शनिवार, 12 अप्रैल 2008

गवाक्ष- अप्रैल 2008



“गवाक्ष” के माध्यम से हम हिन्दी ब्लाग-प्रेमियों को हिन्दी/पंजाबी के उन प्रवासी लेखकों/कवियों की समकालीन रचनाओं से रू-ब-रू करवाने का प्रयास कर रहे हैं जो अपने वतन हिन्दुस्तान से कोसों दूर बैठकर अपने समय और समाज के यथार्थ को अपनी रचनाओं में रेखांकित कर रहे हैं। “गवाक्ष” के पिछ्ले तीन अंकों में पंजाबी कवि विशाल (इटली) की कविताओं का हिन्दी अनुवाद, दिव्या माथुर (लंदन) की कहानी, अनिल जनविजय (मास्को) की कविताएं, देवी नागरानी (न्यू जर्सी, यू.एस.ए.) की पाँच ग़ज़लें तथा लंदन में रह रहे पंजाबी कथाकार-उपन्यासकार हरजीत अटवाल के उपन्यास “सवारी” के हिंदी अनुवाद की पहली दो किस्तें आपने पढ़ीं। “गवाक्ष” के इस अंक में प्रस्तुत हैं – तेजिंदर शर्मा की कविताएं और हरजीत अटवाल के धारावाहिक पंजाबी उपन्यास “सवारी” की तीसरी किस्त का हिंदी अनुवाद…



तीन कविताएं
तेजिंदर शर्मा, यू के

कर्मभूमि

बहुत दिन से मुझे
अपने से यह शिकायत है
वो बिछडा गांव, मेरे
सपनों में नहीं आत।
वो भोर का सूरज,
वो बैलों की घंटियां
वो लहलहाती सरसों भी
मेरे सपनों की चादर को
छेद नहीं पाते।
और मैं
सोचने को विवश हो जाता हूं
कि इस महानगर की रेलपेल ने
मेरे गांव की याद को
कैसे ढक लिया !

विरार से चर्चगेट तक की लोकल के
मिले-जुले पसीने की बदबू
मेरे गांव की मिट्टी की
सोंधी खुशबू पर
क्योंकर हावी हो गई !
बुधुआ, हरिया और सदानंद
के चेहरों पर
सुधांशु, अरूण और राहुल
के चेहरे
कैसे चिपक गये !
मोटरों और गाडियों का प्रदूषण
गाय भैंसों के गोबर पर
कैसे भारी पड़ ग़या !

गांव के नाम पर, मुझे
नीच साहुकार, गंदी गलियां
और नालियां ही, क्यों याद आती हैं ?
छोटे-छोटे लिलिपुट
बड़ी बड़ी डींगें हांकते
मेरे सपनों के कवच में
छेद कर जाते हैं!
भ्रष्ट राजनीति के
गंदे खेल ही
मेरे दिमाग़ को क्यों
मथते रहते हैं !

इस महानगर ने अपनी झोली में
मेरे लिये
न जाने क्या छुपा रखा है
कि यही
मेरी कर्मभूमि बन गया है।

गिलहरी


रहती है मेरे घर के पीछे
बाग़ के एक दरख़्त पर
उछलती, कूदती, फरफराती
एक डाल से दूसरी पर
बंदरिया-सी छलांग लगाती।
ये मेरे बाग़ की गिलहरी है।

इस देश के गोरे नागरिकों की
करती है नकल, अपनी
फ़रदार पूंछ को हिलाती है
अलग-अलग दिशा में नचाती है
चेहरे पर रोब लाए
करती है प्रदर्शन, अपनी
अमीरी का, अपनी सुन्दरता का
हां, ये मेरे बाग़ की गिलहरी है।

अपने आगे के पैरों को देती है
हाथों-सी शक्ल और वैसा ही काम
कुतरती है सेब, मेरे ही बाग़ के
ऐंठती हुई करती है अठखेलियां
पेड़ों से टकराती ब्यार से
उफ़! ये मेरे बाग़ की गिलहरी।

जब जी चाहे पहुंच जाती है
मेरे ज़ीने पर, मेरे स्टोर में
कुतर डालती है, दिखाई देता है जो भी
मैं, बस सुनता हूं आवाज़ें
घबराता हूं, मांगता हूं दुआ
पुस्तकों की ख़ैरियत की।
मुझे भक्त बना देती है
ये जो है मेरे बाग़ की गिलहरी।

एक दिन सपने में मेरे आ खड़ी होती है
चेहरे पर दंभ, रूप से सराबोर
गदराया बदन, दबी मुस्कुराहट
आज आने वाली है उससे मिलने
उसकी दूर की एक रिश्तेदार!
उस शहर से जहां बीता था मेरा बचपन
हां, वो भी तो एक गिलहरी ही है।

ग़रीबी के बोझ से दबी
सिमटी, सकुचाई, शरमाई
अपने सलोने रंग से सन्तुष्ट
संग लाई है अपने अमरूद
बस वही ला सकती थी
महक मेरे शहर की मिट्टी की
पाता हूं वही महक कभी अमरूद में
तो कभी उसमे जो मेरे शहर की गिलहरी है।

मेरे बाग़ की गिलहरी को नहीं भाती
गंवई महक अमरूद की, या फिर
मेरे शहर की मिट्टी की वो गंध
जो मेरे शहर की गिलहरी ले आई है
अपने साथ, अपने शरीर अपनी सांसों में।
वह रखती है अपनी मेहमान के सामने
केक, चीज़ और ड्राई फ़्रूट
कितनी भी खा ले, पूरी है छूट
कितने बड़े दिल की मालकिन है
वो जो मेरे बाग़ की गिलहरी है।


मेरे शहर की गिलहरी सीधी है सादी-सी
निकट है प्रकृति के, सरल और मासूम
बस खाती है पेड़ों के फल, कैसे पचाए
केक, चीज़ और ड्राई-फ़्रूट
देखती है, मुस्कुराती है, पूछती है हाल
अपनी मेज़बान के, उसके परिवार के।
परिवार यहां नहीं होता, सब रहते हैं
अलग-अलग, यह मस्त देश है
ऊंचे कुल की दिखती है वो
जो मेरे बाग़ की गिलहरी है।

“सुनो, तुम यह सब नहीं खाती हो
इसी लिये सेहत नहीं बना पाती हो
मुझे देखो, कितना ख़ूबसूरत देश है मेरा
कैसा है मेरा स्वरूप, रंग रूप।.. देखो
मेरे बाग़ में कितने सुन्दर पेड़ हैं
रंग-बिरंगी पत्तियों वाले पौधे!
यहां का हरा रंग कितना गहरा है!
यहीं आ बसो, यहां है कितना सुख
कितनी शान, मौज है मस्ती है।”
आत्ममुग्ध हो जाती है, जो
मेरे बाग़ की गिलहरी है।

चुप नहीं हो पाती है, जारी है
बोलना उसका और इठलाना।
मेरे देश में इन्सान से अधिक
होती है परवाह हमारी
यही है वो देश जहां कभी
अस्त नहीं होता था सूर्य
जब कभी उदय होता है पूर्व में
तब भी चमकता है मेरा यह
पश्चिम का देश
और चमकने लगता है चेहरा,
मेरे बाग़ की गिलहरी का।

शांत किन्तु दृढ़ आवाज़ में
देती है जवाब, गिलहरी मेरे शहर की।
माना कि तुम हो बहुत सुन्दर और सुगठित
धन और धान्य से भरपूर है शहर तुम्हारा


तुम्हारे देश में हैं सुख, सुविधाएं और आराम
देखो मेरी ओर, देखो मेरे इस साधारण बदन को,
यह तीन उंगलियां जिसकी हैं
उसका नाम है राम! इस तरह देती है सुख
मुझे असीम, वो जो मेरे शहर की गिलहरी है।


टेम्स का पानी

टेम्स का पानी, नहीं है स्वर्ग का द्वार
यहां लगा है, एक विचित्र माया बाज़ार!

पानी है मटियाया, गोरे हैं लोगों के तन
माया के मकड़जाल में, नहीं दिखाई देता मन!

टेम्स कहां से आती है, कहां चली जाती है
ऐसे प्रश्न हमारे मन में नहीं जगा पाती है !

टेम्स बस है ! टेम्स अपनी जगह बरकरार है !
कहने को उसके आसपास कला और संस्कृति का संसार है !

टेम्स कभी खाड़ी है तो कभी सागर है
उसके प्रति लोगों के मन में, न श्रध्दा है न आदर है!

बाज़ार संस्कृति में नदियां, नदियां ही रह जाती हैं
बनती हैं व्यापार का माध्यम, मां नहीं बन पाती हैं !

टेम्स दशकों, शताब्दियों तक करती है गंगा पर राज
फिर सिकुड़ जाती है, ढूंढती रह जाती है अपना ताज!

टेम्स दौलत है, प्रेम है गंगा; टेम्स ऐश्वर्य है भावना है गंगा
टेम्स जीवन का प्रमाद है, मोक्ष की कामना है गंगा

जी लगाने के कई साधन हैं टेम्स नदी के आसपास
गंगा मैय्या में जी लगाता है, हमारा अपना विश्वास!
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तेजेन्द्र शर्मा
जन्म : 21 अक्टूबर 1952 को पंजाब के शहर जगरांव
शिक्षा : दिल्ली विश्विद्यालय से बी.ए. (ऑनर्स) अंग्रेज़ी, एवं एम.ए. अंग्रेज़ी, कम्पयूटर कार्य में डिप्लोमा ।
प्रकाशित कृतियाँ : काला सागर (1990) ढिबरी टाईट (1994), देह की कीमत (1999) यह क्या हो गया ! (2003), बेघर आंखें (2007) -सभी कहानी संग्रह। ये घर तुम्हारा है... (2007 - कविता एवं ग़ज़ल संग्रह) ढिबरी टाइट नाम से पंजाबी, इँटों का जंगल नाम से उर्दू तथा पासपोर्ट का रंगहरू नाम से नेपाली में भी उनकी अनूदित कहानियों के संग्रह प्रकाशित हुए हैं। अंग्रेज़ी में : 1. Black & White (biography of a banker – 2007), 2. Lord Byron - Don Juan (1976), 3. John Keats - The Two Hyperions (1977)
कथा (यू.के.) के माध्यम से लंदन में निरंतर कथा गोष्ठियों, कार्यशालाओं एवं साहित्यिक कार्यक्रमों का आयोजन । लंदन में कहानी मंचन की शुरू‏आत वापसी से की। लंदन एवं बेज़िंगस्टोक में, अहिंदीभाषी कलाकारों को लेकर एक हिंदी नाटक हनीमून का सफल निर्देशन एवं मंचन ।

संपर्क:
74-A, Palmerston Road
Harrow & Wealdstone
Middlesex UK
Telephone: 020-8930-7778 / 020-8861-0923.


E-mail: kahanikar@gmail.com , mailto:kathauk@hotmail.com
Website: http://www.kathauk.connect.to/



धारावाहिक पंजाबी उपन्यास(किस्त- 3)

सवारी
हरजीत अटवाल
हिंदी अनुवाद : सुभाष नीरव


।। चार ।।

वैलजी वे प्रात: चार बजे पहुँचे। मुख्य सड़क से हटकर जो रोड थी, उस पर कुछ मील जाकर शौन का घर था। सड़क पर इस तरह के इकहरी मंजिल वाले अन्य भी इक्का-दुक्का घर थे। सड़क से घर के लिए दो रास्ते थे। एक अंदर जाने के लिए और दूसरा बाहर आने के लिए। घर के बाहर खड़ी कार की ओर इशारा करते हुए शौन बोला–
“यह मैथ्यू की है, बहुत रफ चलाता है, देख तो ज़रा इसकी हालत।”
वे दोनों कार में से निकले। ताजी हवा के बुल्ले इनके जिस्मों को स्पर्श करने लगे। काफी ठंड थी। वे कमीजों में ही थे। भारी कपड़े कार के बूट में ही पड़े थे। शौन ने दरवाजे की घंटी बजाई। कोई नहीं आया। फिर बजाई, दरवाजा भी खटखटाया। कोई उत्तर न मिला। फिर उसने मैथ्यू को आवाज़ देकर पुकारा और अंत में गालियाँ बकने लगा। जब दरवाजा न खुला तो वह बलदेव से कहने लगा–
“आ जा, रसोई की तरफ से चलते हैं।”
वे घर के पिछवाड़े चले गए। शौन ने खिड़की का शीशा उतारा और अंदर जा घुसा। अंदर जाकर उसने बलदेव के लिए दरवाजा खोल दिया। रसोई में बर्तन जस के तस बिखरे पड़े थे। शौन हँसते हुए बोला–
“देख, लगता है न पंजाबी का घर।”
फिर उसने अल्मारी में से आयरश व्हिस्की बु्शमिल की बोतल उठा ली। दो पैग बनाए। एक गिलास बलदेव को देते हुए बोला–
“वैलकम टू आयरलैंड !... मेरे मुल्क की व्हिस्की ट्राई कर।” बलदेव ने कई बार आयरश व्हिस्कियाँ पीकर देख रखी थीं। इन व्हिस्कियों के स्वाद में धुआंखेपन की बू होती थी। वह सोचने लगा कि ये लोग किस तरीके से शराब बनाते होंगे कि वह स्मोकी हो जाती है। एक बार शौन से बहस भी कर चुका था कि व्हिस्की के धुआंखे होने का सवाल ही पैदा नहीं हो सकता। वह इस बारे में सोच ही रहा था कि मैथ्यू आ गया। वह सीधा बैड पर से ही आँखें मलता हुआ आ रहा था। बलदेव ने शक्ल से ही पहचान लिया। वह उनसे हाथ मिलाता हुआ बोला–
“हम तो सारी रात इंतजार करते रहे...।”
शौन ने उसके लिए भी पैग बनाया और गुस्से होकर कहने लगा–
“दरवाजा क्यों नहीं खोला ?”
“तुम्हारी प्रतीक्षा करते-करते हम बहुत देर से सोये थे।”
मैथ्यू की अंग्रेजी इतनी गूढ़ आयरश उच्चारण में थी कि बलदेव को समझने में कठिनाई महसूस हो रही थी। वे रसोई में से बैठक में आ गए। अब तक शौन की माँ भी उठ आई। बलदेव ने उसका हाथ पकड़कर ‘हैलो’ कहा। वह पश्चिमी बुजुर्गों से मिलने का तरीका नहीं जानता था। भारतीय बुढ़िया होती तो पैरों को हाथ लगाता। फिर मैथ्यू की पत्नी कुमैला और बच्चे भी आ गए। शौन ने बच्चों का तआरुफ़ करवाते हुए कहा–
“यह है बड़ा शौन और यह है कुमैला... शौन का नाम मेरे वाला है, मेरे बाप का भी यही था, यह हमारा खानदानी नाम है। कुमैला का नाम इसकी माँ वाला है।”
बलदेव को क्रिश्चियनों के नामकरण का पता था कि एक ही नाम पीढ़ी-दर-पीढ़ी चला आता है। उसने बच्चों को उठाने को कोशिश की, लेकिन वे भाग गए। बलदेव से शरमा रहे थे। कुमैला भी रसोई के काम में जा लगी। शौन ने बलदेव से कहा–
“डेव, हम घंटा भर सो लें, नहीं तो हम तंग होंगे। अपना शैड्यूल बहुत बिजी है।”
शौन उसे एक कमरे में ले आया, जहाँ उसका बैग रखा हुआ था। उनके बैठते मैथ्यू कार में से सामान निकाल लाया था। दो हफ्तों के कपड़े आदि थे। शौन बलदेव को बिस्तर पर लिटाकर स्वयं दूसरे कमरे में जा पड़ा। अब सोने का वक्त नहीं रहा था। परदों में से भी रोशनी अंदर आ रही थी।
मैथ्यू को बेचैनी हो रही थी। शौन और बलदेव का इस तरह सो जाना उसे अच्छा नहीं लग रहा था। उसने उनका रात में इतना इंतजार किया था कि पब तक नहीं जा सका था यह सोचकर कि कहीं वे आ ही न जाएं। उसे इस बात की चिंता नहीं थी कि वे दो रात से सो नहीं पाए थे। अभी घंटा भर भी नहीं हुआ था कि वह बलदेव के कमरे में चला गया। उसे करवटें बदलता पाकर बोला–
“डेव, चल उठ, बेकरी चलती हैं।”
बलदेव उठ खड़ा हुआ। नींद तो उसको न के बराबर ही आई थी। उसे जबरदस्त थकान थी। उसकी हालत देखकर मैथ्यू बोला–
“चिंता न कर, गीनस ठीक कर देगी।”
बलदेव हँसता हुआ बाथरूम में जा घुसा। तैयार हुआ तो कुमैला घर की बनी ब्रेड के टोस्ट सामने रख गई। उसे यह ब्रेड बहुत स्वादिष्ट लगती थी। सिमरन भी घर में ही ब्रेड बेक कर लिया करती थी। मैथ्यू इतना उतावला था कि बलदेव को नाश्ता भी नहीं करने दे रहा था। बलदेव के आने पर वह बेहद उमंगित था।
उसने अपनी कार के बजाय शौन वाली कार ले ली और बोला–
“हम शौन के सोते-सोते ही लौट आएंगे। मुझे तो वह अपनी कार को हाथ ही नहीं लगाने देता।”
कहकर उसने कार को पीछे की ओर ही भगा लिया और बाहर सड़क पर ले आया। कार को सीधा करते हुए बताने लगा–
“दायीं ओर कौर्क और वाटरफोर्ड है, जहाँ से तुम रात में आए थे। यहाँ से हमारा गांव वैलजी एक मील पर है, मिंटले आधा मील... यह बायीं ओर वाला फार्म पहले हमारा हुआ करता था... वो सामने चर्च था, गिर पड़ा था। अब दुबारा बनाएंगे...यह फार्म हमारे परिवार के आदमी का ही है, यह भी मरफी है। हमारा बाबा और इनके बाबा का बाप दोनों भाई थे। इन्होंने फॉर्म बीसेक साल पहले ही लिया है। इनका एक लड़का गठिये का मरीज है, कच्चा दूध जो पी लिया था... वो सामने चीज़ फैक्टरी है। मैंने भी यहाँ काम किया था। इसकी मालकिन पागल हो गई। सामने ज़ोज़ी के पब को रोड जाती है...।”
जब तक वे एक दुकान के आगे न रुके, वह बोलता ही गया। उसके उच्चारण के कारण बलदेव को कई बार दुबारा पूछना पड़ता कि वह क्या कह रहा है। वह बलदेव को बांह से पकड़कर दुकान के अंदर ले चला। सबको प्रसन्न होकर बताने लगा–
“यह डेव है, मेरे भाई शौन का दोस्त। लंदन में रहता है। आज ही आया है, दो सप्ताह ठहरेगा।”
दुकान में दो ग्राहक थे और दो काम करने वाले। सभी बलदेव को उत्साह से मिल रहे थे। पराये रंग का आदमी उन्हें अधिक देखने को नहीं मिलता था। दुकान में ग्राहक आ-जा रहे थे। हर कोई उससे विशेष तौर पर मिलता। मैथ्यू साथ के साथ कमेंटरी देता जा रहा था। बिलकुल ग्रामीण माहौल था। पंजाब के लोगों के साफ स्वभाव जैसे लोग सीधी-सरल बातें कर रहे थे। किसी ने पूछा–
“तू डाक्टर है ?”
“नहीं तो।”
“तेरे रंग के लोग डाक्टर ही तो होते हैं। हमारा एक डाक्टर था, हम उससे मजाक किया करते थे कि तूने हाथ नहीं धोये, जा हाथ धोकर आ।”
वहाँ खड़े सभी लोग हँस पड़े। टाईवाले एक आदमी ने सोचा कि कहीं मेहमान गुस्सा ही न हो जाए, कहने लगा–
“यहाँ एशियन और काले लोग बहुत कम हैं... यहाँ ज्यादातर लोग तो ऐसे होंगे, जिन्होंने काले लोग देखे ही नहीं होंगे। ऐसे लोग भी हैं जिन्हें यह भी नहीं पता कि धरती पर रंगदार लोग भी होते हैं। कभी कहीं गए ही नहीं, अशिक्षा भी बहुत है।”
बलदेव उसकी बात का असली भाव समझ गया था। उसने मुस्कराते हुए कहा–
“अशिक्षा और अज्ञानता तो हर मुल्क के गांव में होती है, इंग्लैंड के गांवों में बहुत से लोग ऐसे हैं जिन्होंने अभी तक लंदन नहीं देखा और बहुत से तो लंदन देखे बगैर ही मर जाते हैं।”
मैथ्यू ने साबुत ब्रेड्स खरीदीं। बलदेव ने देखा कि दुकान में कटी हुई कोई ब्रेड नहीं थी। वह सोच रहा था कि यहाँ साबुत ब्रेड का ही रिवाज होगा। कहने को तो यह बेकरी थी, पर साधारण दुकान की तरह सब कुछ मिलता था। मैथ्यू ने एक टेप भी खरीदी। कार में बैठते ही टेप लगाकर कहने लगा–
“यह हँसी-मजाक से भरी टेप है, ज़रा सुन, तुझे पसंद आएगी।”
बलदेव ने ध्यान लगाकर सुनने की कोशिश की। बहुत कुछ उसके पल्ले नहीं पड़ रहा था। वह मैथ्यू की ओर देखकर ही हँसने लग पड़ता। उसे हँसता देखकर मैथ्यू को अजीब-सी खुशी हो रही थी। उसकी आँखें तसल्ली से भर जातीं।
उनके लौटकर आने तक शौन भी सो कर उठ चुका था। कुछ देर बाद वे तीनों एकसाथ निकल पड़े। मैथ्यू कार चला रहा था। शौन उसके बराबर बैठा था और बलदेव पीछे। पहले उन्होंने उसे अपना गांव दिखाया और फिर आसपास का इलाका। इंग्लैंड के गांवों की तरह ही गांव थे। उन्होंने अपनी पारिवारिक कब्रें भी दिखलाईं, जहाँ उनके बुजु़र्ग दबे हुए थे और उनकी जगहें सुरक्षित थीं।
एक बात जो उसने नोट की, वह यह कि यहाँ पबों की बहुत भरमार थी। वे दो पबों में बियर पी कर बारह बजे वाली सर्विस तक चर्च में आ पहुँचे। शौन कैथलिक क्रिश्चियन था और बहुत ही कट्टर। हर इतवार चर्च जाया करता था। बलदेव भूल ही गया था कि आज इतवार है। उसने एक पल के लिए सोचा कि आज तो गुरां भी फुर्सत में होगी।
चर्च के बाहर ‘आज का वाक्य’ लिखा हुआ था। शौन बता रहा था कि यह उनके परिवार का चर्च था। किसी बड़े बुज़ुर्ग ने बनवाया था। उनके पीछे ही बलदेव चर्च में घुसा। वह पहले भी शौन के साथ चर्च चले जाया करता था। वह इसमें विश्वास नहीं करता था पर साथ देने के लिए चला जाता। ऐसे ही, शौन भी उसके साथ गुरुद्वारे जा आता था। चर्च में स्कूलों के डैस्कों की भांति डैस्क लगे हुए थे, जिन पर आज की अरदास के कुछ पन्ने और अन्य किताबचे-से पड़े हुए थे। अरदास के कई पड़ाव थे।
बलदेव को अधिक जानकारी नहीं थी। वह बाकी लोगों को देखकर उन जैसा ही करता रहा।
चर्च में शौन के बहुत से परिचित मिल गए। वह किसी के पास रुकता नहीं था। हाथ मिलाकर वह आगे बढ़ जाता। उनमें से कुछ लोग बलदेव को भी आकर मिलते। मैथ्यू पब को जाने के लिए उतावला था। वह कह रहा था–
“ज़ोज़ी के यहाँ चलते हैं, वह सड़क पार करके उसका पब है।”
बलदेव सोच रहा था कि ज़ोज़ी का पब कोई खास जगह होगी जिसका जिक्र सुबह से मैथ्यू कई बार कर चुका था। यह नाम पहले शौन से भी सुन रखा था। जब लौटकर वे कार में बैठे तो उसने पूछा–
“यह ज़ोज़ी का पब तो तुम्हारा खास पब लगता है।”
“हाँ, तू भी देखेगा तो हैरान रह जाएगा। यह पब गवर्मेन्ट के किसी कानून के मुताबिक सहीं नहीं उतरता। न यहाँ टॉयलेट है, लोग बाहर ही खड़े हो जाते हैं, स्त्रियाँ ज़ोज़ी के फ्लैट में चली जाती हैं। न कोई हीटिंग है, न धुआं निकालने के लिए पंखा। पर फिर भी बेहद बिजी रहता है।”
शौन के बाद मैथ्यू ने कहा। वह आगे बताने लगा–
“बियर भी इसकी सस्ती होती है। बियर सस्ती होने का कारण तो वैसे यह है कि थरूरियों में जाकर यह बैठी हुई बियर ले आती है और ज्यादा गैस देकर बेची जाती है। रिजेक्टिड बियर तो मुफ्त के भाव ही मिल जाती है।”
“कोई माइंड नहीं करता।”
“माइंड ?... बल्कि खुश होकर पीते हैं। रात में तू भीड़ देखना एक बार।”
सड़क के किनारे एक पहाड़ी के ऊपर था यह पब। पब कैसा, छोटा-सा घर था। खाली क्रेटों या ड्रमों से पब कहा जा सकता था। बीसेक कारें खड़ी करने की जगह थी जहाँ चार खराब कारें पहले ही खड़ी थीं। अधिकतर कारें मेन रोड पर ही पार्क थीं। कारों की संख्या देखकर लगता था कि अंदर काफी लोग थे। एक गीली-सी दीवार की ओर इशारा करते हुए मैथ्यू बोला–
“यह है पब का टॉयलेट। बारिश हो या बर्फ़, लोग यहाँ आ खड़े होते हैं।” बताते हुए मैथ्यू हँसने लगा।
वे पब के अंदर गए। एक ही कमरा था। अंदर भीड़ थी। धुएं से सारा वातावरण भरा पड़ा था। वे लोगों की भीड़ में से जगह बनाते हुए काउंटर तक पहुँच गए। गिलास भरती लड़की से मैथ्यू ने कहा–
“ज़ोज़ी कहाँ है ?”
“ऊपर है।”
“जा, उसे कह कि गारडा आया है।”
कहकर उसने बलदेव की तरफ इशारा किया। गारडा से उसका मतलब था– सिपाही। उस लड़की ने ज़ोज़ी को आवाज़ लगाई। कुछ देर बाद मोटी-सी, टेढ़े घुटनों वाली औरत आ प्रगट हुई। मैथ्यू ने उससे कहा–
“ज़ोज़ी, तेरी कारगुजारी चैक करने के लिए गारडा आया है।”
“मैथ्यू, अगर तूने इसके आने के बारे में पहले मुझे न बताया होता तो मैं तेरी बात पर ध्यान भी देती।”
शौन ने उसे इशारा किया और एक तरफ बुला लिया। उसने ड्यूटी-फ्री वाली लाई हुई बोतलें बेचनी थीं। इसी तरह, पबों वाले इंग्लैंड से आने वालों की प्रतीक्षा करते रहते थे।
बलदेव को कमरे का धुआं चढ़ने लगा। उसने अपना चश्मा उतार कर साफ किया। मैथ्यू ने उससे पूछा–
“ऐलिसन का क्या हाल है?”
बलदेव को ठीक से समझ में नहीं आया। हालांकि संगीत नहीं चल रहा था, पर फिर भी काफी शोर था। बलदेव ने ‘सॉरी’ कहकर सवाल दोहराने के लिए कहा। वह सोचने लगा कि कौन है यह ऐलिसन ? वह तो किसी ऐलिसन को नहीं जानता था।
फिर उसे स्मरण हो आया कि शौन की बहन का नाम भी ऐलिसन था, जिससे शौन की कम ही बनती थी। शौन उससे नाराज था कि उसने कुंवारेपन में बच्चे पैदा कर लिए थे जो कि कैथोलिक धर्म के बहुत खिलाफ है। इसीलिए सभी ने ऐलिसन से सम्बन्ध तोड़ रखे थे।
सिगरेटों के धुएं से बलदेव को खांसी होने लगी तो वह बाहर निकल आया। अपना गिलास थामे मैथ्यू भी पीछे-पीछे ही आ गया। उसने बलदेव से फिर पूछा–
“ऐलिसन का क्या हाल है?”
“बहुत अच्छा। वह बिलकुल ठीक है।”
बलदेव ने शीघ्रता में कहा। मैथ्यू बोला–
“डेव, वह बहुत अच्छी लड़की है। तूने जो उससे विवाह करने का फैसला किया है, वह बहुत सही है।”



