शुक्रवार, 11 फ़रवरी 2011

गवाक्ष – फरवरी 2011


जनवरी 2008 “गवाक्ष” ब्लॉग के माध्यम से हम हिन्दी ब्लॉग-प्रेमियों को विदेशों में रह रहे हिन्दी/पंजाबी के उन लेखकों/कवियों की समकालीन रचनाओं से रू-ब-रू करवाने का प्रयास करते आ रहे हैं जो अपने वतन हिन्दुस्तान से कोसों दूर रहकर अपने समय और समाज के यथार्थ को अपनी रचनाओं में रेखांकित कर रहे हैं। “गवाक्ष” में अब तक विशाल (इटली), दिव्या माथुर (लंदन), अनिल जनविजय (मास्को), देवी नागरानी(यू.एस.ए.), तेजेन्द्र शर्मा(लंदन), रचना श्रीवास्तव(लंदन), पूर्णिमा वर्मन(दुबई), इला प्रसाद(यू एस ए), भगत धवन (डेनमार्क), चाँद शुक्ला (डेनमार्क), वेद प्रकाश ‘वटुक’(यू एस ए), रेखा मैत्र (यू एस ए), तनदीप तमन्ना (कनाडा), प्राण शर्मा (यू के), सुखिन्दर (कनाडा), सुरजीत(कनाडा), डॉ सुधा धींगरा(अमेरिका), मिन्नी ग्रेवाल(कनाडा), बलविंदर चहल (न्यूजीलैंड), बलबीर कौर संघेड़ा(कनाडा), शैल अग्रवाल (इंग्लैंड), श्रद्धा जैन (सिंगापुर), डा. सुखपाल(कनाडा), प्रेम मान(यू.एस.ए.), (स्व.) इकबाल अर्पण, सुश्री मीना चोपड़ा (कनाडा), डा. हरदीप कौर संधु(आस्ट्रेलिया), डा. भावना कुँअर(आस्ट्रेलिया), अनुपमा पाठक (स्वीडन) आदि की रचनाएं और पंजाबी कथाकार-उपन्यासकार हरजीत अटवाल के उपन्यास “सवारी” के हिंदी अनुवाद की तैंतीसवीं किस्त आपने पढ़ीं। “गवाक्ष” के फरवरी 2011 अंक में प्रस्तुत हैं – संयुक्त अरब इमारात से पूर्णिमा वर्मन की कविताएं तथा हरजीत अटवाल के धारावाहिक पंजाबी उपन्यास “सवारी” की चौंतिसवीं किस्त का हिंदी अनुवाद…

यू.एस.ए. से
सुदर्शन 'प्रियदर्शिनी' की कविताएँ

जीवन

वह भीड़ भरी
जिंदगी
वह कन्धे से कन्धे
छिलते हुये तन
वह उठे हुये भीड़ में चेहरे
वह असंख्य
हिलती हुई
मुंडियां
वे अभावों में
घिरे हुये घर
वह पँक्तियों में
लगी हुई
राशन की दुकानों
पर भीड़
वह जीने के
संघर्ष में की गई
एक एक दौड़
वह सुबह से सांझ तक
कुछ नया कर आने का
पूरा पन
मुझे आज भी भरता है…

वह शिद्दत के बाद
मिली हुई
थोड़ी- सी रहमत
वह ब्याही दुल्हन की
पहली रात का
नया नवेला आभास
वह उम्र भर
एक तार में बंध कर
उम्र भर की
चादर बुन
जाने का भरापन
वे छोटे छोटे
घरों में होने वाले तर्क
वह अधिकार एवं स्नेह
के बीच लड़े हुये
खेलों की तरह
जीत और हार
की अनुभूति
वह बसों में चढ़ते उतरते
भीड़ की रेल-पेल
जीवन को जीने की
पूरी चाहत से
भर देते हैं…

इस सागर की
तरह भरे हुये
पर ठहरे हुये
जीवन
जिस में छोटी-छोटी
मछलियों का
क्रिया-कलाप नहीं
जिस में चांदनी रात में
अनबिछी खाट पर
पढ़े हुए चांद को
साथ-साथ ताकने का
सुख नहीं
जिस में छोटी-छोटी
बातों का नहीं
बड़ी- बड़ी प्रलयों का
अहसास भरा हो
ऐसा सुख अन्दर कहीं
गहरे अभावों से
भर देता है …

धीरे-धीरे
स्वयं फल को
पकते देख कर
जीवन के आगे
बढ़ने का सुख
इन छलांगों के
सुख से
कहीं बड़ा लगता है
आज फिर न जाने क्यों
उन धूल-धूसरित
अपने से चेहरों में
खो जाने
का मन करता है।
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बुत

कहते हैं
शरीर नहीं
रहता
पार्थिव है
जल, वायु, व्योम
अग्नि और
मिट्टी से बना है

पर
कहीं न कहीं
एक बुत
रह जाता है

एक अशरीरी
छवि-सा
तुम्हारी प्रकृति
तुम्हारे
आचार विचार
व्यवहार से
लिपा-पुता
किन्हीं
आँखों में…
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अकेले

मैंने
अपने से अलग
अपने घावों
अपनी रिसती
बिवाइयों
गले की फाँस बनी
विसंगतियों
दम घोंट
देने वाली
वे सारी
व्यथाओं की
एक पोटली बांध कर
अलग अलगनी पर
टांग दी है
ताकि जब तुम
आओ तो
ले चलो
मुझे अकेले
निःसग
उन सब से
परे
निःस्वच्छ
स्फटिक लोक
में अकेले…
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सुदर्शन 'प्रियदर्शिनी'
जन्म - लाहौर अविभाजित भारत. शिक्षा पी.एचड़ी हिन्दी. अनेक वषों तक भारत में शिक्षण कार्य किया.
अमरीका में 1982 में आई तब से लेखन लगभग बंद रहा. अब पिछले दो तीन सालों से भारत की पत्रिकाओं में छपने लगी हूं.अमरीका में रह कर भारतीय संस्कृति पर आधारित लगभग दस साल तक पत्रिका निकाली. टी वी प्रोग्राम एंव रडियो प्रसारण भी किया. अब केवल स्वतंत्र लेखन.
पुरस्कार
महादेवी पुरस्कार - हिन्दी परिषद टोरंटो, कनाडा
महानता पुरस्कार - फ़ेडरेशन ऑफ इंडिया, ओहायो
गर्वनस मीडिया पुरस्कार- ओहायो,यू एस ए
प्रकाशित रचनायें - उपन्यास -रेत के घर(भावना प्रकाशन), जलाक (आधारशिला प्रकाशन), सूरज नही उगेगा (बिशन चंद एंड संस)
कविता संग्रह - शिखंडी युग (अर्चना प्रकाशन), बराह (वाणी प्रकाशन), यह युग रावण है (अयन प्रकाशन), मैं कौण हां (पंजाबी में-चेतना प्रकाशन)
कहानी संग्रह - उत्तरायण (प्रकानाधीन)
सम्पर्क :
सुदर्शन प्रियदर्शिनी
246 Stratford Drive
Broadview Hts, Ohio 44147
USA
(440)717-1699
Sudarshansuneja@yahoo.com

धारावाहिक पंजाबी उपन्यास(किस्त- 34)



