शनिवार, 19 मई 2012

गवाक्ष – मई 2012


जनवरी 2008 गवाक्ष ब्लॉग के माध्यम से हम हिन्दी ब्लॉग-प्रेमियों को विदेशों में रह रहे हिन्दी/पंजाबी के उन लेखकों/कवियों की समकालीन रचनाओं से रू--रू करवाने का प्रयास करते आ रहे हैं जो अपने वतन हिन्दुस्तान से कोसों दूर रहकर अपने समय और समाज के यथार्थ को अपनी रचनाओं में रेखांकित कर रहे हैं। गवाक्ष में अब तक विशाल (इटली), दिव्या माथुर (लंदन), अनिल जनविजय (मास्को), देवी नागरानी(यू.एस..), तेजेन्द्र शर्मा(लंदन), रचना श्रीवास्तव(लंदन), पूर्णिमा वर्मन(दुबई), इला प्रसाद(यू एस ए), भगत धवन (डेनमार्क), चाँद शुक्ला (डेनमार्क), वेद प्रकाश वटुक’(यू एस ए), रेखा मैत्र (यू एस ए), तनदीप तमन्ना (कनाडा), प्राण शर्मा (यू के), सुखिन्दर (कनाडा), सुरजीत(कनाडा), डॉ सुधा धींगरा(अमेरिका), मिन्नी ग्रेवाल(कनाडा), बलविंदर चहल (न्यूजीलैंड), बलबीर कौर संघेड़ा(कनाडा), शैल अग्रवाल (इंग्लैंड), श्रद्धा जैन (सिंगापुर), डा. सुखपाल(कनाडा), प्रेम मान(यू.एस..), (स्व.) इकबाल अर्पण, सुश्री मीना चोपड़ा (कनाडा), डा. हरदीप कौर संधु(आस्ट्रेलिया), डा. भावना कुँअर(आस्ट्रेलिया), अनुपमा पाठक (स्वीडन), शिवचरण जग्गी कुस्सा(लंदन), जसबीर माहल(कनाडा), मंजु मिश्रा (अमेरिका), सुखिंदर (कनाडा), देविंदर कौर (यू के), नीरू असीम(कैनेडा), इला प्रसाद और डा. अनिल प्रभा कुमार आदि की रचनाएं और पंजाबी कथाकार-उपन्यासकार हरजीत अटवाल के उपन्यास सवारी के हिंदी अनुवाद की छिआलीसवीं किस्त आपने पढ़ीं। गवाक्ष के मई 2012 अंक में प्रस्तुत हैं टोरोंटो,कैनेडा से डॉ. शैलजा सक्सेना की चार कविताएँ तथा हरजीत अटवाल के धारावाहिक पंजाबी उपन्यास सवारी की सैंतालीसवीं किस्त का हिंदी अनुवाद

टोरोंटो,कैनेडा से
डॉ. शैलजा सक्सेना की चार कविताएँ


जाने वाले

जाने वाले
तू गया तो ठीक,
पर क्यों छोड़ गया चौराहे मेरे लिये?

जब मैं
चौराहों से राहों का पता पूछती हूँ
तो चौराहे हँसते हैं बेशर्मी से,
और बेमतलब
अपने से आ मिलने वाली
गलियों से मेरी बेवकूफी की चुगली करते हैं।

जाने वाले
तू गया तो ठीक
पर आँखों में क्यों इतना पानी छोड़ गया
कि मैं उसमें डूबने-डूबने को हो जाती हूँ
और जब तेरी यादों से
तिनके का सहारा माँगती हूँ तो
वे तेरी बेवफाई के किस्से छेड़
और भी डुबोने लगती हैं मुझे।

जाने वाले
तू गया तो ठीक
पर तेरी याद क्यों दिये-सी जल जाती है
जब जोड़ती हूँ मैं हाथ
ईश्वर के सामने
तेरे दिये घाव रिसने लगते हैं
शिवलिंग पर चढ़्ते हुए जल से
और मैं रखती जाती हूँ व्रत
यह सोच कर
कि मेरे व्रत सुधार देंगे तुझे
कि तेरे पाँव मुडेंगे सुथरे हो कर
घर की देहरी को…

आ जा देख,
मेरे मन का ज्वार चढ़ने को है
इससे पहले कि मेरे प्यार में कोई भाटा आये,
आ के मेरी आँखों की मछलियों को पकड़,
चौराहों के कान उमेठ कर
कह दे कि ऐसे मुझे न सताये
कह दे पानी से कि किनारे से ऊपर न उमड़े
रोक दे चाँद को घटने-बढ़्ने से
तेरे जैसा ही हर रोज़ बदलता है वह अपनी बातें
और मेरे प्यार का पानी
संग-संग जैसे चढ़ता- उतरता है।

जाने वाले
तू गया तो ठीक
पर रात की चादर सिमटने को है
सूरज के जलने से पहले,
चाँद की राख बिखरने से पहले
आ जा
और बंद गली की तरह
अब मेरी ज़िंदगी के पते पर
अपना नाम लिखा जा।