।। पाँच ।।

जुलाई का महीना है। गरमी बहुत पड़ रही है। इतनी भी नहीं कि रिकार्ड टूट जाए। सैंतीस डिग्री का रिकार्ड है लंदन की गरमी का। जुआरियों की कंपनी की ओर से इस साल की गरमी के रिकार्ड टूटने को लेकर शर्त लगाने के बारे में लोगों को उकसाया जा रहा है। तीन हफ्तों से पड़ रही गरमी से अब लोग ऊबने भी लग पड़े हैं। बारिश की दुआ कर रहे हैं। दुकानों और पबों वाले खुश है। आइसक्रीम, सोफ्टड्रिंक्स, बियर आदि की बिक्री अच्छी हो रही है। यद्यपि, टेक-अवे गर्म खाने इतने नहीं बिक रहे। गरमी का मौसम प्रदूषण को भी बढ़ाता है। यही कारण है कि ट्रैफिक के समय हाईबरी कॉर्नर के राउंड-अबाउट के इर्द-गिर्द माहौल दमघोंटू हो जाता है। इसी बात का ध्यान रखते हुए काउंसल ने कुछ नए दरख़्त लगाए हैं। पेड़ तो लगाए हैं पर राउंड-अबाउट के इर्द-गिर्द की प्रेड के लोगों को ये पसंद नहीं हैं, खासतौर पर दुकानदारों को। वे कई बार इन पेड़ों को उखाड़ फेंकने की बात भी करते हैं क्योंकि इससे दुकानें पूरी दिखाई नहीं देतीं। लेकिन पेड़ उखाड़ना ज़ुर्म है। जु़र्म करने के लिए कोई आसानी से तैयार नहीं है, इसलिए पेड़ फलने-फूलने लगे हैं।
हाईबरी के इस बड़े-से राउंड-अबाउट के चारों ओर दुकानें और दफ्तर हैं। हौलो-वे रोड से इसमें दाख़िल हों तो चैरिटी वालों का बड़ा दफ्तर है। साथ ही, पीज़ा और साथ ही, सिंह-वाइन्स। उसके साथ एक ‘फिश एंड चिप्स’ और फिर सरकंडों की छत से बना पब जिसका नाम ‘बैच्ड हाउस’ है। जिसकी मालकिन शीला मिंटगुमरी है। वह अपने ब्वाय-फ्रेंड पॉल राइडर के साथ मिलकर इसको चलाती है। फिर सेंट पौल्ज़ रोड है। इसे पार करके दुकानें हैं जैसे कि कारों के स्पेअर पार्ट्स की, इस्टेट एजेंट है, इंश्योंरेंस का दफ्तर आदि। फिर सिटी रोड पर आगे काउंसल के दफ्तर हैं। इसी तरह आगे अपर स्ट्रीट पार करके ‘मैकडॉनल्ड’ ‘कंटकी’ आदि। बहुत व्यस्त जगह है। बिजनेस के नज़रिये से बढि़या मानी जाने वाली। बड़ी सड़कों का जंक्सन भी है। हौलो-वे रोड जिसे ‘ऐ-वन’ भी कहते हैं, सीधी सिटी में जाती है। दूसरी ओर से सेंट पौल्ज़ रोड ईस्ट लंदन से आकर सीधी वेस्ट एंड पहुँचती है। इस पर यदि सीधे चलते जाओ तो दरिया थेम्ज़ आ जाता है।
करीब दस बजे ‘सिंह वाइन्स’ का शटर अंदर से खुला। सत्तर वर्षीय भारी देहवाला एक बुजु़र्ग बाहर आ खड़ा हुआ। वह सेंट पौल्ज रोड की ओर देखने लगा। सड़क के फुटपाथ पर कई आदमी चले आ रहे थे, पर टोनी दिखाई नहीं दे रहा था। उसने ऐनक ठीक की और आँखों पर हाथ की छ्त्तरी बनाकर फिर से देखने लगा। टोनी अभी भी नहीं दिखाई दिया। उस बुजु़र्ग ने घड़ी की तरफ देखा। दस बजने में पाँच मिनट शेष थे। वह मन ही मन बुदबुदाया, “यह लेजी पूरे टाइम पर ही आएगा। यह नहीं कि तू दो मिनट पहले ही आ जा। शटर उठा लेते हैं, लड़का भी माल लेकर आने वाला है,नहीं...यह तो पूरे टाइम पे ही पहुँचेगा।”
उसके शटर उठाते ही पब का गवना पॉल राइडर भी पब खोलने लग पड़ा। उसने हवा से घूमने वाला साइनबोर्ड खींचकर फुटपाथ पर रख दिया, जिस पर कैपिटल अक्षरों में लिखा था– ‘हॉट फूड सर्व्ड हियर।’ पॉल ने सोहन सिंह को देखकर दूर से ही हैलो की और ऊँचे स्वर में पूछा–
“हाऊ आर यू डैड ?”
“मी ओ.के. पाल, यू ओ.के. ?”
“यैस... नाइस डे अगेन।”
“वैरी ब्यूटीफुल!... मी ड्रिंक टुडे, जू बाई ?”
“आफ कोर्स ! कम आन हियर लेटर आन, आय बाई बियर फार यू।”
“मी जोकिंग पाल, मी ड्रिंक बरांडी, बियर वाटर, मीन नो वाटर।”
पॉल हँसता हुआ अंदर जा घुसा। सोहन सिंह ने वाहेगुरु कहते हुए दुकान खोल ली और साथ ही सिगरेट खरीदने के लिए एक ग्राहक ने अंदर प्रवेश किया। ग्राहक को सर्व करते हुए ही टोनी आ गया। सोहन सिंह ने उसे घड़ी दिखलाते हुए कहा–
“फैव मिनट लेट जू लेजी।”
“सॉरी डैड, बस गॉट लेट।”
“नो बस लेट, टू मच वोमैन लेट।”
“यैस डैड, मी यंग मैन, वोमैन वैरी गुड फार मी, यू ओल्ड मैन, नो गुड फार वोमैन।”
“मी ओल्ड...ओल्ड गोल्ड।”
कहते हुए सोहन सिंह हँसने लगा और टोनी भी। टोनी पैंतालीस साल का अफ्रीकन नस्ल का आदमी था जो कि कई सालों से दुकान में काम करता चला आ रहा था। वह अपने दुबले-पतले शरीर के कारण अभी जवान दिखाई देता था। बालों मे मणके-से डालकर रखता। वह दुकान से बाहर निकलते हुए बोला–
“नो साइन आफ ऐंडी !... मे बी ट्रैफिक।”
वह अभी कह ही रहा था कि अजमेर की वैन बाहर आकर खड़ी हो गई। राउंड-अबाउट की दुकानें होने के कारण गाड़ी खड़ी करने की बहुत समस्या थी। लगभग चार कारों की जगह उनकी दुकानों के आगे बनी हुई थी, पर वह हमेशा भरी रहती। यदि वैन खड़ी करने के लिए सही जगह न मिलती, तो जल्दबाजी में खाली करनी पड़ती। ट्रैफिक वार्डन का भय रहता। अजमेर को भी जगह न मिली। उसने डबल पार्किंग ही कर ली। टोनी ‘हैलो’ कहकर पिछला दरवाजा खोलने लगा और सामान का अंदाजा लगाने लगा कि कितना सामान है और पहले वह कौन-सा उतारे। उसने बियर के क्रेटों को हाथ लगाया और तीन क्रेट उठाकर अंदर ले गया। अजमेर ने वैन का साइड डोर खोलकर सामान उतारना शुरू कर दिया था। अभी थोड़ा-सा सामान ही उतरा होगा कि ट्रैफिक वार्डन आ गया। कहने लगा–
“मिस्टर सिंह, तू डबल पार्किंग नहीं कर सकता।”
“और क्या करूँ ? कहीं भी जगह नहीं है।”
“तू आठ बजे से पहले अनलोड किया कर या फिर जगह खाली होने का इंतजार कर।”
“ऐसा मैं नहीं कर सकता। भरी वैन को कहीं ओर कैसे खड़ी करूँ।”
“वैन मूव कर नहीं तो मैं टिकट दे दूंगा।”
अजमेर उसकी बात अनसुनी करके सामान उतारने लगा। ट्रैफिक वार्डन ने उसकी वैन का नंबर नोट करना शुरू कर दिया। अजमेर डर गया कि सचमुच ही टिकट न काट दे। उसने वैन स्टार्ट की और ले गया। चक्कर काटकर आया तो वार्डन जा चुका था। वे जल्दी-जल्दी वैन अनलोड करने लगे। टोनी कह रहा था–
“यह कुछ ज्यादा नस्लवादी है। दूसरे वार्डन जबकि मान जाते हैं।”
उन्होंने वैन खाली कर दी। अजमेर वैन को दुकानों के पिछवाड़े दुकानदारों के लिए सुरक्षित पार्किंग में खड़ी कर आया। वापस दुकान में आकर अजमेर सीधा पिछले स्टॉक रूम में गया। वहाँ लगे बड़े-से शीशे में खुद को देखा। वह थका-थका-सा लग रहा था। उसकी पगड़ी का सिरा पसीने से भीगा पड़ा था। वह ऊपर फ्लैट में जा चढ़ा। टोनी और सोहन सिंह सामान को सैल्फों में टिकाने लगे। सोहन सिंह प्राइसिंग गन से कीमत लगा देता और टोनी उसे सैल्फ में रख देता।
हफ्ते में दो दिन शापिंग की जाती थी। मंगलवार और वीरवार। पहले दिन से ही अजमेर ने यह सिस्टम बना रखा था। ये दो दिन टोनी दस बजे काम पर आता नहीं था तो वह तीन बजे शुरू करता। तीन से ग्यारह। आठ घंटे। आफ लायसेंस होने के कारा शाम की बिक्री अधिक थी। दिन में ग्राहक इक्का-दुक्का ही आता। दिन में तो सोहन सिंह भी ‘टिल्ल’ का काम चला लेता था। अजमेर की पत्नी गुरिंदर भी आ खड़ी होती थी।
सोहन सिंह की मुश्किल अंग्रेजी की ही थी, नहीं तो काम वह सभी कर लेता था। उम्र अधिक होने के कारण हाथों में भी फुर्ती नहीं रही थी। ग्राहक बढ़ जाने पर वह जल्दी-जल्दी सर्व नहीं कर पाता था। फिर काउंटर के पीछे लगी घंटी बजा देता जो कि ऊपर फ्लैट में बजती थी। घंटी सुनकर ऊपर से कोई न कोई आ जाता। गुरिंदर या अजमेर। सोहन सिंह का सारा दिन दुकान में शुगल-सा चलता रहता था। वह ऐसा बंदा था कि किसी बात को दिल पर नहीं लगाता था। उसने कभी भी घर की जिम्मेदारी नहीं संभाली थी। पहले उसका बड़ा भाई कामरेड परगट सिंह घर को देखता था और अब उसका यह बड़ा लड़का अजमेर का कर्ताधर्ता था। कामरेड परगट सिंह अपनी ओर से इलाके का माना हुआ व्यक्ति था, जिसका अजमेर पर बहुत प्रभाव था। अभी भी घर में उसे प्राय: याद किया जाता था। उसने ही अजमेर को इंग्लैंड भेजा था। उसके नाम पर अजमेर कई साल पार्टी को फंड भी देता रहा था।
अजमेर की दुकान सही स्थान पर थी। आर्सनल की फुटबाल ग्राउंड के बिलकुल नज़दीक। जहाँ हर वीक-एंड पर कोई न कोई मैच चलता ही रहता। वैसे भी हाईबरी कॉर्नर अड्डे की जगह थी। सारी रात लोग चलते-फिरते रहते। रिश्तेदारों और गांव के लोगों में उसकी अच्छी जान-पहचान बन गई थी। ऐसी जान-पहचान बनाकर रखना उसके स्वभाव में था। प्रशंसा का भूखा भी था वह। कई लोग उसकी तारीफें करके उसका इस्तेमाल भी कर लेते थे।
अजमेर की दुकान सामने से तो आम दुकानों जितनी ही चौड़ी थी, पर पीछे की ओर काफी लम्बी थी। जितनी दुकान थी, उतना ही पिछवाड़े में स्टॉक रूम था। बगल में एक कमरा और पीछे की ओर बाथरूम। पीछे एक छोटा-सा आंगन भी था। दुकान में प्रवेश करते ही दायीं ओर काउंटर था। मध्य में गंडोला था। तीनों दीवारों के साथ सैल्फें थीं। शीशे के फ्रंट को वह खाली रखता ताकि बाहर से देखने वाले को अंदर का व्यू पूरा दिखाई दे। बायीं तरफ वाली दीवार की सैल्फों में वाइन भरी हुई थी। बीच में गंडोले पर बियर और दायीं तरफ की सैल्फों में सोफ्ट ड्रिंक के डिब्बे और बोतलें थीं। व्हिस्की की छोटी-बड़ी बोतलें और सिगरेटें काउंटर के पीछे थीं। सैल्फों पर से सामान ग्राहक स्वयं उठा लेता और काउंटर के पीछे की वस्तु को मांग कर लेता था। दुकान की बड़ी सेल वाइन और बियर की ही थी। यद्यपि सामान उसने और भी कई किस्म का रखा हुआ था। जैसे कि चाकलेट, स्वीट्स, मुरमुरे-कुरकुरे आदि। आइसक्रीम का फ्रीज़र भी था। निरोध भी रखे हुए थे जो कि रात के समय बिक जाते थे।
दुकान के पीछे स्टॉक रूम था जहाँ से ला-ला कर सामान सैल्फों पर रखा जाता था। यहीं एक आदमकद शीशा भी लगा हुआ था। स्टॉक रूम में घुसनेवाला शीशे के सामने अवश्य खड़ा होता। सबकी आदत-सी बन गई थी। स्टॉक रूम के साथ ही एक और कमरा था, जहाँ सस्ता मिला सामान भरा पड़ा होता। दायीं ओर फ्लैट को जाता रास्ता था। दुकान के ऊपर और दो मंजि़लें थीं। एक मंजि़ल पर रसोई, एक सिटिंग रूम और एक बैडरूम था। तीन बैडरूम ऊपरली मंजि़ल पर थे। फ्लैट में जाने के लिए रास्ता दुकान में से होकर जाता था और रोड पर भी एक दरवाजा था। दुकान बंद होती तो वही दरवाजा प्रयोग में लाया जाता। शैरन और हरविंदर स्कूल से लौटते तो दुकान में से ही ऊपर फ्लैट में जाते थे, पर स्कूल वे साइड-डोर से ही जाते थे।
कभी-कभी गुरिंदर खिड़की में आ खड़ी होती और कितनी-कितनी देर वहाँ खड़ी होकर बाहर राउंड-अबाउट से गुजरती कारों को देखती रहती। अजमेर देखता तो पूछता–
“क्या देख रही है ?”
“लंदन।”
“लंदन यहाँ से क्या दिखेगा।”
“और तो तुम कहीं ले नहीं जाते, मैंने सोचा यहीं से देख लूँ।”
“मैं दुकान चलाऊँ कि तुझे लंदन घुमाऊँ?”
“मुझे न घुमाओ, कभी बच्चों को कहीं ले जाओ तो क्या हो जाएगा।”
“मेरे पास टाइम नहीं, जा तू ले जा।”
“मैंने लंदन का कुछ देखा हो तो इन्हें लेकर जाऊँ। मुझे तो इस दुकान का ही पता है। कभी नीचे, कभी रसोई में... निरी कै़द!”
(क्रमश: जारी…)


