रविवार, 19 जून 2011

गवाक्ष – जून 2011



जनवरी 2008 “गवाक्ष” ब्लॉग के माध्यम से हम हिन्दी ब्लॉग-प्रेमियों को विदेशों में रह रहे हिन्दी/पंजाबी के उन लेखकों/कवियों की समकालीन रचनाओं से रू-ब-रू करवाने का प्रयास करते आ रहे हैं जो अपने वतन हिन्दुस्तान से कोसों दूर रहकर अपने समय और समाज के यथार्थ को अपनी रचनाओं में रेखांकित कर रहे हैं। “गवाक्ष” में अब तक विशाल (इटली), दिव्या माथुर (लंदन), अनिल जनविजय (मास्को), देवी नागरानी(यू.एस.ए.), तेजेन्द्र शर्मा(लंदन), रचना श्रीवास्तव(लंदन), पूर्णिमा वर्मन(दुबई), इला प्रसाद(यू एस ए), भगत धवन (डेनमार्क), चाँद शुक्ला (डेनमार्क), वेद प्रकाश ‘वटुक’(यू एस ए), रेखा मैत्र (यू एस ए), तनदीप तमन्ना (कनाडा), प्राण शर्मा (यू के), सुखिन्दर (कनाडा), सुरजीत(कनाडा), डॉ सुधा धींगरा(अमेरिका), मिन्नी ग्रेवाल(कनाडा), बलविंदर चहल (न्यूजीलैंड), बलबीर कौर संघेड़ा(कनाडा), शैल अग्रवाल (इंग्लैंड), श्रद्धा जैन (सिंगापुर), डा. सुखपाल(कनाडा), प्रेम मान(यू.एस.ए.), (स्व.) इकबाल अर्पण, सुश्री मीना चोपड़ा (कनाडा), डा. हरदीप कौर संधु(आस्ट्रेलिया), डा. भावना कुँअर(आस्ट्रेलिया), अनुपमा पाठक (स्वीडन), शिवचरण जग्गी कुस्सा(लंदन), जसबीर माहल(कनाडा) आदि की रचनाएं और पंजाबी कथाकार-उपन्यासकार हरजीत अटवाल के उपन्यास “सवारी” के हिंदी अनुवाद की सैंतीसवीं किस्त आपने पढ़ीं। “गवाक्ष” के जून 2011 अंक में प्रस्तुत हैं – अमेरिका से हिंदी कवयित्री मंजु मिश्रा की कविताएँ तथा हरजीत अटवाल के धारावाहिक पंजाबी उपन्यास “सवारी” की अड़तीसवीं किस्त का हिंदी अनुवाद…

कैलिफोर्निया(यू.एस.ए.) से
मंजु मिश्रा की पाँच कविताएँ

परिंदा होना ही कोई शर्त तो नहीं

ऊँचाइयों तक उड़ने के लिए
परिंदा होना ही कोई शर्त तो नहीं
सपनों का आकाश,
और कल्पनाओं के पंख
कुछ कम तो नहीं
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टुकड़ा-टुकड़ा सी धूप

ज़िन्दगी किन अजीब राहों से
जाने कब-कब कहाँ से गुजरी है
जैसे कच्चे मकान की छत से,
टुकड़ा-टुकड़ा सी धूप उतरी है
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खुद को पर्वत समझते हैं

कहने दो उन्हें - जो कुछ और कहते हैं,
तुम !
उनसे हज़ार गुना बेहतर हो,
जो, दूसरों के कन्धों को
सीढ़ी बनाकर,
ऊपर चढ़ते हैं,
और फिर
सीना तान कर
खुद को पर्वत समझते हैं।
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मैं

मै,
एक,
रास्ते का मील पत्थर !
जाने कितने,
युग आए, और चले गए
मैं आज भी,
जहाँ जैसा था वैसा ही हूँ स्थिर ।
इस स्थायीत्व की पीड़ा, कोई क्या जानेगा
अपने घर आप प्रवासी बनना कोई क्या जानेगा
हम यहीं खड़े कितना भटके,
बहती नदिया का पानी क्या जानेगा ।
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मै एक पत्ता
मै एक पत्ता ....
शाख पर रहूँ ,
या शाख से अलग
क्या फर्क पड़ता है !
टूटा तो भी सूखा
न टूटता तो भी सूखता
मुझे तो अपनी जड़ से उखाड़ना ही था !
हाँ, अगर किसी किताब के पन्ने मे, दबा होता
तो...
शायद कभी इतिहास की तरह
उल्टा-पुल्टा जाता
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मंजु मिश्रा
जन्म : 28 जून 1959, लखनऊ(उत्तर प्रदेश)।
शिक्षा : एम. ए.(हिन्दी)
सृजन : कविताएँ, हाइकु, क्षणिकाएँ, मुक्तक और ग़ज़ल।
सम्प्रति : व्यापार विकास प्रबंधक, कैलिफोर्निया (यू.एस.ए.)
ब्लॉग : http://manukavya.wordpress.com
ईमेल : manjushishra@gmail.com

धारावाहिक पंजाबी उपन्यास(किस्त- 38)



