शनिवार, 27 जून 2009

धारावाहिक पंजाबी उपन्यास(किस्त- 15)



सवारी
हरजीत अटवाल
हिंदी अनुवाद : सुभाष नीरव

॥ बीस ॥

सतनाम और मनजीत हाईबरी पहुँचे तो दुकान बन्द देख कर थोड़ा हैरान हो गए। सतनाम ने कहा-
''ये प्रेम चोपड़ा तो कहता था कि दुकान बंद नहीं करनी, कहीं साला टोनी भी पैट्रो न बन गया हो।''
मनजीत ने घंटी बजाई। गुरिंदर ने आकर दरवाजा खोला। सतनाम पूछने लगा-
''शॉप नहीं खोली ?''
''अभी टोनी नहीं आया। तू पहले ऊपर आ, तेरी खबर लेती हूँ।''
''जट्टिये, सुख तो है। हमें तो भाइये की मौत ने ही मारा हुआ है, ऊपर से तू डराने लगी है।''
ऊपर अजमेर शराबी हुआ बैठा था। गुरिंदर गुस्से में भरी कहने लगी-
''देख, इनको तूने पिलाई है, सवेरे-सवेरे शुरू कर दी। कोई शर्म है कि नहीं ? भाइये का जिसे भी पता चलेगा, दौड़ा चला आएगा तो बताओ तुम्हारी क्या इज्जत रह जाएगी ?''
सतनाम हँसने लगा। उसे हँसता देख मनजीत भी गुस्से में आ गई और बोली-
''बेशरमी की भी कोई हद होती है !''
सतनाम गंभीर होकर बोला-
''सीता और गीता, मेरी बात सुनो, तुम जानती हो कि गोरे मरने पर शराब पीते हैं।''
''पर हम तो गोरे नहीं।''
''पैट्रो एंड पार्टी ने मजबूर कर दिया, चलो सॉरी कर दो।''
''देख तो, सॉरी भी ऐसे मांगता है जैसे चाय मांग रहा हो।”
गुरिंदर ने हाथ मारते हुए कहा। सतनाम फिर हँस पड़ा। मनजीत भी हँसी और पीछे से गुरिंदर भी। अजमेर इतना शराबी हुआ पड़ा था कि उससे बोला तक नहीं जा रहा था। गुरिंदर ने कहा-
''देखो अजीब बात ! बाप मरा पड़ा है, अभी तक इस बारे में किसी को फोन तक नहीं किया। यहाँ पुत्त नशे में धुत्त है।''
''ला फोन, इंडिया में तो कर दें। जट्टिये, तू घबरा मत।''
''वहाँ मैंने कर दिया है, बहन को भी और शिन्दे को भी।''
''जट्टिये, एक बात सोच रहा हूँ कि क्यों न शिन्दे को भाइये के फ्यूनरल पर यहाँ बुला लें। इस बहाने उसका इधर आना भी हो जाएगा।''
''पर उसके पास पासपोर्ट भी होगा ?''
''पासपोर्ट तो सारा इंडिया ही बनवा कर जेब में लिए घूमता है, जैसे पासपोर्ट न हो, शोले फिल्म की टिकटें हों।''
तभी घंटी बजी। गुरिंदर दौड़कर सीढ़ियाँ उतरी। टोनी था। किसी कारण से लेट हो गया था। उसे सोहन सिंह के निधन का पता चला तो वह रोने लगा और रोते-रोते नीचे फर्श पर ही बैठ गया। गुरिंदर उसे हौसला देते हुए उठाने लगी। फिर उसके साथ लगकर दुकान खुलवाई। टोनी बोला-
''सिस्टर, मेरा काम करने को मन नहीं कर रहा। इतना अच्छा बन्दा, मेरा तो जैसे बाप था, मुझ से तो खड़ा ही नहीं हुआ जा रहा, मैं घर को जा रहा हूँ। शाम को आ जाऊँगा। ऐंडी कहाँ है?''
''वह बाहर गया है।'' गुरिंदर को भय था कि टोनी अपना ही रोना लेकर बैठ जाएगा।
''उसे बता देना, मैं चारेक बजे आ जाऊँगा।''
टोनी चला गया। टोनी ने काम पर तो शाम को ही आना होता था। उसे सुबह अजमेर ने फोन करके बुला लिया था लेकिन फोन पर सोहन सिंह के बारे में कुछ नहीं बताया था कि कहीं पैट्रो की तरह दुकान पर काला कपड़ा ही न डलवा दे। उसने सोचा था, टोनी यहाँ आएगा तो उसे समझा देगा। पर वही हो गया।
सतनाम अजमेर की शराब उतारने के लिए नींबू-पानी पिलाने लगा। मनजीत को कहकर लस्सी बनवाई। जब तक गुरिंदर भी आ गई। वह भुनभुनाती हुई बोली-
''घरवालों से ज्यादा तो बाहर वालों को दुख है। टोनी दहाड़ें मारता हुआ लौट गया है कि उससे खड़ा नहीं हुआ जाता।''
''पाखंड करता है साला।''
''तुझे पाखंड ही दिखाई देता है।”
''जट्टिये, बता भला, भाइया इसके लिए गड्डा और बैलों की जोड़ी छोड़ गया है जिन्हें देखकर वो रोए जाता है।''
गुरिंदर ने गुस्से में कोई उत्तर नहीं दिया और दूसरे कमरे में चली गई।
फिर उसने मनजीत से कहा-
''बलदेव को भी बुला लेते तो वो भी इनके ड्रामे में शामिल हो जाता।''
''फोन नहीं किया ?''
''मिला नहीं। पता नहीं कहाँ है। अजीब टब्बर है। कई बार तो इस तरह बिहेव करने लग पड़ेंगे, मानो एक दूजे को जानते तक न हों।''
अजमेर का नशा उतरने में तीन घंटे लग गए। फिर भी पूरी तरह ठीक नहीं था। मुँह धोया, सिर में पानी डाला, खट्टी चीजें खाईं। फिर उन्होंने भाइये की मौत की खबर लोगों तक पहुँचानी आरंभ कर दी। शिन्दे को बुलाने की सलाह भी बन गई। सैटियों को एक तरफ करके चादरें बिछा दी गईं। मनजीत कहीं से गुरबाणी की टेपें ले आई और लगा दीं। टेप सुनते ही सतनाम बोला-
''यह कामरेड परगट सिंह का घर है, यह टेप ठीक नहीं।''
''यह घर हमारा भी है, हमें पसंद है और ठीक भी लगती है।''
मनजीत ने कहा। सतनाम कुछ न बोल सका। गुरिंदर आँखें फाड़कर उसकी तरफ देखने लगी कि दे जवाब अब। सतनाम ने धीमे से कहा-
''यह अब मैडम एक्स बनी घूमती है।''
जब सभी काम हो गए तो वे बलदेव को खोजने लगे, पर उसका किसी को पता हो तो वह मिले। शोन के घर से वह जा चुका था। वे बैठते-उठते यह बात करते रहते कि बलदेव को कहाँ ढूँढ़ें। हालांकि फ्यूनरल में अभी कई दिन लग सकते थे क्योंकि शिन्दे के आने पर ही तारीख पक्की करनी थी। फिर भी बलदेव का उनमें शामिल होना ज़रूरी था। अफसोस करने के लिए आने वाले लोग क्या कहेंगे। लोग तो आने भी लग पड़े थे। मिडलैंड से कारें भर कर आ बैठते। सतनाम कहता कि इनके लिए तो यह अफसोस की घड़ी जैसे मुश्किल से नसीब हुई हो।
तीसरे दिन बलदेव का फोन आया। अजमेर ने ही उठाया और झिड़कते हुए कहने लगा-
''कहाँ है तू ? तुझे मालूम भी है कि इधर क्या हो गया है?''
''क्या हुआ ? मैंने सतनाम की दुकान पर काला कपड़ा टंगा हुआ अभी अभी देखा है।''
''भाइया पूरा हो गया, जल्दी आ जा।''
बलदेव एकदम ही चल पड़ा। मैरी अस्पताल गई हुई थी। उसे आठ बजे के करीब लौटना था। उसने मैरी के लिए नोट लिखकर छोड़ दिया कि वह किसी ज़रूरी काम से जा रहा है, शायद लौटने में देर हो जाए। हाईबरी आया तो सभी वहीं पर थे। सतनाम, मनजीत और बच्चे भी। सतनाम उसे देखते ही बोला-
''क्यों भई ऐंनक बाबू, तुझे किसी की फिक्र है कि नहीं ?... इधर दिल एक मंदिर हुआ पड़ा है और तू पता नहीं कहाँ ईद का चाँद बना घूम रहा है।''
''ईद का चाँद बनने लायक होता तो वहीं क्यों छोड़ती।''
अजमेर ने ताना मारा। आमतौर पर वह ऐसी बात करता नहीं था, पर वह बलदेव से बहुत खीझा पड़ा था और इस ताने के जरिये उसने सारी खीझ निकाल ली। बलदेव कुछ न बोला, पर उसे बात चुभी बहुत। सतनाम की बात का उसे कभी दुख नहीं लगता था। अजमेर की यह बात उसे दिल से कहीं हुई प्रतीत हुई थी। उसने कहा -
''इसमें घबराने वाली कौन सी बात है... मैं काम पर जाने लग पड़ा हूँ इसलिए चक्कर नहीं लगा।''
फिर वह भाइये के अन्तिम समय के बारे में पूछने लगा। कुछ दूसरी भी बातें हुई। फिर अजमेर ने कहा-
''फ्यूनरल पर पन्द्रह सौ खर्च हो रहा है, अपने हिस्से का पाँच सौ निकाल दे।''
''मेरे पास तो पाँच सौ हैं नहीं।''
''तू तो कहता है कि मैं काम पर जाने लगा हूँ।''
''हाँ, वेजज़ मंथली मिलती है, और मेरे सिर पर कर्ज भी बहुत हुआ पड़ा है।''
''सीधे सीधे कह कि तू हिस्सा नहीं देगा। तू क्या समझता है कि वह अकेले हमारा ही बाप था।''
''बात तो बेशक साझा था पर वह कौन-सा कंगाल था, पेंशन...।''
उसने बात बीत में ही छोड़ दी। कहने को तो वह कहना चाहता था कि वह तो दुकान में भी काम करता था। अजमेर पेंशन की बात सुन कर ही बौखला उठा और कहने लगा-
''तुम्हें उसकी पेंशन बहुत चुभती है। कितनी पेंशन लेता था वह भला... किसी ने कभी बूढ़े का हाल आकर तो पूछा नहीं, कोई दो रातें तो उसे अपने पास रख नहीं सका, बातें करते हैं पेंशन की...।''
सतनाम बलदेव की बात पर दिल से खुश था लेकिन जब उसने बात बिगड़ती देखी तो अजमेर को शान्त करने के लिए बोला-
''भाई, इसके कहने के पीछे कोई बैड फीलिंग नहीं... यह तो यूँ ही ज़रा हाथ तंग होने के कारण कह रहा है... अब सारे काम भी तो तू बाप की जगह पर करता है, सारे काम काज...अब शिन्दे ने आना है तो इसकी भी तुझे ही फिक्र है...।''
अजमेर कुछ ठंडा पड़ा। वह थोड़ी नरम आवाज में सतनाम से बोला-
''तू इससे पूछ जरा। भाइये को लेकर इसे कभी बाप जैसी फीलिंग हुई ? पूछ तो जरा...।''
''इसका जवाब भाई मैं देता हूँ। असल में इसने तो बाप का प्यार तेरे में ही देखा है, छोटा-सा था जब भाइया इधर आ गया। वैसे भी भाइया सीधा सा बन्दा था, अपने अस्तित्व को पहचानता ही नहीं था कभी, एक्सट्रा की तरह एक ओर खड़े रह कर ही खुश था। हम तुझमें ही बाप को देखते रहे हैं। और फिर माँ के चले जाने के बाद भी इसका स्वभाव कुछ बदल गया, अभी बाल कलाकार के रूप में था उस समय यह।''
सतनाम की बातों से अजमेर की आँखें भर आईं। गुरिंदर और मनजीत भी उनके पास आकर खड़ी हो गई थीं। वे भी उदास हो उठी थीं। सतनाम ने सब की ओर देखकर कहा-
''मुझे लगता है, मैं गलती से 'मैं चुप रहूँगी' का डायलॉग बोल गया हूँ।''
अजमेर ने सैटी पर से उठते हुए कहा-
''अगर किसी ने हिस्सा नहीं डालना, तो तुम्हारी मर्जी, मुझे तो फ्यूनरल अच्छी तरह करना है। गाजे-बाजे के साथ। गाँव वाले क्या कहेंगे !''
अजमेर के उठ खड़े को अर्थ था कि अब पब में चलें। गुरिंदर ने खीझते हुए कहा-
''नीचे, दुकान में टोनी अकेला है, अगर तुम्हें ज्यादा ही हुड़क उठ रही है तो शॉप में कुछ नहीं है क्या ?''
''जट्टी तो भाई अब ध्यान चन्द की तरह ज्यादा ही गोल मारे जा रही है।''
कहकर सतनाम अजमेर के संग नीचे उतरने लगा। बलदेव ने शैरन को अपने पास बुला कर गोदी में बिठा लिया। गुरां भी उसके पास ही बैठ गई और मनजीत भी। मनजीत कहने लगी-
''भाजी, तुम्हें शैरन सबसे अच्छी लगती है। कभी हमारे बच्चे नहीं उठाये। कभी हरविंदर को पास नहीं बुलाया।''
बलदेव को लगा मानो उसकी चोरी पकड़ी गई हो। उसने अवसर को संभालते हुए कहा-
''असल में बात यह है कि मैं बच्चों के साथ बात नहीं कर पाता। ये शैरन ज़रा बड़ी है और मेरी बात सुन लेती है।''
गुरिंदर ने बात बदलते हुए कहा-
''सुन बलदेव, अब तू अपनी भाजी की मदद करा दे शॉप में, अफसोस करने वाले आ जाते हैं तो टोनी को अकेला छोड़ना पड़ता है। रात में रश भी हो जाता है।''
''गुरां, मैं वीक एंड पर ही आ सकता हूँ, पाँच बजे तो काम छोड़ता हूँ।''
''काम पर यहीं से चला जाया कर और रात में ही हैल्प करा दिया कर।''
''तू फिक्र न कर गुरां, मैं कोशिश करता हूँ।''
कहते हुए बलदेव ने शैरन को अपनी बांहों में कसा और उठ खड़ा हुआ। मनजीत के पास होने के कारण गुरां ने उसे रुकने के लिए भी नहीं कहा।
बलदेव जाने के लिए नीचे शॉप में आया तो सतनाम और अजमेर बोतल खोले बैठे थे। न-न करते भी उन्होंने बलदेव के लिए पैग बना दिया और सतनाम कहने लगा-
''बात सुन ओए, कोई सहेली भी है कि फांग (अकेला) ही है।''
''फांग ही समझ ले।''
कहकर उसने अजमेर की तरफ देखा। सतनाम ने फिर कहा-
''अपना मगील है न, बहुत बढ़िया शै है, बात करवाऊँ।''
00
(क्रमश: जारी…)

