शुक्रवार, 11 जनवरी 2008

गवाक्ष (प्रवेशांक)-जनवरी 2008

नव वर्ष 2008 में हम ब्लाग की दुनिया में एक नया “गवाक्ष” खोल रहे हैं जिसके माध्यम से हम हिन्दी ब्लाग-प्रेमियों को हिन्दी/पंजाबी के उन प्रवासी लेखकों/कवियों की समकालीन रचनाओं से रू-ब-रू करवाने का प्रयास करेंगे जो अपने वतन हिन्दुस्तान से कोसों दूर बैठकर अपने समय और समाज के यथार्थ को अपनी रचनाओं में रेखांकित कर रहे हैं। “गवाक्ष” के इस प्रवेशांक में इटली में रह रहे पंजाबी कवि विशाल की कविताओं का हिन्दी अनुवाद तथा लंदन में रह रहीं हिन्दी की जानी-मानी लेखिका दिव्या माथुर की कहानी- “खल्लास” प्रस्तुत कर रहे हैं।


तीन पंजाबी कविताएं
विशाल(इटली)

अपने मठ की ओर


वक्त के फेर में चक्कर खाता
अपने अंदर ही गिरता, संभलता
घर जैसे सारे अर्थों की जुगाली करके
न खत्म होने वाले सफ़र आँखों में रखकर
मैं बहुत दूर निकल आया हूँ
तू रह–रहकर आवाज न दे
इस कदर याद न कर मुझे
लौटना होता तो
मैं बहुत पहले लौट आता।

समन्दर, हदें, सरहदें भी
बहुत छोटी हैं मेरे सफ़रों से
चमकते देशों की रोशनियाँ
बहुत मद्धम है मेरे अंधेरों के लिए

पता नहीं मैं तलाश की ओर हूँ
कि तलाश मेरी ओर चली है
मुझे न बुला
खानाबदोश लौट के नहीं देखते
मैं अपने अस्तित्व पर
दंभी रिश्तों के कसीदे नहीं काढूँगा अब।

बड़ी मुश्किल से
मेरे अंदर मेरा भेद खुला है
छूकर देखता हूँ अपने आप को
एक उम्र बीत गई है
अपने विरोध में दौड़ते
मैंने रिश्तों और सलीकों की आंतों के टुकड़े करके
अपना सरल अनुवाद और विस्तार कर लिया है
तिलिस्म के अर्थ बदल गए हैं मेरे लिए।

रकबा छोटा हो गया है मेरे फैलाव से
यह तो मेरे पानियों की करामात है
कि दिशाओं के पार की मिट्टी सींचना चाहता हूँ
जहाँ कहीं समुन्दर खत्म होते हैं
मैं वहाँ बहना चाहता हूँ।

रमते जब मठों को अलविदा करते हैं
तो अपना जिस्म
धूनी पर रखकर ही आते हैं...।

नाथों का उत्सव


उन्होंने तो जाना ही था
जब रोकने वाली बाहें न हों
देखने वाली नज़र न हो
समझने और समझाने वाली कोई बात न बचे।

अगर वे घरों के नहीं हुए
तो घरों ने भी उन्हें क्या दिया
और फिर जोगियों... मलंगों...साधुओं...
फक्कड़ों...बनवासियों...नाथों...
के संग न जा मिलते
तो करते भी क्य॥

वे बस यही कर सकते थे
अपनी रूह के कम्बल की बुक्कल मारकर
समझौतों के स्टाम्प फाड़ते
अपने गवाह खुद बनते
अपनी हाँ में हाँ मिलाते
अपने ध्यान–मंडल में
संभालकर अपनी सृष्टि
छोड़कर जिस्म का आश्रम
अपने उनींदेपन की चिलमें भर कर
चल पड़ते और बस चल ही पड़ते।

फिर उन्होंने ऐसा ही किया
कोई धूनी नहीं जलाई
पर अपनी आग के साथ
सेका अपने आप को
कोई भेष नहीं बदला
पर वे अंदर ही अंदर जटाधारी हो गए
किसी के साथ बोल–अलाप साझे नहीं किए
न सुना, न सुनाया
न पाया, न गंवाया
बस, वे तो अंदर ही अंदर ऋषि हो गए
खड़ांव उनके पैरों में नहीं... अंदर थीं।

उनके पैरों में ताल नहीं
बल्कि ताल में उनके पैर थे
भगवे वस्त्र नहीं पहने उन्होंने
वे तो अंदर से ही भगवे हो गए

उन्होंने अपनी मिट्टी में से
सुंगधियों को खोजने जाना ही था
फिर वे कभी निराश नहीं हुए
अपितु हमेशा ही उत्सव में रहे
कइयों का न होना ही
उनका होना होता है


जब मैं लौटूंगा

माँ ! जब मैं लौटूंगा
उतना नहीं होऊँगा
जितना तूने भेजा होगा
कहीं से थोड़ा...कहीं से ज्यादा
उम्र जितनी थकावट
युगों–युगों की उदासी
आदमी को खत्म कर देने वाली राहों की धूल
बालों में आई सफ़ेदी
और क्या वापस लेकर आऊँगा...

क्या मैं तुझे बता सकूँगा
कि रोज मेरे अंदर
एक कब्र सांस लेती थी
कि कैसे अपने आप को
जिंदा भ्रम में रखने के लिए
अपने ही कमरे में
प्रवेश करते समय दरवाजा थपथपाता था
यह जानते हुए भी कि
कोई दरवाजा नहीं खोलेगा
और न ही किसी ने आलिंगन में लेना है
न ही किसी ने घूर कर देखना है
न ही किसी ने नाराज होना है
और न ही किसी ने माफ करना है
बस, एक आलम पैदा होना है
जहाँ आदमी अपने आप को टोह कर देखता है।

माँ ! ज्यादा से ज्यादा क्या ले आऊँगा
बाप के गले में लटकाने वाली घड़ी
या मेज पर रखने वाला टाइमपीस
कि बहुत तड़के अलार्म के साथ
वह दो वक्त की रोटी के लिए
अपनी आँखों पर चढ़ा कर चश्मा
घर का चक्कर लगाता रहे
या फिर तेरी वास्तव में ही
खत्म होती जा रही नज़र के लिए
कोई रांगला सा फ्रेम
ताकि तेरे जे़हन में से
कहीं बेटे का फ्रेम टूट न जाए।

तुझे कैसे बताऊ ए माँ
तेरे इस भागे हुए पुत्र को
कहीं भी टिकाव नहीं था
रोज रात में
चौके में पकती मक्की की रोटी की महक
जब याद आती थी
एक बार तो इस तरह लगता था
कि तू बुरकियाँ तोड़–तोड़ मुँह में डाल रही है
उन पलों में मैं
एक आह से बढ़कर कुछ नहीं होता था

माँ, तू तो मुझे हमेशा
अपना सुशील बेटा ही कहती रही थी
यह जानते हुए भी
कि सुबह की पहली किरण से लेकर
रात की आखिरी हिचकी तक
मैंने तेरे लिए छोटे–छोटे दुख पैदा किए थे
मुझे वे सब कुछ अच्छी तरह याद है
कि मेरी रातों की आवारगी को लेकर
कैसे तू सूली पर टंगी रहती थी
बस इस आस में
कि मेरा बेटा कभी तो कोख का दर्द पहचानेगा
कभी तो बेटों की तरह दस्तक देगा...

