रविवार, 6 सितंबर 2009

गवाक्ष – सितम्बर 2009



“गवाक्ष” के माध्यम से हम हिन्दी ब्लॉग-प्रेमियों को हिन्दी/पंजाबी के उन प्रवासी लेखकों/कवियों की समकालीन रचनाओं से रू-ब-रू करवाने का प्रयास कर रहे हैं जो अपने वतन हिन्दुस्तान से कोसों दूर बैठकर अपने समय और समाज के यथार्थ को अपनी रचनाओं में रेखांकित कर रहे हैं। “गवाक्ष” के पिछ्ले तेरह अंकों में पंजाबी कवि विशाल (इटली) की कविताओं का हिन्दी अनुवाद, दिव्या माथुर (लंदन) की कहानी, अनिल जनविजय (मास्को) की कविताएं, न्यू जर्सी, यू.एस.ए. में रह रहीं देवी नागरानी की ग़ज़लें, लंदन निवासी कथाकार-कवि तेजेन्द्र शर्मा, रचना श्रीवास्तव, दिव्या माथुर की कविताएं, दुबई निवासी पूर्णिमा वर्मन की कविताएं, यू एस ए में रह रहीं हिन्दी कथाकार-कवयित्री इला प्रसाद, डेनमार्क निवासी कवि भगत धवन की कविताएँ और चाँद शुक्ला की ग़ज़लें, यू एस ए निवासी कवि वेद प्रकाश ‘वटुक’ तथा कवयित्री रेखा मैत्र की कविताएं, कनाडा अवस्थित पंजाबी कवयित्री तनदीप तमन्ना की कविताएं, यू के अवस्थित हिन्दी कवि-ग़ज़लकार प्राण शर्मा की ग़ज़लें, कैनेडा में अवस्थित पंजाबी कवि सुखिन्दर की कविताएं, कनाडा निवासी पंजाबी कवयित्री सुरजीत, अमेरिका अवस्थित डॉ सुधा धींगरा और पंजाबी कथाकार-उपन्यासकार हरजीत अटवाल के उपन्यास “सवारी” के हिंदी अनुवाद की सोलह किस्तें आपने पढ़ीं। “गवाक्ष” के सित्म्बर 2009 अंक में प्रस्तुत हैं – कनाडा में अवस्थित हिंदी- पंजाबी कथाकार - कवयित्री मिन्नी ग्रेवाल की कविताएं तथा यू के निवासी पंजाबी कथाकार-उपन्यासकार हरजीत अटवाल के धारावाहिक पंजाबी उपन्यास “सवारी” की सत्रहवीं किस्त का हिंदी अनुवाद…

कनाडा से
मिन्नी ग्रेवाल की कविताएँ
पंजाबी से अनुवाद : सुभाष नीरव
कविताओं के साथ चित्र : रुचिरा

(१)
तेरे साथ की प्रतीक्षा
तेरे साथ की प्रतीक्षा करते करते
मैं थक गयी हूँ
नज़रें धुंधला गयी हैं
और इस
धुंधलके के कारण
हर अँधेरे पर
तेरे नक्श उभर आते हैं
हर गले में
मैंने बांहें डाल दी हैं.

तेरे स्पर्श का अहसास
अभी तक है
प्यार गुनाह है
तेरा नाम ले नहीं सकती
इस प्यार के अहसास को
घर के पीछे
गड्ढा खोद कर
दबा दिया है
हाथों में कुछ मिटटी
फिर भी
लगी रह गयी है.

(२)
आज फिर
तड़पें लहरें
चीखे हवा
तूफानों से
घिरी यह फिजा
उम्र पुकारती
मंझदार मंझदार

आज फिर
तेरा ख्याल
आता है
बार बार

(३)
चाहतें
उम्र की भट्टी
मोहब्बत की आग
अरमानों के दानें
शर्म की झोली में से
भुन भुन कर
बाहर गिर रहे हैं.

लोक लज्जा के पैमानें
चाहतों की कब्र पर
छलकते ढुलकते
सांसों को दबोच रहे हैं.

(४)
साझा पल
चौराहे पर लोगों का शोर
खंभे की पीली रोशनी
शाम के साये ढल गए.

तेरी प्रतीक्षा में मैं खड़ी हूँ
कि चौराहे से घर तक के
कुछ पल साझे हो सकें

पुराने कपड़े गर्माहट नहीं देते
ठण्ड से दांत बज रहे हैं
काम के बाद बहुत थक गयी हूँ.

कुछ रुपये, ओवर टाइम
गरीबी का लालच, और तू
हमेशा देर से आता है.

अपनी उम्र की पता नहीं
कितनी जवान शामें
इस चौराहे पर ढल जाएँगी.


