रविवार, 15 जून 2008

गवाक्ष- जून 2008



“गवाक्ष” के माध्यम से हम हिन्दी ब्लाग-प्रेमियों को हिन्दी/पंजाबी के उन प्रवासी लेखकों/कवियों की समकालीन रचनाओं से रू-ब-रू करवाने का प्रयास कर रहे हैं जो अपने वतन हिन्दुस्तान से कोसों दूर बैठकर अपने समय और समाज के यथार्थ को अपनी रचनाओं में रेखांकित कर रहे हैं। “गवाक्ष” के पिछ्ले पाँच अंकों में पंजाबी कवि विशाल (इटली) की कविताओं का हिन्दी अनुवाद, दिव्या माथुर (लंदन) की कहानी, अनिल जनविजय (मास्को) की कविताएं, न्यू जर्सी, यू.एस.ए. में रह रहीं देवी नागरानी की पाँच ग़ज़लें, लंदन निवासी कथाकार-कवि तेजेन्द्र शर्मा की कविताएं तथा रचना श्रीवास्तव की कविताएं और पंजाबी कथाकार-उपन्यासकार हरजीत अटवाल के उपन्यास “सवारी” के हिंदी अनुवाद की पहली चार किस्तें आपने पढ़ीं। “गवाक्ष” के जून,2008 अंक में प्रस्तुत हैं – लंदन निवासी कथाकार-कवयित्री दिव्या माथुर की कविताएं और हरजीत अटवाल के धारावाहिक पंजाबी उपन्यास “सवारी” की पांचवी किस्त का हिंदी अनुवाद…

दस कविताएं
दिव्या माथुर (लंदन)
चित्र : अवधेश मिश्र

पहला झूठ
नई बत्ती को जलाए रखने के लिये
देर तक आग दिखानी होती है
जली हुई रुई की बत्ती
बडी आसानी से जल जाती है
पहला झूठ भी बडी मुश्किल से फूटता है।


अँधेरा

सच को न तो
ओढ़नी चाहिये
न ही कोई बिछौना
झूठ ही ढूँढता है
एक काली चादर
और छिपने के लिए
एक अँधेरा कोना।

अकेलापन

सोचती हूँ
सच बोलना छोड़ दूँ
कम से कम
अकेलापन तो जाएगा भर
अंतर में सुलगती रहे
चाहे अँगीठी
आत्मा की जली कुटी
सुनने से
कहीं बेहतर होंगी
दुनिया की बातें
मीठी मीठी।

मेरी ख़ामोशी

मेरी ख़ामोशी
एक गर्भाशय है
जिसमें पनप रहा है
तुम्हारा झूठ
एक दिन जनेगी ये
तुम्हारी अपराध भावना को
मैं जानती हूँ कि
तुम सा नकार जाओगे
इससे अपना रिश्ता
यदि मुकर न भी पाये तो
उसे किसी के भी
गले मढ़ दोगे तुम
कोई कमज़ोर तुम्हें
फिर बरी कर देगा
पर तुम
भूल के भी न इतराना
क्यूंकि मेरी ख़ामोशी
एक गर्भाशय है जिसमें पनप रहा है
तुम्हारा झूठ।


विसर्प

अपने बदन से
उतार तो दिया
उस विसर्प को
जो पला किया
मेरे खून पर
किंतु उसके छोड़े
निशानों का क्या करूं
जो जब तब
उभर आते हैं
और रिसने लगते हैं
छूतहे खून से।

सती हो गया सच

तुम्हारे छोटे, मँझले
और बड़े झूठ
उबलते रहते थे मन में
दूध पर मलाई सा
मैं जीवन भर
ढकती रही उन्हें
पर आज उफन के
गिरते तुम्हारे झूठ
मेरे सच को
दरकिनार कर गये
तुम मेरी ओट लिये
साधु बने खड़े रहे
और झूठ की चिता पर
सती हो गया सच।

बासी-बासी

हर रात मैं
मैं अपने पलंग की चादर
और तकिऐ के गिलाफ
बदलती हूं
हर रात तुम लौटते हो
बासी-बासी।

अपेक्षा


अन्दर से टूटी फूटी थी स्वयं
पर जोड़ती रही
सबको, सब चीज़ो को
दूसरो से सच की अपेक्षा करती रही
अपने मन मे झूठ छिपाये।

सुनामी सच

तुम्हारे एक झूठ पर
टिकी थी
मेरी गृहस्थी
मेरे सपने
मेरी खुशियाँ
तुम्हारा एक सुनामी सच
बहा ले गया
मेरा सब कुछ।

सहारा

एक सच की तलाश मे
तलवों के रिस रहे है घाव
और हथेलियों मे उग आए है कांटे
कौन ग़म बांटे
एक झूठ का सहारा था
लो वो भी छूट गया!
(उपर्युक्त दस कविताओं का चयन कवयित्री द्वारा “झूठ” पर लिखी गईं सीरीज़ कविताओं में से किया गया है)

शिक्षा : एमए (अंग्रेजी) के अतिरिक्त दिल्ली एवं ग्लास्गो से पत्रकारिता में डिप्लोमा। आइ टी आई दिल्ली में सेक्रेटेरियल प्रैक्टिस में डिप्लोमा एवं चिकित्सा आशुलिपि का स्वतंत्र अध्ययन।
कार्यक्षेत्र : रॉयल सोसायटी आफ आर्टस की फेलो दिव्या का नेत्रहीनता से सम्बंधित कई संस्थाओं में योगदान रहा हैं। वे यू के हिंदी समिति की उपाध्यक्ष कथा यू के की पूर्व अध्यक्ष और अंतर्राष्ट्रीय हिंदी सम्मेलन की सांस्कृतिक अध्यक्ष भी रही हैं। आपकी कहानियां और कविताएं भिन्न भाषाओं के संकलनों में शामिल की गई हैं। रेडियो एवं दूरदर्शन पर प्रसारण के अतिरिक्त इनकी कविताओं कहानियों व नाटकों का मंचन प्रसारण व ब्रेल लिपि में प्रकाशन हो चुका है। दिव्या जी को पदमानंद साहित्य एवं संस्कृति सेवा सम्मान से अलंकृत किया जा चुका है। लंदन में कहानियों के मंचन की शुरूआत का सेहरा भी आपके सिर जाता है।

प्रकाशित रचनाएं : ‘अंत:सलिला’ ‘रेत का लिखा’ ‘ख्याल तेरा’ ‘आक्रोश’ ‘सपनों की राख तले’ एवं ‘जीवन ही मृत्यु’।
संप्रति : नेहरू केन्द्र (लंदन में भारतीय उच्चायोग का सांस्कृतिक विभाग) में वरिष्ठ कार्यक्रम अधिकारी।

संपर्क : 3-A Deacon Road,
London NW2 5NN
E-mail : divyamathur@aol.com

धारावाहिक पंजाबी उपन्यास(किस्त- 5)

सवारी
हरजीत अटवाल
हिंदी अनुवाद : सुभाष नीरव
।। आठ ।।

शौन का मन काम में लगने लगा। उसे अब लंदन में बस जाना ही अच्छा लगता। उस दिन जब उसने ऐलिसन को उसके साथ वापस आयरलैंड लौट चलने के लिए कहा था तो उसके मन में कुछ हुआ था कि वह स्वयं तो वापस लौटने का कोई इरादा नहीं रखता था। आयरलैंड जाने के बारे में सोचते ही उसके मन को कुछ होने लगता। वह सोचता कि यदि कभी आयरलैंड जाना भी पड़ा तो वाटरफोर्ड या कौर्क में जा बसेगा। वैलज़ी तो वह तभी जाएगा जब उसमें उतना ही बड़ा फॉर्म हाउस खरीदने की ताकत आ जाएगी।
काम पर उसका भिन्न-भिन्न लोगों के साथ वास्ता पड़ता था। भिन्न-भिन्न देशों के लोगों से। सियासत में रुचि रखने के कारण वह हर समय अपनी जेब में टाइम्ज़ अखबार रखा करता था। दुनियाभर की ख़बरें पढ़ता और फिर उसके बारे में बात करने के लिए किसी न किसी की तलाश में रहता। रोडेशिया जिम्बावे बनकर दुनिया के सामने आया तो उसे गैरी फ्लिंट बातें करने के लिए मिल गया। जब भी ब्रेक होती या कहीं मिल बैठते तो इसी विषय पर बहस करने लगते। गैरी इंग्लिस था। यह बात शौन को लंदन में आकर समझ में आ गई थी कि इंग्लिस लोग आयरश लोगों के प्रति अच्छा नज़रिया नहीं रखते। उत्तरी आयरलैंड में चल रहे आतंकवाद ने समूचे आयरलैंड का अक्स बदल कर रख दिया था। अंग्रेजों को इस बात से सरोकार नहीं था कि कौन-सा आयरस उत्तरी आयरलैंड की लहर से सहमत था और कौन-सा नहीं। वे सभी आयरशों को नफ़रत की निगाह से देखते। अंग्रेजों के मुकाबले एशियन और अफ्रीकन लोगों का व्यवहार बहुत दोस्ताना था।
शौन की मेजर सिंह के साथ निकटता बढ़ने लगी थी। उसे भारत की राजनीति की अधिक समझ नहीं थी। केन्द्र सरकार में तो एक ही पार्टी थी, पर प्रांतों में कई-कई पार्टियां थीं। जल्दी-जल्दी गिरती-बनती सरकारों की ख़बरें उसकी पकड़ में नहीं आ रही थीं। पंजाब में हुई हलचल के बारे में भी उसे अधिक जानकारी नहीं थी। मेजर सिंह इस मामले में उसके बहुत काम आया। मेजर सिंह से ही उसे सिक्ख धर्म की विशालता के बारे में पता चला। मेजर सिंह उसे पंजाब में सिक्खों के संग हो रहे बर्ताव के बारे में विस्तार से बताता।
मेजर सिंह से दोस्ती बढ़ी तो उसने उसके घर भी जाना प्रारंभ कर दिया। उसे मेजर सिंह का सिक्खी मर्यादा में रहना अच्छा लगता था। उसका घर बहुत अच्छी तरह सजा हुआ होता। उसकी पत्नी घर में ही रहती और बच्चों व घर की देखभाल करती। शौन को यह बात बहुत अच्छी लगती। वह मेजर सिंह को बताने लगता–
“मिस्टर सिंह, यही फिलोसफी क्रिश्चियन धर्म की है, पति काम करेगा, पत्नी घर संभालेगी। असल में, ईश्वर ने मनुष्य को बनाया ही इस तरह है कि आदमी बाहर का काम करे और औरत अंदर का।”
“पर शौन, आज की दुनिया ने सब कुछ बदल कर रख दिया है। औरत को ज़रूरत से ज्यादा हक दे दिए हैं। ये जो स्त्रियाँ आदमी के बराबर काम करने लग पड़ी हैं, इसने बहुत काम खराब किया है।”
“ज़िन्दगी नार्मल नहीं रही, ज़िन्दगी का मज़ा पहले जैसा नहीं रहा। यह अप्राकृतिक ज़िन्दगी है, पर करें भी क्या।”
“तू विवाह कैसी लड़की से करवायेगा ?”
“घरेलू लड़की से। मैं चाहता हूँ कि लड़की मेरी बात सुने, मेरा कहना माने।”
“यह तो फिर इंडियन लड़की ही ऐसा कर सकती है। कोई इंडियन लड़की ढूँढ़ ले।”
“अभी कोई प्रोग्राम नहीं है, अगर विवाह का इरादा हुआ तो सोचूंगा।”
मेजर सिंह के घर जाते हुए उसने नोट किया कि उसकी पत्नी उसकी हर बात मानती थी। एक दिन उसने उससे पूछा–
“मिसेज सिंह, तुम्हारा दिल नहीं करता कि तू काम पर जाए ?”
“यह तो इनकी मर्जी है। अगर इन्हें पसंद है तो मुझे भी पसंद है। नहीं तो नहीं। मेरे साथ की कई स्त्रियाँ काम करती भी हैं, पर यह नहीं चाहते।”
शौन कहता कि भारतीय पत्नी को वोट तो पति से पूछकर ही डालनी है, पर वह टॉयलट भी पूछकर जाती है। कहने को तो किसी भी लहजे में कह जाता, पर दिल से उसे यह बात पसंद थी। आहिस्ता-आहिस्ता वह सोचने लगा था कि क्यों न किसी भारतीय लड़की से दोस्ती की जाए। उसने मेजर सिंह से पूछा–
“मिस्टर सिंह, यहाँ इंडियन पब कहाँ है ?”
“ये साऊथाल में बहुत से पब इंडियन ही हैं, हम कई बार गए हैं।”
“पर इनमें इंडियन लड़कियाँ तो होती नहीं।”
“इंडियन लड़की तुझे इस तरह पब में नहीं मिलेगी, ज़रा और मेहनत करनी पड़ेगी। अगर पब में आई लड़की मिल गई तो शायद वो वैसी न हो, जैसी तुझे चाहिए। पब में आने वाली लड़की इंडियन नहीं होती।”
शौन ने कई बार कोशिश की, पर किसी भी भारतीय लड़की से उसका सम्पर्क न हो सका। उसे भारतीय लोग बहुत ही कट्टर दिखाई देते। कई बार उसे मेजर सिंह की बातें भी संकीर्ण लगने लगतीं।
इन्हीं दिनों में ही बलदेव काम पर आ लगा। शौन वाले टेबल पर ही वह ट्रेनिंग पर आया था। लम्बा कद, महीन मूंछें और नाक पर ऐनक वाला यह भारतीय शौन को पहली नज़र में ही अच्छा लगा था, पर जब उसने सियासत के बारे में बातें शुरू कीं तो वह और अधिक दिलचस्प प्रतीत हुआ। मेजर सिंह से उसके विचार बिलकुल भिन्न थे। उसे सिक्खों की कोई समस्या नहीं दिख रही थी। दुनिया की राजनीति के बारे में भी उसके विचार मेजर सिंह से बहुत अलग थे। मेजर सिंह के उलट उसको ब्रितानवी सियायत में भी गहरी दिलचस्पी थी। अब उसकी दोस्ती बलदेव के साथ बढ़ने लगी। उसमें एक ही नुक्स था कि वह धार्मिक नहीं था।
बलदेव शौन का हमउम्र भी था, जबकि मेजर सिंह बड़ी उम्र का था। अब वे दोनों ही इकट्ठे घूमा करते। बलदेव कईबार शौन के फ्लैट में चला जाता। शौन को अब कांउसल की ओर से रहने के लिए फ्लैट मिला हुआ था। शौन भी बलदेव के घर जाता रहता था। यही नहीं, उसके रिश्तेदारों के घर भी चला जाता। उसके घर का माहौल भी मेजर सिंह वाले घर से अलग था। उसकी पत्नी सिमरन बैंक में काम करती थी। यहाँ की जन्मी भारतीय लड़की में और गोरी(अंग्रेज लड़की) में कोई फ़र्क दिखाई नहीं देता था। वह सोचने लगता कि अगर वह यहाँ की जन्मी इंडियन लड़की से विवाह करवाएगा तो मसले वही रहेंगे। इससे तो बेहतर है कि वह किसी आयरश लड़की के साथ ही ज़िन्दगी गुजारे। रंग का मसला भी नहीं होगा और न ही धर्म का। आगे बच्चों के लिए भी कोई कठिनाई पैदा नहीं होगी।
क्रिकलवुड ब्रोड-वे पर नेशनल नाईट क्लब था। बहुत बड़ा हाल था इस क्लब का। हर वीक-एंड पर यहाँ डिस्को होता। इस क्लब का मालिक आयरश था। यहाँ आयरश संगीत चलता और अधिकतर आयरश लोग ही हुआ करते। शौन यहाँ नियमित रूप से जाता था। कोई अस्थायी लड़की मिल भी जाती, पर ऐसी नहीं मिली थी जिसके साथ लम्बे समय के लिए संबंध बना सके। कभी-कभार बलदेव भी उसके संग चला जाता लेकिन वह रहता बहुत दूर था। ग्रीनविच, दरिया के दूसरी तरफ। उसके लिए वापस लौटना कठिन हो जाता।
एक दिन शौन क्लब गया तो उसे एक इंडियन लड़की दिखलाई दी। वह हैरान होता हुआ उसकी तरफ लपका। उसे वह बहुत सुंदर लगी। उसके करीब जाकर शौन कहने लगा–
“मैंने तुझे पहले भी कहीं देखा है, कहाँ...।”
“नहीं, मैं इस इलाके में नहीं रहती। मैं तो छुट्टियाँ बिताने आई हूँ।”
“हाँ, तू अलिज़बब टेलर-सी दिखती है, इसलिए... तू बहुत खूबसूरत है। किस देश से आई है ?... इंडिया से ?”
“शुक्रिया। नहीं, इंडिया से नहीं, मारीशस से हूँ, वैसे ओरिजिन इंडिया का है।”
“अकेली हो ?”
“नहीं, मेरा ब्वाय-फ्रेण्ड साथ है।”
ब्वाय-फ्रेण्ड के नाम पर शौन की फूक निकल गई। उसने उस लड़की की ओर गौर से देखते हुए सोचा कि यह लड़की तो छीनकर ली जाने वाली है। उसने फिर कहा–
“क्या नाम है तेरा ? कितनी देर ठहरोगी ?”
“कैरन... तेरा ?”
“मेरा शौन...। मेरे साथ बैठकर बियर पीना और बातें करना पसंद करेगी ?”
“मैं बियर नहीं पीती।”
“जूस ही ले लेना।”
शौन ने उसे कंधे से पकड़कर अपने संग ले लिया। शौन ने कहा–
“कहाँ है तेरा ब्वाय-फ्रेण्ड ? और तूने बताया नहीं कि कितनी देर रुकेगी ?”
“यहीं कहीं होगा। मैं महीना भर ठहरूंगी, फिर चली जाऊँगी।”
तभी एक सुकड़ा-सा एशियन उनके पास आ धमका। शौन उसकी तरफ देखकर मन ही मन हँसा। बातें करते हुए उसने कैरन से फोन नंबर भी ले लिया। उसके बारे में और बहुत सी बातें पूछ लीं। ब्वाय-फ्रेण्ड का नाम राजा था। वह असल में ब्वाय- फ्रेण्ड नहीं था। जहाँ वह ठहरी थी, उन्हीं का लड़का था। शौन ने उसके संग डांस भी किया और उसके दोनों हाथ पकड़कर दबाये भी। उसने कान में कहा–
“मैं तेरे साथ और अधिक समय बिताना चाहता हूँ।”
“कल फोन करना।”
फिर उनकी मुलाकातों का सिलसिला शुरू हो गया। कैरन उसके फ्लैट में जाने लग पड़ी। कैरन वहाँ के किसी मिनिस्टर की बेटी थी। उसने अभी हाल ही में अपनी पढ़ाई खत्म की थी और वापस लौटकर पिता का कारोबार संभालना था। शौन को कैरन पसंद थी, वह उसके साथ विवाह भी करवाना चाहता था, पर कहीं कुछ रड़क रहा था। फादर जॉय से कैरन के धर्म के बारे में बात की। कैरन हिंदू थी पर क्रिश्चियनिटी के अनुसार विवाह के लिए धर्म कोई रोड़ा नहीं था। चुभने वाली बात के बारे में अधिक सोचने पर पता चला कि कैरन में अंहकार बहुत था। इतने अंहकार वाली लड़की उसके लिए ठीक नहीं थी। उसे तो मेजर सिंह की पत्नी जैसी लड़की की तलाश थी। फिर भी असमंजस की स्थिति में उसने कैरन से विवाह के बारे में पूछ लिया। कैरन उससे विवाह करवाने के लिए तैयार हो गई। उसने बड़ी मुश्किल से अपने पिता को राजी किया। कैरन की बड़ी बहन जो इसी प्रकार यहाँ सैर करने आने आई थी, ने भी यहीं विवाह करवा लिया था। उसने विवाह तो किसी मारीशियन के साथ ही करवाया था लेकिन वह रुतबे में कैरन के पिता से बहुत छोटा था। कैरन के पिता को इसका बहुत दुख लगा था। इससे उसके अंहकार को गहरी चोट पहुँची थी। बाद में यह विवाह तलाक में बदल गया। पिता को हार्ट-अटैक हो गया था। इस बार कैरन के पिता को इतनी भर तसल्ली थी कि अपने से छोटे आदमी से विवाह नहीं हो रहा था। कैरन को या उसके पिता को भी आयरश और अंग्रेजों के बीच के फर्क के बारे में जानकारी नहीं थी। उसे गोरा रंग ही दिखलाई दे रहा था। उसने वापस अपने देश जाना स्थगित कर दिया।
एक दिन बलदेव शौन से कहने लगा–
“मेरा इंडिया का प्रोग्राम बन रहा है, चल चलें।”
शौन तैयार हो गया। वह सोच रहा था कि शायद वहाँ विवाह के लिए कोई अच्छी लड़की मिल जाए। अगर ढंग की लड़की मिल गई तो फिर कैरन से उसने क्या लेना था। वह इंडिया घूम आया, पर कहीं कोई बात नहीं बनी। इन दिनों में विवाह के बारे में उसने इतना सोचा कि अब वह विवाह करवाने को बहुत उतावला था। यूँ भी ज़िन्दगी के बहुत सारे फैसले वह उतावलेपन में ही करता था। वह सोच रहा था कि इस वर्ष विवाह करवा लिया तो करवा लिया, नहीं तो उम्रभर विवाह नहीं करवाएगा। आयरलैंड में विवाह न करवाना कोई बड़ी बात नहीं थी। एक उम्र के बाद बहुत सारे मर्द विवाह का ख़याल छोड़ देते थे।
इंडिया वह कैरन को बताकर ही गया था। वापस लौटते ही उसके अंदर कैरन के लिए बेतहाशा मोह जागने लगा। वह इंडिया से उसके लिए कई प्रकार के तोहफे लेकर आया था। वह उससे मिलकर जल्दी ही विवाह के बारे में निर्णय पक्का करना चाहता था। उसने कैरन के ठिकाने पर फोन किया। फोन उसी लड़के ने उठाया जिसे शौन ने नेशनल में देखा था। उसने बताया– “कैरन तो हमेशा के लिए वापस चली गई है।”