सवारी
हरजीत अटवाल
हिंदी अनुवाद : सुभाष नीरव

॥ उन्तालीस ॥
शिन्दा सतनाम की दुकान पर सवेरे आठ बजे पहुँच जाता। उसी समय पैट्रो आता और मगील भी। सतनाम कईबार पहले भी आ जाता और कई बार लेट भी हो जाता। उसने शिन्दे को एक चाबी दे दी थी ताकि यदि सतनाम लेट भी हो जाए तो दुकान शिन्दा ही खोल ले। जिस दिन डिलीवरी आनी होती तो शिन्दा जल्दी आ जाता। अजमेर के घर से सतनाम की दुकान का करीब पन्द्रह मिनट का पैदल सफ़र था। मौसम ठीक होता तो यह पन्द्रह मिनट तुरन्त बीत जाते। बारिश हो रही होती तो उसके लिए पैदल चलना कठिन हो जाता। बर्फ़ तो अब पड़ने के आसार नहीं दीख रहे थे पर ठंड बहुत रहती थी। शीत हवा कान चीरती गुजर जाती। अजमेर की दुकान में यह ठंड मालूम नहीं होती थी। अन्दर ही जो रहना होता था। शॉपिंग वाले दिन ही वह बाहर निकलता था।
अब राह की ठंड ही नहीं थी, दुकान में भी कोल्ड रूम्स में आना-जाना पड़ता था शिन्दे को। इस वजह से नाक बहने लगता। बहते नाक का इलाज व्हिस्की है इसका शिन्दे को पता था। अजमेर की दुकान में व्हिस्की की खुली छूट थी। सतनाम की दुकान में ऐसा नहीं था। यहाँ व्हिस्की शाम को निश्चित समय पर मिलती। तभी बोतल खोली जाती। सतनाम की दुकान पर काम से भी उसे घिन्न-सी आती रहती थी। लेकिन यहाँ उसे सौ पौंड मिलने थे, वह भी छह दिन के। वह खुश था।
पर शिन्दे के तो सात दिन ही लग जाते थे। इतवार वाले दिन वह अजमेर की दुकान संभालता। शाम को सतनाम उसे हाईबरी उतार जाया करता। वह दुकान में घुसते ही काम में लग जाता। काम बन्द करवाकर अजमेर के संग ही ऊपर जाता। सवेरे जल्दी उठता। जिस दिन कभी सतनाम के साथ मीट मार्किट में जाना हाता तो तड़के ही उठ बैठता। इस तरह नींद के घंटे कम हो जाते और थकावट-सी रहती। इस थकावट का इलाज भी बियर या व्हिस्की ही होता।
वैसे सवेरे उठकर शिन्दा किसी को जगाता नहीं था। चाय बनानी उसने सीख ली थी। उसे देसी तरीके की चाय ही अच्छी लगती थी। सतनाम की दुकान पर गोरों वाली कच्ची-सी चाय बनती थी जो उसे अच्छी नहीं लगती थी। सतनाम की दुकान में दोपहर में सभी चिप्स-से ही खाते थे। कभी-कभी मीट भी भून लिया जाता। अजमेर की दुकान में गुरिंदर रोटी बना देती थी। अब वह गोरों वाला खाना खाकर अपना स्वाद बनाने की कोशिश करता। कई बार उससे खाया न जाता और भूखा-सा ही रह लेता।
बलदेव को वह खूब याद करता रहता पर वह अब काफी समय से नहीं आया था। अजमेर ने उसे कुछ गलत कह दिया था। अजमेर की तो यह आदत थी कि कहते समय कुछ सोचता ही नहीं था, पर बलदेव को इतना गुस्सा नहीं करना चाहिए था। आख़िर उसका बड़ा भाई था। फिर गुरां को मिलने ही आ जाता। उसे सभी की बात सच प्रतीत होती कि बलदेव निर्मोही हो गया था। उसे किसी से भी प्यार नहीं रहा था।
कई बातों के बावजूद उसका दिल सतनाम की दुकान पर लग गया था। सारा दिन रौनक रहती। कोई न कोई शुगल चलता ही रहता। जुआइस आती तो अपना ही झगड़ा लेकर बैठ जाती। शिन्दे से वह अधिक मोह दिखाने लगी थी। अब शिन्दे को काला रंग पहले जितना पराया नहीं लगता था। पहले दिन टोनी को देखकर हैरान हो गया था। इंडिया में उसने कोई अफ्रीकन नहीं देखा था। जुआइस भी पहले पहले बहुत ही अजीब लगती थी। परन्तु अब वह भिन्न नस्ल के शरीरों की भिन्न बनावट को समझने लग पड़ा था।
उस दिन शिन्दा अपने खाने से इन्कार-सा कर रहा था। जुआइस ने उसकी ओर देखा और पूछने लगी-
''अच्छा नहीं लगता ?''
''नहीं, आदत नहीं बन पा रही।''
''गोट करी-राइस खाएगा ?''
''क्यों नहीं, गोट का मीट मिल जाता है ?''
''मिल जाता है पर यह सैम नहीं लाता, उसके लिए मुझे टोटन हैम जाना पड़ता है।''
''मुझे नहीं पता था। मैंने सैम से पूछा भी था पर वह कहता था कि नहीं मिलता। मैं मार्किट भी जाता हूँ, वहाँ भी नहीं देखा।''
''खास दुकानों पर ही मिलता है। यहाँ यह बिकता नहीं, इसलिए नहीं रखते।''
करीब खड़ा पैट्रो उनकी बातें सुन रहा था। वह बकरे के मीट के बारे में तफ़सील से समझाने लगा। बकरे को गोरे तो खाते ही नहीं थे। भारतीय भी अब भेड़ का मीट ही पसन्द करने लगे हैं। शिन्दा कहने लगा-
''मुझे तो यहाँ का मीट पसन्द ही नहीं। मुर्गा स्किन समेत खाते हैं लोग। भेड़ का मीट भी और तरह का ही है।''
''शैनी, तू मेरे हाथ की बनी गोट करी खाकर देखना, घर के पकवान भूल जाएगा।''
शिन्दे ने कुछ नहीं कहा। जुआइस ने फिर पूछा-
''चलेगा मेरे साथ मेरे घर ?''
शिन्दा हँसा और सतनाम की तरफ देखने लगा। मीट काटते हुए सतनाम बोला-
''इतने प्यार से कह रही है, जा हो आ।''
''हाँ, छोड़ परे।''
''तेरी मर्जी है, जाकर देख ले। शायद तू भी गोता लगा ले।''
कहकर सतनाम ने बीफ के बड़े पीस पर ज़ोरदार गंडासा मारा और एक ही वार से सही काट डाला। मगील के कान उनकी बातों की ओर ही थे। लेकिन उसे पूरी तरह समझ में नहीं आ रहा था। वह कहने लगा-
''शैनी, रहने दे गोट करी। मैं तुझे किसी दिन पायऐला खिलाऊँगा।''
''तू भी कुक है ?''
''और क्या, मैं तो हूँ ही कुक। यह तो सैम की मदद के लिए बुच्चर बना हूँ। मेरे हाथ का बना कुछ खाएगा तो उम्र भर याद रखेगा।''
जुआइस ने अपना काम खत्म किया और शिन्दे को हाथ से पकड़ कर खींचते हुई ले चली। शिन्दे ने एक-दो बार न की और फिर चल पड़ा। जुआइस बताने लगी-
''बस, इसी रोड में से निकलती है मेरी रोड, रेलवे पुल के बाद।''
शिन्दा उसके बराबर चलता जा रहा था। उसे अच्छा-अच्छा लग रहा था। उसने पूछा-
''जुआइस, घर में तेरे कौन-कौन हैं ?''
''मेरे दो बच्चे हैं, बड़ी बेटी क्लेयर और छोटा बेटा मार्क। दस और नौ साल के।''
''तेरा पति ?''
''विक्टर को मैंने घर से निकाल दिया था। बहुत हरामी था। गोरा जो था। उसने सोचा, मैं काली हूँ, वह जितनी चाहे औरतों के साथ जाए, मैं कौन-सा बोलने वाली हूँ। अफ्रीका जाने वाले कई गोरे इसी सोच के तहत विवाह करवाते रहते हैं पर मैंने विक्टर को सबक सिखा दिया।''
''अब कहाँ है ?''
''पूरबी लंडन में कहीं रहता है। आता है कभी कभी। उसकी गर्ल-फ्रेंड भी होती है साथ। वह बहुत अच्छी है। मुझसे बहुत प्यार करती है। क्लेयर और मार्क से भी।
जुआइस का घर आ गया। अन्दर से कुत्ते के भौंकने की आवाज़ आई। उसने दरवाजा खोला तो गंदी-सी गंध का एक झोंका उसके मुँह पर आकर बजा और दौड़ता आता कुत्ता उनके पैरों में लेटने लगा। जुआइस बोली-
''यह मिल्की है। बहुत अक्लमंद जानवर है। मेरा तो यह बच्चा है।''
फिर दौड़ती हुई दो बिल्लियाँ उनके सामने से गुजरीं और सीढ़ियाँ चढ़ गईं। शिन्दे ने नाक पर हाथ रख लिया। जुआइस पूछने लगी-
''तुझे पालतू जानवरी अच्छे नहीं लगते ?''
''लगते हैं, पर अगर जगह खुली हो तो।''
''हाँ, वैसे मेरा गार्डन भी बड़ा है। बाहर मैंने खरगोशों का दरबा बनाया हुआ है। मेरे पास दस खरगोश होंगे कुल।''
शिन्दे ने खरगोशों में कोई उत्साह नहीं दिखाया कि कहीं वह उसे उनका दरबा दिखाने ही न ले जाए। गोट करी खाने का अब मूड ही नहीं रहा था। वह सोच रहा था कि इतने गंद में तो कुछ भी नहीं खाया जा सकता। जुआइस ने कहा-
''तू सैटी पर बैठ, मैं खाना गरम करती हूँ।''
''जुआइस, सच बात तो यह है कि मुझे बिलकुल भी भूख नहीं है। तेरे आने से पहले ही खाना खाया था। मैं तो टाइम पास करने के लिए तेरे संग आ गया।''
''सच कहता है ?''
''बिलकुल सच।''
''कुछ पियेगा ?''
''हाँ, पी लूँगा।'' शिन्दे ने ज़रा सोचते हुए कहा।
शिन्दा सैटी पर बैठने को हुआ लेकिन वह तो कुत्ते के बालों से भरी पड़ी थी। इसलिए वह खड़ा ही रहा। जुआइस रम और कोक गिलासों में डालकर ले आई। एक गिलास शिन्दे को थमाया। उसने एक ही साँस में गिलास खाली करके वापस कर दिया। जुआइस बोली-
''जल्दी किस बात की है ! बैठ ज़रा दस मिनट।''
शिन्दा सैटी पर बैठने से झिझक रहा था। जुआइस समझ गई। वह सैटी झाड़ते हुए बोली-
''ये मिल्की के बाल ही हैं, सुइयाँ तो नहीं।''
शिन्दा सैटी पर बैठ गया। उसने टांगें मेज पर रख लीं। जुआइस एक पैग और उसके लिए बना लाई। शिन्दे ने आँखें मूंद लीं। इस तरह वह इंग्लैंड में आकर पहली बार बैठा था। जुआइस उसके समीप बैठ गई। उसके कंधे पर हाथ फेरते हुए कहने लगी-
''घर कितना याद आता है ?''
''बहुत ज्यादा।''
''कितने बच्चे हैं तेरे ?''
''तीन, बहुत ही प्यारे।''
''फोन करता है ?''
''थोड़ा-बहुत ही, पर चिट्ठियाँ आती जाती रहती हैं।''
''तेरी पत्नी कैसी है ?''
''बहुत सुन्दर, बहुत प्यारी।''
कहकर शिन्दे ने जुआइस की तरफ देखा। उसके मोटे-मोटे काले होंठ अब उसे सुन्दर लगने लगे थे। जुआइस की आँखों में मिन्दो की आँखों जैसा कुछ था। शिन्दे के दिल ने चाहा कि काश आज मिन्दो यहाँ होती। उसे उसका कितना सहारा होता। जुआइस उसकी ओर लगातार देखे जा रही थी। शिन्दे से भी नज़रें हटाना नहीं हुआ। इतने मोह से तो उसे सिर्फ़ मिन्दो ही देख सकती थी। शिन्दे की आँखें भर आईं। जुआइस उसके आँसू पोंछती हुई बोली-
''घबरा मत शैनी, इस मुल्क में सारी दुनिया ही अकेली है, मैं भी...। देख, यहाँ मेरा कोई भी नहीं। मैं अकेली पराये देश में और पराये लोगों के बीच बैठी बच्चे पाल रही हूँ।''
कहकर उसने शिन्दे की छाती पर अपना सिर रख दिया। शिन्दे ने उसे अपने साथ कस लिया।
शिन्दा वापस आया तो सारे ही उससे मजाक करने लगे। सतनाम ने पूछा-
''क्यों भई... कैसे कुछ... ?''
''न, वहाँ तो बदबू ही बहुत आती है।''
संध्या समय जुआइस सफाई करने के लिए समय से आ गई और चुपचाप काम करने लग पड़ी। सतनाम कुछ देर उसकी ओर देखता रहा और फिर बुदबुदाया, ''यह तो भाई शिन्दे ने लगा दी...।''
(जारी…)
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लेखक संपर्क :
67, हिल साइड रोड,
साउथाल, मिडिलसेक्स, इंग्लैंड
दूरभाष : 020-85780393,07782-265726(मोबाइल)

