शनिवार, 27 मार्च 2010

गवाक्ष – मार्च 2010


“गवाक्ष” ब्लॉग के माध्यम से हम हिन्दी ब्लॉग-प्रेमियों को हिन्दी/पंजाबी के उन प्रवासी लेखकों/कवियों की समकालीन रचनाओं से रू-ब-रू करवाने का प्रयास करते आ रहे हैं जो अपने वतन हिन्दुस्तान से कोसों दूर बैठकर अपने समय और समाज के यथार्थ को अपनी रचनाओं में रेखांकित कर रहे हैं। “गवाक्ष” में अब तक पंजाबी कवि विशाल (इटली) की कविताओं का हिन्दी अनुवाद, दिव्या माथुर (लंदन) की कहानी, अनिल जनविजय (मास्को) की कविताएं, न्यू जर्सी, यू.एस.ए. में रह रहीं देवी नागरानी की ग़ज़लें, लंदन निवासी कथाकार-कवि तेजेन्द्र शर्मा, रचना श्रीवास्तव, दिव्या माथुर की कविताएं, दुबई निवासी पूर्णिमा वर्मन की कविताएं, यू एस ए में रह रहीं हिन्दी कथाकार-कवयित्री इला प्रसाद, डेनमार्क निवासी कवि भगत धवन की कविताएँ और चाँद शुक्ला की ग़ज़लें, यू एस ए निवासी कवि वेद प्रकाश ‘वटुक’ तथा कवयित्री रेखा मैत्र की कविताएं, कनाडा अवस्थित पंजाबी कवयित्री तनदीप तमन्ना की कविताएं, यू के अवस्थित हिन्दी कवि-ग़ज़लकार प्राण शर्मा की ग़ज़लें, कैनेडा में अवस्थित पंजाबी कवि सुखिन्दर की कविताएं, कनाडा निवासी पंजाबी कवयित्री सुरजीत, अमेरिका अवस्थित डॉ सुधा धींगरा, कनाडा में अवस्थित हिंदी- पंजाबी कथाकार - कवयित्री मिन्नी ग्रेवाल की कविताएं, न्यूजीलैंड में रह रहे पंजाबी कवि बलविंदर चहल की कविता, कैनेडा में अवस्थित पंजाबी लेखिका बलबीर कौर संघेड़ा की कविताएं, इंग्लैंड से शैल अग्रवाल की पाँच कविताएं, सिंगापुर से श्रद्धा जैन की ग़ज़लें, इटली में रह रहे पंजाबी कवि विशाल की कविताएं और पंजाबी कथाकार-उपन्यासकार हरजीत अटवाल के उपन्यास “सवारी” के हिंदी अनुवाद की बाइसवीं किस्त आपने पढ़ीं। “गवाक्ष” के मार्च 2010 अंक में प्रस्तुत हैं - यू एस ए में रह रहीं हिन्दी कथाकार-कवयित्री इला प्रसाद की एक लघुकथा तथा पंजाबी कथाकार-उपन्यासकार हरजीत अटवाल के धारावाहिक पंजाबी उपन्यास “सवारी” की तेइसवीं किस्त का हिंदी अनुवाद…



यू.एस.ए. से
इला प्रसाद की लघुकथा

समुद्र : एक प्रेमकथा

उसने जीवन में कभी समुद्र नहीं देखा था। और देखा तो देखती ही चली गई। अपने छोटे-छोटे हाथ हिला-हिलाकर पास बुलाता समुद्र... किनारों से टकराता, सिर धुनता, अपनी बेबसी पर मानो पछाड़ खाता समुद्र और अंत में सब कुछ लील जाने को आतुर, पागल समुद्र !

उसे लगा, समुद्र तो उसकी सत्ता ही समाप्त कर देगा। वह घबराकर पीछे हट गई।
लेकिन, तब भी समुद्र के अपने आसपास ही कहीं होने का अहसास उसके मन में बना रहा। बरसों। उसे लगता, अब समुद्र कहीं बाहर न होकर उसके अंदर समा गया है और वह एक भंवर में चक्कर काट रही है... विवृति उसकी नियति नहीं है।

वह रह-रह कर चौंकती। समुद्र उसके आसपास ही है कहीं। वह लौट नहीं आई है और न समुद्र उससे दूर है।
फिर उसने पहचाना, समुद्र भयानक था लेकिन उसका उद्दाम आकर्षण अब भी उसे खींचता है। वह लौटने को बेचैन हो उठी।

उसने खुद को अर्घ्य-सा समर्पित करना चाहा।
लेकिन, ज्वार थम गया था। लौटती लहरें उसे भिगोकर किनारे पर ही छोड़ गईं। उसके पैर कीचड़ और बालू में सन गए।

समुद्र ने उसे कहीं नहीं पहुँचाया था। बस, मुक्त कर दिया था। मुक्ति का बोध उसे था लेकिन, उसने स्वीकारना नहीं चाहा। अब सचमुच समुद्र उसके अंदर भर गया था। वह चुपचाप, अकेले में लौटने को बेचैन, रोती-बिसूरती, अपने ही अंदर डूबती-उतराती, अपने पर पछाड़ खाती, किनारों से टकरा-टकराकर टूटती रही।

फिर एक दिन उसने सुना।
समुद्र में फिर तूफान आया था और किसी ने लहरों पर खुद को समर्पित कर अपनी नियति पा ली।

उसने महसूसा, उसके अंदर कुछ मर गया।
वह जानती थी, समुद्र में अब कभी तूफान नहीं आएगा...।
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झारखंड की राजधानी राँची में जन्म। काशी हिन्दू विश्वविद्यालय से सी. एस. आई. आर. की रिसर्च फ़ेलॊशिप के अन्तर्गत भौतिकी(माइक्रोइलेक्ट्रानिक्स) में पी.एच. डी एवं आई आई टी मुम्बई में सी एस आई आर की ही शॊध वृत्ति पर कुछ वर्षों तक शोध कार्य । राष्ट्रीय एवं अन्तर-राष्ट्रीय शोध पत्रिकाओं में शोध पत्र प्रकाशित । भौतिकी विषय से जुड़ी राष्ट्रीय एवं अन्तरराष्ट्रीय कार्यशालाओं/ सम्मेलनों में भागीदारी एवं शोध पत्र का प्रकाशन/प्रस्तुतीकरण।
कुछ समय अमेरिका के कालेजों में अध्यापन।
कृतियाँ : "धूप का टुकड़ा " (कविता संग्रह) एवं "इस कहानी का अंत नहीं" ( कहानी- संग्रह) । एक कहानी संग्रह शीघ्र प्रकाश्य्।
सम्प्रति :स्वतंत्र लेखन ।
सम्पर्क : ILA PRASAD
12934, MEADOW RUN
HOUSTON, TX-77066
USA
ई मेल ;
ila_prasad1@yahoo.com

धारावाहिक पंजाबी उपन्यास(किस्त- 23)