पर माँ जब मैं लौटूंगा
ज्यादा से ज्यादा क्या लेकर आऊँगा
मेरी आँखों में होंगे मृत सपने
मेरे संग मेरी हार होगी
और वह थोड़ा सा हौसला भी
जब अपना सब कुछ गवां कर भी
आदमी सिकंदर होने के भ्रम में रहता है
और फिर तेरे लिए छोटे–छोटे खतरे पैदा करुँगा
छोटे–छोटे डर पैदा करुँगा
और मैं क्या लेकर आऊँगा।
हिंदी रूपांतर : सुभाष नीरव

कवि संपर्क–
Vishal
PZA, MATTEOTTI-34
46020-PEGOGNAGA(MN)
ITALY




हिंदी कहानी

खल्लास
दिव्या माथुर(लंदन)

दो उँगलियों को पिस्तौल की तरह साध कर जब नीरा ने 'खल्लास' कहा तो रोज़ी के कान खड़े हो गये। गुंडो के चक्कर में पति हेनरी को तो वह खो ही चुकी थी, उसे लगा कि उसकी बेटी भी कहीं अपने पिता के नक्शे कदम पर न चल निकली हो।
"क्या कहा तुमने?" रोज़ी ने सशंकित हो पूछा।
"खल्लास का मतलब क्या होता है, माँ?" जवाब देने के बजाय नीरा ने माँ से प्रश्न किया।
“अपशकुन, निरा अपशकुन,” उस समय तो रोज़ी बस यही कह पाई थी। नीरा ने एक बार पिता से भी यही प्रश्न पूछा था तो बजाय जवाब देने के, वह उसे अपने साथ पिस्तौल क्लब ले जाने को तत्पर हो गए थे। हेनरी अधिक पढ़ा लिखा नहीं था और न उसे अपनी मातृभाषा के विषय में ही कुछ पता था, किंतु बचपन में किसी साथी से सुना ये शब्द उसकी ज़ुबान पर चढ़ गया था और उसके होंठो पर थिरकता रहता था। शायद वह जानता था कि इस जीवन में तो उसका काम तमाम हो चुका था। जिसे प्यार करता था, वो उसे घास नहीं डाल रही थी और जिसे वह पसंद भी नहीं करता था, वह उसकी पत्नी थी।
“वेयर आर यू टेकिंग हर, आर यू मैड?” भयभीत रोज़ी ने उससे पूछा।
“यू शट अप वूमन, शी मस्ट लर्न टू शूट बिफोर समवन शूट्स हर।"
अब तो हेनरी भी नहीं रहा, किसी ने छेड़ा छाड़ी की तो बेटी को कौन बचाएगा। रोज़ी बस अब एक ही रट लगाए थी कि नीरा अपने बचपन के दोस्त पीटर से विवाह रचा ले। गुंडे बदमाशों के शहर, हार्ल्सडन में रहना कोई मज़ाक की बात न थी पर नीरा जानती थी कि घर बसाना एक बात है और आंधी में एक जीर्ण-शीर्ण छप्पर को बचाए रखना दूसरी।
मुहल्ले में रहने वाला पीटर रोज़ी को अच्छा और टिकाऊ लड़का लगता था। वह नीरा का दीवाना भी था। उसे बस यही समझ नहीं आता कि भला नीरा को और क्या चाहिए? उधर नीरा सोचती कि पतला-दुबला मर्गिल्ला-सा पीटर अपनी तो रक्षा कर नहीं सकता, भला उन दोनों की रक्षा क्या करेगा। नीरा के संरक्षण की वजह से ही पीटर स्कूल में बुलींग से बचा हुआ था और जिसकी एवज़ में ही शायद वह माँ-बेटी का बहुत ध्यान रखता था।
रोज़ी ही की तरह, नीरा के पांव भी सदा यथार्थ की धरा पर ही टिके रहते थे और वह जानती थी कि अपने बलबूते पर तो वह अपने मुहल्ले के बाहर कदम भी नहीं रख सकती। उसने अपनी परिस्थिति का अच्छी तरह से जायज़ा ले लिया था। विवाह करके भी वह हार्ल्सडन में तो सुरक्षित नहीं रह सकती। हार्ल्सडन के बाहर की दुनिया उसने कभी देखी ही नहीं और जो देखी वो उसके लिए एक सपना ही थी।
सोलहवां साल लगते ही नीरा एक गुलाब सी खिल गयी थी और कुछ महीनों से नीरा के पीछे भँवरे भी मंडराने लगे थे। रोज़ी के लिए एक नई परेशानी खड़ी हो गई थी। हर जगह तो वह बेटी के साथ जाने से रही। अभी तक तो पड़ौसी माँ बेटी की इज्ज़त करते हैं पर अब जबकि नीरा जवान हो गई है, वे कब तक अपनी खैर मनाएंगी। रोज़ी ने सोचा था कि अब जबकि उसकी बेटी कमाने लायक हो गई है, माँ का हाथ बंटाएगी और वह थोड़ा-सा सुस्ता लेगी। सुपरबाज़ार में बारह से अठारह घंटों की शिफ्ट अब नहीं होती रोज़ी से। हालाँकि रोज़ी ये कहते नहीं थकती थी कि बेटी हो तो नीरा जैसी, जिसका अभी तक कोई ब्वाय फ्रेण्ड तक न बना था, वो भी उस देश में जहाँ पाँच-छ: वर्ष की आयु के बच्चे सैक्स के विषय में सब जानकारी रखते हैं और जहाँ की बच्चियाँ बारह तेरह वर्ष की उम्र में माँ बन जाती हैं। खूबसूरत होने के साथ साथ नीरा पढ़ाई में भी होशियार थी। चार विषयों में उसने ‘ए‘ लेवल किया था। हार्ल्सडन के किसी परिवार से इसकी आशा रखना बहुत कठिन है। रोज़ी के कदम ज़मीन पर नहीं पड़ रहे थे। हेनरी होता तो शराब पीकर पूरे मुहल्ले में हल्ला मचाता। ‘ब्लैस हिज़ सोल,’ रोज़ी के मुंह से निकल गया।
रोज़ी और नीरा को त्योहारों का बहुत चाव था। वे हेनरी से भी श्री लंका के रीति रिवाज़ो के बार में पूछती रहतीं कि कहीं वह यह न सोचे कि उसकी बीवी और बेटी दुनियाँ भर के त्योहार मनाती फिरती हैं किंतु उससे पूछती भी नहीं कि उसके परिवार में कौन-कौन है, वह श्री लंका से कब और क्यूँकर यहाँ पहुंचा। बिल्कुल अलग किस्म का था हेनरी, जिसका हर त्योहार केवल दारू पीकर ही मनता था। लंदन में जन्मी और पली बढ़ी नीरा का मिज़ाज़ न जाने कैसे गोआ निवासियों का-सा था। संगीत और नृत्य की शौकीन नीरा को अलग अलग धर्मों के प्रति बड़ा रुझान था। जहाँ वह अपनी गुजराती सहेली भावना के साथ दीवाली मनाती और गरबा नाचती, वहीं एक मुसलमान लड़की आएशा के साथ ईद मनाती और सिवैयाँ पकाती।
हालाँकि बचपन से वह अफ्रीकियों के बीच पली बढ़ी थी, नाज़ुक-सी छुई मुई नीरा को भारी भरकम और काले लोग आक्रमक लगते थे। विशेषत: हार्ल्सडन शहर के ग़रीब लोग, जो कमियों की सौगात के साथ पैदा होते, स्टेट से मिली सुविधाओं के सहारे जीते और मर जाते पर उनके जोश और स्फूर्ति की दाद देने को भी नीरा का मन करता। मन ही मन चाहती कि अ़फ्रीकी लोगों की तरह वह भी कमर और कूल्हे मटका सके। अकेले में अभ्यास भी करती किंतु प्रयत्न करने के बावज़ूद वह सफल नहीं हो पाई थी। स्कूल में विद्यार्थियों के गुट बने हुए थे, किसी एक अच्छे से दिखने वाले अ़फ्रीकी सहपाठी के साथ अलग से मिल बैठना असंभव था।
अ़फ्रीकियों के प्रीतिभोज रात देर से शुरु होते और अल्लसुबह तक जारी रहते बीच बीच में नोंक-झोंक करते हुए कुछ मेहमान सड़क पर निकल आते और कारों की हेडलाइट्स जलाकर खूब हल्ला मचाते जब वे हाथापाई पर उतर आते तो मुहल्ले के दुखी लोग पुलिस को बुला लेते, डरते-डरते कि कहीं उपद्रवियों को पता चल गया कि किसने फोन किया था तो अगले दिन उसकी खैर नहीं। जबकि रोज़ी को ये धूम-धड़ाम बिल्कुल पसंद नहीं थी, विशेषत: जब कि सुबह सुबह उसे काम पर जाना होता, नीरा को इस शोर शराबे में बड़ा मज़ा आता था।
