शनिवार, 19 मई 2012

धारावाहिक पंजाबी उपन्यास(किस्त- 47)










सवारी
हरजीत अटवाल
हिंदी अनुवाद : सुभाष नीरव


॥ बावन ॥

बलदेव और डौमनिक की दोस्ती दिनोंदिन पक्की हो रही थी। लिज़ को मिलने आया डौमनिक बलदेव के पास अधिक समय गुज़ारता। एक दिन डौमनिक कहने लगा-
      ''डेव, बोट शो लगा हुआ है, अर्ल्ज क़ोर्ट। देखने चलेगा ?''
      ''क्यों नहीं ?''
      ''किस दिन की टिकटें लूँ ?''
      ''मेरे पास तो टाइम ही टाइम है, अपना देख।'' बलदेव ने कहा।
      वह अर्ल्ज़ कोर्ट की ओर से कितनी बार गुज़रता और वहाँ खड़ी रंग-बिरंगी किश्तियाँ देखने में बहुत सुन्दर लगतीं। किश्तियों में हालांकि उसने ज्यादा सफ़र नहीं किया था, पर उसको पसन्द बहुत थीं। जब भी थेम्ज़ की ओर जाता तो वहाँ से गुज़रती छोटी-बड़ी किश्तियों को बहुत ध्यान से देखा करता।
      अगले सोमवार डौमनिक टिकटें लेकर आ गया। वह इस बोट शौ पर हर साल जाया करता था। किश्तियाँ उसकी हॉबी का ख़ास हिस्सा थीं। बोट मैग़जीन वह निरंतर पढ़ा करता। वे सवेरे जल्दी ही अर्ल्ज क़ोर्ट पहुँच गए। यह बहुत बड़ा हॉल था जिसमें आई बोटो की विस्तृत जानकारी एक किताबचे के रूप में गेट पर ही मिल जाती थी। उन्होंने ये बोट एक तरफ़ से देखनी प्रारंभ कीं। इनकी कीमत कुछ हज़ार से लेकर लाखों पाउंड तक जाती थी। सारा शौ देखने में तो एक दिन ना-काफ़ी था इसलिए वे ज्यादा दिलचस्पी वाली बोट ही देख रहे थे। समुद्री किश्तियाँ, दरियाई किश्तियाँ, नहरी किश्तियाँ सब अलग अलग थीं। बोट हाउस भी थे। डौमनिक एक बोट को बहुत ध्यान से देखने लगा। वह इस बोट में चढ़कर इसका निरीक्षण करते हुए बोला-
      ''यह एकदम मॉडर्न बोट है, लेटस्ट।''
      ''पसन्द है ?''
      ''हाँ, बहुत पसन्द। मेरे परिवार के लिए आयडियल।''
      ''खरीदने का तो मन नहीं ?''
      ''खरीदने को तो खरीद लूँ, बहुत वाजिब मूल्य है। सस्ता लोन भी दे रहे हैं, इंश्योरेंस भी मुफ्त।''
      ''फिर देर कैसी, खरीद ले।''
      डौमनिक जवाब देने की बजाय उदास हो गया। बलदेव ने कहा-
      ''क्या बात है ? सब ठीक है ?''
      ''नहीं, मेरे से ज्यादा यह पौलीन की पसंदीदा बोट है, पर उसके साथ मेरी अनबन है, नहीं तो मैं ज़रूर खरीद लेता। बच्चों को छुट्टियों पर लेकर जाने के लिए यह बहुत बढ़िया रहती।''
      ''कितने बच्चे हैं तेरे ?''
      ''तीन बेटे, बड़ा पंद्रह वर्ष का है। साउथएंड ही रहते हैं सब। वहाँ मेरा घर है।''
      ''डौमनिक, तू तो बहुत जवान दिखाई देता है। कोई कह ही नहीं सकता कि इतने बड़े तेरे बच्चे हो सकते हैं।''
      ''शुक्रिया।''
      ''जवान दिखाई देने के कारण ही लिज तेरे पर मरती है।''
      ''लिज किसी पर नहीं मरती। अगर उसने मरना होता तो तेरे पर ही मर गई होती। तेरी खूब तारीफ़ें करती रहती है।''
      ''तुझे खिझाने के लिए करती होगी।''
      ''नहीं, ऐसे नहीं। वह सच ही तेरी बहुत बातें किया करती है।''
      ''मेरी कौन-सी तारीफ़ करती थी ?''
      ''तेरी जल्दबाजी की।''
      कहकर डौमनिक हँसने लगा और बलदेव भी। डौमनिक बोट में से उतरता हुआ कहने लगा-
      ''अगर पौलीन मान जाए तो यह बोट उसको तोहफ़े के तौर पर दूँ।''
      ''ज्यादा ही रूठी हुई है ?''
      ''हाँ डेव, उसने दूसरा आदमी रख लिया है। मेरे घर में ही रहता है। अब तो उससे वह गर्भवती भी है। मैं बहुत परेशान रहता हूँ उसे लेकर।''
      उसकी बात सुनकर बलदेव भी उदास हो गया। डौमनिक फिर बोला-
      ''डेव, इसमें कुछ कसूर मेरा भी है। मैं लंदन में ही रहने लगा था, लिज जैसी लड़कियाँ बहुत हैं और पौलीन को भी मौका मिल गया।''
      इसके बाद वे अधिक देर बोट-शौ में न रुक सके और वापस आ गए।
      डौमनिक 'माइल एंड' में रहता था, पूर्वी लंदन में। वहाँ उसका काम बहुत करीब था। बलदेव ट्यूब पकड़कर उसके पास पहुँच जाता। बलदेव के पास कोई ख़ास दोस्त नहीं था। इसलिए भी उसको डौमनिक के घर जाना अच्छा लगता। वह उसके मित्रों में भी विचरने लगा था। इनमें से क्लाइव और ईअन के साथ उसकी अच्छी छनने लग पड़ी थी। क्लाइव वाल-स्ट्रीट में काम करता था और ईअन पार्लियामेंट में किसी मिनिस्टर का सलाहकार था। वह भी अदृश्य हाथों के विषय में बहुत बातें करने लगता था।
      लिज़ और डौमनिक के बीच एक फ़ासला पड़ चुका था। लिज़ ने अपने साथ कैलविन नाम के लड़के को रूममेट रख लिया था। कैलविन देखने में लिज़ से बहुत छोटा लगता था। डौमनिक आता और घर में कैलविन भी होता तो वे सब एकसाथ बैठकर बियर या व्हिस्की आदि पीते। कैलविन थोड़ा दूर हटता तो वे लिज़ से पूछने लगते-
      ''लिज़, ये किसका बच्चा पालने में से उठा लाई है।''
      यदि लिज़ अकेली घर में होती तो दोनों मिलकर लिज़ को उठाए फिरते और तरह-तरह से तंग करते। लिज़ खीझती हुई कहती-
      ''मैंने तुम दोनों की दोस्ती करवाकर बहुत बड़ी गलती की है। तुम्हारा मेरे साथ बर्ताव बहुत शर्मनाक है।''
      फिर लिज़ रूठ जाती और वे उसे मनाने लगते।
      एक दिन डौमनिक का फोन आया।
      ''डेव, बुधवार को क्या कर रहा है ?''
      ''कुछ ख़ास नहीं, क्यों ?''
      ''क्लाइव एक ख़ास प्रोग्राम बनाए घूमता है, सात बजे मेरे पास पहुँच जाना।''
      बलदेव समय से डौमनिक के घर पहुँच गया। क्लाइव और ईअन पहले ही पहुँचे हुए थे। वे बियर पी रहे थे। क्लाइव ने बलदेव को बियर की बोतल देकर पूछा -
      ''डेव, क्या यह सच है कि हिंदू धर्म में सैक्स का भी देवता होता है।''
      ''कलाइव, सच्चाई यह है कि मुझे नहीं पता। शायद होता हो, मुझे धर्मों के बारे में अधिक जानकारी नहीं।''
      ''मैंने एक किताब में पढ़ा है कि यदि शिवलिंग की पूजा करो तो सैक्स करने की शक्ति बढ़ती है।''
      ''मुझे यह पता है कि शिवलिंग की पूजा होती है। इसको लेकर कई मिथ हैं। एक मिथ तो यह भी है कि कुआँरी लड़कियाँ पहला संभोग शिवलिंग से ही करती है। अर्थ यह कि उसका कुआँरापन इस देवता की सम्पत्ति है।''
      ''हाँ, यह भी पढ़ा है मैंने।''
      ''पर आज यह सवाल क्यों कर रहे हो ?''
      बलदेव ने पूछा। ईअन उठता हुआ बोला-
      ''आओ चलते हैं, बाकी बातें राह में करेंगे।''
      वे सब ईअन की मर्सिडीज़ में जा बैठे। ईअन ने कार रम्मफोर्ड रोड पर चढ़ा ली। आगे पहुँचकर नॉर्थ सरकुलर रोड पर जा चढ़ा और फिर एम इलेविन पकड़ ली। करीब दो मील आगे जाकर एक स्लिप रोड पर उतर गए और सुनसान रोड पर चलने लगे। बलदेव कहने लगा-
      ''किसी ख़ास आप्रेशन पर जा रहे लगते हो ?''
      ''देखता चल, देखते है कि तूने शिवलिंग की कितनी पूजा की है।''
      आगे नज़दीक ही एक फॉर्म हाउस आ गया। कितनी ही कारें वहाँ खड़ी थीं। एक तरफ बड़ा हॉल था। बहुत सारे लोग इधर-उधर बियर के बड़े-बड़े गैलन लिए फिरते थे। ईअन ने टिकट दिखाए और वे अन्दर चले गए। क्लाइव काउंटर पर जाकर एक गैलन बियर और चार गिलास ले आया। यहाँ बियर गिलासों में नही मिलती थी। बियर चार गिलासों से कहीं अधिक थी। उनके और भी कई परिचित आ गए। सभी आकर बलदेव से हाथ मिलाने लगे। कई उसके रंग को देखकर मुँह अजीब-सा बनाते, फिर ठीक हो जाते। बियर बार वाले हॉल में कोई कुर्सी नहीं थी, सिर्फ़ मेज ही थे। साथ ही, एक दूसरा हॉल था जिसमें कई कुर्सियाँ लगी हुई थीं और सामने दीवार के साथ स्टेज बनी हुई थी। बलदेव समझ गया कि नृत्य वगैरह का कार्यक्रम होगा।
      दस बजे तक वे सभी शराबी थे। घंटी बजी तो सब बियर के भरे गैलन लिए हॉल में चले गए। लगभग दो सौ कुर्सियाँ होंगी। सब भर गई थीं। सारा हॉल ही नशे में था। पहले एक हंसोड़ मंच पर आया और लतीफ़े सुनाने लगा। उसके लतीफ़े धीरे धीरे गन्दे होने लगे। लोग हँसते हुए दोहरे हुए जाते। हंसोड़ ने दर्शकों के साथ ऐसा सुर मिलाया कि उसका मुँह खुलते ही लोग हँस पड़ते। वह गंजे व्यक्ति के बारे में लतीफ़ा सुनाता तो दर्शकों में बैठे गंजे व्यक्ति की ओर इशारा करता। मोटे व्यक्ति के बारे में सुनाता तो कोई मोटा ढूँढ़ लेता। पाकिस्तानियों के बारे में सुनाते हुए उसने बलदेव को धर लिया। एक काला लड़का भी था जो कि बार का कर्मचारी था। ऐसे ही आयरिशों और गोरों को लेकर भी गंदे-गंदे लतीफ़े उसने सुनाए। दर्शकों में कोई औरत नहीं थी। यह पार्टी सिर्फ़ मर्दों के लिए थी।
      घंटाभर लतीफ़ेबाजी चलती रही। एक छोटी-सी ब्रेक के बाद नृत्य शुरू हो गया। स्ट्रिपटीज़ डांस की तरह ही था। वही एक-एक करके वस्त्र उतारना, काम उकसाऊ मुद्राएँ। पहले दो लड़कियाँ मंच पर आईं - एक गोरी और एक काली। वे दर्शकों की आँखों में आँखें डालकर नृत्य कर रही थीं। फिर उनमें दो और लड़कियाँ आ मिलीं। वे वस्त्र उतारकर ही मंच पर चढ़ी थीं। कुछ देर बाद वे दर्शकों को आमंत्रित करने लगीं। ईअन उछल कर मंच पर जा चढ़ा और कमीज़ उतारता हुआ उनके संग नाचने लगा। ईअन के पीछे-पीछे क्लाइव स्टेज पर चला गया। मंच पर ही काम क्रीड़ा चलने लगी। पहले अधिक उतावले हो गए। फिर जो सुस्त थे, जब वे भी भुगत चुके तो लड़कियाँ पुरुषों को खींच-खींचकर मंच पर ले जाने लगीं। डौमनिक भी शर्माता-लजाता हाज़िरी लगवाने चला गया। वह चोर आँख से बलदेव की ओर भी देख लेता। एक लड़की उतर कर बलदेव की तरफ आई और उसको बांह से पकड़कर खींचने लगी। बलदेव मना करने लगा। ईअन और क्लाइव ने लड़की की मदद की और उसको जबरन मंच पर ले गए।
(जारी…)
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रविवार, 8 अप्रैल 2012