सवारी
हरजीत अटवाल

हिंदी अनुवाद : सुभाष नीरव

॥ अट्ठाइस ॥

बलदेव काम पर जाने के लिए तैयार हो रहा होता तो उसका मन साथ न देता। शाम को जल्दी में वापस भागता। टफनल रोड पर पहुँचता तो फ्लैट में जाने को दिल न करता। काम पर अभी भी वह किसी स्थायी सीट पर नहीं बैठ सका था। हर रोज़ नये टेबुल पर जाना पड़ता। वह यूनियन में गया तो यूनियन वाले उसके पीछे ही पड़ गए कि इतनी लम्बी बीमारी की छुट्टी क्यों ली थी। छुट्टी न लेकर कोई हल्की ड्यूटी कर लेता तो भी रिकार्ड ठीक रह सकता था। उसका रैप कहता था कि करीब छह महीने लगातार बगैर छुट्टी के काम करे तभी यूनियन उसकी तरफ से कुछ करेगी।
फ्लैट में लौटते हुए पहले तरह-तरह की नज़रों में से होकर गुजरना पड़ता था। कई बार उसे झगड़ा बहुत करीब-सा प्रतीत होता। एक दिन एक आदमी उसे रोक कर खड़ा हो गया और कहने लगा-
''डेव, मुझे जानता है ?... मेरा नाम पैडी है, मैं ग्रांट का खास दोस्त हूँ।''
''पैडी, मैं तुझे नहीं जानता।''
''तू तो ग्रांट को भी नहीं जानता, पर उसके फ्लैट पर कब्ज़ा कर लिया।''
''पैडी, मैंने कोई कब्ज़ा नहीं किया, मैरी का ही है यह।''
''वो तो चली गई, तू ही रहता है।''
बलदेव को लगा कि बात गालियों तक पहुँचनी ही है, शायद हाथापाई तक भी। वह तैयार होता हुआ बोला-
''पैडी, यह कौंसल का फ्लैट है, मेरे लिए इसकी कोई अहमियत नहीं।''
''अगर नहीं, तो यहाँ से दफ़ा हो जा और चाबी मेरे हाथ में दे।''
''पैडी, इस वक्त तो तू ही यहाँ से दफ़ा हो जा... फिर न कहते घूमना कि लोग तेरी शक्ल पहचानना ही भूल गए। इतना मारूँगा कि सारी उम्र नहीं भूलेगा।'' बलदेव ने मुट्ठियाँ भींचते हुए कहा।
पैडी पैर मलता चला गया, पर बलदेव की नींद हराम हो गई। उसे डूडू की बातें पहले से भी ज्यादा परेशान करने लगीं। इमरजेंसी में वह गैरथ के फ्लैट में जा सकता था, पर वहाँ इतनी दुर्गन्ध आती थी कि आदमी बीमार हो जाए। दुर्गन्ध तो ग्रांट के फ्लैट में से भी आती थी, तम्बाकू की। इसकी मैरी ने भी सफाई की थी और वह भी करता था, पर अभी भी किसी न किसी कोने से तम्बाकू की चुटकी हाथ लग ही जाती। जब तक पूरी कारपेट नहीं बदली जाती, दीवारों में नया पेपर नहीं लगता, ऐसे ही रहना था। वह मैरी की प्रतीक्षा कर रहा था कि वह आए और जो करना है, करे।
एक दिन मैरी का फोन आ गया कि वह आ रही है। आज ही शाम की फ्लाइट लेने की कोशिश कर रही थी। डैरी से हीथ्रो के लिए हर घंटे जहाज चलते थे। घंटे भर का ही रास्ता था। आम तौर पर लोग एअरपोर्ट से ही टिकट खरीद लेते थे, पर रश होने के कारण कई बार टिकट न भी मिलती। खास तौर पर शाम की फ्लाइटें पहले ही बुक होतीं। टिकट मिलते ही मैरी ने बलदेव को फोन कर दिया। बलदेव दौड़ता हुआ एअरपोर्ट गया। उसके पहुँचते-पहुँचते मैरी की फ्लाइट को पहुँच जाना था। वह इसी हिसाब से घर से चला था।
मैरी को देखते ही उसका मन खुशी से भर उठा। वह बांहें फैलाकर मैरी की तरफ दौड़ा, पर मैरी ने कोई उत्साह नहीं दिखाया। फिर उसे एक ओर ले जाकर आलिंगनबद्ध करते हुए बोली-
''डेव, मेरे साथ ही इस फ्लाइट में बहुत सारे लोग आए हैं डैरी से, कोई भी परिचित हो सकता है।''
''तेरे हसबैंड का परिचित होगा ?''
''हो सकता है, या फिर हमारे परिवार का ही।''
''टैंड से मिलकर आई लगती हो।''
''हाँ मिली थी। मैं घर गई थी, रात में रही भी थी, पर टैंड तो अभी भी वैसा ही है, लूना बिच अभी भी उसके संग ही है।''
''मिच कैसा है ?''
''वह ठीक है, मुझे बहुत मिस करता है।''
फिर वह अपना अटैची घसीटते हुए बलदेव के साथ-साथ कार पॉर्क की ओर चल पड़ी। कार में बैठती हुई बताने लगी-
''डेव, तू भूल रहा है कि हम कैथोलिक हैं।''
''सॉरी !''
''हाँ, टैंड के साथ कई बैठकें हुईं, पादरी ने भी हमें एक करने की कोशिश की, हमारे परिवार वाले भी यही चाहते थे। टैंड कन्फेशन बॉक्स में जाकर लौट आया और मैंने कह दिया कि यह अन्त है।''
बलदेव कुछ न बोला। चुपचाप कार चलाता रहा। मैरी ने फ्लैट के बारे में कुछ बातें पूछीं और कहने लगी-
''यह फ्लैट अब मैंने अपने नाम करवाना है। सारे बिल अपने नाम करवाकर रैगुलर पे करती रहूँगी और साल भर बाद अप्लाई करूँगी कि अपने भाई के साथ ही रहती रही हूँ यहाँ। कइयों ने यही सलाह दी है।''
बलदेव को यह बात वह पहले भी बता चुकी थी। बलदेव को इस बात की भी खीझ-सी थी कि वह उसके जाने के बाद फ्लैट का किराया देता रहा था जो कि ज्यादा था। शौन के घर में वह थोड़े से किराये में ही रहे जा रहा था। मैरी आगे कहने लगी-
''यह बातें छोड़, कभी याद भी किया मुझे ?''
''मैरी, तुझे बहुत मिस किया। पहले अकेला रहने की आदत बन गई थी, अब तेरी आदत पड़ गई है। अच्छा हुआ तू वापस आ गई।''
मैरी खुश हो गई। फिर फ्यूनरल पर इकट्ठा हुए लोगों के बारे में बताने लगी। अगली सवेर बलदेव से उठा नहीं जा रहा था। दिल ही नहीं कर रहा था। मैरी के साथ से अभी उसका मन नहीं भरा था। वह उससे बातें भी पूरी नहीं कर सका था। उसने काम पर से छुट्टी कर ली। छुट्टी के लिए फोन करते हुए उसका मन भी कांप रहा था कि बिना कारण छुट्टी से उसका नुकसान होगा। वह सारा दिन मैरी के साथ पड़ा रहा। मैरी ने कुछ सिगरेट पीं। उसने कहा-
''मैरी, तू तो बहुत टेंशन में स्मोक करती है, क्या हुआ ?''
''डेव, फ्यूनरल की भाग-दौड़ ने आदत-सी बना दी, मैं कंट्रोल कर लूँगी।''
बलदेव का हाईब्री की तरफ का भी चक्कर लग जाता, पर वह दुकान में नहीं जाता थ। उस रात उसे गुरां के बारे में बुरा-सा सपना आया तो उसका मन हुआ कि एक नज़र देख ही आए। वे उधर से गुजर रहे थे। मैरी जानती थी कि यह बलदेव के भाई की दुकान है। बलदेव ने कार को पिछली रोड पर खड़ा किया। मैरी कार में ही बैठी रही और बलदेव दुकान में आ गया। काउंटर पर खड़े शिन्दे ने कहा-
''बड़ी उम्र है भई तेरी, अभी भाजी ऊपर गया है, तेरी ही बातें कर रहा था।''
''मेरी तुमने चुगलियाँ ही करनी हैं, और क्या करना है।''
''भाजी कह रहा था, तू गोरी के साथ रहता है, सच ?''
बलदेव हँसने लगा। शिन्दे ने कहा-
''हँस रहा है, ज़रूर दाल में काला है...इतने दिनों बाद कैसे ?''
''मैं तुझे घुमाने ले जाने के लिए आया हूँ। मैंने सोचा जंग न लग जाए।''
''फिर से पानी दिखाना है ?''
''ओ यार...कहीं बैठेंगे, दारू का घूंट भरेंगे, पर तू तो बिज़ी लगता है।''
''भाजी से पूछ ले, ऊपर ही है, जा, मिल आ।''
बलदेव ऊपर की ओर चल दिया। स्टॉक रूम के बड़े शीशे के सामने खड़े होकर ऐनक ठीक की। बाल संवारे। सीढ़ियाँ चढ़ गया। सीढ़ियाँ चढ़ते सामने रसोई में गुरां खड़ी थीं। वह न मुस्कराई और न कुछ बोली। बलदेव को पता था कि उसका यह गुस्सा दिखाने का अंदाज है। उस दिन शिन्दे को छोड़ने के बाद वह नहीं आया था। उसने गुरां के पास जाकर पूछा-
''तू ठीक भी है ?''
''तुझे क्या ?''
तभी, फ्रंट रूम से अजमेर भी निकल आया। उसने पूछा-
''अब तो नज़दीक ही रहता है, अब न आने का क्या बहाना है?''
''काम पर ही होता हूँ।''
''वीक एंड ?''
''नहाना-धोना।''
गुरां जो चुप थी, कहने लगी-
''धोने वाले कपड़े यहाँ दे जाया कर।''
बलदेव ने इस बात का कोई उत्तर न दिया और अजमेर से पूछने लगा-
''काम काज कैसा है ?''
''काम ठीक ठाक ही है।''
कहता हुआ वह सीढ़ियाँ उतर गया। बलदेव वहीं खड़ा रहा। उसकी आवाज़ सुनकर शैरन भी अपने कमरे में से निकल आई और उसने उससे 'हैलो' की। बलदेव ने गुरां को धीमे से कहा-
''मैं जल्दी में हूँ, सिर्फ़ तुझे ही देखने आया हूँ।''
''झूठा... इतने करीब रह कर भी।''
उसका दिल भर आया। बलदेव ने पूछा-
''सब ठीक है ? मुझे सपने ठीक नहीं आते।''
