रविवार, 1 मार्च 2009

धारावाहिक पंजाबी उपन्यास(किस्त- 12)



सवारी
हरजीत अटवाल
हिंदी अनुवाद : सुभाष नीरव

॥ सत्रह ॥

लंदन की अंडरग्राउंड वाली नॉर्दन लाइन पर टफनल पॉर्क नाम का स्टेशन है, जिसका मुख्य द्वार टफनल रोड की तरफ निकलता है। यहाँ से बायें मुड़ें तो कुछ दूर जाकर डार्ट माऊथ हाउस नाम की एस्टेट है। बहुत बड़ी नहीं है। सौ के करीब फ्लैट होंगे। पहले टफनल रोड की इस जगह पर घर हुआ करते थे जिनके दरवाजे इस रोड की तरफ खुलते थे। घरों की मुनियाद खत्म हो गई तो गिरा कर यह एस्टेट बना दी गई। अब इस एस्टेट के फ्लैटों की पीठ टफनल रोड के साथ लगती है। इस एस्टेट के आँगन में एक कार पॉर्क है और एक छोटा-सा पॉर्क बच्चों के खेलने के लिए भी है, जिसमें बच्चों के फिसलने और झूलने का प्रबंध भी किया हुआ है। इस एस्टेट में ही ग्रांट का फ्लैट था जहाँ मैरी ठहरी हुई थी। जब से यह एस्टेट बनी थी, ग्रांट तभी से यहाँ रह रहा था। सारी एस्टेट ग्रांट को जानती थी। करीब सौ फ्लैटों के लोग एक-दूजे को जानते थे। अजनबी आदमी का पता एकदम चल जाता। पर मैरी उनके बीच परायी बनकर नहीं आई थी। वह ग्रांट की बहन थी। ग्रांट के बीमार होने के कारण सभी उससे सहानुभूति रखते थे। ज़रूरत पड़ने पर उसकी सहायता भी करते।
वैसे ग्रांट बीमार तो करीब दो साल से था पर शुरूआत में इस बीमारी का पता नहीं चला। रोज का पियक्कड़ होने के कारण छोटे-मोटे दर्द को नशे के नीचे दबा लेता होगा। अब पिछले छह महीनों से उसकी हालत खराब थी। अब तो वह विटिंग्टन अस्पताल की ऐसी मंजिल पर था जहाँ पर गम्भीर मरीज ही जाया करते हैं। कइयों का विचार है कि यहाँ पहुँचने वाले मरीजों की मौत निश्चित होती है। इसके बाद तो मरीज को हौसपीट्स ही भेजा जाता जहाँ रख कर उसकी मौत को आसान बनाया जाता है। दर्द से मारफीन जैसे दवाई देकर या आत्मिक विश्वास के लिए प्रार्थनायें आदि करके।
मैरी के परिवार को ग्रांट के बीमार होने की सूचना उसकी पड़ोसिन बूढ़ी मोअ से मिली थी। ग्रांट का घरवालों से कोई ज्यादा वास्ता नहीं था। अब कोई रास्ता न देख ग्रांट ने कह कर फोन करवाया था। पहले उसका बड़ा भाई आया था और कुछ दिन यहाँ रहा था। लेकिन पीछे फॉर्म का काम होने के कारण उसे डैरी लौटना पड़ा था। अब मैरी आई थी। परिवार की ओर से अब उसे यह काम सौंपा गया था। अब मैरी खाली भी थी और डैरी में रहकर ऊबी हुई भी थी। अगर कुछ समय पहले उसे ऐसा कहा जाता तो उसके लिए डैरी को छोड़ना कठिन हो जाता। उस समय मैरी की ज़िंदगी ठीक थी, पर अब जैसे नरक हुई पड़ी थी। जब उसे लंदन आने का कहा गया तो बग़ैर सोचे-समझे वह मानो दौड़ ही पड़ी थी।
मैरी की अपने पति से अनबन चल रही थी। यह अनबन तो पिछले कई बरस से थी। उसके पति टैंड ने अपने संग काम करती लूना के साथ सम्बन्ध बना लिए थे। यद्यपि वह पक्का क्रिश्चियन था, पढ़ा-लिखा और गर्वमेंट की नौकरी पर था, फिर भी वह फिसल गया था। मैरी को मालूम हुआ तो घर की शांति भंग हो गई। टैंड अपनी हरकत से बाज नहीं आया, इसलिए मैरी पर असर यह हुआ कि उसे अपने साथ काम करते अध्यापक रे से नाता जोड़ने में हवा मिल गई। यही कारण था कि उसका घर टूटने की कगार पर पहुँच गया। उनका एक बेटा भी था- मिच्च। उनका झगड़ा शहर भर में फैल गया। उनके पादरी को पता चला तो उसने दोनों को बुला कर समझाया, सच्चे क्रिश्चियन के फ़र्ज के बारे में बताया। कन्फैशन बॉक्स में ले जाकर दोनों से कन्फैशन करवाया। जीसस से माफी मंगवाई और उन्हें घर में दुबारा रहने योग्य बनवाया। इसके बाद एक बरस ठीकठाक गुजरा, फिर पहले जैसा होने लगा। टैंड ने लूना को छोड़ने से इन्कार कर दिया था। मैरी अपनी माँ के पास जाकर रहने लगी थी। अब लंदन आने की बात हुई तो वह एकदम तैयार हो गई। बेटा मिच्च तो पहले ही टैंड के पास रहता था इसलिए उसे डैरी छोड़ने का दु:ख भी नहीं था।

डैरी से चलते समय उसने कुछ भी नहीं सोचा था लेकिन जहाज में बैठते ही उसे चिंताओं ने घेर लिया कि लंदन पहुँचकर वह हालात से कैसे निपटेगी। एक तो वह लंदन पहली बार आ रही थी, दूसरा यहाँ कोई उसका परिचित भी नहीं था। ग्रांट की पड़ोसिन बूढ़ी मोअ के साथ ही उसकी फोन पर बातचीत होती थी। उसके पास ही ग्रांट के फ्लैट की चाबी थी। मोअ ही कभी-कभी ग्रांट को देखने अस्पताल जाया करती थी। मैरी ने हीथ्रो उतर कर पिकडली लाइन पकड़ी और फिर नॉदर्न लाइन लेकर मंजिल पर पहुँच गई। मोअ से चाबी लेकर फ्लैट को रहने योग्य बनाने लगी और फिर ग्रांट से मिलने अस्पताल चली गई।
अगले दिन मैरी खोजने लगी कि यहाँ कोई दोस्त मिल जाए, जिसके साथ वह दो बातें कर सके। ग्रांट के कुछ मित्र मिले पर वे सभी शराबी और निकम्मे थे। कई तो ग्रांट के फ्लैट पर निगाहें जमाये बैठे थे। आजकल कौंसल पहले की भाँति आसानी से फ्लैट अलॉट नहीं करती थी। लम्बी प्रतीक्षा करनी पड़ती थी। इस प्रकार ग्रांट के फ्लैट पर कब्ज़ा करना आसान था। बीच में कई घुंडियाँ थीं कि फ्लैट किसी ओर के नाम चढ़ सकता था। मैरी को आया देखकर सभी के हौसले पस्त हो गए, इरादे नेस्तोनाबूद हो गए। ऐसे लोग ग्रांट की खैर-ख़बर लेने से भी गए।
जब बलदेव ने मैरी को अपने संग ड्रिंक पीने के लिए आमंत्रित किया तो वह खुश हो गई। उसे इंडियन लोग बहुत पसंद थे। डैरी में भी इंडियन थे पर सभी व्यापारी किस्म के थे। वहाँ उनकी अच्छी इज्ज़त थी। यहाँ आकर उसने कौंसल के इन फ्लैटों में कोई इंडियन नहीं देखा था। काले, गोरे, आयरिश सभी थे। एक बात और जो उसे इन लोगों में पसंद थी कि ये लड़ने-झगड़ने वाले लोग नहीं थे। अधिकांश आयरिश लोगों की भाँति हर समय नशे में रहने वाले भी नहीं थे।
शाम को सात बजे नॉर्थ स्टार में पहुँचने का वायदा करके आई थी वह। पैदल दसेक मिनट का रास्ता था पर वह छह बजे ही तैयार हो बैठी। कितनी ही देर तक वह यह सोचती रही कि वह कौन से कपड़े पहने। डेव कैसे कपड़े पसंद करता होगा। बहुत सोच विचार के बाद उसने लाल फूलों वाली स्कर्ट और हल्के लाल रंग का स्लीवलैस टॉप पहन लिया। उसके पास अधिक कपड़े थे भी नहीं। एक बढ़िया सूट उसने ग्रांट की मौत वाले दिन के लिए रख रखा था तथा एक और था अगर फ्यूनरल लंदन में ही करना पड़ा, उसके लिए। वैसे उसके परिवार में यह निर्णय लिया गया था कि ग्रांट की देह आयरलैंड ले जायी जाएगी, वहीं उनकी पारिवारिक कब्रों में उसे दफनाया जाएगा।
वह धीरे-धीरे चलकर नॉर्थ स्टार जा पहुँची। आर्च वे स्टेशन के सामने बने इस पब में जा बैठी। पब का हरा रंग इसके आयरश होने का सबूत था। यह पब नहीं, बल्कि एक तरह का जज़ीरा -सा था। इसके चारों तरफ वन-वे सड़क थी। बड़ा-सा ग्रारुंड अबाउट ही था। पब के साथ एक बड़ा कार पॉर्क था। आयरश संगीत हर वक्त चलता रहता था। दोपहर को आयरश खाना भी मिलता। मैरी यहाँ कल रात भी आई थी। बहुत देर तक बैठी रही थी। कोई ढंग का साथ नहीं मिला था। उसने वाइन का गिलास भरवाया और एक तरफ होकर बैठ गई। घड़ी देखी, अभी सात नहीं बजे थे।
जल्द ही बलदेव भी आ गया। उसे कार खड़ी करने में कुछ वक्त लग गया था। सतनाम ने दो पैग जल्द-जल्दी में पिला दिए थे। अजमेर की तरफ वह गया ही नहीं था। उसे इस बात का गुस्सा था कि उसने दुकान खरीदने वाली बात स्पष्ट क्यों नहीं की कि वह दुकान हिस्सेदारी में खरीदना चाहता था। उसने अपनी कार उठाई और बिना उनसे मिले ही इधर आ गया। गुरां से मिलने को एक बार मन हुआ, पर उसने मैरी को भी समय दे रखा था। पब में घुसते ही सामने मैरी बैठी मिली। उसे देखकर वह खड़ी हो गई। साँपिन जैसा बदन बलदेव को डसने लगा। अब वाली मैरी और दोपहर वाली मैरी में काफी अंतर था। वह मैरी की गोल बांहों और ठोस पिंडलियों को देखता हुआ उसके करीब आ गया। धीमे स्वर में पूछने लगा-
''क्या पिओगी ?''
''कुछ भी।''
''क्या पी रही हो ?''
''वाइन पर जो तू पियेगा, वही मेरे लिए ले आ।''
वह बियर के दो गिलास ले आया और उसके पास बैठ गया। उसने मैरी के चेहरे पर एक निगाह डाली। उसकी नीली आँखें उसे बहुत गहरी प्रतीत हुईं। उसका मन हुआ कि कंधों पर गिरते रेश्मी बालों पर उँगलियाँ फिरा कर देखे। उसने कहा-
''मैरी तू बहुत खूबसूरत है।''
''शुक्रिया...। डेव, तू भी चलते हुए जैंटल जाइंट लगता है।'' कहकर वह मुस्कराई। बलदेव ने पूछा-
''ग्रांट अब कैसा है ?''
''वैसा ही है, धीरे-धीरे मौत की ओर बढ़ रहा है।''
''सॉरी ! मैरी आय एम रियली सॉरी !''
''कोई कुछ नहीं कर सकता। बहुत अजीब स्थिति है डेव।''
''यही दुआ कर सकते हैं कि उसकी मौत आसान हो।''
''हाँ, देव। मैं उसकी आत्मा की शांति के लिए प्रार्थना करती रहती हूँ, पर डेव हम कुछ और बातें करें।''
बलदेव को भी लगा कि ऐसे अवसर पर ग्रांट की बात नहीं करनी चाहिए थी। उसने फिर पूछा-
''तू सिगरेट नहीं पी रही ?''
''मैं स्मोक नहीं करती। बहुत कम करती हूँ जब कभी ज्यादा ही टेंशन में होती हूँ। मैंने उस वक्त दस की डिब्बी खरीदी थी, अभी भी रखी हैं। तू लेगा, डिब्बी निकालूँ ?''
''नहीं मैरी, मैं भी स्मोक नहीं करता। टेंशन में भी नहीं।''
''फिर टेंशन में क्या करता है ?''
''शराब पीता हूँ। शराब भी नहीं पीता, बहुत कम पीता हूँ। यह जब से मैं अब आयरलैंड होकर लौटा हूँ, पीने की कैपेसिटी बढ़ गई लगती है।''
फिर वह उसके बारे में बातें करने लगा। मैरी अपनी अध्यापिका की नौकरी छोड़ने की कहानी सुनाती रही। टैंड और लूना के इश्क के बारे में बताती रही। बलदेव ने भी बता दिया कि उसकी पत्नी और दो बेटियाँ अलग रहती हैं। रेलवे में क्लर्क था और आजकल सिक लीव लिए बैठा था। अब नौकरी छूट जाने का खतरा बना हुआ था क्योंकि सिक लीव लम्बी हुए जा रही थी। फिर वे उत्तरी आयरलैंड की राजनीति की बातें करने लग पड़े।
मैरी बलदेव की बात को बड़े ध्यान से सुनती और बार-बार बालों को पीछे की ओर झटकती। बलदेव को वह और भी प्यारी लगती। बलदेव दिल से उसका हुआ जाता था। सिमरन के बाद वह किसी से भी भावुक तौर पर जुड़ नहीं पाया था। गुरां से तो वह वैसे भी दूर रहने का प्रयास करता था। उसे चुप देखकर मैरी ने पूछा-
''क्या सोच रहे हो ?''
''सोच रहा हूँ कि जब तू हँसती हो तो तेरी हँसी में से छोटे शहर की खुशबू आने लगती है।''
''वाह, बहुत बारीक नज़र रखते हो।''
''ऐसा अभी हुआ है।''
बलदेव जानता था कि नशा उसे खोल देता था। उसने अपने आप को खुल जाने दिया और मैरी का हाथ पकड़ कर बोला-
''मैरी, मेरे अंदर तेरे लिए बहुत स्ट्रोंग फीलिंग्स पैदा हो रही हैं, मैं तुझे बहुत करीब महसूस कर रहा हूँ।''
''डेव, मुझे इन फीलिंग्स की ज़रूरत है, इस वक्त मैं बहुत अकेली हूँ।''
पब बन्द होने तक वे दोनों शराबी थे। मैरी ने पूछा-
''डेव, अब कार चला सकते हो ?''
''मुझे तो लगता है, बढ़िया चला सकता हूँ। पर रहने देता हूँ, यहाँ से ट्यूब पकड़ कर चला जाऊँगा।''
वे उठकर बाहर निकले तो बलदेव को महसूस हुआ कि वह ठीक था। कार चलाने की स्थिति में था। उसने मैरी से कहा-
''चल आ, मैं तुझे राह में उतार दूँगा।''
पब से निकल वे जंक्शन रोड पर चिप्स की दुकान के आगे खड़े हो गए। मैरी उतर कर दो पैकेट चिप्स के ले आई। बलदेव ने कहा-
''अगली बार तुझे किसी भारतीय रेस्टोरेंट में ले चलूँगा।''
''ज़रूर चलूँगी, मुझे इंडियन भोजन बहुत पसंद है।''
डार्ट माऊथ हाउस के सामने गाड़ी खड़ी करते हुए बलदेव बोला-
''मैरी, तेरी मंजिल आ गई।''
''तेरी मंजिल दूर है, तू नशे में भी है, यहीं क्यों नहीं रह जाता ?''
बलदेव सोच में पड़ गया। वह झिझक रहा था। मैरी ने कहा-
''कोइ एतराज है ? मुझे कोई बीमारी नहीं, मैं साफ औरत हूँ।''
''नहीं नहीं, मैंरी, यह बात नहीं।''
''फिर चल अंदर, कार पॉर्क कर।''
बलदेव ने अंदर खड़ी कारों के बीच कार खड़ी कर दी। मैरी उससे पूछने लगी-
''डेव, कंडोम है ?''
''मैरी, मैंने ऐसा सोचा ही नहीं था।''
''अच्छा... पर गुड ब्वॉय बन कर रहना।''
00
(क्रमश: जारी…)