शनिवार, 1 जनवरी 2011

गवाक्ष – जनवरी 2011



मित्रो, सर्वप्रथम आप सभी को नव वर्ष 2011 की बहुत बहुत शुभकामनाएँ ! हर वर्ष की भाँति इस वर्ष भी हम सबको यही कामना और प्रार्थना करनी चाहिए कि यह नया साल घृणा, द्बेष, नफ़रत, आतंक, विध्वंश से रहित हो और इसके स्थान पर प्रेम, सौहार्द, अमन-चैन और खुशहाली को स्थापित करने वाला हो। इस नये वर्ष में हम सब मिलकर प्रकृति और जीवन को नष्ट करने वाली हर गतिविधि का विरोध करें और इन्हें और अधिक बेहतर और खुशहाल बनाने की प्रक्रिया में संलग्न हों…

जनवरी 2008 में मैंने “गवाक्ष” ब्लॉग की शुरूआत की थी। दो वर्ष का सफ़र पूरा करके यह तीसरे वर्ष की यात्रा में प्रवेश कर रहा है। “गवाक्ष” ब्लॉग के पीछे मेरी मंशा यह थी कि इस ब्लॉग के माध्यम से हिन्दी ब्लॉग-प्रेमियों को हिन्दी/पंजाबी के उन प्रवासी लेखकों/कवियों की समकालीन रचनाओं से रू-ब-रू करवाया जाए जो अपने वतन हिन्दुस्तान से कोसों दूर बैठकर अपने समय और समाज के यथार्थ को अपनी रचनाओं में ईमानदारी से रेखांकित में लगे हुए हैं। “गवाक्ष” का यही उद्देश्य आगे भी जारी रहेगा। इसमें केवल उन्हीं रचनाकारों की रचनाएं प्रकाशित होंगी जो अपने वतन की मिट्टी से कोसों दूर बैठकर सृजनरत हैं। “गवाक्ष” में अब तक विशाल (इटली), दिव्या माथुर (लंदन), अनिल जनविजय (मास्को), देवी नागरानी(यू.एस.ए.), तेजेन्द्र शर्मा(लंदन), रचना श्रीवास्तव(लंदन), पूर्णिमा वर्मन(दुबई), इला प्रसाद(यू एस ए), भगत धवन (डेनमार्क), चाँद शुक्ला (डेनमार्क), वेद प्रकाश ‘वटुक’(यू एस ए), रेखा मैत्र (यू एस ए), तनदीप तमन्ना (कनाडा), प्राण शर्मा (यू के), सुखिन्दर (कनाडा), सुरजीत(कनाडा), डॉ सुधा धींगरा(अमेरिका), मिन्नी ग्रेवाल(कनाडा), बलविंदर चहल (न्यूजीलैंड), बलबीर कौर संघेड़ा(कनाडा), शैल अग्रवाल (इंग्लैंड), श्रद्धा जैन (सिंगापुर), डा. सुखपाल(कनाडा), प्रेम मान(यू.एस.ए.), (स्व.) इकबाल अर्पण, सुश्री मीना चोपड़ा (कनाडा), डा. हरदीप कौर संधु(आस्ट्रेलिया), डा. भावना कुँअर(आस्ट्रेलिया), अनुपमा पाठक (स्वीडन) आदि की रचनाएं और पंजाबी कथाकार-उपन्यासकार हरजीत अटवाल के उपन्यास “सवारी” के हिंदी अनुवाद की बत्तीसवीं किस्त आपने पढ़ीं। “गवाक्ष” के जनवरी 2011 अंक में प्रस्तुत हैं – संयुक्त अरब इमारात से पूर्णिमा वर्मन की कविताएं तथा हरजीत अटवाल के धारावाहिक पंजाबी उपन्यास “सवारी” की तैंतीसवीं किस्त का हिंदी अनुवाद…

संयुक्त अरब इमारात से
पूर्णिमा वर्मन की कविताएँ

सर्द मौसम- बारह क्षणिकाएँ
कविताओं के साथ सभी चित्र : पूर्णिमा वर्मन
1

धुंध बादल
और ये पेड़ों पे पतझड़
सर्दियों में डूबते दिखते हैं
दिन भी

2

एक हिम सागर
धरा पर
और पत्तों को उतारे
एक तरुवर
दूधिया सूरज नहाता

3

इस अकेली शाम का
मतलब न पूछो
सर्द मौसम
और फैला दूर तक
एकांत सागर
एक पुल
थामे हुए हमको हमेशा

4

धूप की खिड़की
और सर्दी से भरा दिन
बंद अलमारी दुखों की
और पर्दों से बरसती
आस खुशियों की

5

आज
फुर्सत का कोई पल
दूर सूरज गुनगुनाए
सर्द मौसम को थपक
जैसे सुलाए

6

हरी छाँहों में बसी है
गंध सर्दी की
बहुत नम
पारदर्शी याद जैसे
कनक शबनम

7

एक मेपल पात
पियरा
देस से परदेस तक
सर्दी का मौसम जोड़ता है
मुदित जियरा

8

खुशनुमा
सर्दी का मौसम
धरा सागर
और
हिम लिपटी ये बटियाँ
दूर खुलता बादलों में से उजाला

9

पाँव में पायल या सिर पर बोझ
मौसमों से
नहीं रुकते काम
समय को साँटना भी और
जीवन साधना भी है

10

आग है तो आस है
सर्द मौसम
पार करने की
जो मन में चाह है
एक प्याली चाह में वह ताप है