''मैं ठीक हूँ, मुझे कुछ नहीं हुआ। तेरे सपनों की जड़ें कहीं ओर होंगी।''
बलदेव घड़ी देखता हुआ बोला-
''गुरां, मुझे कहीं जाना है, लौटकर आता हूँ, आज या कल।''
वह चलने लगा तो शैरन बोल उठी-
''बाय-बाय चाचा जी, सी यू अगेन।''
वह शैरन को हाथ हिलाता हुआ नीचे उतर गया। उसके नीचे पहुँचते ही शिन्दा जैकेट उठाये खड़ा था। अजमेर ने पूछा-
''कहाँ ले जाना चाहता है इसे ?''
''कहीं खास नहीं, मैंने सोचा, चक्कर-सा लगवा दूँ, कहीं बैठकर बीयर-सोडा पिला दूँ।''
''बीयर तो यहाँ पॉल के पी आते हैं।''
''यहाँ तो पीते ही हैं, उधर वैस्ट एंड का चक्कर लगा आते हैं। मेरे काम पर पार्टी-सी है। मैंने सोचा, इसे भी ले चलूँ।''
बलदेव ने बहाना घड़ दिया। अजमेर ने कहा-
''एक बात का ध्यान रखना, इसे अपनी राहों पर न लगा लेना, तू तो बच्चों को छोड़े बैठा है, पर इसका सब कुछ है अभी... तेरे वाले उलटे कामों में पड़ गया तो गया, न ये घर का रहेगा, न घाट का।''
उसकी यह बात बलदेव को सीने में बजी। वह चुपचाप चल दिया। शिन्दा उसके पीछे ही था। उसने शिन्दे से कहा-
''तूने अच्छी तरह पूछ लिया। उस दिन कह रहा था कि क्यों लेकर गया।''
''तू चला चल, यह मुझे हर वक्त नाईयों की बछिया की तरह तो बांधे रखता है दुकान में। और फिर बड़े भाई की बात ऐसी ही होती है, ज्यादा बोदर नहीं किया करते। देख, मैं कभी गुस्सा नहीं करता।''
''पर देख ले, बात कहते समय मिनट नहीं लगाता। एकबार भी नहीं सोचता कि किसी के कहाँ मार करेगी।''
''बलदेव, यह गोरी वाली बात सच है ?''
बलदेव कुछ न बोला और चलता रहा। आगे जा कर कार के पिछले दरवाजे की ओर इशारा किया। कार में बैठी मैरी को देखकर शिन्दे की आँखें चमक उठीं और शरारती लहजे में सिर मारते हुए बोला-
''मैं जाऊ ?... वापस लौट जाऊँ ?''
''आ जा अब, अगर कबाब में हड्डी बनना ही है तो... इससे मिलाने ही तो तुझे लाया हूँ।''
''पर यह है कौन ?''
''भरजाई समझ इस वक्त तो।'' बलदेव के मन में मैरी को शिन्दे से मिलवाने का विचार अचानक ही आया था।
''फिर तू देवर-भरजाई के बीच में न बोलना।''
''नहीं बोलता, तू जो छीनना चाहता है, छीन ले।''
''मेरी इंट्रोडक्शन करा दे ज़रा।''
कार में बैठते ही शिन्दे ने मैरी से हैलो कहा। बलदेव ने दोनों का परिचय करा दिया। उसने शिन्दे को शैनी बना दिया ताकि मैरी को बोलने में आसानी हो। बलदेव ने कार में पड़ी शिन्दे वाली सिगरेटों की डिब्बी उसे थमा दी। शिन्दे ने ना करते हुए वापस कर दी। बलदेव ने कहा-
''मैरी, शैनी तेरे सामने सिगरेट पीने से झिझक रहा है।''
''इसमें झिझक कैसी ?'' कहकर मैरी ने एक सिगरेट खुद सुलगा ली और एक शिन्दे के मुँह से लगा दी और लाइटर से जलाते हुए बोली-
''वैसे मेरा ब्रांड सिलेक्ट है।''
उसका शुक्रिया करते हुए शिन्दा बोला-
''मेरी आदत तो नहीं, पर कभी-कभी हॉबी के तौर पर स्मोक करता हूँ।''
उसे अंग्रेजी में बोलते देख बलदेव हैरान हो गया और बोला-
''तू तो छा गया, बड़ी जल्दी अंग्रेजी पिक कर ली।''
''टोनी के साथ हर समय लगा जो रहता हूँ। ग्राहकों के साथ भी वास्ता पड़ता है। और तू अपने आप को क्या समझता है ! मौका मिलने पर मेरे और भी हाथ देखना।''
बात करते हुए शिन्दे सीट पर से थोड़ा ऊपर उठ रहा था।
बलदेव ने उसका जवाब देने के बजाय मैरी से पूछा-
''अगर शैनी अपने साथ थोड़ी देर बैठ ले तो तुझे कोई एतराज़ तो नहीं ?''
''नहीं-नहीं डेव, मैं तो बल्कि ज्यादा इन्जाय करूँगी।''
तब तक वे फ्लैट में पहुँच गए। बलदेव ने तीन बड़े पैग बनाकर बांट दिए। जब दूसरा पैग बनाया तो बलदेव बोला-
''मैरी, शैनी ने बहुत देर से नंगी औरत नहीं देखी।''
''दिखा दे, कहीं स्ट्रिपटीज़ पर ले जाकर। तुम मर्दों का यही तो शौक है।''
''मैं कभी नहीं गया। और फिर वे औरतें ठीक नहीं होतीं।''
''तुमने तो जिस्म ही देखना है। या यूँ कह कि भाई के लिए पैसे खर्च करने से डरता है।''
''यह भी ठीक है, पैसे मेरे पास है ही कहाँ।''
''सीधा कह कि कंजूस हूँ... इंडियन तो होते ही पैसे वाले हैं।''
''सभी इंडियन नहीं होते, कई मेरे जैसे पैनीलैस भी हैं।''
कहते हुए बलदेव और पैग बनाने लगा। शिन्दा बोला-
''कहीं जाना है ?''
''नहीं, जाना कहाँ है ?''
''फिर जल्दी क्यों मचा रहा है ?''
''मैंने सोचा, ज़रा किक लगे, सरूर आए।''
वह फिर मैरी को बताने लगा-
''ये जल्दबाजी के पैग मैंने एक्सीलेटर देने के लिए डाले हैं।''
''डेव, मुझे तो कुछ ज्यादा ही एक्सीलेटर दे दिया।''
मैरी नशे में हुई पड़ी थी। बलदेव बोला-
''मैरी, नशे में तू बहुत प्यारी लगने लगती है।''
''सच !''
''हाँ मैरी, तेरा जिस्म और ज्यादा कस जाता है और बहुत खूबसूरत लगने लगता है।''
''थैंक्यू डेव।''
''इसमें थैंक्यू वाली बात नहीं है, मैं तुझे कोई कम्पीलेंट नहीं दे रहा।''
मस्ती में आई मैरी उठकर उसे चूमने लग पड़ी। बलदेव खड़ा हो गया, उसने मैरी को भी खड़ा किया और शिन्दे से कहने लगा-
''शैनी, मैरी दिल की बहुत सुन्दर है, इसकी ठोड़ी बहुत सुन्दर है, इसका एक-एक अंग, इसकी छातियाँ तो जैसे पत्थर की हों, तू देखेगा तो सोचेगा कि नकली हैं या फिर कुछ करा रखा हो।''
मैरी गर्व में भरी खड़ी थी। वह हँसे भी जा रही थी। बलदेव उसकी छातियों पर हाथ फेरने लगा। बलदेव ने उसका टॉप उतार दिया और फिर ब्रा भी। मैरी उसी तरह खड़ी हँसती रही। बीच-बीच में कहती रही, ''डेव, यू आर बास्टर्ड !''
बलदेव उसकी छातियों को तोलता हुआ शिन्दे से बोला-
''शैनी, ये मेरी किस्मत में हैं, तू सिर्फ एक बार छू सकता है।''
मैरी अभी भी हँसी जा रही थी। शिन्दा कहने लगा-
''कोई शर्म कर, देख लेगा कोई।''
कहते हुए उसने मुँह दूसरी तरफ घुमा लिया। मैरी ने बलदेव को आलिंगन में ले लिया और अपना चेहरा उसकी गर्दन में छिपा लिया।
वे देर तक बैठे हँसी-मजाक करते रहे। शिन्दा कहने लगा-
''तू तो निकल चला, तभी किसी के हाथ में नहीं आ रहा।''
शिन्दे को घर जाने के लिए उन्होंने टैक्सी बुला दी। बलदेव कार चलाने योग्य नहीं रहा था। टैक्सी में चढ़ाने के लिए वे नीचे आए। स्टेशन पर टैक्सी वालों का दफ्तर था। जल्दी में भारी कपड़ा दोनों ने ही नहीं उठाया था। ठंड बहुत थी। वापस लौटते समय पैडी मिल गया। यही पैडी आज बलदेव को बहुत प्यार से मिला। वैसे भी बलदेव ने नोट किया था कि मैरी के आने के बाद लोगों का व्यवहार कुछ ठीक हो गया था।
बलदेव को मैरी की एक बात कुछ-कुछ चुभती आ रही थी कि वह टैंड और मिच्च की बहुत बातें करने लगी थी। एक दिन उसने कहा-
''डेव, अगर मिच मेरे पास आया तो हमें कुछ ध्यान से रहना पड़ेगा। दस साल का हो गया है। सब समझता है। लूना के बारे में सारी खबर मुझे वही देता है।''
बलदेव सोचने लगा कि हालात बदलने के आसार दिख रहे थे। एक दिन शराबी हुई मैरी बताने लगी-
''मैं टैंड को खुली ऑफर दे आई हूँ। यहाँ लंदन में आ जाए तो ठीक है।''
बलदेव अपने बारे में सोचने लगा कि अचानक सब कुछ बदल गया तो उसका क्या होगा। जब वह सिमरन से अलग हुआ तो रात के बारह बजे घर से निकल पड़ा था। रात को कार एक पॉर्क में खड़ी की थी और वहीं सो गया था। पर अब सर्दियाँ थीं और कार में रात नहीं काटी जा सकती थी। गैरथ भी ज्यादा शराब पीकर सो जाए तो दरवाजा नहीं खोला करता।
एक दिन वह काम से लौटा तो मैरी का चेहरा उतरा-उतरा-सा था।
बलदेव ने पूछा तो बोली-
''शाम की फ्लाइट में टैंड आ रहा है।''
(जारी…)
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लेखक संपर्क :
67, हिल साइड रोड,साउथाल,
साउथाल, मिडिलसेक्स
इंग्लैंड
दूरभाष : 020-८५७८०३९३
07782-265726(मोबाइल)

