सोमवार, 11 अप्रैल 2011

गवाक्ष – अप्रैल 2011



जनवरी 2008 गवाक्ष ब्लॉग के माध्यम से हम हिन्दी ब्लॉग-प्रेमियों को विदेशों में रह रहे हिन्दी/पंजाबी के उन लेखकों/कवियों की समकालीन रचनाओं से रू-ब-रू करवाने का प्रयास करते आ रहे हैं जो अपने वतन हिन्दुस्तान से कोसों दूर रहकर अपने समय और समाज के यथार्थ को अपनी रचनाओं में रेखांकित कर रहे हैं। गवाक्ष में अब तक विशाल (इटली), दिव्या माथुर (लंदन), अनिल जनविजय (मास्को), देवी नागरानी(यू.एस.ए.), तेजेन्द्र शर्मा(लंदन), रचना श्रीवास्तव(लंदन), पूर्णिमा वर्मन(दुबई), इला प्रसाद(यू एस ए), भगत धवन (डेनमार्क), चाँद शुक्ला (डेनमार्क), वेद प्रकाश ‘वटुक’(यू एस ए), रेखा मैत्र (यू एस ए), तनदीप तमन्ना (कनाडा), प्राण शर्मा (यू के), सुखिन्दर (कनाडा), सुरजीत(कनाडा), डॉ सुधा धींगरा(अमेरिका), मिन्नी ग्रेवाल(कनाडा), बलविंदर चहल (न्यूजीलैंड), बलबीर कौर संघेड़ा(कनाडा), शैल अग्रवाल (इंग्लैंड), श्रद्धा जैन (सिंगापुर), डा. सुखपाल(कनाडा), प्रेम मान(यू.एस..), (स्व.) इकबाल अर्पण, सुश्री मीना चोपड़ा (कनाडा), डा. हरदीप कौर संधु(आस्ट्रेलिया), डा. भावना कुँअर(आस्ट्रेलिया), अनुपमा पाठक (स्वीडन), शिवचरण जग्गी कुस्सा(लंदन) आदि की रचनाएं और पंजाबी कथाकार-उपन्यासकार हरजीत अटवाल के उपन्यास “सवारी” के हिंदी अनुवाद की पैंतीसवीं किस्त आपने पढ़ीं। “गवाक्ष” के अप्रैल 2011 अंक में प्रस्तुत हैं कनाडा से पंजाबी कवि जसबीर माहल की कविताएँ तथा हरजीत अटवाल के धारावाहिक पंजाबी उपन्यास “सवारी” की छत्तीसवीं किस्त का हिंदी अनुवाद…

कनाडा से

पंजाबी कवि जसबीर माहल की कुछ कविताएँ

हिंदी रूपान्तर : सुभाष नीरव

भगौड़ा

आज भी

उलझाये रखा

व्यस्तताओं में

अपने आप को…

अपने सम्मुख

पेश होने से

आज भी

मैं बचता रहा!

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उमंगों की मौत

श्रृंगार मेज़ पर

पड़ीं चूड़ियाँ

चूड़ियों पर

जमी धूल !

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मिट्टी की तासीर-1

फूलों को कोई क्या कहे !

हँसते रहते चुपचाप

कब्र पर खिले भी

वे उतने सुन्दर

जितने बगीचे में !

फूलों को कोई क्या कहे !

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मिट्टी की तासीर-2

फूल

मुरझा गया

सूख गया

वज़ूद उसका

ख़त्म हो गया…

देर तक पर स्मृतियों में

उसकी सुगंध

आती रही…

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फास्ट फूड

आग से उतावला पकवान

पकवान से उतावली आग

दोनों से भी अधिक उतावले

हाथ पकाने वाले

और सबसे ज्यादा उतावले

खाते खाते

गाड़ियाँ भगाने वाले !

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वर्तमान गली-पड़ोस

डायरी के पन्ने पलटते हुए

बदले पते और फ़ोन नंबर देखते हुए

कितने ही सवाल ज़ेहन में

उठ उठ कर खड़े होते

कहाँ गया पुरखों का घर

कैसे बनेंगे अब रिश्ते

कैसा होगा गली-पड़ोस

ड्योढ़ी-आँगन के साथ

किस तरह का होगा मोह ?

क्या अब हवा में मिली दुर्गंध से

मिला करेगी

पड़ोसी के मर जाने की ख़बर ?

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ख़याल, असलियत, अहसास

सुनहरी सपनों के खेत में से

कोई सपना उखाड़ लाने के लिए

ख़यालों ने

जब भी कभी

असलियत की बाड़ फांदी है

मुँह के बल गिरे मन पर

अहसास की

बड़ी गहरी चोट लगी है।

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योद्धा

बादल का टुकड़ा था वो

पर्वत से जिसने टक्कर ली

क्या हुआ

यदि जीत न सका

नाचता-कूदता संग दरिया के

वापस आया

साँस लेने के लिए

वह टुकड़ा

सागर में रुका

कितने क़तरे संग मिलाकर

अपना नया वज़ूद बनाकर

पर्वत के दर

फिर जा पहुँचा।

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पंजाबी के एक होनहार कवि। 1978 में पंजाब छोड़ा और इंग्लैंड बस गए। वर्तमान में वर्ष 1994 से कनाडा के ब्रिटिश कोलंबिया प्रांत के सरी शहर में रह रहे हैं।

शिक्षा : बी-एससी।

संप्रति : सोफ्टवेयर डिवलेपर।

प्रकाशित पुस्तक : वर्ष 2009 में पंजाबी में एक कविता संग्रह आपणे आप कोल प्रकाशित।

सम्पर्क : 8229 -157, Street Surrey, BC, Canada V4N 0S2

Email - jmahal@telus.net

धारावाहिक पंजाबी उपन्यास(किस्त- 36)


सवारी
हरजीत अटवाल

हिंदी अनुवाद : सुभाष नीरव

॥ इकतालीस ॥

बलदेव की सिमरन से अलहदगी गुरिंदर के लिए बड़ी ख़बर नहीं थी जबकि बाकी सब इस बात के लिए तैयार नहीं थे। सभी यही समझते थे कि बलदेव ने सिमरन से समझौता कर लिया था। पर गुरां को लगता था कि वह अभी भी सिमरन में से गुरां को ही तलाशता रहता था। शुरू-शुरू में जब वह कहा करता कि सिमरन को गुरां जैसी बनना चाहिए तो कइयों ने इस बात का बुरा मनाया था। सतनाम और मनजीत ने भी। अजमेर को अच्छा लगा था कि बलदेव उसकी पत्नी को आदर्श पत्नी के रूप में देख रहा था। गुरिंदर को यह कभी पता नहीं चल सका था कि उनके अलग होने का बड़ा कारण ली-हार्वे बना था।