(५)
रात ने

रात ने आकाश की चादर ओढी
और सो रही
चादर के माथे पर चाँद चमका
और चांदनी बरस पड़ी
चांदनी ने आँखों के दीये जलाये
और लौ हंस पड़ी

उस रात, पर उस रात
न रात सोयी, न चाँद सोया, न सोये तारे
एक अजीब-सा सवाल मुझसे पूछते रहे सारे
जज्बों का मचलना
खुशबुओं का महकना
दूर कहीं किसी की आहट

पत्तों का सरकना, होठों का फड़कना
यह कैसी जिस्म की थरथराहट
थके भंवरे, मदहोश कलियाँ
यह फिजा
रह रह कर मुझको
राज़ कोई समझा रही है.
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पिछले ३० वर्षों से कैनेडा में रह रहीं सुश्री मिन्नी ग्रेवाल पंजाबी की जानी-मानी लेखिका हैं. इनके अबतक पंजाबी में तीन कहानी संग्रह "कैक्टस दे फुल्ल", "फानूस" और "चांदी डा गेट" तथा हिंदी में "दो आसमान" प्रकाशित हो चुके हैं. इसके अतिरिक्त पंजाबी में एक कविता संग्रह "फुल्ल-पत्तियां" प्रकाशित हो चूका है और एक पुस्तक "सरहदों पार मील" प्रकाशनाधीन है.
संपर्क : 5, Sylvid Court, Loretto On LoG ILO, CANADA
ई-मेल : minniegrewal@sympatico.ca

15 टिप्‍पणियां:

सहज साहित्य ने कहा…

हर विधा से आप गवाक्ष की खूबसूरती बनाए हुए हैं ।मिन्नी ग्रेवाल की कविताएँ इस अंक को और खूबसूरत बनाने में समर्थ हैं।
रामेश्वर काम्बोज 'हिमांशु'

रश्मि प्रभा... ने कहा…

क्रमशः हर भावनाओं की पगडंडियों से गुजरते हुए बहुत अच्छा लगा......

Nirmla Kapila ने कहा…

संवेदनाओं के गहरे उतर कर शब्दों के मोती निकल लाईँ और उन्हें करीने से कविता मे पिरोया एक अछ्ही शब्दशिल्पी मुन्नी जी को बहुत बहुत बधाई और उनसे रुबरू करवाने के लिये आपका धन्यवाद
मिनी जी अपनी पंजाबी की कवितायें निम्न ब्लोग पर भेज सकें तो आभारी हूँगी
http://punjabdikhushbu.blogspot.com/

इष्ट देव सांकृत्यायन ने कहा…

बहुत अच्छी कविताएं. सधुवाद.

रंजना ने कहा…

सुन्दर भावाभिव्यक्ति.......

पर मुझे लगता है ये कवितायेँ अपनी मूल भाषा (पंजाबी) में अधिक सम्प्रेश्नीय तथा प्रभावोत्पादक लगती होंगी....नहीं ????

रूपसिंह चन्देल ने कहा…

Bahut hi utkrisht kavitaayen hain.

Chandel

PRAN SHARMA ने कहा…

MINNI GREWAL KEE SABHEE KAVITAON KI
BHAVABHVYAKTI SARAS AUR PRASAD-
MAYEE HAI.ANUWAAD KEE TO BAAT HEE
KYAA HAI!

सबद-लोक ने कहा…

मिन्नी ग्रेवाल की प्रेम कविता में तपन और विरह की मिठी आग है...पसंद आयी।

Harkirat Haqeer ने कहा…

" Raat ne " nazm sabse adhik pasand aayi ....!!

Aapka chyan har bar lajwaab hota hai Nirav ji ....!!

ashok andrey ने कहा…

priya bhai subhash jee aapne minni jee kii bahut achchhi kavitaon se prichya karvaaya hai unki pehli kavitaa tere saath kii pratikchha kii antim bhaag kii panktiyon -

tera naam le nahi sakti
iss pyaar ke ehsas ko
ghar ke piichhe
gaddha khod kar
dabaa diya hai
hathon mein kuchh mittii
phir bhii
lagii reh gaee hai.
ne bahu jayaada prabhavit kiya hai meri aur se badhai sviikaren
ashok andrey

बेनामी ने कहा…

My dear Subhash Neerav ji,

I visited your blogspot and was very much impressed by the way you have presented my poems and Tippney corner together.
I feel very proud of you and your dedication in promoting parvasi writers,as we are called---parvasi.
I also would like to thank everyone who contributed their comments about my poems. I would like to mention here that Mr. Amarjeet Kaunke and Miss Rekha Mitra sent me individual e-mail messages.
My thanks to you and every reader.
With best wishes,
Minnie Grewal
minniegrewal@sympatico.ca

सुरेश यादव ने कहा…

मिन्नी ग्रेवाल जी की कवितायेँ मानवीय संबंधों का झंझावात है जिसे अपने अनुवाद के कौशल से नीरव जी ने हिंदी भाषा के पाठकों के जहाँ में उतरने का सफल कार्य किया है.मिन्नी ग्रेवाल जी और नीरव जी को एक साथ बधाई. 09818032913

बेनामी ने कहा…

Dear Subhash ji,
Thanks for having Minnie Grewal's poems in September issue. They are beautiful.
Please let us have some more of her poems.
With Best Wishes

Pushpa Bhargava
London
kayceemd@yahoo.com

Pradeep ने कहा…

छोटी-छोटी किन्‍तु प्रभावशाली कविताएं हैं. बधाई स्‍वीकारें.
- प्रदीप जिलवाने, खरगोन म.प्र.

Devi Nangrani ने कहा…

मिन्नी ग्रेवाल की रचनायें मन की तल्वती पर अपनी छाप छोड़ जाती है. Punjab की सौंधी मिटटी की महक सांसों में देर तक महकती है. नीरज
जी यह मंच पे पूरे देश व् परदेश को संगठित कर रहा है

उम्र की भट्टी
मोहब्बत की आग
अरमानों के दानें
शर्म की झोली में से
भुन भुन कर
बाहर गिर रहे हैं.
देवी नागरानी