11

धूप नहाया शहर और
मौसम जाड़े का
आतप झरती काँच
और खिड़की मनभावन

12

देवदारों से
ढँकी यह राह
धुँध में घिरता हुआ दिन
सर्द सन्नाटा
और झरती डालियाँ धीमे
000
जन्म : 27 जून 1955
शिक्षा : संस्कृत साहित्य में स्नातकोत्तर उपाधि, स्वातंत्र्योत्तर संस्कृत साहित्य पर शोध, पत्रकारिता और वेब डिज़ायनिंग में डिप्लोमा।
कार्यक्षेत्र : पीलीभीत (उत्तर प्रदेश, भारत) की सुंदर घाटियों जन्मी पूर्णिमा वर्मन को प्रकृति प्रेम और कला के प्रति बचपन से अनुराग रहा। मिर्ज़ापुर और इलाहाबाद में निवास के दौरान इसमें साहित्य और संस्कृति का रंग आ मिला। पत्रकारिता जीवन का पहला लगाव था जो आजतक साथ है। खाली समय में जलरंगों, रंगमंच, संगीत और स्वाध्याय से दोस्ती।
संप्रतिपिछले बीस-पचीस सालों में लेखन, संपादन, स्वतंत्र पत्रकारिता, अध्यापन, कलाकार, ग्राफ़िक डिज़ायनिंग और जाल प्रकाशन के अनेक रास्तों से गुज़रते हुए फिलहाल संयुक्त अरब इमारात के शारजाह नगर में साहित्यिक जाल पत्रिकाओं 'अभिव्यक्ति' और 'अनुभूति' के संपादन और कलाकर्म में व्यस्त।
प्रकाशित कृतियाँ : कविता संग्रह : वक्त के साथ (वेब पर उपलब्ध)ई मेल: abhi_vyakti@hotmail.com

धारावाहिक पंजाबी उपन्यास(किस्त- 33)



सवारी
हरजीत अटवाल
हिंदी अनुवाद : सुभाष नीरव

॥ अड़तीस ॥
इंडिया में बैठा शिन्दा भाइयों के पास इंग्लैंड आने के लिए उतावला होता। पिता की मृत्यु पर जब आने की तैयारी कर रहा था तो उसका मन पूरी तरह उमंग से भरा हुआ था। घर में अफ़सोस करने आए लोगों की परवाह भी वह भूल जाता। यहाँ पहुँचकर भी वह खुश था। पिता की मृत्यु का दुख था जो शीघ्र ही खत्म हो गया और अंतिम संस्कार के बाद शिन्दा इंग्लैंड के आनन्द को महसूस करने की रौ में आ गया। उसका आनन्द पौंड कमाने में ही था। पौंडों के लिए काम ज़रूरी था।
दुकान में तो वह आते ही काम में हाथ डालने लगा था। दुकान का काम उसको बहुत बढ़िया लगा। इंडिया गए लोग अपने भारी कामों की कहानियाँ सुना सुनाकर यूँ ही डराते रहते थे। दुकान का काम कहीं से भी भारी नहीं था। घंटे ही ज्यादा होते, और कुछ नहीं। सोहन सिंह के संस्कार तक तो शिन्दा जैसे भीड़ में घिरा रहा। बलदेव आ जाता और सतनाम भी। दूसरे गाँवों के लोग अफ़सोस प्रकट करने के लिए आते और मिलते रहते। गाँवों की बातें चल पड़तीं। सब अच्छा लगता। संस्कार के बाद वह एकदम अकेला हो गया। बलदेव तो अब जैसे आता ही नहीं था। सतनाम भी इतवार को आता और अजमेर के संग पब में जा घुसता। गुरिंदर भी अधिक बात न करती। वह बच्चों के संग अपने बच्चों की तरह खेलना चाहता, पर वे उसे बुलाते ही नहीं थे। अपितु उसकी बात पर मजाकिया लहजे में हँसने लग पड़ते।
उसे शीघ्र ही महसूस होने लग पड़ा था कि वह घर का तुच्छ-सा जीव था जबकि इंडिया में वह घर का मुखिया था। उसे गागू बहुत याद आने लगता जो कि उसका बहुत कहना मानता था। इसी तरह दोनों बेटियाँ भी। मिन्दो कभी रूठती तो कभी मान जाती, पर वह एक दबका मारता तो पानी की तरह उसके आगे घूमती फिरती। कभी कभी सक्क का दातुन करती तो गोरे रंग पर लाल अधर बहुत उभरते। यदि कभी शिन्दा रूठ जाता तो उसे सौ सौ नखरे करके मनाती। अब यह सब बहुत पीछे रह गया था। हज़ारों मील दूर। पर वह सारे फ्रीज हुए क्षण उसके सपनों में या ख़यालों में पिघल कर बहते और उसको तंग करते। उसकी नींद टूट जाती। जागता होता तो मन उचाट हो जाता।
उसे अपना रोजाना का रूटीन जो उसे पहले अच्छा लगता था, अब उबाऊ लगने लग गया था। सवेरे उठकर दुकान खोलता और रात के ग्यारह बजे तक खड़ी टांग रहता। ज्यादातर वास्ता उसका टोनी के साथ पड़ता था। टोनी से वास्ता पड़ने के कारण ही अंग्रेजी भी जल्दी सीख गया। उसके रूटीन में उसकी अपनी कोई मर्जी नहीं होती थी। वह फिल्मों का शौकीन था। इंडिया में होता था तो वीडियो घर मंगवा कर फिल्म देखता। नई लगी फिल्म का पहला शो देखने जालंधर या होशियारपुर जा पहुँचता। लेकिन यहाँ कभी टेलीविज़न के आगे बैठ ही नहीं सका था। यदि कभी बैठता तो बच्चे अपना प्रोग्राम देख रहे होते। यदि कभी कुछ देख भी रहा होता तो बच्चे एकदम चैनल बदल देते।
इंडिया में उसे बढ़िया कपड़े पहनने का बहुत शौक था। कभी क्रीज़ नहीं मरने देता था। पर अब वही ट्राउजर सवेरे उठकर टांगों में फंसाता और दुकान में आ घुसता। इंडिया से आते वक्त वह सोचा करता कि इंग्लैंड में आकर अजमेर की तरह पगड़ी ही बांधा करेगा। जब से सिगरेट की लत पड़ी तो उसने बाल कटवा दिए थे। वैसे ही कभी कभी शौकिया पगड़ी बांध लेता। उसका पासपोर्ट भी पगड़ी वाला था, पर यहाँ आकर उसे सतनाम का चेहरा पसंद था, बिलकुल क्लीन शेव्ड। एक दिन उसने भी कुछ वक्त लगाकर शेव कर मारी। उस दिन सतनाम और बलदेव भी संयोग से आए हुए थे। सतनाम का स्वभाव पहले ही मखौल करने वाला था। वह कहने लगा-
''ओए, यह क्या खुसरे की ऐड़ी जैसा मुँह निकाले फिरता है।''
''क्यों, अच्छा नहीं लगता ?''
''अच्छा तो लगता है, बल्कि बहुत अच्छा लगता है, पर अगर किसी गोरे ने पप्पी मांग ली तो हमारी बेइज्ज़ती तो हो जाएगी न।''
उसकी बात सुनकर सभी हँस पड़े। बलदेव बोला-
''अगर गोरे ने मांग ली तो निभ जाएगा, पर अगर कोई काला पीछे पड़ गया तो इसका क्या बनेगा।''
इस बात पर सब तरफ हँसी दौड़ गई। शिन्दा शर्मिन्दा सा हो गया और उसने फिर से पहले जैसी चोंच दाढ़ी रख ली। इंडिया में वह ड्राइवरों जैसा चेहरा-मोहरा बनाकर रखता था। खड़े बाल और चोंचवाली दाढ़ी। खैणी भी खा लेता था और सिगरेटें भी पी लेता, पर जब धार्मिक लहर चली तो सब छोड़ दिया था। अब टोनी को पीते देख उसका दिल करने लगता था। अजमेर सिगरेटों के बहुत खिलाफ़ था। इसलिए शिन्दे की हिम्मत न पड़ती। उस दिन बलदेव की कार में भी डरते हुए ही स्मोक किया था कि घर जाने पर किसी किस्म की गंध के कारण कोई मुसीबत ही न खड़ी हो जाए।
बलदेव भी बहुत बदल गया था। उसे कभी बलदेव अपने बहुत करीब प्रतीत होता था। पर अब वह पहले जैसा नहीं रहा था। वैसे भी उसकी हरकतें शिन्दे को अजीब लगतीं। वह दरियाओं के बारे में ही बातें करता रहता। शिन्दे को लगता कि विवाह के टूट जाने के कारण वह मानसिक तौर पर हिल गया था। बलदेव का गोरी के साथ रहना भी उसको अच्छा नहीं लगा था। फिर जब वह गोरी किसी दूसरे आदमी के साथ दुकान में कुछ खरीदने आई तो शिन्दा बहुत दुखी हुआ था। लोगों का यह कहना था कि गोरी औरतें भरोसेवाली नहीं होतीं, बहुत सच लगा था। इस बात से सतनाम ठीक था। बाहर कहीं मुँह नहीं मारता था। जहाँ सतनाम हर वक्त मजाक के मूड में रहता, वहीं अजमेर सदैव रौब डालता रहता। उसका स्व उसे सजग करता रहता कि मैं ही मैं हूँ।
अजमेर जो कहता, वह सत्य वचन कहकर मान लेता था। उसकी बातें शिन्दे को तंग भी करती, पर वह उफ्फ नहीं करता था। जिस दिन उसने पचास पौंड हफ्ता देने की बात सुनाई, वह भी उस दिन से जबसे शिन्दा आया था तो उसे अजमेर से सारे गिले भूल गए।
अजमेर ने पूछा, ''तू खुश भी है... ये पचास तेरे बचेंगे ही, बाकी का तेरा सारा खर्चा मैंने ही करना है।''
''भाजी, जैसा आपने कर दिया, ठीक ही है। मुझे तुम्हारी बात पसन्द है। तुमने सदा मेरा भला ही सोचना है।''
सतनाम ने बताया हुआ था कि इसे मान देता रहा कर। अजमेर ने आगे कहा, ''यह अब तू देख कि पैसे तूने लेने हैं या सीधे मिन्दो को भेजें।''
''भाजी, उसे ही भेज दो।''
''ऐसा न हो कि यहाँ से पैसे जाते रहें और वो वहाँ खर्च करती रहे। मुझे पता है कि उसका हाथ ज़रा खुला है।''
''नहीं भाजी, वह ऐसी नहीं है। घर के खर्चे ही बहुत हैं। तीन बच्चे पढ़ते हैं। ज़मीन तुम्हें पता ही है कि कितनी है। हमारा घर तो तुम्हारे सिर पर ही चलता था, पहले भी और अब भी।''
अजमेर खुश हो गया। वह मिन्दो को पैसे भेजने के बारे में सोचने लगा। मिन्दो की चिट्ठी भी आई हुई थी। पैसों की मांग की थी।
शिन्दे को ख़त आते रहते थे। वह भी जवाब देता रहता। गागू उसे अलग चिट्ठी लिखता और दोनों लड़कियाँ अलग। कभी कभी शिन्दा फोन भी कर लेता। फोन मंहगा पड़ता था। अजमेर आँखें निकालने लगता था। फिर फोन करने -सुनने के लिए मिन्दो को बाहर आना पड़ता था। यह भी शिन्दे को पसन्द नहीं था।
अजमेर की अन्य किसी बात का तो वह बुरा न मनाता, पर उसका शकी स्वभाव उसे बहुत बुरा लगता था। टोनी पर शक करता, उसे अकेले गल्ले पर अकेला न छोड़ता। ऐसे ही बलदेव भी उससे खफ़ा था। शिन्दा गल्ले पर खड़ा होता तो टोनी के कान में कुछ कहने लगता। शिन्दा जला-भुना बियर का डिब्बा खोल लेता। कई बार बाहर से लौटा अजमेर पूछता कि उसके पीछे कौन कौन दुकान में आए थे। उसका अर्थ यह होता कि कहीं शिन्दा पैसे निकालकर ही न किसी को पकड़ाता रहा हो। बलदेव तो दुकान में आता ही कम था। उसका इशारा सतनाम की तरफ ही अधिक होता।
उस दिन शिन्दे को बहुत तकलीफ़ हुई थी जिस दिन बियर की छोटी सी बोतल की चोरी के कारण अजमेर ने उसे अपमानित किया था। दुकान में वह अकेला किधर किधर हो सकता था। उस दिन के बाद शिन्दे ने सोच लिया था कि छोटी मोटी चोरी के बारे में वह अजमेर को बताएगा ही नहीं। कई बार टोनी की गर्ल फ्रेण्ड आती तो टोनी बियर उसे देकर शिन्दे को पैसे देने लगता। शिन्दा अब लेने से इन्कार करने लगा था। ऐसे ही टोनी की बेटी भी अपने किसी न किसी ब्वॉय फ्रेण्ड को लेकर आ जाती, अब शिन्दा उसको थोड़ी-बहुत रियायत कर देता।
मुनीर और प्रेम शर्मा का दुकान में आना उसे अच्छा लगता था। मुनीर उससे खालिस्तान की बातें करने लगता। इस लहर के बारे में बात छेड़ते हुए मुनीर कहता-
''इसी तहरीक से सिक्खों का भला होसी।''
''भला तो पता नहीं किसका होगा, पर पंजाब मे आम बंदे की हालत बहुत बुरी है, अंधी को बहरा घसीटे फिरता है।''
''जो भी होसी, पर खालिस्तान तो बणसी।''
''मीआं, सब अखबारी रौले हैं।''
''शिन्दे, तुझे पता ना होसी, कभी साउथाल जाके देख, पूरा खालिस्तान बना है।''
''ये साउथाल कहाँ है ?''
शिन्दा कहता और फिर सोचने लगता कि अब बलदेव आया तो कहूँगा कि साउथाल लेकर चले। पर बलदेव लौटकर उसे चक्कर लगवाने के लिए लेकर ही न गया।
एक दिन प्रेम शर्मा उससे पूछने लगा-
''शिन्दे, कैसे स्टे मिल गई।''
''कैसी स्टे ?''
''यही, पुलिटिकल असाईलम की।''
''पता नहीं, भाजी को पता है।''
''अप्लाई तो कर रखा है ?''
''यह भी भाजी को ही पता है।''
''देखना कहीं....। यह तो जल्दी से जल्दी कर देना चाहिए।''
रात में उसने अजमेर से बात करते हुए कहा-
''आज प्रेम पूछ रहा था कि असाईलम के लिए अप्लाई किया कि नहीं। पक्के होने के बहुत चांस हैं।''
उसकी बात सुनकर अजमेर गुस्से में आकर बोला-
''जब हम खालिस्तानी है ही नहीं तो.... इस बामण की टांगें तो मैं चीरूंगा।''
(जारी…)
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लेखक संपर्क :
67, हिल साइड रोड,
साउथाल,
मिडिलसेक्स, इंग्लैंड
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मंगलवार, 7 दिसंबर 2010