सवारी
हरजीत अटवाल

हिंदी अनुवाद : सुभाष नीरव

॥ तेंतालीस ॥

इतवार की दोपहर। मौसम यद्यपि बढ़िया नहीं था, पर फिर भी हाउस खचाखच भरा पड़ा था। एक बड़ा टेबल तो अजमेर वगैरह ही घेरे बैठे थे। कल वह इंडिया से वापस लौटा था और आज सभी मिलने आ गए थे। गुरिंदर के पामर्ज़ ग्रीन से रिश्तेदार सामान लेने आए हुए थे। दो ग्रामीण भी वहाँ से गुज़रते हुए आ गए थे। सतनाम, मुनीर और प्रेम शर्मा भी थे। बलदेव भी था। अजमेर अपने इंडिया में हुए अनुभव साझे कर रहा था। विवाह में उसकी अच्छी-खासी शोभा हुई थी। वहाँ लोग आमतौर पर कहते सुने जाते थे कि लड़की का मामा विवाह करने के लिए विलायत से आया है। विवाह में हिस्सा बेशक सतनाम और शिन्दे ने भी डाला था, पर सारा श्रेय अजमेर के खाते में ही चढ़ गया। बलदेव से दुखी होकर ही अजमेर इंडिया गया था, क्योंकि उसने कोई पैसा इस विवाह के लिए नहीं दिया था। उसने बहाना बना दिया था कि वह फ्लैट ले रहा है और उसके पास पहले ही पैसे की कमी हो रही थी। अब पब में बैठते ही मुनीर ने अजमेर की तारीफ़ों के पुल बांध कर उसको बियर खरीदने लायक कर रखा था। सतनाम और मुनीर की यह बात निरी मिरासीपना लगती। वह मुनीर पर खीझा पड़ा था, पर चुप था।

लेकिन सतनाम ने मुनीर को तंग करने के लिए वांगली वाली बात फिर शुरू कर दी। मुनीर इतने देर बाद भी अपनी बात पर अड़ा बैठा था। सतनाम अपने 'ना मानूँ' वाले अंदाज में खुश था। बलदेव को मुनीर कहने लगा-

''ले यारा, ये तो अनपढ़ लाणा ही है, तू बता क्या मैं गलत होसी ?''

''मीयां, उन प्लेयरों में मुकाबला तो है, डायरेक्ट या इनडायरेक्ट... उन दोनों में से तेज़ धीमे तो होंगे ही... यह भी हो सकता है कि उनका मकसद वांगलू फाड़ने का न हो, पर उनका मुकाबला वांगलू के फटने पर आकर खत्म होता हो।''

''यही तो मैं कह रहा था, प्लेयर एक दूसरे की ओर वेखसण और ताकत फड़सन, पर अजीब बात यह होसी कि अगर वांगलू न फटे तो दोनों हार मनसण, अगर फट गया तो दोनों जितसण। इनाम शिनाम दोनों को एक जैसा होसी।''

''मीयां, वांगलू ने तो फटना ही फटना है। आदमी अपनी आई पर आ जाए तो वांगलू क्या चीज़ है।''

''बलदेव, यह बात एक गेम की होसी ना कि आदमी की ताकत की...।''

फिर किसी ने बोर होते हुए पंजाब की सियासत के बारे में बात छेड़ दी। अजमेर जगह-जगह पुलिस के नाकों की बातें बताने लगा और नाकों पर होती ज्यादतियों की भी। मुनीर ने कहा-

''भाई जान, यह बताओ कि खालिस्तान कब बणसी ?''

''मीयां, खालिस्तान तुम्हारे जेहनों में ही बणसी।''

अजमेर की बात पर सभी हँस पड़े। मुनीर को लगा कि अजमेर झूठ बोल रहा था और वह कम्युनिस्टों का हमदर्द होने के कारण संकीर्ण सोच रखता था। मुनीर कहने लगा-

''असल में तुम्हारा ताया तुम्हें उल्टी दिशा में जो डाल गया होसी।''

दो बजे दुकान बन्द करके शिन्दा भी आ गया। वह पब में कम ही आया करता था, पर आज मेहमानों के आया होने के कारण अजमेर उसको आने के लिए कह आया था। शिन्दे को देखते ही प्रेम शर्मा ने कहा-

''शिन्दे से पूछ लो वांगली के बारे में।''

पास से ही सतनाम बोला, ''शिन्दे को वांगली बारे नहीं, बांगण के बारे में पता है।''

सभी हँसे। मुनीर कहने लगा-

''शिन्दा तो हमारा बहुत शरीफ भ्रा होसी, बिलकुल वांगलू की तरह !''

एक बार फिर हँसी बिखर गई। पब बन्द करने की घंटी बार-बार बज रही थी। वे सभी एक दूसरे को अलविदा कहते हुए उठे और वहीं से अपनी-अपनी राह पर पड़ गए। पामर्ज़ ग्रीन वाले रिश्तेदार दसेक मिनट घर आकर बैठे और फिर वे भी चले गए। अब वे चारो भाई ही रह गए थे। बोतल खुली पड़ी थी। जल्दी ही नीचे चली गई। अजमेर ने शिन्दे से कहा-

''जा, लीटर वाली ही उठा ला।''

शिन्दा उठकर गया तो सतनाम बोला-

''भाई, मिंदो भाभी ने अच्छी सेवा की लगती है।''

अजमेर मुस्कराया और उसके चेहरे का रंग उसकी पगड़ी के रंग जैसा बिस्कुटी हो गया। सतनाम ने बलदेव को आँख मारकर बोला-

''तुझे बहुत कहा था, पर तू गया नहीं। नहीं तो भाई वाली सेवा तेरी होनी थी... पर तुझे अब गोरियों की आदत पड़ गई है।''

अजमेर उसकी बात काटते हुए बलदेव से कहने लगा-

''तेरे बारे में सभी फिक्र करते हैं, बंसो बहन ने तेरे लिए कितनी ही लड़कियाँ देख रही हैं, एक बार जा तो सही, अब तो तूने फ्लैट ले लिया है।''

सतनाम ने अजमेर की बात की हामी भरी और कहा-

''मैं तो इसे यही समझाता हूँ कि गोरी औरतें तो रबड़ होती हैं, रबड़ चबाने से पेट नहीं भरते।''

शिन्दा बोतल ले आया। मनजीत और गुरिंदर भी उनके बीच आ बैठीं। गुरिंदर बोली-

''यह तो भाइयों की खास मीटिंग लगती है।''

''जट्टी ! तेरे लाडले को समझाने बैठे हैं कि विवाह करवा ले, नहीं तो छड़े को तो भाई भी बुलाना छोड़ देते हैं, गड़बड़ से डरकर। हाँ, तुझे बताऊँ !''