।। नौ ।।

तड़के ही एक बड़ी-सी लॉरी ‘बैंस मीट मार्किट’ के बाहर आ खड़ी हुई। लॉरी का ड्राइवर बिग जॉन छलांग लगाकर नीचे उतरा। लम्बे-चौड़े जिस्म के कारण उसे सभी बिग जॉन कहते थे। लॉरी की फ्रिज़ चल रही होने के कारण शोर हो रहा था। तड़के के चुप्पी में यह शोर कुछ अधिक ही महसूस हो रहा था।
बैंस मीट मार्किट का दरवाजा खुला और सतनाम ओवरआल पहनते हुए बाहर निकल आया। उसके पीछे-पीछे ही मगील था। उन्हें देखते हुए जॉन ने कहा–
“मार्निंग सैम, मार्निंग सनिओर।”
“मार्निंग जॉन, लगता है आज दिन बहुत गरम होगा।”
“हाँ, कहते तो हैं पैंतीस प्लस। मैं भी इसीलिए जल्दी काम खत्म कर लेना चाहता हूँ। फिर पब में बैठकर बियर पिऊँगा।”
“तू बहुत लक्की है जॉन।”
बियर का नाम सुनकर मगील बोला। सतनाम ने कहा–
“लौरेल, तू फिजूल की ना सोच। आ काम खत्म करें।”
उसे पता था कि अगर बियर के बारे में और बातें कीं तो मगील का अभी मूड बन जाएगा। यह डिलीवरी उतारनी ज्यादा ज़रूरी थी। फिर सोमवार होने के कारण सामने बिजी दिन खड़ा था। सतनाम उसे लौरेल कहा करता। लौरेल-हार्डी वाली प्रसिद्ध हास्य जोड़ी वाले लौरेल के कारण।
यह लॉरी ‘कंटीनेंटल मीट’ वालों की थी जो कि गाय और सूअर के मीट में स्पेशियलिस्ट माने जाते थे। इनकी कीमतें अन्य होलसेलरों की बनस्बित ठीक होती थी और सर्विस भी बढि़या होती। उधार भी पूरे दो महीने का कर लेते थे। बिग जॉन लॉरी में चढ़कर मांस के बड़े-बड़े पीस सतनाम और मगील को पकड़ाने लगा। वे उन्हें दुकान के पीछे बने कोल्ड-रूम में रख आते। कोल्ड रूम में साइज के हिसाब से हैंगर बने हुए थे। अंग्रेजी के अक्षर ‘एस’ की शक्ल के। तेज सूए वाले। वे मीट के पीस उनमें फंसा आते। गाय की पूरी टांग या फिर पूरा सूअर काफी भारे हो जाते। उठाने वाले की हिम्मत जवाब दे जाती। मगील की बारी आती तो वह कहता–
“जॉन, हल्के वाला देना।”
“क्या सनिओर... तनख्वाह कम मिलती है ?”
“तनख्वाह को तू कम कहता है। ये तो बहुत ही कम देते हैं। काम देख ले कितना हार्ड है, इसे कह– मेरे पैसे बढ़ाये।”
“सैम, तू सनिओर की तनख्वाह बढ़ा। देख, कैसे टांगे टेढ़ी करके चल रहा है।”
“जॉन, यह सनिओर हमारा लौरेल है। यह यहाँ काम करने कहाँ आता है, यह तो कामेडी करने आता है। अगर यह थोड़ी-बहुत कामेडी न करे तो इसे इतने भी न मिलें। काम के वक्त तो यह टॉयलेट में जा घुसता है।”
हँसते हुए सतनाम ने कहा तो मगील बोला–
“जितनी तनख्वाह तू देता है, उससे तो बंदा टॉयलेट में ही घुस सकता है।”
कहते हुए मगील एक ओर होकर हांफने लगा। जॉन ने कहा–
“सनिओर, इस हिसाब से तू शुक्रिया अदा किया कर कि तुझे तनख्वाह मिलती है। अगर कोई और होता तो दुकान में खड़े होने के तेरे से पैसे लेता।”
“तू भी जॉन लॉरी चलाने के सिवा कुछ नहीं जानता। तू क्या जाने मेरी स्किल को। मैं लंदन का बहुत बढि़या बूचड़ हूँ। चालीस साल का तजु‍र्बा है मेरा, पूरे चालीस साल का। स्पेनिश मीट काटने में मेरा कोई सानी नहीं।”
“तेरा चालीस साल का तुजु़‍र्बा है, पैदा होते ही छुरी पकड़ कर खड़ा हो गया था ?”
“बावन साल की उम्र है मेरी, देखने में ही मैं जवान लगता हूँ।”
कहते हुए मगील नखरे से चलने लगा। आर्डर पूरा उतर गया था। जॉन ने डिलीवरी नोट सतनाम के हाथ में थमाकर कहा–
“कुछ फालतू पीस हैं, अगर कैश चाहिए तो...।”
अर्थात वह चोरी का कुछ मीट बेचना चाहता था जिसे वह सस्ता दे दिया करता था। डिलीवरी करते हुए हेरा-फेरी करके या फिर पीछे फैक्टरी में से ही अधिक मीट लॉरी में रखवा लाता और सतनाम को या किसी अन्य विश्वासपात्र को बेच देता। अधिकतर ड्राइवर ऐसा ही करते थे। सतनाम ने नकद पैसे देकर वह मीट भी उतरवा लिया।
बिग जॉन लॉरी लेकर चला गया। मगील का सांस अभी भी सम पर नहीं आया था। उसने कहा–
“मैं यूं ही भारी काम को हाथ लगा लेता हूँ, मेरे वश का नहीं।”
“तुझे तो मैंने कहा था कि तू ऐंजला के साथ लिपटकर सोया रह, मैं खुद ही मायको को बुला लाता।”
मगील मायको के नाम पर कुछ न बोला। यह ओवर टाइम वह स्वयं ही करना चाहता था। इस तरह कुछ पैसे वह ऐंजला से चुराकर रख सकता था। कुछ देर बाद भी सांस सम पर न आया तो बोला–
“यहाँ बियर पड़ी थी, कहाँ गई ?”
“दूसरे कोल्ड रूम में पड़ी है। पर अगर तू अभी ही पीने लग पड़ा तो दिन कैसे गुजरेगा?”
“सैम, मैं इतना थक गया हूँ कि एक डिब्बा पीकर ही काम कर सकता हूँ। चिंता न कर, बस एक डिब्बा ही पिऊँगा।”
“देख मगील, कितना काम है, डिलीवरी संभालनी है, रेस्ट्रोरेंटों का आर्डर मुझे लेकर जाना है, मेरा वक्त तो वहीं बीत जाएगा।”
“तू फिक्र न कर, पैट्रो को आ लेने दे, देखना काम कैसे खत्म होता है।” कहकर वह अंदर से बियर लेने चला गया। सतनाम ने घड़ी देखी। अभी छ: ही बजे थे। पैट्रो ने आठ बजे आना था। दो घंटों में काफी काम किया जा सकता था। वह नये आए मीट को हिसाब से काटने लगा। मगील भी बियर खत्म करके आ गया। आठ बजे तक वे बगै़र कोई बात किए काम में लगे रहे। आठ बजे पैट्रो आ गया। पैट्रो ग्रीक बूढ़ा था। काम में तो अब वह ढीला पड़ चुका था पर था तजु़बे‍र्कार बुच्चड़। सतनाम को उसी ने ट्रेंड किया था। पैट्रो ने ओवरआल पहना और उनके साथ काम में जुट गया।
मगील और पेट्रो के अलावा माइको भी काम करता था। लेकिन शायद वह मूडी-सा आदमी था। उस पर अधिक भरोसा नहीं किया जा सकता था। काम पर भी आ गया तो आ गया, नहीं तो अधिकतर छुट्टी मार जाता था। इसी तरह पैसों के मामले में भी था। घोड़े लगाने का शौकीन था। इस दुकान के पहले मालिक निक्की के ज़माने में उसने बहुत ऐश की हुई थी, सारा हिसाब उसी के पास हुआ करता था। कई फालतू के शौक पाल बैठा था। अब तंग हो रहा था। सतनाम को उसकी ज़रूरत रहती थी, इसलिए कई बार माइको के अनुसार ढल जाता था। लेकिन उसे टिल्ल(गल्ले) पर नहीं जाने देता था। वह जानता था कि अगर माइको का मूड सही हो तो काम में वो बहुत तगड़ा था। सतनाम सोचता था कि इसकी जगह कोई रैगुलर आदमी मिल जाए तो वह इसे हटा देगा। वह नये बुच्चड़ की तलाश में था। बुच्चड़ तो मिलते थे पर तनख्वाह पूरी मांगते थे।
पैट्रो के ठीक बाद माइको भी आ गया। सतनाम को कुछ तसल्ली हुई। वह मगील को संग लेकर रेस्तरांओं के आर्डर वैन में रखने लगा। बहुत सारे भारतीय और ग्रीक रेस्तरांओं को वह मीट की सप्लाई करता था। दुकान की परचून की ग्राहकी से डिलवरी का काम कहीं अधिक आसान था।
तीनेक साल होने को थे सतनाम को इस दुकान में। हौलोवे स्टेशन के सामने ही होर्नजी रोड पर स्थित परेड में थी यह दुकान। इसके पहले मालिक निक्की की अचानक मौत हो गई थी। उसकी पत्नी मारिया काम को चलाने में असमर्थ थी। ये पैट्रो और माइको ही काम करते थे उसके साथ। सबकुछ माइको ही था जो मारियो के पल्ले कुछ भी नहीं पड़ने देता था। उसे दुकान का किराया चुकाना भी कठिन हो गया। उसने दुकान को सेल पर लगा दिया। सतनाम ने थोड़ी-सी पगड़ी देकर खरीद ली। खरीद कर पहले तो वह बहुत पछताया। मीट के काम को उसे कोई अनुभव नहीं था। फिर पैट्रो ने उसे काम सिखलाया। सतनाम जल्द ही समझ गया कि बहुत सारे ग्राहक तो पैट्रो के कारण ही दुकान से जुड़े हुए थे, खासतौर पर ग्रीक ग्राहक। इसी तरह ग्रीक रेस्तरांओं के जो आर्डर मिले हुए थे, वे सब पैट्रो के कारण की टिके रह सकते थे इसलिए उसने पैट्रो को काम नहीं छोड़ने दिया जबकि पैट्रो की उम्र रिटायर होने की हो रही थी। पैट्रो के लिए भी ठीक था कि अपनी मर्जी से काम करके तनख्वाह लिए जा रहा था।
मीट का काम बहुत मेहनत मांगता था। सतनाम का पहला सबक तो यह था कि हर कौम के लोग अलग तरह से मीट काटते हैं और खाने के लिए जानवर का अलग-अलग हिस्सा पसंद करते हैं। किसी को जांघ का मांस पसंद है, किसी की टांग का तो किसी को सीना। मगील को उसने स्पैनिश तरीके से मीट काटने के लिए ही रखा था।
सतनाम के स्टाफ में एक जुआइश भी थी। जुआइश अफ्रीकन औरत थी जो कभी अंग्रेज के संग ब्याही हुई थी। उस अंग्रेज के दो बच्चे भी थे। होर्नज़ी रोड में से निकलती लॉयल रोड पर रहती थी। वह दुकान में सफाई करती। दिन में दो बार आती थी। एक बार दोपहर को और एक बार शाम के वक्त दुकान बन्द करने के समय। मीट की दुकान में सफाई का खास ध्यान रखना पड़ता था, नहीं तो हैल्थ वाले जुर्माना कर जाते थे।
दुकान में काम करने का माहौल बहुत सहज था। हर वक्त हँसी-मजाक चलता रहता। सतनाम का स्वभाव भी कुछ ऐसा था कि वह किसी के सिर पर खड़ा नहीं होता था। रौब डाले बिना ही अपना काम निकलवा लेता। हर शाम हिस्सा डाल कर व्हिस्की की बोतल लाई जाती। थोड़ी-बहुत बियर हर वक्त फ्रिज़ में रखे रखते। जुआइश व्हिस्की नहीं पीती थी, वह सिर्फ़ बियर ही पीती। बियर भी स्ट्रांग जैसे कि टेनंट या स्पेशल ब्रू।
पैट्रो वुडग्रीन में रहता था। दुकान के सामने से ही बस जाती थी। कई बार सतनाम छोड़ भी देता। माइको हौलोवे रोड पर पड़ने वाले फ्लैटों में रहता था। पैदल का पांच मिनट का रास्ता। मगील का होर्नज़ी रोड पर ही कुछ और आगे जाकर घर था। सतनाम की अपनी रिहायश मुज़वैल हिल थी। आठ बजे दुकान बन्द करने का समय निश्चित किया हुआ था। साढ़े सात बजे ही काम समेटना आरंभ कर देते और आठ बजे काम के साथ-साथ व्हिस्की भी समाप्त कर देते और दुकान के शटर खींच देते थे। फिर एक-दूजे को अलविदा कह कर अपनी-अपनी राह पकड़ लेते थे।
मीट का काम करने के बारे में सतनाम ने सोचा भी नहीं था। वह काफी समय से दुकान तलाश रहा था पर आफ लायसेंस, न्यूजपेपर शाप या ग्रोसरी आद की दुकान। मीट का काम उसे बुरा लगा करता था, पर यही काम करना पड़ा। इसके पीछे यह कारण था कि यह दुकान बहुत सस्ती मिल गई थी। किराया भी ठीक था, फिर मीट में मार्जिन अन्य वस्तुओं से अधिक था। पहले पहले उसे मीट की कटाई का काम बहुत कठिन लगता था। हर समय हाथ कटने का भय बना रहता। पर अब वह पूरा बूचड़ बन चुका था।
यह दुकान बहुत बड़ी नहीं थी। दुकान का एरिया कम ही था। थोड़ी-सी राह छोड़कर दुकान जितनी चौड़ाई में फ्रिज़ काउंटर बनाया हुआ था। इस फ्रिज़ में नमूने का ही मीट होता था, शो-केस में रखने की तरह। ज्यादातर मीटर तो पिछले कोल्ड रूम्स में ही रखा होता। ग्राहक आर्डर करता और वे निकालकर ले आते और उसके सामने काट देते।
मीट का ध्यान भी रखना पड़ता था। यह खराब भी जल्दी हो जाता था, खासतौर पर गर्मियों में। खराब मीट मुसीबत भी खड़ी कर देता। उस दिन भी ऐसा ही हुआ। एक अंग्रेजी स्त्री मीट लेकर गई और घंटे भर बाद ही लौट आई। वह गुस्से से भरी हुई थी। दुकान में घुसते ही बोली–
“दुकान का मालिक कौन है ?”
“मैं हूँ ।”
मगील को आगे बढ़कर कहा। वह स्त्री उससे कहने लगी–
“यह देख तेरा मीट, तू लोगों को गंदा मीट बेच रहा है।”
मगील तुरन्त सतनाम की ओर संकेत करता हुआ बोला–
“असली मालिक वो है।”
“मालिक कोई भी हो, मैं तुम्हारी शिकायत करने जा रही हूँ। तुम लोग बासी मीट बेच रहे हो, तुम्हें पब्लिक की सेहत का ज़रा-भी ख़याल नहीं। मैं तुम्हें कचेहरी में घसीटूंगी।”
(क्रमश: जारी…)


लेखक संपर्क :
67, हिल साइड रोड,
साउथहाल, मिडिलसेक्स
इंग्लैंड
दूरभाष : 020-85780393
07782-265726(मोबाइल)
ई-मेल : harjeetatwal@yahoo.co.uk



अनुरोध

“गवाक्ष” में उन सभी प्रवासी लेखकों/कवियों की समकालीन रचनाओं का स्वागत है जो अपने वतन हिंदुस्तान की मिट्टी से कोसों दूर बैठ अपने समय और समाज के यथार्थ को हिंदी अथवा पंजाबी भाषा में अपनी रचनाओं के माध्यम से रेखांकित कर रहे हैं। रचनाएं ‘कृतिदेव’ अथवा ‘शुषा’ फोन्ट में हों या फिर यूनीकोड में। रचना के साथ अपना परिचय, फोटो, पूरा पता, टेलीफोन नंबर और ई-मेल आई डी भी भेजें। रचनाएं ई-मेल से भेजने के लिए हमारा ई-मेल आई डी है- gavaaksh@gmail.com

रविवार, 18 मई 2008

गवाक्ष- मई 2008



“गवाक्ष” के माध्यम से हम हिन्दी ब्लाग-प्रेमियों को हिन्दी/पंजाबी के उन प्रवासी लेखकों/कवियों की समकालीन रचनाओं से रू-ब-रू करवाने का प्रयास कर रहे हैं जो अपने वतन हिन्दुस्तान से कोसों दूर बैठकर अपने समय और समाज के यथार्थ को अपनी रचनाओं में रेखांकित कर रहे हैं। “गवाक्ष” के पिछ्ले चार अंकों में पंजाबी कवि विशाल (इटली) की कविताओं का हिन्दी अनुवाद, दिव्या माथुर (लंदन) की कहानी, अनिल जनविजय (मास्को) की कविताएं, न्यू जर्सी, यू.एस.ए. में रह रहीं देवी नागरानी की पाँच ग़ज़लें तथा लंदन में रह रहे कथाकार-कवि तेजेन्द्र शर्मा की कविताएं और पंजाबी कथाकार-उपन्यासकार हरजीत अटवाल के उपन्यास “सवारी” के हिंदी अनुवाद की पहली तीन किस्तें आपने पढ़ीं। “गवाक्ष” के मई,2008 अंक में प्रस्तुत हैं – रचना श्रीवास्तव की कविताएं और हरजीत अटवाल के धारावाहिक पंजाबी उपन्यास “सवारी” की चौथी किस्त का हिंदी अनुवाद…