गवाक्ष – अप्रैल 2012



जनवरी 2008 “गवाक्ष” ब्लॉग के माध्यम से हम हिन्दी ब्लॉग-प्रेमियों को विदेशों में रह रहे हिन्दी/पंजाबी के उन लेखकों/कवियों की समकालीन रचनाओं से रू-ब-रू करवाने का प्रयास करते आ रहे हैं जो अपने वतन हिन्दुस्तान से कोसों दूर रहकर अपने समय और समाज के यथार्थ को अपनी रचनाओं में रेखांकित कर रहे हैं। “गवाक्ष” में अब तक विशाल (इटली), दिव्या माथुर (लंदन), अनिल जनविजय (मास्को), देवी नागरानी(यू.एस.ए.), तेजेन्द्र शर्मा(लंदन), रचना श्रीवास्तव(लंदन), पूर्णिमा वर्मन(दुबई), इला प्रसाद(यू एस ए), भगत धवन (डेनमार्क), चाँद शुक्ला (डेनमार्क), वेद प्रकाश ‘वटुक’(यू एस ए), रेखा मैत्र (यू एस ए), तनदीप तमन्ना (कनाडा), प्राण शर्मा (यू के), सुखिन्दर (कनाडा), सुरजीत(कनाडा), डॉ सुधा धींगरा(अमेरिका), मिन्नी ग्रेवाल(कनाडा), बलविंदर चहल (न्यूजीलैंड), बलबीर कौर संघेड़ा(कनाडा), शैल अग्रवाल (इंग्लैंड), श्रद्धा जैन (सिंगापुर), डा. सुखपाल(कनाडा), प्रेम मान(यू.एस.ए.), (स्व.) इकबाल अर्पण, सुश्री मीना चोपड़ा (कनाडा), डा. हरदीप कौर संधु(आस्ट्रेलिया), डा. भावना कुँअर(आस्ट्रेलिया), अनुपमा पाठक (स्वीडन), शिवचरण जग्गी कुस्सा(लंदन), जसबीर माहल(कनाडा), मंजु मिश्रा (अमेरिका), सुखिंदर (कनाडा), देविंदर कौर (यू के), नीरू असीम(कैनेडा) और इला प्रसाद आदि की रचनाएं और पंजाबी कथाकार-उपन्यासकार हरजीत अटवाल के उपन्यास “सवारी” के हिंदी अनुवाद की पैंतालीसवीं किस्त आपने पढ़ीं। “गवाक्ष” के अप्रैल 2012 अंक में प्रस्तुत हैं – वाने, अमेरिका में रह रहीं हिंदी एक प्रमुख कवयित्री डा. अनिल प्रभा कुमार की तीन कविताएँ तथा हरजीत अटवाल के धारावाहिक पंजाबी उपन्यास “सवारी” की इक्यावनवीं किस्त का हिंदी अनुवाद…



वाने, अमेरिका से
डा. अनिल प्रभा कुमार की तीन कविताएं

१. भूत
दादी कहती थी
कुंआरी लड़कियां
बालों मे फूल नहीं लगातीं
संवर कर शाम को
पेड़ों के पास से नहीं गुज़रतीं
चुस्त, बदन उघाड़े
कपड़े नहीं पहनतीं।
क्यों,
मैने प्रतिवाद किया था।
भूत पीछे पड़ जाते हैं,
उसका बस यही जवाब था।
मुझसे सड़ी- गली बातें
मत करो
मैने पांव पटक कर कहा था।

अब अख़बारों में
उन्हीं भूतों की
ख़बरें भरी हैं
जिनका उघड़े या
घूंघट में ढके
तन से कोई मतलब नहीं
जिनके शिकार का नाम
बस औरत होना चाहिए।
वह शहर की हो या गांव की,
विदुषी या अनपढ़,
बच्ची या बूढ़ी,
किसी भी जाति या देश की
हो युद्ध या शान्ति,
घर या बाहर,
बस हो औरत।

अब तो हर जगह,
भूत ही भूत हैं।
शायद हमें ही ओझा बनना होगा
महाकाली बन
स्वयं ही
महिषासुर को
बधना होगा
क्योंकि रक्षा को
अब
कोई शिव नहीं आएंगे।


