मंगलवार, 22 जून 2010

गवाक्ष – जून 2010


“गवाक्ष” ब्लॉग के माध्यम से हम हिन्दी ब्लॉग-प्रेमियों को हिन्दी/पंजाबी के उन प्रवासी लेखकों/कवियों की समकालीन रचनाओं से रू-ब-रू करवाने का प्रयास करते आ रहे हैं जो अपने वतन हिन्दुस्तान से कोसों दूर बैठकर अपने समय और समाज के यथार्थ को अपनी रचनाओं में रेखांकित कर रहे हैं। “गवाक्ष” में अब तक पंजाबी कवि विशाल (इटली) की कविताओं का हिन्दी अनुवाद, दिव्या माथुर (लंदन) की कहानी, अनिल जनविजय (मास्को) की कविताएं, न्यू जर्सी, यू.एस.ए. में रह रहीं देवी नागरानी की ग़ज़लें, लंदन निवासी कथाकार-कवि तेजेन्द्र शर्मा, रचना श्रीवास्तव, दिव्या माथुर की कविताएं, दुबई निवासी पूर्णिमा वर्मन की कविताएं, यू एस ए में रह रहीं हिन्दी कथाकार-कवयित्री इला प्रसाद, डेनमार्क निवासी कवि भगत धवन की कविताएँ और चाँद शुक्ला की ग़ज़लें, यू एस ए निवासी कवि वेद प्रकाश ‘वटुक’ तथा कवयित्री रेखा मैत्र की कविताएं, कनाडा अवस्थित पंजाबी कवयित्री तनदीप तमन्ना की कविताएं, यू के अवस्थित हिन्दी कवि-ग़ज़लकार प्राण शर्मा की ग़ज़लें, कैनेडा में अवस्थित पंजाबी कवि सुखिन्दर की कविताएं, कनाडा निवासी पंजाबी कवयित्री सुरजीत, अमेरिका अवस्थित डॉ सुधा धींगरा, कनाडा में अवस्थित हिंदी- पंजाबी कथाकार - कवयित्री मिन्नी ग्रेवाल की कविताएं, न्यूजीलैंड में रह रहे पंजाबी कवि बलविंदर चहल की कविता, कैनेडा में अवस्थित पंजाबी लेखिका बलबीर कौर संघेड़ा की कविताएं, इंग्लैंड से शैल अग्रवाल की पाँच कविताएं, सिंगापुर से श्रद्धा जैन की ग़ज़लें, इटली में रह रहे पंजाबी कवि विशाल की कविताएं, यू एस ए में रह रहीं हिन्दी कथाकार-कवयित्री इला प्रसाद की एक लघुकथा, कैनेडा निवासी पंजाबी कवि डा. सुखपाल की कविता और पंजाबी कथाकार-उपन्यासकार हरजीत अटवाल के उपन्यास “सवारी” के हिंदी अनुवाद की पचीसवीं किस्त आपने पढ़ीं। “गवाक्ष” के जून 2010 अंक में प्रस्तुत हैं –यू.एस.ए. में अवस्थित हिंदी की जानी-मानी कवयित्री डॉ. सुधा ओम ढींगरा की कविताएं तथा पंजाबी कथाकार-उपन्यासकार हरजीत अटवाल के धारावाहिक पंजाबी उपन्यास “सवारी” की छब्बीसवीं किस्त का हिंदी अनुवाद…

यू.एस.ए. से
डॉ. सुधा ओम ढींगरा की चार कविताएं
अपेक्षा

पूनी की तरह
गृहस्थी की तक़ली पर
सुती गई…

अपेक्षाओं का सूत
गदरा ही रहा
आकाँक्षाओं के
महीन सूत के लिए
ना जाने
कितनी बार और
मेरी भावनाएँ
तक़ली पर
कती जाती रहेंगी…

मन को अटेरनी बना
इच्छाओं को कस दिया

गृहस्थी का खेस
फिर भी पूरा न हुआ…
0

बेबसी

चाँद से
मुट्ठी भर चाँदनी
उधार ले आई
हृदय के उन कोनों को
उजागर करने के लिए
जहाँ भावनाएँ
रावण बन
सामाजिक मर्यादाओं की
लक्ष्मण-रेखा पार करना चाहती है
और मन सीता-सा
इन्कार करता हुआ भी
छ्ला जाता है।
00

खिलवाड़ –एक

दिन की आड़ में
किरणों का सहारा ले
सूर्य ने सारी ख़ुदाई
झुलसा दी

धीरे से रात ने
चाँद का मरहम लगा
तारों के फाहे रख
चाँदनी की पट्टी कर
सुला दी।
0

खिलवाड़ – दो

किरणों के फावड़ों से
सूर्य ने
सारी ख़ुदाई
खोद डाली

रात उतरी
मेढ़ से औ’
चाँद तारे
बो गई।
००
उक्त चारों कविताएं डॉ. सुधा ओम ढींगरा के सद्य प्रकाशित कविता संग्रह “धूप से रूठी चाँदनी” से ली गई हैं जो शिवना प्रकाशन, पी सी लैब, सम्राट कॉम्प्लैक्स बेसमेंट, बस स्टैंड, सीहोर-466001(मध्य प्रदेश) से अभी हाल ही में प्रकाशित हुआ है।

धारावाहिक पंजाबी उपन्यास(किस्त- 26)