गुरिंदर बलदेव की प्रतीक्षा करने लगी थी कि अब वह उसके पास आकर ठहेरगा। वह तो उसकी हमेशा ही प्रतीक्षा करती रहती थी। पर जब कभी वह अजमेर द्वारा सताई हुई होती तो वह चाहती कि बलदेव आज न आए। एक दिन उसने अजमेर और सतनाम से कहा -

''तुम्हें नहीं लगता कि बलदेव भी तुम्हारे बीच बैठा होता तो कितना अच्छा होता।''

''जट्टिये, हम तो चाहते हैं, वही हमें अनटचेबल समझे बैठा है। छोटी-छोटी बात पर रूठकर भागता है।''

''तुम्हारा भाई है, दुखी है। तुम कौन-सा उसके दुख को समझने की कोशिश करते हो।''

''वो अपना दुख हमारे साथ साझा भी तो करे। वह आता है और राज कुमार की तरह डायलॉग बोल कर चला जाता है।'' सतनाम ने कहा।

अजमेर अभी तक चुप था, बोला-

''ढ़िया बात यही है कि विवाह करवा ले, पर वो मानता ही नहीं। जब भी बात करो, मुँह फेर लेता है।''

''तुम लोग लड़की देखो, विवाह के लिए मैं मनाऊँगी।''

''लड़कियों की कौन-सी कमी है। इंडिया जाए, पचास लड़कियाँ हैं। और फिर अब तो बहाने से जा भी सकता है, बंसो बहन की लड़की का विवाह है।'' अजमेर ने कहा।

उस समय भी वे विवाह पर जाने की सलाह करने के लिए ही इकट्ठे हुए थे। सतनाम ने काम के कारण असमर्थता दिखा दी थी, क्योंकि उसके पीछे काम संभलना नहीं था। अजमेर को ही जाना पड़ रहा था और जाना भी वह खुद ही चाहता था। अजमेर की अनुपस्थिति में शिन्दे ने ही दुकान संभालनी थी।

गुरिंदर को लगा, अजमेर उसकी बात को यूँ ही समझ कर टाल रहा था। वह थोड़ा खीझ कर बोली-

''बंसो बहन की लड़की का विवाह अभी कौन-सा आ गया, ज़रा-सी चिट्ठी पर तुम मीटिंगें करने बैठ गए और य भाई तुम्हारे सामने दर-दर घूमता फिरता है, इसका कोई फिक्र नहीं कर रहा। जैसे वह कोई पराया हो।''

''जट्टिये, यूँ ही गुस्सा न कर, करते हैं कुछ। इस बार मैं उसके साथ बात करता हूँ। विवाह करवाने से पहले टिक कर भी बैठे।''

एक दिन अजमेर कैश एंड कैरी से लौटा तो दूर से देखकर ही मुस्कराने लगा। गुरिंदर के लिए यह एक अचम्भे वाली बात थी। उसने मन ही मन कहा कि आज खैरियत हो। वह करीब आया तो वह पूछने लगी-

''क्या हुआ ?''

''आज तेरे दिल की बात करके आया हूँ।''

''क्या ?''

''तेरे लाडले के लिए लड़की देखकर आया हूँ।''

''कहाँ ?''

''रैडिंग, लड़की रैडिंग में अपनी बहन के पास रहती है। सैर के लिए आई है, एम.ए. पास है, साढ़े पाँच फुट लम्बी, खूबसूरत, बड़ी बड़ी आँखें, लम्बे बाल, यानी तेरे से हर तरफ़ से दो रत्ती अधिक।''

''तुम रैडिंग कब चले गए ?''

''खीझ मत, मैंने तो फोटो ही देखी है। मेरा एक जानकार है प्रीतम सिंह। मुझे कैश एंड कैरी में मिला करता है। लड़की सैर के लिए बुलाई थी और अब लड़का खोजते फिरते हैं। वह फोटो जेब में ही डाले घूमता है। मैंने बलदेव के बारे में बताया तो मेरे पीछे ही पड़ गया... देख, अब तू जाने, तेरा काम जाने दुबारा मेरे से न झगड़ना।''

उन्होंने उसी वक्त बलदेव के काम पर फोन करके उसके लिए सन्देशा छोड़ दिया। वह अगले दिन ही आ गया। गुरिंदर ने कहा-

''तू हमारी एक बात माने, तो कहें।''

बलदे 'हाँ' कहने से कतरा रहा था। समीप बैठे अजमेर ने कहा-

''पहले ये हमारी कितनी मानता रहा है, जो अब मान जाएगा।''

''भाजी, कोई मानने वाली बात तो हो, मैं कभी भागता हूँ, बताओ तो सही।''

''शॉर् कट यह है कि तेरे भाजी ने तेरे लिए लड़की देखी है। ये शर्त लगाते हैं कि वो मेरे से ज्यादा सुन्दर है।''

सुनकर बलदेव ने गुरां की ओर देखा, फिर अजमेर की तरफ़ और बोला-

''भाजी, तुम्हें भ्रम हुआ होगा।''

''यह तू खुद जाकर देख ले।''

''बाकी सबकुछ हो सकता है, गुरां से सुन्दर नहीं हो सकती।''

बलदेव स्वयं को रोक नहीं पाया, वह कह गया। उसकी बात से अजमेर की छाती फूल गई। वह बोला-

''कहने वाले तो यही कहते हैं, जाकर देख। शायद तेरा दावा गलत हो।''

'' तो जाना ही पड़ेगा।''

''ठीक है, मैं फोन करके अभी टाइम फिक्स कर लेता हूँ।''

अजमेर प्रीतम सिंह को फोन मिलाने लगा। गुरिंदर बलदेव को समझाने के अंदाज में बोली-

''तुझे उसको वहाँ तोलने नहीं जाना, बात सिर्फ़ इतनी है कि तू विवाह करवा ले अगर थोड़ी-बहुत भी पसन्द है तो।''

अजमेर फोन से मुक्त होकर कहने लगा-

''हते हैं कि मंडे को आ जाओ, संडे उन्होंने कहीं जाना है।''

''मंडे ! मंडे को फिर तुम दोनों भाई हो आना।''

''हम वहाँ क्या करेंगे, तेरी भी तो ज़रूरत है।''

''मैं दुकान खोलूँगी, तुम सतनाम को संग ले जाओ।''

''नहीं गुरां, सतनाम को रहने दे। मैं नहीं चाहता कि बात फैले। मैं और भाजी ही चले जाएँगे। तू सतनाम के स्वभाव को जानती है, मजाक करने का बहाना ढूँढ़ता है।''

तय किए गए दिन बलदेव ने काम से छुट्टी ले ली और हाईबरी पहुँच गया। उसके पहुँचते ही सारा प्रोग्राम बदला पड़ा था। वाइन की डिलीवरी आ रही थी, जिस कारण अजमेर नहीं जा सकता था। गुरां कह रही थी-

''अगर तुमने नहीं जाना तो रहने दो, तुम्हारे बिना कैसा जाना ?''