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गुरुवार, 7 मई 2009

गवाक्ष – मई 2009


“गवाक्ष” के माध्यम से हम हिन्दी ब्लॉग-प्रेमियों को हिन्दी/पंजाबी के उन प्रवासी लेखकों/कवियों की समकालीन रचनाओं से रू-ब-रू करवाने का प्रयास कर रहे हैं जो अपने वतन हिन्दुस्तान से कोसों दूर बैठकर अपने समय और समाज के यथार्थ को अपनी रचनाओं में रेखांकित कर रहे हैं। “गवाक्ष” के पिछ्ले तेरह अंकों में पंजाबी कवि विशाल (इटली) की कविताओं का हिन्दी अनुवाद, दिव्या माथुर (लंदन) की कहानी, अनिल जनविजय (मास्को) की कविताएं, न्यू जर्सी, यू.एस.ए. में रह रहीं देवी नागरानी की ग़ज़लें, लंदन निवासी कथाकार-कवि तेजेन्द्र शर्मा, रचना श्रीवास्तव, दिव्या माथुर की कविताएं, दुबई निवासी पूर्णिमा वर्मन की कविताएं, यू एस ए में रह रहीं हिन्दी कथाकार-कवयित्री इला प्रसाद, डेनमार्क निवासी कवि भगत धवन की कविताएं, डेनमार्क निवासी चाँद शुक्ला की ग़ज़लें, यू एस ए निवासी कवि वेद प्रकाश ‘वटुक’ तथा कवयित्री रेखा मैत्र की कविताएं, कनाडा अवस्थित पंजाबी कवयित्री तनदीप तमन्ना की कविताएं, यू के अवस्थित हिन्दी कवि-ग़ज़लकार प्राण शर्मा की ग़ज़लें और पंजाबी कथाकार-उपन्यासकार हरजीत अटवाल के उपन्यास “सवारी” के हिंदी अनुवाद की तेरह किस्तें आपने पढ़ीं। “गवाक्ष” के मई 2009 अंक में प्रस्तुत हैं – कैनेडा में अवस्थित पंजाबी कवि सुखिन्दर की तीन खूबसूरत कविताएं तथा पंजाबी कथाकार-उपन्यासकार हरजीत अटवाल के धारावाहिक पंजाबी उपन्यास “सवारी” की चौहदवीं किस्त का हिंदी अनुवाद…


कैनेडा से
सुखिन्दर की तीन कविताएँ
हिन्दी रूपांतर : सुभाष नीरव


बेटियों को हँसने दो

बेटियों को हँसने दो
हँसती हुई अच्छी लगती हैं वे
हँसती हुई बेटियों को देख याद आएगा
चिड़ियों का चहकना
चिड़ियों के चहकने के साथ याद आएगी
सुबह की ताज़गी
सुबह की ताज़गी के साथ याद आएगा
फूलों का खिलना
फूलों के खिलने के साथ याद आएगी
चारों ओर फैली महक
महक के साथ याद आएगा
तुम्हारा अपना ही मुस्कराता हुआ चेहरा
मुस्कराते हुए चेहरे के साथ याद आएगा
कितने ही ख़ुशगवार मौसमों का इतिहास।

बेटियों को हँसने दो
हँसती-खिलखिलाती ही अच्छी लगती हैं वे
हँसने दो उन्हें
घरों, बज़ारों, चौ-रास्तों पर
स्कूलों, कालेजों, विश्वविद्यालयों में।

हँसने दो उन्हें
मैगज़ीनों, अख़बारों, किताबों के पन्नों पर
रेडियो की ख़बरों में
टेलीविज़नों के स्क्रीनों पर।

हँसने दो उन्हें-
कविताओं, कहानियों, उपन्यासों, नाटकों में
शब्दों, वाक्यों, अर्थों में।

हँसने दो उन्हें-
एकांत में
महफ़िलों में

हँसने दो उन्हें
बहसों में
मुलाकातों में

हँसने दो उन्हें-
साज़ों में
आवाज़ों में

हँसने दो उन्हें-
शब्दों की ध्वनियों में
गायकों की अलापों में

बेटियों को हँसने-खिलखिलाने दो-
हँसती-खिलखिलाती ही अच्छी लगती हैं वे
सदियों से उनके मनों के अंदर
क़ैद हुए परिंदों को उड़ने दो
खुले आसमानों में, खुली हवाओं में
पूरब से पश्चिम
उत्तर से दक्खिन तक उड़ने दो

बेटियाँ घर की खुशबू होती हैं
बेटियों की हँसी से घर महक उठते हैं
बेटियों के चहकने से
उदासी में डूबे चेहरों पर
रौनक लौट आती है

धर्मों, सभ्यताओं की समय बिता चुके
सड़ांध मारते
मनुष्य की चेतना पर निरर्थक बोझ बने
कद्रों-कीमतों की मानसिक क़ैद में जकड़े
बात-बात पर कोबरा साँप की तरह फन फैलाए
मुँहों से ज़हर की पिचकारियाँ छोड़ते
मानवीय भावनाओं, अहसासों से रिक्त
बेटियों की हँसी को क़त्ल करने वाले
धरती पर मानवी जामों में
घूमते-फिरते लोग
हक़ीकत में
हैवानियत की तस्वीर बने
पत्थरों के बुत होते हैं।
0

लड़कियाँ कब हँसती हैं

हत्यारों की तरह जिद्द न करो
चिड़ियों को कमरों में क़ैद करोगे
तड़फ-तड़फ
वे मर जाएँगी

वे उड़ना चाहती हैं
खुले आसमान में
वे बड़े घूँट भरना चाहती हैं
ताज़गी भरी हवा के

वे चहकना चाहती हैं
खुशबुओं भरे मौसम में
वे खिलखिलाना चाहती हैं
खुशबू भरे फूलों की तरह

उमस भरी ज़िंदगी में
लंबी दौड़ के बाद
जब
बरखा रुत आती है
बरसों से होंठों पर लगे ताले
जब
अचानक टूटने लगते हैं
मन के दर्पण में देखने पर
अपना ही चेहरा
गुलाब के फूल की तरह
जब खिल उठता है

लड़कियाँ
तब हँसती है… ।
00

वो सारी औरतें

वो सारी औरतें
जो मेरा नाम सुनते ही
गुलाब के फूलों की तरह
खिलखिला उठती हैं

वो सारी औरतें
जो मेरे कंधों पर
अपने सिर रख
वे सारे भूले-बिसरे
गीत गुनगुनाने लगती हैं
जो गीत उन्होंने
बरसों से नहीं गाए

वो सारी औरतें
जो मेरा नाम सुनते ही
कोयल की भाँति
कू-कू करने लगती हैं
वो भूली-बिसरी आवाज़ें
जो बरसों की दहशत ने
उनके अवचेतन के
किसी कोने में
दबा दी थीं…

वो सारी औरतें
जो मुझे देखते ही
कहने लगतीं-
तू तो ‘अपना-सा’ लगता है

वो सारी औरतें
जो समयों की आवारगी में
मदमस्त हाथियों के पैरों तले
कुचली जाने के कारण
‘अपना-सा’ शब्द के
अर्थ ही भूल गई थीं

कुछ तो होता ही होगा
फूलों की सुगंध में
हवा की ताज़गी में
शब्दों के अर्थों में
रंगों के असर में
आवाज़ों की ध्वनियों में
यूँ ही तो नहीं
करोड़ों वर्षों से
नक्षत्र घूम रहे हैं
इस चुम्बकीय गर्दिश में
बंधे हुए !
00
सुखिन्दर
कैनेडा में एक कैनेडियन पंजाबी लेखक के तौर पर सन् 1975 से सक्रिय। कैनेडा से पंजाबी में छपने वाले खूबसूरत मैगज़ीन “संवाद” के सन् 1989 से संपादक। टोरंटो (कैनेडा) के पंजाबी रेडियो प्रोग्राम “जागते रहो” के प्रोड्यूसर, डायरेक्टर और होस्ट। कविता, फिक्शन और विज्ञान विषयों पर अब तक 20 से अधिक पुस्तकें प्रकाशित। सन् 1975 में हरियाणा भाषा विभाग द्वारा ‘बेस्ट बुक अवार्ड’ से सम्मानित। इसके अतिरिक्त ऑन्टारियो आर्टस कौंसल ग्रांट, कैनेडा (1986 और 1988 ), द कैनेडा कौंसल ग्रांट(1995), इंटरनेशल अवार्ड (1993 और 1996) प्राप्त।
सम्पर्क : Box 67089, 2300 Yonge St.,
Toronto ON M4P 1E0 Canada
Tel. (416) 858-7077
Email: poet_sukhinder@hotmail.com

धारावाहिक पंजाबी उपन्यास(किस्त- 14)