सवारी

हरजीत अटवाल
हिंदी अनुवाद : सुभाष नीरव


॥ इकत्तीस॥

सिमरन ने बैंक के कर्मचारियों के लिए बने कार-पॉर्क में कार खड़ी की। अपना पर्स उठाते हुए बाहर निकली। सीधी खड़ी होकर स्कर्ट के ऊपर आए बल को आगे-पीछे हाथ मारते हुए सीधा करने लगी। फिर कार की पिछली सीट पर से अपनी जैकेट उठाई और आसपास की कारों पर नज़र दौड़ाती अंदाजा लगाने लगी कि कौन कौन आ चुके थे। लगभग सारी ही कारें खड़ी थीं। इसका अर्थ था कि वह लेट थी। आज फैरी ने उसे लेट करवा दिया था। कभी कभी ऐसा हो जाता। अगर वह कुछ मिनट पहले चलती तो बैंक बहुत जल्दी पहुँच जाती, उस समय तक कोई आया ही न होता। उसका घर तो काम पर से इतनी दूर नहीं था लेकिन बीच में थेम्ज़ पड़ता था। यहाँ पर आकर थेम्ज़ कुछ अधिक चौड़ा हो जाता था।
वह ग्रीनिच से चलती। वूलिच आकर फैरी पकड़ती। दरिया पार करते ही वौलफोर्ड है जहाँ उसका बैंक था। दरिया ब्लैकविल टनल के रास्ते भी पार किया जा सकता है, पर टनल थोड़ा दूर पड़ता था और ट्रैफिक भी खूब हो जाता। यह फैरी ही ठीक थी। कई बार उसका दिल करता कि घर ही वौलफोर्ड में ले ले, पर फिर सोचती कि अगर यहाँ से बदली किसी दूसरे बैंक में हो गई तो फिर क्या करेगी। काम तो बदलते ही रहते हैं, पर घर बदलने बहुत कठिन होते हैं। इसलिए वह इस तरह आने-जाने की तकलीफ़ झेले जाती थी। पाँच-सात सौ गज चौड़े दरिया को पार करते हुए अधिक समय तो न लगता, पर उबाऊ-सा होता। फैरी की प्रतीक्षा भी लम्बी होती।
उसने बैंक के पिछले दरवाजे से लगे अलार्म का कोड नंबर दबाया और दरवाजा खोल कर अन्दर प्रवेश कर गई। वह करीब पंद्रह मिनट ही लेट थी। वह सबको 'हैलो' कहती और साथ ही कह देती -'सॉरी, फिर लेट।' मैनेजर सैंडी हैरिस ने हँसते हुए कहा-
''हम तो सोच रहे थे कि थेम्ज़ ने कोई गड़बड़ी कर दी।''
''हाँ सैंडी, यह थेम्ज़ बहुत खराब है। कहाँ बह रहा है, मेरे घर और मेरे आफिस के बीचोबीच।''
''मिस, यह तो सदियों से बह रहा है।''
''हाँ, पर तकलीफ़देह अब हुआ है।'' कहकर हँसती हुई वह जूली की मदद करने लगी। जूली काउंटर खोलने की तैयारी कर रही थी। वे बाहर खड़े ग्राहकों की लाइन का हिसाब लगाकर देखने लगीं कि कितने काउंटर खोले जाएँ। ठीक साढ़े नौ बजे तीन काउंटर खोल दिए गए। बारबरा उनके साथ आ गई थी। लाइन छोटी हुई तो सिमरन अपना काउंटर बन्द करके पिछले डैस्क पर जा बैठी। दस बजे उसकी किसी क्लाइंट से मुलाकात थी। किसी छोटे बिज़नेसमैन ने अपना ओवर-ड्राफ्ट बढ़ाना था लेकिन वह बैंकिंग पूरी नहीं कर रहा था। सिमरन ने एक दिन पहले ही क्लाइंट की फाइल पर बिज़नेस मैनेजर के संग विचार कर लिया था और मन बना रखा था कि उसके ओवर ड्राफ्ट की लिमिट तब तक नहीं बढ़ाई जाएगी, जब तक वह पूरी बैंकिंग करने का वायदा नहीं करता। मैनेजर सैंडी हैरिस को सिमरन पर पूरा विश्वास था, इसलिए बहुत सारे क्लाइंटों को सिमरन अपने हिसाब से डील कर लेती थी। बहुत सारे क्लाइंट भी ऐसे थे जो कि सिमरन पर ज्यादा भरोसा करते। फिर कम अंग्रेजी जानने वाले लोग तो सिमरन के साथ बात करके ही खुश रहते। कुछ एशियन क्लाइंट्स उसके कारण ही बैंक से बंधे हुए थे। मैनेजर उसे बैंक की खास ताकत मानता था। उसके कारण बैंक की टर्न-ओवर बढ़ी थी।
एशियन तो वहाँ एक और था- याकूब सुमरो। पाकिस्तानी था। याकूब सिमरन को कतई नहीं भाता था। कई बार मसखरी-सी के साथ बात करता, खास तौर पर तब से जब से वह बलदेव से अलग हुई थी। सबको पता था। सभी थोड़ी-बहुत हमदर्दी दिखा रहे थे। लेकिन याकूब ज्यादा ही हमदर्द बनता जा रहा था। यहाँ तक कि सिमरन को आँखें दिखानी पड़ी थीं। फिर जब सिमरन की ली हारवे के संग निकटता बढ़ी तो याकूब ने एक बार फिर अंदाज बदला था और सिमरन को उसे डांटना पड़ा था। अब सिमरन उसे नहीं बुलाया करती थी। काम से संबंधित बात भी सीमित शब्दों में करती।
लंच ब्रेक से पहले याकूब सुमरो उसके पास आया और कहने लगा-
''मिसेज बैंस, मैं तुमसे बात करना चाहता हूँ।''
उसने पंजाबी में कहा था और सिमरन अंग्रेजी में बोली-
''मिस्टर सुमरो, मेरे साथ अंग्रेजी में बात करो। यह बैंक है, कोई पॉर्क नहीं।''
याकूब ज़रा-सा झेंपा और फिर बोला-
''मिसेज बैंस, मुझे तुम्हारी मदद की ज़रूरत है।''
''मैं क्या कर सकती हूँ ?''
''स्टैनले स्लेटर मुझसे जूनियर है और उसे प्रोमोशन मिल रहा है। मुझे इग्नोर कर दिया गया है। मैं केस को यूनियन में ऊपर तक ले जाना चाहता हूँ। मुझे शायद तुम्हारी गवाही की ज़रूरत पड़े। यह सब मेरे रंग के कारण हो रहा है।''
''कैसी गवाही ? यह रंग के फ़र्क़ के बारे में मैं क्या कह सकती हूँ ? क्या गवाही दूँगी ?''
''यही मेरे काम के बारे में, मेरे बर्ताव के बारे में। मेरे साथ तो निरी रेशियल डिसक्रिमिनेशन हो रही है।''
''तुम्हारी मदद तो तुम्हारे काम ने करनी है। तुम्हारा काम तुम्हारे पेपरों में बोलेगा, तुम्हें मेरी गवाही की ज़रूरत नहीं पड़ेगी। नस्लवादी कारणों का भी पता चल जाएगा।''
''फिर भी तुम्हें पता ही है गोरों का, हमारे साथ फ़र्क क़रते हैं। अगर तुम इजाज़त दो तो तुम्हारा नाम भर दूँ।''
सिमरन ने मिनट भर के लिए सोचा और कहा-
''भर दो, जो कुछ मेरी जानकारी में होगा, मैं कह दूँगी।''
''थैंक यू। मैं तो सदैव ही तुम्हें बहनों की तरह समझता हूँ।''
सिमरन ने प्रत्युत्तर में कुछ न कहा, पर मन ही मन हँसी। वह सोच रही थी कि याकूब ने उसके बलदेव से अलहदा होने को किस प्रकार मजाक में लिया था। फिर उसे अकेली समझ कर फायदा उठाने की कोशिश की थी। ऐसे ही होते हैं एशियन मर्द। ऐसा ही बलदेव था, पूरा हिप्पोक्रेट। औरत को वस्तु समझने वाला। बलदेव का ख़याल आते ही उसका चेहरा उसके सामने आ गया। बलदेव अच्छा-भला था। उसने बलदेव से कभी नफ़रत नहीं की थी। बस, उससे वह झेला नहीं जाता था। उसे तो सिमरन चाहिए ही नहीं थी, उसे तो गुरिंदर की ज़रूरत थी। बात-बात पर कहने लगता कि गुरिंदर यह पहनती है, गुरिंदर कैसे बोलती है, गुरिंदर ऐसा मेकअप करती है।
बलदेव और सिमरन का विवाह ठीक हो गया था। पहली झड़प उनके बीच रहने के बारे में फैसला करने को लेकर हुई थी। सिमरन ग्रेवज़ैड में रहना चाहती थी और बलदेव फर्न पॉर्क में, उत्तरी लंदन में जहाँ अजमेर रहता था। कुछ समय वे अजमेर के घर में भी रहे, फिर सिमरन को बैंक में नौकरी मिल गई और पहली पोस्टिंग ग्रीनिच में हुई। उसने वहीं घर ले लिया। सो, 'रहना कहाँ है' वाला झगड़ा खत्म हो गया। दूसरी झड़प सिमरन के कपड़ों और बालों को लेकर थी। पहले बलदेव मन में कुढ़ता रहता था, फिर वह सिमरन को टोकने लग पड़ा। वह चाहता था कि गुरिंदर की तरह वह सादे कमीज़-सलवार पहने, उसकी तरह थोड़ा-सा मेकअप करे और धीमे स्वर में बोले। सिमरन को बहुत बुरा लगता। एक दिन तो वह खीझ उठी और ऊँचे स्वर में बोली-
''बलॅडी, वाय नॉट यू अंडरस्टैंड, आय एम फकिन ब्रिटिश एंड शी इज़ फकिन फ्रैशी। डोंट यू डेअर टू कम्पेयर हर विद मी।''
बलदेव को यह वार्तालाप बहुत बड़ा लगा था। कई दिन इसी को लेकर लड़ाई-झगड़ा चलता रहा कि सिमरन ने 'एफ' लफ्ज़ का प्रयोग किया था। गाली निकाली थी। जब कुछ शांति हुई तो बलदेव ने उसे कहा-
''मैं मर्द होकर कभी गाली नहीं निकालता और तू औरत होकर निकालती है। शेम की बात है।''
''वाट वाज़ फकिन डिफरेंस ? तू आदमी है और मैं औरत हूँ, स्टॉप दिस रबिस।''
इस बात पर फिर झगड़ा हो गया। इस झगड़े को सामान्य हालात में लाने के लिए फिर कितने ही दिन लग गए। सिमरन बलदेव से इतनी ऊब गई थी कि उसका दिल करता था कि घर छोड़कर कहीं भाग जाए। उसकी माँ उसे रोकते हुए कहती-
''बेटी, थोड़ा समय और देख ले। यह अभी इंडिया में ही बैठा है, थोड़े समय जब यहाँ की आदत पड़ गई तो ठीक हो जाएगा।''
''मोम, और कितनी देर टोलरेट करूँ इसे ?''
''ऐसा होता है बेटी, इंडिया से आए लड़कों को घटियापन का अहसास होता है, इसलिए भी वह ट्रबल करता होगा। जैसे ठिगने आदमी को बराबर होने के लिए लड़ना पड़ता है, तेरे डैडी की तरह।''
''मोम, डैड तो जैंटिल था, तेरा कहना मानते हैं, तेरी सुनते हैं, पर यह डेव ऐसा नहीं है, ही इज़ टू मच हिप्पोक्रेट।''
''जिस दिन अच्छी जॉब मिल गई, ठीक हो जाएगा। अभी फैक्टरी वर्कर है न।''
बलदेव को रेलवे में क्लर्की मिली तो बहुत खुश था। तनख्वाह बेशक कम थी उसकी फैक्टरी वाली जॉब से, पर बढ़िया नौकरी होने का अहसास था। घर में वह पहले से अधिक प्रसन्न रहने लगा। उसे अच्छे रौ में देखकर सिमरन कहने लगी, ''अपनी हिप्पोक्रेसी को ज़रा नरम कर।''
''नहीं सिमरन, मेरी वैल्यूज़ और तेरी वैल्यूज़ में फ़र्क है।''
''सिर्फ़ हिप्पोक्रेसी का ही फ़र्क़ है। एंड वी आर मैरिड नाउ, वी शुड एडजस्ट।''
''यही तो कर रहा हूँ।''
फिर सिमरन की प्रोमशन होकर वौलफोर्ड वाली ब्राँच में बदली हो गई। वौलफोर्ड दरिया के दूसरी ओर था। कुछ हफ्ते काम पर गई और फिर गर्भवती होने के कारण छुट्टी मिल गई। आठवां महीना चल रहा था। अनैबल का जन्म हुआ। जब अनैबल महीने भर की हुई तो वह दुबारा काम पर जाना आरंभ कर दिया। बेबी को आया के पास छोड़ कर। घर में फिर झगड़ा रहने लगा। बलदेव बच्चे को आया के आसरे नहीं रखना चाहता था। वह चाहता था कि सिमरन काम छोड़ दे। जब वह ग्रीनिच में काम करती थी तो बलदेव को लगता था कि वह आँखों के सामने तो थी, पर वौलफोर्ड बहुत दूर प्रतीत होता। वहाँ तक पहुँचने की तकलीफ़ भी उसे बहुत बड़ी दिखाई देती। बलदेव उसे तरह-तरह की दलीलें देकर काम छोड़ देने के लिए तैयार करता। कभी बच्ची के लालन-पालन को लेकर, कभी वौलफोर्ड के इलाके का रफ एरिया होने की, कभी दरिया के खतरनाक रास्ते की। सिमरन कहती -
''डेव, मैं अपनी जॉब नहीं छोड़ सकती। तू तो इस जॉब की इम्पोर्टेंस समझता ही है। अगर ज्यादा ही है तो तू काम छोड़कर घर संभाल।''
''मैं मर्द हूँ मर्द, समझी।''
इसी खींचतान में शूगर भी आ गई। अब तक बलदेव भी सहनशील हो गया था। वह सवेरे जल्दी काम पर निकल जाता। सिमरन बाद में बच्चों को बेवी मांइडर के पास छोड़कर जाती और बलदेव से पहले घर लौट आती। बच्चियाँ बड़ी हो रही थीं। बड़ी ने बातें करना शुरू कर दिया था, फिर छोटी ने भी। अब वे पहले से अधिक जुड़ गए थे। सिमरन पहले गुस्से में आकर कंधे उचकाकर कह दिया करती थी कि इन बातों की मुझे कोई परवाह नहीं, लेकिन अब यह रवैया उसने छोड़ दिया था। बलदेव ने भी बात-बात में उसकी तुलना गुरिंदर से करना बन्द कर दी थी। वह समझ चुका था कि हर औरत गुरां नहीं होती। लड़ाई-झगड़ा उनका अब भी हो जाया करता। कई-कई दिन बिना बोले बीत जाते। लेकिन दोनों में से कोई न कोई झुक जाता। अब दोनों ने ही झुकना सीख लिया था।
बलदेव का स्वभाव कुछ-कुछ मनमौजी-सा होने लगा था कि जो होता है, होता रहे लेकिन सिमरन ज्यादा प्रैशर में रहने लगी। काम पर अधिक काम का बोझ ओर घर आकर घर का, बच्चों का बोझ। बलदेव ने कभी घर के काम में हाथ नहीं लगाया था। काम पर से लौटता तो सैटी पर जा बैठता और मेज पर टांगें रखकर टेलीविजन देखता रहता या फिर बच्चों के संग खेलता रहता। काम पर उसकी मित्रता शौन से हो गई थी। कई बार उसके संग पब-क्लब में चला जाता तो देर से घर लौटता। सिमरन अकेली बैठी कलपती रहती। सिमरन की बड़ी बहन अमरजीत की अपने घरवाले के साथ अनबन चल रही थी। सिमरन उसके बारे में सोचकर भी अपने मन पर एक बोझ-सा लिए रहती। फिर बहन का तलाक हो गया। इस तलाक का असर सिमरन पर भी हुआ। वह सोचती कि बलदेव के संग और झुककर रह लेगी पर विवाह टूटने नहीं देगी। बलदेव की हर नाराज़गी झेलती रहेगी।
लेकिन हालात सिमरन के हक में नहीं, विरोध में खड़े होने लगे। अमरजीत ने एक मुसलमान लड़का जवैर ढूँढ़ लिया और उसके संग रहने लग पड़ी। इसी बात पर बलदेव गुस्से में रहने लगा। वह सिमरन के पूरे खानदान को ही अबा-तबा बोलने लगा। तभी, ली हारवे सिमरन का इमीजिएट अफ़सर बनकर ब्रांच में आ गया। बैंक के कारोबारी कामों के कारण वह सिमरन को अक्सर शाम को भी फोन करता और घर भी आ जाता। बैंक की नई पॉलिसी से अनुसार एशियन व्यापारियों तक पहुँच बनानी थी। ली हारवे की यही प्रमुख डयूटी थी और सिमरन की उसे ज़रूरत होती। वह शाम की गई कई बार देर से लौटती। क्लाइंट्स के साथ डिनर पर भी जाना पड़ता। बलदेव के सब्र का प्याला जल्द ही छलक गया। एक दिन उसने कहा-
''सिमरन, सब कुछ टॉलरेट कर सकता हूँ, पर यह नहीं किया जाता।''
''डेव, यह मेरी जॉब है।''
''मुझे नहीं चाहिए, ऐसी जॉब।''
''पर मुझे चाहिए। मेरी अब आगे प्रोमोशन के चांस हैं। हो सकता है, मैं बिजनेस कंट्रोलर ही बन जाऊँ।''
''मुझे नहीं चाहिए बिजनेस कंट्रोलर, मुझे वाइफ़ चाहिए। मुझे तेरा वो बन्दा भी पसंद नहीं। मुझे तेरा किसी पराये बन्दे के साथ इस तरह जाना भी पसंद नहीं।''
''इट्स पार्ट ऑफ माय जॉब।''
''छोड़ दे ऐसे जॉब।''
''जॉब मैं नहीं छोड़ सकती।''
''फिर मुझे छोड़ दे।''
सिमरन सिर पकड़कर बैठ गई। फिर कितना कुछ सोचती मन को समझाने लगी।
अगली बार ली हारवे का फोन आया तो बलदेव फिर वही बर्ताव करने लग पड़ा-
''सिमरन, मी ओर दिस मैन एंड जॉब ?''
''डेव, यू आर टू मच फार मी। आय कांट टेक इट।''
''मी टू, आय कांट टेक इट टू।''
''डेव, दैन फक्क ऑफ फ्राम माई लाईफ़।''
(जारी…)
00