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अनुरोध

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रविवार, 8 फ़रवरी 2009

गवाक्ष – फरवरी 2009



“गवाक्ष” के माध्यम से हम हिन्दी ब्लॉग-प्रेमियों को हिन्दी/पंजाबी के उन प्रवासी लेखकों/कवियों की समकालीन रचनाओं से रू-ब-रू करवाने का प्रयास कर रहे हैं जो अपने वतन हिन्दुस्तान से कोसों दूर बैठकर अपने समय और समाज के यथार्थ को अपनी रचनाओं में रेखांकित कर रहे हैं। “गवाक्ष” के पिछ्ले बारह अंकों में पंजाबी कवि विशाल (इटली) की कविताओं का हिन्दी अनुवाद, दिव्या माथुर (लंदन) की कहानी, अनिल जनविजय (मास्को) की कविताएं, न्यू जर्सी, यू.एस.ए. में रह रहीं देवी नागरानी की ग़ज़लें, लंदन निवासी कथाकार-कवि तेजेन्द्र शर्मा, रचना श्रीवास्तव, दिव्या माथुर की कविताएं, दुबई निवासी पूर्णिमा वर्मन की कविताएं, यू एस ए में रह रहीं हिन्दी कथाकार-कवयित्री इला प्रसाद, डेनमार्क निवासी कवि भगत धवन की कविताएं, डेनमार्क निवासी चाँद शुक्ला की ग़ज़लें, यू एस ए निवासी कवि वेद प्रकाश ‘वटुक’ तथा कवयित्री रेखा मैत्र की कविताएं और पंजाबी कथाकार-उपन्यासकार हरजीत अटवाल के उपन्यास “सवारी” के हिंदी अनुवाद की दस किस्तें आपने पढ़ीं। “गवाक्ष” के फरवरी 2009 अंक में प्रस्तुत हैं –कनाडा से पंजाबी कवयित्री तनदीप तमन्ना की कविताएं तथा यू के में रह रहे पंजाबी कथाकार-उपन्यासकार हरजीत अटवाल के धारावाहिक पंजाबी उपन्यास “सवारी” की ग़्यारहवीं किस्त का हिंदी अनुवाद…

पंजाबी कविता


कनाडा से
तनदीप तमन्ना की पाँच कविताएं
हिंदी रूपान्तर : सुभाष नीरव

1
पीर


यह कलम भी
क्या-क्या उकेरती रहती है
सफ़ेद सफ़ों की छाती पर
काले हाशिये की गुलाम
अंतहीन पीड़ाएं।

और यह ब्रश भी
क्या-क्या चित्रित करता रहता है
कैनवस की
प्यासी धरती पर
सूखे गुलाबों की पत्तियाँ।

पीर तो
बगावत कर
हाशिये की क़ैद तोड़
रोम-रोम में रच-बस जाती है
पर
सूखे गुलाबों की महक
ड्राई फ्लावर अरेंजमेंट का
दायरा कभी नहीं तोड़ती !
00

2
अनलिखा शब्द

दो साँसों के बीच की
ख़ामोशी में
जो अटक कर रह गया
मैं वो शब्द हूँ
अगर लिखा जाता
तो
हज़ारों अर्थ होते।
00


3
मरुस्थल की रेत

तेरा नहीं कोई कसूर
मुमकिन ही नहीं
मेरी पहचान
मैं हूँ
मरुस्थल की रेत।

कहीं-कहीं
टीलों में उगी
रूखी –सी झाड़ियाँ
पत्थरों से
मुहब्बत पालती हैं।

वाकिफ़ हूँ
गिद्धों की चालों का
शिकार होतीं
हसरतों से।

मूल्य जानती हूँ
उस पानी के कतरे का
जिसको
सूखे नयनों में
संभाल लेती हूँ
समन्दर समझ कर।

डरती हूँ
उस हवा से
जो
दिन में कई-कई बार
बदल देती है
मेरी शक्ल-सूरत।

इस पल और हूँ
अगले पल
होऊँगी कुछ और।

तेरा नहीं कोई कसूर
मुमकिन ही नहीं
मेरी पहचान।
00


4
लंदन

अनजाने शहर में
बेमकसद-सी घूमती हूँ
दम घुटता जाता है…
किसी कोने पर
घर का पता नहीं
यहाँ मोमबत्तियों की तरह
पिघलती जाती हैं
शक्लें !
और ट्रेनों से उतर कर
ढलती जाती हैं
दूसरी वस्तुओं में।

जीने के बहाने तलाशतीं
फीकी और नकली हँसी हँसतीं।

तड़कसार
सारा शहर गहरी नींद में
सो रहा है शायद
सिर्फ़ मैं ही नहीं तन्हा
दरख़्तों का एक-एक पत्ता
ख़िज़ा की आमद पर
उदास और बेनूर है।
00

5
रंगों का कोलाज

झड़ने से पहले
पतझरी रुत में
पीले, गुलाबी, दालचीनी रंगे
पत्तों ने
कुछ कहा तो है
कि फिर आएंगे
बहार की रुत में
हरियाली लेकर
फूटेंगे
इसी दरख़्त की टहनियों में से
कभी हमें
चाँदनी रात में
रात के पहले पहर
नूरोनूर होते देखना…

फिर आएंगे
संभाल कर रखना
तब तक हमारी
गुलाबी –सी याद
अश्रु न बहाना
बस, दरख़्त को जाकर
बांहों में भर लेना
समझ लेना
रिश्तों के
रंगों की
खुशबू की कीमत

फिर आएंगे
हरियाली लेकर
पर…
अगली बहार की रुत में
तेरी आँखों में
दो नर्गिसी फूल खिले
देखना चाहते हैं।
00

पंजाबी की युवा कवयित्री। कनाडा में रहते हुए अपनी माँ-बोली पंजाबी भाषा की सेवा अपने पंजाबी ब्लॉग “आरसी” के माध्यम से कर रही हैं। गुरुमुखी लिपि में निकलने वाले उनके इस ब्लॉग में न केवल समकालीन पंजाबी साहित्य होता है, अपितु उसमें पंजाबी पुस्तकों, मुलाकातों और साहित्य से जुड़ी सरगर्मियों की भी चर्चा के साथ-साथ हिंदी व अन्य भाषाओं के साहित्य का पंजाबी अनुवाद भी देखा जा सकता है।
“आरसी” का लिंक है- http://www.punjabiaarsi.blogspot.com/
तनदीप तमन्ना का ई मेल है- tamannatandeep@gmail.com






धारावाहिक पंजाबी उपन्यास(किस्त- 11)

