मंगलवार, 6 सितंबर 2011

धारावाहिक पंजाबी उपन्यास(किस्त- 40)




सवारी

हरजीत अटवाल
हिंदी अनुवाद : सुभाष नीरव

॥ पैंतालीस ॥

शिन्दे के वापस आ जाने पर अजमेर बहुत खुश था। वह जानता था कि सतनाम को इससे काफ़ी तकलीफ़ हुई होगी। सतनाम भी तो दांव लगाकर शिन्दे को ले गया था। पचास की जगह सौ पौंड देकर। शिन्दे के कारण ही सतनाम की सेल बढ़ने लग पड़ी थी। उसकी साप्ताहिक बिक्री अजमेर के बराबर आ पहुँची थी, जबकि उसका मुनाफ़ा अजमेर के मुनाफ़े से दोगुना था। सतनाम के मीट के कारोबार में से लाभ चालीस प्रतिशत तक पहुँच जाता, जबकि अजमेर का मुनाफ़ा पंद्रह से बीस प्रतिशत ही होता था। सिगरेटों और व्हिस्की की बोतलों में से तो पाँच प्रतिशत ही रह जाता। यही कारण था कि मनजीत ने नई कार ले ली थी। सतनाम ने भी दुकान को फ्री-होल्ड खरीदने के लिए लैंडलॉर्ड के साथ बात करनी शुरू कर दी थी। ऐसे तो वह अजमेर से आगे निकल चला था। शिन्दे को वापस ले आना एक बार तो अजमेर को ऐसा लगा मानो उसने सतनाम का प्लग ही खींच दिया हो। मन ही मन कहता कि भाग कहाँ तक भागता है।
टोनी वाली पूरी तनख्वाह बचने लग पड़ी। शिन्दा सवेरे उठता और गई रात सोता। वह अकेला ही काम चला सकता था। कठिन समय के लिए गुरिंदर भी घर ही होती। अजमेर भी आस पास ही रहता। शाम को भीड़ के समय अजमेर गल्ला संभालता और शिन्दा ऊपर का काम। टोनी का छुट्टियों पर चले जाना उन्हें एक बार भी नहीं अखरा था। अपितु वह सोचता था कि इस स्कीम पर पहले क्यों नहीं अमल किया।
काम को इतना आराम से चलता देख अजमेर एक बार फिर अपने बिजनेस को बढ़ाने के सपने लेने लग पड़ा था। टोनी ने लौटकर शाम के वक्त शिन्दे के साथ खड़े होना ही था। अजमेर ने एक बार फिर खाली होना था और वह कोई दूसरी दुकान आदि ले सकता था। अब तो बच्चे भी बराबर के होने वाले थे। और कुछ वर्ष में शैरन दुकान में खड़ी होने योग्य हो जाने वाली थी और उसके पीछे ही हरविंदर भी। लोगों के बच्चे छुट्टियों में बाहर काम करने जाते हैं, उनके लिए घर की दुकान थी।
कभी-कभी अजमेर को ढिंचली वाले पब की याद हो आती तो उसको बहुत दुख होता। उसने उधर जाकर देखा था। पब अब खुल चुका था। लिया भी किसी इंडियन ने ही था और भीड़ भी खूब रहती थी। उसको सतनाम पर गुस्सा आने लगा कि आधे में उसके संग क्यों खड़ा नहीं हुआ। आधे में खड़ा होना तो एक तरफ़, उसको भी उसने दिल गिराने वाली सलाह दी थी। यदि वह पब खरीद लिया होता तो अजमेर आज कहीं का कहीं होता। पंडोरी के यहाँ आए लोगों में से शायद उसका नाम सबसे ऊपर होता।
जैसा कि स्वभाव का वह सूफी था, अधिक बात नहीं करता था। शिन्दे के साथ तो बिलकुल ही नहीं, डिब्बा पीकर खुलने लगता। दो डिब्बे पीकर सीधे सवाल करता, पूछता-
''कैसे ? खुश है ?''
''खुश क्या, मैं खुश ही हूँ।''
''मैंने कहा, अगर अब भी खुश न हुआ तो फिर तू कभी खुश नहीं होगा। तू लखपति हो गया, मिंदो के नाम पर दो लाख से ऊपर है।''
''भाजी, सब तुम्हारे कारण ही है।''
''बुच्चर की शॉप की अपेक्षा यहाँ आराम है तुझे... देख, सारा दिन बाहें लटकाये फिरता है। वहाँ मीट की बू से ही भरा फिरता था।''
''भाई, वहाँ काम भी ज्यादा है। सवेरे-सवेरे तो काम का प्रैशर ही बहुत होता है।''
अजमेर खुश हो जाता और बियर का एक डिब्बा पकड़ा देता। शिन्दे का उसने सीधा-सा हिसाब रखा हुआ था कि शाम के सात बजे उसको बियर का एक डिब्बा देता और दूसरा दस बजे। एक बड़ा पैग रोटी खाते के समय। अपनी तरफ़ से शिन्दे की शराब पर नियंत्रण रखा हुआ था। मिंदो ने भी कहकर भेजा था कि उसको ज्यादा पीने न देना। अजमेर को स्वयं भी महंगा न पड़े इसलिए भी ध्यान रखता।
शिन्दे को सुबह जल्दी उठने की आदत पड़ गई थी। वह सवेरे उठकर दुकान में झाड़ू-पौचा लगाता। रात के खाली पड़े बॉक्स तोड़ तोड़कर या फिर दूसरा फालतू सामान कूड़ेदान में डालता। टोनी यह सारे काम रात को ही किया करता था, पर उसको ये सब बहुत दौड़-दौड़ कर करने पड़ते। शिन्दा रात को मजे से काम करता और यह ऊपरवाला काम सवेरे उठ कर निपटाता और दस बजने से पाँच मिनट पहले ही दुकान खोल लेता। अजमेर उसकी यह फुर्ती देखकर खुश हो जाता। मंगलवार और शनिवार दुकान की शॉपिंग करनी होती। शिन्दा अजमेर को किसी भी काम को हाथ न लगाने देता, वह पूरी वैन खुद ही लदवाता और उतरवाता।
अजमेर को एक दिन बोतलों के पीछे ऐश-ट्रे में सिगरेट के टोटे दिखाई दे गए। यह ऐश-ट्रे टोनी इस्तेमाल करता था। वह कई बार स्टॉक रूम में खड़े होकर सिगरेट पिया करता था। सिगरेट के टुकड़े देखकर अजमेर बोला-