तीन कविताएं
रचना श्रीवास्तव

तेरे बिना

एक शाम
जब हम बैठे थे साथ
थाम के मेरा
झुर्रियों भरा हाथ
तुम ने कहा था -
ऐ जी हो गए कितने साल
चलते चलते यूं ही साथ
३५ साल है न
मैंने हौले से कहा
तुम मुस्कुरा दीं
फिर थोड़ा चहक के बोली-
कौन-सा दिन था सबसे प्यारा
जो बिता मेरे साथ
मैं चुप रहा
कुछ तो बोलो
तुम ने तुनक के कहा-
अरे ! मेरी पगली
तेरे इस अजब सवाल का
कोई जवाब दे कैसे
दुआओं भरी पोटली हो जब सामने
कोई एक दुआ उनमें से चुनें कैसे
प्यार अपने बच्चों को
एक सा करते हैं हम
है कौन सब से प्यारा
कोई कहे कैसे
अरे! मेरी प्यारी बुढ़िया
तेरे साथ बीता
हर लम्हा
आज भी है यादों में मेरे
यादों के झरोखों से
कोई एक याद चुने कैसे
अब तुम ही कहो
जब हर दिन हो प्यारा
किसी एक दिन को
सबसे प्यारा कहूँ कैसे
तेरी गहरी आंखों में चमक थी
चाय का प्याला
मेरे हाथों में दे के
तुम बोली -
हम दो चले थे
जीवन सफर में
और आज
फिर हम दो ही है
बीच में कितने मुकाम
आये और चले गए
बच्चे
जिनके लिया जीते रहे हम उम्र सारी
पंख निकले
वो उड़ गए
बनाये बड़े-बड़े घर उन्होंने
पर एक कोना न बना पाये
हमारे लिए
फ़ोन कर कर्तव्य निभा रहें हैं
बात ऐसे करते हैं
के अहसान जाता रहें हैं
याद है न
जब हम बड़े के साथ रहते थे
घर के एक कोने में
अनाथ से पड़े रहते थे
गाहे बगाहे ही
कोई उधर आता था
रखा है
हमें आपने घर में
इस बात का अहसास करा जाता था
जब अपनों का परायापन
सहा न गया
तो हम
यहां आ गए थे
आंसू तेरे
गालों तक आ गये थे
पूछने को उन्हें
जो हाथ बढ़ाया
ख़ुद को अकेला बैठा पाया
उस रोज
जो कुछ पल को बाहर गया मैं
लौटा तो
लुट चुकी थी दुनिया मेरी
मेरे आने का
इंतजार तो किया होता
जाते-जाते कुछ तो कहा होता
अब तो
बाहर जाने से डरता हूं
तन्हा हूं
तन्हाई से डरता हूं
उदास हुआ नहीं
जब बच्चे गए घर से
उस वक्त टूटा नहीं
जब नाता तोड़ा हम से
बिखरा नहीं तब भी
जब पोतों को
दूर रहने को कहा गया हमसे
सब कुछ सहा
पर अब तेरे जाने की बाद
बिखर गया हूं
अकेला
तेरी यादों के साथ रह गया हूं

ज़िंदगी

क्या चीज है ?कैसी है ?
और
किस हाल मे है ज़िंदगी
फूलों में बसी या
बिखरी है खुशबुओं में
या काँटों की बीच फंसी है ज़िंदगी

सांसों के तार से बुनी है
या धडकनों मे बसी है
या लाशों के बीच पलती है ज़िंदगी

सुख की सहेली है
या खुशियों से खिलती है
या गम की चादर से ढकी है ज़िंदगी

तुम को मिली है क्या ?
किसी ने देखी है क्या ?
या फ़िर मुझसे ही छुपी है ज़िंदगी

चाँद की किरण है
या शीतल पवन है
या झुलसते तन-सी है ज़िंदगी

लोगों के बीच मिलती है
या लोगों में मिलती है
या फ़िर विरानों मे भटकती है ज़िंदगी

अपनों की आस है
या प्यार की प्यास है
या टूटते रिश्तों का अहसास है ज़िंदगी

महलों के गुम्बदों में
या घर के आंगन में
या झोपड़ी के दिए मे जलती है ज़िंदगी
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खामोशी की चाह

जीवन सरिता में तैरते हुए देखा मैंने
किनारे पे खामोशी बैठी थी
उसकी भी थी एक आवाज
पर सुनने नहीं दिया उसे
मेरे अन्दर के शोर ने
मैं उसके पास जाना चाहती थी
पर -
दूर बहुत दूर ले गई
लहरें मुझे
देखा उस के पास लोगों को
मुझे लगा छू लूं उसे
हाथ बढाया पर तभी
उलझ गई
मैं लताओं के जाल में
मेरे हाथ उसे छूते-छूते रह गए
नम आँखों से जब देखा
तो लगा
मुस्कुरा रही थी वो
शायद मेरी बेबसी पे
हँस ने भी लगी थी धीरे-धीरे वो
चुभने लगी ये हँसी शूल-सी
हृ्दय विदीर्ण होने लगा मेरा
मैं तेज और तेज
हाथ पाव मरने लगी
पर तब तक
उलझ चुकी थी मैं जीवन भंवर में
निकलने की कोशिश में
और फसती गई
डूबता हुए देखा
वो
शांत-सी बैठी थी किनारे पे
चाहा आवाज दूँ उसे
पर
शब्द कहीं अटक से गए थे
और मैं
उसके स्वप्न संजोये
अनंत सागर मे विलीन हो गई।
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रचना श्रीवास्तव
रेडियो कवयित्री। २००४ से अब तक, रेडियो सलाम नमस्ते और फ़नएइसिया पर कविता पाठ, मंच संचालन मनोरंजन (फ्लोरिडा)संगीत रेडियो (हिउस्टन) पर कविता पाठ। हिन्दी नेस्ट ,रचनाकर ,लेखिनी ,साहित्य-कुंज, सृजनगाथा ,हिन्दी-पुष्प आदि में कविता प्रकाशित हो चुकी हैं
ई मेल : rach_anvi@yahoo.com




धारावाहिक पंजाबी उपन्यास(किस्त- 4)

सवारी
हरजीत अटवाल

हिंदी अनुवाद : सुभाष नीरव

।। छह ।।
शुक्रवार का दिन। गर्मियों के कारण अभी सूरज काफी बड़ा है। सात बज चुके हैं, पर जैसे अभी तीन-चार बजे का समय हो।
सोहन सिंह अभी टिल्ल (गुल्लक) पर ही खड़ा था और टोनी सैल्फों को भर रहा था। हर समय इधर-उधर हाथ मारने की उसकी आदत थी। इस तरह वह हर समय व्यस्त प्रतीत होता। उसकी इसी बात पर अजमेर खुश था। इसी कारण वह अपनी कई बातें अजमेर से मनवा लेता था।
शुक्रवार को दुकान बिजी हो जाया करती, पर आज अभी तक कोई खास बिजनेस नहीं हो रहा था। अजमेर के ऊपर से उतरने की अभी तक आवश्यकता नहीं पड़ी थी। लड़कों का एक समूह दुकान के सामने से गुजरा। सोहन सिंह ने टोनी को सतर्क हो जाने का संकेत किया। ऐसे लड़के इकट्ठा होकर दुकान में चोरी करने आ घुसते थे। इनका बहुत ध्यान रखना पड़ता था। एक आदमी को हर वक्त दरवाजे के आगे खड़ा रहना पड़ता था कि कोई लड़का कोई चीज उठाकर न भाग जाए।
सोहन सिंह को सामने से प्रेम और मुनीर आते दिखाई दिए। उसका चेहरा खिल उठा। वे कई दिनों बाद आए थे। खासतौर पर मुनीर तो दो महीने बाद आया था। वह इंडिया गया हुआ था। उनके अंदर घुसते ही सोहन सिंह कह उठा–
“आओ भई जोड़ो, इतनी देर बाद कहाँ से ? और मुनीर, तू कब आया ?”
“कल ही अंकल जी, मैं किहा, भाई जान को मिल आसां... बताओ, की हाल है हमारे सोहणे सरदार दा ?”
“ठीक है, अभी ऊपर ही है। तू सुना माठरा... किद्दां(कैसे) ?”
वह प्रेम को ‘मास्टर’ कहकर बुलाया करता था। उसका प्रेम और मुनीर के साथ हँसी-मजाक चलता रहता था। प्रेम ने कहा–
“ठीक है अंकल जी।”
“क्या कहती फेर तेरी सियासत ?”
“सियासत ने क्या कहना !... तुम यह हिस्सा-बंटवारा करने से बाज नहीं आते।”
“ओ भई माठरा... तुसी सूत भी ऐसे ही आते हो, सीधी उंगली से घी नहीं निकला करता।”
“फेर ये बसों में से निकालकर गरीबों को क्यों मारे जाते हो, किसी बड़े को हाथ डालो।”
“भई माठरा... वो भी डालेंगे। धीरे-धीरे। ये तो मस्कें करते हैं, तू देखता चल, किसी बड़े को भी हाथ डालेंगे... टाप के बंदे को...।”
कहकर सोहन सिंह हँसा। प्रेम और मुनीर भी हँसे। प्रेम जब भी आता तो पंजाब की सियासत की बातें करने लगता। सोहन सिंह सीधा-सरल होने के कारण सियासत के बारे में अधिक नहीं सोचा करता था। पर पंजाब के आतंकवाद ने उस पर असर किया हुआ था। रोज़ के पाँच-छह बंदे मर रहे थे। उसके भाई कामरेड परगट सिंह के नज़दीकी दोस्त को आतंकवादी मार गए थे। इसका उसे बहुत दुख था। वहाँ गांव में उसका एक लड़का रहता था। उसकी भी चिंता सोहन सिंह को रहती थी। उनके घर में साउथाल से छपने वाला पंजाबी का अखबार आता था, पर इस अखबार में आतंकवाद का पक्ष लेती खबरें ही हुआ करतीं जो कि और अधिक डरावनी लगतीं। पर फिर भी, इस विषय पर वह मजाक कर लेता था। उसने कहा–
“भई माठरा... इस मढीर ने पंजाब को पंजाब नहीं रहने देना। ये पुलसिये तो पहले ही ताड़ में बैठे थे, उन्हें तो जैसे बिल्ली भाणे छिक्का टूटा।”
वह फिर मुनीर से बोला–
“मुल्लो, ये सारा पंगा तुम्हारा ही डाला हुआ है।”
“अंकल जी, तुसी तां ऐवें(यूं ही) इंडिया से जुड़े बैठे जे, भ्रा तुही असाडे होसी, हाले(अभी) भी सोचो, हिम्मत मारो, साडे साथ जाओ, भ्रा–भ्रा मिल के बैठ सां।”
कहकर मुनीर ताली बजाकर हँसने लगा। तब तक अजमेर भी आ गया। उसने मुनीर से गर्मजोशी से हाथ मिलाया और प्रेम से भी, फिर टोनी की तरफ सवालिया नज़रों से देखने लगा। टोनी ने कहा–
“अभी तक तो कुछ नहीं हो रहा। चोर लड़कों का ग्रुप निकल कर गया है।”
“हम बैच्ड हाऊस में हैं, ध्यान रखना। घंटी कर देना, वो आ जाएगी।”
“आल राइट।” टोनी ने उत्तर दिया।
अजमेर आगे-आगे और मुनीर-प्रेम पीछे-पीछे पब में जा घुसे। वे ऐसी जगह पर बैठे जहाँ से दुकान साफ दिखाई देती थी। अजमेर जब भी पब में आता तो इन्हीं सीटों पर बैठने की कोशिश करता, ताकि दुकान का भी ध्यान रखा जा सके। पब में आना अजमेर को अच्छा लगता था। पब में काम करने वाले और वहाँ आने वाले रैगुलर ग्राहक जब उसे ‘हैलो’ कहते तो वह फूल जाता। कभी-कभी किसी के लिए गिलास भी भरवा देता।
बियर का घूंट भरते ही अजमेर ने पूछा–
“अब सुना मियां, तेरा इंडिया का ट्रिप कैसा रहा ?”
“पूछो न सरदार जी, बहुत बढ़िया। मोर दैन एक्सपैक्टेशन्स।”
फिर उसने जेब में से लिफाफा निकालकर अजमेर को देते हुए कहा–
“मैंने कहा, एक तो भाजी को मिल आसां, दूजा शुक्रिया अदा कर आसां।”
अजमेर ने लिफाफा पकड़ लिया। यह वह उधार था जो मुनीर जाते समय उससे लेकर गया था। अजमेर पूछने लगा–
“कब लौटा ?”
“कल ही, और आज ही तुहां दी कचेहरी में आ हाजि़र होयां।”
“कहाँ का चक्कर लगाया फिर ?”
“अबकी दो महीने पटना में लगाए। पटने के साथ ही एक गांव है–सीतापुर, वहाँ इक कबीला डेरा डाले बैठा हैसी। बस, मैं उसमें ही जा मिला था।”
“कैसा लगा ?”
“पुछो कुझ ना सरदार जी, क्या-क्या तजर्बात होए होसण लाइफ दे।”
“हमें भी बता कुछ।”
“उस कबीले का नाम होसी– चांगलो, बड़ा मारखोरा कबीला जे। उनका सरदार बता रहा था कि शेर के शिकार को भी निकलसण... जंगल के डाकू जिनसे पुलीस ऊपर भी दहशत वे, वो भी इनसे डरसण।”
“तेरा उनसे वास्ता कैसे पड़ा ?”
“बाइ चांस ही, मैं तो सोचता था कि कोई खानाबदोश से मिलसण जिनमें मैं सहज ही फिट हो सां। मैं पता करके पहुंचा। मेरे पास सस्ते से पचासेक कंबल होसण, उनको देने की खातिर कि दोस्ती गंढ़ सां। पर उनका काम कहीं मोटा ही था। लोहे दा कम्म करसण और गायों-बैलों का भी।”
“पंजाब में भी बैलगाडि़यों वाले आया करते हैं जैसे।”
प्रेम ने अपनी राय देते हुए कहा।
मुनीर कहने लगा–
“नहीं प्रेम, ये तो बहुत ही शोहदे थे। इनकी एक बात ने मुझे बहुत मुतासिर करे रखा।”
“किस बात ने ?”
“ये एक गेम खेलते हैं। नाम होगा– वांगली, जिसकी खासियत यह है कि दोनों प्लेअर एक ही तरफ खेडसण, जाणी कि प्लेअरों का आपस में कोई मुकाबला ना होसी।”
“फिर किसके साथ हुआ ?”
“वांगलू के साथ।”
“यह वांगलू क्या हुआ ?”
“वांगलू नगाड़े की तरह होसी और नगाड़े की तरह ही बजाया जाता है।”
“जैसा अपने यहाँ अखाड़े में बड़ा ढोल बजाया करते हैं, ऐसा ही कोई गेम होगा।” प्रेम बोला।
मुनीर कुछ कहने लगा था कि पब के दरवाजे से उसे परवेज़ आता दिखाई दिया। यह भी उनकी रोड पर ही रहता था। प्रेम और मुनीर विदरिंग रोड पर एक-दूसरे के आमने-सामने रहते थे। इसीलिए उनकी दोस्ती थी। परवेज़ से मुनीर की अधिक नहीं बनती थी। उसे देखकर मुनीर बियर वाला गिलास छिपाने लगा था, पर फिर हाथ घुमाते हुए गाली देकर बोला–
“मेरा क्या बिगाड़ देसी।”
परवेज़ ने उनके पास आकर सभी से हाथ मिलाया।
मुनीर के सामने पड़े प्वाइंट को देखकर होंठ फैलाए। अजमेर ने कहा, “परवेज़ साहब, बियर का गिलास लाऊँ ?”
“न सरदार जी, मैं नहीं पिऊँगा। मैं तो एक बिल्डर को खोज रहा था, घर का कुछ करवाने के वास्ते। कई बार यहीं पब में ही देखा है।” वह आसपास देखकर वापस चला गया।
अजमेर बोला, “इसे मैंने पचास बार यहाँ बैठकर पीते हुए देखा है। आया भी पीने ही था...।”
“सरदार जी, कई बंदे दोगले होसण। मुसलमान होने का झूठा दावा करसण। मैं तो कहता हूँ अगर तुम्हारे में कोई नुक्स है तो सरेआम कबूल करो।”
मुनीर परवेज़ के व्यवहार से खीझ गया था। बातें पुन: घूमकर इंडिया पर आ गईं। अन्य बहुत सारे पाकिस्तानियों की तरह मुनीर के लिए भी इंडिया खास आकर्षण रखता था। इंडिया की फिल्में, इंडिया की डेमोक्रेसी, इंडिया का टेलीविज़न आदि। इसीलिए वह छुट्टियों में इंडिया जाना पसंद करता था। पहले पाकिस्तानी पासपोर्ट पर उसे इंडिया का वीज़ा नहीं मिला करता था। फिर उसने ब्रिटिश पासपोर्ट भी ले लिया और उसका इंडिया जाना आसान हो गया। वह पाकिस्तान कम ही जाता। उसकी दो बीवियाँ थीं और दोनों ही पाकिस्तान में थीं। इधर दोनों में से किसी को नहीं बुलाया था। वहीं दोनों को खर्चा भेज देता था और यहाँ खुद अकेला रहता था। घर का अधिक हिस्सा किराये पर दे रखा था। खुद बेकार था और बेकारी भत्ता लेता था। अजमेर का उसी दिन से परिचित था जिस दिन से उसने दुकान खोली थी।
अजमेर को मुनीर उसकी बातों और हंसी-मजाक के कारण पसंद था। शाम के वक्त वह दुकान में ही आ खड़ा होता था। दुकान में अपने बंदे खड़े होने का लाभ यह होता कि चोरी का खतरा कम हो जाता था। चोर के लिए अधिक लोगों के बीच चोरी करना कठिन हो जाता। फिर रात के समय लूट-खसोट का भी भय बना रहता था। बाद में, प्रेम भी मुनीर के साथ आ मिला था। प्रेम किसी गुजरातिन लड़की से विवाह करवाकर यहाँ स्थायी हुआ था। अजमेर ने उसकी काफी मदद की थी। इसलिए भी प्रेम उसकी इज्ज़त करता। मुनीर को अजमेर से उधार की ज़रूरत रहा करती, इसलिए उसके गुण गाता रहता। अगर अजमेर अच्छे मूड में होता तो उन्हें पब में पैसे खर्च न करने देता। बाद में, दुकान में ही व्हिस्की आदि पिला दिया करता। कई बार ऐसा भी होता कि उन्हें हिस्सा डालने के लिए भी कह देता।
उनकी बातें घूमती-घुमाती फिर वांगलू पर आ गईं। अजमेर सिर मारता हुआ बोला, “मियां, तेरी बात कैसे मान लूँ कि कोई गेम प्लेअरों के बीच न होकर प्लेअरों और वांगलू के बीच होती है।”
“यह सच है, प्लेअर खेलते हैं वांगलू के फटने तक। अगर वांगलू फट जाए तो दोनों प्लेअर जीत जासण, नहीं तो दोनों की हार।”
“जीतने का उन्हें कुछ मिलता भी है ?”
“हाँ, तीर मिलसण।”
“और अगर वे प्लेअर हार जाते हैं तो तीरों का क्या करते हैं ?”
“अगले साल के लिए रखसण।”
“मियां, मुझे यह बात हज़म नहीं हो रही कि किसी गेम में मुकाबला बंदे और औज़ार के बीच है, मुकाबला तो औज़ार के साथ बंदों में हुआ करता है।”
“तुम्हारी बात सही है पर जो मैं कह रहा हूँ, वह भी सच है।”
“नहीं मियां।”
“सरदार जी, यहाँ खासियत यह भी है कि वे सारे एक ही कबीले के और आपस में सगे होसी।”
इससे पहले कि अजमेर कुछ कहता, खिड़की के रास्ते लड़के-लड़कियों का एक झुंड दुकान में घुसता उसे दिखाई दे गया और वह फुर्ती से उठकर दुकान की ओर भागा।