नीरा सबकी नज़र में थी। सड़क पर चलते हर व्यक्ति की नज़र उस पर टिके बगैर नहीं रहती थी। सुपरमाके‍र्ट में मुसलमान लड़कियों को बुर्का पहने देखती तो रोज़ी सोचती कि काश वह भी नीरा को भी बुर्का पहन कर बाहर निकलने को कह सकती किंतु नीरा तो एक से एक नए फैशन के कपड़े पहनना चाहती थी और हर परिधान में वह सुंदर दिखती थी। रोज़ी को लगता कि विवाह हो जाने पर नीरा सुरक्षित हो जाएगी। किंतु उसे शायद ये पता नहीं कि अब समय बदल चुका है। विवाहित होना कोई गारेंटी नहीं है कि एक युवती शांति से रह पाएगी, वो भी हार्ल्सडन में। नीरा को लगता था कि उसने यदि ढीले ढाले पीटर से विवाह कर भी लिया तो गुंडे उसे एक हफ्ता भी जिंदा नहीं रहने देंगे। वैसे भी नीरा अब तक उससे छोटे भाई-सा स्नेह करती आई है।
जिस दिन नीरा को वैस्टमिन्स्टर कालेज में दाखिला मिला, उसी दिन मिला एक प्रेम प्रस्ताव जिसे देख कर मां-बेटी दोनों की ही नींद उड़ गई। दूसरे दर्जे के एक गुंडे, जानी ने नीरा से अकेले में मिलने का न्यौता भेजा था। जानी से न दोस्ती भली, न ही दुश्मनी। माँ-बेटी दोनो ही जानती थीं कि जानी को ‘न’ करना छोटे-मोटे निठल्ले गुंडो को दावत देने के बराबर था। जहाँ ये खबर फैली कि नीरा ने जानी को इंकार कर दिया है, अन्य गुंडे उस पर चील-कऊओं की तरह टूट पड़ेंगे। क्रोध में भरकर जानी स्वयं परोस देगा नीरा को उन सबके आगे।
यूँ तो नीरा के हेनरी का बॉस मार्टिन भी एक गुंडा ही था किंतु वह एक शरीफ़ गुंडा था, जो नीरा को बचपन से पसंद करता था। हेनरी की हत्या के बाद उसने माँ-बेटी का सालों ध्यान रखा बावजूद इसके कि नीरा उसे अपने पिता की आकस्मिक मृत्यु का दोषी ठहराती रही। रोज़ी ने नीरा को कई बार समझाया कि हेनरी की हत्या में मार्टिन का कोई दोष न था, बल्कि वह तो हेनरी की हत्या के बाद महीनों तक किसी से न बोला और न ही चर्च गया। फिर भी यदि ये प्रस्ताव मार्टिन की ओर से आया होता तो नीरा को इसमें कोई आपत्ति न होती। पीटर से विवाह करके तो नीरा उसे भी इस दलदल में खींच लाएगी। उसकी जान बचा भी पाई तो वह उसका दलाल बनकर रह जाएगा। बेटी की बात सुनकर रोज़ी भौंचक-सी रह गईं थी। कितनी दूर की सोच के बैठी थी नीरा। उन्हें विश्वास नहीं हुआ पर ठीक ही तो कह रही थी नीरा कि उसके भाग्य में एक गुंडे से ही विवाह लिखा है तो वह गुंडों के सरदार के साथ क्यों न भाँवर ले ताकि बाकी के गुंडे उनके सामने आँख न उठा सकें। पर मार्टिन को जाकर कौन बताए कि नीरा जवान हो गई है।
हाल ही में रोज़ी ने सुपरबाज़ार में काम करना छोड़ एक करोड़पति, जमाइमा फरीद के यहाँ नौकरी कर ली थी, जो लंदन के सबसे महंगे इलाके, मेफेयर में रहती थी। एक हफ्ते के लिये जब फरीद परिवार इटली घूमने गया तो रोज़ी नीरा को जमाइमा का घर दिखाने लाई। उसकी आंखे फटी की फटी रह गईं थीं। उसने ऐसे घर अभी तक केवल फिल्मों में ही देखे थे। उस महल जैसे घर में बारह शयन कक्ष थे और अधिकतर कमरों में शानदार गुसलखाने थे। जिम्ज़ और ज़कूज़ी के अलावा तैरने के दो पूल्स भी थे जिसमें वह जी भर के तैरी थी। उस हफ्ते सारे नौकरों ने खूब मज़ा किया था।
उसी हफ्ते हार्ल्सडन में गुटों से संबंधित दो हत्यायें हुई थीं। पूरा पुलिस महकमा उसी में व्यस्त था। बी बी सी पर लगातार इस सनसनीखेज़ घटना की चर्चा हो रही थी। मार्टिन का इस घटना से कोई संबंध नहीं था, फिर भी उसका घर पुलिस की निगरानी में था। अपने पब को सुरक्षित रखने के अलावा, उसे हिंसा में वैसे भी कोई रुचि नहीं थी। पिछले ही कुछ सालों में न जाने कितने ड्रगडीलिंग गिरोह बने और बिगड़े और न जाने कितनी हत्यायें एक इसी छोटे से शहर में हुईं कि घरों के दाम धूल चाटने लगे। शरीफ़ लोगो को अपने बड़े-बड़े घर सस्ते दामों में बेच कर छोटे-छोटे फ्लैट्स में दूर-दूर जाकर बसना पड़ा।
जमाइमा को जब पता लगा कि रोज़ी हार्ल्सडन में ही कहीं रहती है तो उसने जि़द की कि वह उसे वहाँ ले जाए। रोज़ी ने उसे बहुत समझाया किंतु जमाइमा नहीं मानी। वह तो यह सोच कर रोमांचित हो रही थी कि जो अब तक वह पर्दे पर देखती आई है, अपनी आंखो से देखेगी, ढिशूम-ढिशूम, गरीबी, रंगबिरंगे लोग और चोरी चकारी। एक दोपहर रोज़ी को लेकर अपनी बड़ी-सी बी एम डब्लयु में बैठ कर वह चल दी। रोज़ी और ड्राइवर को चिंता थी कि वहाँ उनकी इतनी महंगी गाड़ी पर न जाने कितनी खरोंचे लगें। चाकू अथवा चाबी से दूसरों की शानदार गाडि़यों को नुकसान पहुंचाने का यहाँ एक रिवाज़-सा है।
ऐसा कुछ नहीं था कि जो जमाइमा को साफ नज़र आता, सिवा इसके कि हार्ल्सडन की मुख्य सड़क के आस-पास का इलाका एक कठोरता लिये हुए था, जहाँ निट्ठल्ले अफ्रीकी लोग टहलते या ठहरे से लगते थे, जैसे कि इस शहर के भाग्य में केवल बदकिस्मती ही बदा हो। मुख्य सड़क पर एक बेखबर काला आदमी झूम-झूम कर नाच रहा था, एक बेहद मोटी स्त्री ज़ोर ज़ोर से चिल्ला रही थी, ‘वर्ल्डज़ इज़ फुल आव सिन, डूम्स डे इज़ राउनड द कॉर्नर, और वी आर गोइंग टु पैरिश सून इत्यादि।
एकाएक न जाने कहाँ से एक गंदा-सा आदमी, जिसमें से बदबू के भभके उठ रहे थे, उनकी कार की खिड़की में अपना चेहरा घुसा कर बोला, ‘डार्लिंग, गिम्मी सम मनी।' जमाइमा के तो होश ही उड़ गए। रोज़ी ने उस आदमी को डांट कर खिड़की का शीशा ऊपर चढ़ा लिया। भीड़ इतनी ज्यादा थी कि ड्राइवर गाड़ी को हिला तक नहीं पाया। 'यू बिच' कहकर उस आदमी ने कार के शीशे पर थूक दिया।
“हाऊ डू यू लिव हियर, रोज़ी?” घबराई हुई जमाइमा को रोज़ी अपने घर ले आई जहाँ नीरा ने उसकी बड़ी खातिर की। जमाइमा को नीरा इतनी भाई कि उसने उसे अपनी निजी सचिव के रुप में नौकरी दे दी, जिसमें अच्छे वेतन के अलावा, खाने-पीने और रहने की भी व्यवसथा थी। जानी से यहाँ छिपे रहना बड़ा आसान था। नीरा को लगा जैसे कि प्रभु यीशु ने उसकी सुन ली हो।