सवारी
हरजीत अटवाल
हिंदी अनुवाद : सुभाष नीरव

॥ उन्नीस ॥

सुबह के दस बजे सोहन सिंह की छाती में दर्द उठा। पहले तो वह खुद ही छाती मलता रहा। ऐसा दर्द पहले भी कभी-कभी उठता था, पर कुछ पल बाद बंद हो जाता था। पर आज वाला दर्द असहय था। वह उठकर कमरे में टहलने लगा। दो मिटन में ही उसे बैठना पड़ा। शरीर में जैसे जान ही नहीं रही हो। दर्द और बढ़ने लगा। वह किसी को जगाना नहीं चाहता था। अभी कुछ समय पहले ही तो वे सभी सोये थे। कल भारत की प्रधान मंत्री के क़त्ल के अफ़सोस में बहुत सारे लोग अजमेर की दुकान पर इकट्ठा हो गए थे। आधी रात तक बैठकर बातें करते रहे थे और शराब पीते रहे थे। फिर अजमेर तो रोज़ ही सोने के समय तक इतना शराबी हो जाया करता है कि दुकान का अलार्म भी उसे जगा नहीं सकता। सोहन सिंह को भी पता था कि अजमेर के लिए उठना मुश्किल होगा, पर जब दर्द उससे बिलकुल ही नहीं सहा गया तो उसने जैसे तैसे उठकर उनका दरवाजा खटखटाया। गुरिंदर ने बाहर निकल कर सोहन सिंह की हालत देखी तो उसके हाथ-पैर फूल गए। उसने उसी समय एम्बूलेंस को फोन कर दिया। उसने सोहन सिंह का पसीना पोंछा और उसे बुलाने की कोशिश की। उसका शरीर कुछ देर कांपता रहा और फिर जैसे बेहोश हो गया हो। गुरिंदर दौड़कर अजमेर के पास गयी और उसे जगाने लगी। वह उसे कंधे से पकड़कर हिलाये जा रही थी और कहे जा रही थी-
''जी उठो, देखो भाइये को क्या हो गया ?''
वह इतनी जोर से बोल रही थी कि बच्चे भी उठ गए, पर अजमेर नहीं उठा। पाँच-सात मिनट में एम्बूलेंस भी आ गयी। गुरिंदर ने जैसे तैसे अजमेर को उठाकर बिठा दिया और खुद दरवाजा खोलने चली गयी और एम्बूलेंस वालों को सोहन सिंह के पास ले आई। उन्हें देख, अजमेर भी चेतन होने लगा। एम्बूलेंस के कर्मचारियों ने सोहन सिंह को स्ट्रेचर पर डाला और नीचे ले गए। गुरिंदर ने पूछा-
''कैसी हालत है ?''
''कुछ कह नहीं सकते, हार्ट अटैक लगता है।''
वे सोहन सिंह को एम्बूलेंस में डाल रहे थे तो अजमेर और गुरिंदर भी पीछे-पीछे थे। एक कर्मचारी ने कहा-
''बहुत सीरियस मामला लग रहा है, आपमें से एक व्यक्ति हमारे साथ ही चले।''
''विटिंग्टन होस्पीटल ही जाना है ?''
''हाँ।''
''आप चलो। हम आते हैं। कार में आ जाएँगे।'' अजमेर ने कहा।
एम्बूलेंस चली गयी। गुरिंदर रोने लगी। अजमेर ने कहा-
''चल तैयार हो।''
''बच्चे ?''
''उन्हें भी साथ ही ले चलते हैं।''
''पर उनकी नींद क्या खराब करें।''
''चल, तू तैयार हो... सोचते हैं कुछ। भाइया ब्रांडी पीने से तो बाज आता नहीं था, लगता है, नहीं बचेगा।''
''बुरे बोल न बोलो, ठीक हो जाएँगे।''
''उस बुच्चड़ को फोन कर। उसे साथ ले जाता हूँ, तू घर में ही रह।''
गुरिंदर ने सतनाम के घर का फोन डायल किया। मनजीत ने उठाया। गुरिंदर रोते हुए बताने लगी-
''भाइये को हार्ट अटैक हो गया। एम्बूलेंस ले गयी है। सतनाम कहाँ है ?''
''जगाती हूँ।'' कहकर मनजीत भी रोने लगी। सतनाम फोन पर आया, बोला-
''जट्टिए, क्या हो गया ?''
''तुम जल्दी आ जाओ, तेरे भाजी का तो तुम्हें पता ही है, दिल है नहीं।''
''मैं आया।''
उसके पहुँचते को अजमेर तैयार हुआ बैठा था। अजमेर ने कहा-
''रात को ब्रांडी के तीन पैग पी गया था, पहले एक ही लिया करता था।''
''नहीं, ब्रांडी से क्या होगा, वैसे ही ब्लॅड प्रैशर होई था।''
''ब्लॅड प्रैशर हाई होने पर ब्रांडी ज्यादा ही खतरनाक हो जाती है।''
''चल भाई, जो हो गया, सो गया। अब ठीक हो जाए।''
''लगता नहीं है, मुझे तो गड़बड़ लगती है। ऊपर से काम का जोर है।''
वे दोनों नीचे उतर कर वैन में बैठ गए। सतनाम ने पूछा-''उस हीरो का कुछ पता है ?''
''शौन के यहाँ तो है नहीं, कल इसने फोन किया था।''
सतनाम चुप होकर बैठा रहा। अजमेर गाड़ी चला रहा था। हौलोवे रोड खाली पड़ी थी। कुछ मिनट में ही अस्पताल पहुँच गए। सीधे अमरजैंसी वार्ड में पहुँचे। डॉक्टर और नर्सें सोहन सिंह को घेरे खड़े थे। सतनाम और अजमेर उनके पीछे जा कर खड़े हो गए। एक डॉक्टर ने गले में से स्टैथोस्कोप उतारते हुए कहा-
''यह तुम्हारा रिश्तेदार है ?''
''जी, हमारे पिता हैं।''
''आई एम सॉरी, ही इज़ नो मोर।''
उसने पल भर रुक कर फिर कहा-
''हमने रिवाइव करने की पूरी कोशिश की थी।''
दोनों भाई एक-दूजे की ओर देखने लगे। उनकी आँखें सजल हो उठीं। सतनाम ने आँखें पोंछते हुए डॉक्टर से पूछा-
''अगल प्रोसीज़र क्या है ?''
''वो सिस्टर बताएगी।''
उसने करीब खड़ी सिस्टर की ओर इशारा किया तो नर्स स्वयं ही उनके पास आ गयी।
''हमने कुछ कागजी कार्रवाई करनी है जिसके लिए आपकी ज़रूरत है। फिर बॉडी मॉर्चरी में भेज दी जाएगी। तुम किसी अंडरटेकर से बात कर लो। पर जल्दबाजी की ज़रूरत नहीं है। पहले परिवार में जाओ, बैठो।''
नर्स सतनाम को विस्तार से बता रही थी। उसने अजमेर से कहा-
''वाकई भाई, भाइये ने बहुत गलत टाइम चुना। उधर काम बहुत है और इधर यह पंगा।''
अजमेर चुप था। क्रिसमस के दिन करीब थे। दुकानदारी का यही वक्त था और अब वे फ्यूनरल में बिजी रहेंगे। कुछ देर बाद अजमेर ने कहा-
''तेरा तो अभी फिर भी ठीक है, मेरा तो साल में यही बिजी पीरियड होता है।''
''चल, कोई बात नहीं। हो गया जो होना था। आगे का सोचें। घर चलते हैं। इधर-उधर खबर भी देनी होगी।''
वे घर पहुँचे। गुरिंदर को पता चला तो वह रोने लगी। मनजीत भी पहुँच गई। कुछ समय तक रोना-धोना चला। सतनाम ने जल्दी ही उन्हें शांत होने के लिए कह दिया था। फिर वह घड़ी देखता हुआ बोला-
''मेरा तो मार्किट जाने का समय भी हो गया।''
''आज गए बगैर काम नहीं चलेगा ?'' गुरिंदर ने पूछा।
''चल तो जाएगा, चिकन लेने ही जाना है, यहीं गफूर से पकड़ लूंगा।''
सतनाम ने जल्दबाजी में ही सोच लिया था। गफूर कहता भी रहता था कि वह स्मैथीफील्ड के भाव में ही माल उससे ले लिया करे। गफूर जैसे कई अन्य मिल कर चिकन खरीदते जो कि सस्ता पड़ जाता। सतनाम ने अजमेर से पूछा-
''भाई, क्या आज दुकानें खोलनी हैं ?''
''खोलनी क्यों नहीं !... दुकानें तो चलती रहनी चाहिएँ, नहीं तो ग्राहक किसी दूसरी तरफ चले जाएँगे। एक बार गए ग्राहक को मोड़ना कठिन हो जाता है। मेरी दुकान टोनी खोल लेगा, तेरे पास पैट्रो है...।''
सतनाम और मनजीत अपने घर लौट आए। बच्चों को भी स्कूल भेजना था। मनजीत ने छुट्टी का भी इंतज़ार करना था। घर से सतनाम दुकान में आ गया। बीफ और लैम्ब गुजारे लायक पड़े थे, पोर्क भी था ही। चिकन जैसा कि उसने सोचा था कि कश्मीरी की दुकान से ले आएगा, कुछ पैसे अधिक ही सही अगर देने पड़े तो। वह छुर्रियाँ-गंडासे सीधे करने लग पड़ा। फिर कोल्ड रूम में से मीट लाकर शैल्फ में रखने लगा। तब तक 'मार्निंग' करता हुआ पैट्रो भी आ गया। उसने सतनाम की ओर देखते हुए कहा-
''सैम, तू ठीक नहीं लगता, रात में सोया नहीं ? तेरी आँखें सूजी हुई हैं।''
''तू ठीक कह रहा है पैट्रो, आज तो काम तुम्हें ही चलाना होगा। मैं रात में सो नहीं सका। मेरे पिता जी की मौत हो गई है।''
''सच ! कैसे ?''
''हाँ, हार्ट अटैक आया और साथ ही ले गया।''
''यह तो बहुत बुरा हुआ। वह बहुत अच्छा बुजुर्ग था। जब भी यहाँ आता तो हँसता ही रहता। सैम, बहुत दुख की बात है... पर तू दुकान क्यों खोल रहा है ?''
''क्यों ?''
''तेरे समाज में तेरी बेइज्जती नहीं होगी। तेरे जानकार लोग क्या कहेंगे कि तेरा बाप मर गया और तू दुकान खोल कर बैठा है। नहीं सैम, हम दुकान नहीं खोलेंगे।''
''पर पैट्रो, ग्राहकों का क्या होगा, मीट भी पड़ा है अंदर।''
''ग्राहक सारी बात समझा करते हैं। मीट को मैं फ्रिज में रख देता हूँ, कुछ नहीं बिगड़ता इसका।''
उसने सतनाम के उत्तर की प्रतीक्षा किए बिना दरवाजा बन्द कर दिया। ''क्लोज्ड'' का साइन लगा दिया और बोला-
''देख, यहाँ कोई काला कपड़ा है तो विंडो में टांग दे।''
सतनाम कुछ न कह सका। पैट्रो काला कपड़ा खोजने लगा। उसे काला कपड़ा नहीं मिला। वह रात वाली व्हिस्की की बोतल ढूँढ़ लाया। उसमें छोटे-छोटे दो पैग थे। पैट्रो ने एक पैग सतनाम को थमाया और एक स्वयं ले लिया। गिलास को ऊपर उठाकर बोला-
''तेरे पिता के नाम... क्या नाम था उसका ?''
''सोहन सिंह।''
''सोन सिंह के नाम... हे गॉड उसकी मदद करना, आमीन !''
कह कर उसने दो घूंट व्हिस्की के भरे। तब तक माइको और मगील भी आ गए। उन्हें मालूम हुआ तो वे भी सतनाम से अफसोस प्रकट करने लगे। पैट्रो ने माइको को पैसे देकर कहा-
''ये दुकान तो अभी बंद है, हौलोवे रोड पर खुली है, बोतल पकड़ ला।''
माइको तेज कदमों से गया और बोतल ले आया। पैट्रो ने सबका पैग डाला। तब तक जुआइस भी आ गई थी। पैट्रो के कहने पर वह काली चादर घर से उठा लाई और विंडो में टांग दी। उसके हाथ में रम भी थी और बीयर भी। मगील व्हिस्की नहीं पीता था, पर आज पी ली। उसने कहा-
''हमारा बाप मरा है, उसके नाम के टोस्ट ज़रूरी हैं... कुछ नहीं कहती व्हिस्की मुझे, बुजुर्ग की आत्मा को तो खुश करना ही है न।''
मगील कुछ देर तक एक दिशा में देखता रहा, फिर ज़ोर-ज़ोर से रोने लगा। पैट्रो खीझता हुआ उससे बोला-
''चुप हो जा मगील, वह कोई जवान था कि तू विलाप करेगा। उसने पूरी उम्र भोगी है, उसकी ज़िन्दगी का जश्न रो कर न मना।''
मगील शांत हो गया। तब तक अजमेर ने आ कर दरवाजा खटखटाया। वह हैरान होता हुआ पूछने लगा-
''दुकान क्यों नहीं खोली ?''
''पैट्रो नहीं माना। मैंने भी कहा, चलो कोई बात नहीं।''
पैट्रो, माइको और मगील ने अजमेर से उसके पिता की मौत का अफसोस प्रकट किया। पैट्रो ने उसको भी पैग बनाकर दिया। अचानक मगील ने डांस करना शुरू कर दिया और स्पेनिश भाषा में कोई गीत गाने लग पड़ा। पैट्रो फिर खीझ कर बोला-
''तुझे कहा था न कि यह सब नहीं करना।''
''पैट्रो, वह मेरा भी बाप था, बाप कभी बूढ़ा नहीं होता, इसलिए मैं तो उसका विलाप करूँगा ही। अब तू कल को मरेगा तो तेरा क्या ख़याल है कि मैं नहीं रोऊँगा।''
कह कर वह पुन: रोने लगा। रोते-रोते डांस करने लग पड़ा। सतनाम ने कहा-
''पैट्रो, लौरल को जो करता है, करने दे। इसे भी अभी चांस मिला है।''
अजमेर अपना पैग खत्म करके बोला-
''उधर आ जाना, फ्यूनरल के बारे में सलाह-मशवरा करें।''
''जैसा करना है, कर लो। सलाह की कौन सी बात है।''
''सलाह करते हैं कि कैसा फ्यूनरल हो, कितने खर्चे वाला, फिर खर्च भी शेयर करना है, उस बलदेव को भी ढूँढ़ें, हिस्सा डाले अपना।''
हिस्सा डालने-डलवाने की बात सतनाम को अच्छी न लगी। वह समझता था कि सोहन सिंह की पेंशन आती थी जो कि अजमेर के पास ही रहती थी। उसमें से फ्यूनरल भी किया जा सकता था। सतनाम की खामोशी को देख कर अजमेर समझ गया और बोला-
''भाइये के थोड़े से पैसे मेरे पास पड़े हैं, पर मैं सोचता हूँ कि वे इंडिया को भेज दें। अब अपने से पीछे की देखभाल नहीं हो सकेगी। भाइये के साथ ही था सब कुछ, ऐसा करेंगे तो गाँव में भी अपनी शोभा होगी।''
''जैसा चाहो कर लो, मुझे क्या कहना है।''
सतनाम ने ढीली सी आवाज़ में कहा।
अजमेर वहाँ से गुस्से में भरा हुआ घर पहुँचा। गुरिंदर ने पूछा-
''क्या हुआ ?''
''होना क्या है ? बूचड़ फ्यूनरल में हिस्सा नहीं डालना चाहता।''
''चलो कोई बात नहीं, खफा क्यों होते हो।''
''मैं एक बात बताऊँ... अगर इन दोनों ने हिस्सा न डाला तो मैं बूढ़े की बॉडी काउंसिल को दे दूँगा। खुद लावारिस कह कर संस्कार कर देंगे।''
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(क्रमश: जारी…)