२. तुच्छता
कितना आसान था
मुझे छोटा करना
बस मेरे पास खड़े
आदमी का
क़द बढ़ा दिया।


३. अष्टभुजा
वह अष्टभुजा है
एक से संभालती है
दफ़्तर की कमान
दूसरे से गॄहस्थी की
रासें थामती है
पति के कंधे से कंधा मिला
अर्थ- भार बांटती है वह
बच्चों की बांह थाम
उन्हें ज़िन्दगी में
चढ़ना, सम्भलना
सिखाती है वह
गिरने पर सहारा दे
उठाती है वह
रिश्तों की ज़िम्मेदारियां
उसके पल्ले हैं
समाज के भी कुछ
फ़र्ज़ हैं उसके
सब कुछ देती- बांटती
वह अष्टभुजा बन गई है
उसका सारा अस्तित्व अब
बस भुजा ही भुजा है
इन भुजाओं के चक्र में
खो गए
अपने शेष भाग को
अब ढूंढ्ती है वह।
००


डॉ अनिल प्रभा कुमार
जन्म: दिल्ली में।
शिक्षा: "हिन्दी के सामाजिक नाटकों में युगबोध" विषय पर शोध।
लेखन: 'ज्ञानोदय' के 'नई कलम विशेषांक में 'खाली दायरे' कहानी पर प्रथम पुरस्कार
कुछ रचनाएँ 'धर्मयुग' 'आवेश', 'ज्ञानोदय' और 'संचेतना' में भी छ्पीं।
न्यूयॉर्क के स्थानीय दूरदर्शन पर कहानियों का प्रसारण। पिछले कुछ वर्षों से कहानियां और कविताएं लिखने में रत। कुछ कहानियां वर्त्तमान - साहित्य के प्रवासी महाविशेषांक में भी छपी है।
हंस, अन्यथा, कथादेश, हिन्दी चेतना, गर्भनाल, लमही,शोध-दिशा और वर्त्तमान– साहित्य पत्रिकाओं के अलावा, “अभिव्यक्ति”के कथा महोत्सव-२००८ में “फिर से “ कहानी पुरस्कृत हुई।
“बहता पानी” कहानी संग्रह भावना प्रकाशन से प्रकाशित।
नया कविता- संग्रह प्रकाशन के लिए लगभग तैयार।
संप्रति: विलियम पैट्रसन यूनिवर्सिटी, न्यू जर्सी में हिन्दी भाषा और साहित्य का प्राध्यापन और लेखन।
संपर्क: aksk414@hotmail.com
119 Osage Road, Wayne NJ 07470.USA

धारावाहिक पंजाबी उपन्यास(किस्त- 46)




सवारी

हरजीत अटवाल
हिंदी अनुवाद : सुभाष नीरव

॥ इक्यावन ॥
ईस्टर तक तो काम बहुत कम हो गया था। दिन में दो तीन ही डिलीवरी के आर्डर आते। वह मजे से यार्ड की तरफ जाता। ऑनसरिंग मशीन देखता कि किस किस के मैसेज हैं। वहाँ बैठ कर वह कुछ देर अख़बार पढ़ता। फिर कुछ सिलेंडर पिकअप पर रखता और फोन को घरवाले फोन पर डायवर्ट करके आ जाता। ईस्टर से पहले एक बड़ा लोड सिलेंडरों का मंगवा लिया था। वह सोचता कि यदि कारोबार ऐसे ही रहा तो यह स्टॉक सारी गर्मियाँ खत्म नहीं होने वाला। उसे इतनी तसल्ली थी कि इस सीज़न में सालभर की तनख्वाह बन गई। अब उसने सोशल सिक्युरिटी लेने बन्द कर दी। कोई मुसीबत खड़ी कर सकता था, मुफ्त में यूँ ही पैसे क्लेम करने। अब उसको नौकरी की ज़रूरत नहीं थी। यह बिजनेस उसके लिए ठीक था। इस सीज़न में उसको काफ़ी अनुभव हो गया था। आगे पूरे गरमी के दिन खाली पड़े थे। अगले सीज़न के लिए पूरी तरह तैयार हो सकता था।
एलीसन से उसका अब वास्ता नहीं रहा था, पर उसको अपना फोन नंबर दे आया था कि यदि ज़रूरत पड़े तो फोन कर ले। शौन अब न्यूजीलैंड से आस्ट्रेलिया आ गया था। उसका फोन आता रहता था। शौन की बातों से लगता था कि वह बहुत खुश नहीं था, पर वापस भी नहीं आ सकता था। जैरी स्टोन उसको मिलता रहता था। जैरी खुश था कि बलदेव ने अपना काम ठीकठाक चला लिया था। वह कहता-
''अगर तेरा यार्ड किसी सरल पहुँच वाली जगह पर हो तो तेरा बिजनेस और भी ठीक चले।''
लिज़ अपने कमरे में कम ही आती। वह घर कम ही आती। यदि आती तो डौमनिक उसके संग होता। उसका डौमनिक के साथ ही बहुत समय गुज़रता था। रात में डौमनिक उसके साथ आ जाता या लिज़ उसके फ्लैट में चली जाती। यदि कभी लिज़ अकेली होती और उसका मूड होता तो वह बलदेव के साथ आ लेटती। बलदेव कभी न रोकता। लिज़ अब किसी स्टोर में काम करने लगी थी। स्टोर से उसका कालेज करीब पड़ता था। बलदेव को किराया समय से दे जाती। उसको कभी भी मांगना नहीं पड़ता था। बलदेव को लिज़ अपने काम की शिफ्टों के बारे में जानकारी देने लगती, पर बलदेव ने कभी इस तरफ ध्यान नहीं दिया था मानो उसमें अब उसकी कोई दिलचस्पी नहीं रही थी।
एक शाम डौमनिक ने घंटी बजाई। लिज़ घर में नहीं थी। बलदेव ने दरवाज़ा खोला। डौमनिक 'हैलो' कहता हुआ अन्दर आ गया। लिज़ को न देखकर बोला-
''अभी लौटी नहीं ?... मैं फिर कभी आऊँगा, अब चलता हूँ।''
''अगर उसका इंतज़ार करना है तो यहाँ बैठकर कर ले, मुझे कोई एतराज़ नहीं।''
''शुक्रिया ! मुझे उम्मीद थी कि आज उसकी पहली शिफ्ट होगी।''
''कहीं फंस गई होगी, कोई बातों वाला मिल गया होगा। क्या पिएगा ?''
डौमनिक कुर्सी पर बैठ चुका था, बोला-
''कुछ भी चलेगा, पर ठंडा ही।''
''बियर पियेगा ?''
''नहीं, कोक वगैरह।''
बलदेव दो गिलासों में कोक डाल लाया। डौमनिक ने चीअर्स कहते हुए अपना गिलास उठा लिया। बलदेव पूछने लगा-
''लिज़ बता रही थी कि तू शेयर एक्सचेंज में काम करता है, ठीक है ?''
''हाँ डेव, दस साल हो गए।''
''फिर तो मिलियन्ज़ में खेलता होगा।''
''पर मेरे हिस्से तो कुछ सौ ही आते हैं।''
कहकर डौमनिक हँसा और पूछने लगा-
''तू भी शेयरों के साथ डील करता है ?''
''मुझे इस बिजनेस की कतई समझ नहीं है, मेरा दोस्त है शौन, उसको खूब अच्छी जानकारी है इस बारे में। उसके कहने पर एक बार मैंने खरीदे थे और पैसे बच गए थे। मैंने तो वे पैसे बचा लिए पर शौन ने दुबारा दूसरे शेयर खरीद लिए थे और वे सारे गंवा बैठा। जो शेयर उसने खरीदे, उनके भाव गिर गए थे।''
''इस बिजनेस में यह डर तो बना ही रहता है। बहुत केयरफुल होने की ज़रूरत होती है। इसमें जल्दबाजी नहीं करनी चाहिए। वैसे आजकल कीमतें गिरी हुई हैं। शेयर खरीदने का बढ़िया मौका है।''
''हो सकता है, पर मेरे पास इतने पैसे नहीं है।''
''कीमतें तो संपत्तियों की भी बढ़ रही हैं। लोग कर्ज़ा उठाकर भी खरीद लेते हैं, अगर ठीक चीज़ ठीक भाव में मिल जाए।''
''डौमनिक, तेरी तो यह लाइन है। तुझे नहीं लगता कि इकनोमी में यह बूम नकली है या अस्थायी है।''
''यह तू कैसे कह सकता है ?''
''क्योंकि जायदाद की कीमत निर्धारित करने के लिए दो प्रमुख तत्व काम करते हैं। एक तो घर को बनाने की कीमत और दूसरा जगह की कीमत। इस मुल्क में न जगह की कीमत बढ़ी है और न ही घर बनाने की। फिर यह घरों की कीमतें कैसे बढ़ गईं !''
''डेव, मैं तेरी बात से सहमत नहीं। पर तूने बात बहुत पते की की है। यह जो बूम है, पूरी दुनिया में है, अकेले ब्रितानिया में ही नहीं।''
''यह थेचर-रेगन जोड़ी आर्थिकता को नकली टीके लगा लगा कर मज़बूत दिखाए जा रही है। मैं तो डरता हूँ कि कहीं कीमतें गिर न पड़ें।''
''वैसे शेयर बाज़ार में भी बड़े क्रैश का डर पल रहा है। ऐसे क्रैश में से कई लोग कमा जाते हैं जैसे तीसरे दशक में कैनेडी परिवार ने कमाया था। जिसके पल्ले पैसे हों, गिरती कीमतों पर शेयर खरीद ले।''
''वही चांस की बातें हैं, जुआ है।''
''हाँ, ऐसा जुआ जिसको ध्यान से खेलकर यकीनी बनाया जा सकता है।''
''अगर जायदादों की कीमतें गिर पड़ीं तो इस सरकार के लिए बुरा होगा।''
''डेव, अगर रिसैशन आया तो पूरी दुनिया में आएगा, शायद न भी आए।''
''इकोनोमिस्ट तो बहुत भविष्यवाणियाँ कर रहे हैं''
''हाँ, इनफ्लेशन जो नहीं बढ़ी जो कि अच्छी बात है, पर बूम के लिए बुरी भी। तनख्वाहें बढ़ी नहीं, जायदादों की कीमतें बढ़ गईं।''
''डौमनिक, यदि इसके बारे में गहराई से सोचें तो साफ़ दिखने लग पड़ता है कि यह सब नकली है।''
''डेव, तू गैस के बिजनेस में है। इसके शेयर भी ठीक होते हैं। पैट्रोल से वास्ता जो है इसका... अगर मन बने तो खरीद लेना।''
''देखूँगा किसी पड़ाव पर जाकर यदि मन बना तो। अभी तो मैं इस बिजनेस में बिल्कुल नया हँ, पहला ही सीज़न है।''
डौमनिक घड़ी देखते हुए बोला-
''मुझे तो बैठे बहुत टाइम हो गया। लिज़ अभी भी नहीं आई। अब मुझे चलना चाहिए।''
''डौमनिक, तू तो बहुत बढ़िया आदमी है, मुझे तो आज पता चला। तेरे साथ बातें करने में मजा आ रहा है।''
डौमनिक ने डिब्बा खोला और ठीक से होकर बैठते हुए बोला-
''लेबर पार्टी को सपोर्ट करते हो ?''
''नही, मैं किसी पार्टी को सपोर्ट नहीं करता। मैं वोट ही नहीं डालता।''
''क्यों ?''
''मुझे ये लीडर लीडर कम और एक्टर ज्यादा लगते हैं।''
''यह भी ठीक है पर हर पार्टी की कुछ पालिसियाँ होती हैं, जिनसे आपको सहमत-असहमत होना होता है।''
''डौमनिक, मैंने गौर से देखा है कि पालिसियों का बहुत थोड़ा फ़र्क हुआ करता है। अब मुझे तो लेबर पार्टी अच्छी लगती है पर ये टोरी का मुकाबला करने लायक नहीं।''
''इसीलिए डेव, मैं एस.डी.एल.पी. का सपोर्टर हूँ।''
''किसी के भी सपोर्टर हो जाओ, आख़िर देशों को चलाते तो कुछ अदृश्य हाथ ही हैं।''
''तेरा भी यह यकीन है।''
''बिल्कुल। ये अदृश्य हाथ हर देश में होते हैं। यहाँ भी और अमेरिका में भी हैं। अब अमेरिका के प्रेजीडेंट के लिए अलिखित शर्तें हैं कि वह अमीर हो, गोरा हो, आयरिश पिछड़ी जाति का हो, ज्युओ का हमदर्द हो वगैरह...।''
''डेव, हम किसी पब में चलें, फिर जी भरकर बातें करेंगे। मुझे लगता है कि लिज़ के बहाने मेरी पहचान एक अच्छे दोस्त से हो गई है।''
बलदेव मुस्कराया और कहने लगा-
''लिज़ को इन बातों से एलर्जी है।''
''उसका क्षेत्र दूसरा है। वह ज़िन्दगी को हल्के-फुल्के अंदाज में लेती है।''
''डौमनिक, तेरी लिज़ से दोस्ती कैसे हुई, उसको तो तेरी कोई भी बात पसन्द नहीं आती होगी। वह तुझे भी बोर करती होगी।''
''डेव, बड़ी दूर की सोच रहे हो। मेरी उसके साथ दोस्ती का एक आधार तो यह है कि वह औरत है, खूबसूरत है। दूसरा यह कि मुझे लगता है कि उसके माध्यम से कुछ शेयर बेच सकूँगा। मेरी कारोबारी नज़र मुझे कई सन्देश दे रही है, तभी...।''
उनके बात करते करते ही लिज़ भी आ गई। उन्हें एक साथ बैठे देखकर बोली-
''सॉरी ब्यॉयज़, आई एम लेट।''
बलदेव डौमनिक से बोला-
''अगर तुम चाहो तो यहाँ मेरे साथ बैठकर भी शाम गुज़ार सकते हो। पीज़ा मंगवा लेंगे, मेरे पास हर तरह की ड्रिंक है ही।''
(जारी…)