“बेटी, सोच समझ कर हाँ कहना, तुम्हें अभी कोई अनुभव भी तो नहीं है।" रोज़ी ने कहा तो नीरा ने सोचा कि माँ न जाने क्यों टांग अड़ा रही हैं। न जाने उसे इससे अच्छी नौकरी फिर मिले न मिले।
मेफअर के इस धनाढ़य इलाके में केवल राजपरिवार के लोग और अरबपति ही बसते हैं और यहीं बसी थी जमाइमा, जिसके महलनुमा घर में सब बड़े अदब से पेश आते थे। कोई गाली-गलौज नहीं, शोर शराबा नहीं और न ही कोई गंदगी, हर चीज़ साफ सुथरी, यथास्थान। फरीद की दो बीबियाँ थी, जिनसे उसके पाँच बच्चे थे, तीन बेटे और दो बेटियाँ, जिनकी त्वचा और बाल मखमल से मुलायम थे। नौकर-चाकरों की कोई कमी नहीं थी, तीन ड्राइवर थे, दो खानसामें और चार नौकरानियाँ, जिसमें से दो बच्चों की देखरेख के लिये थीं। रोज़ी तो थी ही बच्चों के होमवर्क आदि की निगरानी के लिये। गोआ में वह एक प्राइमरी स्कूल में अध्यापिका थी। लंदन में बसने के बाद भी उसने एक स्थानीय स्कूल में नौकरी की थी किंतु कुछ एक महीने में ही वह वहाँ से भाग खड़ी हुई थी। पश्चिम संस्कृति से कोई अछूता नहीं था गोआ किंतु वहाँ के बच्चे अध्यापकों की इतनी बेइज्जती नहीं करते थे, यहाँ के बच्चे तो उसे जंगली जानवरों से भी बदत्तर नज़र आए, जिन्हें न बात करने की तमीज़ थी और न ही पढ़ने-लिखने में कोई रुचि। वे इतने उत्पाती और आक्रमक थे कि कभी-कभी तो अध्यापकों को अपनी जान के लाले भी पड़ जाते थे। माँ बहन की गालियाँ सदा उनकी ज़ुबान पर रहती थीं। नाबालिग बच्चे ड्रग्स का शिकार थे और उनसे निबटना रोज़ी के बस के बाहर की बात थी।
रोज़ी की शिक्षा और प्रशिक्षण का पूरा का पूरा लाभ नीरा को मिला। दिन और रात मेहनत करके रोज़ी ने अपनी बेटी को एक ऐसा आदर्श नागरिक बनाया, जिसका उदाहरण न केवल उसके स्कूल में, अपितु आस पड़ोस में भी दिया जाता था। कमल-सी खिलीं थीं माँ-बेटी किंतु थीं तो कीचड़ में ही न, कब तक खड़ी रह पाएंगी यही सोचती।
नीरा का काम था जमाइमा के फोनों और पत्रों के जवाब देना, उसकी डायरी संभालना और जहाँ भी जमाइमा जाए, उसके साथ रहना। जमाइमा कई चैरिटीज़ की अभिवावक थी, बड़े-बड़े जलसों की सदारत करती थी। नीरा को तो लगा कि वहाँ काम धाम तो कुछ होता नहीं था, बस खाना-पीना और हा हा ही ही। इन अमीरों को तो बस कुछ शग्ल चाहिए।
जमाइमा का पति फरीद उम्र में उससे बीस-पच्चीस साल बड़ा था। नीरा को बड़ा अजीब लगता कि वही फरीद जो स्वयं दूसरी लड़कियों के साथ मौज मस्ती करता फिरता था, अपनी ही बच्चियों के प्रति इतना कठोर कैसे हो सकता है। बच्चियों के माथे पर से ज़रा कहीं कपड़ा खिसका नहीं कि वह चिल्लाने लगता। हाँ, जमाइमा चाहे किसी पुरुष के साथ उठे-बैठे, उसे कोई एतराज़ नहीं। शायद इसीलिए कि वह पति की रखेल से अधिक नहीं जो उसके दोस्तों का स्वयं मनोरंजन ही नहीं करती, अपितु पति की पसंदीदा युवतियों को उसे उपलब्ध भी कराती है। नीरा को ये समझ नहीं आ रहा था कि कैसे कोई पत्नी अपने ही पति को किसी और स्त्री के हवाले करने को तैयार हो सकती है? जमाइमा में ही क्या कमी है कि फरीद किसी और के पीछे भागता फिरे? रोज़ी जानती थी जमाइमा और फरीद के लफड़े और इसीलिए जब जमाइमा ने नीरा से नौकरी की बात की थी तो रोज़ी को अच्छा नहीं लगा था।
दो दिन की चांदनी में अभी नीरा नहा ही रही थी कि पता लग गया कि इतना वेतन और सुविधाऐं किसी को मुफ्त में ही नहीं मिल जातीं। हर चीज़ की एक कीमत होती है। हार्ल्सडन में रहने वाला विल्सडन या किल्बर्न के ख्वाब तो देख सकता है किंतु मेफअर या मार्बल आर्च में घर बसाने की सोच भी नहीं सकता। उस बड़े से घर में भी फरीद की नज़रों से नीरा का बचना नामुमकिन था। नीरा ने दबी ज़ुबान में जमाइमा से एक-दो बार इस बात जि़क्र किया पर वह टाल गई।
"कम आन नीरा, एंजौय यौरसैल्फ, "
"बट मैडम…”
“जस्ट ए लिटल बिट्ट आफ़ फ़न, इट मीन्ज़ नथिंग।"
जमाइमा खुद चाहती थी कि नीरा उसके पति का मनोरंजन करे। जमाइमा ने उसे बड़ा फुसलाया कि वह जीवन भर भी कमाएगी तो उसे इतने मूल्यवान उपहार और धन इकट्ठा नहीं कर पाएगी। एक बारगी तो उसका मन हुआ भी था कि कुछ सालो में जब वह अपनी माँ के लिये यहीं मेफेयर में मकान लेने योग्य हो जाएगी तो छोड़ देगी ये धंधा किंतु उसे ये सब बिल्कुल अच्छा नहीं लगता था। तिस पर माँ का चार पहर का पहरा और हिदायत कि यही सब करना था तो पढ़ने-लिखने की क्या आवश्यकता थी। ये स्वर्ग जैसा घर अब नीरा को नर्क से भी बद्तर लगने लगा था। जमाइमा से ये कहकर कि उसे शहर परिषद में नौकरी मिल गई थी, नीरा घर में हाथ पर हाथ धरे बैठी थी।
खल्लास-खल्लास, सामने दीवार पर दिमागी गोलियाँ दाग़ दाग़ कर नीरा अपने मन की भड़ास निकाल रही थी। उसका मन पुरूषों से इतना विरक्त हो चुका था कि उसे समझ नहीं आ रहा था कि वह अपनी रक्षा कैसे करे। एक तरफ फरीद उसके पीछे हाथ धो कर पड़ा था तो दूसरी ओर पीटर शादी के लिए उसे दिक कर रहा था। जानी न सुनने को तैय्यार न था और न जाने कितने अन्य गुंडे इस इंतज़ार में थे कि मौका देखते ही नीरा को लपक लें। जानी का गुंडा जब उसका जवाब माँगने तीसरी बार घर आया तो नीरा के पास कोई रास्ता नहीं बचा था, सिवा इसके कि वह मार्टिन के पास सहायता मांगने जाए।
"आर यू श्योर नीरा, यू डोंट ईवन लाइक मार्टिन।" माँ ने पूछा
"वाट चौइस डू वी हैव, मम?”
"एंड डोंट डेयर सजैस्ट पीटर अगेन”
"मार्टिन इज़ नौट बैड बट वुड ही मैरी यू? इट विल बी बैटर इफ़ आई टाक टू हिम।"
"नो वे, आई कैन हैंडल हिम, मम, यू नीड नौट वरि।"
अच्छे से तैयार होकर नीरा सुबह-सुबह बेन्ज़ डेन में जा पहुंची। पब में घुसते ही नीरा की नज़र एंजला पर नज़र पड़ी जो बार साफ कर रही थी। चूडि़यों से भी बड़ी-बड़ी चांदी की बालियाँ पहने, बालों में नवयुवतियों जैसा बैंड लगाए और चेहरे पर सदाबहार मुस्कान लिये, वह एक अंग्रेज़ी धुन गुनगुना रही थी। नीरा को देखकर उसका चेहरा खिला, बुझा और फिर खिल उठा।
