रविवार, 6 सितंबर 2009

धारावाहिक पंजाबी उपन्यास(किस्त- 17)



सवारी
हरजीत अटवाल
हिंदी अनुवाद : सुभाष नीरव
चित्र : रुचिरा

॥ बाईस ॥
तीनों भाई ही शिन्दे को एअरपोर्ट से लेने गए थे. बलदेव की कार थी. सतनाम और बलदेव पब में जा बैठे और अजमेर हांक लगने की प्रतीक्षा करता रिसेप्शनिस्ट के पास खडा हो गया, जहाँ इमिग्रेशन ऑफिसर ने शिन्दे की शिनाख्त और जिम्मेवारी के लिए आना था. अजमेर थोडा नर्वस हो रहा था की कहीं लौटा ही न दें. अभी वीज़ा सिस्टम शुरू नहीं हुआ था. शोर था कि जल्द ही दिल्ली से ही वीज़ा लेकर आना पड़ा करेगा. अभी सिर्फ एंट्री ही हुआ करती थी और एंट्री में स्पांसरशिप भेजने वाले की जिम्मेवारी अहम् होती थी.

सतनाम अपनी मस्ती में बैठा बियर पीता रहा. बलदेव ने हाफ बियर ही ली थी. कुछ देर बाद शिन्दा अजमेर के पीछे रोता हुआ चला आ रहा था. उनके पास पहुँच कर उसका रोना और तेज़ हो गया. आस पास के लोगों ने उनकी तरफ देखना शुरू कर दिया. सतनाम गुस्से में बोला -
"गला क्यों फाड़ रहा है ?... साला राजिंदर कुमार !"
शिन्दा थोडा शांत हुआ. जब वह उनके गले मिला तो फिर उसने पुकारा -
"हाय भाइया !"
"ओय तू चुप कर, अपने हिस्से का ही रो, हमारा भी टैम न उठाये जा."
बलदेव ने उसका कन्धा थपथपा कर उसे हौसला दिया. कार में बैठने तक शिन्दा सिसकता रहा था. सतनाम ने कहा-
"शिन्दे, रुमाल है ?"
"हाँ, है. चाहिए ?"
"नहीं, अपना ही नाक साफ़ कर ले."
शिन्दा शर्मिंदा सा होकर मुस्कराया और नाक और आँखें साफ़ करने लगा. थोडा और आगे पहुंचे तो शिन्दा बलदेव से बोला-
"बलदेव, कहीं राह में रेहड़ी के पास रोकना, बच्चों के लिए केले ले चलें."
"साले, तूने लन्दन को चबेयाल का अड्डा समझ लिया है क्या ?"
सभी हंसने लगे. शिन्दा शर्मिंदा सा हो गया. फिर अजमेर ने मिन्दो और बच्चों का हाल चाल पूछा. शिन्दा राह में आयी मुश्किलों के बारे में बताने लगा. सतनाम उससे जहाज़ में बैठने के तजुर्बे के बारे में पूछ रहा था. बात घूम कर फिर सोहन सिंह पर आ गयी. शिन्दा फिर रोने लगा. सतनाम ने अजमेर से पूछा-
"भाई, मोर्चरी कितने बजे बंद करते हैं ?"
"मेरे हिसाब से तो चौबीस घंटे खुली रहती है. हम तो रात में आठ - नौ बजे ही जाया करते हैं."
“फिर शिन्दे पुत्त को भाइये के दर्शन करवा कर ही चलें. कहीं रो रो कर यह भी हार्ट अटैक न करा बैठे."
बलदेव ने कार अस्पताल की तरफ मोड़ ली. वो भी भाइये को देखना चाहता था. सिर्फ एकबार ही आया था. मन में खुद को बस यही दलील देता रहता की भाइया तो अब मिटटी है. मिटटी का क्या देखना ? मैरी ग्रांट को देख कर लौटने के बाद रोती रहती थी. उसे अधिक रोना बुरा लगता था. मैरी ग्रांट की देह को आयरलैंड लेकर गयी थी. सारी कागजी कारवाई के दौरान वह मैरी के संग रहा था इसी शर्त पर कि वह रोएगी नहीं. मैरी फिर भी अपना और ग्रांट का बचपन याद करके सिसकने लगती. भाइये का फ्यूनरल शिन्दे के इंतजार में बहुत लेट हो गया था. बलदेव को कोफ्त सी होने लगती थी कि इस कारण कितने ही काम रुके पड़े थे.