सवारी
हरजीत अटवाल
हिंदी अनुवाद : सुभाष नीरव

॥ सोलह ॥

अजमेर ने यह दुकान घर बेच कर ली थी। उसने एक प्रकार से जुआ ही खेला था। दुकानदारी का उसे कुछ भी पता नहीं था। उसके गाँववाले भजन के पास दुकान थी। वह जब भी मिलता तो काफी गप्पें मारा करता। अजमेर को इतनी तसल्ली थी कि फ्री-होल्ड दुकान थी। अगर नहीं चलेगी तो घर का घर तो था ही। घर की कीमत की ही दुकान थी, पर दुकान चल निकली। सोहन सिंह भी बर्मिंघम से आ गया था। उसकी पेंशन की उम्र हो रही थी। वह दुकान में मदद करवाने लगा। फिर ऐसा हुआ कि टोनी को भी काम पर रखना पड़ा। शाम के वक्त काम अधिक हो जाता था। फिर चोरी भी बहुत होती। चोरी करने वालों में काले लड़के अधिक होते थे। इसीलिए उसने टोनी को काम पर रखा था कि काले लड़के को देखकर काले लड़के चोरी करने से झिझकेंगे। उसका कुछ फायदा हुआ भी, पर टोनी छोटे मोटे झगड़े में आगे नहीं होता था। वैसे टोनी काम के लिए बहुत बढ़िया था। वह सोहन सिंह के साथ मिलकर दुकान संभाल लेता था। अजमेर को पेपर वर्क और शॉपिंग आदि करने में कोई दिक्कत नहीं आती थी। गुरिंदर भी घर के सारे काम सहज रूप में ही कर लेती थी। उसका भी बहुत सा समय दुकान में ही निकल जाया करता।
फिर अजमेर एक और दुकान लेने के बारे में सोचने लगा। इतना तो वह जानता था कि दो दुकानें उस अकेले से संभाली नहीं जा सकेंगीं। इसलिए किसी से पार्टनरशिप के बारे में सोचता रहता और नज़र रखता कि कौन सी दुकान खरीदी जा सकती थी। कौन सी दुकान सही जगह पर थी और गलत मैनेजमेंट के कारण डाउन हुई पड़ी थी। अगर दुकान का मालिक गोरा हो या वृद्ध, तो उसके चलने के अवसर अधिक होते थे। गोरे तो अब दुकानों में अधिक रहे भी नहीं थे। एशियनों का मुकाबला न कर पाने के कारण भाग खड़े हुए थे। एशियन बड़े मार्जिन पर काम किए जाते। दुकान खोलने के घंटे भी बढ़ा देते। और सबसे बड़ी बात यह थी कि उनका पूरा परिवार ही मदद कर रहा था जबकि गोरे इस बात पर मार खा जाते थे।
सतनाम वाली दुकान भी अजमेर ने ही खोजी थी। वह चाहता था कि सतनाम का आधा डलवा ले। दुकान में काम सतनाम ही करे, तनख्वाह ले और मुनाफा आधा-आधा बांट लें, पर सतनाम नहीं माना। सतनाम को यह आधा मंजूर नहीं था। सतनाम ने अकेले ही दुकान ले ली और अजमेर के बराबर हो बैठा था। अजमेर कई बार सोचता कि सतनाम को उसने वह दुकान बताकर बहुत बड़ी गलती की थी। उसे आशा नहीं थी कि सतनाम इतनी जल्दी उसकी बराबरी करने लगेगा।
अब विटिंगटन अस्पताल के सामने एक दुकान बिक रही थी। इसका मालिक नायजल एक गोरा था। उत्तरी लंदन में शायद यह किसी गोरे की आख़िरी दुकान होगी। अजमेर इस दुकान के पीछे बहुत समय से पड़ा हुआ था। नायजल उसे कैश एंड कैरी में मिलता, अजमेर उससे विशेष तौर पर हैलो करने जाता और पता लगाने की कोशिश करता कि वह इस दुकान को कब बेचेगा। अब उसने अजमेर को कह दिया था कि अगर दुकान उसने लेनी है, तो पहल उसी की होगी। उसके बाद ही वह मार्किट में बेचने की बात सोचेगा। अजमेर के मन में आया था कि वह यह दुकान बलदेव के साथ मिलकर खरीद ले। यही कारण था कि वह बलदेव का इंतज़ार कर रहा था। यह दुकान छोड़ी जाने वाली नहीं थी।
दुकान तो शायद वह अकेला भी ले लेता अगर उस रात दुकान में झगड़ा नहीं हुआ होता। कुछ लड़के-लड़कियाँ चोरी करने के इरादे से आ घुसे थे। सोहन सिंह ने उन्हें रोकने का यत्न किया तो उन्होंने उसे पीट दिया और भाग खड़े हुए। अजमेर खुद उस वक्त दुकान में नहीं था। वह सोच रहा था कि यदि वह दुकान में होता तो वह घटना न घटी होती। वह सोचता, उसे स्वयं अपनी दुकान में रहना चाहिए था।
बलदेव को आया देख वह खुश हो गया और उसी समय नायजल को फोन करके दुकान देखने चला गया। बलदेव भी संग ही था। अजमेर बलदेव को बता रहा था-
''यह दुकान बहुत मौके की है, अस्पताल के सामने। पासिंग बाई ट्रेड भी है। और फिर नायजल क्या मेहनत करेगा, बीस साल हो गए इसे यहाँ, यह तो वैसे ही फैड-अप हुआ पड़ा है।''
वैन खड़ी कर वे दोनों दुकान के अंदर चले गए। नायजल और उसकी पत्नी जुआइना ने उनके साथ हाथ मिलाया। नायजल दुकान की तारीफ करते हुए जानकारी देने लगा-
''ऐंडी, मेरा मार्जिन देख, मैं कोई कट प्राइस नहीं करता, किराया भी बहुत कम है, लीज अभी हाल ही में नई करवायी है। अगर मैं दुकान मार्किट में लगा दूँ तो हाथोंहाथ बिक जाएगी।''
''तेरी सही टेकिंग कितनी है और शो कितनी कर रहा है ?''
''टेकिंग मेरी तीन से ऊपर है, कभी बत्तीस सौ, कभी तैंतीस सौ, पर मैं शो पन्द्रह सौ करता हूँ।''
''हम दुकान में खड़े होकर देख सकते हैं ?''
''क्यों नहीं ? यह भी मेरी गारंटी है कि तुम्हारी टेकिंग डबल हो जाएगी। मैं तो पूरे समय खड़ा ही नहीं होता। वैसे मैंने इसे बेचना नहीं था, यह तो फ्रैंक नहीं मानता। वह कहता है कि मैं उसके साथ मिल जाऊँ। वह सी-साइड में बड़ा स्टोर ले रहा है।''
अजमेर ने बलदेव से कहा-
''यह पच्चीस हजार मांग रहा है, हम कम ऑफर करेंगे, बीस में बात बन जाएगी। थोड़ा हाथ फेरने से ही टेकिंग बढ़ जाएगी। ना रखनी हुई तो बेच देंगे।''
''भाजी, इसके ऊपर रहने के लिए नहीं है। लॉक-अप है। मुझे रहने के लिए भी जगह चाहिए।''
''आस पास कोई फ्लैट ले लेना।''
''इतने पैसे मेरे पास नहीं हैं।''
''पैसों का फिक्र न कर।''
उसे लगा, बड़ा भाई कुछ अधिक ही दयालु हो रहा था। बलदेव को सन्देह भी हुआ और अच्छा भी लगा। फैसला यह हुआ कि बलदेव दुकान में खड़े होकर देखेगा कि जितनी सेल नायजल बता रहा था, उतनी होती भी है कि नहीं। अजमेर उसे दुकान में छोड़कर स्वयं चला गया। जुआइना बताने लगी-
''हम बहुत बिजी हो सकते हैं, हम दुकान की तरफ ध्यान नहीं दे पाते, खास तौर पर तब से जब से फ्रैंक ब्राइटन चला गया है। अब हमारा दिल भी वहीं जाकर बस जाने को हो रहा है। अब एक बड़ा स्टोर मिल भी रहा है, फ्रैंक चाहता है कि हम उसके साथ हिस्सेदारी करें, इसलिए बेच रहे हैं। हम चाहते हैं कि जल्दी बिक जाए और हम जाएँ।''
जुआइना एक तरफ हट गई तो बलदेव ग्राहकों को सर्व करने लगा। सर्व करने की उसकी कोई इच्छा नहीं थी। अजमेर की दुकान पर कई बार खड़ा होता था। दुकानों की जो बात उसे अच्छी लगती थी, वह यह थी कि रंग-बिरंगे लोगों के साथ वास्ता पड़ता था। अजमेर की दुकान के बनस्पित यहाँ कुछ अलग किस्म के ग्राहक थे। इनमें से अधिकतर अस्पताल से आने वाले लोग थे जैसे कि नर्सें, डॉक्टर या फिर मरीजों के रिश्तेदार। बलदेव उनसे छोटी-मोटी बात भी करता।
इन ग्राहकों में उसे सबसे जुदा मैरी लगी। मैरी ने आकर सिगरेट की डिब्बी मांगी। उसका आयरिश उच्चारण बिलकुल शुद्ध था, लंदन के किसी मिश्रण के बगैर। बलदेव ने पूछा-
''आयरलैंड से नई नई आयी लगती हो ?''
''हाँ, पर तुम कैसे कह सकते हो ?''
''तेरे एक्सेंट से। मुझे विशुद्ध आयरश एक्सेंट की पहचान हो गई है।''
''वह कैसे ?''
''क्यों कि मैं परसों ही आयरलैंड से लौटा हूँ।''
''यह बहुत खूब रहा। मैं भी परसों ही डैरी से आयी हूँ।''
''मैं वैलज़ी गया था, वाटरफोर्ड के पास।''
''कैसी लगी जगह ?''
''बहुत बढ़िया ! लोग भी बहुत पसंद आए।''
दुकान में इस प्रकार बातें करना जुआइना को पसंद नहीं था। उसके चेहरे के बदलते हाव-भाव देखकर बलदेव चुप हो गया। उसे खामोश देखकर मैरी बोली-
''अच्छा दोस्त, तेरे संग बातें करना अच्छा लगा।''
वह चली गई। बलदेव को जाती हुई मैरी बहुत सुन्दर लगी। बाहर खड़ी होकर उसने हाथों की ओट करके सिगरेट सुलगाई और सड़क पार कर अस्पताल में जा घुसी। बलदेव का मन हो रहा था कि वह भी बाहर निकल जाए और उसके साथ बातें करे। वह सोच रहा था कि मैरी में अवश्य कोई खास बात थी जिसके कारण वह उसकी ओर आकर्षित हो रहा था। नहीं तो इतना समय हो गया था उसे अकेले रहते, किसी भी औरत ने उसके मन को इस तरह नहीं छुआ था।
वह लगभग एक घंटा दुकान में रहा। वह सोचने लगा कि वह तो व्यर्थ ही वहाँ खड़ा था। पहले उसे यह फैसला करना चाहिए था कि उसने दुकान खरीदनी भी है कि नहीं। उसने सोचा, क्यों न पहले किसी से सलाह-मशवरा ही कर ले। शोन से या फिर सतनाम से ही। उसे अजमेर एकदम ही इधर ले आया था। इस दुकान के बारे में सोचने के लिए अभी वह तैयार नहीं था। सब जल्दबाजी में हो रहा था। वह जुआइना से शाम को आने का वायदा करके चला आया।
बाहर निकला तो देखा, अस्पताल की दीवार पर बैठी मैरी सिगरेट पी रही थी। वह अकेली थी। अवश्य किसी परेशानी में थी। बलदेव उसकी तरफ जाते हुए पूछने लगा-
''मैंने तो तुम्हें अस्पताल जाते हुए देखा था, सब ठीक तो है?''
''हाँ, क्या नाम है तेरा ?''
''डेव... तेरा ?''
''मैं मैरी हूँ, डैरी से। अपने भाई को देखने आयी हूँ। ग्रांट बहुत बीमार है, उसे कैंसर है।''
''यह तो बहुत दुख की बात है। डॉक्टर क्या कहते हैं ?''
''उन्होंने क्या कहना है। कहते हैं कि मर रहा है वो, शायद कुछ हफ्ते या महीने दो महीने।''
इतना कहकर वह रोने लगी। बलदेव उसके करीब बैठ गया। उसके कंधे पर हाथ रखते हुए बोला-
''मैरी, मैं तुझे जानता तो नहीं हूँ, पर फिर भी अगर मैं तेरे लिए कुछ कर सकता होऊँ तो...।''
''कोई कुछ नहीं कर सकता, इस बीमारी के आगे किसी का जोर नहीं।''
मैरी ने आँखें पौंछीं और बोली-
''यह तेरी दुकान है ?''
''नहीं, मैं तो इसे खरीदने की सोच रहा हूँ। यूँ ही देखने के लिए खड़ा था।''
''तुम्हारे लोग दुकानों पर बहुत हैं। डैरी में भी हैं।''
''वे अब करें भी क्या ! अच्छी नौकरी देने में ये गोरे झिझकते हैं।''
''झिझकते ही नहीं, बल्कि देते ही नहीं। अब हमें देख, रंग भी इनके जैसा है पर फिर भी फर्क करते हैं।''
''तुम्हारे साथ तो इसलिए करते हैं कि तुम लोगों ने इनकी नाक में दम किया हुआ है।''
''तू तो बहुत दिलचस्प आदमी लगता है। उत्तरी आयरलैंड की सियासत समझने वाला लगता है। तुझसे मिलकर बहुत खुशी हुई।''
''कितने दिन लंदन में रहोगी ?''
''अभी तो यहीं पर हूँ, ग्रांट की हालत ठीक नहीं।''
''कहाँ रहती हो ?''
''टफनल पॉर्क स्टेशन के साथ ही, टफनल रोड पर, डार्ट माऊथ एस्टेट में ग्रांट का फ्लैट है, वहीं रहती हूँ।''
''कभी मेरे संग पब में चलना पसंद करोगी ?''
''क्यों नहीं... मैं तो वैसे भी लंदन आकर बोर हुई पड़ी हूँ। कोई भी परिचित नहीं है।''
बलदेव ने शाम को सात बजे नॉर्थ स्टार में मिलने का वायदा करके मैरी को अलविदा कहा और बस पकड़ ली। उसकी कार हाईब्री में खड़ी थी। पर वह हाईब्री न जाकर हौलोवे स्टेशन के पास उतर गया। वह सोच रहा था कि सतनाम उसकी प्रतीक्षा कर रहा होगा। उसे उसके आने की खबर हो चुकी होगी। वह दुकान में गया तो सतनाम दूर से ही बोला-
''आ भई धीदो... तू तो बिलकुल मिलने से भी रह गया... आजकल कौन सी भैंसें चराता है।''
''मैं पहले भी आया था।''
''मुझे लग गया पता। छह महीने बाद आकर रौब दिखाता है! मैंने जट्टी को फोन किया था, बता रही थी दुकान के चक्कर में घूम रहा है।''
''सोचता हूँ कि ले लूँ... तेरी क्या सलाह है ?''
''दुकान तो ले ले, है भी मौके की। मुझे प्रेम चोपड़ा ने बताई थी सारी बात। फोन किया था मैंने। कहता था कि तूने फ्लैट भी लेना है।''
''हाँ, पर एक टाईम पर एक ही चीज ले सकता हूँ, मेरे पास पन्द्रह ही है।''
''यह तू अकेले ही लेना चाहता है कि आधे में उसके साथ ?''
''मैं किसी के साथ आधा नहीं करना चाहता, यह दुकान एक ही आदमी के लायक है।''
''तुझसे उसने बात नहीं की ?''
''नहीं तो, कौन सी बात ?''
''मेरे हिसाब से तो वह तुझे आधे पर रखकर काम पर लगाना चाहता है, तू तो जानता ही है प्रेम चोपड़ा को। तुझे अकेले को लेने भी नहीं देगा कभी, उसके अपने इंटरेस्ट सामने होते हैं, तुझे तो पता ही है। तू क्या उसे जानता नहीं।''
00
(क्रमश: जारी…)

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अनुरोध
“गवाक्ष” में उन सभी प्रवासी लेखकों/कवियों की समकालीन रचनाओं का स्वागत है जो अपने वतन हिंदुस्तान की मिट्टी से कोसों दूर बैठ अपने समय और समाज के यथार्थ को हिंदी अथवा पंजाबी भाषा में अपनी रचनाओं के माध्यम से रेखांकित कर रहे हैं। रचनाएं ‘कृतिदेव’ अथवा ‘शुषा’ फोन्ट में हों या फिर यूनीकोड में। रचना के साथ अपना परिचय, फोटो, पूरा पता, टेलीफोन नंबर और ई-मेल आई डी भी भेजें। रचनाएं ई-मेल से भेजने के लिए हमारा ई-मेल आई डी है- gavaaksh@gmail.com

मंगलवार, 6 जनवरी 2009

गवाक्ष – जनवरी 2009



“गवाक्ष” के माध्यम से हम हिन्दी ब्लॉग-प्रेमियों को हिन्दी/पंजाबी के उन प्रवासी लेखकों/कवियों की समकालीन रचनाओं से रू-ब-रू करवाने का प्रयास कर रहे हैं जो अपने वतन हिन्दुस्तान से कोसों दूर बैठकर अपने समय और समाज के यथार्थ को अपनी रचनाओं में रेखांकित कर रहे हैं। “गवाक्ष” के पिछ्ले ग्यारह अंकों में पंजाबी कवि विशाल (इटली) की कविताओं का हिन्दी अनुवाद, दिव्या माथुर (लंदन) की कहानी, अनिल जनविजय (मास्को) की कविताएं, न्यू जर्सी, यू.एस.ए. में रह रहीं देवी नागरानी की पाँच ग़ज़लें, लंदन निवासी कथाकार-कवि तेजेन्द्र शर्मा, रचना श्रीवास्तव, दिव्या माथुर की कविताएं, दुबई निवासी पूर्णिमा वर्मन की कविताएं, यू एस ए में रह रहीं हिन्दी कथाकार-कवयित्री इला प्रसाद, डेनमार्क निवासी कवि भगत धवन की कविताएं, डेनमार्क निवासी चाँद शुक्ला की ग़ज़लें, यू एस ए में रह रहे हिंदी कवि वेद प्रकाश ‘वटुक’ की कविता और पंजाबी कथाकार-उपन्यासकार हरजीत अटवाल के उपन्यास “सवारी” के हिंदी अनुवाद की नौ किस्तें आपने पढ़ीं। “गवाक्ष” के जनवरी 2009 अंक में प्रस्तुत हैं –यू एस ए से हिंदी कवयित्री रेखा मैत्र की कविताएं तथा पंजाबी कथाकार-उपन्यासकार हरजीत अटवाल के धारावाहिक पंजाबी उपन्यास “सवारी” की दसवीं किस्त का हिंदी अनुवाद…


यू.एस.ए से
रेखा मैत्र की पाँच कविताएं


(1) ज़िंदगी

ख़ुशी की ख़ुशबू
पसंद थी मुझे
सो, मैंने उसे अपने
तन-मन पर
अच्छी तरह छिड़क लिया !

अचानक तुमसे मुलाक़ात हुई
तुम ग़मों की महक में
नहाये हुए थे।

तुमसे मिली थी
सो, तुम्हारी महक भी
मेरे पास चली आई ।

अब आलम ये है
कि ख़ुशी और ग़म की
मिली-जुली ख़ुशबू
मेरे बदन में गमकती है।

इस मिली-जुली ख़ुशबू को
क्या नाम दूँ
यही सोचती हूँ।

इसे ज़िंदगी कहें
तो कैसा रहे ?
00

(2) ख़ुशबू

ख़ुशबू की दुकान पर
वो देर तक भटकती रही
तरह-तरह की महक
ख़ुद पर छिड़कती रही
पसंद की ख़ुशबू मिली ही नहीं।

उसे तलाश थी
शिशु की देह की
दूधिया महक की।

उसे कोई कैसे बताता
कि शिशु के बड़े होते-होते
महक भी उड़ती चली जाती है !
00

(3) धुएं की घाटी

लॉसएंजलस का रास्ता
और बरसात के बाद की दोपहर
आकाशी रेखाओं पर
गाड़ी चलाते पाया
कि बादल तूफानी वेग से आया
और पास की सीट पर
सट कर बैठ गया !

धुएं की घाटियों में
साथ-साथ घूमते रहे
प्रकृति ने सफ़ेद सिफॉन
साड़ी पहन रखी थी
कभी दिख जाती
तो कभी ख़ुद पर
घूँघट डाल लेती !

इस लुकाछिपी में
एकाएक धूप भागती आई
और वो बादल को ले उड़ी
मैं देखती रह गई !
(सेंडिएगो से लॉसएंजलस के रास्ते में लिखी कविता। नेटिव अमेरिकन लॉसएंजलस को धुएं की घाटी कहते थे)


(4) उंगलियों की फ़ितरत
रेत पर लिखी हुई तहरीर
मिट ही जाएगी !

वक़्त के समंदर का
एक तेज़ ज्वार
जो आएगा
साहिल की सारी
इबारतें समेटता चला जाएगा।

वो और बात है
कि लिखना
उंगलियों की फ़ितरत है
मिटने के डर से
उंगलियाँ कब थमती हैं ?

उन्हें रोशनाई
मयस्सर न हो
तब भी वो लिखती हैं।

लिखना उनकी
फ़ितरत है !
00

(5) लफ्ज़ों की ख़ुशबू

परदेस में भटकते-भटकते
कहीं खो दिया था उसे
आज अचानक तुम्हारे साथ
हुई बातचीत में सुना उसे
तो मन बचपन की
गलियों में दौड़ गया !