"ओराइट? नीरा जैसी लड़की यहाँ क्या कर रही है?" वह परेशान थी।
“आइ एम आल राइट, थैंक यू। कैन आइ टॉक विद मार्टिन?"
"मार्टिन," मज़ाकिया तौर पर नीरा को आँख मारते हुए एंजला ने इतनी ज़ोर से गुहार लगाई कि मार्टिन और उसके सभी साथी भागते हुए बाहर आ पहुंचे। मानो किसी ने उनके पब पर हमला बोल दिया हो। उनके परेशान चेहरे देख कर एंजला हो-हो कर हंसने लगी। मार्टिन नीरा को देख कर सकपका गया।
मार्टिन नीरा की ओर कुर्सी बढ़ाता हुआ बोला, "ओराइट?"
"यैस, थैंक यू, कैन आई टॉक विद यू इन प्राइवेट?"
एक बार लगा था कि मार्टिन कह देगा कि जो उसे कहना है, वह सबके सामने कहे। उसके साथियों के चेहरे पर भी कुछ ऐसे ही भाव थे किंतु अगवानी करता मार्टिन नीरा को अपने निजी दफ्तर में ले गया था। नीरा के कमसिन चेहरे को वह अपलक निहार रहा था। सत्तरह साल की युवती और इतनी तेजस्वनी। असल में वह नीरा से इस बीच मिला ही नहीं था। नवयौवना नीरा भी पूरी तैयारी से आई थी। सीधी-सादी किंतु स्मार्ट वेशभूषा में वह झक-झक कर रही थी। नीरा ये देख कर प्रसन्न थी कि मार्टिन भी उसके रुप से अछूता नहीं रह पाया था। बाज़ी जीती-जिताई थी पर नीरा ने खेल जारी रखा कि वह ही मार्टिन की पनाह में आई थी।
टोनी के तीनों पत्रों को मेज़ पर रखते हुए नीरा सीधे-सीधे अपनी बात पर आ गई थी।
"क्षमा चाहती हूँ किंतु मेरे लिए अब और कोई रास्ता नहीं बचा है सिवा इसके कि मैं आपके गिरोह में शामिल हो जाऊँ।" अच्छी अंग्रेज़ी में नीरा बोली।
नीरा के प्रस्ताव को सुन कर मार्टिन स्तब्ध रह गया। कॉकनी (चालू अंग्रेज़ी) में वह हकलाते हुए बोला, "किंतु क्या रोज़ी आपकी माँ को कोई आपत्ति नहीं, क्या वह जानतीं है कि आप यहाँ आईं हैं।"
"वह मेरा विवाह पीटर से रचाना चाहती हैं और जानी का प्रस्ताव ठुकरा कर पीटर से विवाह का नतीज़ा तो आप जानते ही हैं।"
"आप यदि पीटर से शादी करना चाहें तो आपकी सुरक्षा का जि़म्मा मैं ले सकता हूँ।" आंखे झुकाए मार्टिन बोला।
"मैं जानती हूँ किंतु मैं पीटर से विवाह नहीं करना चाहती। उसे मैंने सदा छोटे भाई-सा माना है। स्कूल में जब उसे 'बुली' किया जाता था तो मैं ही उसे बचाती थी।"
मार्टिन को समझ नहीं आ रहा था कि वह क्या कहे।
"मैं जानती हूँ कि एक जवान लड़की को गिरोह में शामिल करना एक बड़ी जि़म्मेदारी है और शायद आपको मेरी ज़रूरत भी न हो किंतु मैं पढ़ी-लिखी हूँ, आपके दफ्तर का सारा काम संभाल सकती हूँ। वैसे पापा की तरह, मेरा निशाना भी बहुत अच्छा है।"
"नहीं वो बात नहीं है…"
"आप अपने साथियों से पूछ कर देख लीजिए। यदि उन्हें आपत्ति न हो तो…"
जैसे ही मार्टिन बाहर गया, नीरा की नज़र उसके दफ्तर की साफ सुथरी और सादी सजावट पर गई। मेज़ पर एक अच्छे किस्म का पेन और डायरी थी, उसका मन हुआ कि देखे कि मार्टिन ने उसमें क्या लिखा है। नीरा को ध्यान आया कि मार्टिन की वेशभूषा भी उसके कमरे की-सी ही थी, सीधी सादी। स्पष्टत वह मार्टिन से बहुत प्रभावित हुई थी। आई तो थी वह अपने जीवन का सौदा करने किंतु अपना दिल दे बैठी थी। अपने को कुछ संयत करके मार्टिन बाहर निकला तो देखा कि उसके साथी दरवाज़े पर कान लगाए बैठे थे।
नीरा जानती थी कि मार्टिन उसे 'न' कह ही नहीं सकता था। हालांकि मार्टिन को देख कर नीरा स्वयं भी विचलित-सी थी। शिकार करने को आए, शिकार होके चले वाली कहावत चरितार्थ हो गई थी। साथियों से पूछने वाली बात उसने सिर्फ़ इसलिये कही थी कि उसके साथी कहीं ये न सोंचे कि मार्टिन ने उन्हें घास तक नहीं डाली। उसे काम तो इन सबके साथ ही करना होगा, ये वही लोग हैं, जिन्होंने मार्टिन को पाल पोसकर बड़ा किया है। चाहे मार्टिन को उनसे पूछने की आवश्यकता न हो, इन लोगों की इज़ाज़त लिये बिना यदि उसने नीरा से 'हाँ' कह भी दी तो वह इनका स्नेह और सम्मान खो बैठेगा, जो नीरा कभी नहीं चाहेगी।
नीरा का प्रस्ताव सुनकर वे सभी आश्चर्यचकित थे। स्पष्टत:, गिरोह के पुरुषों को कोई आपत्ति नहीं थी किंतु शैरी को एक नवयुवति की घुस पैठ गले नहीं उतर रही थी। सिवा मार्टिन के शैरी ही उस गिरोह की सबसे कम उम्र की सदस्य थी। एक नवयुवती का गिरोह में शामिल होना कहीं उसके महत्व को नगण्य न कर दे। अधेड़ उम्र की शैरी को दो एक सालों से ये चिंता सताने लगी थी कि वह बूढ़ी होने को आई और अब तक अकेली है। हालाँकि वह आज भी बड़ी सुंदर दिखती थी पर उसकी आँखो के नीचे झाँइंयाँ उभर आई थीं, जिन्हें वह सुबह-सुबह फाऊंडेशन के नीचे छिपा कर ही बाहर निकलती थी। अब उसे पब से कोई लगाव नहीं था। जब तक हेनरी जिंदा था, शैरी उसे रिझाने का प्रयत्न करती रही, ये जानते हुए भी कि वह शादीशुदा था और एंजला का दीवाना भी किंतु कोई था जिसे वह मन ही मन चाहती थी। सिड बहुत बूढ़ा हो गया था और वैसे भी उसे अब मार्टिन के अलावा कुछ नहीं सूझता था।
"अगर तुम नीरा पर भरोसा कर सकते हो तो ठीक है।" शैरी और क्या कहती। एंजला को कोई एतराज़ नहीं था। वह मन ही मन वह प्रसन्न थी कि उसकी पुरानी सखी रोज़ी पहाड़ तले आई तो, फिर चाहे बेटी के ज़रिये ही सही और नीरा को वह मन ही मन पसंद करती थी, नीरा एक अच्छी लड़की थी और सबसे बड़ी बात कि वह उसके आशिक की बेटी जो ठहरी।
हेनरी मरते दम तक एंजला का दीवाना रहा। शायद उस अशुभ शाम को उसने अपनी जान भी एंजला के लिये ही गंवाई थी। एक पियक्कड़ ने शराब का गिलास लेते समय एंजला का हाथ पकड़ लिया था। यूँ तो पबो में किसी का हाथ थाम लेना या किसी को चूम लेना आम बात है, किंतु एंजला की तरफ किसी का आँख उठाना भी हेनरी को पसंद नहीं था जबकि ग्राहकों की ऐसी हरकतों पर एंजला को स्वयं कोई एतराज़ नहीं था। हेनरी ने आव देखा न ताव, अँगूठे को हथेली में दबा अपनी दो उंगलियों को पिस्तौल के रूप में उसकी कनपटी पर सीधे तानकर बोला, "खल्लास।"