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रविवार, 12 अप्रैल 2009

गवाक्ष – अप्रैल 2009


“गवाक्ष” के माध्यम से हम हिन्दी ब्लॉग-प्रेमियों को हिन्दी/पंजाबी के उन प्रवासी लेखकों/कवियों की समकालीन रचनाओं से रू-ब-रू करवाने का प्रयास कर रहे हैं जो अपने वतन हिन्दुस्तान से कोसों दूर बैठकर अपने समय और समाज के यथार्थ को अपनी रचनाओं में रेखांकित कर रहे हैं। “गवाक्ष” के पिछ्ले बारह अंकों में पंजाबी कवि विशाल (इटली) की कविताओं का हिन्दी अनुवाद, दिव्या माथुर (लंदन) की कहानी, अनिल जनविजय (मास्को) की कविताएं, न्यू जर्सी, यू.एस.ए. में रह रहीं देवी नागरानी की ग़ज़लें, लंदन निवासी कथाकार-कवि तेजेन्द्र शर्मा, रचना श्रीवास्तव, दिव्या माथुर की कविताएं, दुबई निवासी पूर्णिमा वर्मन की कविताएं, यू एस ए में रह रहीं हिन्दी कथाकार-कवयित्री इला प्रसाद, डेनमार्क निवासी कवि भगत धवन की कविताएं, डेनमार्क निवासी चाँद शुक्ला की ग़ज़लें, यू एस ए निवासी कवि वेद प्रकाश ‘वटुक’ तथा कवयित्री रेखा मैत्र की कविताएं, कनाडा अवस्थित पंजाबी कवयित्री तनदीप तमन्ना की कविताएं, यू के अवस्थित हिन्दी कवि-ग़ज़लकार प्राण शर्मा की ग़ज़लें और पंजाबी कथाकार-उपन्यासकार हरजीत अटवाल के उपन्यास “सवारी” के हिंदी अनुवाद की बारह किस्तें आपने पढ़ीं। “गवाक्ष” के अप्रैल 2009 अंक में प्रस्तुत हैं – हिंदी कथाकार-कवि तेजेन्द्र शर्मा की बहुचर्चित कहानी “कब्र का मुनाफा” तथा पंजाबी कथाकार-उपन्यासकार हरजीत अटवाल के धारावाहिक पंजाबी उपन्यास “सवारी” की तेरहवीं किस्त का हिंदी अनुवाद…


हिंदी कहानी

कब्र का मुनाफ़ा
तेजेन्द्र शर्मा

''यार कुछ न कुछ तो नया करना ही पड़ेगा। सारी ज़िंदगी नौकरी में गवां चुके हैं। अब और नहीं की जाएगी ये चाकरी'' ख़लील जैदी का चेहरा सिगरेट के धुएं के पीछे धुंधला-सा दिखाई दे रहा है।

नजम जमाल व्हिस्की का हल्का-सा घूंट भरते हुए किसी गहरी सोच में डूबा बैठा है। सवाल दोनों के दिमाग में एक ही है- अब आगे क्या करना है। कौन करे अब यह कुत्ता घसीटी।
ख़लील और नजम ने जीवन के तैंतीस साल अपनी कम्पनी की सेवा में होम कर दिए हैं। दोनों की यारी के किस्से बहुत पुराने हैं। ख़लील शराब नहीं पीता और नजम सिगरेट से परेशान हो जाता है। किन्तु दोनों की आदतें दोनों की दोस्ती के कभी आड़े नहीं आती हैं।
ख़लील जैदी एक युवा अफ़सर बन कर आया था इस कम्पनी में, किन्तु आज उसने अपनी मेहनत और अक्ल से इस कम्पनी को यूरोप की अग्रणी फाइनेन्शियल कम्पनियों की कतार में ला खड़ा किया है। लंदन के फाइनेन्शियल सेक्टर में ख़लील की ख़ासी इज्ज़त है।
''वैसे ख़लील भाई, क्या ज़रूरी है कि कुछ किया ही जाए। इतना कमा लिया, अब आराम क्यों न करें। बेटे, बहुएं और पोते-पोतियों के साथ बाकी दिन बिता दिए जाएँ तो क्या बुरा है।''
''मियाँ, दूसरे के लिए पूरी ज़िंदगी लगा दी, कम्पनी को कहाँ से कहाँ पहुँचा दिया। लेकिन... कल को मर जाएँगे तो कोई याद भी नहीं करेगा। अगर इतनी मेहनत अपने लिए की होती तो पूरे फाइनेन्शियल सेक्टर में हमारे नाम की माला जपी जा रही होती।''
''ख़लील भाई, मरने पर याद आया, आपने कार्पेण्डर्स पार्क के कब्रिस्तान में अपनी और भाभीजान की कब्र बुक करा ली है या नहीं ? देखिए, उस कब्रिस्तान की लोकेशन, उसका लुक, और माहौल एकदम यूनीक है।... अब ज़िंदगी भर तो काम, काम और काम से फुर्सत नहीं मिली, कम से कम मर कर तो चैन की ज़िंदगी जिएँगे।''
''क्या बात कही है मियाँ, कम से कम मर कर तो चैन की ज़िंदगी जिएँगे। भाई वाह, वो किसी शायर ने भी क्या बात कही है कि, मर के भी चैन न पाया तो किधर जाएँगे।... यार, मुझे तो कोई दिक्कत नहीं। तुम्हारी भाभीजान बहुत सोशलिस्ट किस्म की औरत है। पता लगते ही बिफर जाएगी। वैसे, तुमने आबिदा से बात कर ली है क्या ? ये हव्वा की औलादों ने भी हम जैसे लोगों का जीना मुश्किल कर रखा है। अब देखो ना...।''
नजम ने बीच में ही टोक दिया, ''ख़लील भाई, इनके बिना गुजारा भी तो नहीं। नेसेसरी ईविल हैं हमारे लिए, और फिर इस देश में तो स्टेटस के लिए भी इनकी ज़रूरत पड़ती है। इस मामले में जापान बढ़िया है। हर आदमी अपनी बीवी और बच्चे तो शहर के बाहर रखता है, सबर्ब में - और शहर वाले फ्लैट में अपनी वर्किंग पार्टनर। सोच कर कितना अच्छा लगता है।'' साफ पता चल रहा था कि व्हिस्की अपना रंग दिखा रही है।
''यार, ये साला कब्रिस्तान शिया लोगों के लिए एक्सक्लूसिव नहीं हो सकता क्या ?... वर्ना मरने के बाद पता नहीं चलेगा कि पड़ोस में शिया है या सुन्नी या फिर वो गुजराती टोपी वाला। यार, सोच कर ही झुरझुरी होती है। मेरा बस चले तो एक कब्रिस्तान बना कर उस पर बोर्ड लगा दूँ - शिया मुसलमानों के लिए रिजर्व्ड।''
''बात तो आपने पते की कही है ख़लील भाई। लेकिन ये अपना पाकिस्तान तो है नहीं। यहाँ तो शुक्र मनाइये कि गोरी सरकार ने हमारे लिए अलग से कब्रिस्तान बना रखा है। वर्ना हमें भी ईसाइयों के कब्रिस्तान में ही दफ़न होना पड़ता। आपने कार्पेण्डर्स पार्क वालों की नई स्कीम के बारे में सुना क्या ? वो खाली दस पाउण्ड महीने की प्रीमियम पर आपको शान से दफ़नाने की पूरी ज़िम्मेदारी अपने पर ले रहे हैं। उनका जो नया पैम्फ़लैट निकला है उसमें पूरी डिटेल्स दे रखी हैं। लाश को नहलाना, नये कपड़े पहनाना, कफ़न का इन्तज़ाम, रॉल्स रॉयस में लाश की सवारी और कब्र पर संगमरमर का प्लाक - ये सब इस बीमे में शामिल हैं।''
''यार, ये अच्छा है, कम से कम हमारे बच्चे हमें दफ़नाते वक्त अपनी जेबों की तरफ़ नहीं देखेंगे। मैं तो जब इरफ़ान की तरफ देखता हूँ तो बहुत मायूस हो जाता हूँ। देखो पैंतीस का हो गया है मगर मजाल है, ज़रा भी ज़िम्मेदारी का अहसास हो... कल कह रहा था- डैड, कराची में बिजनस करना चाहता हूँ, बस एक लाख पाउण्ड का इंतज़ाम करवा दीजिए। अबे, पाउण्ड क्या साले पेड़ों पर उगते हैं। नादिरा ने बिगाड़ रखा है। अपने आपको सोशलिस्ट कामों में लगा रखा है। जब बच्चों को माँ की परवरिश की ज़रूरत थी, ये मेमसाब कार्ल मार्क्स की समाधि पर फूल चढ़ा रही थीं। साला कार्ल मार्क्स मरा तो अंग्रेजों के घर में और कैपिटेलिज्म के ख़िलाफ किताबें वहाँ लिखता रहा। इसीलिए दुनिया जहान के मार्क्सवादी दोगले होते हैं। सालों ने हमारा तो घर तबाह कर दिया। मेरा तो बच्चों के साथ कोई कम्यूनिकेश नहीं बन पाया।'' ख़लील जैदी ने ठंडी साँस भरी।
थोड़ी देर के लिए सन्नाटा छा गया है। मौत का-सा सन्नाटा! हल्का-सा सिगरेट का कश, छत की तरफ़ उठता हुआ धुआँ, शराब का एक हल्का-सा घूंट गले में उतरता, दांतों से काजू काटने की थोड़ी आवाज़। नजम से रहा नहीं गया, ''ख़लील भाई, उनकी एक बात बहुत पसन्द आई है। उनका कहना है कि अगर आप किसी एक्सीडेन्ट या हादसे का शिकार हो जाएँ, जैसे आग से जल मरें तो वो लाश का ऐसा मेकअप करेंगे कि लाश एकदम जवान और खूबसूरत दिखाई दे। अब लोग तो लाश की आख़री शक्ल ही याद रखेंगे न। नादिरा भाभी और आबिदा को यही आइडिया बेचते हैं, कि जब वो मरेंगी तो दुल्हन की तरह सजाई जाएँगी।''
''यार नजम, एक काम करते हैं, बुक करा देते हैं दो-दो कब्रें। हमें नादिरा या आबिदा को अभी बताने की ज़रूरत क्या है। जब ज़रूरत पड़ेगी तो बता देंगे।''
''क्या बात कही है भाईजान, मज़ा आ गया ! लेकिन, अगर उनको ज़रूरत पड़ गई तो बताएँगे कैसे ? बताने के लिए उनको दोबारा ज़िन्दा करवाना पड़ेगा। हा...हा... हा... हा...।''
''सुनो, उनकी कोई स्कीम नहीं है जैसे बाई वन गैट वन फ्री या बाई टू गैट वन फ्री ? अगर ऐसा हो तो हम अपने-अपने बेटों को भी स्कीम में शामिल कर सकते हैं। अल्लाह ने हम दोनों को एक-एक बेटा ही तो दिया है।''
''भाईजान, अगर नादिरा भाभी ने सुन लिया तो खट से कहेंगी, क्यों जी हमारी बेटियों ने क्या कुसूर किया है ?''
''यार तुम डरावनी बातें करने से बाज नहीं आओगे। मालूम है, वो तो समीरा की शादी सुन्नियों में करने को तैयार हो गई थी। कमाल की बात ये है कि उसे शिया, सुन्नी, आग़ाखानी, बोहरी सभी एक समान लगते हैं। कहती है, सभी मुसलमान हैं और अल्लाह के बंदे हैं। उसकी इंडिया की पढ़ाई अभी तक उसके दिमाग से निकली नहीं है।''
''भाईजान, अब इंडिया की पढ़ाई इतनी खराब भी नहीं होती। पढ़े तो मैं और आबिदा भी वहीं से हैं। दरअसल मैं तो गोआ में कुछ काम करने के बारे में भी सोच रहा हूँ। वहाँ अगर कोई टूरिस्ट रिजॉर्ट खोल लूँ तो मज़ा आ जाएगा ! भाई, सच कहूँ, मुझे अब भी अपना घर मेरठ ही लगता है। चालीस साल हो गए हिन्दुस्तान छोड़े, लेकिन लाहौर अभी तक अपना नहीं लगता। यह जो मुहाजिर का ठप्पा चेहरे पर लगा है, उससे लगता है कि लाहौर में ठीक वैसे ही हैं जैसे हिन्दुस्तान में अछूत।''
''मियाँ चढ़ गई है तुम्हें। पागलों की सी बातें करने लगे हो। याद रखो, हमारा वतन पाकिस्तान है। बस ! यह हिन्दु धर्म एक डीजेनेरेट, वल्गर और करप्ट कल्चर है। हिन्दुओं या हिन्दुस्तान की पढ़ाई पूरी तरह से एन्टी-इस्लामिक है। फिल्में देखी हैं इनकी, वल्गैरिटी परसोंनीफाईड। मेरा बस चले तो सारे हिन्दुओं को एक कतार में खड़ा करके गोली से उड़ा दूँ।''
नजम के खर्राटे बता रहे थे कि उसे ख़लील जैदी की बातों में कोई रुचि नहीं है। वो शायद सपनों के उड़नखटौले पर बैठ कर मेरठ पहुँच गया था। मेरठ से दिल्ली तक बस का सफ़र, रेलगाड़ी की यात्रा और आबिदा से पहली मुलाकात, पहली मुहब्बत, फिर शादी। पूरी ज़िंदगी जैसे किसी रेल की पटरी पर चलती हुई महसूस हो रही थी।