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गुरुवार, 8 मार्च 2012

गवाक्ष – मार्च 2012




जनवरी 2008 “गवाक्ष” ब्लॉग के माध्यम से हम हिन्दी ब्लॉग-प्रेमियों को विदेशों में रह रहे हिन्दी/पंजाबी के उन लेखकों/कवियों की समकालीन रचनाओं से रू-ब-रू करवाने का प्रयास करते आ रहे हैं जो अपने वतन हिन्दुस्तान से कोसों दूर रहकर अपने समय और समाज के यथार्थ को अपनी रचनाओं में रेखांकित कर रहे हैं। “गवाक्ष” में अब तक विशाल (इटली), दिव्या माथुर (लंदन), अनिल जनविजय (मास्को), देवी नागरानी(यू.एस.ए.), तेजेन्द्र शर्मा(लंदन), रचना श्रीवास्तव(लंदन), पूर्णिमा वर्मन(दुबई), इला प्रसाद(यू एस ए), भगत धवन (डेनमार्क), चाँद शुक्ला (डेनमार्क), वेद प्रकाश ‘वटुक’(यू एस ए), रेखा मैत्र (यू एस ए), तनदीप तमन्ना (कनाडा), प्राण शर्मा (यू के), सुखिन्दर (कनाडा), सुरजीत(कनाडा), डॉ सुधा धींगरा(अमेरिका), मिन्नी ग्रेवाल(कनाडा), बलविंदर चहल (न्यूजीलैंड), बलबीर कौर संघेड़ा(कनाडा), शैल अग्रवाल (इंग्लैंड), श्रद्धा जैन (सिंगापुर), डा. सुखपाल(कनाडा), प्रेम मान(यू.एस.ए.), (स्व.) इकबाल अर्पण, सुश्री मीना चोपड़ा (कनाडा), डा. हरदीप कौर संधु(आस्ट्रेलिया), डा. भावना कुँअर(आस्ट्रेलिया), अनुपमा पाठक (स्वीडन), शिवचरण जग्गी कुस्सा(लंदन), जसबीर माहल(कनाडा), मंजु मिश्रा (अमेरिका), सुखिंदर (कनाडा), देविंदर कौर (यू के) और नीरू असीम(कैनेडा) आदि की रचनाएं और पंजाबी कथाकार-उपन्यासकार हरजीत अटवाल के उपन्यास “सवारी” के हिंदी अनुवाद की चौवालीसवीं किस्त आपने पढ़ीं। “गवाक्ष” के मार्च 12 अंक में प्रस्तुत हैं समकालीन हिंदी कविता की एक प्रमुख कवयित्री इला प्रसाद की कुछ कविताएँ तथा हरजीत अटवाल के धारावाहिक पंजाबी उपन्यास “सवारी” की पचासवीं किस्त का हिंदी अनुवाद…




ह्युस्टन, अमेरिका से
इला प्रसाद की तीन कविताएं


कविता


आज फिर मैंने तुम्हारा नाम लिया
आज फिर मैंने किसी से तुम्हारी बात की

आज फिर मैंने किसी को प्यार से सहलाया
किसी को अपनी उजली हँसी से नहलाया
कोई मेरे क़रीब आया
मैं किसी के पास थी

यह कैसा वक्फ़ा था
जो मेरे और कविता के बीच में आया
तुम्हारा मेरे क़रीब होना
एक कविता-सी ही तो बात थी…।

एक दोस्त के लिए



स्नेह यदि सम्बोधित होता है स्पर्शों से
स्पर्शों की यदि कोई भाषा होती है
तो शब्दों को अनुपस्थित ही रहने दो

अनुभूतियों की कोई ज़मीन होगी
एहसासों का कोई मकान होगा
इन अनकहे अनुभवों को
उसी ज़मीन पर, उसी मकान में बसने दो

स्मृतियों की एक किताब होगी
जो तुम्हारे भी पास होगी
इन कोमल नेह पंखुड़ियों को
उसी किताब में झरने दो
ताकि बोझिल पलों में
जब भी किताब खुले
स्नेह का सुवास
तुम्हारे आसपास घुले !