लेखक संपर्क :
67, हिल साइड रोड,
साउथहाल, मिडिलसेक्स
इंग्लैंड
दूरभाष : 020-85780393
07782-265726(मोबाइल)
ई-मेल : harjeetatwal@yahoo.co.uk





अनुरोध
“गवाक्ष” में उन सभी प्रवासी लेखकों/कवियों की समकालीन रचनाओं का स्वागत है जो अपने वतन हिंदुस्तान की मिट्टी से कोसों दूर बैठ अपने समय और समाज के यथार्थ को हिंदी अथवा पंजाबी भाषा में अपनी रचनाओं के माध्यम से रेखांकित कर रहे हैं। रचनाएं ‘कृतिदेव’ अथवा ‘शुषा’ फोन्ट में हों या फिर यूनिकोड में। रचना के साथ अपना परिचय, फोटो, पूरा पता, टेलीफोन नंबर और ई-मेल आई डी भी भेजें। रचनाएं ई-मेल से भेजने के लिए हमारा ई-मेल आई डी है- gavaaksh@gmail.com

शनिवार, 8 मार्च 2008

गवाक्ष- मार्च 2008


“गवाक्ष” के माध्यम से हम हिन्दी ब्लाग-प्रेमियों को हिन्दी/पंजाबी के उन प्रवासी लेखकों/कवियों की समकालीन रचनाओं से रू-ब-रू करवाने का प्रयास कर रहे हैं जो अपने वतन हिन्दुस्तान से कोसों दूर बैठकर अपने समय और समाज के यथार्थ को अपनी रचनाओं में रेखांकित कर रहे हैं। “गवाक्ष” के पिछ्ले दो अंकों में पंजाबी कवि विशाल (इटली) की कविताओं का हिन्दी अनुवाद, दिव्या माथुर (लंदन) की कहानी, अनिल जनविजय (मास्को) की कविताएं तथा लंदन में रह रहे पंजाबी कथाकार-उपन्यासकार हरजीत अटवाल के उपन्यास “सवारी” के हिंदी अनुवाद की पहली किस्त आपने पढ़ी। “गवाक्ष” के इस अंक में प्रस्तुत हैं – न्यू जर्सी, यू.एस.ए. में रह रहीं देवी नागरानी की पाँच ग़ज़लें और हरजीत अटवाल के धारावाहिक पंजाबी उपन्यास “सवारी” की दूसरी किस्त का हिंदी अनुवाद…

पाँच ग़ज़लें
देवी नागरानी(न्यू जर्सी, यू.एस.ए.)

(1)


डर उसे फिर न रात का होगा
जब ज़मीर उसका जागता होगा

क़द्र वो जानता है खुशियों की
ग़म से रखता जो वास्ता होगा

बात दिल की निगाह कह देगी
चुप जु़बाँ गर रहे तो क्या होगा

क्या बताएगा स्वाद सुख का वो
ग़म का जिसको न ज़ायका होगा

सुलह कैसे करें अँधेरों से
रौशनी से भी सामना होगा

मिलना जुलना है ‘देवी’ दरया से
पर किनारों में फ़ासला होगा


(2)


झूठ सच के बयान में रक्खा
बिक गया जो दुकान में रक्खा

क्या निभाएगा प्यार वह जिसने
ख़ुदपरस्ती को ध्यान में रक्खा

ढूँढ़ते थे वजूद को अपने
भूले हम, किस मकान में रक्खा

जिसने भी मस्लहत से काम लिया
उसने ख़ुद को अमान में रक्खा

जो भी जैसा है ठीक ही तो है
कुछ नहीं झूठी शान में रक्खा

ज़िंदगी तो है बे–वफ़ा ‘देवी’
इसने मुझको गुमान में रक्खा

(3)

दिल को हम कब उदास करते हैं
आज भी उनकी आस करते हैं

हमको ढूँढ़ो नहीं मकानों में
हम दिलों में निवास करते हैं

पहले खुद ही उदास रहते थे
अब वो सबको उदास करते हैं

चढ़के काँधों पे हो गए ऊँचे
इस तरह भी विकास करते हैं

इ​त्तिफ़ाकन निगाह उट्ठी थी
लोग क्या-क्या क़यास करत हैं

(4)


ख़यालो-ख़्वाब में ही महफिलें सजाता है
और उसके बाद उदासी में डूब जाता है

वो चाहता है के नज्दीक रहूँ मैं उसके
क़रीब जाऊँ तो फिर फ़ासले बढ़ाता है

कुछ ऐसे भाए हैं रस्तों के पेचोख़म उसको
क़रीब जाके भी मंजि़ल के लौट आता है

किसी ज़ुबान के शब्दों से उसको नफ़रत है
किसी के धर्म पे उँगली भी वो उठाता है

वो रूठ जाता है यूँ भी कभी-कभी मुझसे
कभी-कभी तो मिरे नाज़ भी उठाता है

(5)



चोट ताज़ा कभी जो खाते हैं
ज़ख्मे-दिल और मुस्कराते हैं

मयकशी से ग़रज नहीं हमको
तेरी आँखों में डूब जाते हैं

जिनको वीरानियाँ ही रास आईं
कब नई बस्तियाँ बसाते हैं

शाम होते ही तेरी यादों के
दीप आँखों में झिलमिलाते हैं

कुछ तो गुस्ताख़ियों की मुहलत दो
अपनी पलकों को हम झुकाते हैं

तुम तो तूफ़ाँ से बच गई ‘देवी’
लोग साहिल पे डूब जाते हैं


जन्म : 11 मई 1941, कराची में।
शिक्षा : बी.ए. अर्ली चाइल्डहुड में, न्यू जर्सी।
सम्प्रति : शिक्षिका, न्यू जर्सी, यू.एस.ए.
कृतियाँ : गम से भीगी ख़ुशी(ग़ज़ल संग्रह– सिंधी में)
चरागे-दिल(ग़ज़ल संग्रह– हिंदी में)
ई मेल : devi1941@yahoo.com




धारावाहिक पंजाबी उपन्यास(किस्त- 2)

सवारी
हरजीत अटवाल
हिंदी अनुवाद : सुभाष नीरव


।। दो ।।

सिमरन से जुदा होने के बाद बलदेव का मूड कुछ बदल गया था। अधिक घूमना-फिरना उसे अब पहले जैसा अच्छा नहीं लगता था। रिवर थेम्ज़ ही थी जो उसे अंदर से निकाल लेती, नहीं तो वह कहीं भी न
जाता, कमरे के भीतर ही बैठा रहता। आयरलैंड जाने की योजना भी शौन की ही थी। वह तो जैसे ‘हाँ’ करके ही फंस गया था। शौन ने कहा था – ‘चल, दो सप्ताह के लिए आयरलैंड चलें।' प्रत्युत्तर में उसने कह दिया था– ‘चल।' जब शौन इंडिया गया तब भी ऐसा ही हुआ था। बलदेव ने सहज भाव में कहा था– ‘आ, इंडिया का चक्कर लगा आएं।' और शौन चल पड़ा था।
उसका शौन को ‘हाँ’ करने के पीछे यह भी एक कारण था कि शौन के जाने के बाद वह कैरन के पास अकेला कैसे रह सकता था। लगभग साल हो गया था उसे शौन और कैरन के संग रहते हुए। वह अब सोचता था कि यहाँ से मूव कर जाए। अपना घर या फ्लैट ले ले। मूव होने का ख़याल पिछले कुछ महीनों से कुछ अधिक ही पीछा कर रहा था, जब से कैरन और शौन के मध्य लड़ाई-झगड़ा रहने लगा था। लंदन से आयरलैंड के लिए चलते समय भी बलदेव ने शौन को कह दिया था –
“शौन, वापस लौटकर मैं कहीं और मूव हो जाऊँगा।"
“जैसी तेरी इच्छा।"
पहले की भांति उसने रुक जाने के लिए जोर नहीं डाला था।
लंदन से चलते समय उसका मूड इतना लम्बा सफ़र करने का कतई नहीं था, पर जब शौन ने कार मोटर-वे पर चढ़ाई तो बलदेव को जैसे चाव-सा चढ़ आया। घर से ही एक-एक पैग पीकर चले थे। बोतल पास थी। एक-एक चलती कार में ही बना लिया तो बलदेव ने रेडियो की आवाज़ ऊँची कर दी। उसकी मनपसंद सिंगर बलौंडी का गीत चल रहा था– ‘टाइड इज़ हाई बट आय एम होल्डिंग आन।’ शौन बोला–
“भाजी, बस ऐसे ही, ऐसे ही रहा कर... खुशी से भरा हुआ।"
“शौन, तू तो जानता ही है कि मैं कभी भी कोई प्रोग्राम प्लैन नहीं करता। जिंदगी जैसे आती है, उसे वैसे ही स्वीकार किए जाता है।"
“ठीक है पर डेव, यह बहुत अच्छी बात नहीं। प्लैन करना चाहिए।"
“तूने बहुत प्लैन कर- करके देख लिए, तू मेरे से कहाँ बेहतर है! तू भी पत्नी का सताया हुआ और मैं भी।"
उसकी बात सुनकर शौन जोर से हँसा और बलदेव भी।
वे सुबह के चले लगभग दोपहर के समय वेल्ज़ जा पहुँचे। एक पब में रुक कर बियर पी और आगे चल दिए। पहले से टिकटें बुक न कराई होने के कारण ज़रा जल्दी फिशगार्ड पहुँचना चाहते थे, पर करते-कराते देर हो ही गई। रात के बारह बज गए थे बंदरगाह पर पहुँचते। सैकड़ों की गिनती में गाडि़याँ खड़ी होकर फैरी में चढ़ने की प्रतीक्षा कर रही थीं। कारें, वैनें और लारियाँ। शौन ने दौड़-भाग करके टिकट लिए। कार को पेट्रोल से भरवाया क्योंकि आयरलैंड में पेट्रोल यहाँ से महंगा था। कार को उन्होंने लाइन में खड़ा कर लिया और इंतज़ार करने लगे।
तीन बजे फैरी को चलना था। एक बजे गाडि़या फैरी में चढ़नी आरंभ हो गईं। नीचे के मंजि़ल लारियों, बसों और बड़ी गाडि़यों की थी और ऊपर की दो मंजि़लें कारों के लिए। फैरी में चढ़ने का बलदेव का यह पहला अवसर नहीं था। फ्रांस वह फैरी से ही गया था, पर वह छोटा-सा सफ़र था। आधे घंटे का। यह फिशगार्ड से रसलेअर तक तो कई घंटों का सफ़र था।
उन्हें रसलेअर पहुँचने के लिए आम दिनों से ज्यादा वक्त लग गया। पहले मौसम साफ था, फिर खराब हो गया। समुद्र गुस्से में दहाड़ने लगा। लहरें फैरी के अंदर तक समुद्र का पानी फेंक जातीं। जहाज के हिचकोलों से लोग बेहाल हुए पड़े थे। उल्टियाँ करके फर्श गंदा कर डाला था। बलदेव उल्टी आदि से बच गया था। जीन के संग होने के कारण उस तरफ ध्यान ही नहीं गया था उसका।
फैरी के रसलेअर पहुँचने तक सूर्यास्त का समय था। बारिश होने के कारण भी अंधेरा जल्दी हो गया था। उसने जीन से विदा ली। वह पैदल जाने वाली भीड़ में शामिल हो गई। शौन और बलदेव अपनी कार की ओर आ गए। शौन कार में बैठते ही कुछ सूंघने लगा। बलदेव ने हँसते हुए कहा–
“मुझे तो मालूम ही नहीं था कि आयरश लड़कियाँ इतनी दरिया-दिल होती हैं।"
“अब तू इसे मर्सडीज़ कहेगा कि नहीं।"
“अगर कोई कार अपनी हो जाए तो उसकी किस्म तो नहीं बदल जाती।"
“डेव, इस मामले में तू बहुत कंजूस है। तुझे औरत की कद्र करनी नहीं आती।"
“शौन, यूं क्यों नहीं कहता कि मैं नरम होकर परख नहीं करता।"
बात करते-करते उनकी कार पुलिस चैकिंग तक पहुँच गई। पुलिसमैन ने सरसरी-सी नज़र दौड़ाई और बढ़ जाने का इशारा कर दिया। उन्होंने राहत की सांस ली। कुछ और आगे बढ़े तो बलदेव को जीन जाती हुई दिखाई दी। उसने शौन से कहा–
“वो देख जीन... ज़रा कार इसके बराबर रोक... पूछ लेते हैं अगर लिफ्ट की ज़रूरत हो तो...।"
शौन ने उसके बराबर जाकर कार को धीमा कर लिया। बलदेव ने कहा–
“हैलो जीन!”
जीन ने यूँ हाथ हिलाया मानो अजनबी आदमी को हाथ हिला रही हो। बलदेव ने फिर पूछा–
“यू फैंसी लिफ्ट ?”
“नो थैंक्स।"
कह का वह मुँह घुमाकर चलने लगी। बलदेव हैरान होकर कहने लगा–
“कमाल है!... इतनी जल्दी भूल गई। देख तो, कंधे उचकाती कैसे गुजर गई।"
शौन हँसा पर बोला कुछ नहीं। उसने कार दौड़ा ली। फिर उसने घड़ी देखते हुए कहा–
“हम वाटरफोर्ड पहुँचकर पब में बैठेंगे और वहीं कुछ खाएंगे।"
“तू ही मेरा वालीवारिस है, जैसा चाहे करता चल। पर रास्ते में कहीं गीनस तो पिलाएगा ही, बहुत थकान हुई पड़ी है।"
बलदेव को पता था कि आयरलैंड में गीनस लोगों को बहुत प्रिय है और हर बीमारी का इलाज गीनस को ही मानते हैं। रसलेअर से निकल कर वे मोटर-वे पर हो गए। आगे जाने पर एक पब आया तो वे रुक गए। दो-दो गिलास पिये, पर दो घंटे बैठे रहे। वक्त का पता ही न चला। फिर थकान भी इस तरह थी कि उठने को मन ही नहीं हो रहा था। घड़ी की ओर देखते हुए शौन उछलकर उठा और बोला–
“जल्दी कर डेव, हम तो बहुत लेट हो गए, हमें वाटरफोर्ड में रुकना है। बारह बजे तो पब बंद हो जाएगा, अभी रास्ता बहुत पड़ा है।"
“फिक्र न कर शौन, बियर न सही, व्हिस्की पी लेंगे।"
“आयरलैंड आकर भी व्हिस्की ही पियेगा ?”
कह कर शौन हँसने लगा।
बरसात यद्यपि बंद हो गई थी, लेकिन हवा अभी भी तेज थी। कार की रफ्तार ज्यादा होने के कारण हवा अधिक सांय-सांय कर रही थी। सड़क पर अंधेरा ही अंधेरा था। कार की लाइट में सडक कुछ गज तक ही नज़र आ रही थी। इंग्लैंड की तरह मोटर-वे पर रोड-लाइट का कोई इंतज़ाम नहीं था। वाटरफोर्ड पहुँचते-पहुँचते उन्हें बारह बज ही गए। शौन बोला–
“अब गीनस नहीं पी सकेंगे। अब कोई पबवाला सर्व नहीं करेगा। पर आ जा, कोशिश करके देखते हैं।"
कहकर उसने कार को एक पब के सामने रोक दिया। वे दोनों फुर्ती से पब में जा घुसे। काउंटर के पीछे खड़ा व्यक्ति तेज स्वर में कहने लगा–
“सॉरी मिस्टर्ज़, पब बंद हो चुका है।"
शौन ने बहुत मुलायम स्वर में कहा–
“यह मेरा दोस्त बहुत दूर से आया है। मैं जानता हूँ कि कुछ मिनट ऊपर हो गए हैं... पर अगर हमें एक गिलास गीनस का मिल जाए तो मेहरबानी होगी। हम अधिक समय नहीं लगाएंगे, हमारा वादा रहा।"
पबवाले ने बलदेव की ओर देखा और फिर शौन की तरफ और कहा–
“ठीक है, पर जल्दी करना।"
कहकर उसने पब में बैठे दूसरे लोगों की तरफ भी देखा क्योंकि पहले वह कइयों को इंकार कर चुका था। उसने फिर बलदेव से पूछा–
“तुम सेलर हो ?”
“नहीं।"
“तुम डॉक्टर हो ?”
“नहीं।"
बलदेव के पीछे ही शौन कहने लगा–
“यह बहुत बड़ा बिजनेसमैन है। यह यहाँ कोई फैक्ट्री खोलना चाहता है। जायजा लेने आया है इस शहर का।"
“वाटरफोर्ड जैसे छोटे शहर में भला क्या कोई फैक्ट्री खोलेगा!”
समीप खड़े किसी व्यक्ति ने हैरानी प्रकट की। शौन ने फिर कहा–
“अब ई.ई.सी. जो बन रही है। आयरलैंड को इससे बहुत मदद मिलेगी। फिर वाटरफोर्ड से अच्छा बंदरगाह कौन-सा हो सकता है, यूरोप से जुड़ने के लिए।"
शौन की दलील से सभी कीले गए। पब के मालिक ने फिर पूछा–
“किस चीज की फैक्ट्री खोलेगा ?”
“शायद कपड़े की।"
शौन ने एकदम उत्तर दिया। उसने यह उत्तर पहले से ही सोच रखा था। वे सभी उससे हाथ मिलाने लगे। उन्हें बलदेव बहुत अच्छा व्यक्ति दिखाई दे रहा था, जो कि शहर में रोज़गार ला रहा था। बलदेव बेंच पर बैठकर गीनस के घूंट भरता हुआ पब का निरीक्षण-सा करने लगा। छोटा-सा पब था। एक तरफ आयरलैंड का प्रमुख वाद्य हार्प पड़ा था। उसे ध्यान आया कि पब का नाम भी ‘द हार्प’ ही था। एक तरफ छोटी-सी स्टेज थी, जिस पर एक स्टूल पर गिटार जैसा कोई वाद्ययंत्र पड़ा था। बलदेव पब में उपस्थित लोगों के लिए आकर्षण का कारण बन चुका था। हर कोई उसकी तरफ देख रहा था। वह भी एक-एक व्यक्ति से नज़र मिलाता और मुस्करा कर उससे मेल-मिलाप का हुंकारा भरता।
फिर एक गंजे व्यक्ति ने स्टेज पर पड़ा वाद्य उठाया और उस पर उंगलियां फिराने लगा। धीरे-धीरे उसने ऐसी धुन छेड़ी कि सभी खुशी में शोर मचाने लग पड़े। फिर एक स्त्री माइक हाथ में पकड़े मंच पर आई और गाने लगी। कोई कंटरी-साइड धुन थी जैसी पुरानी अमेरिकन फिल्मों में हुआ करती है। इस गीत के बोल मस्ती भरे थे। कोई मल्लाह खौफ़नाक समुद्र में से वापस अपनी महबूबा के पास लौटा था। कुछेक लोग उठकर स्टेज के सामने खड़े होकर नाचने लगे। कुछ फ्लोर पर पैर मार-मार कर संगीत का साथ देने लगे।
बलदेव की थकावट कहीं गुम हो गई। वह कंधे हिला-हिलाकर संगीत का आनंद उठाने लगा। गाने वाली स्त्री में उसे गुरां का भ्रम हो रहा था। जब वह मुस्कराती तो गुरां जैसी लगती। उसने गीत समाप्त किया। सभी तालियाँ बजाने लगे। वह बलदेव के करीब आकर बोली–
“तू अपने मुल्क का कोई गीत गाएगा ?”
“नहीं, मैं नहीं गा सकता।"
बलदेव ने कहा तो शौन हँसने लगा। शौन जानता था कि वह गाएगा तो क्या, उसे तो संगीत से भी अधिक लगाव नहीं था। बलदेव ‘न-न’ कर रहा था कि उस स्त्री ने उसकी बांह पकड़ ली। वैसा ही गुरां जैसा नरम स्पर्श। बलदेव उस स्पर्श के पीछे चलता हुआ स्टेज पर जा पहुँचा। स्त्री ने माइक बलदेव के हाथ में थमा दिया। बलदेव ने चश्मा उतारा, उसे जेब में रखा और गाने लगा–
“भट्ठी वालिये चम्बे दिये डालिये
नी पीड़ां दा परागा भुन्न दे...।"
( भट्ठी वाली, चम्बे(पुष्प) की डाली, री दर्दो का हाड़ा भून दे...।)
उसने पूरे का पूरा गीत गा डाला। स्वर अधिक ऊँचा न उठा सकने के कारण वह पास से ही लौट आता था, पर वह गीत खत्म करके ही रुका। पब में बैठे सभी लोगों ने जोरदार तालियाँ बजाईं। उस स्त्री ने उसे अपनी बाहों में भर लिया। पब का मालिक अंदर से पब को बंद करता हुआ ऊँची आवाज़ में बोला–
इसी खुशी में एक-एक प्वाइंट मेरी तरफ से... फ्राम द हाउस...।"
शौन अवाक् हुआ खड़ा था कि बलदेव ने गीत गाया। बलदेव स्वयं भी हैरान था। वह सबका हीरो बना हुआ था। बारी-बारी लोग उससे हाथ मिला रहे थे। हर कोई उसके लिए ड्रिंक खरीदना चाहता था। कई अपने गिलासों में से घूंट भरने के लिए कर रहे थे। पब के मालिक ने दुबारा काउंटर खोल दिया। अब उसे पब बंद करने की कोई जल्दी नहीं थी।
उन्हें पब में से निकलते ढाई बज गए। शौन बुदबुदाया– “ब्लडी लेट!” फिर कार स्टार्ट करते हुए बोला–
“भाजी, तूने तो कमाल कर दिया।"
“हाँ, पर पता नहीं यह सब कैसे हो गया।"
“जैसे भी हुआ, पर मुझे नहीं पता था कि तू गा भी लेता है।"
यह तो मुझे भी आज ही पता चला। पता नहीं दिमाग के किस कोने में से निकलकर यह गीत सामने आ खड़ा हुआ।शौन उसे वाटरफोर्ड शहर के बारे में बता रहा था। बलदेव कोई ध्यान नहीं दे रहा था। फिर शौन उसके बिजनेसमैन होने की बात सूझने के बारे में बात करने लगा, लेकिन बलदेव तो उस गीत के बारे में सोचे जा रहा था जो कि गुरां का गीत था। वह हैरान था कि यह गीत कैसे शब्द-दर-शब्द उसके दिमाग में अंकित हो गया था और अब अचानक कैसे आ प्रकट हुआ था। न कभी उसने इस गीत को गुनगुनाया था और न ही कभी गौर किया था। उसने मन ही मन कहा, ‘गुरां, मुझे भी गाना आ गया।
।। तीन ।।

