सोमवार, 6 फ़रवरी 2012

गवाक्ष – फरवरी 2012


जनवरी 2008 “गवाक्ष” ब्लॉग के माध्यम से हम हिन्दी ब्लॉग-प्रेमियों को विदेशों में रह रहे हिन्दी/पंजाबी के उन लेखकों/कवियों की समकालीन रचनाओं से रू-ब-रू करवाने का प्रयास करते आ रहे हैं जो अपने वतन हिन्दुस्तान से कोसों दूर रहकर अपने समय और समाज के यथार्थ को अपनी रचनाओं में रेखांकित कर रहे हैं। “गवाक्ष” में अब तक विशाल (इटली), दिव्या माथुर (लंदन), अनिल जनविजय (मास्को), देवी नागरानी(यू.एस.ए.), तेजेन्द्र शर्मा(लंदन), रचना श्रीवास्तव(लंदन), पूर्णिमा वर्मन(दुबई), इला प्रसाद(यू एस ए), भगत धवन (डेनमार्क), चाँद शुक्ला (डेनमार्क), वेद प्रकाश ‘वटुक’(यू एस ए), रेखा मैत्र (यू एस ए), तनदीप तमन्ना (कनाडा), प्राण शर्मा (यू के), सुखिन्दर (कनाडा), सुरजीत(कनाडा), डॉ सुधा धींगरा(अमेरिका), मिन्नी ग्रेवाल(कनाडा), बलविंदर चहल (न्यूजीलैंड), बलबीर कौर संघेड़ा(कनाडा), शैल अग्रवाल (इंग्लैंड), श्रद्धा जैन (सिंगापुर), डा. सुखपाल(कनाडा), प्रेम मान(यू.एस.ए.), (स्व.) इकबाल अर्पण, सुश्री मीना चोपड़ा (कनाडा), डा. हरदीप कौर संधु(आस्ट्रेलिया), डा. भावना कुँअर(आस्ट्रेलिया), अनुपमा पाठक (स्वीडन), शिवचरण जग्गी कुस्सा(लंदन), जसबीर माहल(कनाडा), मंजु मिश्रा (अमेरिका), सुखिंदर (कनाडा), देविंदर कौर (यू के) और नीरू असीम(कैनेडा) आदि की रचनाएं और पंजाबी कथाकार-उपन्यासकार हरजीत अटवाल के उपन्यास “सवारी” के हिंदी अनुवाद की तेंतालीसवीं किस्त आपने पढ़ीं। “गवाक्ष” के फरवरी 12 अंक में प्रस्तुत हैं – मंजु मिश्र की कुछ कविताएँ तथा हरजीत अटवाल के धारावाहिक पंजाबी उपन्यास “सवारी” की चौवालीसवीं किस्त का हिंदी अनुवाद…

कैलिफोर्निया(यू।एस.ए.) से

मंजु मिश्रा की कुछ कविताएँ

ख्वाहिशें - कुछ अलग अलग रंग

1
मेरी ख्वाहिशों ने
रिश्ते जोड़ लिए आसमानों से
उगा लिए हैं पंख
और उड़ने लगी हैं हवाओं में
अब तो बस !
ख़ुदा ही ख़ैर करे !!
2
अल्लाह !
ये ख्वाहिशों की उड़ान
कहीं, दम ही न ले ले
ख़ुदा ही जाने,
पांव कहाँ तक साथ देंगे ?
3
रोशनी चुभती हैं
पांवों के छाले फूटते हैं
आँखों के ख़्वाब दम तोड़ते हैं
ऐसे में भी जीने की ख्वाहिश
वल्लाह ..
ज़िंदगी भी क्या चीज है !
4
कितनी ख्वाहिशों ने
दम तोड़े हैं
तब कहीं जा कर
यह तजुर्बे की चाँदी चढ़ी है
बाल धूप में नहीं पकते !!



क्षणिकाएं : चलो जुगनू बटोरें...



1
रिश्ते,
बुनी हुयी चादर
एक धागा टूटा
बस उधड़ गए…
2
देहरी के दिए की
लौ कांपती है,
बाहर आंधियां तेज हैं
3
हमेशा अनबन-सी रही,
आँखें और होठ
अलग-अलग राग अलापते रहे
4
चलो जुगनू बटोरें
चाँद तारे
मिलें न मिलें …

मुट्ठी भर सुख का पावना

समय
जब अपनी बही खोल कर बैठा
हिसाब करने,
तो मैं
सोच में पड़ गयी...