बलदेव भी जवाब देने के मूड में आ गया और कहने लगा-

''मैं तो कुछ और ही देखता-सुनता आया हूँ कि अपने तो ब्याहते ही एक भाई को थे, भाभी के तीन-चार तो वैसे ही होते थे, पर यहाँ तुम तीन-तीन विवाहित होकर मुझ एक को ही फालतू बनाये जाते हो।''

सभी हँसने लगे। सतनाम बोला-

अरे ओ रांझे, तेरे में हिम्मत नहीं, तू लक्ष्मण की तरह देखता है पैरों की तरफ। देख, ये बैठी है माधुरी दीक्षित, कभी इसकी तरफ सीधा झांक कर भी दिखा।''

''रोयेगा सतनाम सिंह, रोयेगा, जिस दिन माधुरी दीक्षित को पता चलेगा कि उसने इतने साल गुलशन ग्रोवर के साथ ही काट लिए और सन्नी देओल तो इधर घूमता है तो तू बहुत रोयेगा।''

चारों ओर हँसी का ठहाका बिखर गया। बच्चों को उनकी बातों की कोई समझ नहीं आ रही थी। शैरन उठकर आई और गुरिंदर से पूछने लगी-

''मॉम, वट'स दा जोक ?''

''कुछ नहीं, अपने चाचा से पूछ ले।''

शैरन बलदेव की तरफ जाते हुए बोली'

''वट'स दा जोक चाचा जी ?''

''यू कांट गैट इट, इट'स इंडियन साईकी'ज़ जोक।''

मनजीत ने अजमेर से कहा-

''भाजी, हमें भी कोई इंडिया की बात सुनाओ।''

''हाँ, मैं गागू को लेकर तुम्हारे गाँव भी गया था, मिंदो के गाँव भी। लगभग सबसे मिलकर आया हूँ।''

''विवाह कैसा हुआ ?''

''विवाह बढ़िया हो गया। लड़का टीचर और लड़की भी।''

''गागू तो अब बड़ा हो गया होगा ?''

''पन्द्रहवें में है, मोटर साइकिल दौड़ाये फिरता है, ट्रैक्टर भी। ट्रैक्टर तो मैंने बिकवा दिया, पैसे मिंदों के नाम रख दिए हैं। सोचा कि अगर ज़रूरत पड़ गई तो फिर ले लेंगे।''

सतनाम पूछने लगा-

''गागू मुंडीर(लड़कों की टोली) में तो नहीं बैठता। किसी गलत सोसायटी में न हो, पीला पटका ही न बांधे घूमता हो।''

''वो तो सारा पंजाब मारे डर के बांधे घूमता है। जिधर जाओ, पीली चुन्नी या पीली पगड़ी। पर ये सब टेम्परेरी है। मैं गागू को समझाकर आया हूँ कि वह जितना चाहे पढ़े और फिर घर को संभाले। लड़कियाँ बराबर की हो चली हैं।''

शिन्दा उसकी बातें सुन सुनकर खुश हो रहा था। धीरे-धीरे सभी को व्हिस्की को असर होने लगा। पहले पब में भी पीकर आए थे। अजमेर बोला-

''आज तुम सभी इकट्ठे बैठे हो, बलदेव के साथ बात करो, पूछो कि यह क्या चाहता है ? हमारे संग शामिल क्यों नहीं होता?''

''भाजी, शामिल, शामिल कैसे नहीं मैं... शामिल हूँ तभी तो बैठा हूँ।''

''यह बैठना भी कोई बैठना हुआ, हम सबका कहना मान। यह देख इतने बन्दे बैठे हैं, पूरा टब्बर, ये जो फैसला कर दे, वहाँ खड़ा हो... विवाह करवा, रैडिंग वाली लड़की अच्छी-भली थी। कोई दूसरी देख देते हैं, नहीं तो इंडिया ही हो आ।''

कहकर अजमेर ने गुरिंदर की ओर और फिर बार-बार सबकी ओर देखा। सभी उससे सहमत थे। बलदेव बोला-

''भाजी, मुझे भी अकेले घूमना अच्छा नहीं लगता, पर हर बात का अपना हिसाब होता है और हर बात अपना टाइम लेती है।''

''चल, ये तेरा पर्सनल मामला है। दूसरी बात जो ज्यादा इम्पोर्टेंट है वो यह कि तू घर के किसी कार्य-व्यवहार में हमारे साथ नहीं खड़ा होता, हमेशा ही भागता है।''

''यह तो भाजी, तुम्हारा मुकाबला करना मेरे लिए मुश्किल है। तुम हो दोनों बिजनेस मैन और मेरी छोटी सी नौकरी है जिसमें मेरा गुज़ारा ही बड़ी मुश्किल से होता है।''