''ये सिगरेटें तू पीता है ओए ?''
''नहीं भाजी।''
''फिर ये ऐश ट्रे में टुकड़े कहाँ से आ गए ?''
''टोनी के होंगे।''
''टोनी को गए तो कई दिन हो गए। और वह तो ऐश ट्रे साफ करके गया था, मैंने खुद देखा।''
''नहीं भाजी, तुम्हें भ्रम हो रहा होगा।''
''भरम का कुछ लगता, क्यों झूठ बोले जा रहा है... कहीं बुच्चर ने कुछ सिखा कर तो नहीं भेजा !''
''उसने मुझे क्या सिखाना है ?''
''यही कि जाकर मुझे ज़मीन पर लगा, वह मुझे देखकर खुश जो नहीं है।''
शिन्दा कुछ न बोला। अजमेर ही चुप हो गया, पर उसके मन में यह बात बैठ गई। रात को खाना खाते समय फिर इसी बात को लेकर बड़बड़ाने लगा। शिन्दे ने अपना पैग पिया और रोटी खाये बग़ैर ही सो गया।
अजमेर सुबह को इस तरह था जैसे कुछ हुआ ही न हो। शिन्दे ने भी रात की बात का जिक्र न किया। पर अजमेर सोच रहा था कि ढाई पौंड की डिब्बी थी, अगर रोज़ की एक डिब्बी भी पी जाए तो बात कहाँ पहुँचती थी। सिगरेटों में से तो पहले ही कुछ नहीं बचता था। उसने दुबारा सिगरेट के टुकड़े कहीं न देखे। करीब दो दिन शिन्दा चुप रहा और फिर ठीक हो गया।
एक दिन अजमेर को लगा कि शिन्दा सही नहीं चल रहा। अजमेर बोला-
''ओ... तूने दिन में ही पी ली ?''
''नहीं भाजी...वैसे ही थकावट सी है। रात को आँख खुल गई, दुबारा नींद ही नहीं आई।''
अगले दिन अजमेर ने शिन्दे की ओर ध्यान से देखा तो उसकी आँखें कुछ लाल-सी प्रतीत हुईं। अजमेर ने कहा-
''आज फिर शराबी लग रहा है।''
''नहीं भाजी, नजला हो रखा है कल से।''
अजमेर ने करीब होकर सूंघकर देखा और बोला-
''तेरे से तो स्मैल ही बहुत आ रही है।''
''रात वाली होगी। मैंने जल्दी में सवेरे कपड़े जो नहीं बदले, तभी।''
अजमेर सोचने लगा कि यह सवेरे जल्दी उठता है, कहीं उसी समय ही दाव न लगाता हो। सवेरे जब शिन्दा डस्टबिन भरकर हटा तो अजमेर ने उसके अन्दर हाथ मारकर देखा। बियर के दो ताज़े डिब्बे पिये हुए मिल गए और एक व्हिस्की की खाली की गई पव्वे वाली बोतल भी। अजमेर का गुस्सा तो सातवें आसमान पर जा चढ़ा। वह चीखता हुआ बोला-
''सौ पौंड तेरी तनख्वाह, ये सौ पौंड की तू चुरा कर पी जाता है, फिर तेरा कपड़ा, खाना-पीना सब फ्री... तू तो मुझे तीन सौ पौंड हफ्ते का पड़ता है। टोनी तो तेरे से मुझे बहुत सस्ता पड़ता है। और तो और मैं गलती से तेरी तनख्वाह एडवांस में दे आया... ऐसा कर, अपने पैसे पूरे कर दे और जा, बाहर जाकर जहाँ मर्जी काम कर और जहाँ चाहे रह, फिर तू इतनी पी कर दिखा और सौ पौंड बचा कर भी...।''
शिन्दे ने उस दिन फिर खाना नहीं खाया और चुपचाप जाकर सो गया।
धीरे-धीरे अजमेर को लगा कि शिन्दा तो उसके लिए एक समस्या बनता जा रहा था। इस हिसाब से वह उसको बहुत महंगा पड़ता था। शराब पीकर दुकान में खड़े होकर गलतियाँ भी करता होगा। वह गुरिंदर के साथ बात करते हुए कहने लगा-
''शिन्दा तो फिश बोन बनकर गले में अटक गया है।''
''मुझे तो पहले ही पता था, मैं इसके कपड़े मशीन में जब धोती हूँ, बू मार रहे होते हैं।''
''तूने बताया नहीं ?''
''तुम कहते कि भाई की चुगली करती हूँ।''
''तू अब इसको समझा, समझा इसको।''
''मैं क्या समझाऊँ, तुम्हारा भाई है, तुम ही समझाओ। और फिर, इंडिया वाली ने भी तुम्हारी ही ड्यूटी लगा रखी है।''
उसके व्यंग्य पर अजमेर जल-भुन गया, पर कुछ बोल न सका। वह गुस्से में आया, अपने हाथ में मुक्के मारने लग पड़ा। गुरिंदर फिर बोली-
''प्यार से समझाओ, ज़रा धीरज से। तुम तो अगले को ऐसे पड़ते हो कि जिसने समझना हो, वह भी न समझे।''
''मैं धीरज कहाँ से लाऊँ। जिसका इतना नुकसान हो रहा हो, वह धीरज से कैसे काम ले।''
''सतनाम को कहो इसको समझाये।''
''वो बुच्चड़ तो इसको और सीख देकर जाएगा, मुझे पता है, यह उसी का उठाया हुआ है... मैं एक बात बता दूँ, अगर समझ गया तो समझ गया, नहीं तो बहुत बुरा होगा। मैं पुलिस को एक फोन करके इसको उठवा कर इंडिया फिकवा दूँगा।''
''ऐसा न सोचो, कोई सुन लेगा तो क्या कहेगा।''
''इसे समझाओ फिर।''
''बलदेव इसके साथ बात कर सकता था, उसकी बात यह समझ भी लेता, पर उसको तुमने नाराज़ कर लिया।''
''नाराज़ कैसा, ला, अभी फोन कर लेते हैं। वो ही एक बार समझा कर देख ले, नहीं तो मैं इसको वापस भेज दूँगा।''
अजमेर बलदेव को उसके काम पर फोन करने लगा। फोन वापस रखते हुए गुरिंदर से बोला-
''बलदेव ने तो वहाँ से काम छोड़ दिया।''
(जारी…)
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मंगलवार, 19 जुलाई 2011