माहिलपुर का कालेज। आश्की के लिए ज़रखेज ज़मीन। इसी कालेज में जाने लगा था बलदेव।
वह घर से सम्पन्न था। पिता-भाई इंग्लैंड में थे। उन्होंने उसे कालेज जाने की खुशी में मोटर साइकिल ले दिया था। यद्यपि उसके गांव से सीधी बस माहिलपुर जाती थी, पर वह मोटर साइकिल ही दौड़ाये फिरता। दो लड़के रास्ते में उसके साथ हो जाते। मोटर साइकिल होने के कारण उसकी दोस्ती का दायरा भी जल्द ही बड़ा हो गया था। सवेरे बस-अड्डे पर जा खड़ा होता और फिर कालेज के गेट के सामने। ये उसके रोजाना के काम हो गए थे। शीघ्र ही वह ग्रुप बनाकर लड़ाई-झगड़ों में भी हिस्सा लेने लग पड़ा था।
घर में उसे रोकने-टोकने वाला कोई नहीं था। माँ मर चुकी थी। भैया-भाभी थे जो बड़ों वाले फर्ज़ तो निबाहते, पर आयु का फ़र्क कम होने के कारण उस पर रौब नहीं बना सके थे। शिंदा उससे सिर्फ दो साल बड़ा था। दोस्तों की तरह था। इकट्ठे मिलकर खेती करते थे, शराब निकालते थे और हुड़दंग मचाते थे। शिंदा अगर कोई बात करता तो उसे सलाह देने जैसी ही करता। कालेज जाते ही बलदेव ने खेती का काम छोड़ दिया था। शिंदा एक बार भी उसे जोर देकर नहीं कह सका था कि वह उसकी मदद किया करे। उसकी भाभी थी, अगर किसी बात पर खीझी होती तो उसके बेटे गागू को मोटर साइकिल पर बिठाकर दो चक्कर लगवा देता, वह खुश हो जाती।
पंडोरी माहिलपुर से दूर नहीं है। पश्चिम की ओर सिर्फ चार मील। माहिलपुर की खबर गांव में पहुँचती तो लोग तरह-तरह की बातें करने लगते कि यह लड़का कहीं न कहीं खता खाएगा। लोग शिंदे से कहते। शिंदा उसे समझाने लगता, पर बलदेव एक कान से सुनकर दूसरे से निकाल देता।
कालेज में यूथ फेस्टिवल के दिन थे। बलदेव को इसमें कोई दिलचस्पी नहीं थी। उसने अपने मित्रों के साथ होशियारपुर फिर देखने के लिए निकलना था, पर किसी बात पर लेट हो गए। यूँ ही वक्त काटने के लिए पंडाल में जा घुसे। कविता पाठ की प्रतियोगिता चल रही थी। भाग लेने वाले विद्यार्थी बारी-बारी से कविता पढ़ रहे थे। बलदेव की मंडली पीछे बैठकर बातें कर रही थी, जिससे पंडाल का ध्यान भंग हो रहा था। स्टेज सचिव ने कई बार उन्हें चुप भी करवाया लेकिन बेअसर रहा। तभी एक लड़की स्टेज पर आई। उसने माइकवाला स्टैंड पकड़ा और मुँह ऊपर उठाकर आँखें मूंदकर हेक लगाई– “भट्ठी वालिये, चम्बे दिये डालिये... नी पीड़ां दा परागा भुन्न दे...।"
सारा पंडाल शांत हो गया। बलदेव तो जैसे कील दिया गया हो। पास बैठा तेजा कहने लगा–
“अरे यह तो गुरां है ... चक्क वाली... यह तो भई बढ़कर निकली, लगती नहीं थी।"
बलदेव को तेजा की बात सुनाई नहीं दी थी। वह तो गुरां को सुन रहा था। वह गुरां को देख रहा था। उसकी लम्बी गर्दन में से होकर निकलता एक-एक शब्द उसको मस्त किए जा रहा था। उसका गीत समाप्त हुआ। अनाउंसर ने कुछ कहा। गुरां के बाद अगले विद्यार्थी की बारी आई। लेकिन बलदेव को अभी भी वही गीत सुनाई दे रहा था। उसके दोस्त उसे फिल्म देखने जाने के लिए उठाने लगे। अगले शो का समय हो रहा था। पहुँचना भी होशियारपुर था। पर वह न उठा। मंच की तरफ ही देखे जा रहा था। दोस्तों से कहने लगा–
“छोड़ो यारो फिल्म... ये यूथ फेस्टिवल देखते हैं, फिल्म तो कल भी देखी जा सकती है।"
बलदेव की बात सुनकर वे सब बैठ गए। बलदेव की नज़रें गुरां को खोज रही थीं। वह न जाने कहाँ जा छिपी थी। फिर प्रतियोगिता के परिणाम की घोषणा हुई। गुरां को इसमें फर्स्ट प्राइज़ मिला था। तालियों से सारा पंडाल गूंजने लगा, पर बलदेव जस का तस बैठा रहा। किसी ने कहा–
“पता नहीं यार, यह ईनाम कैसे ले गई। चलती तो गर्दन झुका कर है।"
फिर जब गुरां ने ईनाम लिया तो बलदेव अपने हाथों की तरफ देखने लगा। गुरां ईनाम लेकर चली गई। लेकिन बलदेव ज्यों का त्यों बैठा रहा। यूथ फेस्टिवल के समाप्त होने पर उसे दोस्तों ने पकड़कर उठाया।
उस दिन के बाद बलदेव बदल गया। खामोश रहने लगा। पहले वाली जल्दबाजी खत्म हो गई। मोटर साइकिल की स्पीड कम हो गई। बस-अड्डे पर जाकर खड़ा होना बंद कर दिया। दोस्त राहों में खड़े होकर उसका इंतज़ार करते रहते, वह दूसरी तरफ से निकल जाता। गुरां की तरफ दूर से खड़े होकर देखता रहता। कक्षा में भी ऐसी जगह पर बैठता जहाँ से गुरां दिखाई देती हो। गुरां इस बात से बेखबर थी, पर बलदेव को इस बात की परवाह नहीं थी कि गुरां उसकी तरफ देखती थी कि नहीं। बस, वह उसकी ओर देखता रहता।
यह जज्बा जिसे वह पाल बैठा था, कभी-कभी उसको बहुत आनंदमयी लगता और कितनी-कितनी देर वह आनंदित हुआ घूमता रहता। लेकिन कभी-कभी खीझने भी लगता कि कैसी बीमारी लगा ली थी उसने।
एक दिन शराब पीते हुए शिंदे ने पूछा–
“तेरी तबीयत तो ठीक है ?”
“हाँ, ठीक है।"
“फिर यह खोया-खोया-सा क्यों बना फिरता है ?”
“कुछ नहीं यार, यूँ ही...।"
“अगर कुछ नहीं तो मैंने यह गुड़ की इतनी ज़बरदस्त चीज बनाई है, एकबार भी नहीं कहा तूने।"
“यार शिंदे, एक लड़की देखी है...।"
“पसंद है ?”
“यार, पसंद वाली बात तो बहुत छोटी है।"
“चक दे फट्टे ! देखता क्या है, अपना ट्यूबवैल वाला कोठा सही जगह पर है।"
“छोड़ यार, तू उल्टी बात कर रहा है।"
“फिर तूने लड़की पूजा करने के लिए देखी है !”
बलदेव ने उसकी बात का जवाब नहीं दिया। उसे लग रहा था कि उसकी यह बात किसी से करने वाली थी ही नहीं। उसके दोस्त भी उल्टा-सीधा बोलने लगते थे। उसने एक-दो बार जब कहा कि गुरां की आवाज़ उसके कानों में अचानक गूंजने लगती है, तो सब उस पर हँसने लगते।
गुरां इस सारे घटनाचक्र से अनजान थी। वह चक्क से सवेरे साइकिल से आती और चुपचाप शाम को लौट जाती। राह में कभी वह रुकी नहीं थी। किसी से फालतू बात नहीं की थी। कक्षा में भी लड़कियों के बीच में होकर बैठती। कक्षा में कौन-कौन सा लड़का था, उसे कुछ मालूम नहीं था। कालेज आने का उसका मकसद सिर्फ पढ़ना था। उसका बाप बहुत साधारण किसान था जो उसे बहुत मुश्किल से पढ़ा रहा था। गुरां का छोटा भाई था जो कि पढ़ नहीं सका था। माँ-बाप की इच्छा थी कि लड़की ही पढ़-लिख जाए। गुरां का लक्ष्य बी.ए.,बी.एड करके अध्यापिका बनने का था। वह इस लक्ष्य के पीछे चलती अपने आसपास को अनदेखा करती आ रही थी।
मैडम फ्लौरा यूथ फेस्टिवल की तैयारी में जुटी हुई थी। वह कालेज के नये विद्यार्थियों में से टेलेण्ट तलाशने निकली तो उसने गुरां के कंधे पर आकर हाथ रखा। गुरां के साथ स्कूल से आई लड़कियों ने गुरां के गाने के बारे में बता दिया था। गुरां सोचती थी कि स्कूल में तो बचपन था, वहाँ लोगों में गाना और बात थी, पर कालेज अलग जगह थी। अब वह बड़ी हो चुकी थी। पूरी औरत थी। लोगों के सामने गाना ठीक नहीं था। और फिर, उसका लक्ष्य तो पढ़ना था, गाना नहीं। उसने मैडम को मना कर दिया। मैडम रिहर्सल करने के लिए दबाव डालने लगी कि गाकर देख ले, अगर पसंद न आए तो न गाये। पर जब उसने कुछेक रिहर्सलें कीं तो उसे यह सब पसंद आने लगा। यह सबकुछ नया-नया और स्कूल से बहुत भिन्न था। मैडम ने उससे कई गीत गवा कर देखे। अंत में, ‘भट्ठी वालिये...’ ही पसंद किया गया। कालेज की स्टेज से गाती तो विद्यार्थी उसे शांत होकर सुनते।
यूथ फेस्टिवल में से जीते ईनाम ने उसकी कालेज में वाह-वाह करवा दी। मंच के प्रधान ने तो यहाँ तक कह दिया कि इस गीत का गीतकार भी शायद इतने बढ़िया ढंग से न गा सका हो, जैसा गीत गुरां ने गाया था। कालेज की वह विशेष विद्यार्थी बन गई थी। उसके मन में थोड़ा अंहकार भी आने लगा था। वह थोड़ा बन-संवर कर भी रहने लगी। कालेज के कितने ही लड़के उस पर जान छिड़कते थे। उससे बात करने का बहाना खोजते थे। हिम्मत वाले लड़के प्यार का इजहार भी करने लगते। पर उसने किसी तरफ ध्यान नहीं दिया और अपनी राह पर चलती चली गई। प्रथम वर्ष अच्छे अंकों में पास हो गई।
पास तो बलदेव भी हो गया था पर मुश्किल से ही। उसकी एक अन्य समस्या थी कि वह इंग्लैंड की तरफ देख रहा था कि कोई न कोई सबब बनेगा ही। भाई किसी ने किसी तरह भिजवा ही देखा वहाँ।
उसका भाई शिंदा एक दिन कहने लगा–
“बलदेव, ये तू लड़कियों के चक्कर में न फंस जाना... यह अपने प्रोफेसर की तरह कोई पंगा न ले बैठना...कालेज में ध्यान से रहना चाहिए। देखने-दिखाने में तू चंगा है, खुरली पर खड़ा ही लाख का है, कोई न कोई बाहर का रिश्ता हो ही जाएगा। नहीं तो उधर से वे भी जोर लगाएंगे ही, पर तू ध्यान से रह।"
बलदेव ने कोई उत्तर न दिया। वह सोच रहा था कि शिंदे की किस बात का जवाब दे, जवाब कोई था ही नहीं। वह किसी लड़की के चक्कर में था ही नहीं। वह तो बस गुरां को दूर से देखा करता था, इससे अधिक कुछ नहीं था। पूरा साल यूँ ही गुजर गया।
उसकी यह हालत सफ़र करती-करती गुरां तक भी पहुँच गई। उसके लिए यह बात कोई नई बात नहीं थी। कितने ही दीवाने थे उसके। कई उसे राह में चलती को आवाज़ें भी कसते। कइयों ने तो उसका नाम ही ‘भट्ठी वाली’ रख छोड़ा था। उसे पता था कि कई खामोश आशिक भी होंगे। लेकिन उसे इन बातों से कोई सरोकार नहीं था। उसने तो अपनी पढ़ाई पूरी करनी थी। फिर भी उसने सोचा कि एक नज़र बलदेव को देखे तो सही। लम्बा-चौड़ा बलदेव, बड़ी-बड़ी आँखें, गोल चेहरा, भरवीं दाढ़ी और खड़े सिर के बाल। उसे अच्छा लगा। उसी पल उसने सोचा कि अच्छे-बुरे से उसे क्या लेना था।
बलदेव ने कालेज चक्क की तरफ से होकर जाना प्रारंभ कर दिया था जबकि चक्क माहिलपुर के दूसरी ओर पड़ता था और उसको कई मील का सफ़र अधिक तय करना पड़ता था। उसे अधिक सफ़र हो जाने से कुछ नहीं था, उसने तो एक नज़र गुरां को देखना होता था। गुरां साइकिल पर जा रही होती और वह मोटर साइकिल धीमी करके उसके करीब से निकल जाता। अब तक गुरां भी उसके मोटर साइकिल की आवाज़ पहचानने लग पड़ी थी। पास आते ही आवाज बदलने लगती।
फिर वह इस आवाज़ की प्रतीक्षा करने लगी। अगर आवाज़ न सुनाई देती तो उसे बेचैनी होने लगती। फिर वह बलदेव को क्लास में आते-जाते देखने लगी और मन ही मन हँसती कि इतना बड़ा आदमी है, पर ज़रा-सी बात करने की हिम्मत नहीं। कभी-कभी उसका दिल करता कि वह स्वयं ही बलदेव को बुला ले, पर ऐसा वह नहीं कर सकती थी। ऐसा उसने नहीं करना था। अब इतना अवश्य हो गया था कि अगर वह गाने के लिए स्टेज पर चढ़ती तो सबसे पहले उसकी नज़रें बलदेव को खोजने लगतीं और आखिर एक कोने में बैठे को वे खोज ही लेतीं। वह पहले की भांति आँखें मूंदकर गाती और बीच-बीच में आँखें खोलकर बलदेव की तरफ देखती। बलदेव की आँखों की प्यास उसके अंदर उथल-पुथल मचाने लगती। कई बार उसका ध्यान भी उखड़ जाता और वह कुछ गलत भी गा जाती, जिसके बारे में बाद में कोई सहेली या मैडम उसे बताती। वह उनकी बात सुनने के बजाय बलदेव के बारे में सोचने लगती।
एक दिन अपने घर में खड़ी वह अपने आंगन को देख रही थी कि यह आंगन कहीं बलदेव के लिए छोटा तो नहीं पड़ जाएगा। वह उसी वक्त अपने आप को झिड़कने लगी कि वह यह क्या फिजूल का सोचे जा रही थी।
उसे बलदेव के ख़याल रह-रह कर आने लगते। जितना वह खुद को बरजती या रोकती, उतना ही अधिक तंग होती। कई बार वह पसीने-पसीने हो जाती। उसे भय सताने लगता कि कोई बीमारी ही न लगा बैठे। उसका दिल करता कि इस बारे में किसी सहेली से ही मिलकर बात करे ताकि मन का बोझ हल्का हो सके। लेकिन वह डर जाती कि बात कहीं फैल ही न जाए। बलदेव को ही न मालूम हो जाए। कई बार यह भी सोचती कि क्यों न बलदेव से ही सारी बात करे। उसे सबकुछ बताए। शायद इसके अच्छे नतीजे ही निकलें। सोच-सोच कर वह पागल होने लगती। और एक दिन उसकी सारी समस्याओं का हल निकल आया। उसके माँ-बाप ने उसके लिए कोई लड़का पसंद कर लिया था और विवाह भी दस दिन बाद का रख दिया था।
(क्रमश: जारी…)

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गुरुवार, 21 फ़रवरी 2008

गवाक्ष- फरवरी 2008



“गवाक्ष” के माध्यम से हम हिन्दी ब्लाग-प्रेमियों को हिन्दी/पंजाबी के उन प्रवासी लेखकों/कवियों की समकालीन रचनाओं से रू-ब-रू करवाने का प्रयास कर रहे हैं जो अपने वतन हिन्दुस्तान से कोसों दूर बैठकर अपने समय और समाज के यथार्थ को अपनी रचनाओं में रेखांकित कर रहे हैं। “गवाक्ष” के प्रवेशांक(जनवरी 2008) में हमने इटली में रह रहे पंजाबी कवि विशाल की कविताओं का हिन्दी अनुवाद तथा लंदन में रह रहीं हिन्दी की जानी-मानी लेखिका दिव्या माथुर की कहानी- “खल्लास” प्रस्तुत की थी। इस अंक में प्रस्तुत हैं- मास्को में रह रहे हिन्दी के जाने-माने कवि अनिल जनविजय की कुछ कविताएं । इसके साथ ही, इस अंक से लंदन में रह रहे पंजाबी कथाकार-उपन्यासकार हरजीत अटवाल के उपन्यास “सवारी” के हिंदी अनुवाद का धारावाहिक प्रकाशन प्रारंभ करने जा रहे हैं।


छह हिंदी कविताएं
अनिल जनविजय


(1) माँ के बारे में


माँ
तुम कभी नहीं हारीं
कहीं नहीं हारीं
जीतती रहीं
अंत तक निरंतर

कच कच कर
टूट कर बिखरते हुए
बार-बार
गिरकर उठते हुए
घमासान युद्ध तुम लड़ती रहीं
द्वंद्व के अनन्त मोर्चों पर

तुम कभी नहीं डरीं
दहकती रहीं
अनबुझ सफेद आग बन
लहकती रहीं
तुम्हारे भीतर जीने की ललक
चुनौती बनी रहीं
तुम जुल्मीं दिनों के सामने

चक्की की तरह
घूमते रहे दिन-रात
पिसती रहीं तुम
कराही नहीं, तड़पी नहीं
करती रहीं चुपचाप संतापित संघर्ष
जब तक तुम रहीं

और एक दिन तुम
आसमान में उड़ीं
उड़ती रहीं, बढ़ती रहीं
अनन्त को चली गईं
खो गईं…।
0

(2) समुद्र और तुम और मैं
(गगन गिल के लिए)