''यह अब मुश्किल से तो राजी हुआ है, मौका न गवां। तुम दोनों चले जाओ।''

''नहीं भाजी, कैंसल कर दो, मैं फिर छुट्टी कर लूँगा।''

''नहीं भई, वो वेट करता होगा, रोज़ मिलता है। अब दुविधा में न पड़ो और चले जाओ।''

बलदेव एक आज्ञाकारी की तरह बाहर निकला और कार घुमाकर दुकान के सामने ही ले आया। गुरां चुन्नी ठीक करती हुई उसके बराबर आकर बैठ गई। बलदेव ने कार चला ली। चलाई नहीं बल्कि भगा ली। वह गुरिंदर की ओर देखता हुआ बोला-

''मुझे यकीन नहीं आ रहा कि तू मेरे संग बैठी है। सबकुछ इतनी जल्दी और अचानक...!''

''तू ज़रूर गुरुद्वारे जाकर कुछ मांग कर आया होगा।''

''मैं बहुत मांगता रहा हूँ, पर किसी रब ने मेरा कुछ नहीं किया। सब साले फिज़ूल हैं।''

''और, आज तो तेरी सुनी गई।''

''हाँ, आज वाकई सुनी गई।''

कुछ देर चुप रहकर गुरां बोली-

'' बता, तेरी प्रॉब्लम क्या है ?''

''मेरी प्रॉब्लम यह है कि मैं अन्दर से स्टेबल नहीं हूँ शायद या फिर मुझे स्टेबल होना नहीं आ रहा।''

''बलदेव, अब तो इतना समय हो गया हमें दूर हुए। अब तो तू जीना सीख ले।''

''गुरां तूने जीना सीख लिया ?''

''मेरा क्या है ! तू अपने बारे में सोच अब।''

''गुरां, मुझे लगता है, जीने के लिए लोग सपने लेते रहते हैं, स्कीमें घड़ते रहते हैं, पर मैं ऐसा कुछ नहीं करता। मेरे स्वभाव में है ही नहीं। तू मेरे साथ होती तो शायद मैं ऐसा न होता। मेरी सपने लेने की हसरत तेरे साथ ही चली गई।''

गुरां ने ठंडा साँस भरा और कहा-

''तूने मुझे इंडिया से आने ही क्यों दिया था। तू एक बार कहता, मैं रुक जाती।''

''अगर इधर मेरा भाई न होता तो हम सोचते ऐसा कुछ।''

''यह गोरी वाली क्या कहानी है ? तेरा भाई रोज़ ही लेकर बैठ जाता था।''

''एक गोरी से मेरी थोड़ी-सी निकटता बनी थी बस...।''

''फिर विवाह करवा लेता।'' गुरां ने गिला-सा करते हुए कहा।

''विवाह !... तू भी बाकी लोगों की तरह सोचती है। मैंने पहले विवाह करवाकर क्या पाया, तूने क्या पाया... और फिर हर निकटता का अर्थ विवाह नहीं हुआ करता।''

''विवा हो जाए तो आदमी का मन बिजी हो जाता है, भटकता नहीं।''

''शायद, पर मेरी और प्रॉब्लम है कि न मुझे गुरां मिले और न मैं विवाह करवाऊँ। सच्चाई यह है कि मैं विवाह करवाने के हक में नहीं।''

गुरां चुप रही। बलदेव ने फिर कहा-

''इसका वैसे एक हल बहुत बढ़िया है।''

''कौन-सा ?''

''वह यह कि भाजी गुरां को मेरे लिए छोड़ दे और खुद विवाह करवा ले।''

''मैं तैयार हूँ, अगर तेरे में हिम्मत है तो कर ले। मैं तैयार हूँ।''

''हिम्मत ही न होने के कारण मैं मार खा रहा हूँ। अगर हिम्मत होती तो मैं तुझे अभी न भगा कर ले जाता''

''मैं इसके लिए भी तैयार हूँ, ले चल जहाँ मर्जी।''

कहकर गुरां उसकी तरफ़ देखने लगी। वे दोनों ही कुछ देर न बोले। दोनों के पास ही कितनी सारी बातें थी, पर इस वक्त सूझ नहीं रही थीं। यदि बोलने लगते तो एक साथ बोल पड़ते या फिर चुप रहते।

बलदेव ने कार एम.फोर पर चढ़ा ली। साइन पढ़ती हुई गुरां बोली-

''ले, रैडिंग तो आ भी गया, इतनी जल्दी ?''

''यह तो आना ही था।''

''तू ऐसा कर, राह भूल जा।''

बलदे कार को मोटर-वे पर से उतार कर छोटी सड़कों पर ले आया। वे अगली-पिछली बातें करते रहे। कार चलाता बलदेव उसकी तरफ़ देखने लगता तो देखता ही रहता। घंटा भर गाँवों में कार घुमाते रहे और रैडिंग पहुँच गए।

प्रीतम की दुकान मेन रोड पर ही थी। जल्दी मिल गई। वहाँ सभी उनकी प्रतीक्षा कर रहे थे। दुकान के पीछे ही घर था। प्रीतम सिंह और उसकी पत्नी ने पूरे आदर से उनको बिठाया। चाय पीते समय ही लड़की आ गई। प्रीतम सिंह कहने लगा-

''यह है हमारी इंदरजीत, मैथ में एम.ए. है।''

बलदेव ने एक नज़र लड़की की ओर देखा। कद ज़रूर लम्बा था, आँखें भी बड़ी थीं, पर चेहरे की बनावट गुरां के मुकाबले कुछ भी नहीं थी। बलदेव ने गुरां की ओर देखा कि कोई बात करे, पर गुरां के पास भी कहने के लिए कुछ नहीं था। वह सोच रही थी कि रास्ते में इस बारे में सलाह करके क्यों नहीं आए। प्रीतम सिंह की पत्नी ने ही बात शुरू की। इंदरजीत के बारे में बताती रही और कुछ बातें उसने बलदेव के बारे में भी पूछीं। चाय का कप पिया और उठ आए। चलने लगे तो प्रीतम सिंह ने कहा-

''हमें हाँ या ना तो बता जाओ।''

''यह आपको खुद ही फोन करेंगे।'' कहती हुई गुरां कार में आ बैठी थी। फिर वह बलदेव से पूछने लगी-

''कैसी थी लड़की ?''