अस्वीकृति

मैं तलहट-सी निकालकर
फेंक दी गई हूँ
किनारों पर

लहरों को मेरा
साथ बहना
रास नहीं आया

मैं न शंख थी
न सीपी
कि चुन ली गई होती
किन्हीं उत्सुक निगाहों से

रेत थी
रेत–सी रौंदी गई
काल के क्रूर हाथों से।
00



समकालीन हिंदी साहित्य की एक प्रमुख कवयित्री-कथाकार।
एक कविता संग्रह ‘धूप का टुकड़ा’, दो कहानी संग्रह ‘इस कहानी का अंत नहीं’ और ‘उस स्त्री का नाम’ प्रकाशित। अनेक पत्र-पत्रिकाओं और वेब पत्रिकाओं/ब्लॉग्स पर कहानियाँ, कवियाएं प्रकाशित।
सम्पर्क : 12934, Meadow Run, Houston, TX 77066, U.S.A.
ई मेल : Ila_prasad1@yahoo.com

धारावाहिक पंजाबी उपन्यास(किस्त- 45)





सवारी

हरजीत अटवाल
हिंदी अनुवाद : सुभाष नीरव

॥ पचास ॥
कुछ दिनों पश्चात सतनाम के दुकान खोलने के समय शिन्दा बाहर खड़ा था। उसको देखकर सतनाम खुश हो गया। शिन्दे के हाथ और जुबान काँप रहे थे। वह सतनाम को देखते ही कहने लगा-
''मार दिया यार, तेरे भाई के बोलों ने। ये मुझे जीने नहीं देगा। साला शरीर का कष्ट झेला जाता है, पर रूह के ज़ख्मों की ताब नहीं झेली जाती।''
सतनाम ने दुकान खोली। अन्दर पड़ी रात की बोतल में से बची हुई व्हिस्की का एक पैग शिन्दे को बनाकर दिया। वह खुश हो गया और काम करने की तैयारी करने लगा। सतनाम ने कहा-
''शिन्दे, यह तो तुझे लग गई भई।''
''हाँ यार, पर मैं धीरे-धीरे छोड़ दूँगा। ज़रा मन चहके तो, कोई खुशी भी मिले कहीं।''
''तू मेरे पास ही रह, खुशी ही खुशी है। यहाँ तुझे कोई फालतू लफ्ज़ नहीं बोलने वाला।''
''वो लाख रुपये का रौब डाले जाता है।''
''यह भी हो जाएगा, मैं तेरा सौ पोंड उसको दे आया करूँगा, तू ज्यादा चिंता न कर।''
कुछ देर बाद अजमेर का फोन आ गया। दुकान खोलने तक शिन्दे की कमी नहीं खटकी थी। उसने उसके कमरे में देखा, शिन्दा वहाँ नहीं था, नीचे दुकान में भी नहीं। वह समझ गया था कि सतनाम की तरफ चला गया होगा। उसने सतनाम को उस वक्त शिन्दे को समझाने के लिए कहा था, जब पानी सिर से ऊपर गुज़र चुका था। उसे यह भी डर था कि सतनाम शिन्दे को समझाने की बजाय उखाड़ने का यत्न करेगा। वही हुआ। शिन्दा उसके पास चला गया। अजमेर मन ही मन कुढ़ने लगा था और सारा दिन कुढ़ता रहा था।
दोपहर को सतनाम की वैन दुकान के सामने आकर खड़ी हुई। उसे देखते ही अजमेर का चेहरा तन गया। समीप खड़ी गुरिंदर ने उसका कंधा दबाया। सतनाम भी उसका रुख समझ गया और अन्दर घुसते हुए बोला-
''भाई, मुझे तो उसकी बिलकुल ज़रूरत नहीं। भला, शराबी बन्दा क्या काम कर लेगा। और फिर अब तो मेरा काम चल ही रहा है। मैं तो कहने आया हूँ कि उसको यहीं अपने पास ही रखो।''
अजमेर कुछ न बोला। गुरिंदर कहने लगी-
''अच्छी बात तो यह होगी कि उसको वापस भेज दो, अपने परिवार में जाए। यहाँ इंग्लैंड में रहा तो कोई उलाहने वाली बात ही न हो जाए।''
''वापस भेज दें तो मेरा दिया एडवांस कैसे पूरा होगा। और फिर लोग क्या कहेंगे !'' अजमेर ने कहा।
उसके चेहरे का तनाव अब तक कुछ कम हो चुका था। सतनाम ने पूछा-
''अब दुबारा कोई खास बात हो गई थी ?''
''पता नहीं अब कौन भड़काता है। कहता, मुझे खालिस्तानी बनाकर यहाँ पक्का कराओ।''
''यह नई बात कहाँ से निकाल लाया, उसे पता नहीं हमारे परिवार का, ताये का।''
''पता तो उसको सब है। कहता है, सारी दुनिया यहाँ पक्की हो रही है तो मैं क्यों नहीं। मैंने समझाया कि तेरी लीगल सिच्युएशन और है, तुझे तीसरा साल है इललीगल रहते हुए, तू अब ऐसे ही समय निकाल, जो निकलता है।''
''फिर क्या बोला ?''
''बोला, तुमने मेरा जानबूझ कर टाइम निकलवा दिया। मैंने कहा कि हम क्या तेरे दुश्मन हैं, इसी बात पर मुझे गुस्सा आ गया।''
''ये बातें इसके दिमाग में कौन डालता होगा ?''
''ये मुल्ला मुनीर और वो बामण। पर यह भी कौन-सा बच्चा है, दुनिया भर की ख़बर रखता है। मुझे लगता है कि यह काली को भी पैसे खिलाता है। तभी वो इसका पीछा करती यहाँ तक पहुँच गई। तू भी इसका ध्यान रखना।'' अजमेर ने कहा।
सतनाम जुआइस के नाम पर चुप रहा। वह जानता था कि जुआइस ऐसी नहीं थी।
सतनाम वापस अपनी दुकान में आया तो शिन्दे ने कहा-
''कर आया भाई से मीटिंग ?''
''हाँ, पर तू क्यों घबरा रहा है ?''
''क्या फैसला किया मेरी किस्मत का ?... मैं तो कहता हूँ, मुझे वापस भेज दो।''
''जैसी तेरी मर्जी। पर मैं तो कहूँगा कि जब तक समय लगता है, लगा ले, पर एक काम यह कर कि शराब कम कर दे। इस तरह तेरे से काम नहीं होगा।''
''जो भी हो, मैं भाजी के पास नहीं रहना चाहता।''
''तू मेरे पास रहता रह।''
''मुझे पता है, मनजीत भाभी का स्वभाव अकेले रहने का है। मुझे बलदेव के पास भेज दो। उसका पानी भी देख लें।''
''बलदेव भी दिलीप कुमार की तरह कहीं-कहीं ही दिखाई देता है... तू मेरे पास रह। मनजीत की चिंता छोड़ दे। तू उसकी हाँ में हाँ मिलाये चलना और दूसरा यह कि बैड की जगह टायलेट यूज़ करना।''
''तू भी यार कमाल करता है...।''
कहते हुए शिन्दा शरमिन्दा-सा होने लगा।
सतनाम सोच रहा था कि यदि शिन्दा शराब कम कर दे तो पहले की तरह एक बार फिर वह फुर्सत-सी पा सकता था। उसने शिन्दे को खुश रखना शुरू कर दिया। माइको सिगरेटें पीता था, शिन्दा उसके साथ खड़े होकर कभी-कभी कश लगाने लग पड़ता। उसने व्हिस्की कम कर दी। शाम के वक्त ही पीता। अब उससे ज्यादा पी भी नहीं जाती थी। वह शीघ्र ही नशे में हो जाता। सतनाम सोचता कि ज़रूर दोपहर को जुआइस के यहाँ से पी आता होगा। जुआइस उसको लगभग हर रोज़ ही घर ले जाया करती।
शिन्दे की सेहत पहले की अपेक्षा अच्छी होने लगी थी। आँखों के नीचे की थैलियाँ ठीक हो रही थीं। सतनाम सोचने लगा कि अजमेर ने शिन्दे को बर्बाद करके छोड़ दिया था। जानवर से भी प्यार से काम लिया जाता है, शिन्दा को अच्छा-भला आदमी था। उसकी देखभाल ज़रूरी थी। उसको शिन्दे का जुआइस के घर जाना अच्छा नहीं लगता था, पर रोकता कभी नहीं, बल्कि मजाक करते हुए कहता-