मैं ही तुम्हें
ले गया था पहली बार
समुद्र दिखाने
तुम परेशान हुई थीं उसे देखकर

चुप गुमसुम खड़ी रह गई थीं
खामोश बिल्ली की तरह तुम
और समुद्र बेहद उत्साह में था

बार-बार
आकर छेड़ता था वह
आमंत्रित करता था तुम्हें
अपने साथ खेलने के लिए
तुमसे बात करना चाहता था देर तक
नंगी रेत पर तुम्हें बैठाकर
अपनी कविताएं सुनाना चाहता था
और तुम्हारी सुनना

वह चाहता था
तुम्हारे साथ कूदना
उन बच्चों की तरह
जो गेंद की तरह उछल रहे थे
समुद्र के कंधों पर

सीमाएं तोड़कर
एक सम्बन्ध स्थापित
करना चाहता था तुमसे
परिवार-सुख के लिए

साप्ताहिक अवकाश का दिन था वह
आकाश पर लदी सफेद चिड़ियाँ
उदासी की शक्ल में नीचे उतर आई थीं
और हम भीग गए थे

कितना खुश था उस दिन समुद्र
तुम्हारे नन्हें पैरों को
स्पर्श कर रहा था
तुम्हारी आंखों में उभर रहे
आश्चर्य को देख रहा था
अनुभव कर रहा था
अपने व्यक्तित्व का विस्तार

वह व्याकुल हो गया था
वह तरंग में था
नहाना चाहता था तुम्हारे साथ
बूँदों के रूप में छिपकर
बैठ जाना चाहता था तुम्हारे शरीर में

आँकने लगा था वह
अपने भीतर उमड़ती लहरों का वेग
उसके पोर-पोर में समा गई थी
शिशु की खिलखिलाहट

अपने आप से अभिभूत वह बढ़ा
बढ़ा वह
और सदा के लिए
तुम्हें अपनी बांहों के विस्तार में
समेट लिया था उसने

और आज मैं
अकेला खड़ा हूँ
उसी जगह
समुद्र के किनारे
जहाँ मैं ले गया था तुम्हें
पहली बार।
0

(3) कवि की ऊष्मा
(एक संस्मरण)

दिसम्बर की एक बेहद सर्द शाम
हापुड़ से लौट रहा हूँ दिल्ली
बाबा नागार्जुन के साथ
बहुत थोड़े से लोग हैं, रेल के डिब्बे में
अपने-अपने में सिकुड़े
खांसते-खंखारते

टूटी खिड़कियों की दरारों से
भीतर चले आते हैं
ठंडी हवा के झोंकें
चीरते चले जाते हैं हड्डियों को
सिसकारियाँ भरकर रह जाते हैं मुसाफिर
अपने में ही और अधिक सिकुड़ जाते हैं

अचानक कहने लगते हैं बाबा-
“माँ की गोद की तरह गर्म है मेरा कम्बल
बहन के प्यार की तरह ऊष्म
इसमें घुस कर बैठते हैं हम
जैसे कि बैठे हों घोर सर्द रात में
अलाव के किनारे…”

“अलाव की हल्की आँच है कम्बल
कश्मीर की ठंड में कोयले की सिगड़ी है
सर्दियों की ठिठुरती सुबह में
सूरज की गुनगुनी धूप है…”

बाबा अपने लाल नर्म कम्बल को
प्यार से थपथपाते हैं
जैसे कोई नन्हा बच्चा हो गोद में
और किलकते हैं –

“भई, मुनि जनविजय !
मेरी किसी कविता से
कम नहीं है यह कम्वल
सर्दियों की ठंडी रातों में
जब निकलता है यात्राओं पर यह बूढ़ा
तो यही कम्वल
इन बूढ़ी हड्डियों को अकड़ने से बचाता है
रक्त को रखता है गर्म
उँगलियों को गतिशील
ताकि मैं लिख सकूँ कविता…
इसमें घुसकर मैं पाता हूँ आराम
मानो बैठा हूँ अपनी युवा पत्नी के साथ
पत्नी का आगोश है कम्वल
पत्नी के बाद अब यह कम्बल ही
मेरे सुख-दुख का साथी है सच्चा…”

इतना कहते-कहते
अचानक उठ खड़े होते हैं बाबा
अपने शरीर से झटकते हैं कम्वल
और ओढ़ा देते हैं उसे
सामने की सीट पर
सिकुड़कर लेटी
एक युवा मज़दूरिन माँ को
जिसकी छाती से चिपका है नवजात-शिशु

फिर खुद सिकुड़कर बैठ जाते हैं बाबा
बगल में घुसाकर अपने हाथ
बेहद सहजता के साथ

मस्त हैं अपने इस करतब पर
आँखों में स्नेहपूर्ण चमक है
एक खुशी, एक उल्लास, उत्साह है, सुख है
मोतियों की तरह चमकते
दो आँसू हैं
बेहद अपनापन है
बाबा की उन गीली आँखों में।
0


(4) यौवन की स्मृति


क्या अब भी तुम कविता लिखती हो, ससि रानी
क्या अब भी कोई कहता है तुम्हें ‘मसि रानी’

क्या अब भी तुम्हें कोई यह दिल्ली शहर घुमाता है
नाव तुम्हारी खेकर यमुना से नगर की छवि दिखाता है

क्या अब भी तुम्हें कोई जीवन का पाठ पढ़ाता है
कभी प्रसूतिगृह तो कभी श्मशानघाट ले जाता है

क्या अब भी तुम वैसी ही हो दुबली-पतली
क्या अब भी तुम्हें हर रोज़ होती है मतली

मैं तो अब बूढ़ा हो गया साठ बरस का
पर याद मुझे हो तुम वैसी ही,जैसे तितली

कहाँ हो तुम अब, कैसी हो तुम, ओ मिस रानी!
मैं आज भी तुम्हें याद करता हूँ मसि रानी !

(5) विरह-गान
(कवि उदय प्रकाश के लिए)


दुख भरी तेरी कथा
तेरे जीवन की व्यथा
सुनने को तैयार हूँ
मैं भी बेकरार हूँ

बरसों से तुझ से मिला नहीं
सूखा ठूँठ खड़ा हूँ मैं
एक पत्ता भी खिला नहीं

तू मेरा जीवन-जल था
रीढ़ मेरी, मेरा संबल था
अब तुझ से दूर पड़ा हूँ मैं।
0

(6) संदेसा




कई दिनों से ई-पत्र तुम्हारा नहीं मिला
कई दिनों से बहुत बुरा है मेरा हाल

कहाँ है तू, कहाँ खो गई अचानक
खोज रहा हूँ, ढ़ूँढ़ रहा हूँ मैं पूरा संजाल

क्या घटा है, क्या दुख गिरा है भहराकर
आता है मन में बस, अब एक यही सवाल

याद तेरी आती है मुझे खूब हहराकर
लगे, दूर है बहुत मस्क्वा से भोपाल

बहुत उदास हूँ, चेहरे की धुल गई हँसी है
कब मिलेगी इस तम में आशा की किरण

जब पत्र मिलेगा तेरा – तू राजी-खुशी है
दिन मेरा हुआ उस पल सोने का हिरण !
00

कवि संपर्क :
अनिल जनविजय
मास्को विश्वविद्यालय, मास्को
ई मेल : aniljanvijay@gmail.com



धारावाहिक पंजाबी उपन्यास(किस्त- 1)



सवारी
हरजीत अटवाल
हिंदी अनुवाद : सुभाष नीरव


।। एक ।।

आयरश-सी। यू.के. और आयरलैंड के मध्य सहस्र मीलों तक फैला समुद्र। कई लोग इसे प्रिय समुद्र भी कहते हैं और कई मौसम का गुलाम भी। यह शीघ्र ही मौसम के प्रभाव में आ जाता है। जैसा कि आज है। खुशगवार मौसम में यह समुद्र ऐसा है मानो यह समुद्र न होकर कोई झील हो।
अगस्त की भोर है। इतनी भोर कि अभी मछली ने भी खेलना प्रारंभ नहीं किया। फिर, पानी पर बैठी कालिमा धीरे-धीरे उठने लगी। दूर, कहीं पानी में हुई आवाज से कइयों ने अंदाजा लगा लिया कि यह व्हेल होगी। लोग लान्ज में से उठकर ऊपरवाले डैक पर जाने लगे। बलदेव ने शौन की तरफ देखा। वह अभी भी गहरी नींद में सोया पड़ा था। उसने अपने बैग को सिरहाना बना रखा था। बलदेव आहिस्ता से उठा और जैकेट डालते हुए वह भी डैक पर जा चढा। यह बड़ा-सा जहाज चलते हुए पानी में छोटी-छोटी लहरें उत्पन्न कर रहा था, ऐसा लग रहा था जैसे किसी खूबसूरत औरत के हँसने पर उसके गालों पर गडढ़े पड़ रहे हों। बलदेव डैक की रेलिंग पर झुकते हुए क्षितिज की ओर देखने लगा। एकबार तो उसके मन में आया कि काश, गुरां उसके साथ यहाँ होती।
पूरब का क्षितिज रक्तिम होने लगा। डैक पर घूमते कुछ यात्रियों ने कैमरे संभाल लिए। कुछ यूं ही एकटक देखे जा रहे थे। सूर्य की एक छोटी-सी फांक ने झांका। कालिमा के स्थान पर अब लालिमा समुद्र की सतह पर आ बैठी थी। फिर, देखते ही देखते, सूरज बच्चे की भांति छलांग लगाकर पूरे का पूरा बाहर आ गया। इस नजारे का जिक्र शौन ने कई बार किया था। बलदेव ने सूर्य उदित होते तो कई बार देखा था, परन्तु समुद्र में फैलती ऊषा की लालिमा पहली बार देख रहा था। न चिड़ियाँ चहचहाईं, न परिन्दों की कतारें सफ़र पर निकलीं। उसका दिल कर रहा था कि वह इस अनुभव को किसी के संग साझा करे।
बलदेव ने गर्दन घुमायी। एक खूबसूरत लड़की उसकी बगल में खड़ी इस दृश्य को देख रही थी। उसका आयरश चेहरा छोटे-छोटे खाकी बिंदियों से भरा पड़ा था। ये बारीक दाग उसके आयरश होने को और पक्का करते थे और उसकी कम आयु को भी। बलदेव को अपनी ओर देखते पाकर वह बोली–
“बहुत सुंदर !”
“हाँ, एकदम अद्भुत !”
“पहली बार देख रहे हो ?”
“हाँ, पहली बार। और तुम ?”
“मैं तो पहले भी देख चुकी हूँ, पर कई बार आज की तरह मौसम साफ नहीं होता। आज तो हम बहुत लक्की हैं।"
“हाँ।"
बलदेव ने कहा और खामोश हो गया। उसका ध्यान सूरज पर से हटकर उस लड़की की ओर हो रहा था। वह कहने लगा–
“इस सूर्योदय में तू भी बहुत खूबसूरत लग रही है।"
“सच !”
“हाँ।"
“तुम्हारे चश्मे का नंबर तो ठीक है ?”
वह लड़की हँसते हुए बोली। बलदेव झुंझला गया और उसका हाथ एकदम अपने चश्मे पर चला गया। लड़की ने पुन: कहा–
“मैं तो मजाक कर रही हूँ, बुरा मत मानना। क्या नाम है तुम्हारा ?"
“मेरा नाम डेव है और तेरा ?”
“मैं जीन हूँ। तुम आयरलैंड में रहते हो ?”
“नहीं, अपने दोस्त शौन के साथ घूमने जा रहा हूँ। लंदन में रहता हूँ मैं।"
“लंदन में किस इलाके में ?”
“करिक्कलवुड।"
“सच !... मैं भी वहाँ कुछ दिन रह कर आयी हूँ। छुट्टियों में।"
“वैसे कहाँ रहती हो ?”
“डबलिन।"
“फिर डबलिन वाली फैरी क्यों नहीं ली ?”
“वो फैरी मुझे लेट कर देती। कल मुझे कालेज जाना है।"
“क्या पढ़ती हो ?”
“मैं नर्सिंग का कोर्स कर रही हूँ।"
“बहुत खूब ! नर्सों की तो पहले ही बहुत कमी है। फिर तो लंदन में ही काम करोगी ?”
“नहीं, शायद मैं अमेरिका जाऊँ।"
फिर वे दोनों चुप हो गये और समुद्र की ओर देखने लगे। सूरज अब कुछ ऊपर उठ चुका था। मौसम सुहावना था। और भी बहुत सारे लोग डैक पर चढ़ आए थे। बात आगे बढ़ाने के लिए बलदेव बोला–
“मौसम अच्छा हो तो सफ़र करने का मज़ा ही कुछ और होता है।"
“हाँ, पर आज की फोर-कास्ट भी बहुत अच्छी नहीं है।"
“तुम अकेली हो ?”
“हाँ, अकेली हूँ। आगे रसलेअर से बस पकड़ूंगी और कुछ घंटों में डबलिन पहुँच जाऊँगी। मेरा घर डबलिन के निकट टारा गांव में है।"
“जीन, मेरे साथ पब में चलना पसंद करोगी ?”
“क्यों नहीं। पर अभी तो खुला भी नहीं होगा... और तुम बता रहे थे कि तुम्हारा दोस्त तुम्हारे साथ है।"
“दोस्त है शौन, पर उसके साथ तो मैं रोज ही पीता हूँ। तेरे जैसी खूबसूरत लड़की का साथ तो किस्मत से ही मिलता है।"
जीन थोड़ा शरमाई। तब तक शौन भी उनके बराबर आ खड़ा हुआ। उसने जीन से हैलो कहा और बलदेव से पूछने लगा–
“कैसा लगा, समुद्र में से सूरज का उगना।"
“अद्वितीय! कल्पना से आगे।"
कहते हुए बलदेव ने शौन का जीन से परिचय करवाया। शौन बोला–
“भाजी(भाई), रेस्टोरेंट खुल गया, आजा नाश्ता कर लें। तूने रात में भी कुछ नहीं खाया।"
शौन के संग चलता बलदेव जीन से कहने लगा–
“हमारे साथ नाश्ते के लिए चलोगी ?”
“नहीं, मैं ठीक हूँ, तुम चलो।"
“फिर मेरे संग ड्रिंक ज़रूर लेना। पब के खुलते ही आ जाना, मैं प्रतीक्षा करुँगा।"
“मैं आ जाऊँगी।"
कहते हुए जीन ने हाथ हिलाया। बलदेव शौन के पीछे-पीछे डैक की सीढि़याँ उतरने लगा।
शौन काफी समय से पंजाबियों के बीच में विचरता आ रहा था। उसने पंजाबी के कुछ मोटे-मोटे शब्द कंठस्थ कर लिए थे, जिन्हें गाहे-बेगाहे प्रयोग कर लेता था। इन शब्दों के सहारे ही कई बार वह पूरा वाक्य भी समझ लेता था। ऐसे ही बलदेव ने भी उससे कुछ आयरश शब्द सीख रखे थे। कई बार मजा लेने के लिए वह भी बोलने लगता।
रेस्टोरेंट में जाकर उन्होंने हल्का-सा नाश्ता किया। रात में शराब अधिक पी लेने के कारण वे कुछ खा नहीं सके थे। बलदेव को तो समुद्री सफ़र में लगने वाली उल्टियों से भी डर लगता था। ‘सी-सिकनैस’ की गोलियां लेना उसे पसंद नहीं था। शराब के साथ ली ये गोलियां उल्टा असर भी कर जाती थीं। नाश्ता करके शौन ने कहा–
“हम पहले ड्यूटी-फ्री वाला काम खत्म कर लें, फिर फुर्सत पाकर दुनिया देखेंगे।"
“शौन मुझे लगता है कि मैंने तो दुनिया देख ली। शायद, जीन मेरे सफ़र को सफल बना दे।"
“हाँ, लड़की सुंदर है। अब ढील मत कर देना, जैसा कि तू कर ही दिया करता है।"
“तू फिकर न कर, तुझे शिकायत का मौका नहीं दूंगा। तेरे लिए खोजूं कुछ ?”
“नहीं, कुछ खास नहीं हैं, पुराने से मॉडल ही घूमे जाते हैं।"
“अभी तड़का है न, थकावट की मारी पड़ी हैं बेचारी। जरा ठहर, इन्हें मेकअप करने दे, फिर देखना – मॉडल को बदलते।"
कहकर बलदेव हँसने लगा। वे दोनों ही लड़कियों को देखने के शौकीन थे। लड़कियों की कारों के मॉडल से तुलना करते। शौन कहने लगा–
“मेकअप से मॉडल बदला तो क्या बदला। और फिर मुझे तो इंडिया जाकर मारुतियाँ ज्यादा पसंद आने लगी हैं।"
शौन की बात पर दोनों हँसे। हँसते हुए वे ड्यूटी-फ्री दुकान में जा घुसे। शौन पिछले दिनों बलदेव के साथ इंडिया का चक्कर लगा आया था। इंडियन लड़कियाँ उसे विशेष तौर पर पसंद थीं। ड्यूटी-फ्री दुकान में से व्हिस्की की बोतलें इकट्ठी करता शौन बोला–
“इतनी तो व्हिस्की, बरांडी और रम ले ही जाएं कि पेट्रोल का खर्च निकल आए।"
“कितनी ले जाने की इजाज़त है ?”
“इंडिया जितनी ही।"
कहकर शौन व्यंग्य में बलदेव की तरफ देखने लगा। बलदेव हँस पड़ा। इंडिया जाते समय वे काफी व्हिस्की ले गये थे। जब दिल्ली के एक अधिकारी ने ऐतराज किया तो दस पौंड बलदेव ने उसके हाथ में थमा दिए थे। तभी शौन ने हँसते हुए कहा था कि हमारे मुल्क में भी इसी तरह मुट्ठी गरम करके काम चल जाता है।
शौन ने तकरीबन पच्चीस लीटर शराब इकट्ठी कर ली। उन्होंने बैग बड़ी मुश्किल से उठाये और फैरी के निचले डैक की तरफ की सीढ़ियाँ उतरने लगे, जहाँ उनकी कार खड़ी थी। नीचे, दो मंजिलें कारों की थीं और तीसरी निचली मंजिल पर लोरियाँ और वैनें खड़ी थीं। यहाँ का माहौल एकदम अलग था। चारों तरफ गहरी चुप थी, सिवाय फैरी के चलने की आवाज के। फैरी की आवाज डरावना-सा माहौल पैदा कर रही थी। बलदेव के लिए यह सब एकदम नया-सा था। जब वह महसूस करता कि यह जगह समुद्र के कई फीट नीचे है तो उसे भय-सा लगने लगता। पर वह शौन के पीछे-पीछे चलता गया। उसकी चुप्पी को देखकर शौन पूछने लगा–
“क्या सोच रहा है ?”
“सोचता हूँ कि यह सीलन, यह चुप्पी, बड़ा फिल्मी-सा माहौल पैदा कर रही हैं।"
“हाँ, तेरा समुद्री जीवन से वास्ता जो नहीं पड़ा।"
“शायद, इसीलिए।"
“चिंता न कर, आज से तू अभ्यस्त हो जाएगा।"
कार तक पहुँचते उन्होंने देखा कि कुछ युगल इधर-उधर कारों में बैठे अपने आप में मस्त थे। शौन बोला–
“भाजी, जीन को यहाँ ले आ। सबकुछ यहाँ का रंगीन लगने लगेगा।"
बलदेव ने कोई उत्तर नहीं दिया। सिवाय छोटी-सी मुस्कान के और उसके साथ शराब की बोतलें कार में रखवाने लग पड़ा। शौन ने बोतलें इस प्रकार रखीं कि बाहर से देखने वाले को पहली नज़र में कुछ पता न चले। सीटों के नीचे भी बोतलें छिपा दीं। कोई कोना नहीं होगा जहाँ उसने बोतल फंसाने की कोशिश न की हो। फिर, एक बोतल को बाहर निकालते हुए बोला–
“पब खुलने में तो अभी देर है, आ जा तुझे कायम करुँ।"
“वे दोनों कार में बैठ गये। शौन ने दो पैग बनाये। उसने कार में ही सबकुछ रखा हुआ था। वह हमेशा ही कार में इसी तरह पीने का इंतजाम किए रखता था। वह ग्लव-बॉक्स खोलता हुआ बोला–
“यह देख, यहाँ सभी कुछ पड़ा है। ये पैकेट देख, ये टीशू, पिछली सीट पर तौलिया भी है, मेरा मतलब है, जब मर्जी आ।"
फिर वह अपने पिछले सफ़रों के किस्से सुनाने लगा कि कैसे हर बार कोई न कोई लड़की उसे मिल जाती रही थी। कई बार दोस्ती लम्बे समय के लिए भी पड़ जाती थी। लेकिन ज्यादातर वास्ता इसी सफ़र तक ही होता। बहुत से नौजवान लड़के-लड़कियों का इस प्रकार फैरी से सफ़र करने का मतलब ही आनन्द उठाना होता है। फैरी में घुसते ही नौजवान आँखें अपने हमउम्र को तलाशने लगती हैं। ये कहानियाँ शौन बलदेव को अक्सर सुनाया करता। लेकिन, हर कहानी हर बार उसे नयी ही लगती। अब तो वह सुनते हुए ही आनंदित होता जा रहा था।
कार में से निकल कर वह वापस ऊपर की ओर चले तो एक जोड़ा उनके आगे-आगे जा रहा था। सीढि़याँ चढ़ते हुए एक जोड़ा नीचे उतरता हुए मिला। यह सीलन और यह चुप्पी, अब बलदेव को इतनी परायी नहीं लग रही थी। वह फिर से मेन लान्ज में आ गए। उन्हें हल्का-सा सुरूर हो रहा था। लान्ज की चहल-पहल बहुत सुहावनी लग रही थी। सुबह सभी सोये हुए ऐसे लग रहे थे मानों इन्होंने कभी उठना ही न हो। जहाँ जिसको जगह मिली थी, सो गया था। कोई सोफे पर तो कोई नीचे ही। भीड़ में से बलदेव जीन को खोजने लगा। शौन ने कहा–
“आ जा बैठते हैं। उसे भी तेरी जरूरत होगी, खुद ढूँढ़ लेगी।"
फिर शौन उसका ध्यान एक औरत की ओर दिलाता हुआ बोला–
“वो देख मर्सडीज।"
“शौन, तू बहुत लिबरल है, करटीना को मर्सडीज कहे जा रहा है।"
“डेव, तुझे सुंदरता की जरा भी समझ नहीं। मर्सडीज नही तो एम डब्ल्यू कह ले, तू तो करटीना पर ही गिर पड़ा है।"
“होंडा, मैं होंडा से ऊपर नहीं उठ सकता।"
“तेरी तंग नज़र... मैं कुछ नहीं कह सकता। तू यहाँ रुक, मैं बात करके आता हूँ।" कहता हुए शौन उस औरत की तरफ चला गया।
बलदेव वहीं बैठ कर सामने चल रहे टेलीविजन पर समाचार देखने लगा। मौसम के बारे में बता रहे थे कि मौसम खराब है। बलदेव ने खिड़की में से समुद्र की ओर देखा, उसका नीलापन धूप में दुगना हुआ पड़ा था। बलदेव सोचने लगा कि मौसम विभाग वाले भी कई बार धोखा खा जाते हैं। कल भी मौसम ठीक नहीं बता रहे थे, पर सारा दिन और फिर रात को भी मौसम साफ रहा था। टेलीविजन देखता बलदेव साँप की तरह सिर घुमाता जीन को खोजे जा रहा था।
कुछ देर बाद शौन एक आदमी के साथ सामने आ खड़ा हुआ। बलदेव मन ही मन हँसा कि औरत के पीछे गया था, पर मर्द ले आया है। शौन ने उस आदमी की तरफ इशारा करके कहा–
“डेव, यह है एंड्रीऊ, मेरी बहन आयरीन का पुराना बॉय–फ्रेंड... और एंड्रीऊ, यह है मेरा दोस्त डेव।"
बलदेव ने उससे हाथ मिलाया और हालचाल पूछा। वे बातें कर ही रहे थे कि सामने जीन आती दिखाई दी। बलदेव उन्हें ‘एक्सक्यूज मी’ कहते हुए जीन की ओर बढ़ गया। जीन उसे देखते ही बोली–
“डेव, किधर चले गए थे ?”
“मुझे थोड़ी शापिंग करनी थी। अब फुर्सत में हूँ, आ जा कहीं बैठें।"
बलदेव ने घड़ी देखी। बारह बज रहे थे। पब खुल चुका था। उसने जीन का हाथ पकड़ा और पब की ओर चल पड़ा। जीन ने अपना बैग पिट्ठू की भांति पीठ पर लटका रखा था। पब में से वाइन के गिलास भरवा कर वे फैरी की रेलिंग के पास आकर खड़े हो गए। धूप हल्का-सा चुभ रही थी। बलदेव ने जेब में कार की चाबी टटोलकर देखी। शौन की कार की एक चाबी हमेशा उसके पास हुआ करती थी और इसी तरह उसकी कार की एक चाबी शौन के पास। बलदेव ने कहा–
“मुझे तेरा इस थोड़े से सामान के साथ सफ़र करना बहुत अच्छा लगा।"
“हाँ, बहन के घर जाती हूँ तो मुझे अधिक सामान की जरूरत नहीं पड़ती। उसके कपड़े मुझे आ जाते हैं।"
“तुझे बाई-एअर सफ़र कैसा लगता है ?”
“ठीक है, एक घंटा लगता है सारा, पर फैरी का मजा कुछ और ही है। डबलिन वाली फैरी में तो नाइट-क्लब भी है, रात भर म्युजिक बजता है।"
“फिर तो अगली बार मैं भी उसी में जाऊँगा।"
“पर समय बहुत लग जाता है।"
कहते हुए जीन ने अपनी वाइन खत्म कर दी। बलदेव और भरवा लाया। ठंडी हवा चलने लग पड़ी थी। समुद्र की लहरें चूहों की कतारों की भांति दौड़ने लगीं। दूर, उत्तर दिशा में बादल का एक टुकड़ा उभर रहा था। हवा जरा-सी तेज हुई तो लहरें खरगोश जितनी हो गईं और जल्द ही कुत्ते जितनी। जहाज हिचकोले खाने लगा। उसकी रफ्तार भी धीमी पड़ गई। बलदेव जीन का हाथ थामे पब के अंदर आ गया। वे एक तरफ कुर्सियों पर बैठ गए। जहाज इतना हिल रहा था कि बैठना कठिन हो रहा था। मेजों पर गिलास तो क्या टिकते। बार-मैन को गिलास भरने कठिन हो रहे थे। लान्ज में बैठे लोग भी हिल गए। कई तो उल्टियाँ करते हुए बाथरूम की ओर भागने लगे। बच्चों पर कोई असर नहीं था। उनका शोर पहले से भी ज्यादा था। बलदेव ने जीन की आँखों में आँखें डाल कर कहा–
“जीन, यू फैंसी ए गुड्ड टाइम ?”
जीन का चेहरा सकुचा गया। उसकी आँखें झुक गईं। बलदेव को आस नहीं थी कि वह यूं शरमा जाएगी। उसने फिर कहा–
“जीन, घबराने की कोई जरूरत नहीं। किसी तरह की फिक्र न कर। मेरे पास सारे इंतजाम हैं, मेरी कार भी नीचे डैक में ठीक जगह पर खड़ी है। तू कोई चिंता न कर।"
“नहीं डेव, मुझे कोई फिक्र नहीं, कंडोम तो मेरे पास भी है, पर तू कुछ जल्दी नहीं कर रहा ?”
(क्रमश: जारी…)