''गुरां से सुन्दर !... माई फुट!''

बलदेव ने कार को रोड पर लाते हुए कहा और दोनों हँसने लगे। कुछ देर बाद बलदेव ने कहा-

''क्या सोच रही है ?''

''सोचती हूँ कि मैंने कभी सोचा भी नहीं था कि यह दिन लौटकर मेरी ज़िन्दगी में आएगा... बलदेव, यह तो हमारी रब ने करीब होकर सुनी है।''

''हाँ गुरां, मेरा मन भी कई बार उतावला पड़ने लगता है इसीलिए एक गैप रखता हूँ मैं, कि कहीं कोई गल हरकत ही न कर बैठें।''

''यह जो लव-शव है, पहले तो इसकी समझ ही नहीं थी, पर अब लगता है कि ये फिल्मों वाले, टेलीविज़न वाले, झूठे नहीं। इतने वर्ष हो गए मुझे तेरी प्रतीक्षा अभी भी पहले की तरह ही रहती है। कई बार अकेली बैठी हुई पुरानी बातें याद आने लगती हैं तो रूह आनन्दित हो जाती है।''

बात करती गुरां ने आँखें मूंद ली। कुछ देर बाद बोली-

''बलदेव, याद है वो क्षण जब बैठक में मैं गा रही थी और तू सामने बैठा था।''

''भला मैं कैसे भूल सकता हूँ। तेरा गीत तो अभी भी मेरे ज़हन में चलता रहता है। गीत की एक-एक ल, एक-एक अक्षर मेरे अन्दर अंकित हुआ पड़ा है, जैसे शिलालेख खुदे होते हैं।''

गुरां अपनी सीट पर से उठती हुई उसकी तरफ़ झुकी और उसका हाथ पकड़कर बोली-

''बलदेव, क्या वो क्षण किसी तरह वापस आ सकते हैं ?''

(जारी…)

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लेखक संपर्क :

67, हिल साइड रोड,
साउथाल, मिडिलसेक्स, इंग्लैंड
दूरभाष : 020-85780393,07782-265726(मोबाइल)

सोमवार, 14 मार्च 2011

गवाक्ष – मार्च 2011

जनवरी 2008 “गवाक्ष” ब्लॉग के माध्यम से हम हिन्दी ब्लॉग-प्रेमियों को विदेशों में रह रहे हिन्दी/पंजाबी के उन लेखकों/कवियों की समकालीन रचनाओं से रू-ब-रू करवाने का प्रयास करते आ रहे हैं जो अपने वतन हिन्दुस्तान से कोसों दूर रहकर अपने समय और समाज के यथार्थ को अपनी रचनाओं में रेखांकित कर रहे हैं। “गवाक्ष” में अब तक विशाल (इटली), दिव्या माथुर (लंदन), अनिल जनविजय (मास्को), देवी नागरानी(यू.एस.ए.), तेजेन्द्र शर्मा(लंदन), रचना श्रीवास्तव(लंदन), पूर्णिमा वर्मन(दुबई), इला प्रसाद(यू एस ए), भगत धवन (डेनमार्क), चाँद शुक्ला (डेनमार्क), वेद प्रकाश ‘वटुक’(यू एस ए), रेखा मैत्र (यू एस ए), तनदीप तमन्ना (कनाडा), प्राण शर्मा (यू के), सुखिन्दर (कनाडा), सुरजीत(कनाडा), डॉ सुधा धींगरा(अमेरिका), मिन्नी ग्रेवाल(कनाडा), बलविंदर चहल (न्यूजीलैंड), बलबीर कौर संघेड़ा(कनाडा), शैल अग्रवाल (इंग्लैंड), श्रद्धा जैन (सिंगापुर), डा. सुखपाल(कनाडा), प्रेम मान(यू.एस.ए.), (स्व.) इकबाल अर्पण, सुश्री मीना चोपड़ा (कनाडा), डा. हरदीप कौर संधु(आस्ट्रेलिया), डा. भावना कुँअर(आस्ट्रेलिया), अनुपमा पाठक (स्वीडन), आदि की रचनाएं और पंजाबी कथाकार-उपन्यासकार हरजीत अटवाल के उपन्यास “सवारी” के हिंदी अनुवाद की चौंतिसवीं किस्त आपने पढ़ीं। “गवाक्ष” के मार्च 2011 अंक में प्रस्तुत हैं – लंदन से पंजाबी कवि-कथाकार शिवचरण जग्गी कुस्सा की कविताएँ तथा हरजीत अटवाल के धारावाहिक पंजाबी उपन्यास “सवारी” की पैंतीसवीं किस्त का हिंदी अनुवाद…


लंदन(यू के) से
पंजाबी कवि शिवचरण जग्गी कुस्सा की दो कविताएँ
हिंदी रूपान्तर : सुभाष नीरव

गर्व न कर तू

गर्व न कर तू
अपने बैंक में पड़े
लाखों डॉलरों और
गोल्डन क्रेडिट कार्डों का...

तेरे ये कार्ड
मेरे पंजाब के ढाबों
या रेहड़ियों पर नहीं चलते !

अंहकार न कर तू
अपने विशाल 'विले' का
इसका उत्तर तो
हमारे खेत वाला
अकेला ‘कोठा’ ही दे सकता है !
जहाँ पड़ती है, ट्यूबवैल की
अमृत जैसी धार
और रसभरा राग
गाती हैं लहलहाती फ़सलें !

और तो और
मेरे खेत की मूली-गाजरें भी
गीत गाती हैं
और मक्की भी ढाक पर छल्ली लटका
मजाजिण(नखरैल) बनी फिरती है !

और ‘मान’ न कर तू
अपनी नाजुक जवानी
और डोलते हुस्न का...
इसका उत्तर देने के लिए तो
हमारे खेतों का
एक सरसों का फूल ही काफ़ी है !
जिसपर बैठकर मधुमक्खी भी
मंत्रमुग्ध हो जाती है
तितलियाँ डालती हैं गिद्धे
और जुगनू रात में दीये बालते हैं !

तू गर्व न कर अपने बाग का
तेरे बाग में अब तक
किसी मोर ने नृत्य नहीं किया होगा
और न ही
'सुभान तेरी कुदरत' कहकर
किसी तीतर ने परवरदिगार का
शुक्राना ही किया होगा...!
नाचे नहीं होंगे खरगोश तेरे बाग में
और न ही कोयल ने कूक कर
कभी ‘शुभ-प्रभात’ का पैगाम दिया होगा !