तब हम कभी
वारिश की वजह से
‘लुकाछिपउल’ नहीं खेल पाते
तो चिढ़कर कहते-
‘आज का दिन चौपट हो गया।’

ये ‘चौपट’ लफ़्ज मुझे
खोए हुए दोस्त सा मिला
और अपने अंचल की
महक से महका गया !

अब ये ख़ुशबू
अंचल की थी
कि बचपन की
मुझे नहीं मालूम !
00

बनारस में जन्मी रेखा मैत्र ने एम ए (हिंदी) तक की शिक्षा सागर विश्वविद्यालय, मध्यप्रदेश से ग्रहण की। विवाह के बाद सन 1978 में यू एस ए प्रस्थान। रेखा जी शिकागो में रहते हुए वहाँ की जानी-मानी साहित्यिक संस्था “उन्मेष” की सदस्य रही हैं। वाणी प्रकाशन, नई दिल्ली से इनके अब तक आठ कविता संग्रह प्रकाशित हो चुके हैं जिनमें हाल में वर्ष 2008 में “ढ़ाई आख़र” और “मुहब्बत के सिक्के” कविता संग्रह भी शामिल हैं। इनकी अपनी एक वेब साइट है- www.rekhamaitra.com

संपर्क : 12920, Summit Ridge Terrace,
Germantown, MD 20874

फोन : 301-916-8825

ई-मेल :
rekha.maitra@gmail.com
धारावाहिक पंजाबी उपन्यास(किस्त- 10)

सवारी
हरजीत अटवाल
हिंदी अनुवाद : सुभाष नीरव
॥ पंद्रह ॥

एज़वेअर रोड पर कारें कतार में खड़ी थीं। ट्रैफिक चल ही नहीं रहा था। लाइट के ग्रीन होने पर झटका-सा लगता, और फिर रुक जाता। आस पास की सड़कों का ट्रैफिक भी आकर मेन रोड में मिल रहा था। सुबह के साढ़े आठ बजे इतने ट्रैफिक की संभावना तो होती ही है, पर सोमवार की सुबह होने के कारण कुछ ज्यादा ही भीड़ थी।
बलवंत खबरें सुन रहा था पर उसका ध्यान कहीं ओर था। वह तो यह सोच रहा था कि यह ट्रैफिक उसकी ज़िंदगी की जान था। भीड़भाड़ उसको अब कितनी पसंद आने लगी थी, इसका अहसास उसे आयरलैंड जाकर ही हुआ। आयरलैंड की ख़ामोशी, कंटरीसाइड की तन्हाई के लिए वह नहीं बना था और न ही ये सब उसके लिए। आसपास की भीड़ को देखते हुए वह मन ही मन कह रहा था - ''दैट्स वॅट आई लाइक ! आई लव दिस ! दिस' ज़ मी, राईट मिडिल इन द क्राउड।'' भीड़ में कोई अपना नहीं होता। लेकिन भीड़ के अस्तित्व का अहसास भी मायने रखता है। लंदनवाली भीड़ वहाँ कहाँ मिल सकती थी। वह अगर वहाँ रह जाता तो यह उसकी बहुत बड़ी गलती होती। लौटते वक्त शौन ने कुछ और प्रापर्टीज़ दिखलाई थीं। एक घोड़ों के फॉर्म को देखकर तो उसका मन हुआ था- खरीद लेने को। घोड़े रखना उसे सदैव ही फ़िल्मी या स्वप्नमयी लगता रहा था। और भी कुछ संपत्तियाँ देखी थीं। एक सिनेमा था, एक क्लब। बहुत सस्ते दामों पर मिल रहे थे। अच्छा हुआ वह लंदन वापस लौट आया। आज रात में वह थेम्ज़ का चक्कर लगाने जाएगा।
ऐसा ही कुछ सोचते हुए वह हाईब्री की तरफ जा रहा था। शैरन का फोन आया था कि आते ही फोन करे या घर आ जाए। गुरिंदर अब उसे शैरन से ही फोन करवाती थी। उसे भी गुरिंदर और शैरन से मिलने की उतावली थी। इतने दिन हो गए थे- दूर गए हुए को। वैसे तो इतने दिन तो बैगर मिले सहज ही गुजर जाते थे, बल्कि महीना-महीना बीत जाता लेकिन इस तरह की दूरी महसूस नहीं होती थी। वह सोच रहा था कि गुरां तो उसका बेसब्री से इंतज़ार कर रही होगी। वह गुरां से दूर रहने की कोशिश करता। गुरां कुछ अधिक ही उसकी ओर झुक जाती थी। एक प्रकार से बांहें खोल कर उसकी ओर दौड़ पड़ती। वह डर जाता कि कहीं ठीक ठाक चल रहा सबकुछ उखड़ ही न जाए। अब तो बच्चे भी सब समझते थे। अजमेर भी हर समय आसपास ही होता था। इसलिए वह फोन भी नहीं करता था। गुरां फोन पर ही शुरू हो जाती। वह डरता कि क्या मालूम दूसरी ओर कौन फोन सुन रहा हो। घर में तीन फोन थे। नहीं तो आयरलैंड से उसका दिल करता था कि वह गुरां के साथ बात साझा करे कि उसने कैसे गुरां का गीत यहाँ गाया था।
वापस लौटते समय उसने शौन के साथ अपने भविष्य को लेकर बहुत सारी बातें की थीं। कई किस्म की स्कीमें बनाई थीं, पर वह सोच रहा था कि यह सब तो यूँ ही दांत घिसाने वाली बातें थीं। वह तो कभी भी कोई प्रोग्राम बनाकर नहीं चलता था। जैसे भी ज़िंदगी उसके हाथ लगती है, वह लिए जाता है। लेकिन अब इसमें कोई संदेह नहीं था कि रहने के लिए उसे कहीं न कहीं इंतज़ाम तो करना ही पड़ेगा। जल्दी ही किराये पर कोई कमरा देखेगा या फिर कोई फ्लैट ही खरीद लेगा। किराये जितनी ही किस्त आएगी। शौन के घर वह और अधिक दिन नहीं रह सकेगा। शौन और कैरन की लड़ाई अब उस तक पहुँचने लगी थी। शौन लड़ते हुए उसे पाकि(पाकिस्तानी) कहकर गाली निकालता। बलदेव को महसूस होता कि शौन पाकि कैरन को ही नहीं कह रहा, उसमें वह भी सम्मिलित है। यह बात अलग थी कि उसी समय शौन बलदेव को सॉरी बोल देता कि यह गाली तेरे लिए नहीं है। शौन ने यद्यपि उसे अधिक कुछ नहीं बताया था, पर वह समझ गया था कि वह कैरन से निजात पाना चाहता था लेकिन उसके कथौलिक होने के कारण अड़चनें पैदा हो रही थीं।
वापस लौटते ही वे दोनों किराये का मकान देखने के लिए निकले थे। जब कहीं भी कोई कमरा पसंद नहीं आया तो शौन ने कहा-
''डेव, एक बात मैं बहुत दिनों से कहना चाहता हूँ पर शायद तुझे पसंद न आए या फिर समझ में ही न आए।''
''तू कह, मैं कोशिश करुँगा।''
''तू एलिसन को तो जानता है, मेरी बहन को।''
''तेरे विवाह पर मिला था, अब तो शक्ल भी याद नहीं रही।''
''तुझे उसकी कहानी भी सुनाई थी कि मैं तो यहाँ उसे ही खोजने आया था।''
''हाँ।''
''उसके घर में कमरे का इंतज़ाम हो सकता है। क्लैपहैम रहती है। काम पर आना भी आसान, और तेरा थेम्ज़ दरिया भी दूर नहीं।''
कहकर शौन ज़रा-सा हँसा था। वह जानता था कि थेम्ज़ दरिया का कुछ ज्यादा ही मोह पाले घूमता था बलदेव। बलदेव कुछ नहीं बोला। शौन ने एक बार फिर कहा-
''मेरा लालच यह है कि जिस आदमी के साथ एलिसन रह रही है, वह मुज़रिम किस्म का आदमी है और कैथोलिक भी नहीं है। यह मुझे गवारा नहीं। अगर तू वहाँ रहेगा तो वह चला जाएगा। इतने बड़े आदमी के आगे कौन टिकेगा।''
बलदेव को मैथ्यू की कही बात याद आने लगी। यह सब शौन ने पहले ही सोच रखा था कि बलदेव एक दिन ऐसे ही एलिसन से विवाह करवा लेगा और वे गाँव में फिर से इज्ज़तदार लोग हो जाएंगे। बलदेव ने अंदाजा लगा लिया था कि शौन अभी भी वैलजी के लोगों से मिलते हुए झिझकता था कि कोई एलिसन वाली कहानी को लेकर ताना ही न मार दे।
शौन ने उसे एलिसन का फोन नंबर भी लिखवा दिया ताकि वक्त पड़ने पर कर ले। साथ ही साथ अपनी बहन की तारीफें भी करता रहा। फिर सलाह देते हुए शौन बलदेव से बोला-
''अमरजैंसी में तो भाइयों को भी इस्तेमाल किया जा सकता है। और भाई होते भी किस काम के लिए हैं। तू थोड़े दिन अपने भाइयों के यहाँ भी तो रह सकता है।''
''नहीं शौन, वहाँ मेरा दम घुटता है। वहाँ रहना होता तो मैं पहले ही रह लेता।''
थोड़ा-बहुत उसने शौन को पहले ही बता रखा था कि सतनाम के घर तो वह बिलकुल परायों की तरह होता है। उसकी पत्नी मनजीत का स्वभाव कुछ अधिक ही अंहकार से भर गया था। सतनाम उससे मसखरी करते हुए चापलूसियाँ करता था। मनजीत चुप रहती। उसकी चुप कई बार साथ बैठे व्यक्ति को अपमानित-सा करने लगती। उधर अजमेर का स्वभाव भी कुछ ऐसा था। अपने आप को आगे रखते-रखते वह दूसरे की इज्जत उतार कर रख देता। इधर फिर गुरां भी थी जिससे वह दूर ही रहना चाहता था।
वह अपने ख़यालों में उलझा अभी भी ऐज़वेअर रोड पर ही था। रेडिया बार-बार वही खबरें दे रहा था लेकिन उसे वे सब ताज़ी लगती रही थीं क्योंकि गौर से तो सुनी ही नहीं थीं। कोई बात एक बार सुनी जाती तो कोई दूसरी बार। धीरे-धीरे थैलसाइज रोड आ गई। वह बाईं ओर मुड़ गया। आगे ट्रैफिक कुछ कम था। फिर भी सतनाम की दुकान तक पहुँचने में उसे पौने दस बज ही गए। उसने सोचा कि अजमेर की दुकान तो दस बजे खुलेगी, इसलिए पहले सतनाम की तरफ़ चला गया। सतनाम दुकान में नहीं था। डिलीवरी करने गया हुआ था। पैट्रो और माइको ने उसे हैलो कहा। मगील उसे देखते ही हाथ ऊपर उठा कमर हिलाते हुए घूम गया। बलदेव यह सोच कर कि पता नहीं सतनाम कब लौटे, अधिक देर वहाँ नहीं रुका।
उसने हाईब्री कॉर्नर पहुँचकर पीछे वाली सड़क पर कार खड़ी की। दुकान के सामने पहुँचा तो सोहन सिंह शटर उठा रहा था। उसे देखते ही खुश हो उठा-
''आ भई जेंटलमैन, बहुत देर बाद दर्शन दिए, कहाँ रहता है ?''
''कैसे हो भाइया, ठीक हो ?''
''तू सुना कैसा है ? सुना है, आयरलैंड गया था ?''
''हाँ।''
''कैसा रहा सफर ?''
''ठीक था... टोनी नहीं आया अभी ?''
''नहीं, वो टूज़डे-थरसडे ही आता है... उसकी ज़रूरत नहीं होती। सुबह बिजी नहीं होता।''
''भाजी, ऊपर ही है ?''
''नहीं, वो तो सवेरे ही कहीं निकल गया। बैंक को गया है शायद।''
तब तक दुकान पूरी तरह खोल कर वे अंदर आ गए थे। सोहन सिंह ने कहा-
''जा, हो आ ऊपर। भाभी तेरी ऊपर ही है। चाय वाय पी ले।''
बलदेव ऊपर की तरफ चल दिया। स्टोर-रूम के शीशे के सामने एक पल के लिए रुका। चश्मा ठीक किया, कमीज़ के कॉलर सीधे किए और फ्लैट की सीढ़ियाँ चढ़ने लगा। गुरिंदर रसोई में से भाग कर सीढ़ियों तक आई और उसे देखकर रुक गई। उसकी तरफ देखती रही। वह सीढ़ियाँ चढ़कर उस तक पहुँच गया। उसने गुरां से कहा-
''हाँ जी, कैसा मिजाज़ है ?''
''अब क्या करने आया है। रहता वहीं पर...।''
कहती हुई वह उसकी छाती में मुक्के मारने लगी। बलदेव ने उसे बांहों में कस लिया और कहने लगा-
''तू तो यूँ ही उदास हो जाती है।''
''तू बता कर भी तो जा सकता था। फोन करने में कितना भार लगता है।''
''मुझे तो जाना ही नहीं था, बस यूँ ही जल्दबाजी में प्रोग्राम बन गया।''
''तुझे पता भी है कि मुझे कितना फिकर था... तू एक दिन मेरी जान लेकर रहेगा। कसम से, मैं अब ज्यादा सहन नहीं कर सकती। शैरन रोज़ पूछती थी कि चाचा जी लौट कर नहीं आए।''
''सॉरी बाबा, गलती हो गई। दुबारा नहीं होगी।''
कह कर बलदेव ने उसका चुम्बन लिया। गुरां कुछ शांत हुई। उसका हाथ पकड़ कर फ्रंट रूम में ले जाते हुए पूछने लगी-
''कोई काम था वहाँ ?''
''नहीं, बस खाली था और चल पड़ा।''
''काम पर अभी भी सिक पर ही हो ?''
''हाँ, अब दिल भी सिक पर ही है।''
''इससे तो कोई शॉप ही ले ले। तेरे भाजी ने कोई देख रखी है। इससे तू आकुपाई भी रहेगा और दूसरा, नज़रों के सामने भी होगा।''
''गुरां, तेरा क्या ख़याल है कि मैं तेरे से दूर रह कर खुश हूँ।''
कहते हुए वह उसकी तरफ़ लगातार देखने लगा। गुरां बोली-
''इस तरह न देख। मेरे मन को कुछ हो रहा है।''
''यह कैसी भूख है जो इतने सालों में भी पूरी नहीं हो रही।''
''यह भूख है !... भूख तो दिन में दो बार लगती होगी, मेरे लिए तो तू मेरी ज़रूरत है, साँस लेने जैसी।''
''गुरां, फील मुझे भी ऐसा ही होता है, पर काबू रखा कर।''
''मैंने तो काबू कर लिया था पर ऐसे तुझे अकेले फिरते भी नहीं देख सकती। ऐसा कर, विवाह करवा ले।''
''विवाह का काम बहुत लम्बा है, पहले तलाक होगा फिर विवाह।''
''फिर तलाक ले ले, अगर तूने सिमरन के साथ नहीं रहना है तो...।''
''अब उसके साथ रहने का तो प्रश्न ही नहीं। और अब गैप भी पड़ गया है।''
''यही तो मैं कह रही हूँ कि दूसरा विवाह करवा ले।''
''विवाह का तो पता नहीं।''
''क्यों ?''
''गुरां मिलेगी तो विवाह करवाऊँगा।''