लेखक संपर्क :
67, हिल साइड रोड,साउथाल,
मिडिलसेक्स, इंग्लैंड
दूरभाष : 020-८५७८०३९३
07782-265726(मोबाइल)

शनिवार, 29 मई 2010

गवाक्ष – मई 2010



“गवाक्ष” ब्लॉग के माध्यम से हम हिन्दी ब्लॉग-प्रेमियों को हिन्दी/पंजाबी के उन प्रवासी लेखकों/कवियों की समकालीन रचनाओं से रू-ब-रू करवाने का प्रयास करते आ रहे हैं जो अपने वतन हिन्दुस्तान से कोसों दूर बैठकर अपने समय और समाज के यथार्थ को अपनी रचनाओं में रेखांकित कर रहे हैं। “गवाक्ष” में अब तक पंजाबी कवि विशाल (इटली) की कविताओं का हिन्दी अनुवाद, दिव्या माथुर (लंदन) की कहानी, अनिल जनविजय (मास्को) की कविताएं, न्यू जर्सी, यू।एस.ए. में रह रहीं देवी नागरानी की ग़ज़लें, लंदन निवासी कथाकार-कवि तेजेन्द्र शर्मा, रचना श्रीवास्तव, दिव्या माथुर की कविताएं, दुबई निवासी पूर्णिमा वर्मन की कविताएं, यू एस ए में रह रहीं हिन्दी कथाकार-कवयित्री इला प्रसाद, डेनमार्क निवासी कवि भगत धवन की कविताएँ और चाँद शुक्ला की ग़ज़लें, यू एस ए निवासी कवि वेद प्रकाश ‘वटुक’ तथा कवयित्री रेखा मैत्र की कविताएं, कनाडा अवस्थित पंजाबी कवयित्री तनदीप तमन्ना की कविताएं, यू के अवस्थित हिन्दी कवि-ग़ज़लकार प्राण शर्मा की ग़ज़लें, कैनेडा में अवस्थित पंजाबी कवि सुखिन्दर की कविताएं, कनाडा निवासी पंजाबी कवयित्री सुरजीत, अमेरिका अवस्थित डॉ सुधा धींगरा, कनाडा में अवस्थित हिंदी- पंजाबी कथाकार - कवयित्री मिन्नी ग्रेवाल की कविताएं, न्यूजीलैंड में रह रहे पंजाबी कवि बलविंदर चहल की कविता, कैनेडा में अवस्थित पंजाबी लेखिका बलबीर कौर संघेड़ा की कविताएं, इंग्लैंड से शैल अग्रवाल की पाँच कविताएं, सिंगापुर से श्रद्धा जैन की ग़ज़लें, इटली में रह रहे पंजाबी कवि विशाल की कविताएं, यू एस ए में रह रहीं हिन्दी कथाकार-कवयित्री इला प्रसाद की एक लघुकथा और पंजाबी कथाकार-उपन्यासकार हरजीत अटवाल के उपन्यास “सवारी” के हिंदी अनुवाद की चौबीसवीं किस्त आपने पढ़ीं। “गवाक्ष” के मई 2010 अंक में प्रस्तुत हैं – कैनेडा निवासी पंजाबी कवि डा. सुखपाल की कविता तथा पंजाबी कथाकार-उपन्यासकार हरजीत अटवाल के धारावाहिक पंजाबी उपन्यास “सवारी” की पचीसवीं किस्त का हिंदी अनुवाद…


कैनेडा से
डा. सुखपाल की पंजाबी कविता

शब्दो तुम आना
हिंदी रूपांतर : सुभाष नीरव

शब्दो तुम आना
चुपचाप, सहज-सहज
मुंडेर पर आ बैठे
और फिर उड़ गए कबूतरों की तरह
छोटी-छोटी 'गुटर-गूं' करते

आँधी की तरह न आना
कि मुझे किसी वाद की छत के तले छिपना पड़े
या किसी विवाद की डाल को पकड़ना पड़े

तुम आना हुमकती हवा की तरह
जो तन को लगे तो आँखें मुंद-मुंद जाएँ
मन की खिड़कियाँ खुल-खुल जाएँ
फूलों की महक को
मेरे अन्दर आने के लिए राह मिले...