विटिंगटन हॉस्पिटल के ऐन पीछे बड़ी सी शैड नुमा ईमारत थी, जहाँ लाशें अंडरटेकर द्वारा ले जाने कि प्रतीक्षा कर रही होती थीं. और जहाँ आगे उनका संस्कार होना होता था.

उस दिन सभी जज्बाती हो गए जब वे सोहन सिंह को स्नान करवाने गए थे. अजमेर कहने लगा-
"तुम लोग जाओ, मुझे तो कुछ हो जायेगा, मेरा तो दिल है नहीं, कमज़ोर है."
"हमने कौन सा दिल को रिबटें लगवा रखी हैं."
सतनाम ने उसे संग ले जाते हुए कहा. अजमेर ने दिल मज़बूत करने के लिए एक पैग लगा लिया. फिर बाकी के भी पीछे न रहे. टोटनहैम हाई रोड पर अंडरटेकर का दफ्तर था. दफ्तर के पीछे कफ़न बनाने वालों का कारखाना था और उसके पीछे लाशों को नहलाने का प्रबंध था. प्लेटफोर्म के ऊपर देह को डाला हुआ था. साथ ही शावर लगा हुआ था.बिज़ली की शक्ति से प्लेटफोर्म आडा -तिरछा हो जाता था ताकि देह को इधर उधर पलटा जा सके. उन सबने सोहन सिंह की देह को दही से नहलाया. नए कपडे पहनाये. शिन्दे ने उसके सिर पर पगडी बाँधी. वे सभी ये सब काम चुपचाप करते रहे. शिन्दे के साथ साथ अजमेर भी हल्का-सा रोता रहा. सतनाम और बलदेव भी खुद को रोक न पाए. जब तैयार करके उसे कफ़न में लपेटा तब सभी रोने लग पड़े. आँखे पौंछते हुए सतनाम ने कहा-
"बच गए. कहीं भाइया वस्मा लगता होता तो इसकी दाढी भी काली करनी पड़ती."
वे सभी हंस पड़े. हँसे भी इतनी जोर से कि अंडरटेकर का एक कर्मचारी उन्हें देखने आ गया. उनका मूड अब कुछ बदला. शिन्दा बोला -
"यह तो भाई तुम्हारा सिस्टम बढ़िया है. वहां इंडिया में तो कुछ नहीं, ऊँचे खू (कुएं) वालों का बूढा मर गया, साले का सवा क्विंटल भार, दस बन्दों से भी ना संभाला जाए."
सतनाम ने अजमेर से कहा -
"भाई, आज तो हमें भाइये वाली ब्रांडी पीनी चाहिए थी, उसके नाम पर. और फिर ठण्ड भी है."
"अब जाकर पी लेते हैं."
अजमेर ने उत्तर दिया और कल के बारे में सोचने लगा. कल फ्यूनरल था. फ्यूनरल उसके लिए बहुत बड़े दिन की तरह था. इस दिन की उसने बहुत तैयारी कर रखी थी. दूर-दूर तक इसके खबर भेजी थी. पंजाबी की साप्ताहिक अख़बार में भी निकाला था. वह सबके कार्य व्यवहारों में पहुंचा करता था. उसे आस थी कि सभी आयेंगे और आये भी सब. मंजीत के रिश्तेदार, गुरिंदर की मौसी और दूर का लगता एक मामा. अजमेर के गाँव के लोग भी पहुंचे.