महसूस आबिदा भी कर रही थी और नादिरा भी। दोनों महसूस करती थीं कि उनके पतियों के पास उनके लिए कोई समय नहीं है। उनके पति बस पैसा देते हैं घर का खर्चा चलाने के लिए, लेकिन उसका भी हिसाब-किताब ऐसे रखा जाता है जैसे कम्पनी के किसी क्लर्क से खर्चे का हिसाब पूछा जा रहा हो। दोनों को कभी यह महसूस नहीं हुआ कि वे अपने-अपने घर की मालकिनें हैं। उन्हें समय-समय पर यह याद दिला दिया जाता था कि घर के मालिक के हुक्म के बिना वे एक कदम भी नहीं चल सकतीं। आबिदा तो अपनी नादिरा आपा के सामने अपना रोना रो लेती थी लेकिन नादिरा हर बात केवल अपने सीने में दबाये रखतीं।
नादिरा ने बहुत मेहनत से अपने व्यक्तित्व में परिवर्तन पैदा किया था। उसने एक स्थाई हँसी का भाव अपने चेहरे पर चढ़ा लिया था। पति की डांट फटकार, गाली गलौंच, यहाँ तक कि कभी-कभार की मारपीट का भी उस पर कोई असर दिखाई नहीं देता था। कभी-कभी तो ख़लील जैदी उसकी मुस्कुराहट से परेशान हो जाते- 'आख़िर आप हर वक्त मुस्कुराती क्यों रहती हैं ? यह हर वक्त का दांत निकालना सीखा कहाँ से है आपने ? हमारी बात का कोई असर ही नहीं होता आप पर।'
नादिरा सोचती रह जाती है कि अगर वो गमगीन चेहरा बनाये रखे तो भी उसके पति को परेशानी हो जाती है। अगर वो मुस्कुराए तो उन्हें लगता है कि ज़रूर कहीं कोई गड़बड़ है, अन्यथा जो व्यवहार वे उसे दे रहे हैं, उसके बाद तो मुस्कुराहट जीवन से गायब ही हो जानी चाहिए।
नादिरा ने एक बार नौकरी करने की पेशकश भी की थी। लखनऊ विश्वविद्यालय से एम.ए. पास है वह। लेकिन ख़लील जैदी को नादिरा की नौकरी का विचार इतना घटिया लगा कि बात, बहस में बदली और नादिरा के चेहरे पर उंगलियों के निशान बनाने के बाद ही रुकी। इसका नतीजा यह हुआ कि नादिरा ने पाकिस्तान से आई उन लड़कियों के लिए लड़ने का बीड़ा उठा लिया है जो अपने पतियों एवं सास-ससुर के व्यवहार से पीड़ित हैं।
ख़लील को इसमें भी शिकायत रहती है - ''आपका तो हर खेल ही निराला है। मैडम कभी कोई ऐसा काम भी किया कीजिए जिससे घर में कुछ आए। आपको भला क्या लेना कमाई धमाई से। आपको तो बस एक मज़दूर मिला हुआ है, वो करेगा मेहनत, कमाए और आप उड़ाइए मज़े।'' अब नादिरा प्रतिक्रिया व्यक्त नहीं करती। जैसे ही ख़लील शुरू होता है, वो कमरा छोड़ कर बाहर निकल जाती है। वह समझ गई है कि ख़लील को बीमारी है। कंट्रोल करने की बीमारी। वह हर चीज़, हर स्थिति, हर व्यक्ति को कंट्रोल कर लेना चाहता है- कंट्रोल फ्रीक। यही दफ्तर में भी करता है और यही घर में।
अपने-अपने घरों में आबिदा और नादिरा बैठी हैं। आबिदा टी.वी. पर फ़िल्म देख रही है- लगान। वह आमिर खान की पक्की फैन है। उसकी हर फ़िल्म देखती है और घंटों उस पर बातचीत भी कर सकती है। पाकिस्तानी फ़िल्में उसे बिल्कुल अच्छी नहीं लगतीं। बहुत लाउड लगती हैं। लाउड तो उसे अपना पति भी मालूम होता है लेकिन इसका कोई इलाज नहीं है उसके पास। उसे विश्वास है कि नादिरा आपा कभी गलत हो ही नहीं सकती हैं। वह उनकी हर बात पत्थर की लकीर मानती है।
लकीर तो नादिरा ने भी लगा ली है अपने और ख़लील के बीच। अब वह ख़लील के किसी काम में दख़ल नहीं देती। लेकिन ख़लील की समस्या यह है कि नादिरा दिन प्रतिदिन खुदमुख्तार होती जा रही है। जब से ख़लील जैदी ने घर का सारा खर्चा अपने हाथ में लिया है, तब से वो घर का सौदा-सुल्फ़ भी नहीं लाती। ख़लील कुढ़ता रहता है लेकिन समझ नहीं पाता कि नादिरा के अहम् को कैसे तोड़े।
नादिरा ख़लील के एजेण्डे से पूरी तरह वाक़िफ़ है। जानती है कि ज़मींदार खून बरदाश्त नहीं कर सकता कि उसकी रियाया उसके सामने सिर उठा कर बात कर सके। परवेज़ अहमद के घर हुए बार-बे-क्यू में तो बदतमीज़ी की हद कर दी थी ख़लील ने। बात चल निकली थी प्रजातंत्र पर कि पाकिस्तान में तो छद्म डेमोक्रेसी है। परवेज़ स्वयं इसी विचारधारा के व्यक्ति हैं। उस पर नादिरा ने कहीं भारत को विश्व का सबसे बड़ा प्रजातंत्र कह दिया। ख़लील का पारा चढ़ गया, ''रहने दीजिए, भला आप क्या समझेंगी।'' बस यही कह कर एकदम चुप हो गया। नादिरा ने स्थिति को समझने में ग़लती कर दी और कहती गई, ''परवेज़ भाई, मैं क्या गलत कह रही हूँ ? भारत का प्रधानमंत्री सिक्ख, वहाँ का राष्ट्रपति मुसलमान और कांग्रेस की मुखिया ईसाई। क्या दुनिया में किसी भी और देश में ऐसा हो सकता है ?''
फट पड़ा था ख़लील - ''आप तो बस हिन्दू हो गई हैं। आप सिंदूर लगा लीजिए, बिन्दी माथे पर चढ़ा लीजिए और आर्य समाज में जा कर शुद्धि करवा लीजिए।... लेकिन याद रखिएगा, हम आपको तलाक दे देंगे।'' सन्नाटा छा गया था पूरी महफिल में। नादिरा भी सन्न रह गई। उसने जिस निगाह से ख़लील को देखा, अपने इस जीवन में ख़लील उसकी परिभाषा के लिए शब्द नहीं खोज पाएगा। फिर नादिरा ने एक झटका दिया अपने सिर को और चिपका ली वही मुस्कुराहट अपने चेहरे पर। ख़लील तिलमिलाया, परेशान हुआ और अंतत: चकरा कर कुर्सी पर बैठ गया। महफिल की मुर्दनी ख़त्म नहीं हो पाई। परवेज़ शर्मिंदा-सा नादिरा भाभी को देख रहा था। उसे अफ़सोस था कि उसने बात शुरू ही क्यों की। महफिल में कब्रिस्तान की-सी चुप्पी छा गई थी।
घर में भी कब्रिस्तान पहुँच गया। नादिरा आम तौर पर ख़लील के पत्र नहीं खोलती। एक बार खोलने का ख़मियाजा भुगत चुकी है। लेकिन इस पत्र पर पता लिखा था - श्री एवं श्रीमती ख़लील जैदी। उसे लगा ज़रूर कोई निमंत्रण पत्र ही होगा। पत्र खोला तो हैरान रह गई। अपने घर से इतनी दूर किसी कब्रिस्तान में इतनी पहले अपने लिए कब्र आरक्षित करवाने का औचित्य समझ नहीं पाई। क्या उसका घर एक ज़िन्दा कब्रिस्तान नहीं ? इस घर में ख़लील क्या नर्क का जल्लाद नहीं। घबरा भी गई कि मरने के बाद भी ख़लील की बगल में ही रहना होगा। क्या मरने के बाद भी चैन नहीं मिलेगा ?
चैन तो उसे दिन भर भी नहीं मिला। पाकिस्तान से आई अनीसा ने आत्महत्या का प्रयास किया था। रॉयल जनरल हस्पताल में दाख़िल थी। उसे देखने जाना था, पुलिस से बातचीत करनी थी। अनीसा को कब्र में जाने से रोकना था। अनीसा को दिलासा देती, पुलिस से बातचीत करती, सब-वे से सैण्डविच लेकर चलती कार में खाती, वह घर वापस पहुँची।
घर की रसोई में खटपट की आवाज़ें सुनाई दे रही थीं। यानी कि अब्दुल खाना बनाने आ चुका था। रात का भोजन अब्दुल ही बनाता है। ख़लील के लिए आज खास तौर पर कबाब और मटन चॉप बन रही थीं। नादिरा ने जब से योग शुरू किया है, शाकाहारी हो गई है। ऊपर कमरे में जा कर कपड़े बदल कर नादिरा अब्दुल के पास रसोई में आ गई है। अब्दुल की ख़ासियत है कि जब तक उससे कुछ पूछा ना जाए, चुपचाप काम करता रहता है। बस, हल्की-सी मुस्कुराहट उसके व्यक्तित्व का एक हिस्सा है। आज भी काम किए जा रहा है। नादिरा ने पूछ ही लिया- ''अब्दुल, तुम्हारी बीवी की तबीयत अब कैसी है ? और बेटी ठीक है ना ?''
''अल्लाह का शुक्र है बाजी। माँ बेटी दोनों ठीक हैं।'' फिर चुप्पी। नादिरा को कई बार हैरानी भी होती है कि अब्दुल के पास बात करने के लिए कुछ भी नहीं होता। अच्छा भी है। दो घरों का काम करता है। कभी इधर की बात उधर नहीं करता।
ख़लील घर आ गया है। अब शरीर थक जाता है। उसे इस बात का गर्व है कि उसने अपने परिवार को ज़माने भर की सुविधाएँ मुहैय्या करवाई हैं। नादिरा के लिए बी.एम.डब्ल्यू कार है तो बेटे इरफ़ान के लिए टोयोटा स्पोटर्स। हैम्पस्टेड जैसे पॉश इलाके में महलनुमा घर है। घर के बाहर दूर तक फैली हरियाली और पहाड़ी। बिल्कुल पिक्चर पोस्टकार्ड जैसा घर दिया है नादिरा को। वह चाहता है कि नादिरा इसके लिए उसकी कृतज्ञ रहे। नादिरा तो एक बेडरूम के फ्लैट में भी खुश रह सकती है। खुशी को रहने के लिए महलनुमा घर की ज़रूरत नहीं पड़ती। सात बेडरूम का घर अगर एक मकबरे का आभास दे तो खुशी तो घर के भीतर घुसने का साहस भी नहीं कर पाएगी। दरवाजे के बाहर ही खड़ी रह जाएगी।
''ख़लील, ये आपने अभी से कब्रें क्यों बुक करवा ली हैं ? और फिर घर से इतनी दूर क्यों ? कार्पेण्डर्स पार्क तक तो हमारी लाश को ले जाने में भी खासी मुश्किल होगी।''
''भई, एक बार लाश रॉल्स राईस में रखी गई तो हैम्पस्टैड क्या और कार्पेण्डर्स पार्क क्या। यह कब्रिस्तान ज़रा पॉश किस्म का है। फ़ाइनेन्शियल सेक्टर के हमारे ज्यादातर लोगों ने वहीं दफ़न होने का फैसला लिया है। कम से कम मरने के बाद अपने स्टेटस के लोगों के साथ रहेंगे।''
''ख़लील, आप ज़िंदगी भर तो इन्सान को पैसों से तौलते रहे। क्या मरने के बाद भी आप नहीं बदलेंगे। मरने के बाद तो शरीर मिट्टी ही है, फिर उस मिट्टी का नाम चाहे अब्दुल हो, नादिरा हो या ख़लील।''
''देखो नादिरा, अब शुरू मत हो जाना। तुम अपना समाजवाद अपने पास रखो। मैं उसमें दख़ल नहीं देता, तुम इसमें दख़ल मत दो। मैं इन्तज़ाम कर रहा हूँ कि हम दोनों के मरने के बाद हमारे बच्चों पर हमें दफ़नाने का कोई बोझ न पड़े। सब काम बाहर-बाहर से ही हो जाए।''
''आप बेशक करिये इन्तज़ाम लेकिन उसमें भी बुर्जुआ सोच क्यों ? हमारे इलाके में भी तो कब्रिस्तान है, हम हो जाएँगे वहाँ दफ़न। मरने के बाद क्या फ़र्क पड़ता है कि हम कहाँ है ?''
''देखो, मैं नहीं चाहता कि मरने के बाद हम किसी खानसामा, मोची, या प्लंबर के साथ पड़े रहें। नजम ने भी वहीं कब्रें बुक करवाई हैं। दरअसल मुझे तो बताया ही उसी ने। मैं चाहता हूँ कि तुम्हारी ज़िंदगी में तो तुमको बेस्ट चीज़ें मुहैय्या करवाऊँ ही, मरने के बाद भी बेहतरीन ज़िंदगी दूँ। भई अपने जैसे लोगों के बीच दफ़न होने का सुख और ही है।''