तुम आना उस सुरूर की तरह
जिसके बाद जीने का डर नहीं रहता
जिसके बाद सहज हो जाता है
हर संध्या-समय
बालों को फूलों से गूंथ लेना
पर फूलों को व्यर्थ तोड़ने वाली
कलाई पकड़कर रोक लेना...

सुन्दर शब्दो !
तुम मात्राओं के फीतों से बंधे
मज़दूरों की भांति न आना
तुम 'गगनमै थाल'¹ गाते हुए आना
या आना किसी दिव्य-पुरुष के तीर की तरह...

तुम आना उस टहनी की तरह
जो बदन पर गहरे नील नहीं
बल्कि पीछे छोड़ जाती हैं फूल...

मेरे अपनो !
तुम ऐसे आना
कि तुम्हें गाते हुए
मैं अपने आप तक पहुँच जाऊँ।
0
1-श्रीगुरूग्रंथ साहिब में 'सोहिला' शीर्षक अधीन एक खास वाणी की पंक्ति 'गगनमै थालु रवि चंद दीपक बने'।
(तनदीप तमन्ना के पंजाबी ब्लॉग ''आरसी'' से साभार)


डा. सुखपाल
निवास : कैनेडा
शिक्षा : वेटरिनरी साइंस में पंजाब कृषि विश्वविद्यालय लुधियाना से डिग्री(1982)
और यूनिवर्सिटी ऑफ गुअलफ़, कैनेडा से डॉक्टरेट(1995)।
संप्रति : अध्यापन( एनिमल एनस्थीजिआ यूनिवर्सिटी आफ गुअलफ, कैनेडा)
पुस्तकें : चुप चुपीते चेतर चढ़िया(2003), रहणु किथाऊ नाहि( 2007 )

धारावाहिक पंजाबी उपन्यास(किस्त- 25)