दोस्तों के उकसाने पर उस पियक्कड़ ने एक झटके से हेनरी की पिस्तौलनुमाँ उंगलियाँ मरोड़ दीं। हेनरी ने उसके गाल पर उल्टे हाथ की एक धौल जमाई ही थी कि मार्टिन ने बीच बचाव करवा के हेनरी को घर भेज दिया किंतु होनी को कुछ और ही मंज़ूर था। उस रात हेनरी कुछ अधिक ही पिये हुए था। रास्ते में उसने गुंडो को फिर ललकारा तो बात हाथापाई पर उतर आई। जब तक मार्टिन के गिरोह के सदस्य घटना-स्थल पर पहुंचते, हेनरी को चाकू घोंपा जा चुका था। सिड और एंजला के समझाने के बावजूद कि हेनरी मर चुका था, मार्टिन उसे कार में लाद कर अस्पताल ले गया था। कहीं किसी स्तर पर उसे सदा लगता रहा कि उसकी वजह से ही एक निर्दोष बच्ची का पिता छिन गया, एक स्त्री विधवा हो गई। तिस पर नीरा की घृणा उसे अलग कुतरे जा रही थी। उसके मन में छिपी पीड़ा एक रूपक कविता के रूप में बह निकली जो उसने हेनरी की मय्यत पर सबको पढ़ कर सुनाई। उस दोपहर को चर्च में नीरा के अलावा, कई दुश्मनों के भी दिल जीत लिये थे मार्टिन ने।
रोज़ी बहुत दिन तक बड़बड़ाती रही कि न वह मनहूस एंजला उनकी जिंन्दगी में आती और न ही माँ-बेटी को ये दिन देखना पड़ता। यूँ देखा जाए तो एंजला ने हेनरी की विनय पत्रिका कभी स्वीकार नहीं की किंतु एक अड़ियल टट्टु की तरह हेनरी अड़ा ही रहता यदि मार्टिन ने उसके आगे गोआ से आई रोज़ी से विवाह करने का प्रस्ताव न रखा होता। एक तरह से ये सुझाव एंजला का ही था ताकि हेनरी उसकी जान छोड़ दे। एक ओर जहाँ हेनरी मार्टिन को मना नहीं कर सका, दूसरी ओर वह रोज़ी को भी कभी स्वीकार नहीं कर पाया। रोज़ी को कुछ ही दिनों में ये राज़ मालूम हो गया था किंतु वह क्या कर सकती थी। एक अच्छे क्रिस्चियन की भाँति वह जिये गई कि प्रभु यीशु एक दिन हेनरी को सही रास्ते पर अवश्य ले आएंगे। विवाहित होते हुए भी वह विधवाओं जैसे कपड़े पहनती रही कि हेनरी कभी तो उसे एक अच्छी रंगीन ड्रेस उपहार में देगा, जिसे पहनकर वह सधवा हो जाएगी।
मार्टिन को पढ़ाई से अधिक निशानेबाज़ी और मारने पीटने आदि की ही ट्रेनिंग कहीं ज्यादा मिली किंतु सही मायने में मार्टिन विनम्र और दयालु किस्म का नवयुवक था जिसे लड़ने-भिड़ने का कोई शौक न था। माँ और पिता के अनुग्रह पर उसने पिस्तौल चलाना और सेल्फ डिफैंस जैसी कलाएं सीख लीं थीं किंतु जिनकी ज़रूरत उसे कभी महसूस नहीं हुई क्योंकि उसके गिरोह के सदस्य सदा ढाल बनकर उसके आगे खड़े हो जाते थे। पब में किस्म-किस्म के लोग उठते-बैठते थे, इसीलिए गिरोह को लेकर बैठना और लोगों पर अपना रौब जमाना आवश्यक था। समय-समय पर एक-आध शराबी को धमकी देना और पब से बाहर फेंक देना आदि धंधे के लिये आवश्यक था।
पति को दुश्मन की गोली से बचाती, मार्टिन की माँ स्वयं मारी गई थी। मरते समय उसने बेन से वादा लिया था कि मार्टिन की खातिर, उसे एक जगह टिक कर रहना होगा। बेन के पास केवल इतना ही धन था कि वह हार्ल्सडन जैसी सस्ती जगह में एक बड़ी इमारत सस्ते में खरीदकर उसमें एक पब खोल ले और इस तरह शुरु हुआ बेन्ज़ डेन, जहाँ वह अपने वफादार साथियों के साथ रहने लगा। मुहल्ले वालों के कुनमुने एतराज़ को बेन ने मुफ्त में शराब पिलाकर दबा दिया। बेन की आकस्मिक मौत के बाद, आस पास के कुछ गुंडो ने सिर उठाया था किंतु बेन के वफादार साथियों ने उनकी एक न चलने दी। मार्टिन को सिड और एंजला ही ने पाला था किंतु माँ-बाप की तरह नहीं, एक नाबालिग बच्चे की तरह जिसके माँ-बाप असमय स्वर्ग सिधार गए थे। उनकी नज़र कभी मार्टिन की संपत्ति पर नहीं गई। सब के सब मार्टिन के प्रति पूरी तरह समर्पित थे। पब से अच्छी खासी कमाई हो रही थी और सब ठीक चल रहा था। शैरी पब का सारा काम संभालती और एंजला घर की देखभाल करती। इन दोनों के बीच की खटपट ही रोज़मर्रा की उस रट को तोड़ती जो धीरे-धीरे चढ़ती उम्र की तरह बढ़ रही थी।
नीरा के पब में बैठने के साथ ही पब के ग्राहक बढ़ गए थे। अपनी ओर ग़लत नज़र उठाने का भी मौका नीरा कभी किसी को नहीं देती थी। जहाँ किसी ने छेड़खानी की नहीं कि वह इधर-उधर खिसक लेती। ऐसा तो नहीं कि पब में गाली-गलौज की कमी हुई हो, किंतु अधिकतर ग्राहक अब बड़े अदब से पेश आने लगे थे। नीरा के रूप और 'लेडी लाइक' व्यवहार से सभी प्रभावित थे। शैरी जब अपने बंधे बंधाए ग्राहको को भी नीरा को निहारते पाती तो रूठकर चुपचाप एक कोने में बैठ जाती किंतु नीरा की भोली मुस्कुराहट उसे जल्दी ही अपनी ओर खींच लाती। नीरा का प्रयत्न रहता कि हर वार्तालाप में शैरी को सम्मलित किया जाए।
दो महीनों में ही मार्टिन उसका पूरी तरह से दीवाना हो चुका था। एंजला ने नीरा के मन की टोह ली और मार्टिन ने नीरा को झट हीरे की अंगूठी पहना दी।
जानी तना-तना घूम रहा था। उसकी बीमारी का इलाज थी नीरा, जो मार्टिन से विवाह रचाने जा रही थी। वह जानता था कि मार्टिन की वजह से ही पीटर का विवाह होते-होते रुक गया था। जानी ने समझा कि पीटर उसके दिल की लगी को समझ सकता है। उधर रोज़ी के विश्वास दिलाने पर कि वह नीरा को मना लेगी, पीटर सपने सजा के बैठा था। उसके दोस्तों ने, जो नीरा से उसके विवाह की बात मानने को वैसे भी तैयार नहीं थे, उसका उठना बैठना दूभर कर दिया था। गहरी चोट खाई थी पीटर ने और वह सचमुच जानी का हमदर्द बन बैठा था।
चट मंगनी और पट ब्याह भी हो गया किंतु रोज़ी पूरी तरह से अब भी आश्वस्त नहीं थी और मन ही मन जानती थी कि जब तक वे हार्ल्सडन में हैं, उनकी जान को खतरा बना ही रहेगा। एक तरफ जहाँ जानी का गिरोह अपने पाँव जमा रहा था, मार्टिन और नीरा प्रेम क्रीड़ा में मग्न थे। माँ की चेतावनियों को सनक समझकर वे उन पर कोई कान ही नहीं दे रहे थे। पीटर के मुताबिक जानी भूखे शेर की तरह घूम रहा था और नीरा को पाने के लिए वह कुछ भी करने को तैयार था। पीटर, जो रोज़ी के बहुत करीब था, जानी से हुई अपनी बातचीत उसे बता देता था। चाहे जानी के फंदे में फंस चुका था, वह नीरा को दुख पहुंचते नहीं देख सकता था।