गवाक्ष – दिसंबर 2010



“गवाक्ष” ब्लॉग के माध्यम से हम हिन्दी ब्लॉग-प्रेमियों को हिन्दी/पंजाबी के उन प्रवासी लेखकों/कवियों की समकालीन रचनाओं से रू-ब-रू करवाने का प्रयास करते आ रहे हैं जो अपने वतन हिन्दुस्तान से कोसों दूर बैठकर अपने समय और समाज के यथार्थ को अपनी रचनाओं में रेखांकित कर रहे हैं। “गवाक्ष” में अब तक विशाल (इटली), दिव्या माथुर (लंदन), अनिल जनविजय (मास्को), देवी नागरानी(यू.एस.ए.), तेजेन्द्र शर्मा(लंदन), रचना श्रीवास्तव(लंदन), पूर्णिमा वर्मन(दुबई), इला प्रसाद(यू एस ए), भगत धवन (डेनमार्क), चाँद शुक्ला (डेनमार्क), वेद प्रकाश ‘वटुक’(यू एस ए), रेखा मैत्र (यू एस ए), तनदीप तमन्ना (कनाडा), प्राण शर्मा (यू के), सुखिन्दर (कनाडा), सुरजीत(कनाडा), डॉ सुधा धींगरा(अमेरिका), मिन्नी ग्रेवाल(कनाडा), बलविंदर चहल (न्यूजीलैंड), बलबीर कौर संघेड़ा(कनाडा), शैल अग्रवाल (इंग्लैंड), श्रद्धा जैन (सिंगापुर), डा. सुखपाल(कनाडा), प्रेम मान(यू.एस.ए.), (स्व.) इकबाल अर्पण, सुश्री मीना चोपड़ा (कनाडा), डा. हरदीप कौर संधु(आस्ट्रेलिया), डा. भावना कुँअर(आस्ट्रेलिया) आदि की रचनाएं और पंजाबी कथाकार-उपन्यासकार हरजीत अटवाल के उपन्यास “सवारी” के हिंदी अनुवाद की इकत्तीसवीं किस्त आपने पढ़ीं। “गवाक्ष” के दिसंबर 2010 अंक में प्रस्तुत हैं – स्वीडन से अनुपमा पाठक की कविताएं तथा हरजीत अटवाल के धारावाहिक पंजाबी उपन्यास “सवारी” की बत्तीसवीं किस्त का हिंदी अनुवाद…

स्वीडन से
अनुपमा पाठक की कविताएँ


॥एक॥
इंसानियत का आत्मकथ्य


गुजरती रही सदियाँ
बीतते रहे पल
आये
कितने ही दलदल
पर झेल सबकुछ
अब तक अड़ी हूँ मैं!
अटल खड़ी हूँ मैं!

अट्टालिकाएं करें अट्टहास
गर्वित उनका हर उच्छ्वास
अनजान इस बात से कि
नींव बन पड़ी हूँ मैं!
अटल खड़ी हूँ मैं!

देख नहीं पाते तुम
दामन छुड़ा हो जाते हो गुम
पर मैं कैसे बिसार दूं
इंसानियत की कड़ी हूँ मैं!
अटल खड़ी हूँ मैं!

जब जब हारा तुम्हारा विवेक
आये राह में रोड़े अनेक
तब तब कोमल एहसास बन
परिस्थितियों सेलड़ी हूँ मैं!
अटल खड़ी हूँ मैं!

भूलते हो जब राह तुम
घेर लेते हैं जब सारे अवगुण
तब जो चोट कर होश में लाती है
वो मार्गदर्शिका छड़ी हूँ मैं!
अटल खड़ी हूँ मैं!