(क्रमश: जारी…)

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शनिवार, 20 दिसंबर 2008

गवाक्ष - दिसंबर 2008



“गवाक्ष” के माध्यम से हम हिन्दी ब्लॉग-प्रेमियों को हिन्दी/पंजाबी के उन प्रवासी लेखकों/कवियों की समकालीन रचनाओं से रू-ब-रू करवाने का प्रयास कर रहे हैं जो अपने वतन हिन्दुस्तान से कोसों दूर बैठकर अपने समय और समाज के यथार्थ को अपनी रचनाओं में रेखांकित कर रहे हैं। “गवाक्ष” के पिछ्ले दस अंकों में पंजाबी कवि विशाल (इटली) की कविताओं का हिन्दी अनुवाद, दिव्या माथुर (लंदन) की कहानी, अनिल जनविजय (मास्को) की कविताएं, न्यू जर्सी, यू.एस.ए. में रह रहीं देवी नागरानी की पाँच ग़ज़लें, लंदन निवासी कथाकार-कवि तेजेन्द्र शर्मा, रचना श्रीवास्तव, दिव्या माथुर की कविताएं, दुबई निवासी पूर्णिमा वर्मन की कविताएं, यू एस ए में रह रहीं हिन्दी कथाकार-कवयित्री इला प्रसाद, डेनमार्क निवासी कवि भगत धवन की कविताएं, डेनमार्क निवासी चाँद शुक्ला की ग़ज़लें और पंजाबी कथाकार-उपन्यासकार हरजीत अटवाल के उपन्यास “सवारी” के हिंदी अनुवाद की आठ किस्तें आपने पढ़ीं। “गवाक्ष” के दिसंबर,2008 अंक में प्रस्तुत हैं – यू एस ए में रह रहे हिंदी कवि वेद प्रकाश ‘वटुक’ की कविता तथा पंजाबी कथाकार-उपन्यासकार हरजीत अटवाल के धारावाहिक पंजाबी उपन्यास “सवारी” की नौंवीं किस्त का हिंदी अनुवाद…


यू.एस.ए से वेद प्रकाश ‘वटुक’ की कविता-
कौन सी महफिलों में जाओगे

कौन सी महफिलों में जाओगे
दर्द अपना किसे सुनाओगे
मौन मानव के साथ धोखा है
सच कहोगे, तो मारे जाओगे

ज़हर सुकरात को पिलायेंगे
सूली ईसा को वे चढ़ायेंगे
कातिलों का भी फलसफा तो है
कत्ल करके मसीह बनायेंगे

बस मुखौटे ही चन्द बदले हैं
केंचुली के ही रंग बदले हैं
सांप, फन, ज़हर कुछ नहीं बदले
काटने के ही ढंग बदले हैं

वही सब ग़ज़नवी अन्दाज होगा
वतन के लूटने का काज होगा
शहीदों ने कभी सोचा नहीं था
उन्हीं के क़ातिलों का राज होगा

खुदी के सांप खुद को छल रहे हैं
घर अपने ही दियों से जल रहे हैं
बचाये आज किस को कौन किससे
यहां तो सांप घर-घर पल रहे हैं

हमारी ही वफा के पेचोखम हैं
हमारे ही किये खुद पर सितम हैं
हमीं ने दूध था इनको पिलाया कि
जिन सांपों के काटे आज हम हैं।
00




धारावाहिक पंजाबी उपन्यास(किस्त- 9)

सवारी
हरजीत अटवाल
हिंदी अनुवाद : सुभाष नीरव


।। चैदह ।।

गुरिंदर को इंग्लैंड आने की इतनी खुशी नहीं थी, क्योंकि उसका आधा हिस्सा तो बलदेव के पास ही रह गया था। अजमेर का स्वभाव यद्यपि कुछ रूखा था पर वह उसे बेहद प्यार करता था। सतनाम भी उनके साथ ही रहता था। सतनाम की आदत उसे बहुत पसंद थी, हर समय दिल लगाये रखता।
इंग्लैंड पहुँचकर सबसे बड़ी उसकी चिंता यह थी कि उसे मैंसिज नहीं हुई थी। तारीखें निकल चुकी थीं, तारीखों के हिसाब से तो उसे राह में ही बीमार हो जाना था। उसे भय सताने लगा कि अगर कोई गड़बड़ हो गई तो वह क्या करेगी। वह तो लुट ही जाएगी, कहीं की न रहेगी। जैसे-जैसे दिन बीत रहे थे, उसका भय बढ़ता जा रहा था। अकेली बैठी सोच रही होती तो उसे कंपकंपी छूटने लगती। फिर, उसने साहस करके फैसला किया कि वह सब कुछ सच-सच अजमेर को बता देगी। जो होना है, हो जाए। वह वापस चली जाएगी। अगर उसे बलदेव भी नहीं रखेगा, न सही, वह फिर से अपनी पढ़ाई शुरू कर देगी। इस बच्चे के सहारे ज़िंदगी काट लेगी। फिर उसने सोचा कि कुछ दिनों की गड़बड़ तो वह कर ही सकती थी। इतनी छूट तो कुदरत ने औरत को दे ही रखी थी। उसने अजमेर से कहा-
“जी, मेरी तो डेट्स निकल चुकी हैं।”
“इतनी जल्दी, अभी तो दस दिन भी नहीं हुए तुझे आई को।”
“जी, मुझे नहीं पता, कुछ करो, मुझे अभी बच्चा नहीं चाहिए।”
कह कर वह रोने लगी। उसकी हालत देखकर अजमेर बोला-
“पर मुझे तो चाहिए, जो भी बेबी आता है, आने दे। यह तो कोई ज्यादा ही उतावला लगता है, इतने उतावले को नहीं रोका करते।”
गुरिंदर का तीर चल गया था, पर जब तक शैरन का जन्म नहीं हुआ, तब तक उसके मन में धुकधुकी लगी रही थी। उसके जन्म लेने तक वह भयमुक्त न हो सकी। इस भय से बाहर आने के बाद ही उसे शैरन की आँखें बलदेव जैसी लगने लगी थीं। बलदेव की भांति शैरन का मुँह भी हँसते समय थोड़ा टेढ़ा हो जाता था। उसे बलदेव की याद आने लगती। घर में बलदेव की बातें होती रहती थीं। पहले उसने उसकी किसी बात में हिस्सा नहीं लिया था, पर अब वह विशेषतौर पर कहती कि उसका भी कुछ करो, कहीं वह गाँव लायक भी न रहे।
जब तक सतनाम का विवाह नहीं हुआ था, वह उनके साथ ही फर्न पार्क वाले घर में रहा। मनजीत के आ जाने पर भी वह कुछ दिन रहा, फिर उसने अपना अलग घर ले लिया था। घर में अप्रत्यक्ष रूप से उसके और मनजीत के मध्य एक प्रतिस्पर्धा-सी बनी रहती, पर वह मनजीत से बहुत आगे थी। सुंदरता में भी, घर के काम में भी। लेकिन जब मनजीत काम पर जाने लग पड़ी तो उसे लगने लगा कि मानो वह अब उससे आगे निकल हो। वह भी नौकरी करना चाहती थी। अजमेर से वह अपनी इच्छा व्यक्त करती तो वह उसे झिड़क बिठा देता।
अजमेर का स्वभाव ऐसा था कि वह उसे प्यार भी करता था और इज्जत उतारने में भी एक मिनट नहीं लगाता था। कई बार बैठा-खड़ा भी न देखता। सतनाम कहा करता-
“जटिये ! प्रेम चोपड़ा की आदत डाल ले। इसे यह सोचने की आदत है कि मेरा नाम है प्रेम चोपड़ा... बस, इसकी बड़ाई करती रहा कर।”
वह बड़ाई भी करती, पर अजमेर फिर भी गुस्से में आकर कुछ न कुछ बोल जाता। गालियाँ तक बक जाता। उसका मन उदास होने लगता। उसे बलदेव की याद तड़फाने लगती। वह सोचती कि काश, वह यहाँ होता।
जब से सतनाम ने अपना घर लिया था, तब से भाइयों के बीच भातृत्व प्रेम कम होने लगा था। वे एक दूसरे के शरीक बनते जा रहे थे। बात बात में प्रतिस्पर्धा होने लगी। पहले तो पत्नियों में ही प्रतिस्पर्धा थी, फिर घर को लेकर होने लगी। सतनाम ने घर ज़रा बड़ा और मंहगी सड़क पर खरीदा तो अजमेर से सहा न गया। वह अन्दर ही अन्दर कुढ़ता रहा था। सतनाम अजमेर से इस बात से भी कुछ गुस्सा था कि सोहन सिंह की तनख्वाह वही संभालता था। सोहन सिंह बर्मिंघम में अपने किसी गांववाले के पास रहा करता था और फैक्टरी में काम करता था। सतनाम कई बार बातों बातों में सुना जाता। अजमेर बहुत चिढ़ता। उसने ही सोहन सिंह को निर्भर बनाकर बुलाया था। सतनाम को भी उसने ही इधर स्थायी करवाया था, पर उसे सतनाम अकृतज्ञ लगने लगा था।
अजमेर इंडिया में रहते अपने भाइयों को पैसे भेजता। बहन के रस्म-रिवाज पूरे करता। किसी ग्रामीण के यहाँ कुछ होता तो पहुँचता। इस बात से उसे तसल्ली होती थी और इसी कारण उसकी अपने गांववालों में विशेष जगह बनी हुई थी। मिडलैंड में तो उसके गांव पंडोरी के बहुत से लोग रहते थे। उसका सभी के यहाँ आना-जाना था।
मिडलैंड में रह रहे उसके गांव के किसी व्यक्ति ने बलदेव के बारे में रिश्ते की बात की थी। अजमेर खुश था। वह सोचता कि सतनाम अब बदल गया था, उसके सारे अहसान वह भूल चुका था, पर बलदेव ऐसा नहीं लगता था। वह इंडिया जाता तो बलदेव उसे बड़े प्यार से मिलता, इज्ज़त भी पूरी करता। वह सतनाम से भिन्न था। भविष्य में यहाँ आकर बिजनेस में उसकी मदद कर सकता था। ऐसी ही बातें सोचते हुए वह इस रिश्ते के पीछे पड़ गया। लड़कीवाले ग्रेवजैंड में रहते थे। लड़की का बाप निर्मल सिंह अजमेर के गांव निवासी सरबण का खास दोस्त था। रिश्ता हो गया। बलदेव इंग्लैंड पहुँच रहा था।
जैसे बहती हुई नदी में मिट्टी का तोंदा गिर जाए तो उसकी गति में अन्तर आ जाता है, ऐसे ही गुरिंदर के साथ हुआ। उसकी ज़िंदगी की रफ़्तार में फर्क पड़ गया। बलदेव की प्रतीक्षा करती कभी वह बहुत उत्तेजित हो जाती तो कभी डरने भी लगती कि इस अच्छी-भली ज़िंदगी में कहीं कोई खलल ही न पैदा हो जाए। जिस दिन बलदेव ने पहुँचना था, वह घर की खिड़की में खड़ी होकर अजमेर की कार को जाते हुए देखती रही मानो वे अभी ही लौट आएंगे। सड़क के मोड़ पर उनका घर हुआ करता था जहाँ से पूरी की पूरी सड़क दिखाई देती थी। दूर से आती हुई कार दिखलाई दे जाती। वह घर के काम से फुर्सत पाकर खिड़की के पास आ खड़ी हुई। बलदेव के पहुँचते ही अजमेर ने एअरपोर्ट से फोन कर दिया था। बहुत लम्बे इंतज़ार के बाद लाल रंग की कौरटीना आती दिखाई दी। उसका दिल धड़क उठा। उसने दिल पर हाथ रखकर उसे काबू में करने की कोशिश की। दरवाजा खुलने की आवाज सुनी, पर वह ज्यों की त्यों खड़ी रही। फिर तीनों भाई बातें करते हुए अन्दर आ गए। खिड़की से गुरिंदर ने बलदेव को देख लिया था। वह बदला-बदला-सा प्रतीत हो रहा था।
बलदेव ने गुरिंदर की ओर देखा और कुछ पल देखता रहा और फिर ‘सत्श्रीअकाल’ कहा। गुरिंदर ने सिर हिलाकर ही जवाब दिया। वे सैटी पर बैठने लगे। गुरिंदर ने पूछा-
“चाय रखूँ ?”
“जट्टिये ! चाय रहने दे, हमें पानी और गिलास ला दे।”
“नहीं गुरां, मुझे तो चाय ही बना दे।”
गुरिंदर की देह में एक लहर दौड़ गई। इतने साल हो गये उसे किसी ने गुरां नाम से नहीं बुलाया था। सतनाम कहने लगा-
“वहाँ तो तेरे ससुराल वाले थे, मैंने कुछ नहीं कहा, पर यहाँ चाय-वाय नहीं मिलेगी, सीधी तरह लाइन पर आ जा, चाहे थोड़ी ही पी।”
गुरिंदर कॉफी टेबुल पर गिलास रखती हुई बोली-
“अगर वह नहीं पीना चाहता तो रहने दो, पिलाना कोई ज़रूरी है !”
“अगर यह पियेगा नहीं तो हमारा भाई कहाँ से लगेगा। अगर इसने न पी तो यह हमारा गांववाला भी नहीं लगेगा, भाई तो दूर की बात है।”
गिलासों में पैग बनाता वह बलदेव को बताने लगा-
“मिडलैंड में एक बात मशहूर है। कोई शराबी राह में गिरा पड़ा हो तो गुजरने वाला कह देता है कि पंडोरी का होगा।”
वे सभी हँसने लगे। अजमेर के पास करने के लिए अधिक बातें नहीं हुआ करती थीं, वह इस तरह सुनने का ही आनन्द लेता। सतनाम गुरिंदर को बताने लगा-
“जट्टिये ! मैंने तो तेरे देवर को पहचाना ही नहीं था। इतने बरस हो गए इसे देखे हुए को। जब मैं घर से चला था तो इसके अभी दाढ़ी भी नहीं फूटी थी। और अब जब यह चला आ रहा था, भाई ने ही इशारा किया कि वह आ गया। मैंने सोचा, यह तो गुलजार आ रहा है, वैसी ही ऐनक, हल्की-सी मूंछें और सफाचट दाढ़ी।”
गुरिंदर हँसने लगी। बलदेव का यह रूप उसे पराया-सा लगा था। उसने पूछा-
“ऐनक कब लग गई ? निगाह कमजोर हो गई ?”
“नहीं गुरां, निगाह ठीक है, सिर दुखता रहता था, डॉक्टर ने कहा कि लगाकर देख। जब से लगाई है, तब से ठीक है।”
फिर वे कितनी ही देर बैठकर गांव की, शिंदे की, उसकी पत्नी और बच्चों की बातें करते रहे। अजमेर उसके विवाह की तैयारी के बारे में बता रहा था कि वह अपने सभी गांववालों को बरात में ले कर जाएगा।
बलदेव की गुरिंदर से अधिक बात न हो सकी। उन्हें अकेले में बात करने का अवसर तीसरे दिन जाकर मिला, जब अजमेर काम पर चला गया। बच्चे अभी सोये हुए थे। बलदेव उसके सामने खड़े होकर बोला-
“हाँ, अब बता, क्या कहना चाहती है ?”
“तू बता, तू क्या कहना चाहता है ? हर समय चोरी-चोरी मेरी ओर झांकता रहता है।” कह कर वह मुस्कराई।
बलदेव कुछ पल के लिए चुप्पी लगा गया और फिर उसकी आँखों में गहरे झांकते हुए बोला-
“गुरां, मैं तुझे खुश देखकर बहुत खुश हूँ। मुझे तेरी बहुत फिक्र थी। मैं तेरे बारे में इतना सोचता रहता था कि मुझे बुरे-बुरे सपने आने लगते। मैं सोचा करता कि तू ठीक हो।”
“अगर मुझे कुछ हो गया होता तो तुझे पता लग ही जाता।”
“मुझे तेरी बाहरी खबर ही मिलती, तेरे अन्दर की खबर का क्या पता चलता।”
“हाँ, बलदेव, अन्दर बहुत कुछ घटित हुआ। मैं कई बार मर कर जिंदा हुई हूँ, कह ले कि पुनर्जन्म हुआ है। अगर बात इधर-उधर हो जाती तो मेरी लाश ही मिलती।”
“क्यों, क्या हुआ ?”
“मैंने तुझे तब बहुत रोका था, पर तू रुका ही नहीं और मुझे तूने मुसीबत में फंसा दिया।”
“क्या मतलब तेरा ?”
“गर्भ ठहर गया था।”
“रियली !”
“और नहीं तो क्या... मैं तो मर ही गई थी।”
“फिर ?”
“फिर क्या !... मैंने रब के आगे कितनी ही अरदासें कीं कि हे रब्बा, एकबार बख्श दे, दुबारा बलदेव का मुँह नहीं देखूँगी।”
कह कर गुरिंदर हँसी। बलदेव ने कहा-
“लगता है, रब ने सुन ली, नहीं तो ये हँसी नहीं निकलती।”
“हाँ, बलदेव, सच ही सुनी गई... शैरन का वेट ज्यादा होने के कारण कई दिन ऊपर जाकर इसका जन्म हुआ और इस तरह कवर हो गया।”
“तो शैरन...?”
“हाँ...।”
तब तक तीनेक साल की शैरन उठ आई। बलदेव ने उसे उठाकर गले से लगा लिया।
(क्रमश: जारी…)