न कर गर्व तू
अपने बेशक़ीमती लहंगों का
तुझे सुनहरी गीटियाँ गिनने से
फुर्सत मिले तो कभी हमारे गाँवों की
गड्डेवालियों का लिबास देखना !
तेरा भ्रम उतर जाएगा।
उनका पहरावा बता देगा
कि सुन्दरता सिर्फ़ अमीरों के पास ही नहीं
झुग्गियों में भी बसती है !

एक बात याद रखना
मोतियों जड़े पिंजरों में
मीठी चूरी खाने वाले
न तो चुग्गा चुगने का
न घोंसलों के मोह का
और न ही
बसंत ऋतुओं का अर्थ जानते हैं
वे तो सिर्फ़ भोगते हैं
बनावटी आलिंगनों की गरमाहट
और नलियों से पीते हैं दूध
और फिर लावारिसों की भाँति
मालिक की राह देखते हैं...

जो फाइव-स्टार होटलों में
डॉलरों की क़ीमत अदा कर
दूसरों के बनावटी आलिंगनों की
गरमाहट का आनन्द उठाता है
जिसे घोंसला बनाने की ढंग नहीं आया
जिसने हमउम्र आलिंगन की तपिश को नहीं भोगा
वो कैसा पंछी होगा ?
तेरे जैसा ?
वह भी तुले हुए हाड़-मांस का पुतला
रूह और रूहानियत से वंचित !
क्योंकि पिंजरे और महलों के माहौल में
अधिक फ़र्क़ नहीं होता।
अजब और ग़ज़ब

न तो मैं धनुष तोड़ने के काबिल हूँ
औ न, नीचे तेल के उबलते कड़ाहे में देख
ऊपर मछली की आँख बींधने के समर्थ !

न किसी कला में सम्पूर्ण
और न, किसी वेद का ज्ञाता हूँ मैं !
न त्रिभुवन का मालिक
और न ही, शक्ति का बली भीम सैन !
न सूरज जितनी तपिश है मेरे में
और न चन्द्रमा जितनी शीतलता !
न रात जैसी कालिमा है मेरे दिल में
और न दिन जैसा उजाला !

मैं तो ‘खाली’ वहंगी उठा भ्रमण करता हूँ
खुले आकाश के नीचे
चारों दिशाओं के तीर्थ स्थान !

न तो इच्छा है मुझे किसी स्वयंवर की
और न ही मैं कोई धर्मयुद्ध लड़ने की
रखता हूँ अभिलाषा !

मेरा बहरा दिल भी सुनता है
हर विरह-पीड़ा की ध्वनि
तब मित्तर-प्यारे को फ़कीरों का
हाल ही सुनाता हूँ
'तैं की दर्द न आया' का वास्ता देकर !

पर तुझ पर एक ग़िला है
मेरे श्रद्धाभरे
भीलनी के बेरों की तरह
चुनकर निकाले हुए मीठे शब्दों को भी
तू 'जूठा' कहकर दुत्कार देती है !

मैं तो अपने भगवान को जबरन
परसादा छकाने की जिद्द करता हूँ,
भोले ‘धन्ने भगत’ की भाँति
और लगाम पकड़कर रोकने का जिगरा रखता हूँ मैं
अपने गुरू का घोड़ा, ‘माता सुलक्खणी’ की तरह !

जंगल में खड़े होकर एक चमत्कार देखा
एक नदी पूछ रही थी मछेरों से
हीरे-जवाहरात की दास्तान !
...और वे मछली के भाव का ही
ढिंढोरा पीटने लग पड़े !

जब बदली ने सतरंगी पींग डाली मोर के संग
तब बिजली ने तड़क कर 'ग़ज़ब' का ग़िला किया
... तब बदली की आँख से टपके मोती
और धरती ने बाहें फैला लीं !
आसमान ने ताली बजाई
समूचा वायुमंडल सुर्ख़ हो मुस्करा उठा
तमाम आलौकिक नज़ारे देखता मैं आ बैठा
गाते हुए दरख्त और कामधेनु गाय के पास !

प्रकृति के आगोश में बैठा
'अज़ब' और 'ग़ज़ब' के चक्करों में पड़ गया मैं !
००
शिवचरण जग्गी कुस्सा
गाँव : कुस्सा, ज़िला-मोगा(पंजाब)
वर्तमान निवास : लंदन(इंग्लैंड)
शिक्षा : मैट्रिक(पंजाब), आई.एफ़.के. यूनिवर्सिटी ऑस्ट्रिया।
सम्प्रति : 1986 से 2006 तक ज़र्मन और ऑस्ट्रियन बार्डर पुलिस में और आजकल एस.आई.जी.(सिक्युरिटी)।
प्रकाशित कृतियाँ :
जट्ट वढिया बोहड़ दी छावें, कोई लभो सन्त सिपाही नूं, लग्गी वाले कदे ना सौंदे, बाझ भरावों मारिया, ऐती मार पई कुरलाणे, पुरजा पुरता कटि मरै, तवी तों तलवार तक, उजड़ गए गरां, बारीं कोहीं बलदा दीवा, तरकश टंगिया जंड, गोरख दा टिल्ला, हाजी लोक मक्के वल्ल जांदे, सजरी पैड़ दा रेता, रूह लै गिया दिलां दा जानी, डाची वालिया मोड़ मुहार वे(१५ उपन्यास पंजाबी में)। एक उपन्यास 'जोगी उतर पहाड़ों आए' प्रकाशनाधीन।
तू सुत्तां रब जागदा, ऊँठां वाले बलोच, राजे शींह मुक्कदम कुत्ते, बुड्ढ़े दरिया दी जूह(चार कहानी संग्रह)।
चारे कूटां सून्नीयां(आत्मकथ्य)।
बोदे वाला भलवान, कुल्ली नी फकीर दी विच्चों(व्यंग्य संग्रह)
सच आक्खां ता भांबड़ मचदै(लेख संग्रह)

पुरस्कार/सम्मान
सात गोल्ड मैडल के अलावा 17 भिन्न-भिन्न संस्थाओं की ओर से अचीवमेंट अवार्ड और पंजाबी सथ लांबड़ा की ओर से 'नानक सिंह नावलिस्ट पुरस्कार' से सम्मानित।
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धारावाहिक पंजाबी उपन्यास(किस्त- 35)