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अनुरोध

“गवाक्ष” में उन सभी प्रवासी लेखकों/कवियों की समकालीन रचनाओं का स्वागत है जो अपने वतन हिंदुस्तान की मिट्टी से कोसों दूर बैठ अपने समय और समाज के यथार्थ को हिंदी अथवा पंजाबी भाषा में अपनी रचनाओं के माध्यम से रेखांकित कर रहे हैं। रचनाएं ‘कृतिदेव’ अथवा ‘शुषा’ फोन्ट में हों या फिर यूनिकोड में। रचना के साथ अपना परिचय, फोटो, पूरा पता, टेलीफोन नंबर और ई-मेल आई डी भी भेजें। रचनाएं ई-मेल से भेजने के लिए हमारा ई-मेल आई डी है- gavaaksh@gmail.com

शुक्रवार, 11 जनवरी 2008

गवाक्ष (प्रवेशांक)-जनवरी 2008

नव वर्ष 2008 में हम ब्लाग की दुनिया में एक नया “गवाक्ष” खोल रहे हैं जिसके माध्यम से हम हिन्दी ब्लाग-प्रेमियों को हिन्दी/पंजाबी के उन प्रवासी लेखकों/कवियों की समकालीन रचनाओं से रू-ब-रू करवाने का प्रयास करेंगे जो अपने वतन हिन्दुस्तान से कोसों दूर बैठकर अपने समय और समाज के यथार्थ को अपनी रचनाओं में रेखांकित कर रहे हैं। “गवाक्ष” के इस प्रवेशांक में इटली में रह रहे पंजाबी कवि विशाल की कविताओं का हिन्दी अनुवाद तथा लंदन में रह रहीं हिन्दी की जानी-मानी लेखिका दिव्या माथुर की कहानी- “खल्लास” प्रस्तुत कर रहे हैं।


तीन पंजाबी कविताएं
विशाल(इटली)

अपने मठ की ओर


वक्त के फेर में चक्कर खाता
अपने अंदर ही गिरता, संभलता
घर जैसे सारे अर्थों की जुगाली करके
न खत्म होने वाले सफ़र आँखों में रखकर
मैं बहुत दूर निकल आया हूँ
तू रह–रहकर आवाज न दे
इस कदर याद न कर मुझे
लौटना होता तो
मैं बहुत पहले लौट आता।

समन्दर, हदें, सरहदें भी
बहुत छोटी हैं मेरे सफ़रों से
चमकते देशों की रोशनियाँ
बहुत मद्धम है मेरे अंधेरों के लिए

पता नहीं मैं तलाश की ओर हूँ
कि तलाश मेरी ओर चली है
मुझे न बुला
खानाबदोश लौट के नहीं देखते
मैं अपने अस्तित्व पर
दंभी रिश्तों के कसीदे नहीं काढूँगा अब।

बड़ी मुश्किल से
मेरे अंदर मेरा भेद खुला है
छूकर देखता हूँ अपने आप को
एक उम्र बीत गई है
अपने विरोध में दौड़ते
मैंने रिश्तों और सलीकों की आंतों के टुकड़े करके
अपना सरल अनुवाद और विस्तार कर लिया है
तिलिस्म के अर्थ बदल गए हैं मेरे लिए।

रकबा छोटा हो गया है मेरे फैलाव से
यह तो मेरे पानियों की करामात है
कि दिशाओं के पार की मिट्टी सींचना चाहता हूँ
जहाँ कहीं समुन्दर खत्म होते हैं
मैं वहाँ बहना चाहता हूँ।

रमते जब मठों को अलविदा करते हैं
तो अपना जिस्म
धूनी पर रखकर ही आते हैं...।

नाथों का उत्सव


उन्होंने तो जाना ही था
जब रोकने वाली बाहें न हों
देखने वाली नज़र न हो
समझने और समझाने वाली कोई बात न बचे।

अगर वे घरों के नहीं हुए
तो घरों ने भी उन्हें क्या दिया
और फिर जोगियों... मलंगों...साधुओं...
फक्कड़ों...बनवासियों...नाथों...
के संग न जा मिलते
तो करते भी क्य॥

वे बस यही कर सकते थे
अपनी रूह के कम्बल की बुक्कल मारकर
समझौतों के स्टाम्प फाड़ते
अपने गवाह खुद बनते
अपनी हाँ में हाँ मिलाते
अपने ध्यान–मंडल में
संभालकर अपनी सृष्टि
छोड़कर जिस्म का आश्रम
अपने उनींदेपन की चिलमें भर कर
चल पड़ते और बस चल ही पड़ते।

फिर उन्होंने ऐसा ही किया
कोई धूनी नहीं जलाई
पर अपनी आग के साथ
सेका अपने आप को
कोई भेष नहीं बदला
पर वे अंदर ही अंदर जटाधारी हो गए
किसी के साथ बोल–अलाप साझे नहीं किए
न सुना, न सुनाया
न पाया, न गंवाया
बस, वे तो अंदर ही अंदर ऋषि हो गए
खड़ांव उनके पैरों में नहीं... अंदर थीं।

उनके पैरों में ताल नहीं
बल्कि ताल में उनके पैर थे
भगवे वस्त्र नहीं पहने उन्होंने
वे तो अंदर से ही भगवे हो गए

उन्होंने अपनी मिट्टी में से
सुंगधियों को खोजने जाना ही था
फिर वे कभी निराश नहीं हुए
अपितु हमेशा ही उत्सव में रहे
कइयों का न होना ही
उनका होना होता है


जब मैं लौटूंगा

माँ ! जब मैं लौटूंगा
उतना नहीं होऊँगा
जितना तूने भेजा होगा
कहीं से थोड़ा...कहीं से ज्यादा
उम्र जितनी थकावट
युगों–युगों की उदासी
आदमी को खत्म कर देने वाली राहों की धूल
बालों में आई सफ़ेदी
और क्या वापस लेकर आऊँगा...

क्या मैं तुझे बता सकूँगा
कि रोज मेरे अंदर
एक कब्र सांस लेती थी
कि कैसे अपने आप को
जिंदा भ्रम में रखने के लिए
अपने ही कमरे में
प्रवेश करते समय दरवाजा थपथपाता था
यह जानते हुए भी कि
कोई दरवाजा नहीं खोलेगा
और न ही किसी ने आलिंगन में लेना है
न ही किसी ने घूर कर देखना है
न ही किसी ने नाराज होना है
और न ही किसी ने माफ करना है
बस, एक आलम पैदा होना है
जहाँ आदमी अपने आप को टोह कर देखता है।

माँ ! ज्यादा से ज्यादा क्या ले आऊँगा
बाप के गले में लटकाने वाली घड़ी
या मेज पर रखने वाला टाइमपीस
कि बहुत तड़के अलार्म के साथ
वह दो वक्त की रोटी के लिए
अपनी आँखों पर चढ़ा कर चश्मा
घर का चक्कर लगाता रहे
या फिर तेरी वास्तव में ही
खत्म होती जा रही नज़र के लिए
कोई रांगला सा फ्रेम
ताकि तेरे जे़हन में से
कहीं बेटे का फ्रेम टूट न जाए।

तुझे कैसे बताऊ ए माँ
तेरे इस भागे हुए पुत्र को
कहीं भी टिकाव नहीं था
रोज रात में
चौके में पकती मक्की की रोटी की महक
जब याद आती थी
एक बार तो इस तरह लगता था
कि तू बुरकियाँ तोड़–तोड़ मुँह में डाल रही है
उन पलों में मैं
एक आह से बढ़कर कुछ नहीं होता था

माँ, तू तो मुझे हमेशा
अपना सुशील बेटा ही कहती रही थी
यह जानते हुए भी
कि सुबह की पहली किरण से लेकर
रात की आखिरी हिचकी तक
मैंने तेरे लिए छोटे–छोटे दुख पैदा किए थे
मुझे वे सब कुछ अच्छी तरह याद है
कि मेरी रातों की आवारगी को लेकर
कैसे तू सूली पर टंगी रहती थी
बस इस आस में
कि मेरा बेटा कभी तो कोख का दर्द पहचानेगा
कभी तो बेटों की तरह दस्तक देगा...

पर माँ जब मैं लौटूंगा
ज्यादा से ज्यादा क्या लेकर आऊँगा
मेरी आँखों में होंगे मृत सपने
मेरे संग मेरी हार होगी
और वह थोड़ा सा हौसला भी
जब अपना सब कुछ गवां कर भी
आदमी सिकंदर होने के भ्रम में रहता है
और फिर तेरे लिए छोटे–छोटे खतरे पैदा करुँगा
छोटे–छोटे डर पैदा करुँगा
और मैं क्या लेकर आऊँगा।
हिंदी रूपांतर : सुभाष नीरव

कवि संपर्क–
Vishal
PZA, MATTEOTTI-34
46020-PEGOGNAGA(MN)
ITALY




हिंदी कहानी

खल्लास
दिव्या माथुर(लंदन)