''अगर मुश्किल होता है तो नौकरी छोड़कर बिजनेस कर ले। उस वक्त कितना अच्छा मौका तूने गवां दिया, तुझे मैं लेकर दे रहा था वो गोरे वाली शॉप।''

''भाजी, यह अहसान मुफ्त में मेरे सिर न चढ़ाओ। तुम मुझे नहीं लेकर दे रहे थे, तुम तो हिस्सा डालकर मुझे तनख्वाह पर रखना चाहते थे। तनख्वाह तो मैं अब भी ले रहा हूँ।''

बलदेव की इस बात ने अजमेर को गुस्सा दिला दिया। लेकिन वह चुप रहा। सतनाम को पता था कि यह चुप साधारण नहीं थी। उसने बात को संभालने के लिए कहा-

''तनख्वाह को तू खर्च कहाँ करता है ? गोरियों की गिनती कम कर दे।''

''गोरियों के लिए मैं क्या महाराजा पटियाला हूँ।''

''पता नहीं साली क्या बात है तेरे में... मैं तेरे से ज्यादा सुन्दर हूँ, मेरे ऐनक भी नहीं लगी, इतने साल हो गए मेरे पर कोई गोरी नहीं मरी।'' सतनाम हैरानी प्रकट करते हुए कह रहा था।

अजमेरे ने अपना पैग एक साँस में पिया और बोला-

''दैट्स योर आउन प्रॉब्लम्ज़... मेरी बात यह है कि मैंने इसके संग एक ही बात करनी है। मैं इसका हिसाब कर देता हूँ। यह अपना हिस्सा दे, और दे भी अभी ही।''

''कौन सा हिसाब ?''

''भाइये के फ्यूनरल का, उस वक्त बंसे को पैसे भेजे, अब ब्याह किया, सबने हिस्सा डाला, तूने पैनी नहीं दी। पहले यह हिस्सा दे और आने वाले सब खर्चे जो इंडिया के हैं, वे भी देने पड़ेंगे। अपने शेयर से तू भाग नहीं सकता।''

''भाजी, मैं अफोर्ड नहीं कर सकता। फिर मुझे ये खर्च इतने ज़रूरी नहीं लगते। भाइये के फ्यूनरल के लायक तो उसकी पेंशन आती थी, बंसो बहन का हम सारी उम्र बोझ नहीं उठा सकते... तुम ब्याहे गए हो, बड़े बने हो तो खर्च भी कर दो। मैंने अभी-अभी फ्लैट लिया है, मेरे पास फिजूल खर्च करने के लिए कोई पैसा नहीं।''

''सौ बातों की एक बात, अगर हमारा भाई है तो यह हिस्सा हर हालत में देना पड़ेगा, नहीं तो...।''

''नहीं तो क्या ?''

''वो दरवाज़ा है और वो सीढ़ियाँ।''

(जारी…)

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लेखक संपर्क :

67, हिल सैद रोड,

साउथाल, मिडिलसेक्स, इंग्लैंड
दूरभाष : 020-85780393,07782-265726(मोबाइल)

शनिवार, 21 मई 2011

गवाक्ष – मई 2011



जनवरी 2008 “गवाक्ष” ब्लॉग के माध्यम से हम हिन्दी ब्लॉग-प्रेमियों को विदेशों में रह रहे हिन्दी/पंजाबी के उन लेखकों/कवियों की समकालीन रचनाओं से रू-ब-रू करवाने का प्रयास करते आ रहे हैं जो अपने वतन हिन्दुस्तान से कोसों दूर रहकर अपने समय और समाज के यथार्थ को अपनी रचनाओं में रेखांकित कर रहे हैं। “गवाक्ष” में अब तक विशाल (इटली), दिव्या माथुर (लंदन), अनिल जनविजय (मास्को), देवी नागरानी(यू.एस.ए.), तेजेन्द्र शर्मा(लंदन), रचना श्रीवास्तव(लंदन), पूर्णिमा वर्मन(दुबई), इला प्रसाद(यू एस ए), भगत धवन (डेनमार्क), चाँद शुक्ला (डेनमार्क), वेद प्रकाश ‘वटुक’(यू एस ए), रेखा मैत्र (यू एस ए), तनदीप तमन्ना (कनाडा), प्राण शर्मा (यू के), सुखिन्दर (कनाडा), सुरजीत(कनाडा), डॉ सुधा धींगरा(अमेरिका), मिन्नी ग्रेवाल(कनाडा), बलविंदर चहल (न्यूजीलैंड), बलबीर कौर संघेड़ा(कनाडा), शैल अग्रवाल (इंग्लैंड), श्रद्धा जैन (सिंगापुर), डा. सुखपाल(कनाडा), प्रेम मान(यू.एस.ए.), (स्व.) इकबाल अर्पण, सुश्री मीना चोपड़ा (कनाडा), डा. हरदीप कौर संधु(आस्ट्रेलिया), डा. भावना कुँअर(आस्ट्रेलिया), अनुपमा पाठक (स्वीडन), शिवचरण जग्गी कुस्सा(लंदन), जसबीर माहल(कनाडा) आदि की रचनाएं और पंजाबी कथाकार-उपन्यासकार हरजीत अटवाल के उपन्यास “सवारी” के हिंदी अनुवाद की छत्तीसवीं किस्त आपने पढ़ीं। “गवाक्ष” के मई 2011 अंक में प्रस्तुत हैं – अमेरिका से हिंदी की चर्चित कवयित्री रेखा मैत्र की कविताएँ तथा हरजीत अटवाल के धारावाहिक पंजाबी उपन्यास “सवारी” की सैंतीसवीं किस्त का हिंदी अनुवाद…



अमेरिका से
हिंदी कवयित्री रेखा मैत्र की कुछ कविताएँ


बेशर्म के फूल
अजीब –सा लगा था ये नाम
पहले जब सुनने में आया
उससे मिलने पर महसूस हुआ
बड़ी समानता थी, उन फूलों के उसकी !