युद्ध

खबरों में बराबर जारी है युद्ध
यहाँ गिरे बम,
वहाँ चलीं बँदूकें,
इतने हुए घायल,
कितने ही चल बसे
अखबारों के पन्नों में रहते हैं
रोते हुए बच्चे
सिर पटकतीं औरतें,
बहस करते राजनेता,
प्रदर्शन करते मानवतावादी,
सब को धौंसियाते बमधारी,
दुनिया डरी-सहमी कुछ देर,
घबरायी-चिल्लायी कुछ देर,
बहुत बुरा हुआ…
कह मातम में रही कुछ देर
फिर फ़िक्रों में रोटी-पानी की
सहज हो आई
बीच में पसरा था युद्ध जो
हाशिए पर जा बसा,
पढ़ लिया, हो गया
खबरों में अब भी
बराबर जारी है युद्ध।


मौन संबंध

अकेलापन आया
और बैठ गया पसर के
मेरे और तुम्हारे बीच
डाइनिंग टेबल पर
कभी तुम्हारे बाल बिखेरता,
कभी मुझ पर आँख तरेरता,
अकेलापन करता रहा
छेडछाड दोनों से
और हम बैठे रहे
संवादहीनता के बीच....
कभी सोचा था क्या हमने
कि संबंध ऐसे मौन हो जायेंगे।
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अम्माँ

सुबह से शुरु हो जाती है अम्माँ की बुड-बुड…
महरी साफ नहीं करती बर्तन
बस फैलाती है पानी,
पानी, जिसकी बूँद-बूँद अनमोल है,
बाबा भरते हैं रोज़ सुबह चार बजे,
घर के उठने से पहले…
महरी नहीं समझती, न समझता है कोई और,
जूठन लगे बर्तन पर, कोई और नहीं बरसता
बस बरसती है अम्माँ।

सुबह से शुरु हो जाती है अम्माँ की बुड-बुड…
झाडू वाली झाडती नहीं धूल, केवल झाडती है वक्त
दो-चार कागज़, मोटा-मोटा कूडा निकालती है
छोड जाती है ढेरों धूल,
जो किसकिसाती है पैरों में, पैरों से बिस्तर तक
और किसकिसाती हैं अम्मा की ज़ुबान,
अम्मा का दिल, अम्मा की आँखें
सोने सी चमकती गॄहस्थी को
अब यूँ किसकिसाते हुए देख कर…
अब कोई काम नहीं करता, सिर्फ काम का नाटक करता है।
बाबा की जी किसकिसाता है अखबार पढ कर,
समाचार सुन कर टी.वी. पर।
बहू-बच्चों का जी नहीं किसकिसाता
वे जानते हैं
अब वह ज़माना नहीं
ज़माना बदल गया है और वे भी इसी ज़माने के हिस्से हैं
पर क्या करें? बदलते नहीं बाबू जी,
बदलती नहीं अम्माँ
किसकिसाता रहता है उनका जी
और सुबह से शुरू हो जाती है उनकी बुड-बुड,
काम नहीं, काम करने के इस नाटक पर।
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डॉ. शैलजा सक्सेना
जन्म : मथुरा (उ.प्र.)
शिक्षा : एम.ए., पी. एच.डी.
टोरोंटो में मानव संसाधन प्रबंधक के पद पर कार्यरत।
प्रकाशन : सारिका, पाँचजन्य, समाज कल्याण, तुलसी, वामा आदि अनेक पत्रिकाओं में कहानी, कविताएँ तथा लेखों का प्रकाशन। "अष्ठाक्षर" नाम के संग्रह में अन्य सात कवियों के साथ आठ कविताओं का संकलन। विश्विद्यालय की कई पत्रिकाओं में लेख तथा संपादन कार्य। एक कविता संकलन, कहानी संग्रह शीघ्र ही प्रकाश्य।
पुरस्कार : सरस्वती पुरस्कार तथा मैथिलीशरण गुप्त पुरस्कार
विशेष : अमेरिका में "हिन्दी, भारतीय इतिहास, संस्कृति, धर्म तथा भाषा" पर कार्यशाला का संचालन किया तथा हिन्दी और भारतीय संस्कृति के अनेक कार्यों में भाग लिया।  "हिन्दी साहित्य सभा, कनाडा" की भूतपूर्व उपाध्यक्ष।
"साहित्य कुंज" में साहित्यिक परामर्श सहयोग।
"हिन्दी राइटर्स गिल्ड" की संस्थापक निदेश।
सम्पर्क : shailjasaksena@hotmail.com

धारावाहिक पंजाबी उपन्यास(किस्त- 47)