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बुधवार, 19 नवंबर 2008

गवाक्ष - नवंबर 2008



गवाक्ष” के माध्यम से हम हिन्दी ब्लॉग-प्रेमियों को हिन्दी/पंजाबी के उन प्रवासी लेखकों/कवियों की समकालीन रचनाओं से रू-ब-रू करवाने का प्रयास कर रहे हैं जो अपने वतन हिन्दुस्तान से कोसों दूर बैठकर अपने समय और समाज के यथार्थ को अपनी रचनाओं में रेखांकित कर रहे हैं। “गवाक्ष” के पिछ्ले नौ अंकों में पंजाबी कवि विशाल (इटली) की कविताओं का हिन्दी अनुवाद, दिव्या माथुर (लंदन) की कहानी, अनिल जनविजय (मास्को) की कविताएं, न्यू जर्सी, यू.एस.ए. में रह रहीं देवी नागरानी की पाँच ग़ज़लें, लंदन निवासी कथाकार-कवि तेजेन्द्र शर्मा, रचना श्रीवास्तव, दिव्या माथुर की कविताएं, दुबई निवासी पूर्णिमा वर्मन की कविताएं, यू एस ए में रह रहीं हिन्दी कथाकार-कवयित्री इला प्रसाद, डेनमार्क निवासी कवि भगत धवन की कविताएं और पंजाबी कथाकार-उपन्यासकार हरजीत अटवाल के उपन्यास “सवारी” के हिंदी अनुवाद की सात किस्तें आपने पढ़ीं। “गवाक्ष” के नवंबर,2008 अंक में प्रस्तुत हैं – डेनमार्क निवासी कवि-कहानीकार चाँद शुक्ला हदियाबादी की ग़ज़लें तथा पंजाबी कथाकार-उपन्यासकार हरजीत अटवाल के धारावाहिक पंजाबी उपन्यास “सवारी” की आठवीं किस्त का हिंदी अनुवाद…


डेनमार्क से
चाँद शुक्ला हदियाबादी की दो ग़ज़लें


1
रुख़ पर उसके बहार आती है
जब वो मुझसे नज़र मिलाती है

इक नज़र गर मैं देख लूँ उसको
शमअ जैसी वो झिलमिलाती है

उसकी आवाज़ फ़ोन पर गोया
घर में ख़ुश्बू बिखेर जाती है

मेरे घर की हरेक खिड़की से
चाँदनी साफ़ झिलमिलाती है

वोह मिरे दिल की झील में अक्सर
चांदनी बन के उतर जाती है

शब के तारीक रास्तों में कहीं
इक किरन-सी भी जगमगाती है

मैं ख़यालों में उसके रहता हूँ
वो मेरे दिल में मुस्कुराती है

"चाँद" तारों की यह नावाजिश है
रौशनी जो घरों में आती है

2
ऐ हवा मुझको तू आँचल में छुपा कर ले जा
सूखा पत्ता हूँ मुझे साथ उड़ा कर ले जा

शाख से कट के तुझे टूट के चाहा मैंने
आ मेरी याद को सीने में छुपा कर ले जा

बंद आखों में मेरी झांकते रहना हरदम
अपनी पलकों में मेरा प्यार बसा कर ले जा

गुनगुनाना मेरी नज्में जब भी हो फुर्सत
मेरे गीतों को तू होठों पे सजा कर ले जा

साथ क्या लाई हो पूछेंगे जब तुझे अपने
अपने माथे पे मेरा प्यार सजा कर ले जा

सियाह रात में तुझको यह रौशनी देंगे
मांग में "चाँद" सितारों को सजा कर ले जा
00

जन्म : चाँद हदियाबादी शुक्ल का जन्म भारत के पंजाब प्रांत के जिला कपूरथला के ऐतिहासिक नगर हादियाबाद में हुआ।
शिक्षा : प्रारम्भिक शिक्षा डलहौज़ी और शिमला में प्राप्त की।
संप्रति : बचपन से ही शेरो-शायरी के शौक और जादुई आवाज़ होने के कारण पिछ्ले पन्द्रह वर्षों से स्वतंत्र प्रसार माध्यम 'रेडियो सबरंग' में मानद निदेशक के पद पर आसीन हैं। आल वर्ल्ड कम्युनिटी रेडियो ब्राडकास्टर कनाडा (AMARIK) के सदस्य। आयात-निर्यात का व्यापार।
प्रकाशन एवं प्रसारण : दूरदर्शन और आकाशवाणी जालन्धर द्वारा मान्यता प्राप्त शायर। पंजाब केसरी, शमा (दिल्ली) और देश विदेश में रचनायें प्रकाशित। गजल संग्रह प्रकाशनाधीन।
पुरस्कार - सम्मान : सन्‌ १९९५ में डेनमार्क शांति संस्थान द्वारा सम्मानित किये गये।सन्‌ २००० में जर्मनी के रेडियो प्रसारक संस्था ने 'हेंस ग्रेट बेंच' नाम पुरस्कार से सम्मानित किया
अन्य : कई लघु फ़िल्मों और वृत्त फ़िल्मों में अभिनय।

ई-मेल- chaandshukla@gmail.com


धारावाहिक पंजाबी उपन्यास(किस्त- 8)