गवाक्ष – जुलाई 2011




जनवरी 2008 “गवाक्ष” ब्लॉग के माध्यम से हम हिन्दी ब्लॉग-प्रेमियों को विदेशों में रह रहे हिन्दी/पंजाबी के उन लेखकों/कवियों की समकालीन रचनाओं से रू-ब-रू करवाने का प्रयास करते आ रहे हैं जो अपने वतन हिन्दुस्तान से कोसों दूर रहकर अपने समय और समाज के यथार्थ को अपनी रचनाओं में रेखांकित कर रहे हैं। “गवाक्ष” में अब तक विशाल (इटली), दिव्या माथुर (लंदन), अनिल जनविजय (मास्को), देवी नागरानी(यू.एस.ए.), तेजेन्द्र शर्मा(लंदन), रचना श्रीवास्तव(लंदन), पूर्णिमा वर्मन(दुबई), इला प्रसाद(यू एस ए), भगत धवन (डेनमार्क), चाँद शुक्ला (डेनमार्क), वेद प्रकाश ‘वटुक’(यू एस ए), रेखा मैत्र (यू एस ए), तनदीप तमन्ना (कनाडा), प्राण शर्मा (यू के), सुखिन्दर (कनाडा), सुरजीत(कनाडा), डॉ सुधा धींगरा(अमेरिका), मिन्नी ग्रेवाल(कनाडा), बलविंदर चहल (न्यूजीलैंड), बलबीर कौर संघेड़ा(कनाडा), शैल अग्रवाल (इंग्लैंड), श्रद्धा जैन (सिंगापुर), डा. सुखपाल(कनाडा), प्रेम मान(यू.एस.ए.), (स्व.) इकबाल अर्पण, सुश्री मीना चोपड़ा (कनाडा), डा. हरदीप कौर संधु(आस्ट्रेलिया), डा. भावना कुँअर(आस्ट्रेलिया), अनुपमा पाठक (स्वीडन), शिवचरण जग्गी कुस्सा(लंदन), जसबीर माहल(कनाडा), मंजु मिश्रा (अमेरिका) आदि की रचनाएं और पंजाबी कथाकार-उपन्यासकार हरजीत अटवाल के उपन्यास “सवारी” के हिंदी अनुवाद की अड़तीसवीं किस्त आपने पढ़ीं। “गवाक्ष” के जुलाई 2011 अंक में प्रस्तुत हैं – इंग्लैंड से हिंदी कवयित्री डॉ. वन्दना मुकेश की कविताएँ तथा हरजीत अटवाल के धारावाहिक पंजाबी उपन्यास “सवारी” की उनतालीसवीं किस्त का हिंदी अनुवाद…

इंग्लैंड से
डॉ. वन्दना मुकेश की पाँच कविताएँ


डैफ़ोडिल

सुन दोस्त, उधर देख-
गुदगुदी वातानुकूलित गाड़ियाँ
क्यों दिखती हैं
थकी, उकताई-सी।
धीरे-धीरे सरकती, ऊँघती सी...
और उनमें बैठे लोग
बेज़ार, थके, मायूस
कुछ खीजे से, कुछ रीते से।
सुन दोस्त, बजा सीटी,
बुला उन्हें, कर इशारा।
आ बैठें हिलमिल
दरख्तों के साये में,
खिलखिलाएँ कुछ पल
खुले आसमां के नीचे।

घर

घर और मकान की क्या परिभाषा?
मकान की
चार सपाट दीवारों में,
गूँज नहीं पाते हैं-
घर के हास-परिहास,
आशा- निराशा।

यूरोप

दबे पाँव दाखिल होते हैं
शहर में
कि खामोशी सहमा देता हमें
इंसानी हजूमों से नदारद
इस शहर में
क्या
दिल धड़कता है कहीं?


स्पर्श

कभी,
ह्रदय के अंतरतम बिंदु तक
वीणा के तारों-सा
झंकृत करता
वह स्पर्श...
भीष्म की शैया का
स्मरण कराता...

टाइम-मशीन

पिता को अंधाश्रम से घर ले आया हूँ।
क्योंकि कल ही टाइम-मशीन में,
अपना भूत औ भविष्य देख आया हूँ।


उम्मीद

जिनके पसीने से बनते हैं-
शराब के साथ के पकौड़े
बुझे पड़े हैं उनके घरों के
कई दिनों से चुल्हे।
बापू कहता है-
फसल अच्छी होगी तो
लल्ली की शादी होगी...
गोटू सोचता है
फसल अच्छी होगी तो शायद बन सकेंगे
उसके घर में भी
एक प्लेट पकौड़े...

या बापू उसे भी खेलने दे
गेंद और बल्ला,
फिर अपने चूल्हे की तो बात क्या
साँझे चूल्हे की खुशबू से
महक उठेगा मोहल्ला।
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जन्म- भोपाल 12 सितंबर 1969 शिक्षा- विक्रम विश्वविद्यालय, उज्जैन से स्नातक, पुणे विद्यापीठ से अंग्रेज़ी व हिंदी में प्रथम श्रेणी से स्नातकोत्तर एवं हिंदी में पी.एचडी की उपाधि। इंग्लैंड से क्वालिफ़ाईड टीचर स्टेटस।भाषा-ज्ञान- हिंदी, अंग्रेजी, मराठी, उर्दू एवं पंजाबी।लेखन एवं प्रकाशन- छात्र जीवन में काव्य लेखन की शुरुआत। 1987 में साप्ताहिक हिंदुस्तान में पहली कविता 'खामोश ज़िंदगी' प्रकाशन से अब तक विभिन्न प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं और साहित्यिक पुस्तकों, वेब पत्र-पत्रिकाओं में विविध विषयों पर कविताएँ, संस्मरण, समीक्षाएँ, लेख, एवं शोध-पत्र प्रकाशित। 'नौंवे दशक का हिंदी निबंध साहित्य एक विवेचन'- 2002 में प्रकाशित शोध प्रबंधप्रसारण- बी.बी.सी. वैस्ट मिडलैंड्स, आकाशवाणी पुणे से काव्य-पाठ एवं वार्ताएँ प्रसारितविशिष्ट उपलब्धियां-
छात्र जीवन से ही अकादमिक स्पर्धाओं में अनेक पुरस्कार, भारत एवं इंग्लैंड में अनेक राष्ट्रीय एवं अंतर्राष्ट्रीय शोध संगोष्ठियों में प्रपत्र वाचन, सहभाग और सम्मान
यू.के. क्षेत्रीय हिंदी सम्मेलन 2011, में हिंदी के प्रचार-प्रसार के लिये भारत सरकार द्वारा विशिष्ट सम्मान
भारत सरकार एवं गीतांजलि बहुभाषीय साहित्यिक संस्था, बर्मिंघम द्वारा आयोजित यू.के. क्षेत्रीय हिंदी सम्मेलन 2011 की संयोजक सचिव।
22वें अंतर्राष्ट्रीय रामायण सम्मेलन में प्रपत्र वाचन
2005 में गीतांजलि बहुभाषीय साहित्यिक संस्था, बर्मिंघम द्वारा आयोजित अंतर्राष्ट्रीय बहुभाषीय सम्मेलन की संयोजक सचिव
इंटीग्रेटेड काउंसिल फ़ॉर सोश्यो-इकनॉमिक प्रोग्रेस दिल्ली द्वारा 'महिला राष्ट्रीय ज्योति पुरस्कार' 2002
1997 से भारत एवं ब्रिटेन में विभिन्न साहित्यिक-सांस्कृतिक कार्यक्रमों और कवि- सम्मेलनों का संयोजन-संचालन
गीतांजलि बहुभाषीय साहित्यिक संस्था की सदस्य। केम्ब्रिज विश्वविद्यालय से संबंद्ध।
संप्रति- इंग्लैंड में अध्यापन एवं स्वतंत्र लेखन
संपर्क: vandanamsharma@yahoo.co.uk