सवारी
हरजीत अटवाल
हिंदी अनुवाद : सुभाष नीरव


॥ बावन ॥

बलदेव और डौमनिक की दोस्ती दिनोंदिन पक्की हो रही थी। लिज़ को मिलने आया डौमनिक बलदेव के पास अधिक समय गुज़ारता। एक दिन डौमनिक कहने लगा-
      ''डेव, बोट शो लगा हुआ है, अर्ल्ज क़ोर्ट। देखने चलेगा ?''
      ''क्यों नहीं ?''
      ''किस दिन की टिकटें लूँ ?''
      ''मेरे पास तो टाइम ही टाइम है, अपना देख।'' बलदेव ने कहा।
      वह अर्ल्ज़ कोर्ट की ओर से कितनी बार गुज़रता और वहाँ खड़ी रंग-बिरंगी किश्तियाँ देखने में बहुत सुन्दर लगतीं। किश्तियों में हालांकि उसने ज्यादा सफ़र नहीं किया था, पर उसको पसन्द बहुत थीं। जब भी थेम्ज़ की ओर जाता तो वहाँ से गुज़रती छोटी-बड़ी किश्तियों को बहुत ध्यान से देखा करता।
      अगले सोमवार डौमनिक टिकटें लेकर आ गया। वह इस बोट शौ पर हर साल जाया करता था। किश्तियाँ उसकी हॉबी का ख़ास हिस्सा थीं। बोट मैग़जीन वह निरंतर पढ़ा करता। वे सवेरे जल्दी ही अर्ल्ज क़ोर्ट पहुँच गए। यह बहुत बड़ा हॉल था जिसमें आई बोटो की विस्तृत जानकारी एक किताबचे के रूप में गेट पर ही मिल जाती थी। उन्होंने ये बोट एक तरफ़ से देखनी प्रारंभ कीं। इनकी कीमत कुछ हज़ार से लेकर लाखों पाउंड तक जाती थी। सारा शौ देखने में तो एक दिन ना-काफ़ी था इसलिए वे ज्यादा दिलचस्पी वाली बोट ही देख रहे थे। समुद्री किश्तियाँ, दरियाई किश्तियाँ, नहरी किश्तियाँ सब अलग अलग थीं। बोट हाउस भी थे। डौमनिक एक बोट को बहुत ध्यान से देखने लगा। वह इस बोट में चढ़कर इसका निरीक्षण करते हुए बोला-
      ''यह एकदम मॉडर्न बोट है, लेटस्ट।''
      ''पसन्द है ?''
      ''हाँ, बहुत पसन्द। मेरे परिवार के लिए आयडियल।''
      ''खरीदने का तो मन नहीं ?''
      ''खरीदने को तो खरीद लूँ, बहुत वाजिब मूल्य है। सस्ता लोन भी दे रहे हैं, इंश्योरेंस भी मुफ्त।''
      ''फिर देर कैसी, खरीद ले।''
      डौमनिक जवाब देने की बजाय उदास हो गया। बलदेव ने कहा-
      ''क्या बात है ? सब ठीक है ?''
      ''नहीं, मेरे से ज्यादा यह पौलीन की पसंदीदा बोट है, पर उसके साथ मेरी अनबन है, नहीं तो मैं ज़रूर खरीद लेता। बच्चों को छुट्टियों पर लेकर जाने के लिए यह बहुत बढ़िया रहती।''
      ''कितने बच्चे हैं तेरे ?''
      ''तीन बेटे, बड़ा पंद्रह वर्ष का है। साउथएंड ही रहते हैं सब। वहाँ मेरा घर है।''
      ''डौमनिक, तू तो बहुत जवान दिखाई देता है। कोई कह ही नहीं सकता कि इतने बड़े तेरे बच्चे हो सकते हैं।''
      ''शुक्रिया।''
      ''जवान दिखाई देने के कारण ही लिज तेरे पर मरती है।''
      ''लिज किसी पर नहीं मरती। अगर उसने मरना होता तो तेरे पर ही मर गई होती। तेरी खूब तारीफ़ें करती रहती है।''
      ''तुझे खिझाने के लिए करती होगी।''
      ''नहीं, ऐसे नहीं। वह सच ही तेरी बहुत बातें किया करती है।''
      ''मेरी कौन-सी तारीफ़ करती थी ?''
      ''तेरी जल्दबाजी की।''
      कहकर डौमनिक हँसने लगा और बलदेव भी। डौमनिक बोट में से उतरता हुआ कहने लगा-
      ''अगर पौलीन मान जाए तो यह बोट उसको तोहफ़े के तौर पर दूँ।''
      ''ज्यादा ही रूठी हुई है ?''
      ''हाँ डेव, उसने दूसरा आदमी रख लिया है। मेरे घर में ही रहता है। अब तो उससे वह गर्भवती भी है। मैं बहुत परेशान रहता हूँ उसे लेकर।''
      उसकी बात सुनकर बलदेव भी उदास हो गया। डौमनिक फिर बोला-
      ''डेव, इसमें कुछ कसूर मेरा भी है। मैं लंदन में ही रहने लगा था, लिज जैसी लड़कियाँ बहुत हैं और पौलीन को भी मौका मिल गया।''
      इसके बाद वे अधिक देर बोट-शौ में न रुक सके और वापस आ गए।
      डौमनिक 'माइल एंड' में रहता था, पूर्वी लंदन में। वहाँ उसका काम बहुत करीब था। बलदेव ट्यूब पकड़कर उसके पास पहुँच जाता। बलदेव के पास कोई ख़ास दोस्त नहीं था। इसलिए भी उसको डौमनिक के घर जाना अच्छा लगता। वह उसके मित्रों में भी विचरने लगा था। इनमें से क्लाइव और ईअन के साथ उसकी अच्छी छनने लग पड़ी थी। क्लाइव वाल-स्ट्रीट में काम करता था और ईअन पार्लियामेंट में किसी मिनिस्टर का सलाहकार था। वह भी अदृश्य हाथों के विषय में बहुत बातें करने लगता था।
      लिज़ और डौमनिक के बीच एक फ़ासला पड़ चुका था। लिज़ ने अपने साथ कैलविन नाम के लड़के को रूममेट रख लिया था। कैलविन देखने में लिज़ से बहुत छोटा लगता था। डौमनिक आता और घर में कैलविन भी होता तो वे सब एकसाथ बैठकर बियर या व्हिस्की आदि पीते। कैलविन थोड़ा दूर हटता तो वे लिज़ से पूछने लगते-
      ''लिज़, ये किसका बच्चा पालने में से उठा लाई है।''
      यदि लिज़ अकेली घर में होती तो दोनों मिलकर लिज़ को उठाए फिरते और तरह-तरह से तंग करते। लिज़ खीझती हुई कहती-
