाने को दोगी
मैने कहा .....
जा.. री.. जा...
जा... री... अम्मा
रास्ता नाप तू अपना
मैं तो कर रही हूँ

इन्तज़ार अपने रब का

तभी आसमान में
गूँजी एक आवाज़
किस रब का
है तुझे इन्तज़ार
मैं तो आया
तीन बार तेरे द्वार
पर तूने मुझे
ठुकराया बार-बार
अगर रब को है तुमने पाना
छोड़ दे तू इधर-उधर भटकना

मैं तो हर कण में हूँ
और रहता तेरे पास ही हूँ
ज़रा अपने मन की
खोल तू आँखें
पाओगी मुझे
हर प्राणी में
०



आटे की चिड़िया

मुन्नी जब रोए
आटे की चिड़िया से
माँ पुचकारे
चिड़िया जब मिली
मुन्नी के चेहरे पर
मुस्कान खिली
आँखें हैं भरी
अभी भी लबा-लब
हँसी भी छूटी
कोमल लबों पर
पकड़ कर चिड़िया
बोली नन्ही गुड़िया-
'' माँ...ओ...माँ...
ये तैसी है...
चिरिया छोती सी
न उदती है...
न करती चीं-चीं...

खाकर नोती
और.....दाने
पीकर दुधू
और....पानी
बदी हो जाएगी
चिरिया नानी
बदी होतर
फुर्र...र हो जाएगी
फिर तिसी के
हाथ न आएगी
जब मैं बुलाऊँ
उदती आएदी

मीथे-मीथे...
गीत सुनाएगी
चीं-चीं कर....
मुझे जगाएगी
दादी की कहानी वाली
चिरिया बन जाएगी!!''
०

दस हाइकु

माँ और बेटी
दु:ख सुख टटोलें
टैलीफोन से ।
०
अँधेरी रात
देती सदा पहरा
बापू की खाँसी ।
०
कर्म से सजे
सबसे सुन्दर हैं
सर्जक हाथ
०
रक्षा का धागा
बहन ने भाई की
कलाई बाँधा।
०
कच्चा ये धागा
भाई-बहन बीच
प्रेम प्रतीक
०
ऊँचे मकान
रेशम के हैं पर्दे

उदास लोग
०
दादी का ख़त
कैसे वो पढ़ पाए
हिन्दी न आए
०
चाटी की लस्सी
गाँव जाकर माँगी
अम्मा हँसती

०
गए बटोही
वे देश अनजान
छोड़ निशान
०
प्रवासी ढूँढ़े घर
धीरे धीरे जड़ जमाए
रोपा गया जो पौधा
०

डा. हरदीप कौर संधु
जन्म: बरनाल़ा (पंजाब)
सम्प्रति निवास: सिडनी (आस्ट्रेलिया)
शिक्षा: बी.एससी., एम.एससी(बनस्पति विज्ञान), एम. फिल(प्लांट इकोलोजी), पी.एच-डी. (बनस्पति विज्ञान)
कार्य: अध्यापन
ई मेल :hindihaiku@gmail.com
हिंदी ब्लॉग : http://hindihaiku.wordpress.com/
पंजाबी ब्लॉग : http://punjabivehda.wordpress.com/