सवारी
हरजीत अटवाल
हिंदी अनुवाद : सुभाष नीरव


।। तेरह ।।

कई दिन अच्छे बीते और इतवार के दिन बारिश हो गई। छुट्टीवाले दिन बारिश को लोग बुरा समझते हैं, पर इतने दिन धूप चमकती रही थी कि बारिश अच्छी लग रही थी।
सतनाम ने कार ‘सिंह वाइन्ज’ के सामने ला खड़ी की। संयोग से उसे वहाँ जगह मिल गई। कार में से बाईं ओर से मनजीत निकली और पिछली सीटों से बच्चे उतर कर दुकान की ओर दौड़ पड़े। गुरिंदर ‘टिल्ल’ पर खड़ी थी। सोहन सिंह काउंटर के पीछे कुर्सी पर बैठा था। टोनी नित्य की तरह काम में व्यस्त था। सतनाम ने अंदर घुसते ही कहा-
“तगड़ी हैं न जट्टिये ? और बापू तू कैसा है ?”
“आ भई, तू सुना कैसा है ?” सोहन सिंह बोला। गुरिंदर मुस्कराई और फिर मनजीत का हालचाल पूछने लगी। बच्चे चॉकलेट उठाने लग पड़े। सतनाम कहने लगा-
“हेमा मालिनी कहती थी कि बहन से मिलना है। मैंने कहा, चल, गोली किसकी और गहने किसके !”
“तेरा काम कैसा है भई ?”
“भाइया, काम ठीक नहीं। गरमी बहुत पड़ती है, लोग मीट नहीं खाते, ये ड्रिंक पीते हैं, तुम तो बिजी होगे ?”
“हाँ, आज बारिश के कारण स्लो है।”
“और भाइया, तू सुना, तेरी दाल में घी होता है कि नहीं ? रात में दूध मिलता है ?” कह कर उसने तिरछी नज़र से गुरिंदर की तरफ देखा। गुरिंदर गुस्से में बोली-
“तुझे कितना मिलता है घी ?... तुझे कितना दूध मिलता है ?... बता तो ज़रा।”
“ए जट्टी ! मेरी तो अभी बहुत उम्र पड़ी है पर भाइये के खाने-पीने और जीने के यही दिन हैं।”
“अगर तुझे बापू की इतना ही फिक्र है तो ले जा अपने संग, कर बूढ़े की सेवा, पता लग जाएगा !”
“देख जट्टी ! हेमा मालिनी से काम कहीं होता है... यह धमिंदर ही भूखा रह जाता है... मैं तो मजाक करता हूँ, जट्टी की बराबरी कौन कर सकता है ?”
गुरिंदर अपनी प्रशंसा सुनकर खुश होने लगी। सतनाम ने सोहन सिंह की कमीज़ टटोली और पूछा-
“ओ भाइया, यह तो बता, कपड़े तुझे आज प्रेस किए मिले थे ?”
गुरिंदर ने फिर मुँह बनाया। मनजीत बोली-
“आओ बहिन जी, हम ऊपर चलें।”
“इसे तू ही झेले जाती है, मैं तो एक दिन न काट सकूं।”
कह कर गुरिंदर ने सतनाम की तरफ देखा। सतनाम ने कहा-
“यह तो ज्यादती है जट्टी ! मेरे मुकाबले जट्ट ज्यादा चालू है। मैं यों ही तो नहीं उसे प्रेम चोपड़ा कहा करता हूँ।”
“यह ठीक है, तेरी हेमा मालिनी और मेरा प्रेम चोपड़ा।”
“वह है कहाँ ?”
गुरिंदर से पहले ही सोहन सिंह कहने लगा-
“राम और श्याम आए हुए हैं।”
मुनीर और प्रेम का नाम राम और श्याम सतनाम ने ही रखा हुआ था। वह एक साथ बाहर निकले थे। विदरिंग रोड सतनाम की दुकान के निकट ही पड़ती थी। वे उसके पास भी चले जाया करते थे। कई बार शाम को हिस्सा डालकर पीने भी बैठ जाते।
मनजीत और गुरिंदर ऊपर चली गईं। स्टोर रूम में लगे शीशे के पास से गुजरीं तो गुरिंदर ने एक नज़र शीशे में मारी। वह मनजीत से किसी भी तरह से कम नहीं थी। पर मनजीत से अपने आप को बहुत कम आंका करती थी वह। मनजीत के पास नौकरी थी। वह कार चला कर जहाँ चाहती, जाती। वह बाहर की दुनिया में घूमती-फिरती थी और वह थी कि इस चारदीवारी में कैद थी। ऊपर जाकर बच्चे शैरन और हरविंदर के संग खेलने लगे। गुरिंदर के बच्चे मनजीत के बच्चों से आयु में बड़े थे, पर वे उन्हें अपने संग खिला लेते थे। सतनाम पब की ओर चला गया। उसके जाने के बाद सोहन सिंह टोनी से बोला-
“माई दिस सन, टू मच यैपी-यैपी... वन सन इंडिया, वैरी गुड।”
टोनी सतनाम के स्वभाव को जानता था। वह गुरिंदर और सतनाम के बीच हुई बात को समझ तो नहीं सकता था, पर वह जानता था कि उनके बीच नोंक-झोंक हो रही थी इसलिए मंद-मंद मुस्कराये जा रहा था।
अजमेर ने सतनाम की कार देखते ही उसके लिए गिलास भरवा लिया। सतनाम, मुनीर और प्रेम से बड़ी गर्मजोशी से मिला। अजमेर ने मुनीर की चांगलो कबीले वाली कहानी, वांगली खेल और वांगलू को फाड़ने वाली सारी कथा सतनाम को सुनाकर उससे उसकी राय पूछी। बात सुनकर सतनाम हँसने लगा। इतना हँसा कि सभी को उसका साथ देना पड़ा। मुनीर खीझ-सा गया। सतनाम ने कहा-
“इस खेल का लॉजिक तो बाद की बात है, मुझे तो ये नाम ही चाइनीज़ से लगते हैं। कहीं कोई चाइनी कबीला तो नहीं था वह ?”
“भाई जान, मैं तो उनके बीच रह कर आया हूँ।”
“मुनीर मियां, मुकाबला हमेशा दो ग्रुपों या दो प्लेयरों में होता है, कई तरह की कशमकश होती है, टेंशन होती है।”
“टेंशन तो यहाँ भी जे, पर जे कि पहले वांगलू को कौन फाड़सी, पर बहुत बारी प्लेयर मिल जासण।”
“वही कि उनका मुकाबला तो वांगलू या नगाड़े के साथ हुआ।”
“वो तो हो सी।”
“मैं नहीं मानता।”
“मन जासी, इक दिन मन जासी।”
फिर मुनीर ने सोचा कि बात को बदला जाए। उसने पूछा-
“भाई जान, हलाल भी रखा करो, हमको कश्मीरियों के जाणा पैसी।”
“किन कश्मीरियों के जाते हो ? गफूर के ?”
“नहीं साईम के, उसके मामा का लड़का ही है।”
“हाँ, अब तो बहनोइया भी है।”
“हाँ, स्ट्राउड ग्रीन में कश्मीरियों की बहोत चढ़त होसी।”
“शक्लें भी सभी की एक जैसी हैं।”
“हाँ, फिर रिश्तेदार जो होसी।”
“इतनी मिलती जुलती कि जैसे एक ही टीके के कटड़ू हों।”
उसकी बात पर सभी हँसने लगे। अब दो बज रहे थे। पब बन्द करने की घंटी बज गई। उन्होंने अपने गिलास शीघ्रता में खाली किए और उठकर चल पड़े। मुनीर और प्रेम दोनों अपने घरों की ओर चल दिए। अगर सतनाम ना आया होता तो रुक भी लेते। अब वे समझते थे कि उन्होंने कोई पारिवारिक बात करनी होगी। नहीं तो कई बार वे पब से उठने के बाद दुकान में आकर खड़े हो जाते थे।
दुकान में आकर अजमेर ने मोटा-सा हिसाब आज की सेल का लगाया और बोला-
“आज तो बारिश ने काम डाउन कर दिया।”
फिर उन्होंने व्हिस्की की बोतल उठाई और ऊपर चले गये। उनके पहुँचने तक सोहन सिंह ने अपने लिए ब्रांडी डाल ली थी। सतनाम और अजमेर आर्सनल की फुटबाल टीम की बातें करने लग पड़े। वे दोनों ही आर्सनल के फैन थे और इस बार आर्सनल ने दोहरी जीत हासिल की थी। एफ.ए. फाइनल भी जीता था और चैम्पीयन लीग भी। अब तीसरी जीत पर नज़रें टिकाये बैठे थे। पूरे युरोप की विजयी टीमों के फाइनल की जीत की भी आस थी उन्हें। अजमेर और सतनाम के पास जब बातें खत्म हो जाती थीं तो फुटबाल की बातें बहुत बढि़या समय व्यतीत कराती थीं।
गुरिंदर ने यों ही आदत के अनुसार खिड़की में खड़े होकर राउंड-अबाउट की ओर देखा। कोई इक्का-दुक्का कार ही आ जा रही थी। बारिश ने दिन को बहुत ही धुंधला-सा बना दिया था। फिर वह अजमेर से बोली-
“रोटी कब खाओगे ?”
“जब मर्जी ले आना, पर पहले अल्मारी में से बहन बंसों वाली चिट्ठी निकाल कर इसे दे।”
गुरिंदर ने चिट्ठी सतनाम को थमायी। वह पढ़ने लगा और फिर बोला-
“इंडिया वाले सोचते हैं कि यहाँ पैसे दरख्तों में लगते हैं, तोड़ो और उन्हें भेज दो। अभी पिछले साल तो हजार पोंड भेजा था।”
“कहते हैं कि वह तो घर की छत डालने में मदद थी और अब तो लड़की का ब्याह है।” अजमेर गुस्से में बिफरा बैठा था। उसने आगे कहा-
“इतने पैसे कहाँ से निकालते रहें। उधर शिंदे का संदेशा आया हुआ है कि ट्रैक्टर खराब पड़ा है।”
“शिंदा भी साला शक्ति कपूर बना घूमता है। पहले ट्रैक्टर लेकर दो, फिर रिपेयर भी करवाओ और वह खुद बांह लटकाये गाँव में घूमता फिरता है। वहाँ बैठे-बैठे आर्डर दिए जाता है।”
“शिंदे वाली प्रॉब्लम तो बाद में है, पर इसका क्या करें, यह सोचो। अगर लड़की का ब्याह है तो उसने पूरे खर्चे की इधर से आस रखनी ही है।”
अजमेर का गुस्सा कुछ कम हुआ था। सतनाम समझता था कि इस खर्चे में वह उससे हिस्सा डलवाना चाहता था। इसीलिए गुस्सा दिखा रहा था कि वह गुस्सा दिखलाए, कुछ बोले। बंसो ने चिट्ठी के शुरू में अजमेर की बढ़-चढ़कर तारीफें की थीं। उसे राजी करने के लिए इतनी ही बात काफी थी। सतनाम ने जानबूझ कर दूसरा ही टोना लगा दिया। वह कंधे पर हाथ रखते हुए सोहन सिंह से कहने लगा-
“भाइया, तू नजीर हुसैन की तरह यों ही हँसता रहता है। इतनी पेंशन लेता है, बंसो को पैसे भेज।”
अजमेर को उसकी यह बात तीर की भांति लगी। सोहन सिंह बोला-
“जैसा मरजी कर लो, उधर शिंदा भी है। यही, ट्रैक्टर का संदेशा आया हुआ है।”
अजमेर गुस्से में भरा हुआ बैठा था। उसे गिला था कि सतनाम अच्छी तरह जानता था कि सोहन सिंह की पेंशन को वह साझे तौर पर गाँव वाले घर के लिए इस्तेमाल किया करता था। सतनाम भी उसका मूड समझ गया और उसे खुश करने के लिए कहने लगा-
“असल में ये चिट्ठियाँ भाई की दरियादिली के कारण आती हैं।”
फिर उसने बात बदलने के लिए गुरिंदर से कहा-
“जट्टी ! तेरे लाड़ले देवर का क्या हाल है ? कोई खैर-खबर है कि नहीं?”
“मैंने शौन के घर फोन किया था। उसकी वाइफ कहती थी कि उसके साथ आयरलैंड गया हुआ है।”
सोहन सिंह जैसे सपने में से उठा हो, कहने लगा-
“इस लड़के ने भी खून पी रखा है, घर में नहीं घुसता, बस गोरे के पीछे घूमता फिरता है।”
“भाइया, तेरा लाड़ला जो ठहरा।”
अजमेर का मूड कुछ बदला। उसने कहा-
“होस्पीटल के सामने दुकान बिक रही है। ठिकाने की दुकान है। मैंने सोचा था कि ले लेते हैं, टिक कर बैठेगा, पर उसका पता ही नहीं कि कब वापस लौटेगा।”
“कहीं आयरलैंड में ही न टिक जाए ?”
“कुछ कह रहा था क्या ?”
“कहता तो नहीं, पर मलंग आदमी का क्या भरोसा ?”
उनकी बात सुनकर गुरिंदर के मुँह से आह निकली। वह बोली-
“तुम्हारा भाई है, भटकता घूमता है, कुछ करो उसका, उसे समझाओ।”
“वह समझने वाली चीज नहीं, जट्टिए।”
“शौन की वाइफ को फोन करके कह कि लौटते ही घर को आए।”
सोहन सिंह ने अपनी बात बताते हुए कहा-
“अगर वह समझने वाला होता तो अपना टब्बर छोड़ कर इस तरह न घूमता फिरता। मैंने बहुत कहा कि घर में झगड़ा न डाल, पर ये नहीं माना।”
“भाइया, वो लड़की इतनी बुरी नहीं, यही पृथ्वीराज के जमाने का बना फिरता है। कहता है- यह न पहनो, वो न पहनो। और लड़की है कि श्रीदेवी वाला माडल।”
(क्रमश: जारी…)
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अनुरोध

गवाक्ष” में उन सभी प्रवासी लेखकों/कवियों की समकालीन रचनाओं का स्वागत है जो अपने वतन हिंदुस्तान की मिट्टी से कोसों दूर बैठ अपने समय और समाज के यथार्थ को हिंदी अथवा पंजाबी भाषा में अपनी रचनाओं के माध्यम से रेखांकित कर रहे हैं। रचनाएं ‘कृतिदेव’ अथवा ‘शुषा’ फोन्ट में हों या फिर यूनीकोड में। रचना के साथ अपना परिचय, फोटो, पूरा पता, टेलीफोन नंबर और ई-मेल आई डी भी भेजें। रचनाएं ई-मेल से भेजने के लिए हमारा ई-मेल आई डी है- gavaaksh@gmail.com

रविवार, 28 सितंबर 2008

गवाक्ष - सितंबर 2008



गवाक्ष” के माध्यम से हम हिन्दी ब्लॉग-प्रेमियों को हिन्दी/पंजाबी के उन प्रवासी लेखकों/कवियों की समकालीन रचनाओं से रू-ब-रू करवाने का प्रयास कर रहे हैं जो अपने वतन हिन्दुस्तान से कोसों दूर बैठकर अपने समय और समाज के यथार्थ को अपनी रचनाओं में रेखांकित कर रहे हैं। “गवाक्ष” के पिछ्ले आठ अंकों में पंजाबी कवि विशाल (इटली) की कविताओं का हिन्दी अनुवाद, दिव्या माथुर (लंदन) की कहानी, अनिल जनविजय (मास्को) की कविताएं, न्यू जर्सी, यू.एस.ए. में रह रहीं देवी नागरानी की पाँच ग़ज़लें, लंदन निवासी कथाकार-कवि तेजेन्द्र शर्मा, रचना श्रीवास्तव, दिव्या माथुर की कविताएं, दुबई निवासी पूर्णिमा वर्मन की कविताएं, यू एस ए में रह रहीं हिन्दी कथाकार-कवयित्री इला प्रसाद की कविताएं और पंजाबी कथाकार-उपन्यासकार हरजीत अटवाल के उपन्यास “सवारी” के हिंदी अनुवाद की सात किस्तें आपने पढ़ीं। “गवाक्ष” के सितंबर,2008 अंक में प्रस्तुत हैं – पंजाबी कथाकार-उपन्यासकार हरजीत अटवाल के धारावाहिक पंजाबी उपन्यास “सवारी” की सातवीं किस्त का हिंदी अनुवाद तथा डेनमार्क निवासी कवि भगत धवन की कविताएं…

धारावाहिक पंजाबी उपन्यास(किस्त- 7)