।। सात ।।

कोई समय था कि शौन राजनीति में बहुत सक्रिय हुआ करता था। फिनागेल पार्टी के खास कारकुन के तौर पर वह उभर रहा था। स्कूल में ही वह पार्टी के सालाना समारोह में जाकर भाषण दिया करता और ऐसे मुद्दे उठाता कि खूब तालियाँ बजतीं। चुनाव आते तो बढ़-चढ़कर प्रचार करता। पार्टी का वक्ता बनकर जलसों को सम्बोधित करता। राजनीति में दिलचस्पी उसके रक्त में थी। उसका दादा शौन मरफी ने आईलैंड की आज़ादी में बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया था। देश आज़ाद हुआ तो वह देश के निर्माण में जुट गया। जिन लोगों ने देश की आज़ादी में कोई खास भूमिका अदा नहीं की थी, वे भी बड़े-बड़े ओहदों पर अपने हक जतला रहे थे। पर शौन मरफी ने ऐसा कुछ नहीं किया था। वह ऐसा नेता था जिसे कुर्सी की कोई भूख नहीं होती। वह मुल्क में से माईग्रेशन रोकने में जुटा हुआ था। उसे दुख था कि देश के पढ़े-लिखे लोग अमेरिका और इंग्लैंड में सैटिल हो रहे थे। इस माईग्रेशन से आयरलैंड को बहुत नुकसान हो रहा था। शौन मरफी अखबारों में लेख लिखता। शहर-शहर जाकर रैलियाँ करता। इसे पार्टी के बड़े मुद्दों में शामिल करने की कोशिश में रहता।
उससे अगला शौन मरफी अर्थात इस शौन का पिता कुछ अलग तरह का नेता था। वह सीधा ही कुर्सी की तरफ दौड़ पड़ा था। पर वह काउंटी कौंसल तक ही रहा। लोगों की राय थी कि वह अगर यहाँ तक पहुँचा था, तो अपने बाप के कारण ही, नहीं तो उसकी इतनी योग्यता नहीं थी। जब शौन जूनियर उठा तो सभी कहने लगे थे कि यह अपने दादा की तरह निकलेगा और पार्टी में ऊपर तक पहुँचेगा।
पर हालात गलत निकल गए। शौन के पिता का अचानक निधन हो गया। घर की सारी जिम्मेदारी स्कूल में पढ़ते शौन के ऊपर आ पड़ी। घर में वही सबसे बड़ा था। उसकी माँ अनपढ़ औरत थी। रोटी-रोजी का प्रमुख जरिया एक फॉर्म था जिसका कई वर्षों से झगड़ा चलता आ रहा था। पिछली पीढ़ी से ही मुकदमा कचेहरियों में था।
शौन ने पिता के बगै़र घर चलाना सीखा ही था कि उनके फॉर्म के मुकदमे का फैसला हो गया। वे हार गए। इससे आमदनी तो खत्म हुई ही, साथ ही साथ, इलाके भर में बदनामी का भी सामना करना पड़ा। सभी जानते थे कि उनके खिलाफ फैसले का बड़ा कारण सियासत में उनकी पकड़ का न रहना था। उसके पिता-दादा के हिमायती विरोधी दल के साथ जा खड़े हुए थे। इसी गिले के मारे शौन ने राजनीति में भाग लेना छोड़ दिया था।
शौन ने किसी न किसी तरह पढ़ाई पूरी की और काम पर लग गया। पहले कुछ समय तक उसने किसी का ट्रैक्टर चलाया और फिर एक पब में गिलास भरने का काम करने लगा। पब में से काम छूटा तो एक फैक्टरी में नौकरी मिल गई। उसके पीछे-पीछे ही उसकी छोटी बहन आइरन जवान हो गई और उसके बराबर काम करने लगी। आइरन के बाद जल्द ही ऐलिसन ने भी काम शुरू कर दिया। उनके दिन फिरने लगे। वे फिर से पैरों पर खड़े हो गए। फॉर्म छिन जाने का दुख कुछ कम होने लगा। शौन फिर से सियासत में सरगरम होने के बारे में सोचने लगा। उसके अंदर राजनीति के प्रति फिर से दिलचस्पी जाग उठी थी।
इन्हीं दिनों में ही ऐसी एक और घटना घटित हो गई कि शौन की ज़िंदगी बदल ही बदल गई। ऐलिसन शौन की छोटी बहन गर्भवती हो गई और हुई भी बरायन स्वीनी के बेटे से जिससे वे फॉर्म वाला केस हारे थे। यह शौन और उसके समस्त परिवार के लिए बहुत ही अपमानजनक बात थी। उनका धर्म कैथोलिक था। कैथोलिक धर्म में सिर्फ़ मदर मैरी ही बिना पति के माँ बन सकती है, अन्य कोई कुआंरी लड़की नहीं।
किसी कुआंरी लड़की का इस तरह गर्भवती हो जाना बहुत बड़ा धब्बा माना जाता था। शौन गुस्से में पागल हो उठा और ऐलिसन को मारने की तैयारियाँ करने लगा। ऐलिसन डर कर लंदन भाग गई।
एक बार उसने इस घटना के बारे में थोड़ा-सा बताते हुए बलदेव से कहा था कि ऐलिसन ने यह पाप कमा लिया। अगर वह ऐसा न करती तो मैं अब तक पार्लियामेंट तक पहुँच गया होता या फिर उसके करीब होता। पर इन हालातों में मैं किस मुँह से लोगों में जाता, मेरा तो घर में से निकलना ही कठिन हो गया था, मैथ्यू की पढ़ाई छूट गई, मुझे अपना चेहरा छुपाने के लिए लंदन की शरण लेनी पड़ी। जिस माईग्रेशन के खिलाफ मेरा ग्रैंड फादर लड़ा था, वैसा ही कुछ मुझे करना पड़ा।
मैथ्यू की पढ़ाई छूटने का शौन को जहाँ दुख था, वहीं तसल्ली भी थी कि काम करेगा और घर संभालेगा। इसी सोच के अधीन ही, उसे लंदन आने के बारे में हौसला मिल रहा था। लंदन वह लोगों की नज़रों से बचने के लिए आया था। लेकिन साथ ही साथ उसके मन में था कि वह ऐलिसन को ढूँढ़ेगा और उसे प्रेरित करेगा कि वह बच्चे को गिरा दे। अगर नहीं गिराना चाहती तो बच्चे को त्याग दे। लंदन में कई संस्थाएं थीं जो अनचाहे बच्चों को ले लेती थीं, वे उन्हें आगे अडोप्शन के लिए दे देती थीं। उसे था कि यदि ऐलिसन बच्चे के बिना अकेली वापस वैलज़ी लौट जाती है और विवाह करवा कर घर बसा लेती है तो उनका पारिवारिक मान-सम्मान पुन: बहाल हो सकता है। जब उसकी माँ को शौन के लंदन जाने के बारे में पता चला तो वह कहने लगी–
“शौन, क्यों पुराने जख्म उधेड़ने चला है, अब लोग भूल-भुला गए हैं।”
“नहीं मदर, लोग ऐसी बातें भूला नहीं करते, अगर वह लौट आई तो सब ठीक हो जाएगा।”
“पर पता नहीं, वह लंदन में हो या बर्मिंघम या फिर लिवरपूल में जा घुसी हो।”
“नहीं मदर, मुझे पता चला है कि लंदन में रहती एक लड़की का पता था उसके पास।”
शौन के लिए लंदन जाना भी बहुत बड़ा कदम था। लंदन में उसके कुछ परिचित रहते थे। पर वह चुपचाप पहुँचना चाहता था। किसी को बिना बताए। उसे यह भी डर था कि लोग उसे भगौड़ा ही न कहने लग पड़ें। उसने क्रकिलवुड नाम के इलाके के बारे में सुन रखा था, जहाँ आयरश लोगों की भरमार थी। इसी इलाके में ‘द क्राउन’ नाम की पब थी जिसका जिक्र कई गानों में आता था। एक आयरश फिल्म का क्लाइमैक्स भी इसी पब में घटित होता दिखलाया गया था। दो एक सीरियल भी यहाँ फिल्माये गए थे। शौन ने सोचा कि क्यों न वह इसी पब में जा पहुँचे। वहाँ से आगे देखा जाएगा। लंदन की तैयारी करता शौन आयरलैंड का मशहूर गीत गुनगुनाता रहा था, जिसमें गायक कह रहा है कि मैंने एक जापानी वैन खरीदी, अरबी तेल वैन में भरवाया और अमेरिकी सपने देखता लंदन के क्राउन पब में आ बैठा।
शौन भी क्राउन पब में जा पहुँचा। पहले गिलास का आर्डर देते ही पब के मालिक से खाली कमरे के बारे में पूछने लगा। उसने, पब में पहले से ही बैठे एक लोकल आदमी से मिलवा दिया जिसने उसे मोरा रोड पर स्थित एक घर में कमरा किराये पर दिलवा दिया। इस कमरे में शौन ने अपना छोटा-सा अटैची और बैग ले जाकर रख दिया। यह सब कुछ घंटे में ही हो गया। शौन हैरान हो रहा था कि जिस बारे में वह इतना डर रहा था, वह इतनी आसानी से हो गया। यहाँ सभी लोग भी अपने थे, पराये देश में आने वाली झिझक भी उसे व्यर्थ लगी। उसने मकान मालिक से काम के बारे में बात की तो उसकी समस्या का हल भी सहज ही हो गया। क्राउन पब के बाहर हर सुबह लोग काम की तलाश में आकर खड़े हो जाया करते थे। ज़रूरतमंद उन्हें आकर ले जाते। भवन निर्माण के लिए मज़दूरों का बहुत अभाव चल रहा था। पहले दिन ही शौन को सीमेंट मिलाने का काम मिल गया। वह इस तुच्छ से काम से ही खुश था। उसे जल्द ही पता चल गया कि लंदन में तो नौकरियाँ ही नौकरियाँ थीं। डाकखानों में, बसों में, रेलवे में, ट्यूब(भूमिगत रेल) में, हर जगह आदमियों की आवश्यकता थी। अब उसे समझ में आने लगा था कि लोग लंदन की ओर क्यों भागते हैं। फिर भी, उसे गिला था कि पढ़े-लिखे लोग जिनके ऊपर आयरलैंड की सरकार बढ़-चढ़कर पैसे खर्च करती है, बाहर भाग जाते हैं।
अगले इतवार को वह चर्च गया। चर्च के पादरी वाटर जोय से उसका बिना किसी कठिनाई के परिचय हो गया। उससे अगले इतवार उसके कुछ और परिचित बन गए। उसे लगने लगा कि लंदन जैसे महानगर में उसका भी कोई है। ऐलिसन को वह भूल ही गया और कई महीने भूला रहा। वह अपने पैर जमाने में लगा रहा। जब ऐलिसन का ख़याल आया तो साथ ही साथ उसने यह भी हिसाब-किताब लगा लिया कि वह अब तक माँ बन चुकी होगी।
अब उसने ऐलिसन को तलाशने के बारे में सोचना प्रारंभ कर दिया। अब उसका गुस्सा खत्म हो चुका था। एक समय था कि ऐलिसन अगर उसके सामने आ खड़ी होती तो पता नहीं वह क्या कर देता। अब वह ऐलिसन के बारे में शांति से सोचता। उसने उसके बारे में फादर जोय के साथ भी बात की। फादर का कहना था कि चर्च में आकर अपने गुनाह की कन्फैशन कर ले तो उसे माफ किया जा सकता था। पहले उसे यह चिंता भी सताती रहती कि पता नहीं ऐलिसन किस हाल में होगी। पर लंदन आकर यह चिंता नहीं रही थी। सोसल सिक्युरिटी वालों ने उसे संभाल लिया होगा।
ऐलिसन को खोजना था, पर खोजे कहाँ ? उसने संभव ठिकानों पर जाकर पता किया, ऐलिसन के बारे में किसी को कुछ नहीं पता था। उसे इतनी भर सूचना मिली कि ऐलिसन ने एक बेटी को जन्म दिया था। उसने ऐलिसन को खोजने में फादर जोय की भी मदद ली ताकि किसी चर्च में आती-जाती की ही खबर मिल सके। उसे यह भी डर था कि उसे लंदन में आया देखकर ऐलिसन कहीं इधर-उधर ही न हो जाए, इसलिए वह बहुत नरम रुख इख्तियार कर रहा था। कई बार यह भी सोचता कि वह ऐलिसन को लेकर व्यर्थ की ही सिर-खपाई करता घूम रहा था।
इन्हीं दिनों में शौन को रेलवे में क्लर्क की नौकरी मिल गई। इस नौकरी पर वह बहुत खुश था। वह चर्च जाकर जीसस क्राइस्ट का शुक्रिया अदा कर आया। वह जीसस के आगे खड़े होकर मन ही मन बोला, हे जीसस क्राइस्ट, मुझे वह सब कुछ वापस चाहिए जो मेरे से खो गया है। मेरा फॉर्म या फॉर्म जैसा मुझे वापस मिले, फिर से वैसी ही इज्ज़त भी।
फॉर्म को भी शौन भूल नहीं सका था। तीन पुश्तों तक कब्ज़ा रहने के बाद फॉर्म इसलिए ही उनके हाथों से निकल गया था कि वे छोटे थे और माँ साधारण औरत थी। कई बार उसे लगता कि उसके साथ बहुत अन्याय हुआ था, पर फिर वह अपने आप को किस्मत की दलील देने लग जाता। वह लंदन आ गया था, नौकरी भी मिल गई थी, अब उसे महसूस होने लगा कि एक दिन वह अपना खोया हुआ सबकुछ वापस हासिल कर लेगा।
एक दिन ऐलिसन का भी उसे पता चल गया। एक जगह जहाँ किसी वक्त ऐलिसन आकर रहा करती थी, वहाँ वह अपना फोन नंबर छोड़ आया था, वहीं से किसी ऐशली ने फोन किया था। उसने ऐलिसन को अपने घर में बुला लिया था और शौन को भी। शौन उसके घर पहुँचा तो उसने कहा–
“देख शौन, मैं ऐलिसन को अच्छी तरह जानती हूँ। तू उस दिन आया, मैंने जानबूझकर नहीं बताया था कि वह कहाँ रहती है। मैंने उसे बहुत मुश्किल से तुझसे मिलने के लिए राजी किया है। अगर तूने उसे कुछ फालतू कहा तो तेरे लिए बहुत बुरा होगा, यह सोच लेना।”
“फिक्र न कर ऐशली, मेरा मकसद उससे गुस्सा होने का नहीं, मैं उसकी मदद करना चाहता हूँ, अगर कुछ कर सकता होऊँ तो।”
तभी दरवाजे की घंटी बजी। ऐशली ने उठकर दरवाजा खोला। शौन के कान दरवाजे की ओर ही थे। उसने ऐलिसन की आवाज़ पहचान ली। उसके मन के अंदर कुछ होने लगा। उसने स्वयं को तैयार किया और ऐलिसन से मिलने के लिए उठकर खड़ा हो गया। ऐलिसन उसके सामने आ खड़ी हुई। दोनों की आँखें भर आईं। ऐलिसन ने बांहें खोलीं, पर शौन वहीं खड़ा रहा। ऐलिसन समझ गई। उसने आँखें पोंछते हुए कहा–
“हैलो शौन।”
“हैलो।”
“क्या हाल है ?”
“ठीक हूँ।”
“घर में सब कैसे हैं ? मदर कैसी है ?”
शौन को इस सवाल पर गुस्सा आ गया। उसने उत्तर नहीं दिया।
ऐशली बोली, “तुम लोग बैठो, मैं कैटल आन करके आती हूँ।”
कुछ देर के लिए शौन और ऐलिसन के बीच चुप छाई रही। फिर ऐलिसन ने ही कहा–
“ऐशली बता रही थी कि तू मुझे मिलना चाहता है।”
“हाँ, मैं तेरी मदद करना चाहता हूँ।”
“क्या मदद करेगा मेरी ?”
“मैं चाहता हूँ कि यह बच्ची तू केअर वालों को दे दे और मेरे संग वापस चले।”
“पस जाकर मैं क्या करूँगी ?”
“पस जाकर हम तुझे सैटिल करेंगे। तेरा विवाह करेंगे।”
ऐलिसन कोई जवाब देने के बजाय व्यंग्य में मुस्कराई। शौको उसका ऐसा करना चुभा, पर वह आगे बोला–
“यहाँ क्रकिलवुड में एक बड़ा चर्च है। पादरी फादर जोय बहुत अच्छा आदमी है। मेरे साथ उसके पास चलकर अपने गुनाह की कन्फैशन कर ले, सब कुछ ठीक हो जाएगा, ज़िंदगी दुबारा शुरू कर ले।”
“शौन, किस गुनाह का कन्फैशन करूँ ? मैंने कोई गुनाह नहीं किया।”
“तूने मदर मैरी बनने की कोशिश की है।”
“तुमने बात को यूँ ही बढ़ा लिया, यहाँ लंदन में तो...।”
“ये सब काफि़र हैं, तू कैथोलिक है, हमारा परिवार सच्चा ईसाई है।”
“अगर तू यह कहे कि मैं बच्ची को छोड़ दूँ, तो यह काम मैं नहीं कर सकती। और मैंने कोई गुनाह नहीं किया।”
“यह बच्ची ?... गुनाह नहीं तो और क्या है ?”
“यह मदर की गलती थी।”
“मदर की गलती कैसे हो गई ? बच्चा तूने पेट में पाला और मदर की गलती कैसे हो गई ?”
“वह इस तरह कि मुझ अल्हड़ को काम पर भेजा। मुझे बाहर की दुनिया का कुछ पता नहीं था। मुझे मदर ने कुछ बताया ही नहीं।”
“ब्राइन स्वीनी के लड़के के साथ तू जा सोई और मदर की गलती ?”
“हर मदर का फर्ज़ होता है कि अपनी बेटी को अच्छे-बुरे की शिक्षा दे और ऐसी कठिन घड़ी से बचने का तरीका सुझाए, जो मुझ पर घटित हुई। सारी गलती मदर की है या फिर तेरी, तू बड़ा था। तुम्हीं जाकर कन्फैशन करो।”
“ऐलिसन तू हद से बाहर जा रही है। मैं तुझे और बर्दाश्त नहीं कर सकता।”
कहते हुए वह उठकर खड़ा हो गया। ऐलिसन भी। उनका शोर सुनकर ऐशली भी आ गई। ऐलिसन ने पैर धरती पर जोर से पटका और चली गई। शौन देखता रह गया। उसने हैरान होते हुए कहा–
“देख ऐशली, यह उल्टा हमें ही बुरा कह रही है।”
ऐशली ने कोई जवाब नहीं दिया और जाकर चाय ले आई। कप शौन के हाथ में पकड़ाते हुए बोली–
“शौन, तेरी जानकारी के लिए एक-दो बातें और बताती हूँ... एक तो यह कि जिस आदमी के साथ ऐलिसन रह रही है, वह सज़ा-याफ़्ता मुजरिम है। वह कैथोलिक भी नहीं। और ऐलिसन आजकल फिर गर्भवती हो गई है।”

(क्रमश: जारी…)


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अनुरोध

“गवाक्ष” में उन सभी प्रवासी लेखकों/कवियों की समकालीन रचनाओं का स्वागत है जो अपने वतन हिंदुस्तान की मिट्टी से कोसों दूर बैठ अपने समय और समाज के यथार्थ को हिंदी अथवा पंजाबी भाषा में अपनी रचनाओं के माध्यम से रेखांकित कर रहे हैं। रचनाएं ‘कृतिदेव’ अथवा ‘शुषा’ फोन्ट में हों या फिर यूनीकोड में। रचना के साथ अपना परिचय, फोटो, पूरा पता, टेलीफोन नंबर और ई-मेल आई डी भी भेजें। रचनाएं ई-मेल से भेजने के लिए हमारा ई-मेल आई डी है- gavaaksh@gmail.com


शनिवार, 12 अप्रैल 2008

गवाक्ष- अप्रैल 2008



“गवाक्ष” के माध्यम से हम हिन्दी ब्लाग-प्रेमियों को हिन्दी/पंजाबी के उन प्रवासी लेखकों/कवियों की समकालीन रचनाओं से रू-ब-रू करवाने का प्रयास कर रहे हैं जो अपने वतन हिन्दुस्तान से कोसों दूर बैठकर अपने समय और समाज के यथार्थ को अपनी रचनाओं में रेखांकित कर रहे हैं। “गवाक्ष” के पिछ्ले तीन अंकों में पंजाबी कवि विशाल (इटली) की कविताओं का हिन्दी अनुवाद, दिव्या माथुर (लंदन) की कहानी, अनिल जनविजय (मास्को) की कविताएं, देवी नागरानी (न्यू जर्सी, यू.एस.ए.) की पाँच ग़ज़लें तथा लंदन में रह रहे पंजाबी कथाकार-उपन्यासकार हरजीत अटवाल के उपन्यास “सवारी” के हिंदी अनुवाद की पहली दो किस्तें आपने पढ़ीं। “गवाक्ष” के इस अंक में प्रस्तुत हैं – तेजिंदर शर्मा की कविताएं और हरजीत अटवाल के धारावाहिक पंजाबी उपन्यास “सवारी” की तीसरी किस्त का हिंदी अनुवाद…



तीन कविताएं
तेजिंदर शर्मा, यू के

कर्मभूमि

बहुत दिन से मुझे
अपने से यह शिकायत है
वो बिछडा गांव, मेरे
सपनों में नहीं आत।
वो भोर का सूरज,
वो बैलों की घंटियां
वो लहलहाती सरसों भी
मेरे सपनों की चादर को
छेद नहीं पाते।
और मैं
सोचने को विवश हो जाता हूं
कि इस महानगर की रेलपेल ने
मेरे गांव की याद को
कैसे ढक लिया !