दो उँगलियों को पिस्तौल की तरह साध कर जब नीरा ने 'खल्लास' कहा तो रोज़ी के कान खड़े हो गये। गुंडो के चक्कर में पति हेनरी को तो वह खो ही चुकी थी, उसे लगा कि उसकी बेटी भी कहीं अपने पिता के नक्शे कदम पर न चल निकली हो।
"क्या कहा तुमने?" रोज़ी ने सशंकित हो पूछा।
"खल्लास का मतलब क्या होता है, माँ?" जवाब देने के बजाय नीरा ने माँ से प्रश्न किया।
“अपशकुन, निरा अपशकुन,” उस समय तो रोज़ी बस यही कह पाई थी। नीरा ने एक बार पिता से भी यही प्रश्न पूछा था तो बजाय जवाब देने के, वह उसे अपने साथ पिस्तौल क्लब ले जाने को तत्पर हो गए थे। हेनरी अधिक पढ़ा लिखा नहीं था और न उसे अपनी मातृभाषा के विषय में ही कुछ पता था, किंतु बचपन में किसी साथी से सुना ये शब्द उसकी ज़ुबान पर चढ़ गया था और उसके होंठो पर थिरकता रहता था। शायद वह जानता था कि इस जीवन में तो उसका काम तमाम हो चुका था। जिसे प्यार करता था, वो उसे घास नहीं डाल रही थी और जिसे वह पसंद भी नहीं करता था, वह उसकी पत्नी थी।
“वेयर आर यू टेकिंग हर, आर यू मैड?” भयभीत रोज़ी ने उससे पूछा।
“यू शट अप वूमन, शी मस्ट लर्न टू शूट बिफोर समवन शूट्स हर।"
अब तो हेनरी भी नहीं रहा, किसी ने छेड़ा छाड़ी की तो बेटी को कौन बचाएगा। रोज़ी बस अब एक ही रट लगाए थी कि नीरा अपने बचपन के दोस्त पीटर से विवाह रचा ले। गुंडे बदमाशों के शहर, हार्ल्सडन में रहना कोई मज़ाक की बात न थी पर नीरा जानती थी कि घर बसाना एक बात है और आंधी में एक जीर्ण-शीर्ण छप्पर को बचाए रखना दूसरी।
मुहल्ले में रहने वाला पीटर रोज़ी को अच्छा और टिकाऊ लड़का लगता था। वह नीरा का दीवाना भी था। उसे बस यही समझ नहीं आता कि भला नीरा को और क्या चाहिए? उधर नीरा सोचती कि पतला-दुबला मर्गिल्ला-सा पीटर अपनी तो रक्षा कर नहीं सकता, भला उन दोनों की रक्षा क्या करेगा। नीरा के संरक्षण की वजह से ही पीटर स्कूल में बुलींग से बचा हुआ था और जिसकी एवज़ में ही शायद वह माँ-बेटी का बहुत ध्यान रखता था।
रोज़ी ही की तरह, नीरा के पांव भी सदा यथार्थ की धरा पर ही टिके रहते थे और वह जानती थी कि अपने बलबूते पर तो वह अपने मुहल्ले के बाहर कदम भी नहीं रख सकती। उसने अपनी परिस्थिति का अच्छी तरह से जायज़ा ले लिया था। विवाह करके भी वह हार्ल्सडन में तो सुरक्षित नहीं रह सकती। हार्ल्सडन के बाहर की दुनिया उसने कभी देखी ही नहीं और जो देखी वो उसके लिए एक सपना ही थी।
सोलहवां साल लगते ही नीरा एक गुलाब सी खिल गयी थी और कुछ महीनों से नीरा के पीछे भँवरे भी मंडराने लगे थे। रोज़ी के लिए एक नई परेशानी खड़ी हो गई थी। हर जगह तो वह बेटी के साथ जाने से रही। अभी तक तो पड़ौसी माँ बेटी की इज्ज़त करते हैं पर अब जबकि नीरा जवान हो गई है, वे कब तक अपनी खैर मनाएंगी। रोज़ी ने सोचा था कि अब जबकि उसकी बेटी कमाने लायक हो गई है, माँ का हाथ बंटाएगी और वह थोड़ा-सा सुस्ता लेगी। सुपरबाज़ार में बारह से अठारह घंटों की शिफ्ट अब नहीं होती रोज़ी से। हालाँकि रोज़ी ये कहते नहीं थकती थी कि बेटी हो तो नीरा जैसी, जिसका अभी तक कोई ब्वाय फ्रेण्ड तक न बना था, वो भी उस देश में जहाँ पाँच-छ: वर्ष की आयु के बच्चे सैक्स के विषय में सब जानकारी रखते हैं और जहाँ की बच्चियाँ बारह तेरह वर्ष की उम्र में माँ बन जाती हैं। खूबसूरत होने के साथ साथ नीरा पढ़ाई में भी होशियार थी। चार विषयों में उसने ‘ए‘ लेवल किया था। हार्ल्सडन के किसी परिवार से इसकी आशा रखना बहुत कठिन है। रोज़ी के कदम ज़मीन पर नहीं पड़ रहे थे। हेनरी होता तो शराब पीकर पूरे मुहल्ले में हल्ला मचाता। ‘ब्लैस हिज़ सोल,’ रोज़ी के मुंह से निकल गया।
रोज़ी और नीरा को त्योहारों का बहुत चाव था। वे हेनरी से भी श्री लंका के रीति रिवाज़ो के बार में पूछती रहतीं कि कहीं वह यह न सोचे कि उसकी बीवी और बेटी दुनियाँ भर के त्योहार मनाती फिरती हैं किंतु उससे पूछती भी नहीं कि उसके परिवार में कौन-कौन है, वह श्री लंका से कब और क्यूँकर यहाँ पहुंचा। बिल्कुल अलग किस्म का था हेनरी, जिसका हर त्योहार केवल दारू पीकर ही मनता था। लंदन में जन्मी और पली बढ़ी नीरा का मिज़ाज़ न जाने कैसे गोआ निवासियों का-सा था। संगीत और नृत्य की शौकीन नीरा को अलग अलग धर्मों के प्रति बड़ा रुझान था। जहाँ वह अपनी गुजराती सहेली भावना के साथ दीवाली मनाती और गरबा नाचती, वहीं एक मुसलमान लड़की आएशा के साथ ईद मनाती और सिवैयाँ पकाती।
हालाँकि बचपन से वह अफ्रीकियों के बीच पली बढ़ी थी, नाज़ुक-सी छुई मुई नीरा को भारी भरकम और काले लोग आक्रमक लगते थे। विशेषत: हार्ल्सडन शहर के ग़रीब लोग, जो कमियों की सौगात के साथ पैदा होते, स्टेट से मिली सुविधाओं के सहारे जीते और मर जाते पर उनके जोश और स्फूर्ति की दाद देने को भी नीरा का मन करता। मन ही मन चाहती कि अ़फ्रीकी लोगों की तरह वह भी कमर और कूल्हे मटका सके। अकेले में अभ्यास भी करती किंतु प्रयत्न करने के बावज़ूद वह सफल नहीं हो पाई थी। स्कूल में विद्यार्थियों के गुट बने हुए थे, किसी एक अच्छे से दिखने वाले अ़फ्रीकी सहपाठी के साथ अलग से मिल बैठना असंभव था।
अ़फ्रीकियों के प्रीतिभोज रात देर से शुरु होते और अल्लसुबह तक जारी रहते बीच बीच में नोंक-झोंक करते हुए कुछ मेहमान सड़क पर निकल आते और कारों की हेडलाइट्स जलाकर खूब हल्ला मचाते जब वे हाथापाई पर उतर आते तो मुहल्ले के दुखी लोग पुलिस को बुला लेते, डरते-डरते कि कहीं उपद्रवियों को पता चल गया कि किसने फोन किया था तो अगले दिन उसकी खैर नहीं। जबकि रोज़ी को ये धूम-धड़ाम बिल्कुल पसंद नहीं थी, विशेषत: जब कि सुबह सुबह उसे काम पर जाना होता, नीरा को इस शोर शराबे में बड़ा मज़ा आता था।
नीरा सबकी नज़र में थी। सड़क पर चलते हर व्यक्ति की नज़र उस पर टिके बगैर नहीं रहती थी। सुपरमाके‍र्ट में मुसलमान लड़कियों को बुर्का पहने देखती तो रोज़ी सोचती कि काश वह भी नीरा को भी बुर्का पहन कर बाहर निकलने को कह सकती किंतु नीरा तो एक से एक नए फैशन के कपड़े पहनना चाहती थी और हर परिधान में वह सुंदर दिखती थी। रोज़ी को लगता कि विवाह हो जाने पर नीरा सुरक्षित हो जाएगी। किंतु उसे शायद ये पता नहीं कि अब समय बदल चुका है। विवाहित होना कोई गारेंटी नहीं है कि एक युवती शांति से रह पाएगी, वो भी हार्ल्सडन में। नीरा को लगता था कि उसने यदि ढीले ढाले पीटर से विवाह कर भी लिया तो गुंडे उसे एक हफ्ता भी जिंदा नहीं रहने देंगे। वैसे भी नीरा अब तक उससे छोटे भाई-सा स्नेह करती आई है।
जिस दिन नीरा को वैस्टमिन्स्टर कालेज में दाखिला मिला, उसी दिन मिला एक प्रेम प्रस्ताव जिसे देख कर मां-बेटी दोनों की ही नींद उड़ गई। दूसरे दर्जे के एक गुंडे, जानी ने नीरा से अकेले में मिलने का न्यौता भेजा था। जानी से न दोस्ती भली, न ही दुश्मनी। माँ-बेटी दोनो ही जानती थीं कि जानी को ‘न’ करना छोटे-मोटे निठल्ले गुंडो को दावत देने के बराबर था। जहाँ ये खबर फैली कि नीरा ने जानी को इंकार कर दिया है, अन्य गुंडे उस पर चील-कऊओं की तरह टूट पड़ेंगे। क्रोध में भरकर जानी स्वयं परोस देगा नीरा को उन सबके आगे।
यूँ तो नीरा के हेनरी का बॉस मार्टिन भी एक गुंडा ही था किंतु वह एक शरीफ़ गुंडा था, जो नीरा को बचपन से पसंद करता था। हेनरी की हत्या के बाद उसने माँ-बेटी का सालों ध्यान रखा बावजूद इसके कि नीरा उसे अपने पिता की आकस्मिक मृत्यु का दोषी ठहराती रही। रोज़ी ने नीरा को कई बार समझाया कि हेनरी की हत्या में मार्टिन का कोई दोष न था, बल्कि वह तो हेनरी की हत्या के बाद महीनों तक किसी से न बोला और न ही चर्च गया। फिर भी यदि ये प्रस्ताव मार्टिन की ओर से आया होता तो नीरा को इसमें कोई आपत्ति न होती। पीटर से विवाह करके तो नीरा उसे भी इस दलदल में खींच लाएगी। उसकी जान बचा भी पाई तो वह उसका दलाल बनकर रह जाएगा। बेटी की बात सुनकर रोज़ी भौंचक-सी रह गईं थी। कितनी दूर की सोच के बैठी थी नीरा। उन्हें विश्वास नहीं हुआ पर ठीक ही तो कह रही थी नीरा कि उसके भाग्य में एक गुंडे से ही विवाह लिखा है तो वह गुंडों के सरदार के साथ क्यों न भाँवर ले ताकि बाकी के गुंडे उनके सामने आँख न उठा सकें। पर मार्टिन को जाकर कौन बताए कि नीरा जवान हो गई है।
हाल ही में रोज़ी ने सुपरबाज़ार में काम करना छोड़ एक करोड़पति, जमाइमा फरीद के यहाँ नौकरी कर ली थी, जो लंदन के सबसे महंगे इलाके, मेफेयर में रहती थी। एक हफ्ते के लिये जब फरीद परिवार इटली घूमने गया तो रोज़ी नीरा को जमाइमा का घर दिखाने लाई। उसकी आंखे फटी की फटी रह गईं थीं। उसने ऐसे घर अभी तक केवल फिल्मों में ही देखे थे। उस महल जैसे घर में बारह शयन कक्ष थे और अधिकतर कमरों में शानदार गुसलखाने थे। जिम्ज़ और ज़कूज़ी के अलावा तैरने के दो पूल्स भी थे जिसमें वह जी भर के तैरी थी। उस हफ्ते सारे नौकरों ने खूब मज़ा किया था।
उसी हफ्ते हार्ल्सडन में गुटों से संबंधित दो हत्यायें हुई थीं। पूरा पुलिस महकमा उसी में व्यस्त था। बी बी सी पर लगातार इस सनसनीखेज़ घटना की चर्चा हो रही थी। मार्टिन का इस घटना से कोई संबंध नहीं था, फिर भी उसका घर पुलिस की निगरानी में था। अपने पब को सुरक्षित रखने के अलावा, उसे हिंसा में वैसे भी कोई रुचि नहीं थी। पिछले ही कुछ सालों में न जाने कितने ड्रगडीलिंग गिरोह बने और बिगड़े और न जाने कितनी हत्यायें एक इसी छोटे से शहर में हुईं कि घरों के दाम धूल चाटने लगे। शरीफ़ लोगो को अपने बड़े-बड़े घर सस्ते दामों में बेच कर छोटे-छोटे फ्लैट्स में दूर-दूर जाकर बसना पड़ा।
जमाइमा को जब पता लगा कि रोज़ी हार्ल्सडन में ही कहीं रहती है तो उसने जि़द की कि वह उसे वहाँ ले जाए। रोज़ी ने उसे बहुत समझाया किंतु जमाइमा नहीं मानी। वह तो यह सोच कर रोमांचित हो रही थी कि जो अब तक वह पर्दे पर देखती आई है, अपनी आंखो से देखेगी, ढिशूम-ढिशूम, गरीबी, रंगबिरंगे लोग और चोरी चकारी। एक दोपहर रोज़ी को लेकर अपनी बड़ी-सी बी एम डब्लयु में बैठ कर वह चल दी। रोज़ी और ड्राइवर को चिंता थी कि वहाँ उनकी इतनी महंगी गाड़ी पर न जाने कितनी खरोंचे लगें। चाकू अथवा चाबी से दूसरों की शानदार गाडि़यों को नुकसान पहुंचाने का यहाँ एक रिवाज़-सा है।
ऐसा कुछ नहीं था कि जो जमाइमा को साफ नज़र आता, सिवा इसके कि हार्ल्सडन की मुख्य सड़क के आस-पास का इलाका एक कठोरता लिये हुए था, जहाँ निट्ठल्ले अफ्रीकी लोग टहलते या ठहरे से लगते थे, जैसे कि इस शहर के भाग्य में केवल बदकिस्मती ही बदा हो। मुख्य सड़क पर एक बेखबर काला आदमी झूम-झूम कर नाच रहा था, एक बेहद मोटी स्त्री ज़ोर ज़ोर से चिल्ला रही थी, ‘वर्ल्डज़ इज़ फुल आव सिन, डूम्स डे इज़ राउनड द कॉर्नर, और वी आर गोइंग टु पैरिश सून इत्यादि।
एकाएक न जाने कहाँ से एक गंदा-सा आदमी, जिसमें से बदबू के भभके उठ रहे थे, उनकी कार की खिड़की में अपना चेहरा घुसा कर बोला, ‘डार्लिंग, गिम्मी सम मनी।' जमाइमा के तो होश ही उड़ गए। रोज़ी ने उस आदमी को डांट कर खिड़की का शीशा ऊपर चढ़ा लिया। भीड़ इतनी ज्यादा थी कि ड्राइवर गाड़ी को हिला तक नहीं पाया। 'यू बिच' कहकर उस आदमी ने कार के शीशे पर थूक दिया।
“हाऊ डू यू लिव हियर, रोज़ी?” घबराई हुई जमाइमा को रोज़ी अपने घर ले आई जहाँ नीरा ने उसकी बड़ी खातिर की। जमाइमा को नीरा इतनी भाई कि उसने उसे अपनी निजी सचिव के रुप में नौकरी दे दी, जिसमें अच्छे वेतन के अलावा, खाने-पीने और रहने की भी व्यवसथा थी। जानी से यहाँ छिपे रहना बड़ा आसान था। नीरा को लगा जैसे कि प्रभु यीशु ने उसकी सुन ली हो।
“बेटी, सोच समझ कर हाँ कहना, तुम्हें अभी कोई अनुभव भी तो नहीं है।" रोज़ी ने कहा तो नीरा ने सोचा कि माँ न जाने क्यों टांग अड़ा रही हैं। न जाने उसे इससे अच्छी नौकरी फिर मिले न मिले।
मेफअर के इस धनाढ़य इलाके में केवल राजपरिवार के लोग और अरबपति ही बसते हैं और यहीं बसी थी जमाइमा, जिसके महलनुमा घर में सब बड़े अदब से पेश आते थे। कोई गाली-गलौज नहीं, शोर शराबा नहीं और न ही कोई गंदगी, हर चीज़ साफ सुथरी, यथास्थान। फरीद की दो बीबियाँ थी, जिनसे उसके पाँच बच्चे थे, तीन बेटे और दो बेटियाँ, जिनकी त्वचा और बाल मखमल से मुलायम थे। नौकर-चाकरों की कोई कमी नहीं थी, तीन ड्राइवर थे, दो खानसामें और चार नौकरानियाँ, जिसमें से दो बच्चों की देखरेख के लिये थीं। रोज़ी तो थी ही बच्चों के होमवर्क आदि की निगरानी के लिये। गोआ में वह एक प्राइमरी स्कूल में अध्यापिका थी। लंदन में बसने के बाद भी उसने एक स्थानीय स्कूल में नौकरी की थी किंतु कुछ एक महीने में ही वह वहाँ से भाग खड़ी हुई थी। पश्चिम संस्कृति से कोई अछूता नहीं था गोआ किंतु वहाँ के बच्चे अध्यापकों की इतनी बेइज्जती नहीं करते थे, यहाँ के बच्चे तो उसे जंगली जानवरों से भी बदत्तर नज़र आए, जिन्हें न बात करने की तमीज़ थी और न ही पढ़ने-लिखने में कोई रुचि। वे इतने उत्पाती और आक्रमक थे कि कभी-कभी तो अध्यापकों को अपनी जान के लाले भी पड़ जाते थे। माँ बहन की गालियाँ सदा उनकी ज़ुबान पर रहती थीं। नाबालिग बच्चे ड्रग्स का शिकार थे और उनसे निबटना रोज़ी के बस के बाहर की बात थी।
रोज़ी की शिक्षा और प्रशिक्षण का पूरा का पूरा लाभ नीरा को मिला। दिन और रात मेहनत करके रोज़ी ने अपनी बेटी को एक ऐसा आदर्श नागरिक बनाया, जिसका उदाहरण न केवल उसके स्कूल में, अपितु आस पड़ोस में भी दिया जाता था। कमल-सी खिलीं थीं माँ-बेटी किंतु थीं तो कीचड़ में ही न, कब तक खड़ी रह पाएंगी यही सोचती।
नीरा का काम था जमाइमा के फोनों और पत्रों के जवाब देना, उसकी डायरी संभालना और जहाँ भी जमाइमा जाए, उसके साथ रहना। जमाइमा कई चैरिटीज़ की अभिवावक थी, बड़े-बड़े जलसों की सदारत करती थी। नीरा को तो लगा कि वहाँ काम धाम तो कुछ होता नहीं था, बस खाना-पीना और हा हा ही ही। इन अमीरों को तो बस कुछ शग्ल चाहिए।
जमाइमा का पति फरीद उम्र में उससे बीस-पच्चीस साल बड़ा था। नीरा को बड़ा अजीब लगता कि वही फरीद जो स्वयं दूसरी लड़कियों के साथ मौज मस्ती करता फिरता था, अपनी ही बच्चियों के प्रति इतना कठोर कैसे हो सकता है। बच्चियों के माथे पर से ज़रा कहीं कपड़ा खिसका नहीं कि वह चिल्लाने लगता। हाँ, जमाइमा चाहे किसी पुरुष के साथ उठे-बैठे, उसे कोई एतराज़ नहीं। शायद इसीलिए कि वह पति की रखेल से अधिक नहीं जो उसके दोस्तों का स्वयं मनोरंजन ही नहीं करती, अपितु पति की पसंदीदा युवतियों को उसे उपलब्ध भी कराती है। नीरा को ये समझ नहीं आ रहा था कि कैसे कोई पत्नी अपने ही पति को किसी और स्त्री के हवाले करने को तैयार हो सकती है? जमाइमा में ही क्या कमी है कि फरीद किसी और के पीछे भागता फिरे? रोज़ी जानती थी जमाइमा और फरीद के लफड़े और इसीलिए जब जमाइमा ने नीरा से नौकरी की बात की थी तो रोज़ी को अच्छा नहीं लगा था।
दो दिन की चांदनी में अभी नीरा नहा ही रही थी कि पता लग गया कि इतना वेतन और सुविधाऐं किसी को मुफ्त में ही नहीं मिल जातीं। हर चीज़ की एक कीमत होती है। हार्ल्सडन में रहने वाला विल्सडन या किल्बर्न के ख्वाब तो देख सकता है किंतु मेफअर या मार्बल आर्च में घर बसाने की सोच भी नहीं सकता। उस बड़े से घर में भी फरीद की नज़रों से नीरा का बचना नामुमकिन था। नीरा ने दबी ज़ुबान में जमाइमा से एक-दो बार इस बात जि़क्र किया पर वह टाल गई।
"कम आन नीरा, एंजौय यौरसैल्फ, "
"बट मैडम…”
“जस्ट ए लिटल बिट्ट आफ़ फ़न, इट मीन्ज़ नथिंग।"
जमाइमा खुद चाहती थी कि नीरा उसके पति का मनोरंजन करे। जमाइमा ने उसे बड़ा फुसलाया कि वह जीवन भर भी कमाएगी तो उसे इतने मूल्यवान उपहार और धन इकट्ठा नहीं कर पाएगी। एक बारगी तो उसका मन हुआ भी था कि कुछ सालो में जब वह अपनी माँ के लिये यहीं मेफेयर में मकान लेने योग्य हो जाएगी तो छोड़ देगी ये धंधा किंतु उसे ये सब बिल्कुल अच्छा नहीं लगता था। तिस पर माँ का चार पहर का पहरा और हिदायत कि यही सब करना था तो पढ़ने-लिखने की क्या आवश्यकता थी। ये स्वर्ग जैसा घर अब नीरा को नर्क से भी बद्तर लगने लगा था। जमाइमा से ये कहकर कि उसे शहर परिषद में नौकरी मिल गई थी, नीरा घर में हाथ पर हाथ धरे बैठी थी।
खल्लास-खल्लास, सामने दीवार पर दिमागी गोलियाँ दाग़ दाग़ कर नीरा अपने मन की भड़ास निकाल रही थी। उसका मन पुरूषों से इतना विरक्त हो चुका था कि उसे समझ नहीं आ रहा था कि वह अपनी रक्षा कैसे करे। एक तरफ फरीद उसके पीछे हाथ धो कर पड़ा था तो दूसरी ओर पीटर शादी के लिए उसे दिक कर रहा था। जानी न सुनने को तैय्यार न था और न जाने कितने अन्य गुंडे इस इंतज़ार में थे कि मौका देखते ही नीरा को लपक लें। जानी का गुंडा जब उसका जवाब माँगने तीसरी बार घर आया तो नीरा के पास कोई रास्ता नहीं बचा था, सिवा इसके कि वह मार्टिन के पास सहायता मांगने जाए।
"आर यू श्योर नीरा, यू डोंट ईवन लाइक मार्टिन।" माँ ने पूछा
"वाट चौइस डू वी हैव, मम?”
"एंड डोंट डेयर सजैस्ट पीटर अगेन”
"मार्टिन इज़ नौट बैड बट वुड ही मैरी यू? इट विल बी बैटर इफ़ आई टाक टू हिम।"
"नो वे, आई कैन हैंडल हिम, मम, यू नीड नौट वरि।"
अच्छे से तैयार होकर नीरा सुबह-सुबह बेन्ज़ डेन में जा पहुंची। पब में घुसते ही नीरा की नज़र एंजला पर नज़र पड़ी जो बार साफ कर रही थी। चूडि़यों से भी बड़ी-बड़ी चांदी की बालियाँ पहने, बालों में नवयुवतियों जैसा बैंड लगाए और चेहरे पर सदाबहार मुस्कान लिये, वह एक अंग्रेज़ी धुन गुनगुना रही थी। नीरा को देखकर उसका चेहरा खिला, बुझा और फिर खिल उठा।
"ओराइट? नीरा जैसी लड़की यहाँ क्या कर रही है?" वह परेशान थी।
“आइ एम आल राइट, थैंक यू। कैन आइ टॉक विद मार्टिन?"