मैं नहीं खोयी खोया है तुमने वजूद
इंसान बनो इंसानियत हो तुममें मौजूद
फिर धरा पर ही स्वर्ग होगा
प्रभुप्रदत्त नेयमतों में, सबसे बड़ी हूँ मैं!
अटल खड़ी हूँ मैं!
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॥दो॥
ऐसा हो...!!!


मान-अभिमान से परे
रूठने-मनाने के सिलसिले सा
कुछ तो भावुक आकर्षण हो!

किनारे पर रेत से घर बनाता
और अगले पल उसे तोड़ छोड़
आगे बढ़ता सा
भोला भाला जीवन दर्शन हो!

नमी सुखाती हुई
रुखी हवा के विरुद्ध
नयनो से बहता निर्झर हो!

परिस्थितियों की दुहाई न देकर
अन्तःस्थिति की बात हो
शाश्वत संघर्ष
आत्मशक्ति पर ही निर्भर हो!

भीतर बाहर
एक से...
कोई दुराव-छिपाव नहीं
व्यवहारगत सच्चाइयां
मन प्राण का दर्पण हो!

सच के लिए
लड़ाई में
निजी स्वार्थों के हाथों
कभी न आत्मसमर्पण हो!
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॥तीन॥
कविता
बनती रहे कविता
शब्द थिरकते रहे अपनी लय में
भाव नित परिमार्जित होता रहे अपने वेग से
लेखक और पाठक...संवेदना के एक ही धरातल पर हो खड़े
भेद ही मिट जाये...
फिर सौंदर्य ही सौंदर्य है इस विलय में!!!!

जीने के लिए जमीन के साथ-साथ
आसमान का होना भी जरूरी है
धरती पे रोपे कदम...सपने फ़लक पे भाग सकें
फिर सृजन की संभावनाएं पूरी हैं
हो विश्वास का आधार...हो स्नेह का अवलंब
नहीं तो नैया डूब जाती है संशय में!!!!

बहती रहे कविता सरिता की तरह
शब्द थिरकते रहे अपनी लय में
जीवन की आपाधापी में कुछ क्षणों का अवकाश हो
कुछ लम्हे एकाकी से पास हो
निहारने को आसपास बिखरी अद्भुत रश्मियाँ...
और डूब जाने को विष्मय में!!!!

यही तो सहेजा जायेगा...
और शब्दों में सजकर नयी आभा में प्रगट हो पायेगा
एक पल की अनुभूति का मर्म
विस्तार को प्राप्त हो नीलगगन की गरिमा पायेगा
ये कालजयी भावनाएं ही बच जाएँगी...
नहीं तो...यहाँ कहाँ कुछ भी बच पाता है प्रलय में!!!!
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अनुपमा पाठक जमशेदपुर से हैं और बचपन से कविताएँ लिखती रही हैं। रचनाओं का संकलन नहीं हो पाया। अभी कुछ समय से अपनी वेबसाइट “अनुशील” http://www.anusheel.in/ पर लिख रही हैं। शिक्षा जमशेदपुर में ही हुई, फिर वाराणसी से बोटनी में स्नातक की डिग्री ली और फिर बॉयो-इनफॉर्मेटिक में परास्नातक। एक वर्ष विद्यालय में अध्यापन कार्य भी किया। अध्ययन –अध्यापन में रूचि है। बॉयो-इनफार्मेटिक में पी.एचडी के लिए प्रयासरत। फिलहाल, गत एक वर्ष से स्टॉकहॉम ( स्वीडन ) में रह रही हैं।
ईमेल : anupama623@gmail.com
anushil623@rediffmail.com
वेब साइट : http://www.anusheel.in/

धारावाहिक पंजाबी उपन्यास(किस्त- 32)