सवारी
हरजीत अटवाल
हिंदी अनुवाद : सुभाष नीरव




॥ तीस ॥
करीब ग्यारह बजे पॉल राइडर ने अपनी टोयटा वैन लाकर 'सिंह वाइन्ज़' के आगे खड़ी की और छोटा-सा हॉर्न बजाकर अन्दर की ओर झांकने लगा। अजमेर उसे देखकर तेजी से आया और वैन में उसके बराबर बैठ गया। पॉल पूछने लगा-
''हाउ यू डूइंग ?''
''फाइन।''
पॉल ने वैन राउंड अबाउट से घुमाकर हौलोवे रोड पर डाल ली। कुछ देर बाद उसने अजमेर से पूछा-
''ऐंडी, तू वैदरस्पून को जानता है ?''
''जिसकी पबों की चेन है।''
''हाँ, वह मेरा दोस्त है। किसी ज़माने में हम इकट्ठे बार मैन हुआ करते थे।''
''मुझे पता है जब उसने आर्चवे में पहला पब खरीदा था, अब वो मिलयनेअर है, कई सौ पब होगा उसका।''
''हाँ ऐंडी, बहुत लक्की है। मेरे से सलाह लेने आता रहा, बस मैंने टिक कर काम नहीं किया। कभी चिप्पी बन गया और कभी पलम्बर, पर वह मन मारकर लगा रहा।''
''बस, चांस मिलने की बात है पॉल।''
''हाँ, उसने हमेशा मैनेजरों के सिर पर काम चलाया और इस बरूरी को कोई मैनेजर ठीक नहीं मिला, नहीं तो यह पब भी ठिकाने का था।''
''बरूरी का पब था ?''
''हाँ, स्मूथ बिटर का, मैं तो इस पब में आता रहा हूँ।''
पॉल किसी पब के बिकने की खबर लाया था। अजमेर ने उसे कह रखा था कि ढंग का पब बिकाऊ हो तो बताये। फिंचली में लोंग लेन पर एक पब बन्द पड़ा था जो बिक रहा था। पॉल ने एजेंट से बारह बजे मिलने का समय तय कर रखा था। इस पब के लिए पॉल उसके साथ आधी हिस्सेदारी में खड़ा होने को तैयार था। इससे अजमेर की पब खरीदने की इच्छा को बल मिला। जब पॉल को इस पब के बिकाऊ होने का पता चला तो वह तुरन्त अजमेर के पास आया था और पब की तारीफें करने लगा था।
यह जो 'थेच्ड हाउस' पब था, यह सिर्फ़ शीला का था। पॉल उसका ब्वॉय फ्रेंड था, पर मालिक की भांति रहता था और इस्तेमाल करता था। शीला को यह पब उसके पहले पति रौबी से तलाक के समय हिस्से के रूप में मिला था। अजमेर को याद था कि पहले इसके मैनेजर जल्दी-जल्दी बदलते रहते थे। पब ढंग से चलता नहीं था। पॉल ने आकर इसे अच्छा-खासा बिजी कर दिया था। पब में उमड़ने वाली भीड़ से अजमेर के बिज़नेस को भी फायदा हुआ था। पब में आए लोग सिगरेट-कंडोम आदि लेने आ जाते। सभी यही कहते थे कि पॉल को बिज़नेस करना आता था।
वे बारह बजे से पहले ही पब के सामने पहुँच गए। एजेंट अभी आया नहीं था। पॉल अजमेर को पब के आसपास का इलाका दिखाने लगा। वैन को घुमाते हुए बोला-
''ऐंडी, देख कितने घर हैं। इनमें कितने लोग रहते हैं। इतनी लम्बी लोंग लेन है पर ये पब यहाँ एक ही था। पब के आगे पॉर्क देख कितना बड़ा... गर्मियों में तो यहाँ इतनी भीड़ होनी चाहिए कि खड़े होने को जगह न मिले। इतना बढ़िया ठिकाना है, पर अगर मैनेजमेंट खराब है तो ठिकाना क्या करेगा। मैं होता इसका मैनेजर तो देखता तू...।''
ऐसी बातें करते हुए वे पब के कार पॉर्क में आ गए। इस्टेट एजेंट भी पहुँच चुका था। उसने उन्हें सारा पब घुमा कर दिखलाया, अन्दर से, बाहर से, नीचे-ऊपर, सेलर और गार्डन। ऊपर फ्लैट में पूरे घर की रिहायश थी। नीचे सेलर इतना खुला था कि स्टॉक रूम बन सकता था। पब का खुला हॉल था। सीटें भी नई थीं। एजेंट हर चीज़ की तारीफ कर रहा था और एजेंट के साथ-साथ पॉल भी ताईद कर रहा था। पब की कीमत दो लाख पाउंड थी जबकि इस इलाके के घरों की कीमत ही ढाई लाख थी। कीमत इसलिए कम थी कि कुछेक काम होने वाला था। कंपनी को बेचने की भी जल्दी थी। कंपनी की नई पॉलिसी के अनुसार बन्द पड़े पब को जल्दी से जल्दी बेचना चाहते थे। एजेंट ने पॉल और अजमेर को सलाह करने के लिए अकेला छोड़ दिया। पॉल बोला-
''ऐंडी, कीमत बहुत जायज है। दो लाख में ऐसी बड़ी प्रॉपर्टी नहीं मिलेगी। यह बार यहाँ से हटा कर दीवार से लगा दी जाए, यहाँ एक तरफ डांस फ्लोर बन जाए, अधिक खर्च करने की ज़रूरत ही नहीं, यह बढ़ईगिरी का काम मैं खुद ही कर लूंगा, बहुत बढ़िया मौका है।''
अजेमर हाँ में सिर हिलाता रहा था। उसने एजेंट से कहा-
''पब हमें पसंद है, अभी और सलाह कर लें। तुम्हें फोन करेंगे।''
''ठीक है, पर कीमत बहुत जायज है। इसमें फ्लैक्सेबिलिटी नहीं है।'' कहता हुआ एजेंट एक तरफ चल दिया और पॉल और अजमेर वैन में आ बैठे। पॉल बोला-
''नो फ्लैक्सेबिलिटी, मॉय फुट। हमारी अपनी प्राइस है, हम अपनी ऑफर देंगे।''
थोड़ा और आगे आकर पॉल ने कहा-
''ऐंडी, पब मुझे चलाना आता है। पब में भीड़ उमड़ती है बैंड के कारण। बढ़िया बैंड हो तो लोग कैसे न आएं। नौजवानों को माडर्न बैंड पसंद है, अधेड़ लोग दूसरी तरह का संगीत पसंद करते हैं और आयरिश लोग कंटरी साइड संगीत को तरजीह देते हैं।''
अजमेर को पॉल की बातें अच्छी लग रही थीं। वह अपना विचार बताते हुए कहने लगा-
''कोई लक्की ड्रा शुरू कर लो, कोई कंपीटिशन आदि।''
''हाँ, बहुत कुछ हो सकता है। पब चलाना कभी भी मुश्किल नहीं। बस ठिकाना बढ़िया हो। चलाने के लिए एक नहीं तो दूसरा तरीका बरता जा सकता है। संगीत नहीं तो स्ट्रिपटीज, दोपहर का खाना भी सहायक होता है। ऐंडी, और भी बहुत से रास्ते हैं, तू मेरे संग खड़ा हो आधी हिस्सेदारी में, हम पब ले लेते हैं।''
''पॉल, सोचते हैं। कुछ और सोच कर इस स्कीम को मैच्योर करते हैं।''
अजमेर इतनी जल्दी हाँ करने वाला नहीं था। उसने पूछा-
''यह पब शीला की नज़र में नहीं पड़ा ?''
''शायद पड़ा हो, शीला में हिम्मत नहीं। उसके बेटा-बेटी तो साथ नहीं देते। ये पब भी मेरे कारण ही चलता है। तुझे बताया था कि मैं अपने भविष्य के बारे में सोचता हूँ, मुझे बच्चा चाहिए जो मेरे खानदान का नाम आगे चला सके और शीला अब इस काबिल नहीं रही।''
अजमेर इस पब की ओर खिंचा जा रहा था। पॉल की बातें उसे सही प्रतीत हो रही थीं। लोंग लेन काफी लम्बी सड़क थी जिस पर अन्य कोई पब भी नहीं था। इसके चल पड़ने के बहुत चांस थे लेकिन पॉल के संग आधे हिस्से वाली बात जच नहीं रही थी। व्यापार में आधा हिस्सा डालना बहुत बड़ी बात होती है। वह पॉल को जानता ही कितना था। पता नहीं, व्यापारिक संबंधों में वह कैसा हो। यह भी सच ही था कि पॉल के पास पब चलाने का हुनर था। यदि वह अकेला ही यह पब खरीद ले तो फिर शायद चले भी न। गोरों का इलाका था। पब का प्बलिक डीलिंग का बिज़नेस होता है। एशियन बन्दे को गोरे पब के मालिक के रूप में देखना पसंद भी करेंगे कि नहीं। कई तरह के ख़याल उसके मन में आ रहे थे। इन ख़यालों में से निकलकर उसने पॉल को कहा-
''दो लाख तो पब का हुआ, ऊपर और कितने लगेंगे ?''
''यही कोई दसेक ग्रैंड, और दो लाख तो वह मांग रहा है, हम ऑफर देंगे...कुछ तो घटायेंगे।''
''ठीक है, कल एक अस्सी की ऑफर दे दें ?''
''बिलकुल ठीक, एक नब्बे में सौदा हो जाने पर दो में पब तैयार।''
''ठीक है, हम वर्क आउट करते हैं कि पल्ले से कितने लगाने हैं और लोन कितना चाहिए।''
''ऐंडी, लोन की कोई प्रॉब्लम नहीं। फ्री होल्ड प्रॉपटी है। एक बैंक मैनेजर मेरा दोस्त है, सत्तर-अस्सी फीसदी कर्ज़ा दे देगा।''
''कर्ज़ा भी हिसाब से ही लेंगे पॉल, अगर डेढ़ लाख कर्ज़ा हुआ तो पचास हजार पास से डालना पड़ेगा।''
बातें करते हुए वे हाईब्री पहुँच गए। पॉल ने वैन अजमेर की दुकान के आगे रोक ली। पॉल ने कहा-
''ऐंडी, अच्छी तरह सोचकर फैसला कर ले। मैं तो बिलकुल तैयार हूँ। पब के काम का तू फिक्र न करना। सारा काम मैं करूँगा, तू बेशक आराम से यह दुकान चलाए जाना।''
''ठीक है पॉल, बाद में बात करते हैं।''
कहते हुए अजमेर उतर गया।
अब अजमेर के मन में हर वक्त पब का भूत सवार रहने लगा। जब से उनके एक गाँववाले ने पब खरीदा था, तब से ही अजमेर भी पब के बारे में सोचने लग पड़ा था। घर पहुँच कर उसने पॉल के संग देखे पब के बारे में बात की। गुरिंदर बेपरवाह-सी बोली-
''मुझे क्या, जैसा मर्जी हो करो। तुम चारो भाइयों ने खुद ही पिये जानी है। आने जाने वाला भी पब में ही उतरेगा।''
''ऐसा नहीं होगा, साथ में गोरा पार्टनर भी तो होगा।''
''गोरा पार्टनर क्यों ? ये गोरे भी कभी किसी के सगे होते हैं।''
यह गोरे पार्टनर वाली बात गुरिंदर को कुनैन की तरह लगी। अजमेर ने सोचा कि उसके संग बात करने का कोई फायदा नहीं। वह किसी न किसी के संग बात करनी चाहता था। अगर टोनी के साथ बात करता तो उसने सबको बताकर पहले ही शोर मचा देना था। शिन्दे के बारे में वह सोचता कि इसे यहाँ के व्यापार की क्या समझ हो सकती है। वह सतनाम की तरफ चल पड़ा। उसके संग यह सब साझा किया जा सकता था। वह कोई सलाह भी दे सकता था। रास्ते में जो भी पब आता, उसे वह बहुत गौर से देखता। लोंग लेन वाला पब इनमें से सबसे सुन्दर लगता।
जब वह पहुँचा, सतनाम फुरसत-सी में ही खड़ा मिला। अजमेर ने सारी कहानी बताई। वह उसके संग पब देखने के लिए लोंग लेन की तरफ चल पड़ा। पब उसे भी बहुत पसंद था। उसने कहा-
''भाई, बाकी तो सब ठीक है, पर यह पॉल के आधे वाली बात सही नहीं।''
''वह कैसे ?''
''मुझे यह आदमी ज़रा डौजी लगता है, उधर तो शीला रखी हुई है, इधर यह लिन के साथ रहता है। मैं उस लड़की को जानता हूँ। अब तो शायद प्रैगनेंट ही हो, कुछ दूसरे ढंग से ही चला करती है।''
''हो सकता है, शीला से इसकी बनती नहीं, बच्चे के लिए तरस रहा है।''
''बस फिर, शीला बांझ है और इसने लिन को रख लिया है और अब यह थैच्ड हाऊस में से मूव होने के चक्कर में है। और यह नया पब इसके लिए बढ़िया मौका है।''
''इससे हमें क्या मतलब। हमें तो यह देखना है कि यह अपने कितना काम आ सकता है, आ भी सकता है कि नहीं।''
''भाई, तू अकेला ले।''
''इस बारे में भी मैंने बहुत सोचा है। एक तो गोरों का इलाका है, दूसरा इस काम की हमें अभी समझ भी नहीं है।''
''बात तो ठीक है, डेढ़ लाख पाउंड की किस्त कितनी आएगी महीने की ?''
''पंद्रह सौ पाउंड के करीब आएगी। मैं सोचता हूँ कि अगर पब अपनी किस्त ही निकाले जाए तो बहुत है। बीच में पड़कर काम का भी पता चल जाएगा। अगर पॉल ठीक चला तो ठीक, नहीं तो उसका हिस्सा देकर एक तरफ करेंगे।''
''ठीक है फिर, ले लो रिस्क।'' सतनाम ने कहा।
अजमेर का पक्का मन बन गया। उसने एजेंट को फोन किया। जैसा पॉल और उसने सोचा था, एक लाख नब्बे हजार में सौदा हो गया। एजेंट ने सौदे के तय हो जाने के कारण हज़ार पाउंड डिपाज़िट के तौर पर मांग लिया और कहा कि जल्दी ही चैक भेज दो ताकि किसी दूसरे ग्राहक को यह पब न दिखाया जाए।
अजमेर अब स्वयं को पब का मालिक समझने लगा था। पब का मालिक बन जाने से उसका मान और बढ़ जाना था। पब का नाम ही बड़ा होता है। पब भी फिंचली में जहाँ के घरों की कीमत आम इलाकों से अधिक हैं। शाम को वह थैच्ड हाऊस में बैठा पॉल से बीयर पीता रहा और भविष्य के प्रोग्राम बनाता रहा।
अगली दोपहर वह काउंटर पर खड़ा था। शिन्दा ऊपर रोटी खाने गया हुआ था। शीला कुछ लेने के लिए दुकान में आई और व्यंग्य में बोली-
''ऐंडी, पब का सौदा हो गया ?''
''हाँ, हो गया। हज़ार पाउंड का चैक एजेंट को भेजना है, बस आज भेज देंगे।''
''ऐंडी, पब वह बढ़िया है, मैंने भी देखा था।''
''फिर तूने क्यों नहीं खरीद लिया ?''
''मैं अकेली हूँ, किधर-किधर होऊँगी। मेरा बेटा-बेटी तो चले गए, यह पॉल भी भरोसे वाला आदमी नहीं, तू भी इससे बचकर रहना।''
''वह कैसे ?''
''देख ऐंडी, तुझे बात साफ़ कर दूँ। इसके पास कोई पैसा-वैसा नहीं है, बिलकुल नंग है। यह चाहता है कि कैश में सारे पैसे तू दे और वह मुफ्त में ही आधे का मालिक बन जाए।''
''यह कैसे हो सकता है। अगर आधे की हिस्सेदारी करनी है तो कैश भी आधा देना पड़ेगा।''
''कितना कैश होगा ?''
''पच्चीस-पच्चीस हज़ार दोनों के हिस्से आएगा।''
''इसके पास तो पाँच सौ पाउंड भी नहीं होगा, इसने बाहर कोई औरत रख रखी है, अपनी सारी तनख्वाह और पब में से पैसे निकाल-निकाल कर उसे खिलाए जाता है... अगर इसके पास पच्चीस हज़ार हो तो मैं न इसे हिस्सेदार रख लेती।''
अजमेर को जैसे साँप सूंघ गया हो। शीला जाते हुए बोली-
''ऐंडी, तू मेरा अच्छा पड़ोसी है, मेरा फर्ज़ है - तुझे आगाह करना, बाकी तू अपनी मर्जी कर।''
शीला एक ही झटके से उसका पब का सपना चकनाचूर कर गई। वह ठगा हुआ खड़ा था। तब तक शिन्दा भी दुकान में आ गया। अजमेर को घबराया हुआ देखकर उसे चिंता हुई। उसने सोचा कि कोई दुकान में से चोरी करके भाग गया है। घंटेभर पहले जब वह दुकान में अकेला था तो एक गोरा लड़का बीयर की बोतल चुरा कर ले गया था। शिन्दा अजमेर को बताने लगा-
''भाजी, आज तो कमाल हो गई। एक गोरा आया, मैं गल्ले पर खड़ा था, उसने फुर्ती से बोतल उठाई और दरवाजा खोल कर भाग गया।''
अजमेर ने उसकी बात सुनी और गुस्से में उबलने लगा और बोला-
''और तू खड़ा देखता रहा ! तुझे तनख्वाह मैं ऐसी चोरियाँ करवाने की देता हूँ ?''
(जारी…)
00