ज़िन्दगी ने तो उसे रौंद-रौंद डाला था
कभी हालात उसे रास नहीं आए
कभी वो हालातों को
हार तब भी नहीं मानी उसने
खिलती रही, इतराती रही
जैसे वो ज़िन्दगी को
अँगूठा दिखा रही हो !

“मुझे कुचलो तो जानूँ
मैं हूँ बेशर्म का फूल !”
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पतंग
पतंग हूँ तुम्हारी मैं
पहले तो शानदार चटख
रंग से तुमने सजाया मुझे

हवा में तुम्हारे
धागे के सहारे
ऊँचे बहुत ऊँचे
जब उड़ने लगी
अपने सौंदर्य पर
मन में इतराने लगी!

तभी अचानक
एक अदृश्य डोर आई
और मैं ज़मीन पर आ गिरी !

तब ख़याल आया
अरे, डोर तो मेरी
तुम्हारे ही पास थी!
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ठिकाना
तुम पूछते हो मेरा ठिकाना
मैं हूँ आँधी में उड़ा तिनका
तुफ़ान आया तो तिनका उड़ा
और थमा तो वो रुक गया
कभी लम्बे समय तक
ये स्थिर रहा अगर
तो मैं भी वहीं बस जाऊँगी
न हुआ, तो तूफ़ान को ही
अपना घर बना लूँगी!
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चित्रकार
इस छोटे से तालाब को
अपना कैनवस बनाकर
आस-पास उगे दरख़्तों को
पानी पर ज्यों का त्यों उतार दिया तुमने !

जल पर पड़े बादलों के
बिम्ब को सुनहरी किरणों की
तुलिका से कुछ ऐसे आँका
जैसे किसी नौजवान ने अपने
केशों को हाईलाइट किया हो!

पोखर के चारों ओर खिले
‘ब्लीडिंग हार्ट’ कुछ यूँ दीखे
मानो महुए के फूलों ने
ढेर सी शराब पी ली है
उसके नशे से आँखे ही नहीं
समूचा जिस्म लाल हो आया है!

एक तुम हो जो पानी पर भी
चित्र खींच देते हो
एक मैं हूँ जो क़ाग़ज पर भी
नहीं उतार पाती !
अनौखे चित्रकार हो तुम…!
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बहुरुपिया बादल
हर बार एक अलग
रूप धर लेते हैं मेरे आसपास !
कभी ‘केयर बेयर’ की तरह
मुझे गले लगाने को व्याकुल
अपनी बाँहें फैलाए
मुझे बुलाते-से
और कभी, नन्हे फरिश्ते बन
पंख लगाकर उड़ने को बेताब से!

कभी तो लगा है-
जैसे किसी धुनिए ने
ढेर-सी रुई धुनक दी है
सारे आकाश के लिए
एक बड़ी-सी रज़ाई
बनाने के ख़याल से

और…
अब, वहाँ इंद्रधनुष दीखा है
लगता है-
इंद्रधनुष का तकिया
सरहाने रखकर
बादलों का लिहाफ़ ओढ़ लूँ
फिर दुनिया की तमाम
तकलीफ़ों को उड़न-छू कर दूँ !
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(सभी कविताएँ ‘वाणी प्रकाशन’ से प्रकाशित कविता संग्रह “बेशर्म के फूल” से साभार)

बनारस में जन्मी रेखा मैत्र ने एम ए (हिंदी) तक की शिक्षा सागर विश्वविद्यालय, मध्यप्रदेश से ग्रहण की। विवाह के बाद सन 1978 में यू एस ए प्रस्थान। रेखा जी शिकागो में रहते हुए वहाँ की जानी-मानी साहित्यिक संस्था “उन्मेष” की सदस्य रही हैं। वाणी प्रकाशन, नई दिल्ली से इनके अब तक आठ कविता संग्रह प्रकाशित हो चुके हैं जिनमें हाल में वर्ष 2008 में “ढ़ाई आख़र” और “मुहब्बत के सिक्के” कविता संग्रह भी शामिल हैं। इनकी अपनी एक वेब साइट है- www.rekhamaitra.com
संपर्क : 12920, Summit Ridge Terrace,
Germantown, MD 20874
फोन : 301-916-8825
ई-मेल :
rekha.maitra@gmail.com

धारावाहिक पंजाबी उपन्यास(किस्त- 37)