शुक्रवार, 26 फ़रवरी 2010

गवाक्ष – फरवरी 2010


“गवाक्ष” ब्लॉग के माध्यम से हम हिन्दी ब्लॉग-प्रेमियों को हिन्दी/पंजाबी के उन प्रवासी लेखकों/कवियों की समकालीन रचनाओं से रू-ब-रू करवाने का प्रयास करते आ रहे हैं जो अपने वतन हिन्दुस्तान से कोसों दूर बैठकर अपने समय और समाज के यथार्थ को अपनी रचनाओं में रेखांकित कर रहे हैं। “गवाक्ष” में अब तक पंजाबी कवि विशाल (इटली) की कविताओं का हिन्दी अनुवाद, दिव्या माथुर (लंदन) की कहानी, अनिल जनविजय (मास्को) की कविताएं, न्यू जर्सी, यू.एस.ए. में रह रहीं देवी नागरानी की ग़ज़लें, लंदन निवासी कथाकार-कवि तेजेन्द्र शर्मा, रचना श्रीवास्तव, दिव्या माथुर की कविताएं, दुबई निवासी पूर्णिमा वर्मन की कविताएं, यू एस ए में रह रहीं हिन्दी कथाकार-कवयित्री इला प्रसाद, डेनमार्क निवासी कवि भगत धवन की कविताएँ और चाँद शुक्ला की ग़ज़लें, यू एस ए निवासी कवि वेद प्रकाश ‘वटुक’ तथा कवयित्री रेखा मैत्र की कविताएं, कनाडा अवस्थित पंजाबी कवयित्री तनदीप तमन्ना की कविताएं, यू के अवस्थित हिन्दी कवि-ग़ज़लकार प्राण शर्मा की ग़ज़लें, कैनेडा में अवस्थित पंजाबी कवि सुखिन्दर की कविताएं, कनाडा निवासी पंजाबी कवयित्री सुरजीत, अमेरिका अवस्थित डॉ सुधा धींगरा, कनाडा में अवस्थित हिंदी- पंजाबी कथाकार - कवयित्री मिन्नी ग्रेवाल की कविताएं, न्यूजीलैंड में रह रहे पंजाबी कवि बलविंदर चहल की कविता, कैनेडा में अवस्थित पंजाबी लेखिका बलबीर कौर संघेड़ा की कविताएं, इंग्लैंड से शैल अग्रवाल की पाँच कविताएं, सिंगापुर से श्रद्धा जैन की ग़ज़लें और पंजाबी कथाकार-उपन्यासकार हरजीत अटवाल के उपन्यास “सवारी” के हिंदी अनुवाद की इकीसवीं किस्त आपने पढ़ीं। “गवाक्ष” के फरवरी 2010 अंक में प्रस्तुत हैं – इटली में रह रहे पंजाबी कवि विशाल की नई कविताओं का हिन्दी अनुवाद तथा पंजाबी कथाकार-उपन्यासकार हरजीत अटवाल के धारावाहिक पंजाबी उपन्यास “सवारी” की बाईसवीं किस्त का हिंदी अनुवाद…
होली 2010 की शुभकामनाएं !

इटली से
विशाल की तीन पंजाबी कविताएँ
हिंदी रूपांतर : सुभाष नीरव
कविताओं के संग चित्र : रुचिरा

एक रिश्ता

अगर उन्होंने लौटना होता
तो इस तरह न जाते
जा कर सुख-सन्देशा भेजते
लौट आने का कोई बहाना घड़ते
ज़रूर भीतर की बात कुछ और होगी
नहीं तो किसके अन्दर
घरों का मोह नहीं जागता।

जाते समय, न आँख उठाकर देखा
न चेहरे पर कोई शिकन आभा
और न ही जाने की कोई उतावली
मोड़ मुड़ते हुए मुड़कर नहीं देखा
नहीं तो एक रिश्ता तो होता ही है
अन्दर-बाहर चलता हिलोरा देता
जीने की चाहत भरता, आलिंगन बनता
पर वे तो सब कुछ तोड़ कर
संयम-सलीकों से भरे
रिश्तों से किनारा कर चलते बनें
तनिक भी ज़ाहिर नहीं किया
हलचल नहीं कोई
नहीं तो, किसी एक को तो
निहारता ही है आदमी
यह किस तरह का जाना था उनका...

वैसे जाने से पहले
उनकी कई बातों की चर्चा भी थी
तितलियों के परों जैसे शोख रंग
उनकी आँखों में दिखाई देते
गरम हो जातीं महफ़िलें उनके साथ
बेपरवाह बनजारे, अस्थिर से
जिधर से भी गुजरते, हवाएँ नाच उठतीं।

पर पता नहीं अचानक क्या हो गया
सब कुछ फिसल सा गया
छिपा गए वे सारी बातें
गहरी-सी चुप
गहरी-सी रात का पहरा हो गया
धरे-धराये रह गए सारे चाव
वे अचानक चले गए।

क्या मालूम
ऐसा अधिक मोह के कारण ही हुआ हो
नहीं तो किसके अन्दर
घरों के लिए मोह नहीं जागता
लौट आने का
कोई बहाना तो होता ही है

क्या पता, क्या हो अन्दर की बात ?
0

रहस्य

मैं तो बहुत पहले आ गया था
तेरा सपना
अपनी आँखों में धर कर लाया था
तुझसे ही पहचाना नहीं गया
न मैं और न ही तेरा अपना सपना।

तू पूछ बैठी-
कौन हो ऋषि ?
मैंने अपनी आँखें तेरी हथेलियों पर रख दीं
कि तू अपना सपना चुन ले
पर तू खोल कर बैठ गई
अपने फलसफों की अधूरी यात्रा
अपनी डायरी के उखड़े हुए पन्नों को तरतीब देती
'कौन तू', 'कौन मैं' के शोर में उलझी
न हुंकारा भरा
न ही शोर खत्म हुआ

पहचान के मेलों में एक बार फिर गुम हो गए
वो तेरे मेरे दरम्यान कैसी घड़ी थी
और मिले या और बिछुड़ गए
ये रहस्य और गहरे हो गए।
0
तेरा अपूर्ण

कई जन्मों से
तेरा नाम जप रहा हूँ
पर हर बार तू अजप हो गई
मेरी महायात्रा
मैं फिर आया हूँ
तू एक श्राप और दे दे
मेरी कोई भी सतर पूरी न हो
मेरी यात्रा टूट जाए अधबीच में
मेरा कभी भी सृजन न हो
कुछ गूंध ही इस तरह मेरे मिट्टी को
कि कोई मूरत न बने
कोई बहाना घड़
अपने हाथों से गिराने का
मैं आधा-अधूरा
कभी भी न होऊँ पूरा
मैं अधूरा, तेरा अपूर्ण
तुझ अजप को जपता
तिड़क जाए मेरी यात्रा।
0
पंजाबी के बहु चर्चित कवि। कविता की अनेक पुस्तकें प्रकाशित। पिछ्ले कई वर्षों से इटली मे।

सम्पर्क :
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धारावाहिक पंजाबी उपन्यास(किस्त- 22)