लेखक संपर्क :
67, हिल साइड रोड,
साउथाल, मिडिलसेक्स
इंग्लैंड
दूरभाष : 020-85780393
07782-265726(मोबाइल)

सोमवार, 12 अप्रैल 2010

गवाक्ष – अप्रैल 2010



“गवाक्ष” ब्लॉग के माध्यम से हम हिन्दी ब्लॉग-प्रेमियों को हिन्दी/पंजाबी के उन प्रवासी लेखकों/कवियों की समकालीन रचनाओं से रू-ब-रू करवाने का प्रयास करते आ रहे हैं जो अपने वतन हिन्दुस्तान से कोसों दूर बैठकर अपने समय और समाज के यथार्थ को अपनी रचनाओं में रेखांकित कर रहे हैं। “गवाक्ष” में अब तक पंजाबी कवि विशाल (इटली) की कविताओं का हिन्दी अनुवाद, दिव्या माथुर (लंदन) की कहानी, अनिल जनविजय (मास्को) की कविताएं, न्यू जर्सी, यू.एस.ए. में रह रहीं देवी नागरानी की ग़ज़लें, लंदन निवासी कथाकार-कवि तेजेन्द्र शर्मा, रचना श्रीवास्तव, दिव्या माथुर की कविताएं, दुबई निवासी पूर्णिमा वर्मन की कविताएं, यू एस ए में रह रहीं हिन्दी कथाकार-कवयित्री इला प्रसाद, डेनमार्क निवासी कवि भगत धवन की कविताएँ और चाँद शुक्ला की ग़ज़लें, यू एस ए निवासी कवि वेद प्रकाश ‘वटुक’ तथा कवयित्री रेखा मैत्र की कविताएं, कनाडा अवस्थित पंजाबी कवयित्री तनदीप तमन्ना की कविताएं, यू के अवस्थित हिन्दी कवि-ग़ज़लकार प्राण शर्मा की ग़ज़लें, कैनेडा में अवस्थित पंजाबी कवि सुखिन्दर की कविताएं, कनाडा निवासी पंजाबी कवयित्री सुरजीत, अमेरिका अवस्थित डॉ सुधा धींगरा, कनाडा में अवस्थित हिंदी- पंजाबी कथाकार - कवयित्री मिन्नी ग्रेवाल की कविताएं, न्यूजीलैंड में रह रहे पंजाबी कवि बलविंदर चहल की कविता, कैनेडा में अवस्थित पंजाबी लेखिका बलबीर कौर संघेड़ा की कविताएं, इंग्लैंड से शैल अग्रवाल की पाँच कविताएं, सिंगापुर से श्रद्धा जैन की ग़ज़लें, इटली में रह रहे पंजाबी कवि विशाल की कविताएं, यू एस ए में रह रहीं हिन्दी कथाकार-कवयित्री इला प्रसाद की एक लघुकथा और पंजाबी कथाकार-उपन्यासकार हरजीत अटवाल के उपन्यास “सवारी” के हिंदी अनुवाद की तेइसवीं किस्त आपने पढ़ीं। “गवाक्ष” के अप्रैल 2010 अंक में प्रस्तुत हैं – यू के में अवस्थित जाने-माने ग़ज़लकार प्राण शर्मा की नई ग़ज़लें तथा पंजाबी कथाकार-उपन्यासकार हरजीत अटवाल के धारावाहिक पंजाबी उपन्यास “सवारी” की चौबीसवीं किस्त का हिंदी अनुवाद…

यू.के. से
प्राण शर्मा की तीन ग़ज़लें
(1)
हाथ मिला लेने से यार नहीं होता
हर कोई अपना दिलदार नहीं होता

गंगा का जल पावन ही कहलाता है
सच्चे मन का झूठा प्यार नहीं होता

कैसे कह दूँ बेगानों को मैं अपना
सबसे इक जैसा व्यवहार नहीं होता

कितने हो अनजान कि ये भी जाना नहीं
कांटों का तो कारोबार नहीं होता

दिल चाहे कितना भी किसी का हो पक्का
कौन मुसीबत में लाचार नहीं होता

कुछ तो है संबंध हमारा सपनों से
माना हर सपना साकार नहीं होता

‘प्राण’ समर्पण करना पड़ता है खुद को
प्यार जताने से उपकार नहीं होता

(2)
बुरा-भला रिश्तों के बिगड़ते क्यों बोले
भेद किसी के यारो कोई क्यों खोले

कुछ तो लगे सच्चाई जैसा अय यारो
कोई मुँह से बोले या मन से बोले

क्यों न सुहायें हर मन को फूलों जैसे
लोग कि जिनके चेहरे हैं भोले-भोले

रोज़ नहीं चलती है फ़कीरी इनकी भी
रह जाते है खाली फ़कीरों के झोले

दूर जलाओ आग यहाँ से मतवालो
पड़ न कहीं जाएँ खलिहानों पर शोले

मिट्टी-मिट्टी ‘प्राण’ हुआ कमरा-कमरा
आँधी में दरवाजे मैंने क्या खोले

(3)
मेरी अच्छी किस्मत है कि मुझको अच्छे मीत मिले हैं
लगता है बगिया में केवल सुन्दर-सुन्दर फूल खिले है

ये भी सच है मेरे यारो अपने तो अपने होते हैं
ये भी सच है मेरे यारो अपनों के हर रोज़ गिले हैं

दो वक्तों की रोटी उसको मिली तो गुस्सा क्यों खाता है
शुक्र मना कि बेचारे के बरसों बाद अब होंठ हिले हैं

इतनी खुशी मिली है मुझको, अपनो से बेगानों से भी
लगता है, गुंचे और पत्थर दोनों मिलकर साथ खिले हैं

क्यों न रहो तुम जा के कहीं भी, मन में संशय पालने वालो
सब के सब है अपने यारो, भारत में जितने भी ज़िले हैं
00

जन्म-१३ जून ,१९३७ , वजीराबाद (वर्तमान पाकिस्तान)
शिक्षा –एम ए(हिन्दी), पंजाब विश्वविद्यालय
१९६६ से यू.के में।
सम्मान-१९६१ में भाषा विभाग ,पटियाला ,पंजाब द्वारा आयोजित "टैगोरनिबंध प्रतियोगिता" में द्वितीय पुरस्कार। १९८३ में कादम्बिनी द्वारा आयोजित “अंतर्राष्ट्रीय कहानी प्रतियोगिता " में सांत्वना पुरस्कार। १९८६ में ईस्ट मिडलैंड आर्ट्स ,लेस्टर ,यूं,के द्वारा आयोजित कहानी प्रतियोगिता में प्रथम पुरकार। २००६ में हिन्दी समिति ,यूं .के द्बारा "हिन्दी साहित्य के कीर्तिपुरुष" के रूप में सम्मानित।लेखन- ग़ज़ल विधा पर कई लेख-कहानी और लघु कहानी लिखने में भी रूचि। यूँ तो गीत-कवितायें भी कहते हैं लेकिन गज़लकार के रूप में जाना जाते हैं। ग़ज़ल विधा पर इनके आलेखों की इन दिनों खूब चर्चा है।प्रकाशित कृतियाँ – ‘ग़ज़ल कहता हूँ’ और ‘सुराही’। ‘सुराही’ का धारावाहिक रूप में हिन्दी की वेब पत्रिका ‘साहित्य कुञ्ज’ और महावीर शर्मा के ब्लॉग पर प्रकाशन।
ई मेल : sharmapran4@gmail.com

धारावाहिक पंजाबी उपन्यास(किस्त- 24)