सवारी
हरजीत अटवाल
हिंदी अनुवाद : सुभाष नीरव


॥ चालीस ॥
रात में महिमत का फोन आया था कि सवेरे बियर डिलीवर करके जाएगा। आठ-नौ बजे से पहले पहले। उस वक्त ट्रैफ़िक वार्डन भी नहीं होते और बियर भी छिपाकर अन्दर रख ली जाती थी। महिमत यूरोप से स्मगल करके बियर लाता था। यूरोपकी साझी मंडी बन जाने के कारण उस तरफ से ब्रिटेन को काफ़ी मात्रा में बियर, वाइन और व्हिस्की सप्लाई हो रही थी। कैश एंड कैरी से कहीं सस्ता माल मिलता। नहीं तो बड़े-बड़े स्टोरों ने छोटे दुकानदारों की टें बुलवा दी थी। यह दो नंबर का माल ही था जो उन्हें साँस दिला रहा था। माल तो वही था जो कैश एंड कैरी से मिलता था, पर स्मगलर टैक्स पर भी ए.टी. बचाकर उधर से ले आते। अभी इसे रोकने के लिए बहुत सख्त कानून भी नहीं बने थे। यूरोपियन साझी मंडी के अपवाद से निबटने के लिए गवर्नमेंट अभी तैयार जो नहीं थी। अजमेर दो नंबर का माल लेने से बहुत झिझकता था। वह करीब आधी बियर ऐसे खरीद कर बाकी की कैश एंड कैरी से लेकर आता ताकि रसीदें भी पास में सबूत के तौर पर रह सकें। महिमत से वह सौ केस बियर का इकट्ठा फिकवा लेता। जिसमें स्टैला, बडवाइज़र, पिल्ज़ और फौस्टर होंती। एकसाथ सौ केस लेने पर महिमत उसे पच्चीस पैंस एक केस के पीछे और सस्ती दे जाता।
महिमत जल्दी से माल उतारकर पैसे खरे करके चला गया। अजमेर ने अकेले ही सारे केस पीछे वाले स्टोर रूम में टिका दिए। वह पसीने में भीगा पड़ा था। उसको शिन्दे पर रह रहकर गुस्सा आ रहा था कि सतनाम के साथ काम करने जा लगा। इसमें दोष हालांकि सतनाम का अधिक था जो कि उसे यहाँ से ले गया था। शिन्दा भी पहले से ही तैयार बैठा था। शिन्दे को उसके अहसान की कोई कद्र नहीं थी। वह सोच रहा था कि अवसर मिलेगा तो वह उन दोनों को सबक अवश्य सिखाएगा। उसको लगता कि उसके सभी भाई ही अहसान फ़रामोश थे। सब उसके किए को भुलाये बैठे थे।
काम समाप्त करके वह ऊपर चला गया। बच्चे स्कूल जा चुके थे। गुरिंदर शायद नहा रही थी। वह टेलीविज़न के सामने बैठ गया पर दिल नहीं लगा। उसके अन्दर बेचैनी-सी हो रही थी। सौ केस बियर के उठाकर अन्दर रखने ने उसके शरीर को यद्यपि थका दिया था, पर मन स्थिर नहीं था। उसने दस बजने से पहले ही नीचे आकर दुकान खोल ली।
डिंगूमल जैसे दुकान के बाहर खड़ा इसके खुलने का ही इंतज़ार कर रहा था। वैस्ट इंडियन डिंगूमल उसका पुराना ग्राहक था। वह अक्सर उधार ले जाता और पैसे समय से लौटा देता था। अजमेर उधार बहुत कम करता था। यदि करता भी था तो दस पौंड तक का ही करता। वह भी इस प्रकार कि ग्राहक को हर बार दस पैनियाँ अधिक लगा लगाकर उसने अपने दस पौंड पूरे कर लिए होते ताकि यदि ग्राहक भाग भी जाए तो उसको बहुत फ़र्क न पड़े। लेकिन डिंगूमल ऐसा था कि जिसकी सीमा बीस-पच्चीस पौंड तक भी पहुँच जाया करती। डिंगूमल अन्दर घुसा और चार डिब्बे टेनंट के उठाता हुआ बोला-
''ऐंडी, ये लिख लेना।''
''नहीं डिंगूमल अभी मैं उधार नहीं दूँगा।''
''क्यों ?''
''क्योंकि तू मेरा पहला ग्राहक है। पहले कुछ ग्राहक मुझे नकद वाले चाहिएँ।''
''ऐंडी, तेरा उधार लौटाने वाला भी तो मैं ही पहला ग्राहक होता हूँ।''
''लिए हुए माल के ही पैसे देकर जाता है, कोई मुफ्त में तो नहीं पकड़ा जाता।''
''ऐंडी, तू बहुत खराब आदमी है। तू अपने मूड का कैदी है।''
''जो भी है, तू डिब्बे वापस रख दे।''
डिब्बे फेंकता हुआ सा डिंगूमल उसको गालियाँ बकता चला गया। अजमेर दाँत पीसता रहा गया और दुकानदारी के धंधे को कोसने लगा। खराब दिन की शुरूआत के बारे में भी चिंता करने लगा। व्यापारियों वाले छोटे-छोटे वहम वो करने लगता था।
करीब आधे घंटे बाद एक औरत आई। यह परिचित-से चेहरे वाली ग्राहक थी। वह हैलो करते हुए बोली-
''दो बोतलें ब्लैक लेबल और एक सौ रौथमन।''
अजमेर ने दो बोतलें और पाँच डिब्बियाँ सिगरेट की काउंटर पर रख दीं। उस औरत ने क्रेडिट कार्ड निकालकर उसके सामने कर दिया। अजमेर बोला-
''सॉरी मैडम, हम स्प्रिट और सिगरेट पर कार्ड नहीं लेते। बाहर विंडो में भी लिखकर लगा रखा है।''
''क्यों नहीं लेते ?''
''क्योंकि इनमें हमें बचता कुछ नहीं। पाँच परसेंट तो हमारे बैंक वाले ले जाते हैं। हमें इतने भी नहीं बचते और अन्त में पल्ले से पैसे डालकर छूटते हैं।''
''मिस्टर यह तो गैर-कानूनी है।''
''हो सकता है पर यहाँ हम अपने लिए काम करते हैं, न कि लोगों के लिए..., हाँ, यदि वाइन ग्रौसरी चाहिए तो ले जा, बियर भी। पर व्हिस्की-सिगरेटों पर नहीं।''
''पर मुझे तो यही चाहिएँ।''
''सॉरी मैडम।''
''तुझे किस बात की सॉरी। सॉरी तो मुझे है कि जिसके मुल्क में आकर तू मालिक बना बैठा है और मन मर्जी के कानून बना रहा है।'' कहकर वह औरत चल पड़ी और दरवाजे से बाहर निकलते हुए बोली-