सवारी
हरजीत अटवाल
हिंदी अनुवाद : सुभाष नीरव
चित्र : रुचिरा


॥ सत्ताइस ॥

सुबह उठते ही बलदेव ने रोज़ की तरह पर्दे खींचे। उसने देखा कि बर्फ़ पड़ी हुई थी। उसका मन खिल उठा। बहुत वर्षों बाद बर्फ़ देखने को मिली थी। टेलीविजन वाले कहते थे कि लंदन में बर्फ़ न पड़ने का कारण 'ग्लोबल वार्मिंग' है। इस धरती नामक प्लैनट का मौसम गरम हो रहा है। गैसों का इतना धुआं बन बनकर आसमान की ओर उड़ता है कि आसमान में छेद हो रहे हैं। सूरज की गरमी ओजोन लेअर को चीरती हुई आसानी से धरती पर पहुँचने लगी है। पर आज इन सभी दावों को झुठलाती बर्फ़ अपनी सफ़ेदी बिखेरने आ पहुँची थी। डार्टमाउथ हाउस ऊँची जगह पर था और उसका यह फ्लैट भी तीसरी मंजिल पर था। खिड़की में से दूर तक देखा जा सकता था। बर्फ़ अभी भी पड़ रही थी। रूई के फाहे कभी चिंदी-चिंदी होकर गिरते तो कभी सघन हो जाते। एस्टेट का पॉर्क बर्फ़ से भरा हुआ था। कारें बर्फ़ के नीचे छिपी हुई थीं। घरों की छतों ने सफ़ेद लिहाफ ओढ़ रखे थे। दरख्तों को जैसे सफ़ेद फूल लगे हों।
वह वहाँ से हट कर फ्लैट की पिछली खिड़की में जा खड़ा हुआ। यहाँ से दूसरी खिड़की जैसा नज़ारा तो नहीं था पर चारों ओर बर्फ़ ही बर्फ़ थी, बर्फ़ के सिवा कुछ नहीं दिखता था। टफनल रोड को भी बर्फ़ ने इस तरह ढक रखा था मानो यह सड़क न होकर सफ़ेद रंग की नहर हो। कभी-कभी कोई कार गुजरती थी। सफेद रंग में कालिमा भर जाती, पर शीघ्र ही रूई के नये गोले कालिमा को मिटा देते।
बलदेव का मन हुआ कि वह नीचे जाए और बर्फ़ की गेंदें बना-बना कर खेले। फिर उसने सोचा कि गुरां करीब हो तो उसके साथ या शैरन के साथ खेलने लगे। उसे अनैबल और शूगर भी याद आने लगीं। इतवार का दिन होने के कारण वे तो अभी सो ही रही होंगी। एक पल के लिए उसके मन में ख़याल आया कि अब उन्हें भी मिलना चाहिए। बहुत समय हो गया था। गैप बड़ा होता जा रहा था। फिर सोचने लगा कि रहने का कोई सही ठिकाना हो तभी सोच सकेगा।
फिर उसे गैरथ डेवी का ख़याल आया। ऐसे मौसम में वह ज़रूर किसी तरफ़ फोटोग्राफी करने निकल जाएगा। फिर वह फोटो किसी लोकल अख़बार को देकर कुछ पैसे प्राप्त कर लेगा। कहने को तो वह लोकल अख़बार का फोटोग्राफर था, पर खर्च के मामले में वह हमेशा तंगहाल ही रहता। एक फोटो के बदले में उसे अधिक कुछ न मिलता। बलदेव सोच रहा था कि आज की खिंची फोटो ज़रूर मंहगी बिकेगी। उसका दिल हुआ कि क्यों न गैरथ को मिल आए। उसका पुराना मित्र था। उन दिनों का जब वह इंडिया से आया ही था और फरन-पॉर्क में रहा करता था। उसने घड़ी देखी। अभी आठ नहीं बजे थे। वह तैयार होने लगा।
गैरथ को वह अधिक नहीं मिला करता था। जब कभी उस तरफ जाना होता, तभी जाता था। अब जब वह टफनल पॉर्क आया था, उसकी तरफ़ नहीं गया था। उस दिन सोहन सिंह के फ्युनरल पर गैरथ आया था पर खास बातें नहीं हो सकी थीं। वह तो उससे उसकी बिल्ली टैग - लिली का हालचाल भी नहीं पूछ सका था। इस बिल्ली के साथ अनैबल और शूगर की कितने ही फोटो थे। गैरथ ने बलदेव की सिमरन के साथ भी फोटो खींची थीं। सिमरन से अलग होकर भी वह गैरथ के फ्लैट में जा बैठता। अपना गम हल्का करने के लिए भी चला जाता। यह गैरथ ही था जिसने उसे कुत्ते को काबू में रखने का गुर भी सिखाया था।
गैरथ को कुत्तों के साथ इतना प्यार था कि जब उसका अपनी पत्नी सिलविया से मुकदमा चल रहा था तो गैरथ अपने कुत्ते टाईगर के बदले अपने घर आदि छोड़ने तक के लिए तैयार था। सिलविया भी ऐसी निकली कि टाईगर गैरथ को नहीं दिया। गैरथ के पास उस वक्त एक कमरे का स्टुडिओ फ्लैट ही हुआ करता था और कोर्ट ने कुत्ते का हक उसे नहीं दिया था। उसे सिर्फ़ इतनी इजाज़त मिली थी कि वह सप्ताह में केवल एक घंटे के लिए जाकर कुत्ते से खेल सकता था। इस घटना से मायूस होकर उसने कुत्ते को तो क्या, अपने तीन बच्चों को भी कभी जाकर नहीं देखा था, घर में से भी कोई हिस्सा नहीं लिया था।
तैयार होता हुआ बलदेव सोच रहा था कि पिछले कुछ दिनों से गैरथ की याद उसे अक्सर आ रही थी, इसका क्या कारण हो सकता था। फिर उसे ख़याल आया कि गैरथ उसका इमरजेंसी का ठिकाना था। यदि कहीं दूसरी जगह रात बिताने का मन न हो या कोई इंतज़ाम न हो तो वह गैरथ के फ्लैट में आ सकता था। यह सोचता हुआ वह जल्दी-जल्दी तैयार होने लगा।
वह फ्लैट से बाहर निकला तो बर्फ़ पड़नी बन्द हो गई थी लेकिन ठंडी शीत लहर चल पड़ी थी जिसका अर्थ था कि यह बर्फ़ अब जम जाएगी। शीघ्र पिघलने वाली नहीं। इससे फिसलने का खतरा भी होगा। उसने इसी कारण ऐसे ट्रेनर्ज पहन लिए थे कि अगर जमी हुई बर्फ़ में चलना पड़ा तो आसानी रहेगी। कपड़े भी भारी ही पहने थे। असल में उसकी मंशा हाईगेट के पॉर्क में जाकर गैरथ के साथ मिलकर फोटोग्राफी करने की थी। फोटोग्राफी का उसे गैरथ जितना तो नहीं पर थोड़ा-बहुत शौक था।
सीढ़ियाँ उतरता हुआ वह सोचने लगा कि इतनी ठंड में कहीं कार की बैटरी ही डाउन न हो गई हो। कार स्टार्ट भी होगी या नहीं। एस्टेट के पॉर्क में पड़ी बर्फ़ पर कदमों का एक भी निशान नहीं था। मानो सभी अभी तक सो ही रहे थे। कोई उठकर किसी तरफ़ गया ही नहीं था। वह धीमे कदमों से चलकर कार तक पहुँचा। बर्फ़ इतनी थी कि कार को पहचानना कठिन हो रहा था। बर्फ़ हटाता वह कार के दरवाजे तक बमुश्किल पहुँचा। बड़ी कठिनाई से दरवाजा खोला। जैसे तैसे होकर कार में बैठ गया। चाबी डालकर घुमाई। इग्निशन ठीक ऑन हो गया। सैल्फ़ मारी तो इंजन नहीं घूमा। फिर कोशिश की। पहले से ज्यादा हिलजुल हुई। धीरे से उसने कार स्टार्ट कर ही ली। अब मसला था, कार को यहाँ से निकालकर मेन रोड पर ले जाने का। एक बार तो उसका दिल हुआ कि लौट कर बिस्तर में जा घुसे। फिर सोचने लगा कि तैयार होने में इतना समय लगाया था, अब चक्कर लगा कर तो देखना ही चाहिए। बर्फ़ के ऊपर कार चलाने का भी एक अलग ही मजा था। उसने धीरे धीरे कार खिसकाई। स्लिपरी से बचता-बचाता बाहर टफनल रोड पर ले आया। बाहर ट्रैफिक चल पड़ने के कारण बर्फ़ कीचड़ बन गई थी और कारों के लिए आसानी हो गई थी। और फिर, कौंसल वाली लॉरी नमक का छिड़काव भी कर गई थी। आगे जंक्शन रोड पर भी ट्रैफिक ठीक चल रहा था। होर्नज़ी रोड को वह आराम से क्रॉस कर गया, पर आगे ट्रैफिक का एरिया न होने के कारण फिर बर्फ़ ही बर्फ़ मिली। सड़क की चढ़ाई के कारण कार स्लिप भी होने लगी। जिस रोड पर गैरथ के फ्लैट वाला ब्लॉक था, वहाँ तक सड़क और भी ज्यादा खराब थी। उसे लगता था कि उसकी कार अभी आस पास खड़ी कारों में बजी कि बजी। बहुत ही कठिनाई से वह ब्लॉक के गेट के आगे पहुँचा।
उसने गैरथ के फ्लैट की घंटी बजाई। ऊपर से कोई उत्तर न आया। सिक्युरिटी गेट लगा होने के कारण वह ब्लॉक के गेट के अन्दर नहीं जा सकता था। अन्दर से ही फ्लैट का मालिक गेट खोलता, तभी जाना संभव हो सकता था। वह कितनी ही देर तक घंटी बजाता रहा। वह सोच रहा था कि गैरथ इतनी देर तक तो सोने वाला नहीं है और इतनी जल्दी उठकर बाहर फोटोग्राफी करने जाने वाला भी नहीं। वह काफी समय खराब करके वापस कार में आकर बैठ गया। कार स्टार्ट करके आगे बढ़ाने लगा तो देखा, सामने से गैरथ चला आ रहा था। सिर पर वही टोप, वही लम्बी दाढ़ी और लम्बा कोट पहने बर्फ़ को पांवों तले कुचलता, छोटे-छोटे डग भरता चला आ रहा था। बलदेव को देखकर वह दूर से ही हँसा और ऊँची आवाज़ में कहने लगा-
''यू बगर ! इतनी ठंड में तू किधर ?''
''मैंने सोचा, देखकर आऊँ, कहीं ठंड में जम न गया हो।''
''डेव, यह ठंड मुझे नहीं जमा सकती।''
बात करता वह उसके नज़दीक पहुँच गया और गर्मजोशी से हाथ मिलाया और बोला-
''तू अपने बारे में बता, तेरे साथ यह ठंड कैसा बर्ताव कर रही है।''
''गैरथ, तुझे तो मालूम ही है, अकेले मर्दों को ठंड कितना कुछ याद करवाने लगती है।''
''तू अभी तक अकेला ही है ?''
कह कर उसने बलदवे को संग आने का इशारा भी कर दिया। बलदेव ने कार लॉक की और उसके पीछे-पीछे चल पड़ा। गैरथ ने अपना सवाल फिर दोहराया तो बलदेव ने कहा-
''ऐसा ही समझ ले।''
''डेव, ये तू अपने संग बहुत ज्यादती कर रहा है। तू अभी नौजवान है, सुन्दर है, तू कम से कम अपने हिस्से की औरतें तो संभाल।''
गैरथ की फिलॉसफी थी कि हर मर्द के हिस्से में एक सौ औरतें होती हैं जिन्हें उसे सारी उम्र भोगना होता है। हर मर्द को अपना हिस्सा ज़रूर लेना चाहिए।
गैरथ ने अपना फ्लैट खोला। एक बदबू का भभका बलदेव के नाक में चढ़ गया। बलदेव को पता था कि यह उसकी बिल्ली की बदबू थी। वैसे फ्लैट अन्दर से गरमाहट से भरा था। कुछ देर बाद बदबू ठीक हो गई। गैरथ ने पूछा-
''क्या पियेगा ? कॉफी या फिर कुछ ठंडा ?''
''ठंडे में क्या है ?''
''बियर मैंने खुद बनाई हुई है। वाइन भी तैयार होने को है। वैसे मेरे पास कुछ ब्रांडी भी है और व्हिस्की भी, जो कहे...।''
''ब्रांडी ले आ।''
''तू ब्रांडी पी और मैं व्हिस्की पीता हूँ।''
उसने मैले से गिलासों में पैग बनाए। पैग क्या बनाए, सारी व्हिस्की एक गिलास में डाल ली और ब्रांडी दूसरे गिलास में। दो-दो गिलासों का पोज होगा। वे नीट ही पी लेंगे। बलदेव ने घूंट भर कर पूछा-
''अपनी लव लाइफ के बारे में बता।''
''हैज़ल है, कामचलाऊ सी। पर है बहुत मूडी। तब से तो बहुत ही मूडी हो गई है जब से मेनोपॉज आरंभ हुआ। पिछले हफ्ते उसका पचासवां बर्थ डे था, बहुत रोई कि मैं बूढ़ी हो गई हूँ।''
इतने में बिल्ली ने बलदेव की गोदी में छलांग लगाई। उसे बहुत घिन्न सी आई। उसने आहिस्ता से उसे उठाकर एक तरफ बिठा दिया। उसने बाहर झांका तो बर्फ़ फिर से पड़नी शुरू हो गई थी। बलदेव ने पूछा-
''गैरथ, बस एक ही कहानी है ?''
''इस उम्र में एक कहानी भी बहुत है। वैसे एक और भी है, पर वह लड़की अभी यंग है। नई-नई अफ्रीका से आई है। मेरे में बहुत दिलचस्पी लेती है। बहुत प्यारी चीज़ है, जवान, तरोताज़ा !''
''कितनी उम्र होगी उसकी ?''
''अट्ठारह साल की।''
''गैरथ इतनी जवान लड़की तेरे साथ ?''
''डेव, तू शायद नहीं जानता, काली लड़कियाँ गोरे रंग पर ही मरती है। वे उम्र नहीं देखा करतीं।''
कहते हुए गैरथ हँसने लगा। बलदेव ने कहा-
''गैरथ, किसी काले को पता चला तो बात उलटी भी पड़ सकती है।''
''यह खतरा तो है।''
वह फिर हँसा और साथ ही बलदेव भी। बाहर मौसम की ओर देखता गैरथ पूछने लगा-
''इतने खराब मौसम में तू किस मार में घूम रहा है ?''
''मैं सोच रहा था कि हाईगेट चलकर फोटोग्राफी करें।''
उसकी बात का गैरथ ने कोई उत्तर न दिया, अपितु उदास हो गया। बलदेव ने कहा-
''गैरथ, क्या बात हो गई ?''
''डेव, फोटोग्राफी तो गई अब... एक वीक मेरा चैक लेट हो गया और उधार मुझे किसी ने दिया नहीं, लिहाजा कैमरा बेचना पड़ा। बहुत बढ़िया कैमरा था वह। जान से भी प्यारा।''
कह कर गैरथ और भी ज्यादा उदास हो गया और बलदेव भी। गैरथ ने कुछ देर बाद पूछा-
''तू बता, किस काम से आया है मेरे पास ?''
''गैरथ, मैं इस काम से आया हूँ कि जहाँ मैं रहता हूँ, वहाँ कोई ट्रबल सी आ सकती है। हो सकता है, रात-बेरात किसी इमरजेंसी में मुझे तेरे पास रहने के लिए आना पड़ जाए।''
(जारी…)
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लेखक संपर्क :
67, हिल साइड रोड,
साउथाल, मिडिलसेक्स
इंग्लैंड
दूरभाष : 020-८५७८०३९३
07782-265726(मोबाइल)