''हर औरत एक जैसी होती है। मेरा वास्ता मीना कुमारी से लेकर श्रीदेवी के साथ पड़ा है।''
कई बार इस बात को उलटकर भी कह देता-
''हर औरत अपनी जगह है, हरेक की अपनी एक्टिंग, अपनी अदा।''
सतनाम के लिए पहले वाले दिन लौटने लगे थे। शिन्दे ने पुन: सारा काम संभाल लिया था। अब तो वह सारी डिलीवरी अकेला ही कर देता। सतनाम तो कई बार कमर पर हाथ रखे ही खड़ा रहता। स्मिथफील्ड मीट मार्केट जाने के लिए शिन्दा तड़के ही उठ खड़ा होता और सारा काम दौड़ दौड़कर करता। सतनाम उसका सौ पौंड हर सप्ताह जाकर अजमेर को दे आता।
हाईबरी में अब गुरिंदर ही ज्यादा समय दुकान पर खड़ी होती। शैरन और हरविंदर स्कूल से लौटते तो उसकी कुछ मदद कर देते। पाँच बजे टोनी आ जाता। टोनी को भी ये गल्ले पर न छोड़ते। शाम को अजमेर होता। पहले वाली मौज अब फिर गायब हो गई थी। अजमेर सुबह समय से शॉपिंग करने निकल जाता और दुकान खोलने तक बमुश्किल लौटता। फिर अकेला ही सारा सामान वैन में से उतारता। उसके लिए यह काम बहुत हो जाता।
उस दिन सतनाम हाईबरी गया तो गुरिंदर बोली-
''मैं तुझे फोन करने वाली थी।''
''जट्टिये, मुझसे क्या काम पड़ गया ?''
''कहते हैं न कि जिस जेब में दाने हों, उस से ही हैलो की जाती है।''
''मेरी जेब में दाने कहाँ हैं ?''
''तू चालू चीज़ है। सभी भाइयों की चालाकी तेरे अकेले में है।''
''ये प्रेम चोपड़ा ?''
''वो तो यूँ ही बदनाम है। जैसे कहते है न, घुग्गी शैतान और कौआ बदनाम।''
''जट्टिये, बाज़ को घुग्गी न कह। चल तू काम की बात कर।''
''तू ना नहीं करेगा।''
''पहले कभी की है ?''
''हमें दो दिन सुबह के लिए शिन्दा चाहिए। टयूज-डे और थर्स-डे मॉर्निंग। तेरे भाजी से अब वैन लोड-अनलोड नहीं होती, पसीना आए जाता है।''
''सवेरे जब भाई ने जाना हो तो उधर से उसको पिक कर लिया करे।''
''उससे भी पूछ लेना, वो आएगा भी कि नहीं।''
''आएगा क्यों नहीं...।''
दुकान में से निकलता सतनाम बड़बड़ा रहा था, ''प्रेम चोपड़ा तो बाहर रहकर गोल कर गया !''
सतनाम का अधिक कुछ नहीं बिगड़ा था। शिन्दा सिर्फ़ दो दिन ही उधर जाता था, वह भी ग्यारह बजे तक लौट आता। सतनाम ने अपनी शॉपिंग के दिन बदल लिए थे। परन्तु उसको एक खीझ-सी चढ़ी रहती थी। वह सोचता कि दो दिन की तनख्वाह भी अजमेर ही दे, पर वह मुँह से कुछ नहीं कहता था।
जिस दिन शिन्दा अजमेर के यहाँ से आता तो बहुत खुश होता। वह बताने लगता-
''आज तो जट्टी ने हमारे पहुँचने से पहले ही आलू के परांठे बनाए हुए थे और साथ ही मैंगो लस्सी। बोली- खा लो पहले, फिर वैन में से सामान उतारना। भाजी उलटकर गुस्से में बोला- अगर वार्डन टिकट काट गया तो ?''
एक दिन शिन्दा बोला-
''भाजी तो मेरा कुछ ज्यादा ही फिक्र किए जाता है। कहता है, हाथ न कटवा लेना।''
सतनाम पहले ही ईर्ष्या में भरा पड़ा था, बोला-
''तब उसका फिक्र कहाँ गया था जब सारी-सारी रात तुझ पर शराब उंडेलता था।''
सुनकर शिन्दा झेंप गया और आगे कुछ न बोला। रात को रोटी खाता सतनाम मनजीत से बोला-
''बात सुन मेरी स्मिता पाटिल, ये तेरा देवर निरा ही असरानी बना घूमता है। इसे प्रेम चोपड़ा संजीव कुमार दिखाई देता है।''
आहिस्ता-आहिस्ता सभी को यह रूटीन मंज़ूर हो गया। शिन्दा इतवार को भी अजमेर के साथ काम करवाने जाता। सवेरे उठकर सतनाम की दुकान में आ जाता। हौर्नज़ी रोड की इस परेड में शिन्दे को सभी जानने लग पड़े थे। वह खाली होता तो यूँ ही किसी दूसरी दुकान में जा खड़ा होता। सब जानते थे कि वह सतनाम का भाई है। अब्दुला की दुकान पर बोतल लेने भी वही जाता। कभी कांती पटेल की दुकान से भी ले आता। अब्दुला उसको रोक लेता और कहता-
''सरदार जी, अपनी दुकान छोड़कर दूसरी पर क्यों जासों।''
''खान साहिब, मैं तो बैलेंस रखने की कोशिश कर रहा हूँ। पचास बोतलें तुमसे और एक वहाँ से। और फिर वह मीट भी हमसे ही लेता है।''
''मैंने तो पहले ही सतनाम से कहा था कि हलाल रखा करो।''
''जिन्होंने हलाल रखा हुआ है, उनका भी मुझे पता है।''
''देखो जी, हमें हलाल का कहकर देंगे तो सारी जिम्मेदारी उनकी ही होसी।''
''ऐसे तो हम भी हलाल का फट्टा लगा लेते हैं।''
कहकर शिन्दा चलने लगता तो अब्दुला उसके बैग में बियर का डिब्बा डाल देता, पर शिन्दा कांती पटेल की दुकान में जा घुसता।
एक दिन पैट्रो सतनाम को बताने लगा-
''सैम, मुझे लगता है, शैनी टिल में से हर रोज़ पाँच का नोट लेता है। पहले तो मैं सोचता था कि यह मेरा शक है। पर फिर मैंने ध्यान से चैक किया। पाँच पौंड लेकर फिर बाहर से शराब पी आता है।''
''तभी जल्दी शराबी हो जाता है।... चलो, कोई बात नहीं, पाँच पौंड ही हैं।''
''सैम, तू मालिक है, जो मर्जी कह। मैंने तो सोचा था कि अपने पैसे कम होते देख तू किसी और को न पकड़ता फिरे।''
कहकर पैट्रो ने कंधे हिलाये और दुबारा काम करने लग पड़ा। सतनाम बाहर से तो मुस्करा रहा था, पर अन्दर से वह जल-भुन गया। पाँच पौंड की बात नहीं थी, बात तो चोरी करने की थी। कहीं सच में ही जुआइस को पैसे न खिलाता हो। फिर वह उस बात की ओर से अपना ध्यान हटाते हुए अपने को दिलासा देने लग पड़ा।
अगले दिन शिन्दा अजमेर के साथ शॉपिंग करवाकर नहीं लौटा। वैसे वह ग्यारह बजे तक लौट आता था। पर बारह बज चुके थे। फिर एक बज गया। सतनाम याद करने लगा कि रात में कोई बात तो नहीं हुई थी उसकी। याद करने पर वह सबकुछ समझ गया। उसने नशे में शिन्दे को कहा था-
''बड़े ज्वैल थीफ़ ! अगर पाँच से गुज़ारा नहीं होता, तो पाँच और ले लिया कर।''
(जारी…)
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लेखक संपर्क :

67, हिल साइड रोड,
साउथाल, मिडिलसेक्स, इंग्लैंड

दूरभाष : 020-85780393,07782-265726(मोबाइल)