सवारी
हरजीत अटवाल
हिंदी अनुवाद : सुभाष नीरव

॥ सैंतीस ॥
कॉफी टेबल पर लोकल पेपर पड़ा था जो घरों में मुफ्त फेंका जाता था। बलदेव उठाकर पन्ने पलटने लगा। ख़बर तो ख़ास नहीं थी, बस विज्ञापनों से ही भरा पड़ा था। कारों के, घरों के और अन्य छोटी-मोटी सर्विसों के विज्ञापन। वह क्लैपहम में घरों की कीमतों का जायजा लेने लगा। उसे व्यस्त देखकर नील ने ख़बरों वाला चैनल बदलकर कार्टून लगा लिए। नील को देखकर बलदेव हँसने लगा। एलीसन ने भी नील को चैनल बदलते देख लिया था। वह बलदेव के समीप बैठते हुए बोली-
''डैरक के साथ इतने नहीं खुले थे ये, उससे डरते थे। वह मार भी देता था, पर तेरे संग तो मिक्स हो गए हैं।''
बलदेव समझ गया कि डैरक उसके पहले प्रेमी का नाम होगा। उसका मन होता था कि वह डैरक के विषय में कुछ पूछे क्योंकि शौन उसके बहुत खिलाफ़ रहा करता था, पर उसने सोचा कि अतीत में जाने का अधिक लाभ नहीं होता। एलीसन बुरा भी मान सकती थी।
एलीसन ने लोकल अख़बार 'न्यू टाइम्ज़' की ओर देखते हुए उससे पूछा-
''डेव, क्या ढूँढ़ रहा है ?''
''घर खरीदना है, देख रहा हूँ कि इस इलाके में कैसे घर हैं।''
''यहाँ तो ये विक्टोरियन जैसे घर है, पर क्लैपहम कॉमन में बहुत खूबसूरत घर हैं।''
''मेरा दिल करता है, दरिया के करीब खरीदूँ।''
''आज अचानक घर की सोच कैसे आ गई ?''
''एलीसन, मैं ज़रा सैटिल होना चाहता हूँ, बहुत देर भटक लिया।''
असल बात उसने बताई नहीं कि फेह और नील को देखकर उसे अपने बच्चे याद आते थे और सिमरन ने कहा था कि यदि लगातार लड़कियों को लेकर जाया करेगा तभी लेकर जाना। लड़कियों को लाने के लिए अपना घर भी चाहिए था। दूसरा भय उसे अपनी नौकरी का था कि छूट ही न जाए। नौकरी छूटने से पहले पहले वह घर ले लेगा तो मोर्टगेज आसानी से मिल जाएगी, नौकरी के बिना बैंक मोर्टगेज नहीं देते।
उनके बातचीत करते समय ही फोन की घंटी बजी। बलदेव फोन के करीब बैठा था। एलीसन ने कहा-
''डेव, देख तो ज़रा।''
उसने झिझकते हुए फोन उठाया। शौन का था। वह बोला-
''मैं तुझे इतने दिनों से ढूँढ़ता घूम रहा हूँ, कितनी बार ऐंडी के घर फोन किया और शैम की शॉप पर भी... चल अच्छा हुआ तू यहाँ मिल गया। एलीसन से तेरे बारे में पूछने के लिए ही फोन किया था मैंने।''
''सुना, कहाँ है ?''
''न्यूज़ीलैंड, तेरे कज़न के पास, कैराफेई।''
''क्या हाल है ग्रेवाल का और तेरा भी।''
''बहुत अच्छा। शराब का दौर चल रहा है।''
''काम करता है ?''
''काम की समस्या नहीं, काम तो मिल जाएगा। फार्मिंग के काम बहुत आसानी से मिल जाते हैं।''
''दिल लगा हुआ है ?''
''हाँ, ग्रेवाल की कम्पनी में दिल न लगे !'' कहकर शौन हँसने लगा।
फिर बलदेव ने ग्रेवाल से भी बातें कीं। उसने फोन रखा तो एलीसन बोली-
''देख, अपने दोस्त की बात, मेरे घर फोन किया और मेरे से हैलो तक नहीं की। यह पहले से ही ऐसा रहा, ख़ुदगर्ज़।''
''वह जल्दी में था, वहाँ बिल भी बहुत आता होगा।''
''यह भी ठीक है पर मैं इसे बचपन से जानती हूँ। ऐसा ही रहा है। मेरी ज़रूरत होगी तो आएगा, नहीं तो तू कौन, मैं कौन।''
''एलीसन, यूँ ही न मन खराब कर, ज़िन्दगी ऐसे ही चलती है।''
''डेव, मेरा मन अब खराब नहीं होता, हो चुका जितना होना था। मैंने बहुत कठिन समय देखा है। किसी ने मेरी मदद नहीं की, बल्कि उल्टा लड़ने आ जाता था। यह मैं जानती हूँ, अपनी ज़रूरत के कारण मेरे साथ सुलह की है।'' कहती हुई वह अपने घर से भागने की, यहाँ आकर देखी तकलीफ़ों की कहानी फिर से सुनाने लगी। बलदेव ने पूछा-
''एलीसन, तेरा दिल नहीं करता वैलजी जाने को ?''
''बहुत करता है पर एक तो मेरे बच्चे कौन संभालेगा ? दूसरे वहाँ मेरा स्वागत बिलकुल नहीं होगा।''
''इन्हें तू संग ही ले जाना।''
''मुझे तो पता नहीं कि वे बुलाएँगे भी कि नहीं। मेरे बच्चों को देखकर वे वैसे ही मर जाएँगे। वे तो यह समझे बैठे हैं कि मैं उनके घर में कभी पैदा ही नहीं हुई थी।'' कहकर एलीसन चुप हो गई। वह दूर आयरलैंड जा पहुँची थी। कुछ देर बाद कहने लगी-
''डेव, वे लोग बहुत साधारण बुद्धि वाले हैं। मेरी छोटी-सी बात को इतना बड़ा हादास बनाये फिरते हैं। वे यह नहीं समझते कि लंदन में पिचहत्तर फीसदी बच्चे बिना विवाह के पैदा होते हैं। विवाह की अब कद्र ही नहीं, एक काग़ज़ का टुकड़ा हाथ में पकड़ भी लो तो बहुत जल्दी तुम उसे फाड़ने लगते हो। विवाह के बग़ैर जोड़ों में समझ अधिक बनती है।''
''एलीसन, जो कुछ भी है, यदि तेरा मन वैलज़ी जाने को करता है तो फेह और नील को मैं संभाल लूँगा।''
''यह तो तेरा बड़प्पन है। मैं तो तेरी वैसे ही बहुत शुक्रगुजार हूँ कि तू मेरी बातें सुन लेता है, इतने साल हो गए, ये बातें मैं किसी के साथ भी नहीं कर सकी। डेव, मेरा घर जाने को, सबको देखने को बहुत दिल करता है, पर वे नहीं चाहते कि मैं आऊँ। कई बार मैं फोन पर बात करना चाहती हूँ तो वे फोन कट कर देते हैं।''
''तेरी बहन है, आयरीन, वह तुझे शायद समझती हो।''
''हाँ डेव, वह समझदार है, पर उसका पति कट्टर कैथोलिक है।''
''तू तो चर्च जाती है, फॉदर एडवर्ड क्या कहता है ?''
''डेव, वह भी यही बोली बोलता है। असल में तो यह चर्च की ही शिक्षा है, वहीं से तो सारे हुक्मनामे चला करते हैं।''
बलदेव को एलीसन से बातें करना अच्छा लगता था। यद्यपि एलीसन को राजनीति की बहुत समझ नहीं थी, पर ज़िन्दगी की मारें काफ़ी खाई हुई थीं। बच्चों को स्कूल छोड़कर एक कॉफ़ी शॉप में काम करने जाया करती थी और स्कूल बन्द होने तक वहीं काम किया करती। कुछ पैसे सोशल सिक्युरिटी की तरफ़ से मिलते थे। उसका गुजारा ठीक हो रहा था। वह बलदेव को इतनी सहजता से पैसे खर्च करने नहीं देती थी।
बलदेव अब क्लैपहम से ही काम पर जाता था। यहाँ से ट्यूब का सफ़र टफनल पॉर्क से भी कम था। वही नॉर्दन लाइन पर छठा स्टेशन। काम पर वह जाता ज़रूर था पर दिल अभी भी नहीं लग सका था। अभी भी उसे स्थायी सीट नहीं मिली थी। जो भी कोई छुट्टी पर होता, उसे उसके स्थान पर ही भेज दिया जाता। उसकी लम्बी सिक का केस अभी चल रहा था। जो भी मिलता, उससे उसके केस के बारे में पूछने लगता। उसे शोकॉज़ नोटिस मिला था कि तुझे काम पर से हटा क्यों न दिया जाए। उसने यूनियन की मार्फ़त हैड ऑफिस में अपील की थी, जहाँ उसे आस थी कि मुआफ़ीनामा देकर नौकरी बच जाएगी। लेकिन उसे अब इस नौकरी में कोई दिलचस्पी नहीं थी। यदि घर लेने का विचार न होता तो वह कभी का इस्तीफ़ा दे चुका होता।
घर तलाशने के लिए उसने लंदन का नक्शा खोला और साँप जैसे थेम्ज़ पर हाथ फेरने लगा। वॉलफोर्ड को उंगलियों से दरिया को छूता हुआ वह ग्रीनिच आ गया। फिर धीरे-धीरे फुल्हम आ पहुँचा। एक दिन उसने एलीसन और बच्चों को कार में बिठाया और फुल्हम के चक्कर लगाने लगा। कितनी ही सड़कें देखीं, सब एक जैसी लग रही थीं।
अगले रोज़ वह अकेला ही फुल्हम आया और कार एक तरफ़ खड़ी करके पैदल चलने लगा। पैदल चलना उसे सदैव ही अच्छा लगा करता था। वह थेम्ज़ के किनारे आ गया। यहाँ थेम्ज़ कुछ और ही तरह का लगता था। घर दरिया से हटकर थे। वह चाहता था कि उसका घर दरिया से इतना भर दूर हो कि मिनट भर में ही चलकर वह दरिया पहुँच सकता हो। यदि खिड़की से दिखाई देता हो तो सोने पर सुहागे वाली बात होगी। वह चलता हुआ एक पब के पास आ गया। पब की दीवार दरिया के साथ जा लगती थी। पानी के चढ़ने-उतरने के निशान दीवार पर दिखाई देते थे। चढ़ा हुआ दरिया यूँ प्रतीत होता होगा कि बेशक पानी चुल्लू में भर लो। यही सोचता हुआ वह पब में प्रवेश कर गया।
काफ़ी बड़ा पब था। अधिक लोग नहीं थे। जो थे भी, वे सभी चढ़ी उम्र के थे। उसने मन ही मन सोचा कि जैंटिलमैन पब होगा। वह आसपास देखता हुआ समझ गया कि इस पब में लोकल लोग ही अधिक आते होंगे। उसने लागर का गिलास भरवाया और दरिया की ओर खिड़की के पास बैठ गया। दरिया के पार रौशनियाँ जगमग-जगमग कर रही थीं। एक बड़ी किश्ती दरिया में से गुजरी। यह रौशनियों से भरी हुई थी और लोग खड़े होकर ड्रिंक कर रहे थे, आपस में बातें कर रहे थे। इसमें कोई पार्टी चल रही थी। एक बोट कुछ ड्रम-से खींचती हुई गुजरी। जैसे-जैसे शाम ढल कर रात की ओर बढी, पब भी भरने लगा।
भारी कदकाठी का एक व्यक्ति उसके सामने वाली सीट की ओर इशारा करता हुआ पूछने लगा-
''यहाँ कोई बैठा तो नहीं ?''
''नहीं।''
''बैठ सकता हूँ ?''
''क्यों नहीं।''
कहकर बलदेव उसकी ओर देखकर मुस्कराने लगा। वह व्यक्ति अपनी दाढ़ी पर हाथ फेरता हुआ बोला-
''मैं जैरी स्टोन हूँ।''
''और मैं डेव बैंज।''
''मैं तुम्हें पहली बार देख रहा हूँ, इसी इलाके में रहते हो ?''
''नहीं, इस इलाके में रहने की कोशिश कर रहा हूँ। इधर कहीं घर की तलाश कर रहा हूँ इसीलिए इलाका देखने आया रिवरसाइड आर्मज में आ बैठा।''
''यह बात बहुत अच्छी है, कोई इलाका देखने के लिए लोकल पब में चला जाए तो सब पता चल जाएगा। पर यहाँ लोग अन्य दूर-दराज इलाकों से भी आ जाते हैं।''
''जैरी, तुम इसी इलाके में रहते हो ?''
''हाँ, यहीं जन्मा, जवान हुआ और बूढ़ा हो रहा हूँ।'' कहकर जैरी हँसा।
बलदेव ने कहा, ''मैं दरिया के किनारे घर लेने का इच्छुक हूँ। दरिया किनारे ही मेरा काम है, ब्रिटिश रेल का हैड ऑफिस। और मेरा पहला घर जहाँ मेरी पत्नी बच्चों के संग अलहदगी के बाद रहती है, ग्रीनिच है, वो भी दरिया के बहुत करीब है।''
''हाँ डेव... पर इससे क्या फ़र्क़ पड़ता है। तुम दो दिन में तो दरिया के आदी हो जाते हो। हमारा मेन डीपू दरिया के ऐन किनारे पर है, मैं तो वहाँ बोर होने लगता हूँ।''
''क्या काम करते हो जैरी ?''
''मैं सेंट्रल गैस में साउथ ईस्ट का एरिया मैनेजर हूँ।''
''सेंट्रल गैस कौन सी ? सिलंडरगैस ?''
''हाँ, जो पेट्रोल पम्पों पर पड़े होते हैं।''
''मैं जानता हूँ। पहले मैं सोचा करता था कि घरों में तो नेचुरल गैस की सप्लाई है, ये सिलंडर कौन लेता होगा।''
''सभी ऐसा ही सोचते हैं, पर यह बिजनेस बहुत बड़ी स्केल पर चल रही है। हर एरिये में डीपू हैं इसके।''
''यहाँ किस रोड पर रहते हो ?''
''हार्ट ग्रोव पर... मेरे पिता का घर है यह। अब तो वह नहीं रहा और मैं ही मालिक हूँ। कैमला कहती है कि सफाई नहीं की जाती, घर बेचकर फ्लैट ले लेना है। और फिर मेरे सारे बच्चे चले गए, लड़की ही रहती है।''
''कितने बच्चे हैं ?''
''तीन। बड़ा लड़का, उसने अपना घर ले लिया है, काम करता है। छोटी लड़की है, वह अपने ब्वॉय फ्रेंड के साथ हमारे पास रहती है। उसका यह ब्वॉय फ्रेंड अच्छा नहीं है, मुझे नहीं पसन्द इसलिए मैंने उन्हें घर से चले जाने के लिए कह दिया है। इससे पहले वाला ब्वॉय फ्रेंड बहुत अच्छा था, मेरे साथ पब में भी आता था। सबसे छोटा मेरा लड़का है, उसे भी हमने घर से निकाल दिया है।''
''क्यों ?''
''क्योंकि वह सोलह साल का हो गया था, न तो वह हमें किराया देता था और न ही पढ़ता था। कैमला ने उसे चलता कर दिया।''
(जारी…)
००
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बुधवार, 3 नवंबर 2010