सोमवार, 25 जनवरी 2010

गवाक्ष – जनवरी 2010


“गवाक्ष” ब्लॉग ने जनवरी 2008 में हिंदी ब्लॉग की दुनिया में पदार्पण किया था। जनवरी 2010 में इसने अपना दो वर्ष का सफ़र तय कर लिया है। इस ब्लॉग के माध्यम से हम हिन्दी ब्लॉग-प्रेमियों को हिन्दी/पंजाबी के उन प्रवासी लेखकों/कवियों की समकालीन रचनाओं से रू-ब-रू करवाने का प्रयास करते आ रहे हैं जो अपने वतन हिन्दुस्तान से कोसों दूर बैठकर अपने समय और समाज के यथार्थ को अपनी रचनाओं में रेखांकित कर रहे हैं। “गवाक्ष” में अब तक पंजाबी कवि विशाल (इटली) की कविताओं का हिन्दी अनुवाद, दिव्या माथुर (लंदन) की कहानी, अनिल जनविजय (मास्को) की कविताएं, न्यू जर्सी, यू।एस.ए. में रह रहीं देवी नागरानी की ग़ज़लें, लंदन निवासी कथाकार-कवि तेजेन्द्र शर्मा, रचना श्रीवास्तव, दिव्या माथुर की कविताएं, दुबई निवासी पूर्णिमा वर्मन की कविताएं, यू एस ए में रह रहीं हिन्दी कथाकार-कवयित्री इला प्रसाद, डेनमार्क निवासी कवि भगत धवन की कविताएँ और चाँद शुक्ला की ग़ज़लें, यू एस ए निवासी कवि वेद प्रकाश ‘वटुक’ तथा कवयित्री रेखा मैत्र की कविताएं, कनाडा अवस्थित पंजाबी कवयित्री तनदीप तमन्ना की कविताएं, यू के अवस्थित हिन्दी कवि-ग़ज़लकार प्राण शर्मा की ग़ज़लें, कैनेडा में अवस्थित पंजाबी कवि सुखिन्दर की कविताएं, कनाडा निवासी पंजाबी कवयित्री सुरजीत, अमेरिका अवस्थित डॉ सुधा धींगरा, कनाडा में अवस्थित हिंदी- पंजाबी कथाकार - कवयित्री मिन्नी ग्रेवाल की कविताएं, न्यूजीलैंड में रह रहे पंजाबी कवि बलविंदर चहल की कविता, कैनेडा में अवस्थित पंजाबी लेखिका बलबीर कौर संघेड़ा की कविताएं, इंग्लैंड से शैल अग्रवाल की पाँच कविताएं और पंजाबी कथाकार-उपन्यासकार हरजीत अटवाल के उपन्यास “सवारी” के हिंदी अनुवाद की बीसवीं किस्त आपने पढ़ीं। “गवाक्ष” के जनवरी 2010 अंक में प्रस्तुत हैं – सिंगापुर से श्रद्धा जैन की छह ग़ज़लें तथा पंजाबी कथाकार-उपन्यासकार हरजीत अटवाल के धारावाहिक पंजाबी उपन्यास “सवारी” की इकीसवीं किस्त का हिंदी अनुवाद…


सिंगापुर से
श्रद्धा जैन की छह ग़ज़लें

1
घटा से घिर गयी बदली, नज़र नहीं आती
बहा ले नीर तू उजली, नज़र नहीं आती

हवा में शोर ये कैसा सुनाई देता है
कहीं पे गिर गयी बिजली नज़र नहीं आती

है चारों ओर नुमाइश के दौर जो यारो
दुआ भी अब यहाँ असली नज़र नहीं आती

चमन में खार ने पहने, गुलों के चेहरे हैं
कली कोई कहाँ, कुचली नज़र नही आती

पहाड़ों से गिरा झरना तो यूँ ज़मीं बोली
ये दिल की पीर थी पिघली नज़र नही आती

2

तना है दम चराग़ में तब ही पता चले
फानूस की न आस हो , उस पर हवा चले

लेना है इम्तिहान अगर सब्र दे मुझे
कब तक किसी के साथ कोई रहनुमा चले
नफ़रत की आँधियाँ कभी, बदले की आग है
अब कौन लेके झंडा –ए- अमनो-वफ़ा चले
चलना अगर गुनाह है, अपने उसूल पर
सारी उमर सज़ाओं का ही सिल सिला चले

खंजर लिये खड़ें हों अगर मीत हाथ में
“श्रद्धा” बताओ तुम वहाँ फ़िर क्या दुआ चले

3
च्छी है यही खुद्दारी क्या
रख जेब में दुनियादारी क्या
जो दर्द छुपा के हंस दे हम
अश्कों से हुई गद्दारी क्या
हंस के जो मिलो सोचे दुनिया
मतलब है, छुपाया भारी क्या
वे देह के भूखे क्या जाने
ये प्यार वफ़ा दिलदारी क्या
बातें तो कहे सच्ची "श्रद्धा"
वे सोचे मीठी खारी क्या

4
ल में जब प्यार का नशा छाया
पंछी पिंजरे में खुद चला आया

सह गया जो ख़िजां के ज़ोर–ओ-खम
गुल उसी पेड़ पर नया आया

सबको कह देगा, आँख का काजल
मेरे दिल ने कहाँ सकूँ पाया

क़ैद-ए-सरहद से है वफ़ा आज़ाद
राज़ ये बादलों ने समझाया
आके पहलू में बैठ जा मेरी
“श्रद्धा” अब तो है बस तेरा साया
5
किसने जाना कि कल है क्या होगा
कुरबतें या के फासला होगा
आज़ रोया है वो तो रोने दो
हो न हो खुद से वो मिला होगा
चाँद जो पल में बन गया मिट्टी,
रात दिन किस तरह जला होगा
ज़ुल्म करता नहीं वो बन्दों पर
आज दुनिया का रब जुदा होगा
यूँ न ढूँढों यहाँ वफा “श्रद्धा”
तन्हा तन्हा सा रास्ता होगा
6
अफ़साना –ए-उलफत है, इशारों से कहेंगे
गर तुम न सुनोगे तो सितारोँ से कहेंगे
हम सिद्क़-ओ-इबादत से कभी अज़म-ओ-अदा से
बस अहद -ए- मोह्ह्बत, इन्हीं चारों से कहेंगे
आगोश में मिल जाए समंदर जो वफ़ा का
हम अलविदा दुनिया के किनारों से कहेंगे
चेहरे से चुराओगे जो सुर्खी-ए-तब्ब्सुम
क़िस्सा उड़ी रंगत का बहारों से कहेंगे
आँखों में हैं जल जाते वफाओं के जो जुगनू,
जज़्बात ये “श्रद्धा” के हज़ारों से कहेंगे
00
विदिशा एक छोटे से शहर में 8 नबम्बर 1977 को जन्मी श्रद्धा जैन ने केमिस्ट्री में अपनी शिक्षा पूरी की
ये पिछले नौ सालों से सिंगापुर में निवासित हैं और यहाँ पर एक भारतीय अंतर विद्यालय में हिन्दी अध्यापिका हैं
सम्पर्क : MS. Shrddha Jain, 86 Corporation Rd,#05-12 ,Lake Holmz Condo.
Singapore
H.P. - +65-81983705
ईमेल : shradha8@gmail.com