सोमवार, 6 फ़रवरी 2012

गवाक्ष – फरवरी 2012


जनवरी 2008 “गवाक्ष” ब्लॉग के माध्यम से हम हिन्दी ब्लॉग-प्रेमियों को विदेशों में रह रहे हिन्दी/पंजाबी के उन लेखकों/कवियों की समकालीन रचनाओं से रू-ब-रू करवाने का प्रयास करते आ रहे हैं जो अपने वतन हिन्दुस्तान से कोसों दूर रहकर अपने समय और समाज के यथार्थ को अपनी रचनाओं में रेखांकित कर रहे हैं। “गवाक्ष” में अब तक विशाल (इटली), दिव्या माथुर (लंदन), अनिल जनविजय (मास्को), देवी नागरानी(यू.एस.ए.), तेजेन्द्र शर्मा(लंदन), रचना श्रीवास्तव(लंदन), पूर्णिमा वर्मन(दुबई), इला प्रसाद(यू एस ए), भगत धवन (डेनमार्क), चाँद शुक्ला (डेनमार्क), वेद प्रकाश ‘वटुक’(यू एस ए), रेखा मैत्र (यू एस ए), तनदीप तमन्ना (कनाडा), प्राण शर्मा (यू के), सुखिन्दर (कनाडा), सुरजीत(कनाडा), डॉ सुधा धींगरा(अमेरिका), मिन्नी ग्रेवाल(कनाडा), बलविंदर चहल (न्यूजीलैंड), बलबीर कौर संघेड़ा(कनाडा), शैल अग्रवाल (इंग्लैंड), श्रद्धा जैन (सिंगापुर), डा. सुखपाल(कनाडा), प्रेम मान(यू.एस.ए.), (स्व.) इकबाल अर्पण, सुश्री मीना चोपड़ा (कनाडा), डा. हरदीप कौर संधु(आस्ट्रेलिया), डा. भावना कुँअर(आस्ट्रेलिया), अनुपमा पाठक (स्वीडन), शिवचरण जग्गी कुस्सा(लंदन), जसबीर माहल(कनाडा), मंजु मिश्रा (अमेरिका), सुखिंदर (कनाडा), देविंदर कौर (यू के) और नीरू असीम(कैनेडा) आदि की रचनाएं और पंजाबी कथाकार-उपन्यासकार हरजीत अटवाल के उपन्यास “सवारी” के हिंदी अनुवाद की तेंतालीसवीं किस्त आपने पढ़ीं। “गवाक्ष” के फरवरी 12 अंक में प्रस्तुत हैं – मंजु मिश्र की कुछ कविताएँ तथा हरजीत अटवाल के धारावाहिक पंजाबी उपन्यास “सवारी” की चौवालीसवीं किस्त का हिंदी अनुवाद…

कैलिफोर्निया(यू।एस.ए.) से

मंजु मिश्रा की कुछ कविताएँ

ख्वाहिशें - कुछ अलग अलग रंग

1
मेरी ख्वाहिशों ने
रिश्ते जोड़ लिए आसमानों से
उगा लिए हैं पंख
और उड़ने लगी हैं हवाओं में
अब तो बस !
ख़ुदा ही ख़ैर करे !!
2
अल्लाह !
ये ख्वाहिशों की उड़ान
कहीं, दम ही न ले ले
ख़ुदा ही जाने,
पांव कहाँ तक साथ देंगे ?
3
रोशनी चुभती हैं
पांवों के छाले फूटते हैं
आँखों के ख़्वाब दम तोड़ते हैं
ऐसे में भी जीने की ख्वाहिश
वल्लाह ..
ज़िंदगी भी क्या चीज है !
4
कितनी ख्वाहिशों ने
दम तोड़े हैं
तब कहीं जा कर
यह तजुर्बे की चाँदी चढ़ी है
बाल धूप में नहीं पकते !!



क्षणिकाएं : चलो जुगनू बटोरें...



1
रिश्ते,
बुनी हुयी चादर
एक धागा टूटा
बस उधड़ गए…
2
देहरी के दिए की
लौ कांपती है,
बाहर आंधियां तेज हैं
3
हमेशा अनबन-सी रही,
आँखें और होठ
अलग-अलग राग अलापते रहे
4
चलो जुगनू बटोरें
चाँद तारे
मिलें न मिलें …

मुट्ठी भर सुख का पावना

समय
जब अपनी बही खोल कर बैठा
हिसाब करने,
तो मैं
सोच में पड़ गयी...

पता ही नहीं चला
कब
मुट्ठी भर सुख का पावना
इतना बढ़ गया, कि
सारी उम्र बीत गयी
सूद चुकाते चुकाते
मूल फिर भी
जस का तस



सन्नाटा : अलग-अलग अंदाज़

1
यूँ तो
ख़ामोश है रात
पर सन्नाटे का भी
अपना अलग राग है

सुनो तो कान देकर -
सुनाई देंगी
रात की सिसकियाँ
2
ख़ामोश सी फिजायें
चुप चुप -सा है समां
फ़िर भी रात
सन्नाटी नहीं
3
तोड़ लो
मगर ख़ामोशी से,
सितारों के फूल...
चाँद न जागे
सन्नाटे का जादू टूट जायेगा
००


मंजु मिश्रा
जन्म : 28 जून 1959, लखनऊ(उत्तर प्रदेश)।
शिक्षा : एम। ए.(हिन्दी)
सृजन : कविताएँ, हाइकु, क्षणिकाएँ, मुक्तक और ग़ज़ल।
सम्प्रति : व्यापार विकास प्रबंधक, कैलिफोर्निया (यू।एस.ए.)
ब्लॉग :
http://manukavya.wordpress.कॉम
ईमेल :
manjushishra@gmail.com

धारावाहिक पंजाबी उपन्यास(किस्त- 44)