      ''मैंने तुम दोनों की दोस्ती करवाकर बहुत बड़ी गलती की है। तुम्हारा मेरे साथ बर्ताव बहुत शर्मनाक है।''
      फिर लिज़ रूठ जाती और वे उसे मनाने लगते।
      एक दिन डौमनिक का फोन आया।
      ''डेव, बुधवार को क्या कर रहा है ?''
      ''कुछ ख़ास नहीं, क्यों ?''
      ''क्लाइव एक ख़ास प्रोग्राम बनाए घूमता है, सात बजे मेरे पास पहुँच जाना।''
      बलदेव समय से डौमनिक के घर पहुँच गया। क्लाइव और ईअन पहले ही पहुँचे हुए थे। वे बियर पी रहे थे। क्लाइव ने बलदेव को बियर की बोतल देकर पूछा -
      ''डेव, क्या यह सच है कि हिंदू धर्म में सैक्स का भी देवता होता है।''
      ''कलाइव, सच्चाई यह है कि मुझे नहीं पता। शायद होता हो, मुझे धर्मों के बारे में अधिक जानकारी नहीं।''
      ''मैंने एक किताब में पढ़ा है कि यदि शिवलिंग की पूजा करो तो सैक्स करने की शक्ति बढ़ती है।''
      ''मुझे यह पता है कि शिवलिंग की पूजा होती है। इसको लेकर कई मिथ हैं। एक मिथ तो यह भी है कि कुआँरी लड़कियाँ पहला संभोग शिवलिंग से ही करती है। अर्थ यह कि उसका कुआँरापन इस देवता की सम्पत्ति है।''
      ''हाँ, यह भी पढ़ा है मैंने।''
      ''पर आज यह सवाल क्यों कर रहे हो ?''
      बलदेव ने पूछा। ईअन उठता हुआ बोला-
      ''आओ चलते हैं, बाकी बातें राह में करेंगे।''
      वे सब ईअन की मर्सिडीज़ में जा बैठे। ईअन ने कार रम्मफोर्ड रोड पर चढ़ा ली। आगे पहुँचकर नॉर्थ सरकुलर रोड पर जा चढ़ा और फिर एम इलेविन पकड़ ली। करीब दो मील आगे जाकर एक स्लिप रोड पर उतर गए और सुनसान रोड पर चलने लगे। बलदेव कहने लगा-
      ''किसी ख़ास आप्रेशन पर जा रहे लगते हो ?''
      ''देखता चल, देखते है कि तूने शिवलिंग की कितनी पूजा की है।''
      आगे नज़दीक ही एक फॉर्म हाउस आ गया। कितनी ही कारें वहाँ खड़ी थीं। एक तरफ बड़ा हॉल था। बहुत सारे लोग इधर-उधर बियर के बड़े-बड़े गैलन लिए फिरते थे। ईअन ने टिकट दिखाए और वे अन्दर चले गए। क्लाइव काउंटर पर जाकर एक गैलन बियर और चार गिलास ले आया। यहाँ बियर गिलासों में नही मिलती थी। बियर चार गिलासों से कहीं अधिक थी। उनके और भी कई परिचित आ गए। सभी आकर बलदेव से हाथ मिलाने लगे। कई उसके रंग को देखकर मुँह अजीब-सा बनाते, फिर ठीक हो जाते। बियर बार वाले हॉल में कोई कुर्सी नहीं थी, सिर्फ़ मेज ही थे। साथ ही, एक दूसरा हॉल था जिसमें कई कुर्सियाँ लगी हुई थीं और सामने दीवार के साथ स्टेज बनी हुई थी। बलदेव समझ गया कि नृत्य वगैरह का कार्यक्रम होगा।
      दस बजे तक वे सभी शराबी थे। घंटी बजी तो सब बियर के भरे गैलन लिए हॉल में चले गए। लगभग दो सौ कुर्सियाँ होंगी। सब भर गई थीं। सारा हॉल ही नशे में था। पहले एक हंसोड़ मंच पर आया और लतीफ़े सुनाने लगा। उसके लतीफ़े धीरे धीरे गन्दे होने लगे। लोग हँसते हुए दोहरे हुए जाते। हंसोड़ ने दर्शकों के साथ ऐसा सुर मिलाया कि उसका मुँह खुलते ही लोग हँस पड़ते। वह गंजे व्यक्ति के बारे में लतीफ़ा सुनाता तो दर्शकों में बैठे गंजे व्यक्ति की ओर इशारा करता। मोटे व्यक्ति के बारे में सुनाता तो कोई मोटा ढूँढ़ लेता। पाकिस्तानियों के बारे में सुनाते हुए उसने बलदेव को धर लिया। एक काला लड़का भी था जो कि बार का कर्मचारी था। ऐसे ही आयरिशों और गोरों को लेकर भी गंदे-गंदे लतीफ़े उसने सुनाए। दर्शकों में कोई औरत नहीं थी। यह पार्टी सिर्फ़ मर्दों के लिए थी।
      घंटाभर लतीफ़ेबाजी चलती रही। एक छोटी-सी ब्रेक के बाद नृत्य शुरू हो गया। स्ट्रिपटीज़ डांस की तरह ही था। वही एक-एक करके वस्त्र उतारना, काम उकसाऊ मुद्राएँ। पहले दो लड़कियाँ मंच पर आईं - एक गोरी और एक काली। वे दर्शकों की आँखों में आँखें डालकर नृत्य कर रही थीं। फिर उनमें दो और लड़कियाँ आ मिलीं। वे वस्त्र उतारकर ही मंच पर चढ़ी थीं। कुछ देर बाद वे दर्शकों को आमंत्रित करने लगीं। ईअन उछल कर मंच पर जा चढ़ा और कमीज़ उतारता हुआ उनके संग नाचने लगा। ईअन के पीछे-पीछे क्लाइव स्टेज पर चला गया। मंच पर ही काम क्रीड़ा चलने लगी। पहले अधिक उतावले हो गए। फिर जो सुस्त थे, जब वे भी भुगत चुके तो लड़कियाँ पुरुषों को खींच-खींचकर मंच पर ले जाने लगीं। डौमनिक भी शर्माता-लजाता हाज़िरी लगवाने चला गया। वह चोर आँख से बलदेव की ओर भी देख लेता। एक लड़की उतर कर बलदेव की तरफ आई और उसको बांह से पकड़कर खींचने लगी। बलदेव मना करने लगा। ईअन और क्लाइव ने लड़की की मदद की और उसको जबरन मंच पर ले गए।
(जारी…)
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लेखक संपर्क :
67, हिल साइड रोड,
साउथाल, मिडिलसेक्स, इंग्लैंड
दूरभाष : 020-85780393,07782-265726(मोबाइल)