"मार्टिन," मज़ाकिया तौर पर नीरा को आँख मारते हुए एंजला ने इतनी ज़ोर से गुहार लगाई कि मार्टिन और उसके सभी साथी भागते हुए बाहर आ पहुंचे। मानो किसी ने उनके पब पर हमला बोल दिया हो। उनके परेशान चेहरे देख कर एंजला हो-हो कर हंसने लगी। मार्टिन नीरा को देख कर सकपका गया।
मार्टिन नीरा की ओर कुर्सी बढ़ाता हुआ बोला, "ओराइट?"
"यैस, थैंक यू, कैन आई टॉक विद यू इन प्राइवेट?"
एक बार लगा था कि मार्टिन कह देगा कि जो उसे कहना है, वह सबके सामने कहे। उसके साथियों के चेहरे पर भी कुछ ऐसे ही भाव थे किंतु अगवानी करता मार्टिन नीरा को अपने निजी दफ्तर में ले गया था। नीरा के कमसिन चेहरे को वह अपलक निहार रहा था। सत्तरह साल की युवती और इतनी तेजस्वनी। असल में वह नीरा से इस बीच मिला ही नहीं था। नवयौवना नीरा भी पूरी तैयारी से आई थी। सीधी-सादी किंतु स्मार्ट वेशभूषा में वह झक-झक कर रही थी। नीरा ये देख कर प्रसन्न थी कि मार्टिन भी उसके रुप से अछूता नहीं रह पाया था। बाज़ी जीती-जिताई थी पर नीरा ने खेल जारी रखा कि वह ही मार्टिन की पनाह में आई थी।
टोनी के तीनों पत्रों को मेज़ पर रखते हुए नीरा सीधे-सीधे अपनी बात पर आ गई थी।
"क्षमा चाहती हूँ किंतु मेरे लिए अब और कोई रास्ता नहीं बचा है सिवा इसके कि मैं आपके गिरोह में शामिल हो जाऊँ।" अच्छी अंग्रेज़ी में नीरा बोली।
नीरा के प्रस्ताव को सुन कर मार्टिन स्तब्ध रह गया। कॉकनी (चालू अंग्रेज़ी) में वह हकलाते हुए बोला, "किंतु क्या रोज़ी आपकी माँ को कोई आपत्ति नहीं, क्या वह जानतीं है कि आप यहाँ आईं हैं।"
"वह मेरा विवाह पीटर से रचाना चाहती हैं और जानी का प्रस्ताव ठुकरा कर पीटर से विवाह का नतीज़ा तो आप जानते ही हैं।"
"आप यदि पीटर से शादी करना चाहें तो आपकी सुरक्षा का जि़म्मा मैं ले सकता हूँ।" आंखे झुकाए मार्टिन बोला।
"मैं जानती हूँ किंतु मैं पीटर से विवाह नहीं करना चाहती। उसे मैंने सदा छोटे भाई-सा माना है। स्कूल में जब उसे 'बुली' किया जाता था तो मैं ही उसे बचाती थी।"
मार्टिन को समझ नहीं आ रहा था कि वह क्या कहे।
"मैं जानती हूँ कि एक जवान लड़की को गिरोह में शामिल करना एक बड़ी जि़म्मेदारी है और शायद आपको मेरी ज़रूरत भी न हो किंतु मैं पढ़ी-लिखी हूँ, आपके दफ्तर का सारा काम संभाल सकती हूँ। वैसे पापा की तरह, मेरा निशाना भी बहुत अच्छा है।"
"नहीं वो बात नहीं है…"
"आप अपने साथियों से पूछ कर देख लीजिए। यदि उन्हें आपत्ति न हो तो…"
जैसे ही मार्टिन बाहर गया, नीरा की नज़र उसके दफ्तर की साफ सुथरी और सादी सजावट पर गई। मेज़ पर एक अच्छे किस्म का पेन और डायरी थी, उसका मन हुआ कि देखे कि मार्टिन ने उसमें क्या लिखा है। नीरा को ध्यान आया कि मार्टिन की वेशभूषा भी उसके कमरे की-सी ही थी, सीधी सादी। स्पष्टत वह मार्टिन से बहुत प्रभावित हुई थी। आई तो थी वह अपने जीवन का सौदा करने किंतु अपना दिल दे बैठी थी। अपने को कुछ संयत करके मार्टिन बाहर निकला तो देखा कि उसके साथी दरवाज़े पर कान लगाए बैठे थे।
नीरा जानती थी कि मार्टिन उसे 'न' कह ही नहीं सकता था। हालांकि मार्टिन को देख कर नीरा स्वयं भी विचलित-सी थी। शिकार करने को आए, शिकार होके चले वाली कहावत चरितार्थ हो गई थी। साथियों से पूछने वाली बात उसने सिर्फ़ इसलिये कही थी कि उसके साथी कहीं ये न सोंचे कि मार्टिन ने उन्हें घास तक नहीं डाली। उसे काम तो इन सबके साथ ही करना होगा, ये वही लोग हैं, जिन्होंने मार्टिन को पाल पोसकर बड़ा किया है। चाहे मार्टिन को उनसे पूछने की आवश्यकता न हो, इन लोगों की इज़ाज़त लिये बिना यदि उसने नीरा से 'हाँ' कह भी दी तो वह इनका स्नेह और सम्मान खो बैठेगा, जो नीरा कभी नहीं चाहेगी।
नीरा का प्रस्ताव सुनकर वे सभी आश्चर्यचकित थे। स्पष्टत:, गिरोह के पुरुषों को कोई आपत्ति नहीं थी किंतु शैरी को एक नवयुवति की घुस पैठ गले नहीं उतर रही थी। सिवा मार्टिन के शैरी ही उस गिरोह की सबसे कम उम्र की सदस्य थी। एक नवयुवती का गिरोह में शामिल होना कहीं उसके महत्व को नगण्य न कर दे। अधेड़ उम्र की शैरी को दो एक सालों से ये चिंता सताने लगी थी कि वह बूढ़ी होने को आई और अब तक अकेली है। हालाँकि वह आज भी बड़ी सुंदर दिखती थी पर उसकी आँखो के नीचे झाँइंयाँ उभर आई थीं, जिन्हें वह सुबह-सुबह फाऊंडेशन के नीचे छिपा कर ही बाहर निकलती थी। अब उसे पब से कोई लगाव नहीं था। जब तक हेनरी जिंदा था, शैरी उसे रिझाने का प्रयत्न करती रही, ये जानते हुए भी कि वह शादीशुदा था और एंजला का दीवाना भी किंतु कोई था जिसे वह मन ही मन चाहती थी। सिड बहुत बूढ़ा हो गया था और वैसे भी उसे अब मार्टिन के अलावा कुछ नहीं सूझता था।
"अगर तुम नीरा पर भरोसा कर सकते हो तो ठीक है।" शैरी और क्या कहती। एंजला को कोई एतराज़ नहीं था। वह मन ही मन वह प्रसन्न थी कि उसकी पुरानी सखी रोज़ी पहाड़ तले आई तो, फिर चाहे बेटी के ज़रिये ही सही और नीरा को वह मन ही मन पसंद करती थी, नीरा एक अच्छी लड़की थी और सबसे बड़ी बात कि वह उसके आशिक की बेटी जो ठहरी।
हेनरी मरते दम तक एंजला का दीवाना रहा। शायद उस अशुभ शाम को उसने अपनी जान भी एंजला के लिये ही गंवाई थी। एक पियक्कड़ ने शराब का गिलास लेते समय एंजला का हाथ पकड़ लिया था। यूँ तो पबो में किसी का हाथ थाम लेना या किसी को चूम लेना आम बात है, किंतु एंजला की तरफ किसी का आँख उठाना भी हेनरी को पसंद नहीं था जबकि ग्राहकों की ऐसी हरकतों पर एंजला को स्वयं कोई एतराज़ नहीं था। हेनरी ने आव देखा न ताव, अँगूठे को हथेली में दबा अपनी दो उंगलियों को पिस्तौल के रूप में उसकी कनपटी पर सीधे तानकर बोला, "खल्लास।"
दोस्तों के उकसाने पर उस पियक्कड़ ने एक झटके से हेनरी की पिस्तौलनुमाँ उंगलियाँ मरोड़ दीं। हेनरी ने उसके गाल पर उल्टे हाथ की एक धौल जमाई ही थी कि मार्टिन ने बीच बचाव करवा के हेनरी को घर भेज दिया किंतु होनी को कुछ और ही मंज़ूर था। उस रात हेनरी कुछ अधिक ही पिये हुए था। रास्ते में उसने गुंडो को फिर ललकारा तो बात हाथापाई पर उतर आई। जब तक मार्टिन के गिरोह के सदस्य घटना-स्थल पर पहुंचते, हेनरी को चाकू घोंपा जा चुका था। सिड और एंजला के समझाने के बावजूद कि हेनरी मर चुका था, मार्टिन उसे कार में लाद कर अस्पताल ले गया था। कहीं किसी स्तर पर उसे सदा लगता रहा कि उसकी वजह से ही एक निर्दोष बच्ची का पिता छिन गया, एक स्त्री विधवा हो गई। तिस पर नीरा की घृणा उसे अलग कुतरे जा रही थी। उसके मन में छिपी पीड़ा एक रूपक कविता के रूप में बह निकली जो उसने हेनरी की मय्यत पर सबको पढ़ कर सुनाई। उस दोपहर को चर्च में नीरा के अलावा, कई दुश्मनों के भी दिल जीत लिये थे मार्टिन ने।
रोज़ी बहुत दिन तक बड़बड़ाती रही कि न वह मनहूस एंजला उनकी जिंन्दगी में आती और न ही माँ-बेटी को ये दिन देखना पड़ता। यूँ देखा जाए तो एंजला ने हेनरी की विनय पत्रिका कभी स्वीकार नहीं की किंतु एक अड़ियल टट्टु की तरह हेनरी अड़ा ही रहता यदि मार्टिन ने उसके आगे गोआ से आई रोज़ी से विवाह करने का प्रस्ताव न रखा होता। एक तरह से ये सुझाव एंजला का ही था ताकि हेनरी उसकी जान छोड़ दे। एक ओर जहाँ हेनरी मार्टिन को मना नहीं कर सका, दूसरी ओर वह रोज़ी को भी कभी स्वीकार नहीं कर पाया। रोज़ी को कुछ ही दिनों में ये राज़ मालूम हो गया था किंतु वह क्या कर सकती थी। एक अच्छे क्रिस्चियन की भाँति वह जिये गई कि प्रभु यीशु एक दिन हेनरी को सही रास्ते पर अवश्य ले आएंगे। विवाहित होते हुए भी वह विधवाओं जैसे कपड़े पहनती रही कि हेनरी कभी तो उसे एक अच्छी रंगीन ड्रेस उपहार में देगा, जिसे पहनकर वह सधवा हो जाएगी।
मार्टिन को पढ़ाई से अधिक निशानेबाज़ी और मारने पीटने आदि की ही ट्रेनिंग कहीं ज्यादा मिली किंतु सही मायने में मार्टिन विनम्र और दयालु किस्म का नवयुवक था जिसे लड़ने-भिड़ने का कोई शौक न था। माँ और पिता के अनुग्रह पर उसने पिस्तौल चलाना और सेल्फ डिफैंस जैसी कलाएं सीख लीं थीं किंतु जिनकी ज़रूरत उसे कभी महसूस नहीं हुई क्योंकि उसके गिरोह के सदस्य सदा ढाल बनकर उसके आगे खड़े हो जाते थे। पब में किस्म-किस्म के लोग उठते-बैठते थे, इसीलिए गिरोह को लेकर बैठना और लोगों पर अपना रौब जमाना आवश्यक था। समय-समय पर एक-आध शराबी को धमकी देना और पब से बाहर फेंक देना आदि धंधे के लिये आवश्यक था।
पति को दुश्मन की गोली से बचाती, मार्टिन की माँ स्वयं मारी गई थी। मरते समय उसने बेन से वादा लिया था कि मार्टिन की खातिर, उसे एक जगह टिक कर रहना होगा। बेन के पास केवल इतना ही धन था कि वह हार्ल्सडन जैसी सस्ती जगह में एक बड़ी इमारत सस्ते में खरीदकर उसमें एक पब खोल ले और इस तरह शुरु हुआ बेन्ज़ डेन, जहाँ वह अपने वफादार साथियों के साथ रहने लगा। मुहल्ले वालों के कुनमुने एतराज़ को बेन ने मुफ्त में शराब पिलाकर दबा दिया। बेन की आकस्मिक मौत के बाद, आस पास के कुछ गुंडो ने सिर उठाया था किंतु बेन के वफादार साथियों ने उनकी एक न चलने दी। मार्टिन को सिड और एंजला ही ने पाला था किंतु माँ-बाप की तरह नहीं, एक नाबालिग बच्चे की तरह जिसके माँ-बाप असमय स्वर्ग सिधार गए थे। उनकी नज़र कभी मार्टिन की संपत्ति पर नहीं गई। सब के सब मार्टिन के प्रति पूरी तरह समर्पित थे। पब से अच्छी खासी कमाई हो रही थी और सब ठीक चल रहा था। शैरी पब का सारा काम संभालती और एंजला घर की देखभाल करती। इन दोनों के बीच की खटपट ही रोज़मर्रा की उस रट को तोड़ती जो धीरे-धीरे चढ़ती उम्र की तरह बढ़ रही थी।
नीरा के पब में बैठने के साथ ही पब के ग्राहक बढ़ गए थे। अपनी ओर ग़लत नज़र उठाने का भी मौका नीरा कभी किसी को नहीं देती थी। जहाँ किसी ने छेड़खानी की नहीं कि वह इधर-उधर खिसक लेती। ऐसा तो नहीं कि पब में गाली-गलौज की कमी हुई हो, किंतु अधिकतर ग्राहक अब बड़े अदब से पेश आने लगे थे। नीरा के रूप और 'लेडी लाइक' व्यवहार से सभी प्रभावित थे। शैरी जब अपने बंधे बंधाए ग्राहको को भी नीरा को निहारते पाती तो रूठकर चुपचाप एक कोने में बैठ जाती किंतु नीरा की भोली मुस्कुराहट उसे जल्दी ही अपनी ओर खींच लाती। नीरा का प्रयत्न रहता कि हर वार्तालाप में शैरी को सम्मलित किया जाए।
दो महीनों में ही मार्टिन उसका पूरी तरह से दीवाना हो चुका था। एंजला ने नीरा के मन की टोह ली और मार्टिन ने नीरा को झट हीरे की अंगूठी पहना दी।
जानी तना-तना घूम रहा था। उसकी बीमारी का इलाज थी नीरा, जो मार्टिन से विवाह रचाने जा रही थी। वह जानता था कि मार्टिन की वजह से ही पीटर का विवाह होते-होते रुक गया था। जानी ने समझा कि पीटर उसके दिल की लगी को समझ सकता है। उधर रोज़ी के विश्वास दिलाने पर कि वह नीरा को मना लेगी, पीटर सपने सजा के बैठा था। उसके दोस्तों ने, जो नीरा से उसके विवाह की बात मानने को वैसे भी तैयार नहीं थे, उसका उठना बैठना दूभर कर दिया था। गहरी चोट खाई थी पीटर ने और वह सचमुच जानी का हमदर्द बन बैठा था।
चट मंगनी और पट ब्याह भी हो गया किंतु रोज़ी पूरी तरह से अब भी आश्वस्त नहीं थी और मन ही मन जानती थी कि जब तक वे हार्ल्सडन में हैं, उनकी जान को खतरा बना ही रहेगा। एक तरफ जहाँ जानी का गिरोह अपने पाँव जमा रहा था, मार्टिन और नीरा प्रेम क्रीड़ा में मग्न थे। माँ की चेतावनियों को सनक समझकर वे उन पर कोई कान ही नहीं दे रहे थे। पीटर के मुताबिक जानी भूखे शेर की तरह घूम रहा था और नीरा को पाने के लिए वह कुछ भी करने को तैयार था। पीटर, जो रोज़ी के बहुत करीब था, जानी से हुई अपनी बातचीत उसे बता देता था। चाहे जानी के फंदे में फंस चुका था, वह नीरा को दुख पहुंचते नहीं देख सकता था।
लाचार रोज़ी अपने भाई-भाभी से मिलने पुर्तगाल पहुंच गई कि देखे कि वे लोग नीरा को स्पौंसर कर सकते हैं कि नहीं। वे खुशी-खुशी राज़ी हो गये थे, नीरा को ही नहीं मार्टिन को भी वहाँ बुलाने के लिये। उनके अपने तो कोई औलाद थी नहीं, अकेलेपन को भरने के लिये इससे अच्छा और क्या उपाय हो सकता था। बेटी के साथ-साथ दामाद और फिर उनके होने वाले बच्चे भी तो उनके आंगन में ही खेलेंगे।
रोज़ी खुशी-खुशी लंदन लौटी थी और जब एंजला ने उसे खुशखबरी दी कि वह नानी बनने जा रही है, उसे लगा कि जैसे उसकी सारी चिंताएं छूमंतर हो गईं हों। बच्चे की खातिर ही सही किंतु जब नीरा पुर्तगाल में बसने के लिये मान गई तो मार्टिन के पास क्या चारा था। एंजला और सिड के लिये भी मार्टिन और नीरा की सुरक्षा सर्वोपरि थी।
टैक्सियाँ द्वार पर खड़ी थीं। सामान रखा जा चुका था। काफिला चलने को तैयार खड़ा था। शैरी रुकने को झट मान गई तो एंजला को बड़ी हैरानी हुई कि शैरी और बाहर जाने का कोई मौका छोड़ दे। सिड को विदाई की रस्म से सख्त परहेज़ था। शैरी के कहने के बावजूद कि कुछ ही घंटो की ही तो बात है, वह पब को संभाल लेगी, वह एअरपोर्ट जाने को तैयार नहीं हुआ।
सिवा मार्टिन के, सब लोग टैक्सियों में बैठ चुके थे कि फोन की घंटी सुनाई दी। शैरी, जो दरवाज़े पर ही खड़ी थी, भाग कर अंदर गई और फिर अंदर से ही चिल्लाई, "नीरा, तुम्हारा फोन है।"
"पूछो तो सही किसका फोन है।" एंजला ने झुंझलाते हुए कहा।
"मैं एक मिनट में आई।" नीरा एंजला की बात को अनसुना करती हुई भाग कर अंदर गई। वह हैरान थी कि इस समय किसका फोन हो सकता था किंतु ये सोचकर कि पुर्तगाल से उसके मामा-मामी का फोन होगा ये पूछने को कि वे घर से रवाना हुए कि नहीं या फिर पीटर का, जिसने नीरा के विवाह के बाद से उससे बात करना ही छोड़ दिया था। वह उल्लसित थी कि शायद उसने अब 'बाय' कहने को फोन किया था। उससे बिना मिले या बिना बात किये जाना उसे बिल्कुल अच्छा नहीं लग रहा था।
"नीरा, बी क्विक, वी विल मिस दि प्लेन।" रोज़ी ने हांक लगाई। मार्टिन ने सोचा कि इतनी लंबी बात वह किससे कर रही है कि उसे प्लेन के समय का भी ध्यान न रहे। वह पब की ओर चला ही था कि दरवाज़े पर नीरा दिखाई दी। जानी उसके पीछे था। नीरा की गर्दन को अपने हाथ की लपेट में लिये, उसने पिस्तौल नीरा की कनपटी पर रखी हुई थी। अपनी जेब में पिस्तौल थामें मार्टिन आगे बढ़ा। उसका खून खौल रहा था।
"लीव नीरा टु मी। आई एम रैडी टु स्पेयर यू, मार्टिन।" जानी सीधे-सीधे अपनी बात पर आ गया।
"वाटएवर यू से जानी, बट डोंट हर्ट हर।" मार्टिन गिड़गड़ाया।
"डोंट ट्राइ एनिथिंग फन्नी विद मी, आई एम वार्निंग यू।" नीरा के गले में अपनी बांह का फंदा कसते हुए जानी ने अपनी पिस्तौल की नली उसकी कनपटी पर कुछ और गड़ा दी।
तभी जानी के दो और गुंडों के साथ पीटर दिखाई दिया। जानी ने उन्हें अपनी ओर आने का संकेत दिया।
"फॉर गॉड्स सेक पीटर, शी इज़ प्रैगनैंट," रोज़ी ने नज़दीक से गुज़रते हुए पीटर से कहा तो वह नीरा की ओर देखने लगा। उसका मन भीग-भीग उठा।
"डोंट लिसन टू दैट बिच, पीटर।" जानी पीटर को अपनी ओर खींचता हुआ बोला।
"यू रास्कल," मार्टिन को मौका देती हुई रोज़ी नीरा की ओर भागी।
जानी ने बौखला कर गोली चला दी, रोज़ी वहीं ढेर हो गई। बौखलाई हुई नीरा अपनी माँ की लाश पर बिछ गई और ज़ोर-ज़ोर से विलाप करने लगी।
इसी बीच साँसों को संभालता बूढ़ा सिड दरवाज़े के बीचों बीच आ खड़ा हुआ।
"मार्टिन, माई चाइल्ड, वी आर आल डूम्ड, शैरी हैज़ सोल्ड अस टू द डैविल।" इससे पहले कि सिड कुछ और कहता, शैरी ने उस पर गोली चला दी। एंजला दौड़ कर दम तोड़ते हुए सिड के पास आ बैठी। अपने कान को सिड के मुंह पर लगाए वह केवल यह भर सुन सकी कि शैरी ने ही जानी को नीरा और मार्टिन के लंदन छोड़ने की खबर दी थी। फोन के बहाने नीरा को अंदर भी उसने ही बुलाया था, जहाँ जानी उसके इंतज़ार में छिपा खड़ा था।
"यू स्नेक, यू बिच, यू होर।" एंजला को दगाबाज़ शैरी के लिये उपयुक्त शब्द नहीं मिले तो वह उसका गला घोंटने पर उतारू हो आई।
"लीव शैरी एलोन, अदरवाइज़ आई विल किल दैट सन आफ ए होर।" जानी का निशाना अब मार्टिन पर था।
"जानी डार्लिंग, डोंट हर्ट मार्टिन। यू हैव प्रोमिस्ड पीटर, लेट हिम टेक नीरा एंड गो।" एंजला की ओर गर्व से देखते हुए शैरी ने कहा मानो स्थिति उसके वश में हो।
"डोंट टेल मी वाट टू डू, बिच।" जानी ने उसे पूरी तरह से नज़रंदाज़ कर दिया था। वह इतनी हैरान और परेशान थी कि उसे समझ ही नहीं आया कि ये कहर उस पर कहाँ से टूटा।
"यू बास्टर्ड, यू सन आफ ए बिच," कहती हुई बेहाल शैरी जानी की ओर लपकी।
जानी नियंत्रण खो चुका था। शैरी को अपने रास्ते से हटाने के लिए उसने गोली चला दी। इससे पहले कि मार्टिन गोली चलाता, क्रोधित पीटर ने जानी को अपना निशाना बना कर गोली चला दी किंतु बिजली की-सी फुर्ती से जानी ने नीरा को अपने आगे कर लिया।
नीरा के सिर से उफनता खून ज़मीन पर सुनामी-सा फैलने लगा। नीरा का खून देख कर पीटर मानो पागल हो गया। उसने एक के बाद एक गोलियाँ दागनी शुरु कर दीं। जानी उसके सीधे निशाने पर था। दूसरा साथी भौंचक्का-सा खड़ा था। अपनी पिस्तौल वह पीटर पर साध ही रहा था कि मार्टिन ने गोली चला दी किंतु इससे पहले की मार्टिन की गोली उसे लगती, जानी का दूसरा गुंडा पीटर पर गोली चला चुका था। मृत्यु के वक्त पीटर की व्यथित आँखे नीरा पर ही टिकी थीं।
लाशों से घिरा मार्टिन नीरा के पास जा बैठा।
"खल्लास," रोज़ी के होंठो पर एक शब्द कुछ देर के लिए ठहरा और फिर फिसल गया।
"नहीं नीरा, अभी नहीं।" एक आखिरी गोली की आवाज़ हवा में देर तक गूंजती रही।
दूर से आते पुलिस की गाडि़यों के साइरन सुनाई दे रहे थे जो इस शहर के लिये रोज़मर्रा की बात थी। अपने-अपने घरों में लोग नाश्ता करते रहे, सांस रोके, टी वी के सामने बैठे, समाचार सुनने को बेताब कि पड़ौस में आज सुबह क्या घटा था।

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