लाचार रोज़ी अपने भाई-भाभी से मिलने पुर्तगाल पहुंच गई कि देखे कि वे लोग नीरा को स्पौंसर कर सकते हैं कि नहीं। वे खुशी-खुशी राज़ी हो गये थे, नीरा को ही नहीं मार्टिन को भी वहाँ बुलाने के लिये। उनके अपने तो कोई औलाद थी नहीं, अकेलेपन को भरने के लिये इससे अच्छा और क्या उपाय हो सकता था। बेटी के साथ-साथ दामाद और फिर उनके होने वाले बच्चे भी तो उनके आंगन में ही खेलेंगे।
रोज़ी खुशी-खुशी लंदन लौटी थी और जब एंजला ने उसे खुशखबरी दी कि वह नानी बनने जा रही है, उसे लगा कि जैसे उसकी सारी चिंताएं छूमंतर हो गईं हों। बच्चे की खातिर ही सही किंतु जब नीरा पुर्तगाल में बसने के लिये मान गई तो मार्टिन के पास क्या चारा था। एंजला और सिड के लिये भी मार्टिन और नीरा की सुरक्षा सर्वोपरि थी।
टैक्सियाँ द्वार पर खड़ी थीं। सामान रखा जा चुका था। काफिला चलने को तैयार खड़ा था। शैरी रुकने को झट मान गई तो एंजला को बड़ी हैरानी हुई कि शैरी और बाहर जाने का कोई मौका छोड़ दे। सिड को विदाई की रस्म से सख्त परहेज़ था। शैरी के कहने के बावजूद कि कुछ ही घंटो की ही तो बात है, वह पब को संभाल लेगी, वह एअरपोर्ट जाने को तैयार नहीं हुआ।
सिवा मार्टिन के, सब लोग टैक्सियों में बैठ चुके थे कि फोन की घंटी सुनाई दी। शैरी, जो दरवाज़े पर ही खड़ी थी, भाग कर अंदर गई और फिर अंदर से ही चिल्लाई, "नीरा, तुम्हारा फोन है।"
"पूछो तो सही किसका फोन है।" एंजला ने झुंझलाते हुए कहा।
"मैं एक मिनट में आई।" नीरा एंजला की बात को अनसुना करती हुई भाग कर अंदर गई। वह हैरान थी कि इस समय किसका फोन हो सकता था किंतु ये सोचकर कि पुर्तगाल से उसके मामा-मामी का फोन होगा ये पूछने को कि वे घर से रवाना हुए कि नहीं या फिर पीटर का, जिसने नीरा के विवाह के बाद से उससे बात करना ही छोड़ दिया था। वह उल्लसित थी कि शायद उसने अब 'बाय' कहने को फोन किया था। उससे बिना मिले या बिना बात किये जाना उसे बिल्कुल अच्छा नहीं लग रहा था।
"नीरा, बी क्विक, वी विल मिस दि प्लेन।" रोज़ी ने हांक लगाई। मार्टिन ने सोचा कि इतनी लंबी बात वह किससे कर रही है कि उसे प्लेन के समय का भी ध्यान न रहे। वह पब की ओर चला ही था कि दरवाज़े पर नीरा दिखाई दी। जानी उसके पीछे था। नीरा की गर्दन को अपने हाथ की लपेट में लिये, उसने पिस्तौल नीरा की कनपटी पर रखी हुई थी। अपनी जेब में पिस्तौल थामें मार्टिन आगे बढ़ा। उसका खून खौल रहा था।
"लीव नीरा टु मी। आई एम रैडी टु स्पेयर यू, मार्टिन।" जानी सीधे-सीधे अपनी बात पर आ गया।
"वाटएवर यू से जानी, बट डोंट हर्ट हर।" मार्टिन गिड़गड़ाया।
"डोंट ट्राइ एनिथिंग फन्नी विद मी, आई एम वार्निंग यू।" नीरा के गले में अपनी बांह का फंदा कसते हुए जानी ने अपनी पिस्तौल की नली उसकी कनपटी पर कुछ और गड़ा दी।
तभी जानी के दो और गुंडों के साथ पीटर दिखाई दिया। जानी ने उन्हें अपनी ओर आने का संकेत दिया।
"फॉर गॉड्स सेक पीटर, शी इज़ प्रैगनैंट," रोज़ी ने नज़दीक से गुज़रते हुए पीटर से कहा तो वह नीरा की ओर देखने लगा। उसका मन भीग-भीग उठा।
"डोंट लिसन टू दैट बिच, पीटर।" जानी पीटर को अपनी ओर खींचता हुआ बोला।
"यू रास्कल," मार्टिन को मौका देती हुई रोज़ी नीरा की ओर भागी।
जानी ने बौखला कर गोली चला दी, रोज़ी वहीं ढेर हो गई। बौखलाई हुई नीरा अपनी माँ की लाश पर बिछ गई और ज़ोर-ज़ोर से विलाप करने लगी।
इसी बीच साँसों को संभालता बूढ़ा सिड दरवाज़े के बीचों बीच आ खड़ा हुआ।
"मार्टिन, माई चाइल्ड, वी आर आल डूम्ड, शैरी हैज़ सोल्ड अस टू द डैविल।" इससे पहले कि सिड कुछ और कहता, शैरी ने उस पर गोली चला दी। एंजला दौड़ कर दम तोड़ते हुए सिड के पास आ बैठी। अपने कान को सिड के मुंह पर लगाए वह केवल यह भर सुन सकी कि शैरी ने ही जानी को नीरा और मार्टिन के लंदन छोड़ने की खबर दी थी। फोन के बहाने नीरा को अंदर भी उसने ही बुलाया था, जहाँ जानी उसके इंतज़ार में छिपा खड़ा था।
"यू स्नेक, यू बिच, यू होर।" एंजला को दगाबाज़ शैरी के लिये उपयुक्त शब्द नहीं मिले तो वह उसका गला घोंटने पर उतारू हो आई।
"लीव शैरी एलोन, अदरवाइज़ आई विल किल दैट सन आफ ए होर।" जानी का निशाना अब मार्टिन पर था।
"जानी डार्लिंग, डोंट हर्ट मार्टिन। यू हैव प्रोमिस्ड पीटर, लेट हिम टेक नीरा एंड गो।" एंजला की ओर गर्व से देखते हुए शैरी ने कहा मानो स्थिति उसके वश में हो।
"डोंट टेल मी वाट टू डू, बिच।" जानी ने उसे पूरी तरह से नज़रंदाज़ कर दिया था। वह इतनी हैरान और परेशान थी कि उसे समझ ही नहीं आया कि ये कहर उस पर कहाँ से टूटा।
"यू बास्टर्ड, यू सन आफ ए बिच," कहती हुई बेहाल शैरी जानी की ओर लपकी।
जानी नियंत्रण खो चुका था। शैरी को अपने रास्ते से हटाने के लिए उसने गोली चला दी। इससे पहले कि मार्टिन गोली चलाता, क्रोधित पीटर ने जानी को अपना निशाना बना कर गोली चला दी किंतु बिजली की-सी फुर्ती से जानी ने नीरा को अपने आगे कर लिया।
नीरा के सिर से उफनता खून ज़मीन पर सुनामी-सा फैलने लगा। नीरा का खून देख कर पीटर मानो पागल हो गया। उसने एक के बाद एक गोलियाँ दागनी शुरु कर दीं। जानी उसके सीधे निशाने पर था। दूसरा साथी भौंचक्का-सा खड़ा था। अपनी पिस्तौल वह पीटर पर साध ही रहा था कि मार्टिन ने गोली चला दी किंतु इससे पहले की मार्टिन की गोली उसे लगती, जानी का दूसरा गुंडा पीटर पर गोली चला चुका था। मृत्यु के वक्त पीटर की व्यथित आँखे नीरा पर ही टिकी थीं।
लाशों से घिरा मार्टिन नीरा के पास जा बैठा।
"खल्लास," रोज़ी के होंठो पर एक शब्द कुछ देर के लिए ठहरा और फिर फिसल गया।
"नहीं नीरा, अभी नहीं।" एक आखिरी गोली की आवाज़ हवा में देर तक गूंजती रही।
दूर से आते पुलिस की गाडि़यों के साइरन सुनाई दे रहे थे जो इस शहर के लिये रोज़मर्रा की बात थी। अपने-अपने घरों में लोग नाश्ता करते रहे, सांस रोके, टी वी के सामने बैठे, समाचार सुनने को बेताब कि पड़ौस में आज सुबह क्या घटा था।