''ख़लील अपने जैसे क्यों ? अपने क्यों नहीं ? आप पाकिस्तान में क्यों नहीं दफ़न होना चाहते ? वहाँ आप अपनों के करीब रहेंगे। क्या ज्यादा खुशी नहीं हासिल होगी ?''
''आप हमें यह उल्टा पाठ न पढ़ाएँ। इस तरह तो आप हमसे कहेंगी कि मैं पाकिस्तान में दफ़न हो जाऊँ अपने लोगों के पास और आप मरने के बाद पहुँच जाएँ भारत अपने लोगों के कब्रिस्तान में। यह चाल मेरे साथ नहीं चल सकती हैं आप। हम आपकी सोच से अच्छी तरह वाक़िफ़ है बेगम।''
''ख़लील, हम कहे देते हैं, हम किसी फाइव स्टार कब्रिस्तान में न तो खुद को दफ़न करवाएँगे और न ही आपको होने देंगे। आप इस तरह की सोच से बाहर निकलिए।''
''बेगम कुरान-ए-पाक भी इस तरह का कोई फ़तवा नहीं देती कि कब्रिस्तान किस तरह का हो। वहाँ भी सिर्फ़ दफ़न करने की बात है।''
''दिक्कत तो यही है ख़लील, यह जो तीनों आसमानी किताबों वाले मज़हब हैं वो पूरी ज़मीन को कब्रिस्तान बनाने पर आमादा हैं। एक दिन पूरी ज़मीन कम पड़ जाएगी हम तीनों मज़हबों के मरने वालों के लिए।''
''नादिरा जी, अब आप हिन्दुओं की तरह मुतासिब बातें करने लगी हैं। समझती तो आप कुछ हैं नहीं। आप तो यह भी कह देंगी कि हम मुसलमानों को भी हिन्दुओं की तरह चिता में जलाना चाहिए।'' ख़लील जब गुस्सा रोकने का प्रयास करता है तो नादिरा के नाम के साथ जी लगा देता है।
''हर्ज़ ही क्या है इसमें ? कितना साफ सुथरा सिस्टम है। ज़जीन भी बची रहती है, खाक मिट्टी में भी मिल जाती है।''
''देखिए, हमें भूख लगी है। बाकी बात कल कर लेंगे।''
कल कभी आता भी तो नहीं है। फिर आज हो जाता है। किन्तु नादिरा ने तय कर लिया है कि इस बात को कब्र में नहीं दफ़न होने देगी। आबिदा को फोन करती है- ''आबिदा कैसी हो ?''
''अरे, नादिरा आपा, कैसी हैं आप ? आपको पता है आमिर खान ने दूसरी शादी कर ली है। और सैफ़ अली खान ने भी अपनी पहली बीवी को तलाक दे दिया है। इन दिनों बॉलीवुड में मज़ेदार ख़बरें मिल रही हैं। आपने शाहरुख की नई फ़िल्म देखी क्या ? देवदास ? क्या फ़िल्म है !''
''आबिदा, तुम फ़िल्मों की दुनिया से बाहर आकर हक़ीकत को भी कभी देखा करो। तुम्हें पता है कि ख़लील और नजम कार्पेण्डर्स पार्क के कब्रिस्तान में कब्रें बुक करवा रहे हैं।''
''आपा हमें क्या फ़र्क पड़ता है ? एक के बदले चार-चार बुक करें और मरने के बाद चारों में रहें। आपा जब ज़िन्दा होते हुए इनको सात-सात बेडरूम के घर चाहिएँ तो मरने के बाद क्या खाली दो गज़ ज़मीन काफी होगी इनके लिए। मैं तो इनके मामलों में दख़ल ही नहीं देती। हमारा ध्यान रखें बस...। आप क्या समझती हैं कि मैं नहीं जानती कि नजम पिछले चार साल से बुशरा के साथ वक्त बिताते हैं। आप क्या समझती हैं कि बंद कमरे में दोनों कुरान शरीफ की आयतें पढ़ रहे होते हैं ? पिछले दो सालों से हम दोनों भाई बहन की तरह जी रहे हैं। अगर हिन्दू होती तो अब तक नजम को राखी बांध चुकी होती।''
धक्क सी रह गई नादिरा ! उसने तो कभी सोचा ही नहीं कि पिछले पाँच वर्षों से एक ही बिस्तर पर सोते हुए भी वह और ख़लील हम-बिस्तर नहीं हुए। दोनों के सपने भी अलग-अलग होते हैं और सपनों की ज़बान भी। एक ही बिस्तर पर दो अलग-अलग जहान होते हैं। तो क्या ख़लील भी कहीं...। वैसे उसे भी क्या फ़र्क पड़ता है।
''आबिदा, मैं जाती रिश्तों की बात नहीं कर रही। मैं समाज को ले कर परेशान हूँ। क्या यह ठीक है जो ये दोनों कर रहे हैं।''
''आपा मुझे कोई फ़र्क नहीं पड़ता। मेरे लिए यह बातें बेकार सी हैं। जब मर ही गए तो क्या फ़र्क पड़ता है कि मिट्टी कहाँ दफ़न हुई। इस बात को लेकर मैं अपना आज क्यों खराब करूँ ? हाँ, अगर नजम मुझ से पहले मर गए तो मैं उनको दुनिया के सबसे गरीब कब्रिस्तान में ले जाकर दफ़न करूँगी और कब्र पर कोई कुतबा नहीं लगवाऊँगी। गुमनाम कब्र होगी उसकी। अगर मैं पहले मर गई तो फिर बचा ही क्या ?''
ठीक कहा आबिदा ने कि बचा ही क्या। आज ज़िन्दा हैं तो भी क्या बचा है। साल भर बीत जाने के बाद भी क्या कर पाई है नादिरा। आदमी दोनों ज़िन्दा हैं लेकिन कब्रें आरक्षित हैं दोनों के लिए। ख़लील और नजम आज भी इसी सोच में डूबे हैं कि नया धन्धा क्या शुरू किया जाए। कब्रें आरक्षित करने के बाद वो दोनों इस विषय को भूल भी गए हैं।
लेकिन कार्पेण्डर्स पार्क उनको नहीं भूला है। आज फिर एक चिट्ठी आई है। मुद्रा स्फीति के साथ-साथ मासिक किश्त में पैसे बढ़ाने की चिट्ठी ने नादिरा को खून फिर खौला दिया है। ख़लील और नजम आज ड्राइंग रूम में योजना बना रहे हैं। पूरे लन्दन में एक नजम ही है जो ख़लील के घर शराब पी सकता है। और एक ख़लील ही है जो नजम के घर सिगरेट पी सकता है। लेकिन दोनों अपना-अपना नशा खुद साथ लाते हैं- सिगरेट भी और शराब भी।
''ख़लील भाई, देखिए मैं पाकिस्तान में कोई धन्धा नहीं करूँगा। एक तो आबिदा वहाँ जाएगी नहीं, दूसरे अब तो बुशरा का भी सोचना पड़ता है, और तीसरा यह कि अपना तो साला पूरा मुल्क ही करप्शन का मारा हुआ है। इतनी रिश्वत देनी पड़ती है कि दिल करता है, सामने वाले को चार जूते लगा दूँ। ऊपर से नीचे तक सब करप्ट ! अगर हम दोनों को मिल कर कोई काम शरू करना है तो यही इंगलैण्ड में रह कर करना होगा। वर्ना आप कराची और हम गोआ। मैं तो आजकल सपनों में वहीं गोआ में रहता हूँ। क्या जगह है ख़लील भाई, क्या लोग हैं, कितना सेफ फील करता है आदमी वहाँ।''
''मियाँ, तुमको चढ़ बहुत जल्दी जाती है। अभी तय कुछ हुआ नहीं तुम्हारे अन्दर का हिन्दुस्तानी लगा चहकने। तुम साले हिन्दुस्तानी लोग कभी सुधर नहीं सकते। अन्दर से तुम सब के सब मुतासिब होते हो, चाहे मज़हब तुम्हारा कोई भी हो। तुम्हारा कुछ नहीं हो सकता।''
''तो फिर आप ही कुछ सोचिए ना। आप तो बहुत ब्रॉड-माइंडेड हैं।''
''वहीं तो कर रहा हूँ। देखो, एक बात सुनो।''
नदिरा भुनभुनाती हुई ड्राइंग रूम में दाख़िल होती है - ''ख़लील, मैंने आपसे कितनी बार कहा है कि यह कब्रें कैंसिल करवा दीजिए। आप मेरी इतनी छोटी-सी बात नहीं मान सकते ?''
''अरे भाभी, आपको ख़लील भाई ने बताया नहीं कि उनकी स्कीम की खास बात क्या है ? उनका कहना है कि अगर आप किसी एक्सीडेंट या हादसे का शिकार हो जाएँ, जैसे आग में जल मरें तो वो लाश का ऐसा मेकअप करेंगे कि लाश एकदम जवान और खूबसूरत दिखाई दे। अब आप ही सोचिए, ऐसी कौन-सी ख़ातून है जो मरने के बाद खूबसूरत और जवान न दिखना चाहेगी ?''
''आप तो हमसे बात भी न करें नजम भाई। आपने ही यह कीड़ा इनके दिमाग़ में डाला है। हम आपको कभी माफ़ नहीं करेंगे... ख़लील, आप अभी फोन करते हैं या नहीं। वर्ना मैं खुद ही कब्रिस्तान को फोन करके कब्रें कैंसिल करवाती हूँ।''
''यार तुम समझती नहीं हो नादिरा, कैंसिलेशन चार्ज अलग से लगेंगे। क्यों नुकसान करवाती हो।''
''तो ठीक है, मैं खुद ही फोन करती हूँ और पता करती हूँ कि आपका कितना नुकसान होता है। उसकी भरपाई मैं खुद ही कर दूँगी।''
नादिरा गुस्से में नम्बर मिला रही है। सिगरेट का धुआँ कमरे में एक डरावना-सा माहौल पैदा कर रहा है। शराब की महक रही सही कसर भी पूरी कर रही है। फोन लग गया है। नादिरा अपना रेफरेन्स नम्बर दे कर बात कर रही है। ख़लील और नजम परेशान और बेबस से लग रहे हैं।
नदिरा 'थैंक्स' कह कर फोन रख देती है।
''लीजिए ख़लील, हमने पता भी कर दिया है और कैन्सिलेशन का आर्डर भी दे दिया है। पता है उन्होंने क्या कहा ? उनका कहना है कि आपने साढ़े तीन सौ पाउण्ड एक कब्र के लिए ज़मा करवाए हैं। यानी कि दो कब्रों के लिए सात सौ पाउण्ड। और अब इन्फ़लेशन की वजह से उन कब्रों की कीमत हो गई है ग्यारह सौ पाउण्ड यानी कि आपको कुल चार सौ पाउण्उ का लाभ।''
ख़लील ने कहा- ''क्या ! चार सौ पाउण्ड का फ़ायदा, बस साल भर में !'' उसने नजम की तरफ़ देखा। नजम की आँखों में भी वही चमक थी।
नया धन्धा मिल गया था।
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तेजेन्द्र शर्मा
जन्म : 21 अक्टूबर 1952 को पंजाब के शहर जगरांव
शिक्षा : दिल्ली विश्विद्यालय से बी.ए. (ऑनर्स) अंग्रेज़ी, एवं एम.ए. अंग्रेज़ी, कम्पयूटर कार्य में डिप्लोमा ।
प्रकाशित कृतियाँ : काला सागर (1990) ढिबरी टाईट (1994), देह की कीमत (1999) यह क्या हो गया ! (2003), बेघर आंखें (2007) -सभी कहानी संग्रह। ये घर तुम्हारा है... (2007 - कविता एवं ग़ज़ल संग्रह) ढिबरी टाइट नाम से पंजाबी, इँटों का जंगल नाम से उर्दू तथा पासपोर्ट का रंगहरू नाम से नेपाली में भी उनकी अनूदित कहानियों के संग्रह प्रकाशित हुए हैं। अंग्रेज़ी में : 1. Black & White (biography of a banker – 2007), 2. Lord Byron - Don Juan (1976), 3. John Keats - The Two Hyperions (1977)
कथा (यू.के.) के माध्यम से लंदन में निरंतर कथा गोष्ठियों, कार्यशालाओं एवं साहित्यिक कार्यक्रमों का आयोजन । लंदन में कहानी मंचन की शुरू‏आत वापसी से की। लंदन एवं बेज़िंगस्टोक में, अहिंदीभाषी कलाकारों को लेकर एक हिंदी नाटक हनीमून का सफल निर्देशन एवं मंचन ।
74-A, Palmerston Road
Harrow & Wealdstone
Middlesex UK
Telephone: 020-8930-7778 / 020-8861-0923.
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धारावाहिक पंजाबी उपन्यास(किस्त- 13)