रविवार, 8 अप्रैल 2012

गवाक्ष – अप्रैल 2012



जनवरी 2008 “गवाक्ष” ब्लॉग के माध्यम से हम हिन्दी ब्लॉग-प्रेमियों को विदेशों में रह रहे हिन्दी/पंजाबी के उन लेखकों/कवियों की समकालीन रचनाओं से रू-ब-रू करवाने का प्रयास करते आ रहे हैं जो अपने वतन हिन्दुस्तान से कोसों दूर रहकर अपने समय और समाज के यथार्थ को अपनी रचनाओं में रेखांकित कर रहे हैं। “गवाक्ष” में अब तक विशाल (इटली), दिव्या माथुर (लंदन), अनिल जनविजय (मास्को), देवी नागरानी(यू.एस.ए.), तेजेन्द्र शर्मा(लंदन), रचना श्रीवास्तव(लंदन), पूर्णिमा वर्मन(दुबई), इला प्रसाद(यू एस ए), भगत धवन (डेनमार्क), चाँद शुक्ला (डेनमार्क), वेद प्रकाश ‘वटुक’(यू एस ए), रेखा मैत्र (यू एस ए), तनदीप तमन्ना (कनाडा), प्राण शर्मा (यू के), सुखिन्दर (कनाडा), सुरजीत(कनाडा), डॉ सुधा धींगरा(अमेरिका), मिन्नी ग्रेवाल(कनाडा), बलविंदर चहल (न्यूजीलैंड), बलबीर कौर संघेड़ा(कनाडा), शैल अग्रवाल (इंग्लैंड), श्रद्धा जैन (सिंगापुर), डा. सुखपाल(कनाडा), प्रेम मान(यू.एस.ए.), (स्व.) इकबाल अर्पण, सुश्री मीना चोपड़ा (कनाडा), डा. हरदीप कौर संधु(आस्ट्रेलिया), डा. भावना कुँअर(आस्ट्रेलिया), अनुपमा पाठक (स्वीडन), शिवचरण जग्गी कुस्सा(लंदन), जसबीर माहल(कनाडा), मंजु मिश्रा (अमेरिका), सुखिंदर (कनाडा), देविंदर कौर (यू के), नीरू असीम(कैनेडा) और इला प्रसाद आदि की रचनाएं और पंजाबी कथाकार-उपन्यासकार हरजीत अटवाल के उपन्यास “सवारी” के हिंदी अनुवाद की पैंतालीसवीं किस्त आपने पढ़ीं। “गवाक्ष” के अप्रैल 2012 अंक में प्रस्तुत हैं – वाने, अमेरिका में रह रहीं हिंदी एक प्रमुख कवयित्री डा. अनिल प्रभा कुमार की तीन कविताएँ तथा हरजीत अटवाल के धारावाहिक पंजाबी उपन्यास “सवारी” की इक्यावनवीं किस्त का हिंदी अनुवाद…