सवारी

हरजीत अटवाल
हिंदी अनुवाद : सुभाष नीरव

॥ बयालीस ॥
गुरिंदर ने सबसे बढ़िया सूट निकालकर प्रैस किया और पहनकर देखा। उसने बालों का जूड़ा बनाया। उसकी गर्दन और भी लम्बी लगने लग पड़ी। उसने गर्दन पर झुर्रियों वाली ख़ास क्रीम मली। गहरे रंग का मेकअप किया। इतना वक्त लगाकर वह पहले कभी तैयार नहीं हुई थी। ऐसा दिन भी पहले कभी नहीं आया था। वह बलदेव के संग बाहर जा रही थी। इस दिन की उसको हसरत तो थी पर उम्मीद नहीं थी। उस दिन रैडिंग जाते हुए उसे कुछ घंटे बलदेव के संग बिताने का अवसर मिल गया था और आज तो पूरा दिन ही बिताएँगे।
अजमेर इंडिया गया हुआ था। उसका जल्दबाजी में प्रोग्राम बन गया था। बंसों ने अपनी बेटी के विवाह की तारीख़ पक्की करके ही चिट्ठी डाली थी। उतावली-सी में अजमेर तैयारी करने लग पड़ा था। शिन्दे को पुन: उसने दुकान में बुला लिया था, साथ में टोनी को पूरा दिन काम करना था। ऊपर से गुरिंदर तो थी ही, साथ ही साथ बलदेव की भी चक्कर लगाने की ड्यूटी लगा गया था। दुकानों में सो तरह की इमरजैंसी पड़ जाया करती हैं। कोई झगड़ा ही हो जाता, छोटी-बड़ी चोरी भी होती, कोई शीशा आदि भी तोड़ सकता था। शिन्दा इन बातों को शायद संभाल न सके, इसलिए बलदेव या सतनाम की ज़रूरत पड़ सकती थी। अजमेर उन्हें पूरी ताक़ीद कर गया था। बलदेव तो काम पर से सीधा ही इधर आ जाता और रात में वापस एलीसन के घर चला जाता। वहाँ से उसके काम के नज़दीक होने का फ़ायदा था। हाईबरी से वाटरलू जाने के लिए ट्यूब दो जगह से बदलनी पड़ती थी। गुरिंदर को पता था कि बलदेव यहाँ रुकना नहीं चाहता था। बच्चे बड़े थे। शैरन सब समझती थी। शिन्दा भी घर में ही था। वह भी नज़र रखता होगा। इंडिया में तो वह उनका बहुत ध्यान रखता था। गुरिंदर को बलदेव का रात में चले जाना बहुत बुरा लगता। जब वह चला जाता तो मन में कहती कि अच्छा हुआ, जज्बाती होकर कोई ग़लती भी हो सकती है।
बलदेव दुकान में बहुत कम समय खड़ा होता। गुरिंदर या शिन्दा उसको कोई ग्राहक सर्व करने के लिए कहते तो बलदेव कहता-
''ना भई, तुम ही गल्ला संभालो, भाजी तो अगले की जेबें सूंघने लग जाते हैं। मैं भाजी की लक्ष्मी को हाथ नहीं लगाऊँगा।''
बाद में गुरां कहती-
''यह जो इस लक्ष्मी को हाथ लगाता है, वो ?''
''यह तो मेरी है, वो मुफ्त में ही कब्ज़ा किए बैठा है।''
कल बलदेव आया तो उसके आगे चाबियाँ खनखनाता हुआ बोला-
''मेरी जान, मैंने फ्लैट ले लिया।''
''''फ्लैट क्यूँ, घर क्यों नहीं लिया ?''
''फ्लैट संभालना मुझे आसान लगता है, फुल्हम के फ्लैट भी घरों जैसी कीमत के ही हैं।''
''यह तेरा फुल्हम है कहाँ पर ?''
''लंदन में ही है, तुझे ले चलूँगा किसी दिन।''
''आज ही ले चल।''
''आज तो अब लेट हो गए, शॉप भी बिजी हो जाएगी। और फिर बच्चे भी घर पर ही हैं। कल चलना।''
आजकल वह बलदेव के संग शॉपिंग करने चली जाया करती थी। लेकिन संग शैरन और हरविंदर भी होते। रास्ते भर वे ही बलदेव के साथ सवाल-जवाब करते रहते और फिर स्टोरों में जाकर भी चिपटे रहते। गुरिंदर को अपनी बात करने का अवसर ही न मिलता, और किसी बात की आज़ादी कहाँ होनी थी।
गुरिंदर के कान सीढ़ियों की तरफ़ लगे हुए थे। बलदेव का फोन आ गया था कि दसेक बजे वह पहुँच जाएगा। शिन्दे ने नीचे जाकर दुकान खोल ली थी। सीढ़ियों पर आहट हुई। गुरिंदर उठकर शीशे के आगे खड़ी हो गई। अपने आप को एक बार फिर देखा और फिर सीढ़ियों की तरफ़ देखने लगी। बलदेव ही था। बलदेव ने गुरिंदर की ओर देखा तो देखता ही रह गया। गुरिंदर के करीब होकर सूंघते हुए बोला-
''क़त्ल करने की पूरी तैयारी की हुई है।''
''क़ातिल तो तू हैं, मैंने तो बस लाश सजाई है तेरे लिए। इसे छूकर इसमें जान डाल दे।''
बलदेव ने उसे बाहों में लेकर कहा-
''न मेरी जान, ऐसा न कह। तू लाश नहीं, तू तो मेरी रूह है, अप्सरा है... चलें ?''
''हाँ, पर शिन्दे को कोई गोली दे दे, नहीं तो यह मरा शक करेगा।''
''उसको मैं संभालता हूँ, तू साइड डोर के रास्ते निकल चल। ये ले चाबी, कार में बैठ, मैं टरका कर आता हूँ।''