ग्यारह बजे लाश को लेकर काली लम्बी कार उनके घर आ पहुंची. सारा हाईबरी कोर्नर ही लोगों से भर गया. कारें खडीं करने के लिए तो जगह ही नहीं बची. ट्रैफिक रुक गया. पुलिस को आकर लोगों की मदद करनी पड़ी. आधा घंटा भर लाश घर में रही. बॉक्स को स्टैंड पर रखा हुआ था. इस काम के लिए उन्होंने पिछला स्टोर रूम खाली कर लिया था. एक एक करके लोग आते और सोहन सिंह का दर्शन करके आगे बढ़ जाते. भाई ने अरदास की. बॉक्स को कार में रखा. दो और लम्बी कारें थीं जिनमें परिवार और अन्य करीबी औरतें -बच्चे बैठे. यह काफिला साउथ गेट गुरूद्वारे की तरफ रवाना हो लिया. पूरे उत्तरी लन्दन को यही गुरुद्वारा लगता था. वहां पहुँच कर फिर बक्से को कार में से उतार कर स्टैंड पर टिकाया गया. अन्दर भाई ने अरदास की. बक्से का ढक्कन खोल दिया गया. जिन्होंने सोहन सिंह के दर्शन नहीं किये थे, उन्होंने भी कर लिए. आधा घंटा वहां रुके. यहाँ से फिर एक लम्बे काफिले के रूप में फिंचले कैरीटोरियम की ओर चल दिए. वे चारों भाई एक ही कार में थे. सतनाम कहने लगा-
"ले भाई भाइया खट गया . इतने लोग, इतनी कारें कि सडकों का ट्रैफिक जाम हो गया. मानो भाइया ना हुआ, कोई हीरो हो गया."
"यही तो मैं तुमसे कहा करता हूँ कि भाई बना कर रखो. अब इतने लोगों के आने से अपनी कितनी इज्ज़त बढ़ी. हम इक्कठे चलते हैं तो शोभा होती है."
"भा, ठीक है तेरी बात, पर यह सब तेरे कारण ही है. भाइया तो सांई लोक था. यह सब तेरे कारण ही आये हैं." सतनाम ने कहा. अजमेर यही सुनना चाहता था. बलदेव को चुप देख कर सतनाम ने उसे छुआ. वह भी सतनाम की हाँ में हाँ मिलाने लगा. कार में से निकल कर सतनाम बलदेव से धीमे से बोला-
"तूने मुंह को क्यों ताला लगा रखा था, अगर प्रेम चोपडा की बडाई हो जाती है तो फ्युनरल पर खर्च किये गए उसके पैसे हरे हो जायेंगे."
"सारा टब्बर ही मरासियों का हो जाए तो अच्छी बात नहीं."
"बाहर जाकर तो नहीं करते हम किसी की चमचागिरी. बड़े भाई की ही करते हैं. और एक बात तुझे भी बताऊँ, तू कुछ ज्यादा ही चुप रहने लगा है, जल्दी ही कोई औरत ढूंढ ले अपने लिए."
औरत के नाम पर शिन्दा भी उनके पास आ खडा हुआ. सतनाम ने कहा-
"इसे देख कैसे टोह लेता फिरता है कुत्ते की तरह."

बातें करते हुए वे हाल के अन्दर जा घुसे. हाल बहुत छोटा रह गया था. इतनी भीड़ के आगे. सोहन सिंह का बक्सा मंच पर रखा गया. भाई ने फिर अरदास की. अजमेर ने बटन दबाया. बॉक्स धीरे धीरे अन्दर जाने लगा. फिर परदे की ओट हो गया. कुछेक लोग सबूत के लिए बॉक्स को बिजली से जलता देखने के लिए अन्दर चले गए. शेष लोग बाहर निकल कर चिमनी की ओर देखने लगे, जहाँ से धुंआ निकलना था.
कैरीटोरियम से सब लोग गुरूद्वारे में आ गए. जहाँ भोग पड़ना था. लोगों ने रोटी खाकर अपने घरों को वापस लौट जाना था. कुछ लोग पब को जाने वाले थे, ख़ास तौर पर पैट्रो, माइको, जुआइस, मगील आदि. कुछ और अजमेर के गौरे ग्राहक भी थे, जिन्होंने रस्म के बाद बियर पीनी थी. साउथ गेट के गुरूद्वारे के साथ ही पब था. बलदेव की ड्यूटी सब को पब में ले जाने की लगी हुई थी. शौन और गैरथ के आने के कारण उसे पब में वैसे भी जाना ही था.
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(क्रमश: जारी…)

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