वाने, अमेरिका से
डा. अनिल प्रभा कुमार की तीन कविताएं

१. भूत
दादी कहती थी
कुंआरी लड़कियां
बालों मे फूल नहीं लगातीं
संवर कर शाम को
पेड़ों के पास से नहीं गुज़रतीं
चुस्त, बदन उघाड़े
कपड़े नहीं पहनतीं।
क्यों,
मैने प्रतिवाद किया था।
भूत पीछे पड़ जाते हैं,
उसका बस यही जवाब था।
मुझसे सड़ी- गली बातें
मत करो
मैने पांव पटक कर कहा था।

अब अख़बारों में
उन्हीं भूतों की
ख़बरें भरी हैं
जिनका उघड़े या
घूंघट में ढके
तन से कोई मतलब नहीं
जिनके शिकार का नाम
बस औरत होना चाहिए।
वह शहर की हो या गांव की,
विदुषी या अनपढ़,
बच्ची या बूढ़ी,
किसी भी जाति या देश की
हो युद्ध या शान्ति,
घर या बाहर,
बस हो औरत।

अब तो हर जगह,
भूत ही भूत हैं।
शायद हमें ही ओझा बनना होगा
महाकाली बन
स्वयं ही
महिषासुर को
बधना होगा
क्योंकि रक्षा को
अब
कोई शिव नहीं आएंगे।


२. तुच्छता
कितना आसान था
मुझे छोटा करना
बस मेरे पास खड़े
आदमी का
क़द बढ़ा दिया।


३. अष्टभुजा
वह अष्टभुजा है
एक से संभालती है
दफ़्तर की कमान
दूसरे से गॄहस्थी की
रासें थामती है
पति के कंधे से कंधा मिला
अर्थ- भार बांटती है वह
बच्चों की बांह थाम
उन्हें ज़िन्दगी में
चढ़ना, सम्भलना
सिखाती है वह
गिरने पर सहारा दे
उठाती है वह
रिश्तों की ज़िम्मेदारियां
उसके पल्ले हैं
समाज के भी कुछ
फ़र्ज़ हैं उसके
सब कुछ देती- बांटती
वह अष्टभुजा बन गई है
उसका सारा अस्तित्व अब
बस भुजा ही भुजा है
इन भुजाओं के चक्र में
खो गए
अपने शेष भाग को
अब ढूंढ्ती है वह।
००


डॉ अनिल प्रभा कुमार
जन्म: दिल्ली में।
शिक्षा: "हिन्दी के सामाजिक नाटकों में युगबोध" विषय पर शोध।
लेखन: 'ज्ञानोदय' के 'नई कलम विशेषांक में 'खाली दायरे' कहानी पर प्रथम पुरस्कार
कुछ रचनाएँ 'धर्मयुग' 'आवेश', 'ज्ञानोदय' और 'संचेतना' में भी छ्पीं।
न्यूयॉर्क के स्थानीय दूरदर्शन पर कहानियों का प्रसारण। पिछले कुछ वर्षों से कहानियां और कविताएं लिखने में रत। कुछ कहानियां वर्त्तमान - साहित्य के प्रवासी महाविशेषांक में भी छपी है।
हंस, अन्यथा, कथादेश, हिन्दी चेतना, गर्भनाल, लमही,शोध-दिशा और वर्त्तमान– साहित्य पत्रिकाओं के अलावा, “अभिव्यक्ति”के कथा महोत्सव-२००८ में “फिर से “ कहानी पुरस्कृत हुई।
“बहता पानी” कहानी संग्रह भावना प्रकाशन से प्रकाशित।
नया कविता- संग्रह प्रकाशन के लिए लगभग तैयार।
संप्रति: विलियम पैट्रसन यूनिवर्सिटी, न्यू जर्सी में हिन्दी भाषा और साहित्य का प्राध्यापन और लेखन।
संपर्क: aksk414@hotmail.com
119 Osage Road, Wayne NJ 07470.USA

धारावाहिक पंजाबी उपन्यास(किस्त- 46)