संपर्क :
83-A Deacon Road,
London NW2 5NN
E-mail : divyamathur@aol.com



अनुरोध




“गवाक्ष” में उन सभी प्रवासी लेखकों की समकालीन रचनाओं का स्वागत है, जो अपने वतन हिंदुस्तान की मिट्टी से कोसों दूर बैठे अपने समय और समाज के यथार्थ को हिंदी अथवा पंजाबी भाषा में अपनी रचनाओं के माध्यम से रेखांकित कर रहे हैं। रचनाएं कृतिदेव अथवा शुषा फोन्ट में हों या फिर यूनीकोड में। रचना के साथ अपना परिचय, फोटो, पूरा पता, टेलीफोन नंबर और ई मेल आई डी भी भेजें। रचनाएं ई मेल द्वारा ही भेजें। हमारा ई मेल आई डी है- gavaaksh@gmail.com

7 टिप्‍पणियां:

अनिल रघुराज ने कहा…

सुभाष जी, विशाल की कविताएं जबरदस्त हैं। कल इनकी झांकी गवाक्ष के लिंक के साथ मैं अपने ब्लॉग पर लगा रहा हूं। शायद आपको इस पर कोई आपत्ति नहीं होगी।

Ila ने कहा…

बहुत सुन्दर कविताएँ । इतनी मर्मस्पर्शी रचनाओं के लिए विशाल जी को जितनी बधाई दी जाए , कम है!

छत्‍तीसगढिया .. Sanjeeva Tiwari ने कहा…

सराहनीय प्रयास, स्‍वागत ।
संजीव
त्रिलोचन : किवदन्ती पुरूष

Alpana Verma ने कहा…

सुभाष जी, आप के ब्लॉग पर प्रवासी रचनाकारों को एक साथ पढने का मौका मिलेगा.
यह आप का एक सराहनीय प्रयास है .
प्रस्तुत कवितायें ब्लॉग का स्तर बढ़ा रही हैं.कहानी भी अच्छी है.
सभी रचनाकारों को भी बधाई.
शुभकामनाएं.
-अल्पना वर्मा

रवीन्द्र प्रभात ने कहा…

सुभाष जी,यह आपका सराहनीय प्रयास है ,प्रवासी रचनाकारों में विशाल की कविताएं मर्मस्पर्शी है,अच्छी है,अपने वतन हिंदुस्तान की मिट्टी से कोसों दूर बैठे सभी रचनाकारों को भी बधाई!

Jitendra Dave ने कहा…

Subhaashji,
Bahut hi laazavaab kaam kiyaa hai aapne. Sahitya ke tathaakathit vaad-vivaad se pare aap saahitya ki khari sevaa kar rahe hain. Content toh umdaa hai hi, layout bhi jaandaar hai. Meri shubhkaamnaayen sadaa aapke saath hain.

नीरज गोस्वामी ने कहा…

“गवाक्ष” के माध्यम से आप बहुत सराहनीय काम कर रहे हैं. आज पूर्णिमा जी की कवितायें पढ़ कर आनंद आ गया. वे बहुत संवेदनशील कवयित्री हैं और उनके जैसी अभिव्यक्ति भी बहुत कम लोगों में देखी है. उनकी ताज़ा रचनाओं में बारिश के कितने ही रंग, रिमझिम और मधुरता भरपूर दिखाई दी.
नीरज