गुरिंदर कार में जा बैठी, करीब दो मिनट में बलदेव भी आ गया। ड्राइविंग सीट पर बैठता हुआ बोला-
''मैं कह आया हूँ कि फ्लैट की सफ़ाई करने चले हैं।''
''इंडिया में तो यह बड़ा बुजुर्ग बना होता था, बहुत रौब डालता था।''
''यहाँ भाजी और सतनाम ने काम करवा-करवा कर इसकी जान ही निकाल रखी है, अभी भी शराब पिये घूमता है। मैंने कहा तो कहता है कि रात में जो पी थी, उसकी ही स्मैल आती है।''
''स्मैल तो कहीं इसके कपड़ों में से देखो।''
बातें करते हुए वे चल पड़े। पहले बलदेव ने उसको थेम्ज़ दिखाया और फिर फुल्हम आ गया। वे दोनों कार में से निकले और साथ-साथ चलने लगे। गुरिंदर ने बलदेव का हाथ पकड़ लिया और बोली-
''आज के दिन तो मुझे अपनी बनाकर चल।''
बलदेव ने उसको खींचकर अपनी बगल में लगा दिया। फ्लैट का दरवाज़ा खोलकर अन्दर प्रवेश किया। बलदेव दिखाने लगा-
''ये देख, बड़ा बैड रूम, यह दूसरा और यह सिटिंग रूम... ये किचिन और डायनिंग... मेरे लायक बहुत है।''
''सुन्दर है, बहुत बढ़िया। सामान तूने डलवाया है ये ?''
''नहीं गोरे छोड़ गए। बता, क्या पियेगी, चाय या ठंडा ?''
गुरां उसकी तरफ़ देखने लगी। उसे बाहों में भरकर ऐड़ियाँ उठाकर चूमते हुए बोली-
''ये रम पिऊँगी मैं।''
दोनों एक दूजे की बाहों में वैसे ही खड़े रहे। गुरां कहने लगी-
''मुझे माहिलपुर वाली जीती मिली थी एक दिन।''
''क्या कहती थी ?''
''पूछती थी कि अपने देवर के संग रहती है या कि हसबैंड के साथ।''
''तूने क्या कहा ?''
''उस दिन तो कुछ नहीं कहा, अब मिलेगी तो बताऊँगी सबकुछ। वह तेरा हालचाल बहुत पूछे जाती थी।''
''मैंने तेरे आने के बाद फेल होने का रिकार्ड जो तोड़ दिया था।'' कहकर बलदेव हँसने लगा और फिर बोला-
''और क्या कहती थी ?''
''पूछती थी कि अभी भी गाती है ?''
''गुरां, आज गाएगी तू ?''
''जैसा कहे। मैंने तो इंडिया में तब भी कहा था कि अगर गाया तो सिर्फ़ तेरे लिए ही गाऊँगी।''
''आज हो जाए फिर वही रौनक।''
''तुझे पता है कि मैंने मुड़कर फिर कभी गाया नहीं, रियाज़ भी नहीं, गीत भी भूल गया होगा।''
''गीत तो मुझे पूरा याद है।''
कहकर बलदेव ने अल्मारी में से वोदका की बोतल निकाल ली। उससे बोतल पकड़ते हुए गुरिंदर ने कहा-
''बलदेव, बी नैचुरल ! शराब के बग़ैर, जैसे लंगेरी बैठक में हम बैठे थे... याद है न ?''
''मुझे सबकुछ याद है गुरां।''
कहकर वह हाथ पकड़कर गुरां को बैडरूम में ले गया। गुरां बैड पर चढ़कर बैठ गई। एक सिरहाना पीठ के पीछे रख लिया और एक टांगों के नीचे। बलदेव बैड के नज़दीक कुर्सी पर बैठ गया। गुरां बोली-
''तू वहाँ क्यों बैठ गया ? यहाँ मेरे पास आ।''
बलदेव उठकर बैड पर बैठ गया। गुरां ने कहा-
''तू अभी भी दूर बैठा है, और पास हो।''
बलदेव कुछ करीब सरका। गुरां गला साफ़ करती गुनगुनाने लगी। उसने आँखें बंद करके लम्बी टेर लगाई - ''नी भट्ठी वालिये…चम्बे दीये डालिये, नी पीडां दा परागा भुन्न दे, नी तैनुं देवां हझुंआं दा हाड़ा....।''
उसने गीत का मुखड़ा गाते हुए आँखें खोल लीं। बलदेव थोड़ा हटकर आँखें मूंदे गीत के आनन्द में डूबा हुआ था। गुरां ने मुखड़े से आगे पहला टप्पा शुरू करते हुए आँखें पुन: मूंद ली। उसको लगा कि बलदेव उसकी ओर बढ़ रहा था और गर्दन पर चुम्बन लेने लगा था। उसने आँखें खोलीं, बलदेव अभी भी आँखें बंद किए अधलेटा पड़ा था। टप्पे के बाद उसने मुखड़ा दुबारा शुरू करते हुए टेर के साथ बांह भी आगे बढ़ाई, पर बांह बलदेव को छू न सकी। वह थोड़ा हटकर था। गुरां ने एकबार फिर आँखें बंद कीं। दुबारा खोलीं तो बलदेव अभी भी उसी मुद्रा में था। गुरां की आवाज़ डोलने लगी। पर वह गाती रही। वह बोल भूल रही थी, उसकी आवाज़ डूब रही थी। बलदेव अभी भी थोड़ी दूरी पर आँखें मूंदे पड़ा था। गुरां का गीत बंद हो गया। वह बुरी तरह हाँफने लगी। बलदेव एक झटके से उठा और बोला-
''गुरां तू ठीक तो है ?''
फिर उसने गुरां की बांह देखी ओर एकदम से कह उठा-
''तुझे तो तेज़ बुख़ार है !''
(जारी…)
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सोमवार, 11 अप्रैल 2011