सवारी

हरजीत अटवाल
हिंदी अनुवाद : सुभाष नीरव

॥ इक्यावन ॥
ईस्टर तक तो काम बहुत कम हो गया था। दिन में दो तीन ही डिलीवरी के आर्डर आते। वह मजे से यार्ड की तरफ जाता। ऑनसरिंग मशीन देखता कि किस किस के मैसेज हैं। वहाँ बैठ कर वह कुछ देर अख़बार पढ़ता। फिर कुछ सिलेंडर पिकअप पर रखता और फोन को घरवाले फोन पर डायवर्ट करके आ जाता। ईस्टर से पहले एक बड़ा लोड सिलेंडरों का मंगवा लिया था। वह सोचता कि यदि कारोबार ऐसे ही रहा तो यह स्टॉक सारी गर्मियाँ खत्म नहीं होने वाला। उसे इतनी तसल्ली थी कि इस सीज़न में सालभर की तनख्वाह बन गई। अब उसने सोशल सिक्युरिटी लेने बन्द कर दी। कोई मुसीबत खड़ी कर सकता था, मुफ्त में यूँ ही पैसे क्लेम करने। अब उसको नौकरी की ज़रूरत नहीं थी। यह बिजनेस उसके लिए ठीक था। इस सीज़न में उसको काफ़ी अनुभव हो गया था। आगे पूरे गरमी के दिन खाली पड़े थे। अगले सीज़न के लिए पूरी तरह तैयार हो सकता था।
एलीसन से उसका अब वास्ता नहीं रहा था, पर उसको अपना फोन नंबर दे आया था कि यदि ज़रूरत पड़े तो फोन कर ले। शौन अब न्यूजीलैंड से आस्ट्रेलिया आ गया था। उसका फोन आता रहता था। शौन की बातों से लगता था कि वह बहुत खुश नहीं था, पर वापस भी नहीं आ सकता था। जैरी स्टोन उसको मिलता रहता था। जैरी खुश था कि बलदेव ने अपना काम ठीकठाक चला लिया था। वह कहता-
''अगर तेरा यार्ड किसी सरल पहुँच वाली जगह पर हो तो तेरा बिजनेस और भी ठीक चले।''
लिज़ अपने कमरे में कम ही आती। वह घर कम ही आती। यदि आती तो डौमनिक उसके संग होता। उसका डौमनिक के साथ ही बहुत समय गुज़रता था। रात में डौमनिक उसके साथ आ जाता या लिज़ उसके फ्लैट में चली जाती। यदि कभी लिज़ अकेली होती और उसका मूड होता तो वह बलदेव के साथ आ लेटती। बलदेव कभी न रोकता। लिज़ अब किसी स्टोर में काम करने लगी थी। स्टोर से उसका कालेज करीब पड़ता था। बलदेव को किराया समय से दे जाती। उसको कभी भी मांगना नहीं पड़ता था। बलदेव को लिज़ अपने काम की शिफ्टों के बारे में जानकारी देने लगती, पर बलदेव ने कभी इस तरफ ध्यान नहीं दिया था मानो उसमें अब उसकी कोई दिलचस्पी नहीं रही थी।
एक शाम डौमनिक ने घंटी बजाई। लिज़ घर में नहीं थी। बलदेव ने दरवाज़ा खोला। डौमनिक 'हैलो' कहता हुआ अन्दर आ गया। लिज़ को न देखकर बोला-
''अभी लौटी नहीं ?... मैं फिर कभी आऊँगा, अब चलता हूँ।''
''अगर उसका इंतज़ार करना है तो यहाँ बैठकर कर ले, मुझे कोई एतराज़ नहीं।''
''शुक्रिया ! मुझे उम्मीद थी कि आज उसकी पहली शिफ्ट होगी।''
''कहीं फंस गई होगी, कोई बातों वाला मिल गया होगा। क्या पिएगा ?''
डौमनिक कुर्सी पर बैठ चुका था, बोला-
''कुछ भी चलेगा, पर ठंडा ही।''
''बियर पियेगा ?''
''नहीं, कोक वगैरह।''
बलदेव दो गिलासों में कोक डाल लाया। डौमनिक ने चीअर्स कहते हुए अपना गिलास उठा लिया। बलदेव पूछने लगा-
''लिज़ बता रही थी कि तू शेयर एक्सचेंज में काम करता है, ठीक है ?''
''हाँ डेव, दस साल हो गए।''
''फिर तो मिलियन्ज़ में खेलता होगा।''
''पर मेरे हिस्से तो कुछ सौ ही आते हैं।''
कहकर डौमनिक हँसा और पूछने लगा-
''तू भी शेयरों के साथ डील करता है ?''
''मुझे इस बिजनेस की कतई समझ नहीं है, मेरा दोस्त है शौन, उसको खूब अच्छी जानकारी है इस बारे में। उसके कहने पर एक बार मैंने खरीदे थे और पैसे बच गए थे। मैंने तो वे पैसे बचा लिए पर शौन ने दुबारा दूसरे शेयर खरीद लिए थे और वे सारे गंवा बैठा। जो शेयर उसने खरीदे, उनके भाव गिर गए थे।''
''इस बिजनेस में यह डर तो बना ही रहता है। बहुत केयरफुल होने की ज़रूरत होती है। इसमें जल्दबाजी नहीं करनी चाहिए। वैसे आजकल कीमतें गिरी हुई हैं। शेयर खरीदने का बढ़िया मौका है।''
''हो सकता है, पर मेरे पास इतने पैसे नहीं है।''
''कीमतें तो संपत्तियों की भी बढ़ रही हैं। लोग कर्ज़ा उठाकर भी खरीद लेते हैं, अगर ठीक चीज़ ठीक भाव में मिल जाए।''
''डौमनिक, तेरी तो यह लाइन है। तुझे नहीं लगता कि इकनोमी में यह बूम नकली है या अस्थायी है।''