पता ही नहीं चला
कब
मुट्ठी भर सुख का पावना
इतना बढ़ गया, कि
सारी उम्र बीत गयी
सूद चुकाते चुकाते
मूल फिर भी
जस का तस



सन्नाटा : अलग-अलग अंदाज़

1
यूँ तो
ख़ामोश है रात
पर सन्नाटे का भी
अपना अलग राग है

सुनो तो कान देकर -
सुनाई देंगी
रात की सिसकियाँ
2
ख़ामोश सी फिजायें
चुप चुप -सा है समां
फ़िर भी रात
सन्नाटी नहीं
3
तोड़ लो
मगर ख़ामोशी से,
सितारों के फूल...
चाँद न जागे
सन्नाटे का जादू टूट जायेगा
००


मंजु मिश्रा
जन्म : 28 जून 1959, लखनऊ(उत्तर प्रदेश)।
शिक्षा : एम। ए.(हिन्दी)
सृजन : कविताएँ, हाइकु, क्षणिकाएँ, मुक्तक और ग़ज़ल।
सम्प्रति : व्यापार विकास प्रबंधक, कैलिफोर्निया (यू।एस.ए.)
ब्लॉग :
http://manukavya.wordpress.कॉम
ईमेल :
manjushishra@gmail.com

13 टिप्‍पणियां:

बलराम अग्रवाल ने कहा…

कितनी ख्वाहिशों ने
दम तोड़े हैं
तब कहीं जा कर
यह तजुर्बे की चाँदी चढ़ी है
बाल धूप में नहीं पकते !!
***
तोड़ लो
मगर ख़ामोशी से,
सितारों के फूल...
चाँद न जागे
सन्नाटे का जादू टूट जायेगा

जैसी कविताएँ मंजु को परिपक्व कवयित्री सिद्ध करती हैं। विश्वास है कि अपने बाल उन्हें धूप में नहीं पकाने पड़ेंगे और सितारों के फूल आसानी से उनकी झोली में आ जाएँगे। चाँद जागे न जागे, कविता का सन्नाटा तोड़ने का माद्दा तो उनमें है ही।
शुभकामनाएँ।

डॉ. जेन्नी शबनम ने कहा…

sabhi rachnaayen utkrisht. behad bhaavpurn...

रिश्ते,
बुनी हुयी चादर
एक धागा टूटा
बस उधड़ गए…
Manju ji ko badhai.

बेनामी ने कहा…

मंजू जी की कविताओं का भी एक अलग अंदाज है जो उनकी पहचान बनाने के लिए काफी है| सभी कवितायेँ अच्छी लगीं|
इला

संगीता स्वरुप ( गीत ) ने कहा…

गहन भावों को अपनी क्षणिकाओं में समेटा है ॥ हर रचना खूबसूरत ...

सहज साहित्य ने कहा…

मंजु जी की सैंकड़ों कविताएँ पढ़ी हैं। कोई कविता किसी से भी कम नहीं है। नया चिन्तन, नई उद्भावना , शब्द-संयम सभी कुछ बेजोड़ । दरअसल दिल में पाकीज़गी हो तो चेहरे पर रौनक स्वत: आ जाती है । यही बात कविता पर भी लागू होती है ।सभी कविताओं के लिए मंजु जी को हार्दिक बधाई !

PRAN SHARMA ने कहा…

SUSHREE MANJU MISHRA KO UNKEE
ACHCHHEE KAVITAAYON KE LIYE
BADHAAEE . BADEE BAAT KO
THODE SHABDON MEIN KAHNE KEE DAKSH
LAGTEE HAIN VAH .

रूपसिंह चन्देल ने कहा…

बहुत सुन्दर कविताएं. ख्वाहिशें- अलग अलग अंदाज बहुत ही सुन्दर.

चन्देल

KAHI UNKAHI ने कहा…

बहुत सुन्दर...बेहतरीन रचनाओं के लिए मेरी बधाई...।
प्रियंका

manukavya ने कहा…

सभी पाठकों का हार्दिक धन्यवाद !
सादर
मंजु

Udan Tashtari ने कहा…

बहुत उम्दा....पसंद आई...

डॉ. हरदीप कौर सन्धु ने कहा…

मंजु जी की सभी कविताएँ बहुत ही उम्दा और ऊँची सोच लिए हैं | हर कविता अलग-अलग अंदाज में लिखी होने के बावजूद नई दिशाएँ दिखाती हैं और संदेश भी छोडती हैं | मंजु जी को हार्दिक शुभकामनाएँ !
हरदीप

Dr.Bhawna ने कहा…

Lmbi bimari ke baad aap sabko padhne ka avsar mila...sabhi rachnayen eak se badhkar eak hain bahut2 badhai...

भारतेंदु मिश्र ने कहा…

बहुत मार्मिक कविताएँ हैं,मंजू जी को बधाई।