धारावाहिक पंजाबी उपन्यास(किस्त- 39)




सवारी

हरजीत अटवाल
हिंदी अनुवाद : सुभाष नीरव



॥ चौवालीस ॥

सुबह दुकान के शटर उठाते हुए अजमेर गुस्से से भरा पड़ा था। शिन्दा फिर सतनाम की तरफ चला गया था। जाते समय कुछ बताकर नहीं गया था। एक दो दिन और रुक जाता तो क्या फ़र्क पड़ जाता। टोनी भी आज तीन बजे काम पर आने के लिए कहकर गया हुआ था। अजमेर को लगा कि दुकान से जैसे सभी ऊबे पड़े हैं। गुरिंदर भी बहुत अच्छी तरह बात नहीं कर रही थी। बच्चों ने भी उसके इंडिया से लौटने पर कोई चाव नहीं दिखाया था।
अजमेर अभी काम करने के मूड में नहीं था। वह अभी इंडिया के सुरूर में ही था। उसको मिंदो की हँसी की टनकार अभी भी सुनाई दे रही थी। उसको गाँव की गलियों के गोबर की खुशबू अभी भी महसूस हो रही थी। धूप की चुभन भी चुभ रही थी। विवाह में जो उसकी गुड्डी चढ़ी थी, उसकी खुशी उसके अन्दर पहले की भाँति ही तारी थी, पर शिन्दे ने उसको ये दुकान खोलने में लगा दिया था। वह इतनी जल्दी इस रूटीन में नहीं घुसना चाहता था।
उसने दुकान खोली। गल्ले पर खड़ा होकर मिंदो के बारे में सोचने लगा। वह कितनी जल्दी तैयार हो गई थी और पहले दिन ही उसको जीत लिया था। बदले में अजमेर ने भी उसको खुश कर दिया था। शिन्दे की कमाई तो उसको दी ही थी और साथ ही, एक लाख एडवांस भी दे दिया जिसे शिन्दे की तनख्वाह में से उसे काटते रहना था। ट्रैक्टर बेचकर सारे पैसे उसके नाम जमा करवा दिए और और भी बहुत कुछ। भान्जी के विवाह की सारी चौधर भी मिंदो के पास ही थी। वापस लौटते अजमेर के पास तो गिनती के पौंड ही बचे थे। वह खड़ा दुकान में था लेकिन उसका मन पंडोरी में ही घूम रहा था। एक ग्राहक दुकान में आया तो उसका ध्यान टूटा। ग्राहक ने चोरी करने की कोशिश की तो अजमेर ने आगे बढ़कर रोक दिया। एक और ग्राहक आया तो वह वाइन की बोतल की कीमत को लेकर झगड़ पड़ा और जाते हुए उसको 'पाकि' की गाली दे गया। अजमेर अब इंडिया से वापस वर्तमान में लौटने लगा। तभी, एक गोरा चोरी की शराब बेचने आ गया। उसके साथ भाव तय करता हुए अजमेर पूरी तरह अपने वर्तमान में वापस आ चुका था।
उसने सेल बुक चैक की। सेल कुछ कम हुई थी पर अधिक नहीं जैसा कि उसे डर था। फिर कागज उठाकर खत्म हुई वस्तुओं की सूची बनाने लग पड़ा। कल उसे शॉपिंग के लिए जाना था। माल डिलीवर करवाना मंहगा पड़ रहा था।
जब वह लिस्ट बना रहा था, गुरिंदर नीचे आ गई। वह बहुत गुस्से में थी। अजमेर ने पूछा-
''तेरा मुँह क्यों सूजा हुआ है ?''
''जैसे तुम्हें पता ही न हो।''
''कुछ बोलो भी।''
''रात में बलदेव को क्यो अपसेट किया ?''
''मैंने उसे क्या अपसेट करना है, अपसेट तो वह मुझे करता घूमता है। हमेशा ही पराया बनकर रहता है। मेरी तरफ ऐसे देखेगा जैसे पहली बार देख रहा हो।''
''यह भी कोई तरीका था कहने का कि वो दरवाज़ा है... आख़िर तुम्हारा छोटा भाई है।''
''अगर छोटा भाई है तो मेरी किसी बात का गुस्सा नहीं करेगा।''
''भाई के साथ-साथ शरीक भी है। तुम्हें ज़रा सोच समझकर बात करनी चाहिए। तुमने उसको नाराज़ कर दिया। उसके जाने के बाद सभी दुखी हो गए थे और तुम्हें कोई फिक्र ही नहीं, एक ड्रिंक और लिया और जाकर बैड पर लेट गए।''
गुरिंदर का गला भर गया। अजमेर उसको खुश करते हुए बोला-
''तू जैसा कहे कर लेता हूँ। उसे सॉरी कह देता हूँ। उसको जाकर मना लाता हूँ। मुझे उसका एड्रेस बता, मैं आज ही होकर आता हूँ या फोन कर लेता हूँ, पर तू गम न कर।''
''मुझे उसके फोन का नहीं पता, न ही उसका एड्रेस मालूम है।''
''तू तो उसका फ्लैट साफ करने गई थी।''
''वही मुझको ले गया था और छोड़ गया था, फुल्हम में है कहीं।''
''चल, तू कूल डाउन हो जा। मैं उसके आफिस में कंटेक्ट कर लूंगा।''
''मैं कैसे कूल डाउन हो जाऊँ। बच्चे भी गुस्से में हैं, बलदेव उनका फेवरेट चाचा जी है।''
''मेरे साथ तो उन्होंने अच्छी तरह हैलो भी नहीं की।''
''हैलो कैसे करते, वे तो तुम्हारे संग विवाह पर जाना चाहते थे।''