''यह तू कैसे कह सकता है ?''
''क्योंकि जायदाद की कीमत निर्धारित करने के लिए दो प्रमुख तत्व काम करते हैं। एक तो घर को बनाने की कीमत और दूसरा जगह की कीमत। इस मुल्क में न जगह की कीमत बढ़ी है और न ही घर बनाने की। फिर यह घरों की कीमतें कैसे बढ़ गईं !''
''डेव, मैं तेरी बात से सहमत नहीं। पर तूने बात बहुत पते की की है। यह जो बूम है, पूरी दुनिया में है, अकेले ब्रितानिया में ही नहीं।''
''यह थेचर-रेगन जोड़ी आर्थिकता को नकली टीके लगा लगा कर मज़बूत दिखाए जा रही है। मैं तो डरता हूँ कि कहीं कीमतें गिर न पड़ें।''
''वैसे शेयर बाज़ार में भी बड़े क्रैश का डर पल रहा है। ऐसे क्रैश में से कई लोग कमा जाते हैं जैसे तीसरे दशक में कैनेडी परिवार ने कमाया था। जिसके पल्ले पैसे हों, गिरती कीमतों पर शेयर खरीद ले।''
''वही चांस की बातें हैं, जुआ है।''
''हाँ, ऐसा जुआ जिसको ध्यान से खेलकर यकीनी बनाया जा सकता है।''
''अगर जायदादों की कीमतें गिर पड़ीं तो इस सरकार के लिए बुरा होगा।''
''डेव, अगर रिसैशन आया तो पूरी दुनिया में आएगा, शायद न भी आए।''
''इकोनोमिस्ट तो बहुत भविष्यवाणियाँ कर रहे हैं''
''हाँ, इनफ्लेशन जो नहीं बढ़ी जो कि अच्छी बात है, पर बूम के लिए बुरी भी। तनख्वाहें बढ़ी नहीं, जायदादों की कीमतें बढ़ गईं।''
''डौमनिक, यदि इसके बारे में गहराई से सोचें तो साफ़ दिखने लग पड़ता है कि यह सब नकली है।''
''डेव, तू गैस के बिजनेस में है। इसके शेयर भी ठीक होते हैं। पैट्रोल से वास्ता जो है इसका... अगर मन बने तो खरीद लेना।''
''देखूँगा किसी पड़ाव पर जाकर यदि मन बना तो। अभी तो मैं इस बिजनेस में बिल्कुल नया हँ, पहला ही सीज़न है।''
डौमनिक घड़ी देखते हुए बोला-
''मुझे तो बैठे बहुत टाइम हो गया। लिज़ अभी भी नहीं आई। अब मुझे चलना चाहिए।''
''डौमनिक, तू तो बहुत बढ़िया आदमी है, मुझे तो आज पता चला। तेरे साथ बातें करने में मजा आ रहा है।''
डौमनिक ने डिब्बा खोला और ठीक से होकर बैठते हुए बोला-
''लेबर पार्टी को सपोर्ट करते हो ?''
''नही, मैं किसी पार्टी को सपोर्ट नहीं करता। मैं वोट ही नहीं डालता।''
''क्यों ?''
''मुझे ये लीडर लीडर कम और एक्टर ज्यादा लगते हैं।''
''यह भी ठीक है पर हर पार्टी की कुछ पालिसियाँ होती हैं, जिनसे आपको सहमत-असहमत होना होता है।''
''डौमनिक, मैंने गौर से देखा है कि पालिसियों का बहुत थोड़ा फ़र्क हुआ करता है। अब मुझे तो लेबर पार्टी अच्छी लगती है पर ये टोरी का मुकाबला करने लायक नहीं।''
''इसीलिए डेव, मैं एस.डी.एल.पी. का सपोर्टर हूँ।''
''किसी के भी सपोर्टर हो जाओ, आख़िर देशों को चलाते तो कुछ अदृश्य हाथ ही हैं।''
''तेरा भी यह यकीन है।''
''बिल्कुल। ये अदृश्य हाथ हर देश में होते हैं। यहाँ भी और अमेरिका में भी हैं। अब अमेरिका के प्रेजीडेंट के लिए अलिखित शर्तें हैं कि वह अमीर हो, गोरा हो, आयरिश पिछड़ी जाति का हो, ज्युओ का हमदर्द हो वगैरह...।''
''डेव, हम किसी पब में चलें, फिर जी भरकर बातें करेंगे। मुझे लगता है कि लिज़ के बहाने मेरी पहचान एक अच्छे दोस्त से हो गई है।''
बलदेव मुस्कराया और कहने लगा-
''लिज़ को इन बातों से एलर्जी है।''
''उसका क्षेत्र दूसरा है। वह ज़िन्दगी को हल्के-फुल्के अंदाज में लेती है।''
''डौमनिक, तेरी लिज़ से दोस्ती कैसे हुई, उसको तो तेरी कोई भी बात पसन्द नहीं आती होगी। वह तुझे भी बोर करती होगी।''
''डेव, बड़ी दूर की सोच रहे हो। मेरी उसके साथ दोस्ती का एक आधार तो यह है कि वह औरत है, खूबसूरत है। दूसरा यह कि मुझे लगता है कि उसके माध्यम से कुछ शेयर बेच सकूँगा। मेरी कारोबारी नज़र मुझे कई सन्देश दे रही है, तभी...।''
उनके बात करते करते ही लिज़ भी आ गई। उन्हें एक साथ बैठे देखकर बोली-
''सॉरी ब्यॉयज़, आई एम लेट।''
बलदेव डौमनिक से बोला-
''अगर तुम चाहो तो यहाँ मेरे साथ बैठकर भी शाम गुज़ार सकते हो। पीज़ा मंगवा लेंगे, मेरे पास हर तरह की ड्रिंक है ही।''
(जारी…)

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