धारावाहिक पंजाबी उपन्यास(किस्त- 21)


सवारी
हरजीत अटवाल
हिंदी अनुवाद : सुभाष नीरव
चित्र : रुचिरा
॥ छब्बीस ॥

बलदेव ने कार लंदन ब्रिज पर रोक ली। आठ बज रहे थे। अंधेरा पूरी तरह फैल चुका था, पर यहाँ सारा वातावरण रौशनियों ने जगमग-जगमग किया हुआ था। ट्रैफिक अभी भी काफी था। यहाँ कार रोकना मना था, पर बलदेव ने रोक ली। वह शिन्दे को दरिया बिलकुल ऊपर से दिखलाना चाहता थ। पंजाब में तो दरियाओं की कमी थी। शायद ही शिन्दे ने सतलुज या फिर बियास को ध्यान से देखा होगा। अगर उसने थेम्ज़ को उतरा हुआ देखा तो उसे अच्छा नहीं लगेगा।
''हम यहाँ गाड़ी खड़ी नहीं कर सकते, पर मैंने कर ली।''
''क्यों कर ली फिर ? कहते हैं पुलिस टिकट दे देती है।''
''हाँ, दे देती है। हमने दो मिनट ही रुकना है। पुलिस आ गई तो सॉरी कह देंगे।''
''अच्छा ! फिर तो यहाँ की पुलिस मास्टरों से भी गई गुजरी है, वे तो बच्चे के सॉरी कहते-कहते दो थप्पड़ लगा देते हैं।''
''तू जल्दी से आ, तुझे रिवर थेम्ज़ दिखाऊँ। इसीलिए इधर लाया हूँ तुझे।''
शिन्दा बाहर निकलते हुए बोला -
''यह तो भाई दिवाली बना हुआ है।''
फिर उसने पुल की ग्रिल पकड़ते हुए नीचे झांककर देखा और कहा-
''यह तो भाई बहुत खतरनाक है। बंदा गिर पड़े तो लाश भी न मिले।''
फिर शिन्दे ने आसपास देखते हुए कहा-
''हम तो बहुत दूर आ गए लगते हैं।''
''नहीं, बहुत भी नहीं। जितना गाँव से माहलपुर है, यह रोड सीधी हाईब्री को जाती है। पुल पार करके नजदीक ही मेरा दफ्तर है।''
वे पुन: कार में बैठ गए। बलदेव ने कार बढ़ा ली। आगे बायें मोड़कर वाटरलू का चक्कर लगाया। अपना दफ्तर बाहर से दिखाया। दफ्तर दिखाते हुए मन में ही सोचा कि पता नहीं जॉब बचेगी भी कि नहीं। उसकी लम्बी सिक को लेकर झगड़ा पड़ा हुआ था। आगे जाकर टौवर ब्रिज का भी चक्कर लगाया और बलदेव कहने लगा-
''यह दरिया अलग-अलग जगहों से अलग-अलग तरह का दिखाई देता है। कहीं भीड़ा, कहीं से चौड़ा, कहीं भयानक और कहीं भोला सा।''
कार चलाते हुए बलदेव दरिया की ही बातें किए जा रहा था। शिन्दा खीझ-सा गया और बोला-
''तू मुझे यह बता कि थेम्ज़ के पानी से कितने एकड़ खेती होती है ?''
''यह खेती के काम नहीं आता।''
''चल, यह बता कि पिछली बाढ़ में कितने बंदे मरे ?''
''बाढ़ भी नहीं आई कभी।''
''इसके पानी के बंटवारे के लिए कितने झगड़े होते हैं ?''
''तू यार, उलटी बातें करता है। यह साला लंदन है, हुशियारपुर नहीं।''
''वहीं तो मैं कहने जा रहा हूँ कि मैं लंदन में घूम रहा हूँ, कोई लंदन वाली बात कर, यूँ हीं मूर्खों सी बातें किए जा रहा है, पानी सा दिखा कर टैम निकाले जा रहा है।''
''और क्या दिखाऊँ, दिन के समय कुछ दिखा दूँगा।''
''मैंने तो सुना है, लंदन रात में सोहणा लगता है।''
''यह रात ही है, दिखा तो रहा हूँ।''
''छोड़ यार, चल घर को चलें। इससे से भाजी की दुकान में ही ज्यादा रौनक लगती है।''
''तू क्या देखना चाहता है ?''
''कोई गोरी दिखा, अलफ नंगी, जैसी फोटो होती हैं, जैसी फिल्मों में होती हैं।''
''मुल्ला की दौड़ मस्जिद तक।''
''ऐसा ही कह ले, अगर यह काम कर सकता है तो भाई बनकर कर दे।''
''यह काम मेरे वश का नहीं। मैं इस गाड़ी का सवार नहीं।'' हँसते हुए बलदेव कहने लगा।
शिन्दे ने कहा, ''तूने कभी खुद भी कुछ देखा है ?''
बलदेव फिर हँसने लगा। शिन्दा बोला-
''चल, तेरे लिए मैं काम बहुत आसान कर देता हूँ, कहीं से सिगरेट पिला दे। दुकान में पड़ी हुई देखकर तलब लगी हुई है। यह तो तेरे वश का ही काम है ?''
''यह काम आसान ही है।''
पास ही एक दुकान आई। बलदेव उतर कर थैम्सन एंड हैजज की बीस सिगरेटें ले आया। शिन्दे ने उतावली से कार के लाइटर से सिगरेट सुलगाई। कुछ गहरे कश भरे और आनन्दित होता हुआ बोला-
''आदत नहीं, बस हुड़क सी है। वहाँ मिन्दो से छिपकर धुआं निकाल लेता था, यहाँ अब तेरी जट्टी से बहुत डर लगता है।''
उसने जानबूझ कर 'तेरी जट्टी' शब्द का प्रयोग किया था। पर बलदेव ने जैसे सुना ही न हो। उसने एक पब के पॉर्क में ले जाकर गाड़ी खड़ी कर दी। शिन्दे ने कहा-
''बियर की तुम्हारी आदत खराब है, इससे तो थोड़ा-सा पेट भरना ही होता है। मुझे तो व्हिस्की ले देना, बेशक थोड़ी हो।'' पब में जाकर बलदेव भी अधिक खुश नहीं था। उसने वहाँ से कार आगे बढ़ाई और एक ऑफ़ लायसेंस में से बोतल ले ली। कार में बैठकर ही पीने लग पड़े। शिन्दे ने पूछा-
''यह तो बता, तू रहता कहाँ है ?''
''काम के नज़दीक ही कमरा ले रखा है।''
''भाजी है, सतनाम है, इनके पास क्यों नहीं रहता ?''
''भाजी की आदत के बारे में तो तू जानता ही है। उधर मनजीत... और फिर मैं अपना कमाता-खाता हूँ, किसी पर क्यों बोझ बनूँ।''
''जट्टी से डरता तो नहीं दौड़ता ?''
''उससे मुझे क्या डरना। मुझे वैसे ही किसी के बीच रहना अच्छा नहीं लगता।''
''वैसे बलदेव, लगता है तेरी जट्टी अब पहले जैसी नहीं रही। मैंने देखा है, तू उससे बचता घूमता है।''
''वह तो पहले भी मेरी नहीं थी।''
''मुझे बता रहा है... मुझे तो यही बहुत है कि बचाव हो गया। मैं बहुत डर गया था उस समय।''
''शिन्दे लगता है, तुझे शराब चढ़ गई है।'' बलदेव ज़रा सा गुस्से में आ गया।
''जो चाहे कह ले। तू मुझे बता, अपनी घरवाली और बेटियों से कब मिलवाएगा।''
''तुझे उनसे क्या लेना ?''
''वह यार हमारे घर की बहू है, बेटियाँ हैं। उनकी ख़ैर-खबर तो लेनी ही चाहिए।''
''जिस गाँव नहीं जाना उसका राह क्या पूछना, वहाँ की ख़बर क्या रखना। सच बात तो यह है कि जब से उधर से आया हूँ, लौटकर फिर उस इलाके में जाने को दिल नहीं किया।''
''फिर दूसरा विवाह करवा ले। चल इंडिया चलें। गाजे-बाजे से तुझे घोड़ी चढ़ाऊँगा।''
''तू भी यार, भाजी वाली बोली बोले जा रहा है।''
''सभी तेरी फिक्र करते हैं। तू अपनी जगह सैटिल हो जाए, मैं भी कहूँगा विवाह...।''
''विवाह करना आसान बात नहीं। पहले तलाक लूँगा। तलाक के लिए भी ग्राउन्ड चाहिए। और फिर, दूसरी औरत भी ऐसी-वैसी मिल गई तो...।''
बात करता बलदेव अपनी बात पर ज़ोर दे रहा था। शिन्दे ने कहा-
''जैसी तेरी मर्जी। असल में तेरी बात वो है कि दूध का जला, छाछ भी फूंक-फूंक कर पीता है।''
बातें करते हुए वे हाईब्री पहुँच गए। अजमेर ने ही बलदेव को कह रखा था कि शिन्दे को कहीं घुमा दे। बलदेव भी अकेला-सा था। शौन के जाने के बाद वह और अधिक अकेला महसूस करने लगा था। हालांकि शौन से उसकी अधिक बात नहीं होती थी पर किसी दोस्त की निकटता का अहसास ही बहुत था। मैरी भी अभी लौटी नहीं थी। उसे शिन्दे के संग वक्त गुजारना अच्छा लगा पर जब वह अजीब से सवाल करने लगा तो वह ऊब गया था।
दुकान में अजमेर काउंटर पर खड़े होकर ग्राहक सर्व कर रहा था। गुरां और बच्चे भी खड़े थे। उन्हें देखते ही शैरन बलदेव की ओर दौड़ती हुई आई और बोली-
''हैलो चाचा जी, व्हेयर यू बीन ? आय हैव नाट सीन यू फॉर लांग टाइम।''
''जस्ट अराउंड डार्लिंग, आय एम जस्ट अराउंड।''
कहते हुए बलदेव उनके साथ स्कूल की बातें करने लग पड़ा। शिन्दा बोला-
''मेरे साथ नहीं ऐसा बोलते।''
अजमेर भी शैरन और हरविंदर को बलदेव के साथ इतना खुलकर बातें करते देख खुश भी होता और हैरान भी। वह कहने लगा-
''तेरे साथ क्या, ये तो मेरे से भी आँख नहीं मिलाते।''
गुरिंदर भी तभी बोल उठी-
''तुम भी इनके बीच कभी बैठो।''
''यह इनके बीच बैठता है ?''
''यह इनकी बात सुनता तो है कम से कम।''
बलदेव बच्चों से फुर्सत पाकर वापस लौटने की तैयारी में अजमेर के पास आ खड़ा हुआ। गुरां के साथ सरसरी-सी बातें की और बोला-
''अच्छा, मैं चलता हूँ।''
''क्यों ? रोटी नहीं खाएगा ?'' गुरां ने गुस्से में कहा। उसने जवाब दिया-
''बहुत लेट हो गया हूँ, बैठ गया तो ड्रिंक भी हो जाएगी। मुझे गाड़ी भी चलानी है।''
''तू कौन सा दूर रहता है।''
अजमेर ने कहा। बलदेव समझ गया कि चोरी पकड़ी गई। उसे कुछ नहीं सूझा कि जवाब में क्या कहे। वह चुप रहा। अजमेर ने कहा-
''एक दिन माइकल बता रहा था कि तू डार्टमाउथ हाउस में रहता है।''
''हाँ, कोई फ्रेंड आयरलैंड गया हुआ है। उसका फ्लैट खाली था, बस अपना देख रहा हूँ, जल्दी ही ले लूँगा।''
''हम तेरी यह बात बहुत देर से सुनते आ रहे हैं। अगर लेना है तो ले ले।''
गुरां ने खीझ कर कहा। अजमेर ने गुरां की बात की ओर ध्यान दिए बग़ैर ही कहा-
''जानता है, माइकल के पास जो गे है, अरे वही जिसकी फोटो गार्जियन में आई थी।''
''माइकल को तो जानता हूँ, पर गार्जियन में छपी उसकी फोटो के बारे में नहीं जानता।''
''पिछले दिनों इसने क्लेम किया था कि इसे किसी ने रेप किया है। इस तरह गे-रेप शब्द इसी ने पोपुलर किया था।''
''मुझे इस ख़बर का नहीं पता, पर इसकी कोई आर्गनाइजेशन है, फंड इकट्ठा करता घूमता है।''
गुरां को उनकी बातों में दिलचस्पी नहीं थी। वह बोली-
''बात सुन ध्यान से... तू अब रोटी खाकर ही जाएगा। दुकान बन्द करने का टाइम भी हो चला है। अगर अभी खानी है तो इसी तरह ऊपर आ जा, नहीं तो वेट कर ले, सुनता है !''
(जारी…)
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शनिवार, 5 दिसंबर 2009