''पर उस समय क्यों नहीं बोले। अगर कहते तो मैं ले ही जाता।''
''मैंने तुमसे कहा तो था, पर तुमने मेरी कोई बात सुनी ही नहीं। क्या मालूम तुम्हारे सफ़र में कोई विघ्न पड़ता हो, उनके संग जाने से।''
अजमेर को लगा कि गुरिंदर ने कोई बात ताने के रूप में कही थी। उसने टालते हुए कहा-
''या तो यहाँ मेरे साथ कोई काम कर, या फिर ऊपर जाकर रोटी का इंतज़ाम कर, रात में भी कुछ नहीं खाया।''
गुरिंदर ऊपर चली गई। अजमेर शिन्दे को लेकर सोचने लगा। अब शिन्दे को उसके साथ ही काम करना चाहिए था। वह उसकी एडवांस तनख्वाह जो दे आया था। इसके अलावा अब उसको शिन्दे पर पहले से ज्यादा मोह आने लगा था। उसके लौटते समय मिंदो ने कई ताकीदें की थीं। अजमेर ने मिंदो के बेटे गागू के बारे में भी सोचना था और लड़कियों के बारे में भी। अब शिन्दे का किसी दूसरे के लिए काम करना उससे देखा नहीं जाएगा। सतनाम के लिए काम करता तो वह बिलकुल भी अच्छा नहीं लगता था। जब से शिन्दा सतनाम के साथ काम करने लगा था, सतनाम तो खाली ही हो गया था। कई कई चक्कर तो हाईब्री कॉर्नर के ही लगाता। दुकान के सामने से गुज़रता हॉर्न बजाकर जाता। उसने काम भी बढ़ा लिया था। यह सब शिन्दे के कारण ही था। शिन्दा के दुकान पर खड़े होने से चोरी के चांस कम हो जाते होंगे। इसलिए सतनाम ज्यादा देर तक बाहर रह सकता था। यदि शिन्दा उसके साथ काम करता है तो वह सौ पौंड भी दे सकता है। टोनी को किसी तरह हटा देगा।
उसने टोनी को हटा देने के बारे में पहले भी सोचा था। अपने अकाउंटेंट से इस बात को लेकर सलाह की तो उसने कहा था कि चूंकि टोनी उसके साथ काफ़ी समय से कानूनन काम कर रहा है, इसलिए रिटैंडैंसी देकर ही हटाया जा सकता था, जो कि काफ़ी बन जाती। यदि टोनी स्वयं छोड़ता था तो कुछ नहीं देना पड़ता। वह मन ही मन सारी योजना बनाता दुकान में इधर-उधर घूम रहा था। यदि टोनी काम छोड़ता है तो वह सतनाम से शिन्दे को आसानी से मांग सकता था। नहीं तो सीधे किसी बहाने के बगैर ऐसा करना कठिन था।
टोनी आया। वह बात को घुमाकर छुट्टियों पर ले आया और पूछने लगा-
''छुट्टियों पर कब जा रहा है टोनी ?''
''ऐंडी, कैसी छुट्टियाँ। मेरे खर्चे ही पूरे नहीं होते। मेरी यह गर्ल फ्रेंड खर्चीली है, पैसे लिए बिना किसी काम को हाँ नहीं करती। फिर मेरे फ्लैट का किराया, दूसरे बिल और किस्तें... कुछ न पूछ... फिर शैनी(शिन्दे) के आने पर तुमने मेरा ओवर टाइम भी बन्द कर दिया था।''
''टोनी यदि मेरी सलाह माने तो तेरे सारे मसले हल हो सकते हैं। छुट्टियाँ भी काट लेगा और तेरा हाथ भी खुला हो जाएगा।''
''वह कैसे ?''
''तू डोल (बेकारी) पर चला जा, पहली बीवी का खर्च भी बन्द हो जाएगा, फ्लैट का किराया और रेट भी मुआफ... सोशल सिक्युरिटी भी मिलेगी और शाम को मेरे साथ काम भी करता रह... हिसाब लगाकर देख, इस तरह तू बहुत सुखी रहेगा।''
टोली हिसाब लगाने लगा। अजमेर ने पेपर-पेन उठाया और लिखकर उसको समझाने लगा। वाकई, उस तरीके से काम न करके टोनी की जेब में पैसे ज्यादा पड़ते थे। टोनी ने कहा-
''रिटैडैंसी मनी कितनी देगा ?''
''वह मैं तुझे ज्यादा नहीं दे सकता। हाँ, छुट्टियों का खर्चा दे दूंगा।''
टोनी के लिए छुट्टियाँ एक सपने की भाँति थीं। अफ्रीका का टिकट, फिर वहाँ के लिए खर्चा आदि, कहाँ से निकाल सकता था यह सब। उसका मन ललचाने लगा। कुछ सोचते हुए उसने कहा-
''अगर तू रिटेंडैंसी नहीं देगा तो इसका मतलब मैं खुद काम छोड़ूंगा ?''
''नहीं, मैं तुझे सैक दूंगा(बर्खास्त करूँगा), पेपरों में तू मुझे बिना बताये अफ्रीका चला जाएगा, इसी कारण मैं तुझे काम से निकाल दूंगा और तू सोशल सिक्युरिटी के दफ्तर में जाकर क्लेम कर देना।''
''ऐंडी, इंडिया में बैठा तू यही सोचता रहा है ?''
''टोनी, मैं तो तेरा सदा ही फायदा सोचता हूँ, इंडिया में होऊँ या यहाँ।''
(जारी…)
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रविवार, 19 जून 2011