सवारी
हरजीत अटवाल
हिंदी अनुवाद : सुभाष नीरव


॥ अट्ठारह ॥
सुबह बलदेव की नींद खुली तो मैरी उसकी छाती के बालों से खेल रही थी। उसने बलदेव को आँखें खोलते देख 'गुड मार्निंग' कहा और एक बड़ा-सा चुम्बन दिया। बलदेव ने उसे बांहों में कस लिया और सोचने लगा कि इतना बेसब्रा तो वह नहीं था। अगर उसके अंदर ज़रा-सी भी फुर्ती होती तो गुरां को दिल की बात कह सकता था। अगर ऐसा कर सका होता तो ज़िंदगी कुछ और ही होती। मैरी ने पूछा-
''डेव, कहाँ गुम हो ?''
''मैरी, मैं यह सोच रहा था कि छोटी-सी मुलाकात हमें कहाँ से कहाँ ले आई है, मैं इसके लिए तैयार नहीं था।''
''तेरा क्या ख़याल है, मैं तैयार थी ? मैं लंदन में ग्रांट की खातिर आई हूँ, किसी के साथ सोने के लिए नहीं, वह भी इतनी जल्दी।''
''मैरी, तू मुझे पसंद है, पर मुझ पर कोई आस न बांध बैठना।''
''मुझे तेरे पर या किसी और पर अभी कोई आस नहीं है। यह सब कुछ तो इस कारण घटित हो गया कि तू बहुत बढ़िया मनुष्य है। मुझे आशा है कि मेरा अंदाजा सही होगा।''
बलदेव कुछ नहीं बोला। आँखें मूंदे यूँ ही पड़ा रहा। वह इस आनंद को भीतर तक महसूस करना चाहता था। मैरी कहने लगी-
''डेव, मेरे संग सोकर तू कितना खुश है ?''
''बहुत, इतना कि बता नहीं सकता।''
''मेरे पास आदमी को खुश करने की स्किल है। मैंने इस बारे में बहुत किताबें पढ़ी हैं, अपनी सहेलियों के साथ भी इस विषय पर बात करती रहती हूँ, मेरी जितनी जानकारी किसी की नहीं होगी।''
''तेरी बात सच है मैरी, मेरा अधिक अनुभव नहीं पर तेरी बात सही लगती है।''
''डेव, मेरा दुखान्त देख, टैंड फिर भी लूना के पीछे भाग गया।''
कह कर मैरी उदास हो गई। बलदेव ने उसे अपने संग कसकर दबाया और कहा-
''शायद टैंड ने तुझे मेरे लिए छोड़ दिया हो।''
उसकी बात पर मैरी हँसने लगी। कुछ देर बाद बोली-
''डेव, अब तेरा अगला प्रोग्राम क्या है ?''
''मैं उठ कर अब चलता हूँ। जाते-जाते नाइजल को मिलूंगा। दुकान के बारे में सोचना है, लेनी है कि नहीं।''
''उसके बाद, तू कह रहा था कि फ्लैट खोजने जाना है।''
''हाँ, रहने के लिए जगह खोजनी है। फिर फ्लैट खरीदना चाहता हूँ। इसीलिए दुकान एक बार फिर से देखनी है। फैसला करना है।''
''काम पर नहीं जाना अब ? तेरी जॉब सुनने में तो अच्छी लगती है।''
''अगर दुकान नहीं ली तो जल्दी ही काम पर चला जाऊँगा। यूँ ही पीठ के दर्द का बहाना बना कर सिक-लीव लिए बैठा हूँ। अगर फ्लैट लेना हुआ तो काम पर जाना ही पडेग़ा नहीं तो मोर्टगेज नहीं मिलेगी।''
''मैं एक बात कहूँ ?''
''कह ।''
''तू मेरे पास क्यों नहीं रहने लग जाता।''
''मैरी, हम अभी कल ही तो मिले हैं।''
''तू दूसरी जगह भी तो किराये पर मकान लेगा ही, किराया मुझे देते रहना या खर्च शेयर कर लेना।''
बलदेव को मैरी की बात में दम लगा। उस फ्लैट के दो कमरे थे। एक में वह रह सकता था, पर फ्लैट गंदा बहुत था। उसने कहा-
''सोच ले मैरी, तू मुझे झेल भी सकेगी ? किसी को एक रात में कितना जान सकती है।''
''कोशिश तो कर सकती हूँ। मैं ग्रांट की मौत तक तो यहाँ हूँ ही। फिर भी मुझे अब यहीं लंदन में ही रहना है, इस फ्लैट को अपने नाम करवाना है किसी तरह। तू तो जानता है न, काउँसल के फ्लैट आजकल मिलते कहाँ हैं। फिर इस मिले-मिलाये को हाथ से क्यों जाने दें।''
वे देर से उठे। मैरी अस्पताल चली गई और बलदेव नाइजल की दुकान पर जा पहुँचा। जुआइना टिल्ल(गल्ले) पर खड़ी थी। उसे देखते ही बोली-
''हम रात में तुम्हारा इंतज़ार करते रहे, रात में दुकान इतनी बिजी थी कि देखकर तेरी रूह खुश हो जाती।''
बलदेव ने दुकान लेने का फैसला कर दिया। पन्द्रह हजार उसके पास था, पन्द्रह का कर्ज़ा उठा लेगा। बीस की दुकान और दस हजार का स्टॉक। पर नाइजल पच्चीस हजार पौंड मांग रहा था। उसने सोचा कि वह बीस की ऑफर दे देगा, अगर मान गया तो ठीक, नहीं तो इससे अधिक कीमत नहीं देगा। जुआइना ने कहा-
''फ्रैंक आया हुआ है न, उसके साथ पब में गया है, सामने कैट में। फ्रैंक ही तो हमें अपने पास ले जाना चाहता है।''
''फ्रैंक नाइजल का भाई है ?''
उसकी बात पर जुआइना हँसने लगी और बोली-
''नहीं, फ्रैंक मेरा पहला पति है, पर अब उसकी नाइजल के साथ दोस्ती हो गई है। अब हम सब एकसाथ रहेंगे। उसकी पत्नी भी बहुत अच्छी है, हमारी खूब निभती है।''
बलदेव को यह रिश्ता अच्छा लगा। इन्सान में इतनी तो सहनशीलता होनी ही चाहिए। उसने कहा-
''जुआइना, मैं अब पब तो नहीं जा सकूँगा, फिर आऊँगा।''
''डेव, तू जो कुछ कहना चाहता है, मुझे कह जा। बता, क्या ऑफर देना चाहता है ?''
''बीस हजार, जैसी भी दुकान है, ठीक है, न अकाउंट देखूँगा और न ही कुछ और देखूँगा।''
बीस हजार सुनकर जुआइना का मुँह कुछ अजीब-सा हो गया। वह बोली-
''यह तो बहुत कम है, पच्चीस तो हमने सिर्फ तुम्हें वाकिफ होने के कारण कहा था। मार्किट में लगाई तो पैंतीस की लगाएँगे।''
बलदेव चुप था। जुआइना ने फिर कहा-
''तू दुबारा सोच कर आ। अपने भाई के साथ सलाह कर ले, फिर बात करना।''
बलदेव वहाँ से चला आया। उसने एक पल के लिए स्वयं को दुकानदार बना देख लिया था। वह समझ गया था कि यह सौदा नहीं बनने वाला। बीस से अधिक देने को वह तैयार नहीं था। दुकान की हालत भी अच्छी नहीं थी। ऊपर भी खर्चा होना था। दुकान में से निकल कर उसने सोचा कि अजमेर से भी मिलता जाए। गुरां को एक बार देख लेगा। शैरन तो इस वक्त स्कूल में होगी। अजमेर उसे देखते ही नाराज होता हुआ बोला-
''कल नहीं आया, हम इंतज़ार करते रहे। मैं तेरी कार देखने गया, पर तू तो चुपके से खिसक गया।''
''भाजी, असल में मैं सतनाम के यहाँ दो पैग लगा बैठा, मुझे कहीं और भी जाना था इसलिए मैं चला गया।''
''मैंने तो सोचा था, दुकान के बारे में सलाह करेंगे।''
''अब मैं वहीं से आ रहा हूँ... मैं बीस हजार की ऑफर दे आया हूँ।''
''मुझसे पूछ तो लेता।''
''मैंने सोचा कि अपनी जेब के हिसाब से ऑफर दे दूँ।''
''जेब... तू अकेले लेना चाहता है ?''
''तुम ऐसा ही तो कहते थे।''
''मैं... पर तू अकेले चलाएगा कैसे ?''
''किसी को रख लूँगा।''
बलदेव के मन में उसी समय मैरी का नाम आ गया कि वह उसकी मदद ले लेगा। मैरी का नाम मन में आते ही वह उत्साह से भी भर गया। अजमेर कह रहा था-
''यह दुकानदारी अकेले बंदे का काम नहीं होती।''
''पर यह दुकान दो मालिकों का खर्च नहीं उठा पाएगी।''
''तेरी तनख्वाह तो निकालेगी ही।''
''तनख्वाह के लिए तो मेरे पास जॉब है ही।''
''अगर है तो कर जाकर, सड़कों पर क्यों घूमता फिरता है।''
कह कर अजमेर ने मुँह दूसरी तरफ कर लिया। उनकी बातें सुन कर गुरिंदर भी ऊपर से नीचे उतर आयी। उसे देखकर बोली-
''तू है... मैंने सोचा, पता नहीं ये किसके साथ तेज आवाज़ में बातें कर रहे हैं। रात को हम तेरा वेट करते रहे।''
फिर उसने पति का मूड खराब देखकर पूछा-
''आपको क्या हो गया ?''
''कुछ नहीं। गधे से कहो कि लूण(नमक) दे तो कहता है कि कान फटते हैं।''
बलदेव कुछ नहीं बोला। अजमेर भी चुप था। दुकान में सोहन सिंह भी था। वह माहौल गरम देखकर अन्दर चला गया। कुछ देर बाद गुरां ने कहा-
''चाय पिएगा ?''
''नहीं, अब मैं चलूँगा।''
''जाना कहाँ है ? शौन के घर ?''
''नहीं, मैं कहीं और मूव हो जाऊँगा अब।''
''कहाँ ? हमें भी बता। अगर तुझे ढूँढ़ना हो तो कहाँ ढूँढ़ें।''
बलदेव से पहले ही अजमेर बोल उठा-
''जब वह हमारे में भीजता ही नहीं तो क्यों पूछे जाती है। जाने दे, जहाँ जाता है।''
बलदेव वहाँ से आ गया। उसे अजमेर की खुदगर्जी पर गुस्सा आ रहा था लेकिन उसका मूड खराब नहीं हुआ था, क्योंकि मैरी उसके अंग-संग थी। अजमेर के साथ तो उसने पहले रहकर देख ही लिया था। दूसरे की इज्ज़त एक मिनट में उतार कर रख देता है। अगर उसकी हाँ में हाँ मिलाते रहो तो खुश रहता है।
वहाँ से वह सीधा शौन के पास गया। फ्लैट की चाबी उसके पास थी पर उसने घंटी बजाना ही ठीक समझा। उसे अपना सामान उठाना था। सामान उसका ज्यादा नहीं था। कुछ सामान तो लॉण्डरी में होता और कुछ कार में ही रखता। कैरन ने दरवाजा खोला। उनके चेहरों से लगता था कि वे अभी-अभी लड़ कर हटे थे। शौन उसे देखकर खुश हो गया और बोला-
''कल नहीं आया ? भाई के यहाँ ठहर गया था ?''
''नहीं, मैंने दूसरी जगह ढूँढ़ ली है, मूव हो जाऊँगा अब।''
''कब ?''
''अभी, इसी वक्त। सामान लेने आया हूँ।''
कह कर उसने अपना सामान बटोरना आरंभ कर दिया। थोड़ा होने के कारण जल्द ही इकट्ठा हो गया और दो ही बैग में आ गया। उसने कैरन को अलविदा कहा। शौन उससे कहने लगा-
''चल, तुझे पैग पिलाकर भेजता हूँ।''
वे क्राउन पब में आ बैठे। बीयर पीते हुए शौन बोला-
''इसी पब से शुरू हुई थी मेरी लंडन की ज़िन्दगी। यहीं मैं आकर उतरा था। कमरा किराये पर लिया, फिर यह फ्लैट मिल गया और कैरन मिल गई, सब कुछ बहुत ठीकठाक था पर कैरन से सब खराब कर दिया। अब और बर्दाश्त नहीं हो रहा, मेरे धर्म ने मेरे हाथ बाँध रखे हैं। कुछ भी हो, मैं भी यहाँ से मूव हो जाऊँगा।''
''शौन, मैं जल्द ही फ्लैट खरीदने वाला हूँ, तू मेरे पास आ जाना।''
''डेव, मेरा तो लंडन में रहने को ही दिल नहीं करता।''
शौन बहुत उदास था। बलदेव उसको हौसला देने लगा। बीयर के नशे में आकर शौन ने कहा-
''डेव, तुझे कहीं मूव होने की ज़रूरत नहीं। तू एलिशन के चला जा। चल, मैं तुझे मिलवा आता हूँ, आजकल वह अकेली है। उस आदमी को उसने निकाल दिया है। तुझे एलिशन से अच्छी लड़की नहीं मिलेगी। अगर तुम्हारे संबंध ठीक रहे तो विवाह करवा लेना।''
00
(क्रमश: जारी…)