विरार से चर्चगेट तक की लोकल के
मिले-जुले पसीने की बदबू
मेरे गांव की मिट्टी की
सोंधी खुशबू पर
क्योंकर हावी हो गई !
बुधुआ, हरिया और सदानंद
के चेहरों पर
सुधांशु, अरूण और राहुल
के चेहरे
कैसे चिपक गये !
मोटरों और गाडियों का प्रदूषण
गाय भैंसों के गोबर पर
कैसे भारी पड़ ग़या !

गांव के नाम पर, मुझे
नीच साहुकार, गंदी गलियां
और नालियां ही, क्यों याद आती हैं ?
छोटे-छोटे लिलिपुट
बड़ी बड़ी डींगें हांकते
मेरे सपनों के कवच में
छेद कर जाते हैं!
भ्रष्ट राजनीति के
गंदे खेल ही
मेरे दिमाग़ को क्यों
मथते रहते हैं !

इस महानगर ने अपनी झोली में
मेरे लिये
न जाने क्या छुपा रखा है
कि यही
मेरी कर्मभूमि बन गया है।

गिलहरी


रहती है मेरे घर के पीछे
बाग़ के एक दरख़्त पर
उछलती, कूदती, फरफराती
एक डाल से दूसरी पर
बंदरिया-सी छलांग लगाती।
ये मेरे बाग़ की गिलहरी है।

इस देश के गोरे नागरिकों की
करती है नकल, अपनी
फ़रदार पूंछ को हिलाती है
अलग-अलग दिशा में नचाती है
चेहरे पर रोब लाए
करती है प्रदर्शन, अपनी
अमीरी का, अपनी सुन्दरता का
हां, ये मेरे बाग़ की गिलहरी है।

अपने आगे के पैरों को देती है
हाथों-सी शक्ल और वैसा ही काम
कुतरती है सेब, मेरे ही बाग़ के
ऐंठती हुई करती है अठखेलियां
पेड़ों से टकराती ब्यार से
उफ़! ये मेरे बाग़ की गिलहरी।

जब जी चाहे पहुंच जाती है
मेरे ज़ीने पर, मेरे स्टोर में
कुतर डालती है, दिखाई देता है जो भी
मैं, बस सुनता हूं आवाज़ें
घबराता हूं, मांगता हूं दुआ
पुस्तकों की ख़ैरियत की।
मुझे भक्त बना देती है
ये जो है मेरे बाग़ की गिलहरी।

एक दिन सपने में मेरे आ खड़ी होती है
चेहरे पर दंभ, रूप से सराबोर
गदराया बदन, दबी मुस्कुराहट
आज आने वाली है उससे मिलने
उसकी दूर की एक रिश्तेदार!
उस शहर से जहां बीता था मेरा बचपन
हां, वो भी तो एक गिलहरी ही है।

ग़रीबी के बोझ से दबी
सिमटी, सकुचाई, शरमाई
अपने सलोने रंग से सन्तुष्ट
संग लाई है अपने अमरूद
बस वही ला सकती थी
महक मेरे शहर की मिट्टी की
पाता हूं वही महक कभी अमरूद में
तो कभी उसमे जो मेरे शहर की गिलहरी है।

मेरे बाग़ की गिलहरी को नहीं भाती
गंवई महक अमरूद की, या फिर
मेरे शहर की मिट्टी की वो गंध
जो मेरे शहर की गिलहरी ले आई है
अपने साथ, अपने शरीर अपनी सांसों में।
वह रखती है अपनी मेहमान के सामने
केक, चीज़ और ड्राई फ़्रूट
कितनी भी खा ले, पूरी है छूट
कितने बड़े दिल की मालकिन है
वो जो मेरे बाग़ की गिलहरी है।


मेरे शहर की गिलहरी सीधी है सादी-सी
निकट है प्रकृति के, सरल और मासूम
बस खाती है पेड़ों के फल, कैसे पचाए
केक, चीज़ और ड्राई-फ़्रूट
देखती है, मुस्कुराती है, पूछती है हाल
अपनी मेज़बान के, उसके परिवार के।
परिवार यहां नहीं होता, सब रहते हैं
अलग-अलग, यह मस्त देश है
ऊंचे कुल की दिखती है वो
जो मेरे बाग़ की गिलहरी है।

“सुनो, तुम यह सब नहीं खाती हो
इसी लिये सेहत नहीं बना पाती हो
मुझे देखो, कितना ख़ूबसूरत देश है मेरा
कैसा है मेरा स्वरूप, रंग रूप।.. देखो
मेरे बाग़ में कितने सुन्दर पेड़ हैं
रंग-बिरंगी पत्तियों वाले पौधे!
यहां का हरा रंग कितना गहरा है!
यहीं आ बसो, यहां है कितना सुख
कितनी शान, मौज है मस्ती है।”
आत्ममुग्ध हो जाती है, जो
मेरे बाग़ की गिलहरी है।

चुप नहीं हो पाती है, जारी है
बोलना उसका और इठलाना।
मेरे देश में इन्सान से अधिक
होती है परवाह हमारी
यही है वो देश जहां कभी
अस्त नहीं होता था सूर्य
जब कभी उदय होता है पूर्व में
तब भी चमकता है मेरा यह
पश्चिम का देश
और चमकने लगता है चेहरा,
मेरे बाग़ की गिलहरी का।

शांत किन्तु दृढ़ आवाज़ में
देती है जवाब, गिलहरी मेरे शहर की।
माना कि तुम हो बहुत सुन्दर और सुगठित
धन और धान्य से भरपूर है शहर तुम्हारा


तुम्हारे देश में हैं सुख, सुविधाएं और आराम
देखो मेरी ओर, देखो मेरे इस साधारण बदन को,
यह तीन उंगलियां जिसकी हैं
उसका नाम है राम! इस तरह देती है सुख
मुझे असीम, वो जो मेरे शहर की गिलहरी है।


टेम्स का पानी

टेम्स का पानी, नहीं है स्वर्ग का द्वार
यहां लगा है, एक विचित्र माया बाज़ार!

पानी है मटियाया, गोरे हैं लोगों के तन
माया के मकड़जाल में, नहीं दिखाई देता मन!

टेम्स कहां से आती है, कहां चली जाती है
ऐसे प्रश्न हमारे मन में नहीं जगा पाती है !

टेम्स बस है ! टेम्स अपनी जगह बरकरार है !
कहने को उसके आसपास कला और संस्कृति का संसार है !

टेम्स कभी खाड़ी है तो कभी सागर है
उसके प्रति लोगों के मन में, न श्रध्दा है न आदर है!

बाज़ार संस्कृति में नदियां, नदियां ही रह जाती हैं
बनती हैं व्यापार का माध्यम, मां नहीं बन पाती हैं !

टेम्स दशकों, शताब्दियों तक करती है गंगा पर राज
फिर सिकुड़ जाती है, ढूंढती रह जाती है अपना ताज!

टेम्स दौलत है, प्रेम है गंगा; टेम्स ऐश्वर्य है भावना है गंगा
टेम्स जीवन का प्रमाद है, मोक्ष की कामना है गंगा

जी लगाने के कई साधन हैं टेम्स नदी के आसपास
गंगा मैय्या में जी लगाता है, हमारा अपना विश्वास!
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तेजेन्द्र शर्मा
जन्म : 21 अक्टूबर 1952 को पंजाब के शहर जगरांव
शिक्षा : दिल्ली विश्विद्यालय से बी.ए. (ऑनर्स) अंग्रेज़ी, एवं एम.ए. अंग्रेज़ी, कम्पयूटर कार्य में डिप्लोमा ।
प्रकाशित कृतियाँ : काला सागर (1990) ढिबरी टाईट (1994), देह की कीमत (1999) यह क्या हो गया ! (2003), बेघर आंखें (2007) -सभी कहानी संग्रह। ये घर तुम्हारा है... (2007 - कविता एवं ग़ज़ल संग्रह) ढिबरी टाइट नाम से पंजाबी, इँटों का जंगल नाम से उर्दू तथा पासपोर्ट का रंगहरू नाम से नेपाली में भी उनकी अनूदित कहानियों के संग्रह प्रकाशित हुए हैं। अंग्रेज़ी में : 1. Black & White (biography of a banker – 2007), 2. Lord Byron - Don Juan (1976), 3. John Keats - The Two Hyperions (1977)
कथा (यू.के.) के माध्यम से लंदन में निरंतर कथा गोष्ठियों, कार्यशालाओं एवं साहित्यिक कार्यक्रमों का आयोजन । लंदन में कहानी मंचन की शुरू‏आत वापसी से की। लंदन एवं बेज़िंगस्टोक में, अहिंदीभाषी कलाकारों को लेकर एक हिंदी नाटक हनीमून का सफल निर्देशन एवं मंचन ।

संपर्क:
74-A, Palmerston Road
Harrow & Wealdstone
Middlesex UK
Telephone: 020-8930-7778 / 020-8861-0923.


E-mail: kahanikar@gmail.com , mailto:kathauk@hotmail.com
Website: http://www.kathauk.connect.to/



धारावाहिक पंजाबी उपन्यास(किस्त- 3)

सवारी
हरजीत अटवाल
हिंदी अनुवाद : सुभाष नीरव


।। चार ।।

वैलजी वे प्रात: चार बजे पहुँचे। मुख्य सड़क से हटकर जो रोड थी, उस पर कुछ मील जाकर शौन का घर था। सड़क पर इस तरह के इकहरी मंजिल वाले अन्य भी इक्का-दुक्का घर थे। सड़क से घर के लिए दो रास्ते थे। एक अंदर जाने के लिए और दूसरा बाहर आने के लिए। घर के बाहर खड़ी कार की ओर इशारा करते हुए शौन बोला–
“यह मैथ्यू की है, बहुत रफ चलाता है, देख तो ज़रा इसकी हालत।”
वे दोनों कार में से निकले। ताजी हवा के बुल्ले इनके जिस्मों को स्पर्श करने लगे। काफी ठंड थी। वे कमीजों में ही थे। भारी कपड़े कार के बूट में ही पड़े थे। शौन ने दरवाजे की घंटी बजाई। कोई नहीं आया। फिर बजाई, दरवाजा भी खटखटाया। कोई उत्तर न मिला। फिर उसने मैथ्यू को आवाज़ देकर पुकारा और अंत में गालियाँ बकने लगा। जब दरवाजा न खुला तो वह बलदेव से कहने लगा–
“आ जा, रसोई की तरफ से चलते हैं।”
वे घर के पिछवाड़े चले गए। शौन ने खिड़की का शीशा उतारा और अंदर जा घुसा। अंदर जाकर उसने बलदेव के लिए दरवाजा खोल दिया। रसोई में बर्तन जस के तस बिखरे पड़े थे। शौन हँसते हुए बोला–
“देख, लगता है न पंजाबी का घर।”
फिर उसने अल्मारी में से आयरश व्हिस्की बु्शमिल की बोतल उठा ली। दो पैग बनाए। एक गिलास बलदेव को देते हुए बोला–
“वैलकम टू आयरलैंड !... मेरे मुल्क की व्हिस्की ट्राई कर।” बलदेव ने कई बार आयरश व्हिस्कियाँ पीकर देख रखी थीं। इन व्हिस्कियों के स्वाद में धुआंखेपन की बू होती थी। वह सोचने लगा कि ये लोग किस तरीके से शराब बनाते होंगे कि वह स्मोकी हो जाती है। एक बार शौन से बहस भी कर चुका था कि व्हिस्की के धुआंखे होने का सवाल ही पैदा नहीं हो सकता। वह इस बारे में सोच ही रहा था कि मैथ्यू आ गया। वह सीधा बैड पर से ही आँखें मलता हुआ आ रहा था। बलदेव ने शक्ल से ही पहचान लिया। वह उनसे हाथ मिलाता हुआ बोला–
“हम तो सारी रात इंतजार करते रहे...।”
शौन ने उसके लिए भी पैग बनाया और गुस्से होकर कहने लगा–
“दरवाजा क्यों नहीं खोला ?”
“तुम्हारी प्रतीक्षा करते-करते हम बहुत देर से सोये थे।”
मैथ्यू की अंग्रेजी इतनी गूढ़ आयरश उच्चारण में थी कि बलदेव को समझने में कठिनाई महसूस हो रही थी। वे रसोई में से बैठक में आ गए। अब तक शौन की माँ भी उठ आई। बलदेव ने उसका हाथ पकड़कर ‘हैलो’ कहा। वह पश्चिमी बुजुर्गों से मिलने का तरीका नहीं जानता था। भारतीय बुढ़िया होती तो पैरों को हाथ लगाता। फिर मैथ्यू की पत्नी कुमैला और बच्चे भी आ गए। शौन ने बच्चों का तआरुफ़ करवाते हुए कहा–
“यह है बड़ा शौन और यह है कुमैला... शौन का नाम मेरे वाला है, मेरे बाप का भी यही था, यह हमारा खानदानी नाम है। कुमैला का नाम इसकी माँ वाला है।”
बलदेव को क्रिश्चियनों के नामकरण का पता था कि एक ही नाम पीढ़ी-दर-पीढ़ी चला आता है। उसने बच्चों को उठाने को कोशिश की, लेकिन वे भाग गए। बलदेव से शरमा रहे थे। कुमैला भी रसोई के काम में जा लगी। शौन ने बलदेव से कहा–
“डेव, हम घंटा भर सो लें, नहीं तो हम तंग होंगे। अपना शैड्यूल बहुत बिजी है।”
शौन उसे एक कमरे में ले आया, जहाँ उसका बैग रखा हुआ था। उनके बैठते मैथ्यू कार में से सामान निकाल लाया था। दो हफ्तों के कपड़े आदि थे। शौन बलदेव को बिस्तर पर लिटाकर स्वयं दूसरे कमरे में जा पड़ा। अब सोने का वक्त नहीं रहा था। परदों में से भी रोशनी अंदर आ रही थी।
मैथ्यू को बेचैनी हो रही थी। शौन और बलदेव का इस तरह सो जाना उसे अच्छा नहीं लग रहा था। उसने उनका रात में इतना इंतजार किया था कि पब तक नहीं जा सका था यह सोचकर कि कहीं वे आ ही न जाएं। उसे इस बात की चिंता नहीं थी कि वे दो रात से सो नहीं पाए थे। अभी घंटा भर भी नहीं हुआ था कि वह बलदेव के कमरे में चला गया। उसे करवटें बदलता पाकर बोला–
“डेव, चल उठ, बेकरी चलती हैं।”
बलदेव उठ खड़ा हुआ। नींद तो उसको न के बराबर ही आई थी। उसे जबरदस्त थकान थी। उसकी हालत देखकर मैथ्यू बोला–
“चिंता न कर, गीनस ठीक कर देगी।”
बलदेव हँसता हुआ बाथरूम में जा घुसा। तैयार हुआ तो कुमैला घर की बनी ब्रेड के टोस्ट सामने रख गई। उसे यह ब्रेड बहुत स्वादिष्ट लगती थी। सिमरन भी घर में ही ब्रेड बेक कर लिया करती थी। मैथ्यू इतना उतावला था कि बलदेव को नाश्ता भी नहीं करने दे रहा था। बलदेव के आने पर वह बेहद उमंगित था।
उसने अपनी कार के बजाय शौन वाली कार ले ली और बोला–
“हम शौन के सोते-सोते ही लौट आएंगे। मुझे तो वह अपनी कार को हाथ ही नहीं लगाने देता।”
कहकर उसने कार को पीछे की ओर ही भगा लिया और बाहर सड़क पर ले आया। कार को सीधा करते हुए बताने लगा–
“दायीं ओर कौर्क और वाटरफोर्ड है, जहाँ से तुम रात में आए थे। यहाँ से हमारा गांव वैलजी एक मील पर है, मिंटले आधा मील... यह बायीं ओर वाला फार्म पहले हमारा हुआ करता था... वो सामने चर्च था, गिर पड़ा था। अब दुबारा बनाएंगे...यह फार्म हमारे परिवार के आदमी का ही है, यह भी मरफी है। हमारा बाबा और इनके बाबा का बाप दोनों भाई थे। इन्होंने फॉर्म बीसेक साल पहले ही लिया है। इनका एक लड़का गठिये का मरीज है, कच्चा दूध जो पी लिया था... वो सामने चीज़ फैक्टरी है। मैंने भी यहाँ काम किया था। इसकी मालकिन पागल हो गई। सामने ज़ोज़ी के पब को रोड जाती है...।”
जब तक वे एक दुकान के आगे न रुके, वह बोलता ही गया। उसके उच्चारण के कारण बलदेव को कई बार दुबारा पूछना पड़ता कि वह क्या कह रहा है। वह बलदेव को बांह से पकड़कर दुकान के अंदर ले चला। सबको प्रसन्न होकर बताने लगा–
“यह डेव है, मेरे भाई शौन का दोस्त। लंदन में रहता है। आज ही आया है, दो सप्ताह ठहरेगा।”
दुकान में दो ग्राहक थे और दो काम करने वाले। सभी बलदेव को उत्साह से मिल रहे थे। पराये रंग का आदमी उन्हें अधिक देखने को नहीं मिलता था। दुकान में ग्राहक आ-जा रहे थे। हर कोई उससे विशेष तौर पर मिलता। मैथ्यू साथ के साथ कमेंटरी देता जा रहा था। बिलकुल ग्रामीण माहौल था। पंजाब के लोगों के साफ स्वभाव जैसे लोग सीधी-सरल बातें कर रहे थे। किसी ने पूछा–
“तू डाक्टर है ?”
“नहीं तो।”
“तेरे रंग के लोग डाक्टर ही तो होते हैं। हमारा एक डाक्टर था, हम उससे मजाक किया करते थे कि तूने हाथ नहीं धोये, जा हाथ धोकर आ।”
वहाँ खड़े सभी लोग हँस पड़े। टाईवाले एक आदमी ने सोचा कि कहीं मेहमान गुस्सा ही न हो जाए, कहने लगा–
“यहाँ एशियन और काले लोग बहुत कम हैं... यहाँ ज्यादातर लोग तो ऐसे होंगे, जिन्होंने काले लोग देखे ही नहीं होंगे। ऐसे लोग भी हैं जिन्हें यह भी नहीं पता कि धरती पर रंगदार लोग भी होते हैं। कभी कहीं गए ही नहीं, अशिक्षा भी बहुत है।”
बलदेव उसकी बात का असली भाव समझ गया था। उसने मुस्कराते हुए कहा–
“अशिक्षा और अज्ञानता तो हर मुल्क के गांव में होती है, इंग्लैंड के गांवों में बहुत से लोग ऐसे हैं जिन्होंने अभी तक लंदन नहीं देखा और बहुत से तो लंदन देखे बगैर ही मर जाते हैं।”
मैथ्यू ने साबुत ब्रेड्स खरीदीं। बलदेव ने देखा कि दुकान में कटी हुई कोई ब्रेड नहीं थी। वह सोच रहा था कि यहाँ साबुत ब्रेड का ही रिवाज होगा। कहने को तो यह बेकरी थी, पर साधारण दुकान की तरह सब कुछ मिलता था। मैथ्यू ने एक टेप भी खरीदी। कार में बैठते ही टेप लगाकर कहने लगा–
“यह हँसी-मजाक से भरी टेप है, ज़रा सुन, तुझे पसंद आएगी।”
बलदेव ने ध्यान लगाकर सुनने की कोशिश की। बहुत कुछ उसके पल्ले नहीं पड़ रहा था। वह मैथ्यू की ओर देखकर ही हँसने लग पड़ता। उसे हँसता देखकर मैथ्यू को अजीब-सी खुशी हो रही थी। उसकी आँखें तसल्ली से भर जातीं।
उनके लौटकर आने तक शौन भी सो कर उठ चुका था। कुछ देर बाद वे तीनों एकसाथ निकल पड़े। मैथ्यू कार चला रहा था। शौन उसके बराबर बैठा था और बलदेव पीछे। पहले उन्होंने उसे अपना गांव दिखाया और फिर आसपास का इलाका। इंग्लैंड के गांवों की तरह ही गांव थे। उन्होंने अपनी पारिवारिक कब्रें भी दिखलाईं, जहाँ उनके बुजु़र्ग दबे हुए थे और उनकी जगहें सुरक्षित थीं।
एक बात जो उसने नोट की, वह यह कि यहाँ पबों की बहुत भरमार थी। वे दो पबों में बियर पी कर बारह बजे वाली सर्विस तक चर्च में आ पहुँचे। शौन कैथलिक क्रिश्चियन था और बहुत ही कट्टर। हर इतवार चर्च जाया करता था। बलदेव भूल ही गया था कि आज इतवार है। उसने एक पल के लिए सोचा कि आज तो गुरां भी फुर्सत में होगी।
चर्च के बाहर ‘आज का वाक्य’ लिखा हुआ था। शौन बता रहा था कि यह उनके परिवार का चर्च था। किसी बड़े बुज़ुर्ग ने बनवाया था। उनके पीछे ही बलदेव चर्च में घुसा। वह पहले भी शौन के साथ चर्च चले जाया करता था। वह इसमें विश्वास नहीं करता था पर साथ देने के लिए चला जाता। ऐसे ही, शौन भी उसके साथ गुरुद्वारे जा आता था। चर्च में स्कूलों के डैस्कों की भांति डैस्क लगे हुए थे, जिन पर आज की अरदास के कुछ पन्ने और अन्य किताबचे-से पड़े हुए थे। अरदास के कई पड़ाव थे।
बलदेव को अधिक जानकारी नहीं थी। वह बाकी लोगों को देखकर उन जैसा ही करता रहा।
चर्च में शौन के बहुत से परिचित मिल गए। वह किसी के पास रुकता नहीं था। हाथ मिलाकर वह आगे बढ़ जाता। उनमें से कुछ लोग बलदेव को भी आकर मिलते। मैथ्यू पब को जाने के लिए उतावला था। वह कह रहा था–
“ज़ोज़ी के यहाँ चलते हैं, वह सड़क पार करके उसका पब है।”
बलदेव सोच रहा था कि ज़ोज़ी का पब कोई खास जगह होगी जिसका जिक्र सुबह से मैथ्यू कई बार कर चुका था। यह नाम पहले शौन से भी सुन रखा था। जब लौटकर वे कार में बैठे तो उसने पूछा–
“यह ज़ोज़ी का पब तो तुम्हारा खास पब लगता है।”
“हाँ, तू भी देखेगा तो हैरान रह जाएगा। यह पब गवर्मेन्ट के किसी कानून के मुताबिक सहीं नहीं उतरता। न यहाँ टॉयलेट है, लोग बाहर ही खड़े हो जाते हैं, स्त्रियाँ ज़ोज़ी के फ्लैट में चली जाती हैं। न कोई हीटिंग है, न धुआं निकालने के लिए पंखा। पर फिर भी बेहद बिजी रहता है।”
शौन के बाद मैथ्यू ने कहा। वह आगे बताने लगा–
“बियर भी इसकी सस्ती होती है। बियर सस्ती होने का कारण तो वैसे यह है कि थरूरियों में जाकर यह बैठी हुई बियर ले आती है और ज्यादा गैस देकर बेची जाती है। रिजेक्टिड बियर तो मुफ्त के भाव ही मिल जाती है।”
“कोई माइंड नहीं करता।”
“माइंड ?... बल्कि खुश होकर पीते हैं। रात में तू भीड़ देखना एक बार।”
सड़क के किनारे एक पहाड़ी के ऊपर था यह पब। पब कैसा, छोटा-सा घर था। खाली क्रेटों या ड्रमों से पब कहा जा सकता था। बीसेक कारें खड़ी करने की जगह थी जहाँ चार खराब कारें पहले ही खड़ी थीं। अधिकतर कारें मेन रोड पर ही पार्क थीं। कारों की संख्या देखकर लगता था कि अंदर काफी लोग थे। एक गीली-सी दीवार की ओर इशारा करते हुए मैथ्यू बोला–
“यह है पब का टॉयलेट। बारिश हो या बर्फ़, लोग यहाँ आ खड़े होते हैं।” बताते हुए मैथ्यू हँसने लगा।
वे पब के अंदर गए। एक ही कमरा था। अंदर भीड़ थी। धुएं से सारा वातावरण भरा पड़ा था। वे लोगों की भीड़ में से जगह बनाते हुए काउंटर तक पहुँच गए। गिलास भरती लड़की से मैथ्यू ने कहा–
“ज़ोज़ी कहाँ है ?”
“ऊपर है।”
“जा, उसे कह कि गारडा आया है।”
कहकर उसने बलदेव की तरफ इशारा किया। गारडा से उसका मतलब था– सिपाही। उस लड़की ने ज़ोज़ी को आवाज़ लगाई। कुछ देर बाद मोटी-सी, टेढ़े घुटनों वाली औरत आ प्रगट हुई। मैथ्यू ने उससे कहा–
“ज़ोज़ी, तेरी कारगुजारी चैक करने के लिए गारडा आया है।”
“मैथ्यू, अगर तूने इसके आने के बारे में पहले मुझे न बताया होता तो मैं तेरी बात पर ध्यान भी देती।”
शौन ने उसे इशारा किया और एक तरफ बुला लिया। उसने ड्यूटी-फ्री वाली लाई हुई बोतलें बेचनी थीं। इसी तरह, पबों वाले इंग्लैंड से आने वालों की प्रतीक्षा करते रहते थे।
बलदेव को कमरे का धुआं चढ़ने लगा। उसने अपना चश्मा उतार कर साफ किया। मैथ्यू ने उससे पूछा–
“ऐलिसन का क्या हाल है?”
बलदेव को ठीक से समझ में नहीं आया। हालांकि संगीत नहीं चल रहा था, पर फिर भी काफी शोर था। बलदेव ने ‘सॉरी’ कहकर सवाल दोहराने के लिए कहा। वह सोचने लगा कि कौन है यह ऐलिसन ? वह तो किसी ऐलिसन को नहीं जानता था।
फिर उसे स्मरण हो आया कि शौन की बहन का नाम भी ऐलिसन था, जिससे शौन की कम ही बनती थी। शौन उससे नाराज था कि उसने कुंवारेपन में बच्चे पैदा कर लिए थे जो कि कैथोलिक धर्म के बहुत खिलाफ है। इसीलिए सभी ने ऐलिसन से सम्बन्ध तोड़ रखे थे।
सिगरेटों के धुएं से बलदेव को खांसी होने लगी तो वह बाहर निकल आया। अपना गिलास थामे मैथ्यू भी पीछे-पीछे ही आ गया। उसने बलदेव से फिर पूछा–
“ऐलिसन का क्या हाल है?”
“बहुत अच्छा। वह बिलकुल ठीक है।”
बलदेव ने शीघ्रता में कहा। मैथ्यू बोला–
“डेव, वह बहुत अच्छी लड़की है। तूने जो उससे विवाह करने का फैसला किया है, वह बहुत सही है।”