गवाक्ष – जून 2011



जनवरी 2008 “गवाक्ष” ब्लॉग के माध्यम से हम हिन्दी ब्लॉग-प्रेमियों को विदेशों में रह रहे हिन्दी/पंजाबी के उन लेखकों/कवियों की समकालीन रचनाओं से रू-ब-रू करवाने का प्रयास करते आ रहे हैं जो अपने वतन हिन्दुस्तान से कोसों दूर रहकर अपने समय और समाज के यथार्थ को अपनी रचनाओं में रेखांकित कर रहे हैं। “गवाक्ष” में अब तक विशाल (इटली), दिव्या माथुर (लंदन), अनिल जनविजय (मास्को), देवी नागरानी(यू.एस.ए.), तेजेन्द्र शर्मा(लंदन), रचना श्रीवास्तव(लंदन), पूर्णिमा वर्मन(दुबई), इला प्रसाद(यू एस ए), भगत धवन (डेनमार्क), चाँद शुक्ला (डेनमार्क), वेद प्रकाश ‘वटुक’(यू एस ए), रेखा मैत्र (यू एस ए), तनदीप तमन्ना (कनाडा), प्राण शर्मा (यू के), सुखिन्दर (कनाडा), सुरजीत(कनाडा), डॉ सुधा धींगरा(अमेरिका), मिन्नी ग्रेवाल(कनाडा), बलविंदर चहल (न्यूजीलैंड), बलबीर कौर संघेड़ा(कनाडा), शैल अग्रवाल (इंग्लैंड), श्रद्धा जैन (सिंगापुर), डा. सुखपाल(कनाडा), प्रेम मान(यू.एस.ए.), (स्व.) इकबाल अर्पण, सुश्री मीना चोपड़ा (कनाडा), डा. हरदीप कौर संधु(आस्ट्रेलिया), डा. भावना कुँअर(आस्ट्रेलिया), अनुपमा पाठक (स्वीडन), शिवचरण जग्गी कुस्सा(लंदन), जसबीर माहल(कनाडा) आदि की रचनाएं और पंजाबी कथाकार-उपन्यासकार हरजीत अटवाल के उपन्यास “सवारी” के हिंदी अनुवाद की सैंतीसवीं किस्त आपने पढ़ीं। “गवाक्ष” के जून 2011 अंक में प्रस्तुत हैं – अमेरिका से हिंदी कवयित्री मंजु मिश्रा की कविताएँ तथा हरजीत अटवाल के धारावाहिक पंजाबी उपन्यास “सवारी” की अड़तीसवीं किस्त का हिंदी अनुवाद…

कैलिफोर्निया(यू.एस.ए.) से
मंजु मिश्रा की पाँच कविताएँ

परिंदा होना ही कोई शर्त तो नहीं

ऊँचाइयों तक उड़ने के लिए
परिंदा होना ही कोई शर्त तो नहीं
सपनों का आकाश,
और कल्पनाओं के पंख
कुछ कम तो नहीं
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टुकड़ा-टुकड़ा सी धूप

ज़िन्दगी किन अजीब राहों से
जाने कब-कब कहाँ से गुजरी है
जैसे कच्चे मकान की छत से,
टुकड़ा-टुकड़ा सी धूप उतरी है
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खुद को पर्वत समझते हैं

कहने दो उन्हें - जो कुछ और कहते हैं,
तुम !
उनसे हज़ार गुना बेहतर हो,
जो, दूसरों के कन्धों को
सीढ़ी बनाकर,
ऊपर चढ़ते हैं,
और फिर
सीना तान कर
खुद को पर्वत समझते हैं।
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मैं

मै,
एक,
रास्ते का मील पत्थर !
जाने कितने,
युग आए, और चले गए
मैं आज भी,
जहाँ जैसा था वैसा ही हूँ स्थिर ।
इस स्थायीत्व की पीड़ा, कोई क्या जानेगा
अपने घर आप प्रवासी बनना कोई क्या जानेगा
हम यहीं खड़े कितना भटके,
बहती नदिया का पानी क्या जानेगा ।
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मै एक पत्ता
मै एक पत्ता ....
शाख पर रहूँ ,
या शाख से अलग
क्या फर्क पड़ता है !
टूटा तो भी सूखा
न टूटता तो भी सूखता
मुझे तो अपनी जड़ से उखाड़ना ही था !
हाँ, अगर किसी किताब के पन्ने मे, दबा होता
तो...
शायद कभी इतिहास की तरह
उल्टा-पुल्टा जाता
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मंजु मिश्रा
जन्म : 28 जून 1959, लखनऊ(उत्तर प्रदेश)।
शिक्षा : एम. ए.(हिन्दी)
सृजन : कविताएँ, हाइकु, क्षणिकाएँ, मुक्तक और ग़ज़ल।
सम्प्रति : व्यापार विकास प्रबंधक, कैलिफोर्निया (यू.एस.ए.)
ब्लॉग : http://manukavya.wordpress.com
ईमेल : manjushishra@gmail.com

धारावाहिक पंजाबी उपन्यास(किस्त- 38)



सवारी
हरजीत अटवाल

हिंदी अनुवाद : सुभाष नीरव

॥ तेंतालीस ॥

इतवार की दोपहर। मौसम यद्यपि बढ़िया नहीं था, पर फिर भी हाउस खचाखच भरा पड़ा था। एक बड़ा टेबल तो अजमेर वगैरह ही घेरे बैठे थे। कल वह इंडिया से वापस लौटा था और आज सभी मिलने आ गए थे। गुरिंदर के पामर्ज़ ग्रीन से रिश्तेदार सामान लेने आए हुए थे। दो ग्रामीण भी वहाँ से गुज़रते हुए आ गए थे। सतनाम, मुनीर और प्रेम शर्मा भी थे। बलदेव भी था। अजमेर अपने इंडिया में हुए अनुभव साझे कर रहा था। विवाह में उसकी अच्छी-खासी शोभा हुई थी। वहाँ लोग आमतौर पर कहते सुने जाते थे कि लड़की का मामा विवाह करने के लिए विलायत से आया है। विवाह में हिस्सा बेशक सतनाम और शिन्दे ने भी डाला था, पर सारा श्रेय अजमेर के खाते में ही चढ़ गया। बलदेव से दुखी होकर ही अजमेर इंडिया गया था, क्योंकि उसने कोई पैसा इस विवाह के लिए नहीं दिया था। उसने बहाना बना दिया था कि वह फ्लैट ले रहा है और उसके पास पहले ही पैसे की कमी हो रही थी। अब पब में बैठते ही मुनीर ने अजमेर की तारीफ़ों के पुल बांध कर उसको बियर खरीदने लायक कर रखा था। सतनाम और मुनीर की यह बात निरी मिरासीपना लगती। वह मुनीर पर खीझा पड़ा था, पर चुप था।

लेकिन सतनाम ने मुनीर को तंग करने के लिए वांगली वाली बात फिर शुरू कर दी। मुनीर इतने देर बाद भी अपनी बात पर अड़ा बैठा था। सतनाम अपने 'ना मानूँ' वाले अंदाज में खुश था। बलदेव को मुनीर कहने लगा-

''ले यारा, ये तो अनपढ़ लाणा ही है, तू बता क्या मैं गलत होसी ?''