सवारी

हरजीत अटवाल
हिंदी अनुवाद : सुभाष नीरव


॥ उनतीस ॥

अजमेर को सोहन सिंह की मृत्यु के बाद ही पता चला कि वह कितना महत्वपूर्ण था उसकी दुकान के लिए। पूरा रखवाला था। उसके सिर पर ही दुकान को टोनी के आसरे छोड़ सकता था। उसके बाद एक बार तो सब कुछ बहुत ही मुश्किल लगा। न तो टोनी को अकेले छोड़ा जा सकता था इस डर से कि चोरी कर लेगा, न ही वह खुद या गुरिंदर हर वक्त दुकान में खड़े रह सकते थे। गुरिंदर को घर का भी काम करना होता था। अजमेर को भी कई अन्य दुकानों के काम होते। फिर ऊपर से अफ़सोस प्रकट करने वालों की भीड़ लगी रहती। बलदेव शाम को मुँह भर दिखाने आता था। जब शिन्दे को बुलाने की बात हो रही थी तो उसे लगा था कि वह ज़रूर सोहन सिंह वाली जगह की पूर्ति करेगा। वह शिन्दे को अपने संग ही काम पर रख लेगा और वह उसके पास ही रहता रहेगा। शिन्दे को उसके पास ही रहना चाहिए था। भाईचारे में भी उसके पास रहने की ही उसकी बात होनी थी। फिर वह सोचने लगता कि शिन्दा गाँव में निठल्ला ही रहता था। खाली रह कर लंबरदारी-जैसी आदत बन चुकी होगी। पता नहीं, काम में निकम्मा ही हो। उसने तय कर लिया कि शिन्दे के आने पर उसके काम को परख कर ही सोचेगा कि क्या करना है। अगर न हुआ तो वह उसे किसी अन्य जगह काम खोज देगा। कुछ न हुआ तो वापस इंडिया भेज देगा।
शिन्दा आ गया। पहले एअरपोर्ट से पीते हुए आए, फिर सभी पब में जा बैठे। अजमेर शराबी हो गया और ऊपर जाकर सो गया। पहले भी ऐसा ही किया करता था। ज्यादा शराबी हो जाता तो बैड पर गिरने की करता। सतनाम भी चला गया और बलदेव भी। दुकान बन्द करते समय तक टोनी ही रह गया। गुरिंदर उसके संग खड़ी थी। शिन्दे ने आकर टोनी को काम करते हुए देखा और फिर शटर बन्द करवाने में टोनी की मदद करने लगा। सवेरे उठकर शिन्दा शटर स्वयं ही खोलने लगा। उसने सोहन सिंह वाली जगह अच्छी तरह हथिया ली। गुरिंदर ने टिल्ल सिखाने की कोशिश की तो शिन्दे ने सहजता से सीख ली। अजमेर को खुशी थी कि शिन्दा काम में ठीक था। उसने टोनी को ओवरटाइम देना कम कर दिया। इतवार को उसने टोनी को बुलाना ही बन्द कर दिया। दो घंटे तो दुकान खुलती थी। शिन्दे के साथ गुरिंदर खड़ी हो जाती। काम चल जाता। शाम को भी साढ़े तीन घंटे के लिए ही दुकान खुलती थी। वे जैसे तैसे काम चला लेते।
अजमेर ने सोचकर शिन्दे से कहा-
''कहाँ काम करना चाहता है ? यहीं दुकान में या कहीं ओर ?''
''भाजी, मुझे जहाँ भेज दोगे मैं वहीं कर लूँगा, मेरा क्या है।''
''अगर बाहर करेगा तो किराये पर रहना पड़ेगा, रोटी भी खुद पकानी पड़ेगी, कपड़े भी खुद धोने पड़ेंगे। काम भी ऐसा-वैसा ही मिलेगा। यहाँ घर है और कोई प्राब्लम नहीं।''
''जैसा कहते हो, मैं यहीं कर लूँगा।''
''बुच्चड़ के साथ भी सलाह कर ले।''
''इसमें सलाह की क्या ज़रूरत है। जैसा तुमने कह दिया, वे कौन सा तुम्हारी बात काटने वाले हैं।''
''पता नहीं, उसे टंगड़ी-सी तो फंसाने की आदत है।''
अजमेर ने कहा। अगले दिन सतनाम से भी इस बारे में बात की। कहने लगा-
''मैंने शिन्दे से बात की थी कि रहना है या वापस जाना है। कहता था-यहीं रहना है। मैंने कहा- भई बाहर काम ढूँढ़ देते हैं, मेरे पास तो टोनी है ही। कहने लगा- मैंने यहीं दुकान में ही काम करना है। मैंने कहा- चल ठीक है। मैं पचास पाउंड हफ्ते के दिए जाऊँगा, बाहर रहकर पचास नहीं बचने वाले।''
सतनाम ने कोई उत्तर नहीं दिया। पर उसने इसके बारे में सोचना आरंभ कर दिया। शिन्दे को पचास पाउंड का पता चला तो वह खुश हो गया। उसने पाउंडों को रुपये में बदल कर देखा था। पचास हफ्ते की, दो सौ महीने के और ढाई हज़ार साल के। बात लाखों में पहुँचती थी। उसके तो धरती पर पैर ही नहीं लग रहे थे। उसने काम करते होने का दिखावा करना टोनी से सीख लिया था और वह हर वक्त हाथ चलाता ही रहता। उसकी तरफ देखता अजमेर सोचने लगा कि क्यों न कोई दुकान या कोई बिजनेस साथ के साथ फंसा लिया जाए। दुकान तो इस तरह शिन्दे द्वारा संभाली ही जानी थी।
अब मसला यह था कि शिन्दे का सैर का वीज़ा छह महीने का था। उसके बाद उसका क्या इंतज़ाम होना था। यह चिंता शिन्दे की नहीं थी। अजमेर की थी या थोड़ा-बहुत सतनाम की। अजमेर ने सतनाम से बात की तो वह बोला-
''इललीगल ही रहना पड़ेगा, अब और तो कोई रास्ता नहीं पक्का होने का।''
''राह तो है एक, खालिस्तानी बनकर पुलिटिकल स्टे की एप्लीकेशन दे दे।''
''दे दो फिर, देखी जाएगी। शायद बात बन जाए। जहाँ पहले ही हज़ारों-लाखों स्टे के लिए एप्लाई किए घूमते हैं, वहाँ इसकी एक एप्लीकेशन से होम ऑफिस भला कितना बिजी हो जाएगा।''
''पर लोग क्या कहेंगे कि कामरेड परगट सिंह के भतीजे ने खालिस्तानी बन कर...।''
''बात तो भाई ठीक है यह भी।''
''मैं सोचता हूँ कि इसी तरह रहे जाए, ज़रूरत पड़े तो मेरे वाली या बलदेव वाली अडेंटीफिकेशन इस्तेमाल कर कर ले।''
बात हो गई। शिन्दा सोहन सिंह की तरह दुकान का एक हिस्सा बन गया। शेष सब कुछ 'सिंह वाइन्ज़' में पहले की तरह ही था।
बलदेव और मनजीत इतवार को आ जाते। पहले की भांति मुनीर और प्रेम शर्मा भी आ जाया करते। पब में जा बैठते। गिलासों के गिलास खाली होते। अजमेर पब के व्यापार को बहुत गौर से देखता। कई बार पब के मालिक पॉल राइडर के साथ भी पब के कारोबार के बारे में बातें करने लगता।
पंजाब में गड़बड़ी ज़ोरों पर थी। कई बार अजमेर कहने लगता-
''यह तो शुक्र है, गागू अभी छोटा है, नहीं तो मुंढीर (लड़कों का समूह) के साथ बिगड़ जाता। पंजाब के लड़के पता नहीं क्या सोच रहे हैं।''
वह पंजाब के हालात को लेकर बहुत फिक्रमंद रहता था। वही नहीं, सतनाम और प्रेम भी वहाँ की बातें करते हुए जज्बाती हो जाते। रोज़ ही कितने-कितने बेगुनाह लोग मर रहे थे। मुनीर, इन बातों से अधिक बावास्ता नहीं था। वह छोटी-मोटी बात कर लेता। वह अभी भी बिहार के चांगलो कबीले के वांगली खेल के इर्दगिर्द ही उलझा हुआ था।
एक दिन सतनाम ने कहा-
''मियाँ, हम क्यों न वांगली के बारे में बीच का कोई समझौता कर लें।''
''कैसा समझौता ?''
''तेरी बात को थोड़ा-सा हम मान लेते हैं, थोड़ा-सा तू इधर सरक आ, इस कहानी में से थोड़ी-सी कहानी खारिज कर दे।''
''ओए सतनाम सिंघा, ऐ समझौता तां मैं करसी अगर झूठ होसी। ऐ गल्ल तां मैंनू इस तरहां होंट करसी कि सारी की सारी मेरे जेहन में संभाली पईऊ। अगर यकीन नहीं होसी तो जाके देख छड्डो।''
''तेरा मतलब इतनी सी बात के लिए इंडिया की टिकट खरीदें, फिर बिहार जाकर चांगलो खोजें।''
''तू सरदारा कुछ न कर, ऐह गल्ल यहीं छोड़ सू।''
''कैसे छोड़ दूँ। आदमी का आदमी के साथ मुकाबला तो है ही, पर एक नगाड़े से या तू जिसे वांगलू कहता है, से कैसा मुकाबला।''
''मुकाबला तो प्लेअरों में भी होसी पर दिखता नहीं ऊ। यकीन जाणो यारो।''
''यकीन ! क्यों करें तेरे पर यकीन ? कारण बता।''
''इस कारण कि मैं शरीफ बंदा, अगर नहीं करना सू तो भुला छड्ड।''
''अपनी शराफ़त की काई और बात सुना जो तेरी यह बात मान सकें।''
''की सुणा सां सतनाम सिंघ जी, की सुणां सां। मैं कभी कूकर के सोटी तक नहीं है मारी।''
''कुत्ते को गाली दी होगी।''
सतनाम भी मजे लेने के मूड में था। प्रेम और अजमेर दर्शक बने बैठे थे। मुनीर कुछ खीझकर ठीक होकर गया और बताने लगा-
''गालियों की गल्ल तों ऐह है कि मैनूं आउंदी ही नहीं ऊ। छोटा होता था तो मेरे वालिद साहिब ने एक बंदा मैनूं गालियाँ सिखावण खातिर रखिया होसी। एक गाली मैनूं याद होसी तो उसनूं एक छिल्लड़ मिल सी।''
''मियाँ, तू आगे ही बढ़ी जा रहा है।''
''खुदा कसम।''
मुनीर फिर अपनी बात पर अड़ गया। हँसी-ठट्ठा होता रहा। सतनाम ने कहा-
''तेरी बात का यकीन तो कर लें पर तू हमारी बात का नहीं करेगा।''
''तू बता तो सही।''
''वो जो सामने काला बैठा है, उसकी आँख बकरे की है।''
''यारा, तू मजाक उडा सैं। भला बकरे दी किंज लग सी। वैसे मैनूं तो इह वी नहीं सू पता कि अखियाँ चेंज होसी, इह तो मेरे बाबे ने बदलवाई तो यकीन आसी।''
''तेरा बाबा ने आँख बदलवाई ?... एक और गप्प।''
''यारा, तैनूं मेरी हर गल्ल गप्प लगसी... मेरे बाबे का इक सरदार दोस्त होसी, मरन लगा अखियाँ दान कर गिया, पर बाबे के साथ धोखा हो गया सू, बहुत बड़ा धोखा।''
''वह कैसे ?''
''मेरा बाबा पंज नवाजी और अखियाँ अधिया पी के खुल सण।''
सभी हँसने लगे। इतना हँसे कि आसपास बैठे लोग उनकी ओर देखने लग पड़े। जब तक पब बन्द होने की घंटी बजी, सभी उठकर चल पड़े। मुनीर और प्रेम -पने घर की ओर चल दिए। शिन्दा ग्राहकों को सर्व कर रहा था। सतनाम ने अजमेर से पूछा-
''शिन्दा, काम में कैसा है ?''
''महा लेज़ी...। इसका कोई फायदा नहीं, टोनी भी खीझा पड़ा है। मैं वायदा कर बैठा हूँ काम देने का। अब सोचता हूँ कि मेरे तो पचास भी पूरे नहीं होने वाले।''
(जारी…)
00