।। पाँच ।।

जुलाई का महीना है। गरमी बहुत पड़ रही है। इतनी भी नहीं कि रिकार्ड टूट जाए। सैंतीस डिग्री का रिकार्ड है लंदन की गरमी का। जुआरियों की कंपनी की ओर से इस साल की गरमी के रिकार्ड टूटने को लेकर शर्त लगाने के बारे में लोगों को उकसाया जा रहा है। तीन हफ्तों से पड़ रही गरमी से अब लोग ऊबने भी लग पड़े हैं। बारिश की दुआ कर रहे हैं। दुकानों और पबों वाले खुश है। आइसक्रीम, सोफ्टड्रिंक्स, बियर आदि की बिक्री अच्छी हो रही है। यद्यपि, टेक-अवे गर्म खाने इतने नहीं बिक रहे। गरमी का मौसम प्रदूषण को भी बढ़ाता है। यही कारण है कि ट्रैफिक के समय हाईबरी कॉर्नर के राउंड-अबाउट के इर्द-गिर्द माहौल दमघोंटू हो जाता है। इसी बात का ध्यान रखते हुए काउंसल ने कुछ नए दरख़्त लगाए हैं। पेड़ तो लगाए हैं पर राउंड-अबाउट के इर्द-गिर्द की प्रेड के लोगों को ये पसंद नहीं हैं, खासतौर पर दुकानदारों को। वे कई बार इन पेड़ों को उखाड़ फेंकने की बात भी करते हैं क्योंकि इससे दुकानें पूरी दिखाई नहीं देतीं। लेकिन पेड़ उखाड़ना ज़ुर्म है। जु़र्म करने के लिए कोई आसानी से तैयार नहीं है, इसलिए पेड़ फलने-फूलने लगे हैं।
हाईबरी के इस बड़े-से राउंड-अबाउट के चारों ओर दुकानें और दफ्तर हैं। हौलो-वे रोड से इसमें दाख़िल हों तो चैरिटी वालों का बड़ा दफ्तर है। साथ ही, पीज़ा और साथ ही, सिंह-वाइन्स। उसके साथ एक ‘फिश एंड चिप्स’ और फिर सरकंडों की छत से बना पब जिसका नाम ‘बैच्ड हाउस’ है। जिसकी मालकिन शीला मिंटगुमरी है। वह अपने ब्वाय-फ्रेंड पॉल राइडर के साथ मिलकर इसको चलाती है। फिर सेंट पौल्ज़ रोड है। इसे पार करके दुकानें हैं जैसे कि कारों के स्पेअर पार्ट्स की, इस्टेट एजेंट है, इंश्योंरेंस का दफ्तर आदि। फिर सिटी रोड पर आगे काउंसल के दफ्तर हैं। इसी तरह आगे अपर स्ट्रीट पार करके ‘मैकडॉनल्ड’ ‘कंटकी’ आदि। बहुत व्यस्त जगह है। बिजनेस के नज़रिये से बढि़या मानी जाने वाली। बड़ी सड़कों का जंक्सन भी है। हौलो-वे रोड जिसे ‘ऐ-वन’ भी कहते हैं, सीधी सिटी में जाती है। दूसरी ओर से सेंट पौल्ज़ रोड ईस्ट लंदन से आकर सीधी वेस्ट एंड पहुँचती है। इस पर यदि सीधे चलते जाओ तो दरिया थेम्ज़ आ जाता है।
करीब दस बजे ‘सिंह वाइन्स’ का शटर अंदर से खुला। सत्तर वर्षीय भारी देहवाला एक बुजु़र्ग बाहर आ खड़ा हुआ। वह सेंट पौल्ज रोड की ओर देखने लगा। सड़क के फुटपाथ पर कई आदमी चले आ रहे थे, पर टोनी दिखाई नहीं दे रहा था। उसने ऐनक ठीक की और आँखों पर हाथ की छ्त्तरी बनाकर फिर से देखने लगा। टोनी अभी भी नहीं दिखाई दिया। उस बुजु़र्ग ने घड़ी की तरफ देखा। दस बजने में पाँच मिनट शेष थे। वह मन ही मन बुदबुदाया, “यह लेजी पूरे टाइम पर ही आएगा। यह नहीं कि तू दो मिनट पहले ही आ जा। शटर उठा लेते हैं, लड़का भी माल लेकर आने वाला है,नहीं...यह तो पूरे टाइम पे ही पहुँचेगा।”
उसके शटर उठाते ही पब का गवना पॉल राइडर भी पब खोलने लग पड़ा। उसने हवा से घूमने वाला साइनबोर्ड खींचकर फुटपाथ पर रख दिया, जिस पर कैपिटल अक्षरों में लिखा था– ‘हॉट फूड सर्व्ड हियर।’ पॉल ने सोहन सिंह को देखकर दूर से ही हैलो की और ऊँचे स्वर में पूछा–
“हाऊ आर यू डैड ?”
“मी ओ.के. पाल, यू ओ.के. ?”
“यैस... नाइस डे अगेन।”
“वैरी ब्यूटीफुल!... मी ड्रिंक टुडे, जू बाई ?”
“आफ कोर्स ! कम आन हियर लेटर आन, आय बाई बियर फार यू।”
“मी जोकिंग पाल, मी ड्रिंक बरांडी, बियर वाटर, मीन नो वाटर।”
पॉल हँसता हुआ अंदर जा घुसा। सोहन सिंह ने वाहेगुरु कहते हुए दुकान खोल ली और साथ ही सिगरेट खरीदने के लिए एक ग्राहक ने अंदर प्रवेश किया। ग्राहक को सर्व करते हुए ही टोनी आ गया। सोहन सिंह ने उसे घड़ी दिखलाते हुए कहा–
“फैव मिनट लेट जू लेजी।”
“सॉरी डैड, बस गॉट लेट।”
“नो बस लेट, टू मच वोमैन लेट।”
“यैस डैड, मी यंग मैन, वोमैन वैरी गुड फार मी, यू ओल्ड मैन, नो गुड फार वोमैन।”
“मी ओल्ड...ओल्ड गोल्ड।”
कहते हुए सोहन सिंह हँसने लगा और टोनी भी। टोनी पैंतालीस साल का अफ्रीकन नस्ल का आदमी था जो कि कई सालों से दुकान में काम करता चला आ रहा था। वह अपने दुबले-पतले शरीर के कारण अभी जवान दिखाई देता था। बालों मे मणके-से डालकर रखता। वह दुकान से बाहर निकलते हुए बोला–
“नो साइन आफ ऐंडी !... मे बी ट्रैफिक।”
वह अभी कह ही रहा था कि अजमेर की वैन बाहर आकर खड़ी हो गई। राउंड-अबाउट की दुकानें होने के कारण गाड़ी खड़ी करने की बहुत समस्या थी। लगभग चार कारों की जगह उनकी दुकानों के आगे बनी हुई थी, पर वह हमेशा भरी रहती। यदि वैन खड़ी करने के लिए सही जगह न मिलती, तो जल्दबाजी में खाली करनी पड़ती। ट्रैफिक वार्डन का भय रहता। अजमेर को भी जगह न मिली। उसने डबल पार्किंग ही कर ली। टोनी ‘हैलो’ कहकर पिछला दरवाजा खोलने लगा और सामान का अंदाजा लगाने लगा कि कितना सामान है और पहले वह कौन-सा उतारे। उसने बियर के क्रेटों को हाथ लगाया और तीन क्रेट उठाकर अंदर ले गया। अजमेर ने वैन का साइड डोर खोलकर सामान उतारना शुरू कर दिया था। अभी थोड़ा-सा सामान ही उतरा होगा कि ट्रैफिक वार्डन आ गया। कहने लगा–
“मिस्टर सिंह, तू डबल पार्किंग नहीं कर सकता।”
“और क्या करूँ ? कहीं भी जगह नहीं है।”
“तू आठ बजे से पहले अनलोड किया कर या फिर जगह खाली होने का इंतजार कर।”
“ऐसा मैं नहीं कर सकता। भरी वैन को कहीं ओर कैसे खड़ी करूँ।”
“वैन मूव कर नहीं तो मैं टिकट दे दूंगा।”
अजमेर उसकी बात अनसुनी करके सामान उतारने लगा। ट्रैफिक वार्डन ने उसकी वैन का नंबर नोट करना शुरू कर दिया। अजमेर डर गया कि सचमुच ही टिकट न काट दे। उसने वैन स्टार्ट की और ले गया। चक्कर काटकर आया तो वार्डन जा चुका था। वे जल्दी-जल्दी वैन अनलोड करने लगे। टोनी कह रहा था–
“यह कुछ ज्यादा नस्लवादी है। दूसरे वार्डन जबकि मान जाते हैं।”
उन्होंने वैन खाली कर दी। अजमेर वैन को दुकानों के पिछवाड़े दुकानदारों के लिए सुरक्षित पार्किंग में खड़ी कर आया। वापस दुकान में आकर अजमेर सीधा पिछले स्टॉक रूम में गया। वहाँ लगे बड़े-से शीशे में खुद को देखा। वह थका-थका-सा लग रहा था। उसकी पगड़ी का सिरा पसीने से भीगा पड़ा था। वह ऊपर फ्लैट में जा चढ़ा। टोनी और सोहन सिंह सामान को सैल्फों में टिकाने लगे। सोहन सिंह प्राइसिंग गन से कीमत लगा देता और टोनी उसे सैल्फ में रख देता।
हफ्ते में दो दिन शापिंग की जाती थी। मंगलवार और वीरवार। पहले दिन से ही अजमेर ने यह सिस्टम बना रखा था। ये दो दिन टोनी दस बजे काम पर आता नहीं था तो वह तीन बजे शुरू करता। तीन से ग्यारह। आठ घंटे। आफ लायसेंस होने के कारा शाम की बिक्री अधिक थी। दिन में ग्राहक इक्का-दुक्का ही आता। दिन में तो सोहन सिंह भी ‘टिल्ल’ का काम चला लेता था। अजमेर की पत्नी गुरिंदर भी आ खड़ी होती थी।
सोहन सिंह की मुश्किल अंग्रेजी की ही थी, नहीं तो काम वह सभी कर लेता था। उम्र अधिक होने के कारण हाथों में भी फुर्ती नहीं रही थी। ग्राहक बढ़ जाने पर वह जल्दी-जल्दी सर्व नहीं कर पाता था। फिर काउंटर के पीछे लगी घंटी बजा देता जो कि ऊपर फ्लैट में बजती थी। घंटी सुनकर ऊपर से कोई न कोई आ जाता। गुरिंदर या अजमेर। सोहन सिंह का सारा दिन दुकान में शुगल-सा चलता रहता था। वह ऐसा बंदा था कि किसी बात को दिल पर नहीं लगाता था। उसने कभी भी घर की जिम्मेदारी नहीं संभाली थी। पहले उसका बड़ा भाई कामरेड परगट सिंह घर को देखता था और अब उसका यह बड़ा लड़का अजमेर का कर्ताधर्ता था। कामरेड परगट सिंह अपनी ओर से इलाके का माना हुआ व्यक्ति था, जिसका अजमेर पर बहुत प्रभाव था। अभी भी घर में उसे प्राय: याद किया जाता था। उसने ही अजमेर को इंग्लैंड भेजा था। उसके नाम पर अजमेर कई साल पार्टी को फंड भी देता रहा था।
अजमेर की दुकान सही स्थान पर थी। आर्सनल की फुटबाल ग्राउंड के बिलकुल नज़दीक। जहाँ हर वीक-एंड पर कोई न कोई मैच चलता ही रहता। वैसे भी हाईबरी कॉर्नर अड्डे की जगह थी। सारी रात लोग चलते-फिरते रहते। रिश्तेदारों और गांव के लोगों में उसकी अच्छी जान-पहचान बन गई थी। ऐसी जान-पहचान बनाकर रखना उसके स्वभाव में था। प्रशंसा का भूखा भी था वह। कई लोग उसकी तारीफें करके उसका इस्तेमाल भी कर लेते थे।
अजमेर की दुकान सामने से तो आम दुकानों जितनी ही चौड़ी थी, पर पीछे की ओर काफी लम्बी थी। जितनी दुकान थी, उतना ही पिछवाड़े में स्टॉक रूम था। बगल में एक कमरा और पीछे की ओर बाथरूम। पीछे एक छोटा-सा आंगन भी था। दुकान में प्रवेश करते ही दायीं ओर काउंटर था। मध्य में गंडोला था। तीनों दीवारों के साथ सैल्फें थीं। शीशे के फ्रंट को वह खाली रखता ताकि बाहर से देखने वाले को अंदर का व्यू पूरा दिखाई दे। बायीं तरफ वाली दीवार की सैल्फों में वाइन भरी हुई थी। बीच में गंडोले पर बियर और दायीं तरफ की सैल्फों में सोफ्ट ड्रिंक के डिब्बे और बोतलें थीं। व्हिस्की की छोटी-बड़ी बोतलें और सिगरेटें काउंटर के पीछे थीं। सैल्फों पर से सामान ग्राहक स्वयं उठा लेता और काउंटर के पीछे की वस्तु को मांग कर लेता था। दुकान की बड़ी सेल वाइन और बियर की ही थी। यद्यपि सामान उसने और भी कई किस्म का रखा हुआ था। जैसे कि चाकलेट, स्वीट्स, मुरमुरे-कुरकुरे आदि। आइसक्रीम का फ्रीज़र भी था। निरोध भी रखे हुए थे जो कि रात के समय बिक जाते थे।
दुकान के पीछे स्टॉक रूम था जहाँ से ला-ला कर सामान सैल्फों पर रखा जाता था। यहीं एक आदमकद शीशा भी लगा हुआ था। स्टॉक रूम में घुसनेवाला शीशे के सामने अवश्य खड़ा होता। सबकी आदत-सी बन गई थी। स्टॉक रूम के साथ ही एक और कमरा था, जहाँ सस्ता मिला सामान भरा पड़ा होता। दायीं ओर फ्लैट को जाता रास्ता था। दुकान के ऊपर और दो मंजि़लें थीं। एक मंजि़ल पर रसोई, एक सिटिंग रूम और एक बैडरूम था। तीन बैडरूम ऊपरली मंजि़ल पर थे। फ्लैट में जाने के लिए रास्ता दुकान में से होकर जाता था और रोड पर भी एक दरवाजा था। दुकान बंद होती तो वही दरवाजा प्रयोग में लाया जाता। शैरन और हरविंदर स्कूल से लौटते तो दुकान में से ही ऊपर फ्लैट में जाते थे, पर स्कूल वे साइड-डोर से ही जाते थे।
कभी-कभी गुरिंदर खिड़की में आ खड़ी होती और कितनी-कितनी देर वहाँ खड़ी होकर बाहर राउंड-अबाउट से गुजरती कारों को देखती रहती। अजमेर देखता तो पूछता–
“क्या देख रही है ?”
“लंदन।”
“लंदन यहाँ से क्या दिखेगा।”
“और तो तुम कहीं ले नहीं जाते, मैंने सोचा यहीं से देख लूँ।”
“मैं दुकान चलाऊँ कि तुझे लंदन घुमाऊँ?”
“मुझे न घुमाओ, कभी बच्चों को कहीं ले जाओ तो क्या हो जाएगा।”
“मेरे पास टाइम नहीं, जा तू ले जा।”
“मैंने लंदन का कुछ देखा हो तो इन्हें लेकर जाऊँ। मुझे तो इस दुकान का ही पता है। कभी नीचे, कभी रसोई में... निरी कै़द!”
(क्रमश: जारी…)