सवारी
हरजीत अटवाल
हिंदी अनुवाद : सुभाष नीरव


बारह

गुरां ने सोचा कि अब विवाह तय हो गया है और वह बलदेव से पीछा छुड़वा लेगी, पर बलदेव था कि अब अधिक याद आने लगा था। उसे अपने आप पर गुस्सा आता कि उसने बलदेव के दिल की सदा सुनी क्यों नहीं। फिर बलदेव पर गुस्सा आने लगता कि वह मुँह से कुछ बोला क्यों नहीं। जैसे-जैसे विवाह नज़दीक आ रहा था, उसे लग रहा था कि यह ठीक नहीं हो रहा। फिर उसे अपने गरीब माँ-बाप का खयाल आता तो सोचती कि यही ठीक था। वह तो बहुत किस्मत वाली थी कि इंग्लैंड से आया लड़का मिल गया था, नहीं तो उनके घर की हैसियत को ऐसा रिश्ता कहाँ नसीब होना था। उसका मन होता कि किसी के संग वह अपने दिल की बात साझी करे, पर इतनी करीबी सहेली कोई थी ही नहीं। फिर अब तो विवाह में तीन दिन ही शेष थे। किसी को दिल की बात बता कर करेगी भी क्या। फिर इससे भी अधिक अनसोचा घटित हो गया। बलदेव दूल्हे के पीछे सरबाला बना खड़ा था। यह देखकर गुरां को झटका-सा लगा। उसने मन ही मन सोचा कि रब्ब उससे किस जन्म के बदले ले रहा है। असल में, अब उसे महसूस हो रहा था कि वह बलदेव के साथ कितना जुड़ गई थी।
बलदेव का बड़ा भाई अजमेर इंग्लैंड से विवाह करवाने इंडिया आया तो उसने कितनी ही लड़कियाँ देखीं। कोई उसे पसंद नहीं आती थी तो कोई उसे ना कर देती। आख़िर में किसी बिचौलिये ने गुरां के रिश्ते की बात की और साथ ही कहा कि लड़की लड़के को नहीं दिखानी है, कोई दूसरा बेशक लड़की को देख ले। इस पर उनकी बड़ी बहन बंसो जाकर लड़की देख आई और पसंद भी कर आई। अजमेर को जल्दी लौटना था इसलिए विवाह की भी जल्दी थी। बलदेव और शिंदा अजमेर के आने की खुशी में शराब निकालने में जुटे हुए थे, इसलिए उन्होंने अधिक ध्यान ही नहीं दिया। जब बलदेव को पता चला कि लड़की चक्क से है तो एकबार उसके दिल को कुछ हुआ। फिर जब बारात लेकर गए और वहाँ अपनी क्लास की कुछ लड़कियों को घूमते देखा तो उसे शक होने लगा। फिर एक लड़की ने आकर उसे बुला ही लिया। कहा-
“दूल्हा तेरा सगा भाई है ?”
“हाँ।”
“इधर जो लड़की है, वह गुरां है, पता है तुझे ?”
बलदेव ‘नहीं’ भी नहीं कह सका था। उसे अपने आप पर गुस्सा आ रहा था कि लड़की के बारे में पहले जानने की कोशिश क्यों नहीं की। फिर वह सोचने लगा कि अगर जान भी जाता तो क्या करता। क्या विवाह रुकवा देता। गुरां से उसका इकतरफा लगाव था, इतने से लगाव के सहारे वह कैसे हिम्मत दिखा सकता था। ऐसा सोचते हुए वह संभल गया और विवाह का आनन्द लेने लगा।
अजमेर जब लड़की लेने उनके घर गया तो वहीं उसे मालूम हो गया कि गुरां और बलदेव दोनों क्लास-फैलो रहे थे। अजमेर ने कहा-
“तूने मुझे बताया क्यों नहीं ?”
“मुझे क्या पता था ? हमने कौन-सा लड़की देखी थी। और फिर, गुरां ने कालेज में अधिक किसी को बताया भी नहीं था कि उसका विवाह होने जा रहा है।”
“कैसी है लड़की ?”
“अब तो जैसी भी है, ठीक है। वैसे भाजी एक बात बताऊँ कि ऐसी लड़की किस्मत वालों को ही मिलती है।” कहकर उसने अजमेर से हाथ मिलाया तो अजमेर बागोबाग हो गया।
बलदेव इस हादसे में से सहजता से निकल आया। उसने अपने आप को संभाल लिया था। कभी-कभी अपने पराजित होने का अहसास जागता तो वह उसी समय अपने आप को तसल्ली देने लगता कि वह अगर हारा है, तो अपनों से ही हारा है, गैरों से नहीं। इस हार में भी उसकी जीत थी। कालेज में दोस्त भाई की शादी की पार्टी मांगते तो वह खुशी-खुशी सबकी सेवा कर देता। किसी को उसने अपना उदास चेहरा नहीं दिखलाया था। घर में भी पहले की भांति ही हँसता-खेलता रहता।
गुरां से उसकी कोई बातचीत साझी नहीं हो सकी। जब कभी कहीं इकट्ठे बैठे होते तो वे दोनों नज़रें चुराकर एक दूसरे की ओर देखते, पर बोलते नहीं थे। शाम को जब तीनों भाई बैठकर पीने लगते तो बलदेव कुछ खुलकर बातें करने लग पड़ता, लेकिन गुरां से फिर भी उसकी कोई बात न होती। विवाह के बाद अजमेर महीनाभर रहा और फिर वापस इंग्लैंड जाने की तैयारी करने लगा। उसने गुरां का पासपोर्ट बनने के लिए दे दिया था, जिसके बनने में अभी कुछ महीने लगने थे। एक दिन गुरां की माँ अजमेर से पूछने लगी-
“बेटा, गुरां को कालेज से हटा लें ?”
“किसलिए माता, जाने दो, घर में भी क्या करेगी !”
“यहीं चक्क से जाती रहे ?”
“जैसा चाहो कर लो, पर वहाँ से बलदेव को भी जाना होता है, उसके संग ही चली जाया करेगी।”
एक दिन गुरां तैयार होकर अपने कमरे से बाहर निकली। बाहर बलदेव खड़ा था। उसने गुरां को देखा और देखता ही रह गया। इस दौरान उसने गुरां को गौर से देखा ही नहीं था। हल्के से मेकअप में वह अप्सरा लग रही थी। उसके कानों में गुरां का गीत गूंजने लगा। कुछ दिनों से यह गीत बंद हुआ पड़ा था। गुरां उसके करीब से इस तरह निकल गई मानो वह वहाँ हो ही नहीं। पर आगे बढ़कर उसने मुड़कर बलदेव की तरफ देखा। वह कुछ कहना चाहती थी, पर क्या कहना था, यह वह भी नहीं जानती थी। उस दिन गुरां कालेज जाने के लिए बलदेव की मोटर-साइकिल के पीछे पहली बार बैठी थी। मोटर-साइकिल हिला तो उसने बलदेव के कंधे पर अपना हाथ रख लिया। बलदेव के जिस्म में एक सिहरन-सी दौड़ गई। एक झटके से मोटर-साइकिल आगे बढ़ी तो गुरां पूरी की पूरी उसके साथ लग गई। बलदेव आनंदित-सा हो उठा। उसने बात करने का साहस करते हुए कहा-
“ध्यान से बैठना, कहीं कुछ हो न जाए। भाई को क्या मुँह दिखाऊँगा मैं !”
“अगर इतनी ही चिंता है तो ध्यान से चलाना।”
यह उनके बीच पहला वार्तालाप था। कालेज पहुँचकर बलदेव ने शैड में मोटर-साइकिल खड़ी करते हुए कहा-
“कैसा रहा सफर ?”
“बहुत खूब ।”
“डर तो नहीं लगा ?”
“डराने वाला कोई काम करता, तभी न डर लगता।”
बलदेव सोच में पड़ गया कि वह क्या कहना चाहती होगी। उसने फिर कहा-
“लौटने के समय यहीं आ जाना।”
“अब तू मेरे साथ नहीं चलेगा ?”
“तेरे साथ चलते शर्म आती है।”
“अच्छा ! तेरे भाई ने तो तुझे मेरे साथ मेरी देखभाल करने के लिए भेजा है, पर तू है कि तुझे शर्म आ रही है।”
“चल बाबा चल।”
वह गुरां के साथ-साथ चलने लगा। कुछ दूर जाकर गुरां लड़कियों के झुंड में जा मिली और बलदेव अपने यार-दोस्तों में जा खड़ा हुआ। लौटते समय दोनों ही एक-दूसरे से शरमाते रहे। अधिक बात नहीं की, पर एक-दूजे की निकटता का सुख अनुभव करते रहे।
अजमेर के वापस जाने तक वह खुलकर बातचीत करने लगे थे। कालेज में भी किताबें उठाये एक-साथ चलते। गुरां बलदेव के दोस्तों के झुंड में आ खड़ी होती। वह राह में आते-जाते कालेज की, दोस्तों की बातें करते, पर घर में चुप-चुप रहते।
कालेज जाने के समय एक दिन गुरां मोटर-साइकिल के पीछे बैठी वह गीत गुनगुनाने लगी। पहले तो बलदेव ने सोचा कि यह गीत उसके कानों को वैसे ही सुनाई देने लगा है जैसे पहले हुआ करता था, पर फिर उसे लगा- नहीं, यह तो गुरां ही गा रही थी। उसने मोटर-साइकिल रोक ली। गुरां ने गाना बंद कर दिया। बलदेव ने कहा-
“चुप क्यों हो गई ?... गा।”
“क्यों गाऊँ ?... तेरा भाई तो मेरे गाने को बंद कर गया है। उसे जब मेरे गाने का पता चला तो बोला था कि खबरदार, अगर फिर से यह मिरासियों वाला काम किया।”
“तू मेरे लिए गा। तेरे इस गीत में मेरा बहुत कुछ है गुरां।”
“बहुत कुछ क्या है ?”
“तेरे इस गीत में मेरी सांसें हैं, मेरी ज़िंदगी है।”
“बहुत समय से बता रहा है !”
कहते हुए गुरां मोटर-साइकिल से उतरकर उसके सामने खड़ी हो गई। उसने गुरां के दोनों हाथ थाम लिए और आँखें नम करके बोला-
“गुरां, मैं तुझसे कुछ कहना चाहता हूँ।”
“मेरे हाथ छोड़, चलती राह है, कोई देख लेगा... हिजड़ा-सा ! कहता है, मैं कुछ कहना चाहता हूँ... अब जब सबकुछ हो चुका तो मैं कुछ कहना चाहता हूँ... कहने का जब समय था, तब कहाँ चला गया था ? जब सारी दुनिया कहती घूमती थी तो तू कहाँ छिपा फिरता था।”
रोष में आकर बात करती गुरां ने मुँह दूसरी तरफ घुमा लिया।
“आय एम सॉरी गुरां, मैं तेरे गुस्से से डर गया था।”
“और अब किस डॉक्टर ने कह दिया कि कह ?”
“तेरे इस गीत ने मुझे हिम्मत दी।”
गुरां आगे कुछ न बोली और गुस्से में भरी दूर कहीं देखती रही। कुछ देर बाद बलदेव बोला-
“मुझे माफ कर दे।”
गुरां ने उसकी तरफ देखा। दोनों की आँखें नम थीं। बलदेव ने कुछ कहे बिना मोटर-साइकिल स्टार्ट किया और गुरां पीछे बैठ गई। रास्ते भर दोनों कुछ न बोले। बोल ही नहीं सके। कालेज पहुँचकर भी वे गुमसुम से घूमते रहे। लेकिन, दोनों को ढेर तसल्ली थी। उन्होंने कुछ पा लिया था। वापस लौटते हुए गुरां ने प्रश्न किया-
“कैसा है अब तू ?”
“मैं ठीक हूँ, तू कैसी है ?... मुझे माफ कर दिया ?”
“बलदेव, तू एकबार कहता तो सही। मैं सब समझती थी, प्रतीक्षा भी करती थी।”
“हौसला नहीं हुआ।”
“तेरे इस हौसले ने सबकुछ बिगाड़ कर रख दिया।”
“जो भी हो गुरां, बट आय लव यू सो मच... स्टिल आय लव यू...।”
“आय लव यू टू बलदेव, मेरे दिल का तो किसी को पता ही नहीं। तुझे विवाह में देखकर तू क्या जाने, मेरी क्या हालत हुई थी।” कहते हुए गुरां की आँखें भर आईं।
अब वे हमेशा इकट्ठे रहते। घर में भी और कालेज में भी। शिंदे ने एकदिन बलदेव से कहा-
“बलदेव, यह अपने भाई की अमानत है। अगर कोई ऐसी-वैसी बात हो गई तो भाई को मुँह दिखलाने योग्य नहीं रहेंगे।”
“तू फिक्र न कर, मुझे सब पता है।”
“तुझे पता है या नहीं, पर यह जो तू मोटर-साइकिल फर्राटे से निकाल ले जाता है और पीछे वो बैठी होती है, यह सब मुझे अच्छा नहीं लगता, डर लगने लगता है।”
बलदेव ने उसे बाहों में भर लिया।
“यकीन कर यार, मैं तेरा ही भाई हूँ, अगर तू मेरी जगह हो तो क्या ऐसी-वैसी बात सोच लेगा !”
“मैं तेरी जैसी जमातें जो नहीं पढ़ा।” कहकर शिंदा हँसने लगा।
गुरां मोटर-साइकिल के पीछे बैठती तो एकदम बलदेव से लगकर बैठती। उसके काने के पास मुँह ले जाकर गुनगुनाना आरंभ कर देती। बलदेव को नशा चढ़ने लगता। वह कहता-
“अगर भाई न होता तो मैं तुझे कभी भी दूर न होने देता।”
“तेरा भाई तो विलैतिया है, और बहुत मिल जाएंगी।”
“अगर हिम्मत है तो रहे जा, जो होगा, देखा जाएगा, मैं खुद झेल लूंगा।”
गुरां उसकी ठोढ़ी पकड़कर कहती-
“मुंडा जवान हो गया।”
इन्हीं दिनों में गुरां का पासपोर्ट बनकर आ गया। उसने बलदेव से कहा-
“बता, कब जाऊँ ?”
“अगर जाना ही है तो जब मर्जी चली जा। पर जाने से पहले एक बार गीत सुना जा ताकि जब मेरा दिल करे, उसे सुन सकूँ। तुझे नहीं पता, यह गीत मेरा आसरा है।”
उसकी बात सुनकर गुरां भावुक होते हुए बोली-
“यह गीत तेरा, यह गुरां तेरी मेरा राजा।”
बलदेव ने उसे आलिंगन में ले लिया।
चक्क वे जाते रहते थे। छोटा-सा घर था। घर की एक बैठक थी, गली से थोड़ा हटकर। वहीं बलदेव बैठा करता था। वही उसकी शराब पड़ी होती। घर में अकेली माँ ही हुआ करती। उसका बाप और भाई तो खेतों में होते। उस दिन भी वे चक्क चले गए। माँ बहाना करके बाहर निकल गई। बलदेव ने बोतल उठाई। गुरां बोली-
“इसकी क्या ज़रूरत है ?”
बलदेव ने बोतल एक तरफ रख दी। गुरां ने पलंग पर नई चादर बिछाई और बैठ गई। एक सिरहाना टांगों के नीचे रखा और एक पीठ के पीछे और बलदेव से बोली-
“तुझे इस गीत के मायने भी पता हैं ?”
“मुझे इसके मायने से कुछ नहीं लेना-देना। मेरा मतलब तो गीत से है, तुझ से है, तेरी आवाज़ से है और तेरी शीशे की बनी गर्दन से है।”
गुरां ने घुटनों को हाथों के घेरे में लिया और गला साफ करते हुए गीत गाने लगी- “भट्ठी वालिये... चंबे दीये डालिये नीं...।”
गुरां गाती गई। बलदेव उसकी ओर देखता रहा। पहले गुरां ने आँखें मूंद रखी थीं, ठीक वैसे जैसे कालेज में गाया करती थी। फिर उसने आँखें खोल लीं और बलदेव की आँखों में आँखें डालकर गाने लगी। बलदेव बुत बनकर उसकी तरफ देखता रहा।
गुरां ने गीत खत्म किया तो उसने उसकी गर्दन पर चुम्बन दिया और फिर उसके होंठ चूमने लगा।

(क्रमश: जारी…)

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भगत धवन की कविताएं
मीठी स्मृति
मीठी स्मृति
चंदन चमेली-सी महक
जब भी आए
आत्मसात करे
कड़वी स्मृति
सीले मौसम की सुलगती अग्नि
जब भी आए
तन मन तड़पाये
स्मृति तो है
एक रोशन द्वीप
जब भी आएमन चमकाए।
0
चिंता
चिंता से भाग कर
कहाँ जायेंगे
भाग कर देखें
भागते भागते
हाँफ जायेंगे
आत्म संतोष के लिए
मुड़ कर झांकें
वो पीछे नहीं
हमसे भी प्रथम
हमारे आगे
नए परिवेश में
हमारी प्रतीक्षा में रत
मत भागो इस से
हर्ष से मिलें इसको
कभी आगे, कभी पीछे
कभी हमारे भीतर
साथ न त्यागने वाला
अटूट प्रतिबिम्ब है यह।
0
जीवन है प्रवाह
जीवन है प्रवाह
बूंद-बूंद छलके
जैसे फूटे अमृत-धारा
सौन्दर्य का
शीतलता का
पर्वतों में बहता
लुप्त होता
समुन्दर में हो जाता विलीन
खारा-खारा सा
नमक रहितट
कराये पर्वतों से
हवा के कन्धों पे सवार
रूप धार कर बादल का
कर नूतन अभियान
नन्हीं-सी आशा और उमंग
जल तरंग हास रंग
वेदना से भरपूर
जीवन है प्रवाह।
0
मानव
मानव हो कर
दानव बनना
अपने को मानव कहलाना
ठीक नही है

पुत्र हो कर
बने कपूत
कैसे कहलाये फिर पूत
ठीक नही है

पैदा किया ईश्वर ने मानस
मानस बन जाए बनमानस
अपने को मानस कहलाये
ठीक नही है
पैदा किए उसने इंसान
और वो बन जायें हैवान
कहलायें ख़ुद को भगवान
ठीक नही है ।
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जन्म : २ फरवरी, १९५६, लुधियाना (पंजाब) पिछले बीस वर्षों से डेनमार्क में निवास प्रकाशन व प्रसारण : चार पुस्तकें पंजाबी भाषा में, "जीवन जाच" "चेतना दे आर पार" "सगल मनोरथ" “किरण किरण मेरी कविता रानी" हिन्दी पुस्तक "दर्पण" का पंजाबी में अनुवाद, हिन्दी में कविता प्रकाशाधीन, डेनमार्क में अनेक "भारतीय राजदूतों" द्वारा सांस्कृतिक कार्यक्रमों में सम्मानित "रेडियो सबरंग डेनमार्क" में पंजाबी भाषा में कार्यक्रम प्रसारित "अनेकता में एकता" पर अटूट विश्वास


अनुरोध
गवाक्ष” में उन सभी प्रवासी लेखकों/कवियों की समकालीन रचनाओं का स्वागत है जो अपने वतन हिंदुस्तान की मिट्टी से कोसों दूर बैठ अपने समय और समाज के यथार्थ को हिंदी अथवा पंजाबी भाषा में अपनी रचनाओं के माध्यम से रेखांकित कर रहे हैं। रचनाएं ‘कृतिदेव’ अथवा ‘शुषा’ फोन्ट में हों या फिर यूनीकोड में। रचना के साथ अपना परिचय, फोटो, पूरा पता, टेलीफोन नंबर और ई-मेल आई डी भी भेजें। रचनाएं ई-मेल से भेजने के लिए हमारा ई-मेल आई डी है- gavaaksh@gmail.com