गवाक्ष – अप्रैल 2011



जनवरी 2008 गवाक्ष ब्लॉग के माध्यम से हम हिन्दी ब्लॉग-प्रेमियों को विदेशों में रह रहे हिन्दी/पंजाबी के उन लेखकों/कवियों की समकालीन रचनाओं से रू-ब-रू करवाने का प्रयास करते आ रहे हैं जो अपने वतन हिन्दुस्तान से कोसों दूर रहकर अपने समय और समाज के यथार्थ को अपनी रचनाओं में रेखांकित कर रहे हैं। गवाक्ष में अब तक विशाल (इटली), दिव्या माथुर (लंदन), अनिल जनविजय (मास्को), देवी नागरानी(यू.एस.ए.), तेजेन्द्र शर्मा(लंदन), रचना श्रीवास्तव(लंदन), पूर्णिमा वर्मन(दुबई), इला प्रसाद(यू एस ए), भगत धवन (डेनमार्क), चाँद शुक्ला (डेनमार्क), वेद प्रकाश ‘वटुक’(यू एस ए), रेखा मैत्र (यू एस ए), तनदीप तमन्ना (कनाडा), प्राण शर्मा (यू के), सुखिन्दर (कनाडा), सुरजीत(कनाडा), डॉ सुधा धींगरा(अमेरिका), मिन्नी ग्रेवाल(कनाडा), बलविंदर चहल (न्यूजीलैंड), बलबीर कौर संघेड़ा(कनाडा), शैल अग्रवाल (इंग्लैंड), श्रद्धा जैन (सिंगापुर), डा. सुखपाल(कनाडा), प्रेम मान(यू.एस..), (स्व.) इकबाल अर्पण, सुश्री मीना चोपड़ा (कनाडा), डा. हरदीप कौर संधु(आस्ट्रेलिया), डा. भावना कुँअर(आस्ट्रेलिया), अनुपमा पाठक (स्वीडन), शिवचरण जग्गी कुस्सा(लंदन) आदि की रचनाएं और पंजाबी कथाकार-उपन्यासकार हरजीत अटवाल के उपन्यास “सवारी” के हिंदी अनुवाद की पैंतीसवीं किस्त आपने पढ़ीं। “गवाक्ष” के अप्रैल 2011 अंक में प्रस्तुत हैं कनाडा से पंजाबी कवि जसबीर माहल की कविताएँ तथा हरजीत अटवाल के धारावाहिक पंजाबी उपन्यास “सवारी” की छत्तीसवीं किस्त का हिंदी अनुवाद…

कनाडा से

पंजाबी कवि जसबीर माहल की कुछ कविताएँ

हिंदी रूपान्तर : सुभाष नीरव

भगौड़ा

आज भी

उलझाये रखा

व्यस्तताओं में

अपने आप को…

अपने सम्मुख

पेश होने से

आज भी

मैं बचता रहा!

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उमंगों की मौत

श्रृंगार मेज़ पर

पड़ीं चूड़ियाँ

चूड़ियों पर

जमी धूल !

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मिट्टी की तासीर-1

फूलों को कोई क्या कहे !

हँसते रहते चुपचाप

कब्र पर खिले भी

वे उतने सुन्दर

जितने बगीचे में !

फूलों को कोई क्या कहे !

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मिट्टी की तासीर-2

फूल

मुरझा गया

सूख गया

वज़ूद उसका

ख़त्म हो गया…

देर तक पर स्मृतियों में

उसकी सुगंध

आती रही…

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फास्ट फूड

आग से उतावला पकवान

पकवान से उतावली आग

दोनों से भी अधिक उतावले

हाथ पकाने वाले

और सबसे ज्यादा उतावले

खाते खाते

गाड़ियाँ भगाने वाले !

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वर्तमान गली-पड़ोस

डायरी के पन्ने पलटते हुए

बदले पते और फ़ोन नंबर देखते हुए

कितने ही सवाल ज़ेहन में

उठ उठ कर खड़े होते

कहाँ गया पुरखों का घर

कैसे बनेंगे अब रिश्ते

कैसा होगा गली-पड़ोस

ड्योढ़ी-आँगन के साथ

किस तरह का होगा मोह ?

क्या अब हवा में मिली दुर्गंध से

मिला करेगी

पड़ोसी के मर जाने की ख़बर ?

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ख़याल, असलियत, अहसास

सुनहरी सपनों के खेत में से

कोई सपना उखाड़ लाने के लिए

ख़यालों ने

जब भी कभी

असलियत की बाड़ फांदी है

मुँह के बल गिरे मन पर

अहसास की

बड़ी गहरी चोट लगी है।

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योद्धा

बादल का टुकड़ा था वो

पर्वत से जिसने टक्कर ली

क्या हुआ

यदि जीत न सका

नाचता-कूदता संग दरिया के

वापस आया

साँस लेने के लिए

वह टुकड़ा

सागर में रुका

कितने क़तरे संग मिलाकर

अपना नया वज़ूद बनाकर

पर्वत के दर

फिर जा पहुँचा।

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पंजाबी के एक होनहार कवि। 1978 में पंजाब छोड़ा और इंग्लैंड बस गए। वर्तमान में वर्ष 1994 से कनाडा के ब्रिटिश कोलंबिया प्रांत के सरी शहर में रह रहे हैं।

शिक्षा : बी-एससी।

संप्रति : सोफ्टवेयर डिवलेपर।

प्रकाशित पुस्तक : वर्ष 2009 में पंजाबी में एक कविता संग्रह आपणे आप कोल प्रकाशित।

सम्पर्क : 8229 -157, Street Surrey, BC, Canada V4N 0S2

Email - jmahal@telus.net