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शनिवार, 8 मार्च 2008

गवाक्ष- मार्च 2008


“गवाक्ष” के माध्यम से हम हिन्दी ब्लाग-प्रेमियों को हिन्दी/पंजाबी के उन प्रवासी लेखकों/कवियों की समकालीन रचनाओं से रू-ब-रू करवाने का प्रयास कर रहे हैं जो अपने वतन हिन्दुस्तान से कोसों दूर बैठकर अपने समय और समाज के यथार्थ को अपनी रचनाओं में रेखांकित कर रहे हैं। “गवाक्ष” के पिछ्ले दो अंकों में पंजाबी कवि विशाल (इटली) की कविताओं का हिन्दी अनुवाद, दिव्या माथुर (लंदन) की कहानी, अनिल जनविजय (मास्को) की कविताएं तथा लंदन में रह रहे पंजाबी कथाकार-उपन्यासकार हरजीत अटवाल के उपन्यास “सवारी” के हिंदी अनुवाद की पहली किस्त आपने पढ़ी। “गवाक्ष” के इस अंक में प्रस्तुत हैं – न्यू जर्सी, यू.एस.ए. में रह रहीं देवी नागरानी की पाँच ग़ज़लें और हरजीत अटवाल के धारावाहिक पंजाबी उपन्यास “सवारी” की दूसरी किस्त का हिंदी अनुवाद…

पाँच ग़ज़लें
देवी नागरानी(न्यू जर्सी, यू.एस.ए.)

(1)


डर उसे फिर न रात का होगा
जब ज़मीर उसका जागता होगा

क़द्र वो जानता है खुशियों की
ग़म से रखता जो वास्ता होगा

बात दिल की निगाह कह देगी
चुप जु़बाँ गर रहे तो क्या होगा

क्या बताएगा स्वाद सुख का वो
ग़म का जिसको न ज़ायका होगा

सुलह कैसे करें अँधेरों से
रौशनी से भी सामना होगा

मिलना जुलना है ‘देवी’ दरया से
पर किनारों में फ़ासला होगा


(2)


झूठ सच के बयान में रक्खा
बिक गया जो दुकान में रक्खा

क्या निभाएगा प्यार वह जिसने
ख़ुदपरस्ती को ध्यान में रक्खा

ढूँढ़ते थे वजूद को अपने
भूले हम, किस मकान में रक्खा

जिसने भी मस्लहत से काम लिया
उसने ख़ुद को अमान में रक्खा

जो भी जैसा है ठीक ही तो है
कुछ नहीं झूठी शान में रक्खा

ज़िंदगी तो है बे–वफ़ा ‘देवी’
इसने मुझको गुमान में रक्खा

(3)

दिल को हम कब उदास करते हैं
आज भी उनकी आस करते हैं

हमको ढूँढ़ो नहीं मकानों में
हम दिलों में निवास करते हैं

पहले खुद ही उदास रहते थे
अब वो सबको उदास करते हैं

चढ़के काँधों पे हो गए ऊँचे
इस तरह भी विकास करते हैं

इ​त्तिफ़ाकन निगाह उट्ठी थी
लोग क्या-क्या क़यास करत हैं

(4)


ख़यालो-ख़्वाब में ही महफिलें सजाता है
और उसके बाद उदासी में डूब जाता है

वो चाहता है के नज्दीक रहूँ मैं उसके
क़रीब जाऊँ तो फिर फ़ासले बढ़ाता है

कुछ ऐसे भाए हैं रस्तों के पेचोख़म उसको
क़रीब जाके भी मंजि़ल के लौट आता है

किसी ज़ुबान के शब्दों से उसको नफ़रत है
किसी के धर्म पे उँगली भी वो उठाता है

वो रूठ जाता है यूँ भी कभी-कभी मुझसे
कभी-कभी तो मिरे नाज़ भी उठाता है

(5)



चोट ताज़ा कभी जो खाते हैं
ज़ख्मे-दिल और मुस्कराते हैं

मयकशी से ग़रज नहीं हमको
तेरी आँखों में डूब जाते हैं

जिनको वीरानियाँ ही रास आईं
कब नई बस्तियाँ बसाते हैं

शाम होते ही तेरी यादों के
दीप आँखों में झिलमिलाते हैं

कुछ तो गुस्ताख़ियों की मुहलत दो
अपनी पलकों को हम झुकाते हैं

तुम तो तूफ़ाँ से बच गई ‘देवी’
लोग साहिल पे डूब जाते हैं


जन्म : 11 मई 1941, कराची में।
शिक्षा : बी.ए. अर्ली चाइल्डहुड में, न्यू जर्सी।
सम्प्रति : शिक्षिका, न्यू जर्सी, यू.एस.ए.
कृतियाँ : गम से भीगी ख़ुशी(ग़ज़ल संग्रह– सिंधी में)
चरागे-दिल(ग़ज़ल संग्रह– हिंदी में)
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धारावाहिक पंजाबी उपन्यास(किस्त- 2)

सवारी
हरजीत अटवाल
हिंदी अनुवाद : सुभाष नीरव


।। दो ।।

सिमरन से जुदा होने के बाद बलदेव का मूड कुछ बदल गया था। अधिक घूमना-फिरना उसे अब पहले जैसा अच्छा नहीं लगता था। रिवर थेम्ज़ ही थी जो उसे अंदर से निकाल लेती, नहीं तो वह कहीं भी न
जाता, कमरे के भीतर ही बैठा रहता। आयरलैंड जाने की योजना भी शौन की ही थी। वह तो जैसे ‘हाँ’ करके ही फंस गया था। शौन ने कहा था – ‘चल, दो सप्ताह के लिए आयरलैंड चलें।' प्रत्युत्तर में उसने कह दिया था– ‘चल।' जब शौन इंडिया गया तब भी ऐसा ही हुआ था। बलदेव ने सहज भाव में कहा था– ‘आ, इंडिया का चक्कर लगा आएं।' और शौन चल पड़ा था।
उसका शौन को ‘हाँ’ करने के पीछे यह भी एक कारण था कि शौन के जाने के बाद वह कैरन के पास अकेला कैसे रह सकता था। लगभग साल हो गया था उसे शौन और कैरन के संग रहते हुए। वह अब सोचता था कि यहाँ से मूव कर जाए। अपना घर या फ्लैट ले ले। मूव होने का ख़याल पिछले कुछ महीनों से कुछ अधिक ही पीछा कर रहा था, जब से कैरन और शौन के मध्य लड़ाई-झगड़ा रहने लगा था। लंदन से आयरलैंड के लिए चलते समय भी बलदेव ने शौन को कह दिया था –
“शौन, वापस लौटकर मैं कहीं और मूव हो जाऊँगा।"
“जैसी तेरी इच्छा।"
पहले की भांति उसने रुक जाने के लिए जोर नहीं डाला था।
लंदन से चलते समय उसका मूड इतना लम्बा सफ़र करने का कतई नहीं था, पर जब शौन ने कार मोटर-वे पर चढ़ाई तो बलदेव को जैसे चाव-सा चढ़ आया। घर से ही एक-एक पैग पीकर चले थे। बोतल पास थी। एक-एक चलती कार में ही बना लिया तो बलदेव ने रेडियो की आवाज़ ऊँची कर दी। उसकी मनपसंद सिंगर बलौंडी का गीत चल रहा था– ‘टाइड इज़ हाई बट आय एम होल्डिंग आन।’ शौन बोला–
“भाजी, बस ऐसे ही, ऐसे ही रहा कर... खुशी से भरा हुआ।"
“शौन, तू तो जानता ही है कि मैं कभी भी कोई प्रोग्राम प्लैन नहीं करता। जिंदगी जैसे आती है, उसे वैसे ही स्वीकार किए जाता है।"
“ठीक है पर डेव, यह बहुत अच्छी बात नहीं। प्लैन करना चाहिए।"
“तूने बहुत प्लैन कर- करके देख लिए, तू मेरे से कहाँ बेहतर है! तू भी पत्नी का सताया हुआ और मैं भी।"
उसकी बात सुनकर शौन जोर से हँसा और बलदेव भी।
वे सुबह के चले लगभग दोपहर के समय वेल्ज़ जा पहुँचे। एक पब में रुक कर बियर पी और आगे चल दिए। पहले से टिकटें बुक न कराई होने के कारण ज़रा जल्दी फिशगार्ड पहुँचना चाहते थे, पर करते-कराते देर हो ही गई। रात के बारह बज गए थे बंदरगाह पर पहुँचते। सैकड़ों की गिनती में गाडि़याँ खड़ी होकर फैरी में चढ़ने की प्रतीक्षा कर रही थीं। कारें, वैनें और लारियाँ। शौन ने दौड़-भाग करके टिकट लिए। कार को पेट्रोल से भरवाया क्योंकि आयरलैंड में पेट्रोल यहाँ से महंगा था। कार को उन्होंने लाइन में खड़ा कर लिया और इंतज़ार करने लगे।
तीन बजे फैरी को चलना था। एक बजे गाडि़या फैरी में चढ़नी आरंभ हो गईं। नीचे के मंजि़ल लारियों, बसों और बड़ी गाडि़यों की थी और ऊपर की दो मंजि़लें कारों के लिए। फैरी में चढ़ने का बलदेव का यह पहला अवसर नहीं था। फ्रांस वह फैरी से ही गया था, पर वह छोटा-सा सफ़र था। आधे घंटे का। यह फिशगार्ड से रसलेअर तक तो कई घंटों का सफ़र था।
उन्हें रसलेअर पहुँचने के लिए आम दिनों से ज्यादा वक्त लग गया। पहले मौसम साफ था, फिर खराब हो गया। समुद्र गुस्से में दहाड़ने लगा। लहरें फैरी के अंदर तक समुद्र का पानी फेंक जातीं। जहाज के हिचकोलों से लोग बेहाल हुए पड़े थे। उल्टियाँ करके फर्श गंदा कर डाला था। बलदेव उल्टी आदि से बच गया था। जीन के संग होने के कारण उस तरफ ध्यान ही नहीं गया था उसका।
फैरी के रसलेअर पहुँचने तक सूर्यास्त का समय था। बारिश होने के कारण भी अंधेरा जल्दी हो गया था। उसने जीन से विदा ली। वह पैदल जाने वाली भीड़ में शामिल हो गई। शौन और बलदेव अपनी कार की ओर आ गए। शौन कार में बैठते ही कुछ सूंघने लगा। बलदेव ने हँसते हुए कहा–
“मुझे तो मालूम ही नहीं था कि आयरश लड़कियाँ इतनी दरिया-दिल होती हैं।"
“अब तू इसे मर्सडीज़ कहेगा कि नहीं।"
“अगर कोई कार अपनी हो जाए तो उसकी किस्म तो नहीं बदल जाती।"
“डेव, इस मामले में तू बहुत कंजूस है। तुझे औरत की कद्र करनी नहीं आती।"
“शौन, यूं क्यों नहीं कहता कि मैं नरम होकर परख नहीं करता।"
बात करते-करते उनकी कार पुलिस चैकिंग तक पहुँच गई। पुलिसमैन ने सरसरी-सी नज़र दौड़ाई और बढ़ जाने का इशारा कर दिया। उन्होंने राहत की सांस ली। कुछ और आगे बढ़े तो बलदेव को जीन जाती हुई दिखाई दी। उसने शौन से कहा–
“वो देख जीन... ज़रा कार इसके बराबर रोक... पूछ लेते हैं अगर लिफ्ट की ज़रूरत हो तो...।"
शौन ने उसके बराबर जाकर कार को धीमा कर लिया। बलदेव ने कहा–
“हैलो जीन!”
जीन ने यूँ हाथ हिलाया मानो अजनबी आदमी को हाथ हिला रही हो। बलदेव ने फिर पूछा–
“यू फैंसी लिफ्ट ?”
“नो थैंक्स।"
कह का वह मुँह घुमाकर चलने लगी। बलदेव हैरान होकर कहने लगा–
“कमाल है!... इतनी जल्दी भूल गई। देख तो, कंधे उचकाती कैसे गुजर गई।"
शौन हँसा पर बोला कुछ नहीं। उसने कार दौड़ा ली। फिर उसने घड़ी देखते हुए कहा–
“हम वाटरफोर्ड पहुँचकर पब में बैठेंगे और वहीं कुछ खाएंगे।"
“तू ही मेरा वालीवारिस है, जैसा चाहे करता चल। पर रास्ते में कहीं गीनस तो पिलाएगा ही, बहुत थकान हुई पड़ी है।"
बलदेव को पता था कि आयरलैंड में गीनस लोगों को बहुत प्रिय है और हर बीमारी का इलाज गीनस को ही मानते हैं। रसलेअर से निकल कर वे मोटर-वे पर हो गए। आगे जाने पर एक पब आया तो वे रुक गए। दो-दो गिलास पिये, पर दो घंटे बैठे रहे। वक्त का पता ही न चला। फिर थकान भी इस तरह थी कि उठने को मन ही नहीं हो रहा था। घड़ी की ओर देखते हुए शौन उछलकर उठा और बोला–
“जल्दी कर डेव, हम तो बहुत लेट हो गए, हमें वाटरफोर्ड में रुकना है। बारह बजे तो पब बंद हो जाएगा, अभी रास्ता बहुत पड़ा है।"
“फिक्र न कर शौन, बियर न सही, व्हिस्की पी लेंगे।"
“आयरलैंड आकर भी व्हिस्की ही पियेगा ?”
कह कर शौन हँसने लगा।
बरसात यद्यपि बंद हो गई थी, लेकिन हवा अभी भी तेज थी। कार की रफ्तार ज्यादा होने के कारण हवा अधिक सांय-सांय कर रही थी। सड़क पर अंधेरा ही अंधेरा था। कार की लाइट में सडक कुछ गज तक ही नज़र आ रही थी। इंग्लैंड की तरह मोटर-वे पर रोड-लाइट का कोई इंतज़ाम नहीं था। वाटरफोर्ड पहुँचते-पहुँचते उन्हें बारह बज ही गए। शौन बोला–
“अब गीनस नहीं पी सकेंगे। अब कोई पबवाला सर्व नहीं करेगा। पर आ जा, कोशिश करके देखते हैं।"
कहकर उसने कार को एक पब के सामने रोक दिया। वे दोनों फुर्ती से पब में जा घुसे। काउंटर के पीछे खड़ा व्यक्ति तेज स्वर में कहने लगा–
“सॉरी मिस्टर्ज़, पब बंद हो चुका है।"
शौन ने बहुत मुलायम स्वर में कहा–
“यह मेरा दोस्त बहुत दूर से आया है। मैं जानता हूँ कि कुछ मिनट ऊपर हो गए हैं... पर अगर हमें एक गिलास गीनस का मिल जाए तो मेहरबानी होगी। हम अधिक समय नहीं लगाएंगे, हमारा वादा रहा।"
पबवाले ने बलदेव की ओर देखा और फिर शौन की तरफ और कहा–
“ठीक है, पर जल्दी करना।"
कहकर उसने पब में बैठे दूसरे लोगों की तरफ भी देखा क्योंकि पहले वह कइयों को इंकार कर चुका था। उसने फिर बलदेव से पूछा–
“तुम सेलर हो ?”
“नहीं।"
“तुम डॉक्टर हो ?”
“नहीं।"
बलदेव के पीछे ही शौन कहने लगा–
“यह बहुत बड़ा बिजनेसमैन है। यह यहाँ कोई फैक्ट्री खोलना चाहता है। जायजा लेने आया है इस शहर का।"
“वाटरफोर्ड जैसे छोटे शहर में भला क्या कोई फैक्ट्री खोलेगा!”
समीप खड़े किसी व्यक्ति ने हैरानी प्रकट की। शौन ने फिर कहा–
“अब ई.ई.सी. जो बन रही है। आयरलैंड को इससे बहुत मदद मिलेगी। फिर वाटरफोर्ड से अच्छा बंदरगाह कौन-सा हो सकता है, यूरोप से जुड़ने के लिए।"
शौन की दलील से सभी कीले गए। पब के मालिक ने फिर पूछा–
“किस चीज की फैक्ट्री खोलेगा ?”
“शायद कपड़े की।"
शौन ने एकदम उत्तर दिया। उसने यह उत्तर पहले से ही सोच रखा था। वे सभी उससे हाथ मिलाने लगे। उन्हें बलदेव बहुत अच्छा व्यक्ति दिखाई दे रहा था, जो कि शहर में रोज़गार ला रहा था। बलदेव बेंच पर बैठकर गीनस के घूंट भरता हुआ पब का निरीक्षण-सा करने लगा। छोटा-सा पब था। एक तरफ आयरलैंड का प्रमुख वाद्य हार्प पड़ा था। उसे ध्यान आया कि पब का नाम भी ‘द हार्प’ ही था। एक तरफ छोटी-सी स्टेज थी, जिस पर एक स्टूल पर गिटार जैसा कोई वाद्ययंत्र पड़ा था। बलदेव पब में उपस्थित लोगों के लिए आकर्षण का कारण बन चुका था। हर कोई उसकी तरफ देख रहा था। वह भी एक-एक व्यक्ति से नज़र मिलाता और मुस्करा कर उससे मेल-मिलाप का हुंकारा भरता।
फिर एक गंजे व्यक्ति ने स्टेज पर पड़ा वाद्य उठाया और उस पर उंगलियां फिराने लगा। धीरे-धीरे उसने ऐसी धुन छेड़ी कि सभी खुशी में शोर मचाने लग पड़े। फिर एक स्त्री माइक हाथ में पकड़े मंच पर आई और गाने लगी। कोई कंटरी-साइड धुन थी जैसी पुरानी अमेरिकन फिल्मों में हुआ करती है। इस गीत के बोल मस्ती भरे थे। कोई मल्लाह खौफ़नाक समुद्र में से वापस अपनी महबूबा के पास लौटा था। कुछेक लोग उठकर स्टेज के सामने खड़े होकर नाचने लगे। कुछ फ्लोर पर पैर मार-मार कर संगीत का साथ देने लगे।
बलदेव की थकावट कहीं गुम हो गई। वह कंधे हिला-हिलाकर संगीत का आनंद उठाने लगा। गाने वाली स्त्री में उसे गुरां का भ्रम हो रहा था। जब वह मुस्कराती तो गुरां जैसी लगती। उसने गीत समाप्त किया। सभी तालियाँ बजाने लगे। वह बलदेव के करीब आकर बोली–
“तू अपने मुल्क का कोई गीत गाएगा ?”
“नहीं, मैं नहीं गा सकता।"
बलदेव ने कहा तो शौन हँसने लगा। शौन जानता था कि वह गाएगा तो क्या, उसे तो संगीत से भी अधिक लगाव नहीं था। बलदेव ‘न-न’ कर रहा था कि उस स्त्री ने उसकी बांह पकड़ ली। वैसा ही गुरां जैसा नरम स्पर्श। बलदेव उस स्पर्श के पीछे चलता हुआ स्टेज पर जा पहुँचा। स्त्री ने माइक बलदेव के हाथ में थमा दिया। बलदेव ने चश्मा उतारा, उसे जेब में रखा और गाने लगा–
“भट्ठी वालिये चम्बे दिये डालिये
नी पीड़ां दा परागा भुन्न दे...।"
( भट्ठी वाली, चम्बे(पुष्प) की डाली, री दर्दो का हाड़ा भून दे...।)
उसने पूरे का पूरा गीत गा डाला। स्वर अधिक ऊँचा न उठा सकने के कारण वह पास से ही लौट आता था, पर वह गीत खत्म करके ही रुका। पब में बैठे सभी लोगों ने जोरदार तालियाँ बजाईं। उस स्त्री ने उसे अपनी बाहों में भर लिया। पब का मालिक अंदर से पब को बंद करता हुआ ऊँची आवाज़ में बोला–
इसी खुशी में एक-एक प्वाइंट मेरी तरफ से... फ्राम द हाउस...।"
शौन अवाक् हुआ खड़ा था कि बलदेव ने गीत गाया। बलदेव स्वयं भी हैरान था। वह सबका हीरो बना हुआ था। बारी-बारी लोग उससे हाथ मिला रहे थे। हर कोई उसके लिए ड्रिंक खरीदना चाहता था। कई अपने गिलासों में से घूंट भरने के लिए कर रहे थे। पब के मालिक ने दुबारा काउंटर खोल दिया। अब उसे पब बंद करने की कोई जल्दी नहीं थी।
उन्हें पब में से निकलते ढाई बज गए। शौन बुदबुदाया– “ब्लडी लेट!” फिर कार स्टार्ट करते हुए बोला–
“भाजी, तूने तो कमाल कर दिया।"
“हाँ, पर पता नहीं यह सब कैसे हो गया।"
“जैसे भी हुआ, पर मुझे नहीं पता था कि तू गा भी लेता है।"
यह तो मुझे भी आज ही पता चला। पता नहीं दिमाग के किस कोने में से निकलकर यह गीत सामने आ खड़ा हुआ।शौन उसे वाटरफोर्ड शहर के बारे में बता रहा था। बलदेव कोई ध्यान नहीं दे रहा था। फिर शौन उसके बिजनेसमैन होने की बात सूझने के बारे में बात करने लगा, लेकिन बलदेव तो उस गीत के बारे में सोचे जा रहा था जो कि गुरां का गीत था। वह हैरान था कि यह गीत कैसे शब्द-दर-शब्द उसके दिमाग में अंकित हो गया था और अब अचानक कैसे आ प्रकट हुआ था। न कभी उसने इस गीत को गुनगुनाया था और न ही कभी गौर किया था। उसने मन ही मन कहा, ‘गुरां, मुझे भी गाना आ गया।
।। तीन ।।