''पाकि हरामी, वापस जा।''
यह सुनकर अजमेर भी गालियाँ बकने लगा। औरत तो चली गई पर अजमेर ठगा-सा खड़ा-खड़ा सोचने लगा कि वह कहाँ गलत था। उसने बियर का डिब्बा खोला और बड़े-बड़े कुछ घूंट भरकर एक तरफ रख दिया। बियर ने उसके निराश मन को स्थिर किया। डिब्बा खत्म करते हुए वह सोच रहा था कि यदि बिजनेस करना है तो ऐसे लोगों का सामना भी करना ही पड़ेगा। वह काउंटर के पीछे रखे स्टूल पर बैठा था। उसका दिल करता था कि कुछ बियर और पिये, पर वह जानता था कि बियर उसके जिस्म को निढाल कर देगी। उसके लिए काम करना भी कठिन हो जाएगा। टोनी को अभी ठहर कर आना था। गुरिंदर भी ऊपर घर के काम में लगी हुई थी। उसको फुर्सत नहीं थी। एक ग्राहक दुकान का दरवाजा पार करके अन्दर आया। अजमेर बांहें मारता हुआ इस प्रकार उठा मानो सघन जंगल में से निकल रहा हो। कुछ ग्राहक और आए। अजमेर का मूड कुछ-कुछ बदला, पर पूरी तरह नहीं।
रोटी का वक्त हुआ। गुरिंदर नीचे आई। जैसा कि वह किया ही करती थी कि वह दुकान देखती और अजमेर ऊपर जाकर रोटी खा आता। उसका चेहरा देखकर गुरां कुछ न बोली। संक्षिप्त से शब्दों में सिर्फ इतना कहा कि रोटी किचन में रखी है। अजमेर चला गया।
रोटी खाते हुए अजमेर शॉपिंग के विषय में सोचने लगा कि अगले दिन क्या-क्या चाहिए था। बियर तो आज आ ही गई थी। कल वैन ओवरलोड करने की ज़रूरत नहीं पड़नी थी। फिर लोड, अनलोड करने में भी आसानी रहती। वह नीचे आया तो गुरिंदर फिर भी न बोली और वापस ऊपर चढ़ गई। अजमेर ने स्टॉक रूम में जाकर शीशा देखा। उसको सब बुरा-बुरा लग रहा था। उसने दुकान का चक्कर लगाया और फिर काउंटर पर जा बैठा।
कुछ देर बाद बर्नी आया। बर्नी अजमेर का ऐसा ग्राहक था जो चोरी के क्रेडिट कार्डों पर शॉपिंग करता था। अजमेर दुगने पैसे चार्ज क़र लेता और अपने नफ़े को आसानी से दुगना-तिगना कर लेता। कई बार वह नकद पैसे भी अगले को दे देता। बर्नी जैसे कुछ विश्वसनीय ग्राहक थे जिनके साथ अजमेर ऐसा कर लेता था। क्रेडिट कार्ड वाले बैंक हर दुकानदार की एक सीमा बना देते थे कि उस सीमा से ऊपर की शॉपिंग के लिए दुकानदार बैंक को फोन करके एक रेफ्रेंस नंबर लेता, जिस कारण भुगतान यकीनी बन जाता। बहुत से कार्ड ऐसे ही होते कि चोरी होने के बाद एकदम ही उपयोग में लाए जा सकते थे जब तक कि उनके मालिक चोरी या गुम होने की बैंक के पास शिकायत न कर देते। इसके बाद तो बैंक उस कार्ड के हर भुगतान पर रोक लगा देता था। चोर और दुकानदार की मिली भगत से ही हेराफेरी परवान चढ़ती थी। अजमेर काफ़ी देर तक करता रहा था यह काम, तब तक जब तक बैंक का एक कर्मचारी आकर उसे यह चेतावनी नहीं दिया गया था कि उसकी दुकान से संबंधित बड़े भुगतान अधिकतर चोरी वाले ही होते हैं। अगर दुबारा ऐसा हुआ तो इसकी इन्क्वारी हो सकती थी। अजमेर अपना नाम बदनाम तो किसी भी कीमत पर नहीं होने देना चाहता था। उसने चोरी के क्रेडिट कार्ड लेने एकदम बन्द कर दिए।
बर्नी आया। उसने एक क्रेडिट कार्ड निकालकर अजमेर के सामने रख दिया। अजमेर तुरन्त बोला-
''बनी, नहीं यह कार्ड मैं मंजूर नहीं कर सकता। तू तो जानता ही है कि मेरी इन्क्वारी होने को फिरती है।''
''ऐंडी, मुझे सब पता है। तू मेरा साथी है, मैं तेरे लिए कोई मुसीबत थोड़ा खड़ी करूँगा। यह कार्ड मेरा अपना है।''
''तेरा कार्ड किस बैंक ने बना दिया ?''
''इस बात से तुझे क्या ? फिर मुझे शॉपिंग भी तेरी लिमिट में रहकर ही करनी है।''
''नहीं बर्नी, मैं अब कोई रिस्क नहीं ले सकता।''
''क्यों ?''
''क्योंकि अन्दर जाने का मेरा कोई शौक नहीं है।''
''सेफ मैन सेफ।''
''सॉरी बर्नी, बिलकुल नहीं।''
''यू श्योर ?''
''हाँ।''
''ऐंडी, तूने मेरे कारण हजारों पौंड कमाये हैं। तू अगर बग़ैर पैसे लिए ही कुछ सामान मुझे दे दे तो भी तू घाटे में नहीं।''
''यह भी ठीक है। मैंने बहुत चांस ले लिए, अब नहीं।''
''ऐंडी, तू बहुत बड़ा हरामी है।''
''बर्नी, तेरे से अभी भी छोटा हूँ।''
बर्नी आगे बढ़ा और काउंटर के ऊपर से अपनी लम्बी बांह बढ़ाकर उसने अजमेर की कमीज़ का गला पकड़ लिया। पूरे ज़ोर से उसे हिलाते हुए धक्का मारकर पीछे फेंक दिया और गंदी गालियाँ बकता हुआ बाहर निकल गया।
अजमेर पगड़ी संभालता हुआ उठा और कोने में पड़ी हॉकी जो ऐसे अवसरों के लिए रखी हुई थी, लेकर बाहर निकला। बर्नी दूर जा चुका था। अजमेर फटी हुई कमीज़ को ठीक करता हुआ काउंटर के पीछे आ खड़ा हुआ।
(जारी…)
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लेखक संपर्क :
67, हिल साइड रोड,
साउथाल, मिडिलसेक्स, इंग्लैंड
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शुक्रवार, 11 फ़रवरी 2011