''मीयां, उन प्लेयरों में मुकाबला तो है, डायरेक्ट या इनडायरेक्ट... उन दोनों में से तेज़ धीमे तो होंगे ही... यह भी हो सकता है कि उनका मकसद वांगलू फाड़ने का न हो, पर उनका मुकाबला वांगलू के फटने पर आकर खत्म होता हो।''

''यही तो मैं कह रहा था, प्लेयर एक दूसरे की ओर वेखसण और ताकत फड़सन, पर अजीब बात यह होसी कि अगर वांगलू न फटे तो दोनों हार मनसण, अगर फट गया तो दोनों जितसण। इनाम शिनाम दोनों को एक जैसा होसी।''

''मीयां, वांगलू ने तो फटना ही फटना है। आदमी अपनी आई पर आ जाए तो वांगलू क्या चीज़ है।''

''बलदेव, यह बात एक गेम की होसी ना कि आदमी की ताकत की...।''

फिर किसी ने बोर होते हुए पंजाब की सियासत के बारे में बात छेड़ दी। अजमेर जगह-जगह पुलिस के नाकों की बातें बताने लगा और नाकों पर होती ज्यादतियों की भी। मुनीर ने कहा-

''भाई जान, यह बताओ कि खालिस्तान कब बणसी ?''

''मीयां, खालिस्तान तुम्हारे जेहनों में ही बणसी।''

अजमेर की बात पर सभी हँस पड़े। मुनीर को लगा कि अजमेर झूठ बोल रहा था और वह कम्युनिस्टों का हमदर्द होने के कारण संकीर्ण सोच रखता था। मुनीर कहने लगा-

''असल में तुम्हारा ताया तुम्हें उल्टी दिशा में जो डाल गया होसी।''

दो बजे दुकान बन्द करके शिन्दा भी आ गया। वह पब में कम ही आया करता था, पर आज मेहमानों के आया होने के कारण अजमेर उसको आने के लिए कह आया था। शिन्दे को देखते ही प्रेम शर्मा ने कहा-

''शिन्दे से पूछ लो वांगली के बारे में।''

पास से ही सतनाम बोला, ''शिन्दे को वांगली बारे नहीं, बांगण के बारे में पता है।''

सभी हँसे। मुनीर कहने लगा-

''शिन्दा तो हमारा बहुत शरीफ भ्रा होसी, बिलकुल वांगलू की तरह !''

एक बार फिर हँसी बिखर गई। पब बन्द करने की घंटी बार-बार बज रही थी। वे सभी एक दूसरे को अलविदा कहते हुए उठे और वहीं से अपनी-अपनी राह पर पड़ गए। पामर्ज़ ग्रीन वाले रिश्तेदार दसेक मिनट घर आकर बैठे और फिर वे भी चले गए। अब वे चारो भाई ही रह गए थे। बोतल खुली पड़ी थी। जल्दी ही नीचे चली गई। अजमेर ने शिन्दे से कहा-

''जा, लीटर वाली ही उठा ला।''

शिन्दा उठकर गया तो सतनाम बोला-

''भाई, मिंदो भाभी ने अच्छी सेवा की लगती है।''

अजमेर मुस्कराया और उसके चेहरे का रंग उसकी पगड़ी के रंग जैसा बिस्कुटी हो गया। सतनाम ने बलदेव को आँख मारकर बोला-

''तुझे बहुत कहा था, पर तू गया नहीं। नहीं तो भाई वाली सेवा तेरी होनी थी... पर तुझे अब गोरियों की आदत पड़ गई है।''

अजमेर उसकी बात काटते हुए बलदेव से कहने लगा-

''तेरे बारे में सभी फिक्र करते हैं, बंसो बहन ने तेरे लिए कितनी ही लड़कियाँ देख रही हैं, एक बार जा तो सही, अब तो तूने फ्लैट ले लिया है।''

सतनाम ने अजमेर की बात की हामी भरी और कहा-

''मैं तो इसे यही समझाता हूँ कि गोरी औरतें तो रबड़ होती हैं, रबड़ चबाने से पेट नहीं भरते।''

शिन्दा बोतल ले आया। मनजीत और गुरिंदर भी उनके बीच आ बैठीं। गुरिंदर बोली-

''यह तो भाइयों की खास मीटिंग लगती है।''

''जट्टी ! तेरे लाडले को समझाने बैठे हैं कि विवाह करवा ले, नहीं तो छड़े को तो भाई भी बुलाना छोड़ देते हैं, गड़बड़ से डरकर। हाँ, तुझे बताऊँ !''

बलदेव भी जवाब देने के मूड में आ गया और कहने लगा-

''मैं तो कुछ और ही देखता-सुनता आया हूँ कि अपने तो ब्याहते ही एक भाई को थे, भाभी के तीन-चार तो वैसे ही होते थे, पर यहाँ तुम तीन-तीन विवाहित होकर मुझ एक को ही फालतू बनाये जाते हो।''

सभी हँसने लगे। सतनाम बोला-

अरे ओ रांझे, तेरे में हिम्मत नहीं, तू लक्ष्मण की तरह देखता है पैरों की तरफ। देख, ये बैठी है माधुरी दीक्षित, कभी इसकी तरफ सीधा झांक कर भी दिखा।''

''रोयेगा सतनाम सिंह, रोयेगा, जिस दिन माधुरी दीक्षित को पता चलेगा कि उसने इतने साल गुलशन ग्रोवर के साथ ही काट लिए और सन्नी देओल तो इधर घूमता है तो तू बहुत रोयेगा।''

चारों ओर हँसी का ठहाका बिखर गया। बच्चों को उनकी बातों की कोई समझ नहीं आ रही थी। शैरन उठकर आई और गुरिंदर से पूछने लगी-

''मॉम, वट'स दा जोक ?''