सवारी

हरजीत अटवाल
हिंदी अनुवाद : सुभाष नीरव


॥ उनचास ॥
सतनाम ने ड्रिंक डालकर हाथ में पकड़ी हुई थी। न पी रहा था और न ही मेज पर रख रहा था। नशे में होने की वजह से हाथ हिल जाता और शराब छलक जाती। दोनों बच्चे पास ही बैठे थे। मनजीत घर का काम करती इधर-उधर आ-जा रही थी। टेलीविज़न पर नया एशियन प्रोग्राम लगा रखा था। बच्चों ने देखा कि उसका ध्यान कहीं और था तो उन्होंने आहिस्ता से रिमोट दबाकर कार्टून लगा लिए। मनजीत ने पूछा -
''रोटी ले आऊँ कि हो गया ?''
''डिंपल कपाड़िया, प्रेम चोपड़ा ने मेरा साथ दिया, शिन्दे को तरीके से निकालकर ले गया जैसे मक्खन में से बाल निकालते हैं। इसका कोई तोड़ सोच, मेरी डिंपल कपाड़िया।''
''सोचना क्या है, दूसरा आदमी रख लो।''
''तूने बात कर दी न टुनटुन वाली। अरे, तुझे बताया तो है कि स्किल्ड बुच्चर दो ढाई सौ मांगते हैं।''
''और तुम तो कहते थे कि आर्थर है।''
''है, आर्थर भी, वह भी इससे कम में नहीं मानता।''
''इतना !''
''इसी तरह के योद्धे मिलते हैं सौ में, यह तो ऐसे होता है जैसे अमिताभ बच्चन के आगे रिशी कपूर।''
उसने गिलास में से छोटा-सा पैग भरा और बोला-
''प्रेम चोपड़ा सीधे ही सौ पोंड हफ्ते का बचा गया। टोनी लेता था दो सौ और ये मुकरी वही काम करेगा सौ में।''
''तुम कह देते, हमारा गुजारा नहीं होता शिन्दे के बिना।''
''तुझे पता है बिन्दू कि मैं उसके सामने बिना पिये बोल नहीं सकता।''
''पीकर बोल लो।''
''अब साँप निकल गया, लकीर को पीटता रहूँ ! उसके पास बहाना ही ऐसा था कि टोनी छुट्टियाँ पर जा रहा है। शिन्दे के कारण मैंने माइको को हटा दिया था।''
सतनाम जानता था कि अब माइको वापस आने के लिए नखरे दिखाएगा। तनख्वाह बढ़ाने के लिए भी ज़ोर डालेगा। माइको को वापस लाने का तरीका एक ही था कि आर्थर को काम पर रखने का भय दिखाया जाए। वैसे आर्थर को काम पर रखकर वह ज्यादा खुश नहीं होता, क्योंकि आर्थर भी विश्वसनीय व्यक्ति नहीं था कि कब काम छोड़कर चलता बने। शिन्दे का इस प्रकार जाना उसको एक धक्के की भाँति लगा। शिन्दे के सिर पर दुकान छोड़कर वह कहीं भी हो आता था। कई कई घंटे बाहर रह सकता था। शिन्दे का वापस लौटना अब इतना सरल नहीं था।
माइको पुन: उसके संग काम करने आ लगा। सब कुछ पहले की भाँति हो गया, पर शिन्दे वाला अभाव पूरा नहीं होता था। शिन्दे को सभी याद करते। सभी उसकी बातें करते रहते, खासतौर पर जुआइस। वह तो शिन्दे से मिलने अजमेर की दुकान पर भी हो आती। यदि अजमेर वहाँ होता तो उसे देखकर आँखें निकालने लग पड़ता। वह उसको देखते ही लौट पड़ती। कभी कभी मगील जुआइस से कहने लगता -
''मुझे तेरी बहुत चिंता है।''
''क्यों ?''
''सोचता हूँ कि शैनी(शिन्दे) के बिना तेरा दिल कैसे लगता होगा ?''
''तू फिक्र न कर बुङ्ढे, तेरी मुझे ज़रूरत नहीं पड़ने वाली।''
यह सच था कि वह शिन्दे की कमी महसूस करती थी। वह शिन्दे को प्यार करने लगी थी। वह सतनाम से कहने लगती-
''तेरा भाई बहुत अच्छा है। इस दुनिया में बुरे लोगों की चलती है, उसके जैसे शरीफों की नहीं।''
उसकी बात सुनकर सतनाम मन ही मन बोला कि यदि शरीफ़ होता तो साला पार्टियाँ न बदलता घूमता।
शिन्दे का चले जाना कुछ दिन तक तो उससे स्वीकार ही नहीं हुआ था। फिर वह सोचने लगा कि कोशिश जारी रखनी चाहिए कि किसी तरह वह वापस आ जाए। शिन्दे के होते जो फायदे थे, शिन्दे के चले जाने पर और अधिक उभर कर सामने आने लगे। वह हाईबरी पहले की तरह ही जाता। जब से उसने दुकान खोली थी, हफ्ते में दो-तीन बार ताज़ा स्प्रिंग लैम्ब अजमेर को देकर आता था। जिस दिन भी नई डिलीवरी आती तो वह गुजरते हुए दो पोंड मीट उधर दे जाता। अब भी जाता। उसका टोनी, शिन्दे और गुरिंदर के साथ भी हँसी-मजाक चलता रहता था। गुरिंदर उसकी कई बातों पर खीझ भी उठती, पर उसके आने पर लगता कि आसपास का वातावरण हरकत में आ रहा है। अजमेर के स्वभाव का तो पता ही नहीं था कि किस वक्त उसको चढ़ जाएगी और दूसरे की वह उतार कर रख देगा।
सतनाम शिन्दे को छेड़ता हुआ कहता-
''अच्छा भला मीट का काम सीख चला था, इंडिया जाकर बेशक गाँव के अड्डे पर मीट की दुकान खोल लेता।''
प्रत्युत्तर में शिन्दा कहता-
''तुम भाई भाई जैसा मर्जी करो, चाहे मुझे झटकाई बनाओ या ठेकेदार या फिर मुनीर वाला वांगलू।''
एक दिन गुरिंदर सतनाम से बोली-
''तेरे भाजी को तो पता ही नहीं चलता कुछ, देख बलदेव को गए कितना वक्त हो गया। बेचारा लौटकर नहीं आया। जा, तू ही बुला ला उसको।''
''जट्टिये, मुझे लगता है, वह अब इंटरवल के बाद ही आएगा।''
गुरिंदर को उसकी यह बात अच्छी न लगी और कहने लगी-
''इतने महीने हो गए, अभी तक तुम्हारा इंटरवल ही नहीं हुआ ? मैं तो कहती हूँ कि अजीब भाई हो तुम लोग, मुँह पर एक दूजे की तारीफ़ें करने लगते हो, ज़रा इधर-उधर हुए नहीं कि तू कौन, मैं कौन।''
''जट्टिये, सारी दुनिया ही ऐसी है।''
बियर का घूंट भरकर अजमेर कहने लगा-
''इसने तो भई लहू पी लिया।''
''किसने ?''
''ये शिन्दे के बच्चे ने।''
''क्या बात हो गई ?''
''कुछ न पूछ, न साला टोनी जाता, न यह जड़ों में बैठता। अब टोनी को साइन करके ज्यादा पैसे देने होंगे। वह फुल टाइम को मानता ही नहीं।''
उसकी बात सुनता सतनाम बिल्ली झपट्टे के लिए तैयार होता हुआ बोला-
''मैं भी सुनूँ, यह कहता क्या है ?''
''कहना क्या है, सवेरे उठता ही पीने लग पड़ता है। कुछ सामने पीता है और कुछ चोरी से। ऊपर से सिगरेटें भी पीता है।''
''अच्छा, सिगरेटों का तो मुझे नहीं पता।''
''मैंने तो पकड़ा है इसे। मैंने पूरा हिसाब लगाकर देखा कि इसका दस से पन्द्रह पोंड का फालतू खर्च है रोज़ का। लगाकर देख हिसाब, बात कहाँ पहुँचती है। मैं तो परेशान हुआ पड़ा हूँ।''
''यह तो बिलकुल गलत है, दुकानें इतना बोझ कहाँ झेलती हैं। इसे समझाना था।''
''समझाऊँ क्या !... अगर कुछ कहूँ तो गुस्सा हो जाता है। लहू पी रखा है। गुरिंदर अलग लड़ने लगती है।''
''गुस्सा होने का क्या मतलब हुआ। जब वह गलती करता है तो रोकना तो हुआ ही। चुरा कर पीने का क्या मतलब ! धमकाना था ज़रा।''
''क्या धमकाऊँ ! पहले बलदेव छोटी सी बात पर गुस्सा होकर चला गया जैसे कोई डंडा मारा हो... अब इसे कुछ कहा तो... इसे इतना समझ में नहीं आता कि इसकी तनख्वाह तो एडवांस में इसकी औरत को दे आया हूँ।''
''भाई, कोई बात नहीं। हौसला रख। मैं इसको समझाता हूँ, बात इसके खाने में डालता हूँ।”
''मैंने तो मज़बूर होकर ही बात तुझे बताई है, तू ही इसके साथ बात कर।''
पब में से उठकर वे दुकान पर आ गए। सतनाम ने शिन्दे की तरफ देखा। शिन्दे ने नज़रें झुका लीं। सतनाम ने कहा-
''आ भई गब्बर सिंह, एक दो बातें करें।''
शिन्दा गल्ला छोड़कर बाहर निकल आया। उसके हाथ काँप रहे थे। सतनाम ने चिंतित होकर पूछा-
''क्यूँ, क्या हुआ तुझे ?''
''कुछ नहीं, यूँ ही सिर सा दुखता है।''
सतनाम उसके कंधे पर हाथ रख उसको दुकान में से बाहर ले आया। शिन्दा कहने लगा-
''यार, भाजी मेरे साथ बहुत बुरा व्यवहार करता है। रात में जी भर कर पीता है और फिर मेरे पर ही बिगड़ता है। मुझे तो वापस इंडिया ही चढ़ा दो, यहाँ मेरी कुत्ते बराबर कदर नहीं।''
''इस मुल्क में कुत्तों के तो मेन रोल होते हें... तू यूँ न देवदास वाला रोल किए जा।''
''मेरी तो बस करवा दी इसने। लाख रुपया क्या दे आया है, अब बातों से मेरा खून पीना चाहता है।''
''बात यह है भई कि एक तो शराब कम कर और ध्यान से काम कर। जिसने तनख्वाह देनी है, वो काम तो चाहेगा ही।''
''मैं काम से कब इन्कार करता हूँ।''
''शराब तो पीता है न।''
''यह तो भाजी ने मुझे अपसेट ही इतना किया हुआ है कि रहा नहीं जाता।''
''सोच ले, अगर नहीं दिल लगता तो उधर आ जा, पर मेरा नाम न लेना।''
शिन्दा कुछ न बोला। वह पुन: दुकान में आ गए।
घर पहुँचकर सतनाम मनजीत से कहने लगा-
''ओ मेरी पूनम ढिल्लों, तेरा देवर आ रहा है, एक रूम सैट कर दे।''
''सच, बलदेव मान गया ?''
''अरी शर्मिला टैगोर, तेरा एक ही देवर है कहीं। उधर जट्टी को भी बलदेव की ही पड़ी हुई है, साला बलदेव ही संजय दत्त हो गया। सारा मूड ही खराब कर दिया।''
''और कौन आ रहा है ?''
''शिन्दा ! उधर प्रेम चोपड़ा की उसके साथ शूटिंग ठीक नहीं चल रही।''
''शिन्दे को हम नहीं रखेंगे। मैं तो किसी को भी नहीं रखना चाहती। पर शिन्दे को तो बिलकुल ही नहीं। जाकर बहन जी से पूछो, कितना गन्दा है वह।''
''ज़रा होश से काम ले, हमेशा बिन्दू ही न बनी रहा कर। अब हमें उसकी सख्त ज़रूरत है। सोच कर देख, उसके आने से हमारे कितने पैसे बचते हैं। और फिर घर में, मेरी भी चल लेने दिया कर। तू मुझे हीरो तो क्या, साइड हीरो भी नहीं समझती।''
(जारी…)
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