गवाक्ष – फरवरी 2011


जनवरी 2008 “गवाक्ष” ब्लॉग के माध्यम से हम हिन्दी ब्लॉग-प्रेमियों को विदेशों में रह रहे हिन्दी/पंजाबी के उन लेखकों/कवियों की समकालीन रचनाओं से रू-ब-रू करवाने का प्रयास करते आ रहे हैं जो अपने वतन हिन्दुस्तान से कोसों दूर रहकर अपने समय और समाज के यथार्थ को अपनी रचनाओं में रेखांकित कर रहे हैं। “गवाक्ष” में अब तक विशाल (इटली), दिव्या माथुर (लंदन), अनिल जनविजय (मास्को), देवी नागरानी(यू.एस.ए.), तेजेन्द्र शर्मा(लंदन), रचना श्रीवास्तव(लंदन), पूर्णिमा वर्मन(दुबई), इला प्रसाद(यू एस ए), भगत धवन (डेनमार्क), चाँद शुक्ला (डेनमार्क), वेद प्रकाश ‘वटुक’(यू एस ए), रेखा मैत्र (यू एस ए), तनदीप तमन्ना (कनाडा), प्राण शर्मा (यू के), सुखिन्दर (कनाडा), सुरजीत(कनाडा), डॉ सुधा धींगरा(अमेरिका), मिन्नी ग्रेवाल(कनाडा), बलविंदर चहल (न्यूजीलैंड), बलबीर कौर संघेड़ा(कनाडा), शैल अग्रवाल (इंग्लैंड), श्रद्धा जैन (सिंगापुर), डा. सुखपाल(कनाडा), प्रेम मान(यू.एस.ए.), (स्व.) इकबाल अर्पण, सुश्री मीना चोपड़ा (कनाडा), डा. हरदीप कौर संधु(आस्ट्रेलिया), डा. भावना कुँअर(आस्ट्रेलिया), अनुपमा पाठक (स्वीडन) आदि की रचनाएं और पंजाबी कथाकार-उपन्यासकार हरजीत अटवाल के उपन्यास “सवारी” के हिंदी अनुवाद की तैंतीसवीं किस्त आपने पढ़ीं। “गवाक्ष” के फरवरी 2011 अंक में प्रस्तुत हैं – संयुक्त अरब इमारात से पूर्णिमा वर्मन की कविताएं तथा हरजीत अटवाल के धारावाहिक पंजाबी उपन्यास “सवारी” की चौंतिसवीं किस्त का हिंदी अनुवाद…

यू.एस.ए. से
सुदर्शन 'प्रियदर्शिनी' की कविताएँ

जीवन

वह भीड़ भरी
जिंदगी
वह कन्धे से कन्धे
छिलते हुये तन
वह उठे हुये भीड़ में चेहरे
वह असंख्य
हिलती हुई
मुंडियां
वे अभावों में
घिरे हुये घर
वह पँक्तियों में
लगी हुई
राशन की दुकानों
पर भीड़
वह जीने के
संघर्ष में की गई
एक एक दौड़
वह सुबह से सांझ तक
कुछ नया कर आने का
पूरा पन
मुझे आज भी भरता है…

वह शिद्दत के बाद
मिली हुई
थोड़ी- सी रहमत
वह ब्याही दुल्हन की
पहली रात का
नया नवेला आभास
वह उम्र भर
एक तार में बंध कर
उम्र भर की
चादर बुन
जाने का भरापन
वे छोटे छोटे
घरों में होने वाले तर्क
वह अधिकार एवं स्नेह
के बीच लड़े हुये
खेलों की तरह
जीत और हार
की अनुभूति
वह बसों में चढ़ते उतरते
भीड़ की रेल-पेल
जीवन को जीने की
पूरी चाहत से
भर देते हैं…

इस सागर की
तरह भरे हुये
पर ठहरे हुये
जीवन
जिस में छोटी-छोटी
मछलियों का
क्रिया-कलाप नहीं
जिस में चांदनी रात में
अनबिछी खाट पर
पढ़े हुए चांद को
साथ-साथ ताकने का
सुख नहीं
जिस में छोटी-छोटी
बातों का नहीं
बड़ी- बड़ी प्रलयों का
अहसास भरा हो
ऐसा सुख अन्दर कहीं
गहरे अभावों से
भर देता है …

धीरे-धीरे
स्वयं फल को
पकते देख कर
जीवन के आगे
बढ़ने का सुख
इन छलांगों के
सुख से
कहीं बड़ा लगता है
आज फिर न जाने क्यों
उन धूल-धूसरित
अपने से चेहरों में
खो जाने
का मन करता है।
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बुत

कहते हैं
शरीर नहीं
रहता
पार्थिव है
जल, वायु, व्योम
अग्नि और
मिट्टी से बना है

पर
कहीं न कहीं
एक बुत
रह जाता है

एक अशरीरी
छवि-सा
तुम्हारी प्रकृति
तुम्हारे
आचार विचार
व्यवहार से
लिपा-पुता
किन्हीं
आँखों में…
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अकेले

मैंने
अपने से अलग
अपने घावों
अपनी रिसती
बिवाइयों
गले की फाँस बनी
विसंगतियों
दम घोंट
देने वाली
वे सारी
व्यथाओं की
एक पोटली बांध कर
अलग अलगनी पर
टांग दी है
ताकि जब तुम
आओ तो
ले चलो
मुझे अकेले
निःसग
उन सब से
परे
निःस्वच्छ
स्फटिक लोक
में अकेले…
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सुदर्शन 'प्रियदर्शिनी'
जन्म - लाहौर अविभाजित भारत. शिक्षा पी.एचड़ी हिन्दी. अनेक वषों तक भारत में शिक्षण कार्य किया.
अमरीका में 1982 में आई तब से लेखन लगभग बंद रहा. अब पिछले दो तीन सालों से भारत की पत्रिकाओं में छपने लगी हूं.अमरीका में रह कर भारतीय संस्कृति पर आधारित लगभग दस साल तक पत्रिका निकाली. टी वी प्रोग्राम एंव रडियो प्रसारण भी किया. अब केवल स्वतंत्र लेखन.
पुरस्कार
महादेवी पुरस्कार - हिन्दी परिषद टोरंटो, कनाडा
महानता पुरस्कार - फ़ेडरेशन ऑफ इंडिया, ओहायो
गर्वनस मीडिया पुरस्कार- ओहायो,यू एस ए
प्रकाशित रचनायें - उपन्यास -रेत के घर(भावना प्रकाशन), जलाक (आधारशिला प्रकाशन), सूरज नही उगेगा (बिशन चंद एंड संस)
कविता संग्रह - शिखंडी युग (अर्चना प्रकाशन), बराह (वाणी प्रकाशन), यह युग रावण है (अयन प्रकाशन), मैं कौण हां (पंजाबी में-चेतना प्रकाशन)
कहानी संग्रह - उत्तरायण (प्रकानाधीन)
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सुदर्शन प्रियदर्शिनी
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