लेखक संपर्क :
67, हिल साइड रोड,
साउथाल, मिडिलसेक्स
इंग्लैंड
दूरभाष : 020-८५७८०३९३
07782-265726(मोबाइल)

शनिवार, 27 मार्च 2010

गवाक्ष – मार्च 2010


“गवाक्ष” ब्लॉग के माध्यम से हम हिन्दी ब्लॉग-प्रेमियों को हिन्दी/पंजाबी के उन प्रवासी लेखकों/कवियों की समकालीन रचनाओं से रू-ब-रू करवाने का प्रयास करते आ रहे हैं जो अपने वतन हिन्दुस्तान से कोसों दूर बैठकर अपने समय और समाज के यथार्थ को अपनी रचनाओं में रेखांकित कर रहे हैं। “गवाक्ष” में अब तक पंजाबी कवि विशाल (इटली) की कविताओं का हिन्दी अनुवाद, दिव्या माथुर (लंदन) की कहानी, अनिल जनविजय (मास्को) की कविताएं, न्यू जर्सी, यू.एस.ए. में रह रहीं देवी नागरानी की ग़ज़लें, लंदन निवासी कथाकार-कवि तेजेन्द्र शर्मा, रचना श्रीवास्तव, दिव्या माथुर की कविताएं, दुबई निवासी पूर्णिमा वर्मन की कविताएं, यू एस ए में रह रहीं हिन्दी कथाकार-कवयित्री इला प्रसाद, डेनमार्क निवासी कवि भगत धवन की कविताएँ और चाँद शुक्ला की ग़ज़लें, यू एस ए निवासी कवि वेद प्रकाश ‘वटुक’ तथा कवयित्री रेखा मैत्र की कविताएं, कनाडा अवस्थित पंजाबी कवयित्री तनदीप तमन्ना की कविताएं, यू के अवस्थित हिन्दी कवि-ग़ज़लकार प्राण शर्मा की ग़ज़लें, कैनेडा में अवस्थित पंजाबी कवि सुखिन्दर की कविताएं, कनाडा निवासी पंजाबी कवयित्री सुरजीत, अमेरिका अवस्थित डॉ सुधा धींगरा, कनाडा में अवस्थित हिंदी- पंजाबी कथाकार - कवयित्री मिन्नी ग्रेवाल की कविताएं, न्यूजीलैंड में रह रहे पंजाबी कवि बलविंदर चहल की कविता, कैनेडा में अवस्थित पंजाबी लेखिका बलबीर कौर संघेड़ा की कविताएं, इंग्लैंड से शैल अग्रवाल की पाँच कविताएं, सिंगापुर से श्रद्धा जैन की ग़ज़लें, इटली में रह रहे पंजाबी कवि विशाल की कविताएं और पंजाबी कथाकार-उपन्यासकार हरजीत अटवाल के उपन्यास “सवारी” के हिंदी अनुवाद की बाइसवीं किस्त आपने पढ़ीं। “गवाक्ष” के मार्च 2010 अंक में प्रस्तुत हैं - यू एस ए में रह रहीं हिन्दी कथाकार-कवयित्री इला प्रसाद की एक लघुकथा तथा पंजाबी कथाकार-उपन्यासकार हरजीत अटवाल के धारावाहिक पंजाबी उपन्यास “सवारी” की तेइसवीं किस्त का हिंदी अनुवाद…



यू.एस.ए. से
इला प्रसाद की लघुकथा

समुद्र : एक प्रेमकथा

उसने जीवन में कभी समुद्र नहीं देखा था। और देखा तो देखती ही चली गई। अपने छोटे-छोटे हाथ हिला-हिलाकर पास बुलाता समुद्र... किनारों से टकराता, सिर धुनता, अपनी बेबसी पर मानो पछाड़ खाता समुद्र और अंत में सब कुछ लील जाने को आतुर, पागल समुद्र !

उसे लगा, समुद्र तो उसकी सत्ता ही समाप्त कर देगा। वह घबराकर पीछे हट गई।
लेकिन, तब भी समुद्र के अपने आसपास ही कहीं होने का अहसास उसके मन में बना रहा। बरसों। उसे लगता, अब समुद्र कहीं बाहर न होकर उसके अंदर समा गया है और वह एक भंवर में चक्कर काट रही है... विवृति उसकी नियति नहीं है।

वह रह-रह कर चौंकती। समुद्र उसके आसपास ही है कहीं। वह लौट नहीं आई है और न समुद्र उससे दूर है।
फिर उसने पहचाना, समुद्र भयानक था लेकिन उसका उद्दाम आकर्षण अब भी उसे खींचता है। वह लौटने को बेचैन हो उठी।

उसने खुद को अर्घ्य-सा समर्पित करना चाहा।
लेकिन, ज्वार थम गया था। लौटती लहरें उसे भिगोकर किनारे पर ही छोड़ गईं। उसके पैर कीचड़ और बालू में सन गए।

समुद्र ने उसे कहीं नहीं पहुँचाया था। बस, मुक्त कर दिया था। मुक्ति का बोध उसे था लेकिन, उसने स्वीकारना नहीं चाहा। अब सचमुच समुद्र उसके अंदर भर गया था। वह चुपचाप, अकेले में लौटने को बेचैन, रोती-बिसूरती, अपने ही अंदर डूबती-उतराती, अपने पर पछाड़ खाती, किनारों से टकरा-टकराकर टूटती रही।

फिर एक दिन उसने सुना।
समुद्र में फिर तूफान आया था और किसी ने लहरों पर खुद को समर्पित कर अपनी नियति पा ली।

उसने महसूसा, उसके अंदर कुछ मर गया।
वह जानती थी, समुद्र में अब कभी तूफान नहीं आएगा...।
00
झारखंड की राजधानी राँची में जन्म। काशी हिन्दू विश्वविद्यालय से सी. एस. आई. आर. की रिसर्च फ़ेलॊशिप के अन्तर्गत भौतिकी(माइक्रोइलेक्ट्रानिक्स) में पी.एच. डी एवं आई आई टी मुम्बई में सी एस आई आर की ही शॊध वृत्ति पर कुछ वर्षों तक शोध कार्य । राष्ट्रीय एवं अन्तर-राष्ट्रीय शोध पत्रिकाओं में शोध पत्र प्रकाशित । भौतिकी विषय से जुड़ी राष्ट्रीय एवं अन्तरराष्ट्रीय कार्यशालाओं/ सम्मेलनों में भागीदारी एवं शोध पत्र का प्रकाशन/प्रस्तुतीकरण।
कुछ समय अमेरिका के कालेजों में अध्यापन।
कृतियाँ : "धूप का टुकड़ा " (कविता संग्रह) एवं "इस कहानी का अंत नहीं" ( कहानी- संग्रह) । एक कहानी संग्रह शीघ्र प्रकाश्य्।
सम्प्रति :स्वतंत्र लेखन ।
सम्पर्क : ILA PRASAD
12934, MEADOW RUN
HOUSTON, TX-77066
USA
ई मेल ;
ila_prasad1@yahoo.com