माहिलपुर का कालेज। आश्की के लिए ज़रखेज ज़मीन। इसी कालेज में जाने लगा था बलदेव।
वह घर से सम्पन्न था। पिता-भाई इंग्लैंड में थे। उन्होंने उसे कालेज जाने की खुशी में मोटर साइकिल ले दिया था। यद्यपि उसके गांव से सीधी बस माहिलपुर जाती थी, पर वह मोटर साइकिल ही दौड़ाये फिरता। दो लड़के रास्ते में उसके साथ हो जाते। मोटर साइकिल होने के कारण उसकी दोस्ती का दायरा भी जल्द ही बड़ा हो गया था। सवेरे बस-अड्डे पर जा खड़ा होता और फिर कालेज के गेट के सामने। ये उसके रोजाना के काम हो गए थे। शीघ्र ही वह ग्रुप बनाकर लड़ाई-झगड़ों में भी हिस्सा लेने लग पड़ा था।
घर में उसे रोकने-टोकने वाला कोई नहीं था। माँ मर चुकी थी। भैया-भाभी थे जो बड़ों वाले फर्ज़ तो निबाहते, पर आयु का फ़र्क कम होने के कारण उस पर रौब नहीं बना सके थे। शिंदा उससे सिर्फ दो साल बड़ा था। दोस्तों की तरह था। इकट्ठे मिलकर खेती करते थे, शराब निकालते थे और हुड़दंग मचाते थे। शिंदा अगर कोई बात करता तो उसे सलाह देने जैसी ही करता। कालेज जाते ही बलदेव ने खेती का काम छोड़ दिया था। शिंदा एक बार भी उसे जोर देकर नहीं कह सका था कि वह उसकी मदद किया करे। उसकी भाभी थी, अगर किसी बात पर खीझी होती तो उसके बेटे गागू को मोटर साइकिल पर बिठाकर दो चक्कर लगवा देता, वह खुश हो जाती।
पंडोरी माहिलपुर से दूर नहीं है। पश्चिम की ओर सिर्फ चार मील। माहिलपुर की खबर गांव में पहुँचती तो लोग तरह-तरह की बातें करने लगते कि यह लड़का कहीं न कहीं खता खाएगा। लोग शिंदे से कहते। शिंदा उसे समझाने लगता, पर बलदेव एक कान से सुनकर दूसरे से निकाल देता।
कालेज में यूथ फेस्टिवल के दिन थे। बलदेव को इसमें कोई दिलचस्पी नहीं थी। उसने अपने मित्रों के साथ होशियारपुर फिर देखने के लिए निकलना था, पर किसी बात पर लेट हो गए। यूँ ही वक्त काटने के लिए पंडाल में जा घुसे। कविता पाठ की प्रतियोगिता चल रही थी। भाग लेने वाले विद्यार्थी बारी-बारी से कविता पढ़ रहे थे। बलदेव की मंडली पीछे बैठकर बातें कर रही थी, जिससे पंडाल का ध्यान भंग हो रहा था। स्टेज सचिव ने कई बार उन्हें चुप भी करवाया लेकिन बेअसर रहा। तभी एक लड़की स्टेज पर आई। उसने माइकवाला स्टैंड पकड़ा और मुँह ऊपर उठाकर आँखें मूंदकर हेक लगाई– “भट्ठी वालिये, चम्बे दिये डालिये... नी पीड़ां दा परागा भुन्न दे...।"
सारा पंडाल शांत हो गया। बलदेव तो जैसे कील दिया गया हो। पास बैठा तेजा कहने लगा–
“अरे यह तो गुरां है ... चक्क वाली... यह तो भई बढ़कर निकली, लगती नहीं थी।"
बलदेव को तेजा की बात सुनाई नहीं दी थी। वह तो गुरां को सुन रहा था। वह गुरां को देख रहा था। उसकी लम्बी गर्दन में से होकर निकलता एक-एक शब्द उसको मस्त किए जा रहा था। उसका गीत समाप्त हुआ। अनाउंसर ने कुछ कहा। गुरां के बाद अगले विद्यार्थी की बारी आई। लेकिन बलदेव को अभी भी वही गीत सुनाई दे रहा था। उसके दोस्त उसे फिल्म देखने जाने के लिए उठाने लगे। अगले शो का समय हो रहा था। पहुँचना भी होशियारपुर था। पर वह न उठा। मंच की तरफ ही देखे जा रहा था। दोस्तों से कहने लगा–
“छोड़ो यारो फिल्म... ये यूथ फेस्टिवल देखते हैं, फिल्म तो कल भी देखी जा सकती है।"
बलदेव की बात सुनकर वे सब बैठ गए। बलदेव की नज़रें गुरां को खोज रही थीं। वह न जाने कहाँ जा छिपी थी। फिर प्रतियोगिता के परिणाम की घोषणा हुई। गुरां को इसमें फर्स्ट प्राइज़ मिला था। तालियों से सारा पंडाल गूंजने लगा, पर बलदेव जस का तस बैठा रहा। किसी ने कहा–
“पता नहीं यार, यह ईनाम कैसे ले गई। चलती तो गर्दन झुका कर है।"
फिर जब गुरां ने ईनाम लिया तो बलदेव अपने हाथों की तरफ देखने लगा। गुरां ईनाम लेकर चली गई। लेकिन बलदेव ज्यों का त्यों बैठा रहा। यूथ फेस्टिवल के समाप्त होने पर उसे दोस्तों ने पकड़कर उठाया।
उस दिन के बाद बलदेव बदल गया। खामोश रहने लगा। पहले वाली जल्दबाजी खत्म हो गई। मोटर साइकिल की स्पीड कम हो गई। बस-अड्डे पर जाकर खड़ा होना बंद कर दिया। दोस्त राहों में खड़े होकर उसका इंतज़ार करते रहते, वह दूसरी तरफ से निकल जाता। गुरां की तरफ दूर से खड़े होकर देखता रहता। कक्षा में भी ऐसी जगह पर बैठता जहाँ से गुरां दिखाई देती हो। गुरां इस बात से बेखबर थी, पर बलदेव को इस बात की परवाह नहीं थी कि गुरां उसकी तरफ देखती थी कि नहीं। बस, वह उसकी ओर देखता रहता।
यह जज्बा जिसे वह पाल बैठा था, कभी-कभी उसको बहुत आनंदमयी लगता और कितनी-कितनी देर वह आनंदित हुआ घूमता रहता। लेकिन कभी-कभी खीझने भी लगता कि कैसी बीमारी लगा ली थी उसने।
एक दिन शराब पीते हुए शिंदे ने पूछा–
“तेरी तबीयत तो ठीक है ?”
“हाँ, ठीक है।"
“फिर यह खोया-खोया-सा क्यों बना फिरता है ?”
“कुछ नहीं यार, यूँ ही...।"
“अगर कुछ नहीं तो मैंने यह गुड़ की इतनी ज़बरदस्त चीज बनाई है, एकबार भी नहीं कहा तूने।"
“यार शिंदे, एक लड़की देखी है...।"
“पसंद है ?”
“यार, पसंद वाली बात तो बहुत छोटी है।"
“चक दे फट्टे ! देखता क्या है, अपना ट्यूबवैल वाला कोठा सही जगह पर है।"
“छोड़ यार, तू उल्टी बात कर रहा है।"
“फिर तूने लड़की पूजा करने के लिए देखी है !”
बलदेव ने उसकी बात का जवाब नहीं दिया। उसे लग रहा था कि उसकी यह बात किसी से करने वाली थी ही नहीं। उसके दोस्त भी उल्टा-सीधा बोलने लगते थे। उसने एक-दो बार जब कहा कि गुरां की आवाज़ उसके कानों में अचानक गूंजने लगती है, तो सब उस पर हँसने लगते।
गुरां इस सारे घटनाचक्र से अनजान थी। वह चक्क से सवेरे साइकिल से आती और चुपचाप शाम को लौट जाती। राह में कभी वह रुकी नहीं थी। किसी से फालतू बात नहीं की थी। कक्षा में भी लड़कियों के बीच में होकर बैठती। कक्षा में कौन-कौन सा लड़का था, उसे कुछ मालूम नहीं था। कालेज आने का उसका मकसद सिर्फ पढ़ना था। उसका बाप बहुत साधारण किसान था जो उसे बहुत मुश्किल से पढ़ा रहा था। गुरां का छोटा भाई था जो कि पढ़ नहीं सका था। माँ-बाप की इच्छा थी कि लड़की ही पढ़-लिख जाए। गुरां का लक्ष्य बी.ए.,बी.एड करके अध्यापिका बनने का था। वह इस लक्ष्य के पीछे चलती अपने आसपास को अनदेखा करती आ रही थी।
मैडम फ्लौरा यूथ फेस्टिवल की तैयारी में जुटी हुई थी। वह कालेज के नये विद्यार्थियों में से टेलेण्ट तलाशने निकली तो उसने गुरां के कंधे पर आकर हाथ रखा। गुरां के साथ स्कूल से आई लड़कियों ने गुरां के गाने के बारे में बता दिया था। गुरां सोचती थी कि स्कूल में तो बचपन था, वहाँ लोगों में गाना और बात थी, पर कालेज अलग जगह थी। अब वह बड़ी हो चुकी थी। पूरी औरत थी। लोगों के सामने गाना ठीक नहीं था। और फिर, उसका लक्ष्य तो पढ़ना था, गाना नहीं। उसने मैडम को मना कर दिया। मैडम रिहर्सल करने के लिए दबाव डालने लगी कि गाकर देख ले, अगर पसंद न आए तो न गाये। पर जब उसने कुछेक रिहर्सलें कीं तो उसे यह सब पसंद आने लगा। यह सबकुछ नया-नया और स्कूल से बहुत भिन्न था। मैडम ने उससे कई गीत गवा कर देखे। अंत में, ‘भट्ठी वालिये...’ ही पसंद किया गया। कालेज की स्टेज से गाती तो विद्यार्थी उसे शांत होकर सुनते।
यूथ फेस्टिवल में से जीते ईनाम ने उसकी कालेज में वाह-वाह करवा दी। मंच के प्रधान ने तो यहाँ तक कह दिया कि इस गीत का गीतकार भी शायद इतने बढ़िया ढंग से न गा सका हो, जैसा गीत गुरां ने गाया था। कालेज की वह विशेष विद्यार्थी बन गई थी। उसके मन में थोड़ा अंहकार भी आने लगा था। वह थोड़ा बन-संवर कर भी रहने लगी। कालेज के कितने ही लड़के उस पर जान छिड़कते थे। उससे बात करने का बहाना खोजते थे। हिम्मत वाले लड़के प्यार का इजहार भी करने लगते। पर उसने किसी तरफ ध्यान नहीं दिया और अपनी राह पर चलती चली गई। प्रथम वर्ष अच्छे अंकों में पास हो गई।
पास तो बलदेव भी हो गया था पर मुश्किल से ही। उसकी एक अन्य समस्या थी कि वह इंग्लैंड की तरफ देख रहा था कि कोई न कोई सबब बनेगा ही। भाई किसी ने किसी तरह भिजवा ही देखा वहाँ।
उसका भाई शिंदा एक दिन कहने लगा–
“बलदेव, ये तू लड़कियों के चक्कर में न फंस जाना... यह अपने प्रोफेसर की तरह कोई पंगा न ले बैठना...कालेज में ध्यान से रहना चाहिए। देखने-दिखाने में तू चंगा है, खुरली पर खड़ा ही लाख का है, कोई न कोई बाहर का रिश्ता हो ही जाएगा। नहीं तो उधर से वे भी जोर लगाएंगे ही, पर तू ध्यान से रह।"
बलदेव ने कोई उत्तर न दिया। वह सोच रहा था कि शिंदे की किस बात का जवाब दे, जवाब कोई था ही नहीं। वह किसी लड़की के चक्कर में था ही नहीं। वह तो बस गुरां को दूर से देखा करता था, इससे अधिक कुछ नहीं था। पूरा साल यूँ ही गुजर गया।
उसकी यह हालत सफ़र करती-करती गुरां तक भी पहुँच गई। उसके लिए यह बात कोई नई बात नहीं थी। कितने ही दीवाने थे उसके। कई उसे राह में चलती को आवाज़ें भी कसते। कइयों ने तो उसका नाम ही ‘भट्ठी वाली’ रख छोड़ा था। उसे पता था कि कई खामोश आशिक भी होंगे। लेकिन उसे इन बातों से कोई सरोकार नहीं था। उसने तो अपनी पढ़ाई पूरी करनी थी। फिर भी उसने सोचा कि एक नज़र बलदेव को देखे तो सही। लम्बा-चौड़ा बलदेव, बड़ी-बड़ी आँखें, गोल चेहरा, भरवीं दाढ़ी और खड़े सिर के बाल। उसे अच्छा लगा। उसी पल उसने सोचा कि अच्छे-बुरे से उसे क्या लेना था।
बलदेव ने कालेज चक्क की तरफ से होकर जाना प्रारंभ कर दिया था जबकि चक्क माहिलपुर के दूसरी ओर पड़ता था और उसको कई मील का सफ़र अधिक तय करना पड़ता था। उसे अधिक सफ़र हो जाने से कुछ नहीं था, उसने तो एक नज़र गुरां को देखना होता था। गुरां साइकिल पर जा रही होती और वह मोटर साइकिल धीमी करके उसके करीब से निकल जाता। अब तक गुरां भी उसके मोटर साइकिल की आवाज़ पहचानने लग पड़ी थी। पास आते ही आवाज बदलने लगती।
फिर वह इस आवाज़ की प्रतीक्षा करने लगी। अगर आवाज़ न सुनाई देती तो उसे बेचैनी होने लगती। फिर वह बलदेव को क्लास में आते-जाते देखने लगी और मन ही मन हँसती कि इतना बड़ा आदमी है, पर ज़रा-सी बात करने की हिम्मत नहीं। कभी-कभी उसका दिल करता कि वह स्वयं ही बलदेव को बुला ले, पर ऐसा वह नहीं कर सकती थी। ऐसा उसने नहीं करना था। अब इतना अवश्य हो गया था कि अगर वह गाने के लिए स्टेज पर चढ़ती तो सबसे पहले उसकी नज़रें बलदेव को खोजने लगतीं और आखिर एक कोने में बैठे को वे खोज ही लेतीं। वह पहले की भांति आँखें मूंदकर गाती और बीच-बीच में आँखें खोलकर बलदेव की तरफ देखती। बलदेव की आँखों की प्यास उसके अंदर उथल-पुथल मचाने लगती। कई बार उसका ध्यान भी उखड़ जाता और वह कुछ गलत भी गा जाती, जिसके बारे में बाद में कोई सहेली या मैडम उसे बताती। वह उनकी बात सुनने के बजाय बलदेव के बारे में सोचने लगती।
एक दिन अपने घर में खड़ी वह अपने आंगन को देख रही थी कि यह आंगन कहीं बलदेव के लिए छोटा तो नहीं पड़ जाएगा। वह उसी वक्त अपने आप को झिड़कने लगी कि वह यह क्या फिजूल का सोचे जा रही थी।
उसे बलदेव के ख़याल रह-रह कर आने लगते। जितना वह खुद को बरजती या रोकती, उतना ही अधिक तंग होती। कई बार वह पसीने-पसीने हो जाती। उसे भय सताने लगता कि कोई बीमारी ही न लगा बैठे। उसका दिल करता कि इस बारे में किसी सहेली से ही मिलकर बात करे ताकि मन का बोझ हल्का हो सके। लेकिन वह डर जाती कि बात कहीं फैल ही न जाए। बलदेव को ही न मालूम हो जाए। कई बार यह भी सोचती कि क्यों न बलदेव से ही सारी बात करे। उसे सबकुछ बताए। शायद इसके अच्छे नतीजे ही निकलें। सोच-सोच कर वह पागल होने लगती। और एक दिन उसकी सारी समस्याओं का हल निकल आया। उसके माँ-बाप ने उसके लिए कोई लड़का पसंद कर लिया था और विवाह भी दस दिन बाद का रख दिया था।
(क्रमश: जारी…)

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