''कुछ नहीं, अपने चाचा से पूछ ले।''

शैरन बलदेव की तरफ जाते हुए बोली'

''वट'स दा जोक चाचा जी ?''

''यू कांट गैट इट, इट'स इंडियन साईकी'ज़ जोक।''

मनजीत ने अजमेर से कहा-

''भाजी, हमें भी कोई इंडिया की बात सुनाओ।''

''हाँ, मैं गागू को लेकर तुम्हारे गाँव भी गया था, मिंदो के गाँव भी। लगभग सबसे मिलकर आया हूँ।''

''विवाह कैसा हुआ ?''

''विवाह बढ़िया हो गया। लड़का टीचर और लड़की भी।''

''गागू तो अब बड़ा हो गया होगा ?''

''पन्द्रहवें में है, मोटर साइकिल दौड़ाये फिरता है, ट्रैक्टर भी। ट्रैक्टर तो मैंने बिकवा दिया, पैसे मिंदों के नाम रख दिए हैं। सोचा कि अगर ज़रूरत पड़ गई तो फिर ले लेंगे।''

सतनाम पूछने लगा-

''गागू मुंडीर(लड़कों की टोली) में तो नहीं बैठता। किसी गलत सोसायटी में न हो, पीला पटका ही न बांधे घूमता हो।''

''वो तो सारा पंजाब मारे डर के बांधे घूमता है। जिधर जाओ, पीली चुन्नी या पीली पगड़ी। पर ये सब टेम्परेरी है। मैं गागू को समझाकर आया हूँ कि वह जितना चाहे पढ़े और फिर घर को संभाले। लड़कियाँ बराबर की हो चली हैं।''

शिन्दा उसकी बातें सुन सुनकर खुश हो रहा था। धीरे-धीरे सभी को व्हिस्की को असर होने लगा। पहले पब में भी पीकर आए थे। अजमेर बोला-

''आज तुम सभी इकट्ठे बैठे हो, बलदेव के साथ बात करो, पूछो कि यह क्या चाहता है ? हमारे संग शामिल क्यों नहीं होता?''

''भाजी, शामिल, शामिल कैसे नहीं मैं... शामिल हूँ तभी तो बैठा हूँ।''

''यह बैठना भी कोई बैठना हुआ, हम सबका कहना मान। यह देख इतने बन्दे बैठे हैं, पूरा टब्बर, ये जो फैसला कर दे, वहाँ खड़ा हो... विवाह करवा, रैडिंग वाली लड़की अच्छी-भली थी। कोई दूसरी देख देते हैं, नहीं तो इंडिया ही हो आ।''

कहकर अजमेर ने गुरिंदर की ओर और फिर बार-बार सबकी ओर देखा। सभी उससे सहमत थे। बलदेव बोला-

''भाजी, मुझे भी अकेले घूमना अच्छा नहीं लगता, पर हर बात का अपना हिसाब होता है और हर बात अपना टाइम लेती है।''

''चल, ये तेरा पर्सनल मामला है। दूसरी बात जो ज्यादा इम्पोर्टेंट है वो यह कि तू घर के किसी कार्य-व्यवहार में हमारे साथ नहीं खड़ा होता, हमेशा ही भागता है।''

''यह तो भाजी, तुम्हारा मुकाबला करना मेरे लिए मुश्किल है। तुम हो दोनों बिजनेस मैन और मेरी छोटी सी नौकरी है जिसमें मेरा गुज़ारा ही बड़ी मुश्किल से होता है।''

''अगर मुश्किल होता है तो नौकरी छोड़कर बिजनेस कर ले। उस वक्त कितना अच्छा मौका तूने गवां दिया, तुझे मैं लेकर दे रहा था वो गोरे वाली शॉप।''

''भाजी, यह अहसान मुफ्त में मेरे सिर न चढ़ाओ। तुम मुझे नहीं लेकर दे रहे थे, तुम तो हिस्सा डालकर मुझे तनख्वाह पर रखना चाहते थे। तनख्वाह तो मैं अब भी ले रहा हूँ।''

बलदेव की इस बात ने अजमेर को गुस्सा दिला दिया। लेकिन वह चुप रहा। सतनाम को पता था कि यह चुप साधारण नहीं थी। उसने बात को संभालने के लिए कहा-

''तनख्वाह को तू खर्च कहाँ करता है ? गोरियों की गिनती कम कर दे।''

''गोरियों के लिए मैं क्या महाराजा पटियाला हूँ।''

''पता नहीं साली क्या बात है तेरे में... मैं तेरे से ज्यादा सुन्दर हूँ, मेरे ऐनक भी नहीं लगी, इतने साल हो गए मेरे पर कोई गोरी नहीं मरी।'' सतनाम हैरानी प्रकट करते हुए कह रहा था।

अजमेरे ने अपना पैग एक साँस में पिया और बोला-

''दैट्स योर आउन प्रॉब्लम्ज़... मेरी बात यह है कि मैंने इसके संग एक ही बात करनी है। मैं इसका हिसाब कर देता हूँ। यह अपना हिस्सा दे, और दे भी अभी ही।''

''कौन सा हिसाब ?''

''भाइये के फ्यूनरल का, उस वक्त बंसे को पैसे भेजे, अब ब्याह किया, सबने हिस्सा डाला, तूने पैनी नहीं दी। पहले यह हिस्सा दे और आने वाले सब खर्चे जो इंडिया के हैं, वे भी देने पड़ेंगे। अपने शेयर से तू भाग नहीं सकता।''

''भाजी, मैं अफोर्ड नहीं कर सकता। फिर मुझे ये खर्च इतने ज़रूरी नहीं लगते। भाइये के फ्यूनरल के लायक तो उसकी पेंशन आती थी, बंसो बहन का हम सारी उम्र बोझ नहीं उठा सकते... तुम ब्याहे गए हो, बड़े बने हो तो खर्च भी कर दो। मैंने अभी-अभी फ्लैट लिया है, मेरे पास फिजूल खर्च करने के लिए कोई पैसा नहीं।''

''सौ बातों की एक बात, अगर हमारा भाई है तो यह हिस्सा हर हालत में देना पड़ेगा, नहीं तो...।''

''नहीं तो क्या ?''

''वो दरवाज़ा है और वो सीढ़ियाँ।''

(जारी…)

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