गवाक्ष – दिसम्बर 2009


“गवाक्ष” के माध्यम से हम हिन्दी ब्लॉग-प्रेमियों को हिन्दी/पंजाबी के उन प्रवासी लेखकों/कवियों की समकालीन रचनाओं से रू-ब-रू करवाने का प्रयास कर रहे हैं जो अपने वतन हिन्दुस्तान से कोसों दूर बैठकर अपने समय और समाज के यथार्थ को अपनी रचनाओं में रेखांकित कर रहे हैं। “गवाक्ष” के पिछ्ले तेरह अंकों में पंजाबी कवि विशाल (इटली) की कविताओं का हिन्दी अनुवाद, दिव्या माथुर (लंदन) की कहानी, अनिल जनविजय (मास्को) की कविताएं, न्यू जर्सी, यू.एस.ए. में रह रहीं देवी नागरानी की ग़ज़लें, लंदन निवासी कथाकार-कवि तेजेन्द्र शर्मा, रचना श्रीवास्तव, दिव्या माथुर की कविताएं, दुबई निवासी पूर्णिमा वर्मन की कविताएं, यू एस ए में रह रहीं हिन्दी कथाकार-कवयित्री इला प्रसाद, डेनमार्क निवासी कवि भगत धवन की कविताएँ और चाँद शुक्ला की ग़ज़लें, यू एस ए निवासी कवि वेद प्रकाश ‘वटुक’ तथा कवयित्री रेखा मैत्र की कविताएं, कनाडा अवस्थित पंजाबी कवयित्री तनदीप तमन्ना की कविताएं, यू के अवस्थित हिन्दी कवि-ग़ज़लकार प्राण शर्मा की ग़ज़लें, कैनेडा में अवस्थित पंजाबी कवि सुखिन्दर की कविताएं, कनाडा निवासी पंजाबी कवयित्री सुरजीत, अमेरिका अवस्थित डॉ सुधा धींगरा, कनाडा में अवस्थित हिंदी- पंजाबी कथाकार - कवयित्री मिन्नी ग्रेवाल की कविताएं, न्यूजीलैंड में रह रहे पंजाबी कवि बलविंदर चहल की कविता, कैनेडा में अवस्थित पंजाबी लेखिका बलबीर कौर संघेड़ा की कविताएं और पंजाबी कथाकार-उपन्यासकार हरजीत अटवाल के उपन्यास “सवारी” के हिंदी अनुवाद की उन्नीसवीं किस्त आपने पढ़ीं। “गवाक्ष” के दिसम्बर 2009 अंक में प्रस्तुत हैं – इंग्लैंड से शैल अग्रवाल की कविताएं तथा पंजाबी कथाकार-उपन्यासकार हरजीत अटवाल के धारावाहिक पंजाबी उपन्यास “सवारी” की बीसवीं किस्त का हिंदी अनुवाद…

इंग्लैंड से
शैल अग्रवाल की पाँच कविताएं

(1)

शब्द बनकर बह चले
देखो सब चन्दा और तारे
बहुत जतन से जो मैंने
अपनी चूनर पर थे टांके
पक्की गांठ लगाकर
टाँका वह जोड़ा था
सूई तो बहुत नुकीली थी
धागा ही कुछ छोटा था।

(2)

बेचैन ये तूलिका
ठहरे ना थमे
रंगों के मटमैले पानी में
आंसू और मुस्कान ज्यों
एक तुम्हारे
आने और जाने पर।

(3)

मन्दिर यह
उसने तो नहीं बनवाया था
हमने ही
सिंहासन पे बिठा
फूल माला चढ़ा
भगवान बनाया था
आलम अब यह है
कि डाली का वह फूल
चरणों पे चढ़कर
माथे से लगकर भी
बस सूखा ही सूखा
और मँदिर में
खड़ा भगवान फिर हँसा
एकनिष्ठ परवशता
असमर्थ आस्था
और हठी हमारी
मूर्खता पर।

(4)

अजीब तस्बीर थी वह
उदास और अस्पष्ट
रंगों की तहों में गुम
ढूंढती कुछ…
लाल पीले चंद छींटे
खुशी का लिबास ओढ़े
मचले बिखरे और बेतरतीब
जैसे नामुराद कोई जिन्दगी
डायरी के पन्नों सी
बेवजह ही खुद को
भरने की कोशिश में
छुप-छुप के रोए।
(5)

दोष किसी का नहीं
जब गति तेज हो
दृष्टि भटक जाती है
धुरी पर घूमती
एक अकेली तीली
सौ रूपों में नजर आती है
शेर की खाल ओढ़े
गीदड़ भी जंगल-जंगल
डर फैला आता है
दस्तानों के पीछे जादूगर
कबूतर उड़ा जाता है
पर जब तीली रुकी
खाल उघड़ी, जादू टूटा
बादलों के पीछे से
निकला फिर सूरज।
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जन्म: 21 जनवरी 1947, वाराणसी में। शिक्षा: बनारस हिंदू विश्वविद्यालय से प्रथम श्रेणी में आनर्स के साथ स्नातक संस्कृत, चित्रकला व अंग्रेज़ी साहित्य में और स्नातकोत्तर उपाधि अंग्रेज़ी साहित्य में। '
1968 से आज तक सपरिवार भारत से दूर इंग्लैंड में, एकांत में शब्दों, रंगों और स्वरलहरी में डूबना प्रिय, लिखने का शौक बचपन से, हिंदी और अंग्रेज़ी में निरंतर लेखन पिछले चंद वर्षों से। कविता, कहानी, लेख व नाटक चंद पत्रिकाओं और संकलनों में, कुछ रेडियो पर भी। '
प्रकाशित रचनाएँ :कहानी-संग्रह :'ध्रुव-तारा' काव्य-संग्रह 'समिधा' व 'नेति-नेति' '
शैल अग्रवाल अभिव्यक्ति में बर्तानिया का प्रतिनिधित्व करती हैं और परिक्रमा के अंतर्गत ‘लंदन पाती’ नाम से नियमित स्तंभ लिखती हैं। ' कई वर्षों से नेट पर हिन्दी-अंग्रेजी में द्विभाषिक वेब पत्रिका “लेखनी” का संचालन-संपादन।
संपर्क : shailagrawal@hotmail.com'