लेखक संपर्क :
67, हिल साइड रोड,
साउथहाल, मिडिलसेक्स
इंग्लैंड
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07782-265726(मोबाइल)
ई-मेल : harjeetatwal@yahoo.co.uk

लोकार्पण

“तेजेंद्र शर्मा - वक़्त के आईने में" पुस्तक का लोकार्पण"

समकालीन हिंदी कथा साहित्य में तेजेंद्र शर्मा एक चर्चित नाम है. हरि भटनागर और बृजनारायण शर्मा द्वारा संपादित और रचना समय, भोपात से प्रकाशित पुस्तक “तेजेन्द्र शर्मा- वक़्त के आईने में” पुस्तक का लोकार्पण गत ४ अप्रैल, २००९ को नई दिल्ली के राजेंद्र भवन सभागार में किया गया। इस पुस्तक में न केवल तेजेन्द्र शर्मा द्वारा लिखी चुनिंदा कहानियाँ, कविताएँ, गजलें, संवाद शामिल किए गए हैं बल्कि इसमें कई आलोचकों व समीक्षकों की राय, उनके मित्रों के विचार, एक ख़त और माँ का आशीर्वाद भी संकलित है। समारोह में हिंदी आलोचक नामवर सिंह, वरिष्ठ लेखिका कृष्णा सोबती, कथाकार, उपन्यासकार व हिंदी पत्रिका "हंस" के संपादक राजेंद्र यादव तथा पत्रकार अजित राय मंच पर विराजमान थे।
रचना समय के संपादक व मध्य प्रदेश की पत्रिका "साक्षात्कार" के सम्पादक हरी भटनागर ने अपना सम्पादकीय वक्तव्य बताया की "वक्त के आईने में" पुस्तक प्रकाशन कैसे हुआ। उन्होंने एक घटना का जिक्र किया जब उन्होंने तेजेंद्र शर्मा जी की कहानी "कब्र का मुनाफा" को इंडिया टुडे में बीस सब से अच्छी कहानियो में रखा तब उन्हें कई प्रतिक्रियाएं मिली जो कि शायद कहानी को बिना पढ़े ही दे दी गई थीं। उन्होंने कहा कि तेजेन्द्र की कहानियाँ दो सभ्यताओं के संगम की कहानियां है व जीवन के सत्य से खुराक लेती हैं. तेजेन्द्र की कहानियाँ इस धारणा का खंडन करती हैं कि तेजेन्द्र के लेखन पर हिंदुत्व का प्रभाव है और वह मार्क्सवाद के पीछे डंडा ले कर फिरते हैं. हरि भटनागर ने अपने वक्तव्य में यहा स्पष्ट किया कि यह पुस्तक अभिनन्दन ग्रन्थ नहीं है।अजित राय ने मंच संचालन के दौरान खुलासा कि दो वर्ष पूर्व तक वह तेजेन्द्र शर्मा को कहानीकार नहीं मानते थे। उनके लंदन प्रवास के दौरान तेजेन्द्र ने उन्हें जो कहानियों की पुस्तकें दीं तो उन्होंने उन पुस्तकों को रद्दी कि टोकरी में फेंक दिया था क्योंकि उनकी धारणा थी कि विदेश में बसे हुए लेखक और कुछ नहीं हिन्दुत्व को मानने वाले बी जे पी के अनुयायी मात्र हैं। बाद में जब उन्होंने वही कहानियां पढ़ी तो उन्हें लगा कि वह गलत थे। उन्हें लगा कि तेजेन्द्र के लेखन में हिन्दुत्व वाली कोइ बात नहीं है और उनकी कहानियों के पात्र आम आदमी के जीवन के बहुत करीव हैं।
हिंदी के युवा कथाकार अजय नावरिया ने पुस्तक पर बोलते हुए प्रश्न उठाया कि यह पुस्तक अभिनन्दन ग्रन्थ क्यों नहीं है? अभिनन्दन ग्रथ की जो परिभाषा शब्द कोष में वर्णित है, उसके अनुसार यह पुस्तक अभिनन्दन ग्रंथ क्यों नहीं है? उन्होंने कहा कि हरी भटनागर जी शायद इसको अभिनन्दन ग्रन्थ इस लिए नहीं मानते क्यों कि वह विनम्र हैं और इस पुस्तक में चाटुकारिता का कोइ स्थान नहीं है। तेजेन्द्र की कहानियो में देश विदेश के उन अंचलों का प्रतिबिंब है जिन्हें आम पाठक सोच भी नहीं पाता।
श्रीमती नूर जहीर ने पुस्तक के खंड ५ में छपे "अमेरिका से एक ख़त" को मंच पर पढ़कर सुनाया जिसे डा0 सुधा ओम ढींगरा ने लिखा है। नूर जहीर ने पत्र पढ़ने से पूर्व कहा कि इस पत्र को पढ़ने के लिए उन्हें ही क्यों चुना गया, इस बात को लेकर वह हैरत में थीं परन्तु उस ख़त को पढ़ने के बाद उन्होंने कहा कि यदि वो इसको न पढती तो शायद उन्हें इस का अफ़सोस रह जाता।
नामवर जी ने हरी भटनागर को बधाई दी कि उन्होंने एक बहुत अच्छे ग्रन्थ का संपादन किया। इस कार्य को एक मिसाल कहते हुए उन्होंने कहा कि उनकी समझ में नहीं आ रहा वह किस को बधाई दें- पुस्तक के हीरो को या जिसने उसे हीरो को बनाया- "शिवा को सराहूं या सराहूं छत्रसाल को"। तेजेन्द्र को इन्दु सम्मान की स्थापना के लिए बधाई देते हुए नामवर जी ने कहा कि वह (तेजेन्द्र जी) तो हाउस ऑफ़ लॉर्ड्स का जलवा भी देख चुके हैं और यह तो हाउस ओफ कोमन है. उन्होंने कहा कि साहित्यकार का फर्ज है कि वह सत्य को उजागर करे और यह तेजेन्द्र बहुत बखूबी कर रहे हैं।
तेजेंद्र शर्मा जी ने मंच और सभागार में उपस्थित सभी का स्वागत करते हुए कहा कि यह दिन उनके लिए बहुत ख़ास है क्यों कि साहित्य से उनका परिचित करवाने वाले उनके प्रोफ़ेसर सोमनाथ जी, प्रोफ़ेसर प्रताप सहगल यहाँ उपस्थित हैं। उन्होंने अपनी हिंदी रुचि को अपनी पत्नी इन्दु शर्मा की पी एच डी से जोडा. उन्होंने कहा कि आज दुनिया उनकी कहानिया पढ़ रही है और आलोचक भी उसे देख रहे हैं यह उनके लिए बहुत बड़ी उपलब्धि है्। उन्होंने अजित राय और हरी भटनागर को पुस्तक के प्रकाशन के लिये धन्यवाद दिया व किताब पर मेहनत करने के लिए उन्होंने मधु अरोरा जी का आभार प्रकट किया।
राजेन्द्र यादव जी ने अपने पुराने दिनों को याद करते हुये कहा कि उन्हें एक पुरानी घटना याद आ रही है. यह घटना किशोर साहू (अभिनेता) से सम्बन्धित है. उनके पिता श्री राजेन्द्र यादव जी के काफ़ी करीब थे और अक्सर उन्हे पत्र लिखा करते थे. किशोर साहू एक कथाकार भी थे यह बहुत कम लोग जानते हैं. उनकी तरफ़ से आत्मकथा छापने का प्रस्ताव आया परन्तु जैसे ही यादव जी ने इसको स्वीकार कर लिया था। परन्तु जब वह उसमें कुछ चित्र और अन्य सामाग्री भी प्रकाशित भी प्रकाशित करवाने की जिद्द करने लगे तो उन्हें पुस्तक प्रकाशित न करने का निर्णय लेना पड़ा। लेकिन आज उन्हें लगता है कि उनका यह निर्णय उचित नहीं था। यादव जी ने कहा कि यदि आज वह किताब उन्हें मिल जाये तो वह उसे छापना चाहेंगे। अपने वक्तव्य में यादव जी ने बताया कि उनके मन में एक अवधारणा है कि विदेश में रहने वाले लोग हिन्दुत्व से ग्रसित होते हैं क्योंकि यह उनके जीवन का प्रश्न हो सकता है व उनकी रचनाये बडी बचकानी होती हैं। उन्होने भारत में आतंकवाद को बाबरी मस्जिद के गिरने से जोडा। उन्होंने निर्मल जी के लेखन का जिक्र करते हुए कहा कि उनकी कहानियों के पात्र आत्मलीन होते है और अपने आप से ही बातचीत करते हैं परन्तु तेजेन्द्र की कहानियों के पात्र आम आदमी से जुडे है और तेजेन्द्र जानते हैं कि किस तरह से किसी घटना या चरित्र से एक सफ़ल कहानी बनाई जा सकती है।
अन्त में हिंदी की वरिष्ठ कथाकार- उपन्यासकार श्रीमती कृष्णा सोबती जी ने मंच से कहा कि जो लोग विदेश में हैं, निश्चित रूप से अपने देश से इसलिये अधिक जुडे रहते हैं क्योंकि यह उनकी सुरक्षा का प्रश्न है। उन्होंने तेजेन्द्र शर्मा जी की कहानियों में से कुछ अंश पढ कर उनकी गहराई पर अपने विचार दिये और सुझाया कि किस तरह तेजेन्द्र जी एक आम घटना को एक सबल कहानी में परिवर्तित कर देते हैं।
समारोह में दिल्ली और दिल्ली से बाहर से आए अनेक गणमान्य लेखक, कवि, आलोचक, पत्रकार उपस्थित थे जिनमें मिस मारिया, असगर वजाहत, कन्हैया लाल नन्दन, सूरज प्रकाश, मधु अरोरा, श्रीमती विजया शर्मा, प्रेम जनमेजय, रूपसिंह चन्देल, सुभाष नीरव, अलका सिन्हा, अविनाश वाचस्पति, शैलेश भारतवासी आदि प्रमुख थे।
श्रद्धांजलि

प्रख्यात साहित्यकार विष्णु प्रभाकर का देहावसान

हिंदी के वयोवृद्ध प्रख्यात साहित्यकार विष्णु प्रभाकर जी का 10 अप्रैल 2009 को देर रात दिल्ली के महाराजा अग्रसेन अस्पताल में निधन हो गया। 97 वर्षीय प्रभाकर काफी समय से बीमार चल रहे थे। उनके पार्थिव शरीर को उनकी इच्छानुसार अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान(एम्स) दान कर दिया गया। स्वभाव से बेहद सरल और विनम्र विष्णु प्रभाकर जी एक महान लेखक थे। कर्म करने में ही विश्वास रखने वाले इस लेखक ने आडम्बर न जीवन में पसंद किए, न साहित्य में। "आवारा मसीहा" उनकी हिंदी में ही नहीं, वरन विश्व साहित्य में एक क्लासिक कृति है। साहित्य अकादमी पुरस्कार प्राप्त उनका उपन्यास “अर्द्ध-नारीश्वर” भी एक बहुचर्चित उपन्यास रहा है। कहानियों, लघुकथाओं के अतिरिक्त प्रभाकर जी ने कई नाटकों की रचना की और बाल साहित्य में भी लेखन करते रहे। इस महान दिवगंत आत्मा को “गवाक्ष” “सेतु साहित्य” परिवार की ओर से विनम्र श्रद्धांजलि !