गवाक्ष – नवंबर 2010


“गवाक्ष” ब्लॉग के माध्यम से हम हिन्दी ब्लॉग-प्रेमियों को हिन्दी/पंजाबी के उन प्रवासी लेखकों/कवियों की समकालीन रचनाओं से रू-ब-रू करवाने का प्रयास करते आ रहे हैं जो अपने वतन हिन्दुस्तान से कोसों दूर बैठकर अपने समय और समाज के यथार्थ को अपनी रचनाओं में रेखांकित कर रहे हैं। “गवाक्ष” में अब तक विशाल (इटली), दिव्या माथुर (लंदन), अनिल जनविजय (मास्को), देवी नागरानी(यू।एस.ए.), तेजेन्द्र शर्मा(लंदन), रचना श्रीवास्तव(लंदन), पूर्णिमा वर्मन(दुबई), इला प्रसाद(यू एस ए), भगत धवन (डेनमार्क), चाँद शुक्ला (डेनमार्क), वेद प्रकाश ‘वटुक’(यू एस ए), रेखा मैत्र (यू एस ए), तनदीप तमन्ना (कनाडा), प्राण शर्मा (यू के), सुखिन्दर (कनाडा), सुरजीत(कनाडा), डॉ सुधा धींगरा(अमेरिका), मिन्नी ग्रेवाल(कनाडा), बलविंदर चहल (न्यूजीलैंड), बलबीर कौर संघेड़ा(कनाडा), शैल अग्रवाल (इंग्लैंड), श्रद्धा जैन (सिंगापुर), डा. सुखपाल(कनाडा), प्रेम मान(यू.एस.ए.), (स्व.) इकबाल अर्पण, सुश्री मीना चोपड़ा (कनाडा), डा. हरदीप कौर संधु(आस्ट्रेलिया) आदि की रचनाएं और पंजाबी कथाकार-उपन्यासकार हरजीत अटवाल के उपन्यास “सवारी” के हिंदी अनुवाद की तीसवीं किस्त आपने पढ़ीं। “गवाक्ष” के नवंबर 2010 अंक में प्रस्तुत हैं - डा. भावना कुँअर(आस्ट्रेलिया) की कविताएं तथा हरजीत अटवाल के धारावाहिक पंजाबी उपन्यास “सवारी” की इकत्तीसवीं किस्त का हिंदी अनुवाद…

आस्ट्रेलिया(सिडनी) से
डा. भावना कुँअर की कविताएँ

॥एक॥
दीये की व्यथा
(दीपावली पर विशेष)

शाम के वक्त
घर लौटते हुए
चौंका दिया मुझे एक
दर्द भरी आवाज़ ने
मैं नहीं रोक पाई स्वयं को
उसके करीब जाने से
पास जाकर देखा तो
बड़ी दयनीय अवस्था में
पड़ा हुआ था एक "मिट्टी का दीया"
मैंने उसको उठाकर
अपनी हथेली पर रखा
और प्यार से सहलाकार पूछा
उसकी कराहट का मर्म?
उसकी इस अवस्था का जिम्मेदार?
वह सिसक पड़ा
और टूटती साँसों को जोड़ता हुआ -सा
बहुत छटपटाहट से बोला-
मैं भी होता था बहुत खुश
जब किसी मन्दिर में जलता था
मैं भी होता था खुश जब
दीपावली से पहले लोग मुझे ले जाते थे अपने घर
और पानी से नहला-धुलाकर
बड़े प्यार से कपड़े से पौंछकर
सजाते थे मुझे तेल और बाती से
और फिर मैं
देता था भरपूर रोशनी उनको
झूमता था अपनी लौ के साथ
करता था बातें अँधियारों से
जाने कहाँ-कहाँ की मिट्टी को
एक साथ लाकर
कारीगर देता था एक पहचान हमें
"दीये की शक्ल"
और हम सब मिलजुलकर
फैलाते थे एक सुनहरा प्रकाश
पर अब
हमारी जगह ले ली है
सोने, चाँदी और मोम के दीयों ने
अब तो दीपावली पर भी लोग दीये नहीं
लगातें हैं रंग बिरंगी लड़ियाँ
और मिटा डाला हमारा अस्तित्व
एक ही पल में
तो फिर अब भी क्यों रखा है
नाम "दीपावली" यानी
दीयों की कतार?
आज फेंक दिया हमें
इन झाड़ियों में
तुम आगे बढ़ोगी
तो मिलेंगे तुम्हें मेरे संगी साथी
इसी अवस्था में
अपनी व्यथा सुनाने को
पर तुमसे पहले नहीं जाना किसी ने भी
हमारा दर्द, हमारी तड़प
आज वही भुला बैठे हैं हमें
जिन्हें स्वयं जलकर
दी थी रोशनी हमने
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॥दो॥
आँखें जाने क्यों

आँखें जाने क्यों
भूल गई पलकों को झपकना...
क्यों पसंद आने लगा इनको
आँखों में जीते-जागते
सपनों के साथ खिलवाड़ करना …
क्यों नहीं हो जाती बंद
सदा के लिए
ताकि ना पड़े इन्हें किसी
असम्भव को रोकना ।
०
॥तीन॥
स्याह धब्बे ...

आँखों के नीचे
दो काले स्याह धब्बे ...

आकर ठहर गए

और नाम ही नहीं लेते जाने का...
न जाने क्यों उनको
पसंद आया ये अकेलापन।
0

॥चार॥
दस हाइकु

1-भटका मन
गुलमोहर वन
बन हिरन।

2-नन्ही चिरैया
गुलमोहर पर
फुदकी फिरे।

3-जुगनुओं से
गुलमोहर वृक्ष
हैं झिलमिल।

4-था पल्लवित
मन मेरा -देखा जो
गुलमोहर।

5-मखमली सा
शृंगार किये,खिले
गुलाबी फूल।

6-झूम ‍ गाते हैं
खेत खलिहान भी
आया बंसत।

7-नटखट -सी
चंचला,लुभावनी
ऋतु बसन्त ।

8-दुल्हन बनी
पृथ्वी रानी,पहने
फूलों के हार।

9-खेत है वधू
सरसों हैं गहने
स्वर्ण के जैसे ।

10-रंग बिरंगी
तितलियों का दल
झूमता फिरे ।

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डॉ० भावना कुँअर
शिक्षा - हिन्दी व संस्कृत में स्नातकोत्तर उपाधि, बी० एड०, पी-एच०डी० (हिन्दी)
शोध-विषय - ' साठोत्तरी हिन्दी गज़लों में विद्रोह के स्वर व उसके विविध आयाम'।
विशेष - टेक्सटाइल डिजाइनिंग, फैशन डिजाइनिंग एवं अन्य विषयों में डिप्लोमा।
प्रकाशित पुस्तकें - 1. तारों की चूनर ( हाइकु संग्रह)
2. साठोत्तरी हिन्दी गज़ल में विद्रोह के स्वर
प्रकाशन - स्तरीय पत्र-पत्रिकाओं में कविता, कहानी, गीत, हाइकु, बालगीत, लेख, समीक्षा, आदि का अनवरत प्रकाशन। अनेक राष्ट्रीय एवं अन्तर्राष्ट्रीय अंतर्जाल पत्रिकाओं में रचनाओं एवं लेखों का नियमित प्रकाशन, अपने ब्लॉग http://dilkedarmiyan.blogspot.com पर अपनी नवीन-रचनाओं का नियमित प्रकाशन तथा http://drbhawna.blogspot.com/ पर कला का प्रकाशन अन्य योगदान
स्वनिर्मित जालघर - http://drkunwarbechain.blogspot.com/
http://leelavatibansal.blogspot.com/
सिडनी से प्रकाशित "हिन्दी गौरव" पत्रिका की सम्पादन समिति में
संप्रति - सिडनी यूनिवर्सिटी में अध्यापन
अभिरुचि- साहित्य लेखन, अध्ययन,चित्रकला एवं देश-विदेश की यात्रा
करना।
सम्पर्क - bhawnak2002@yahoo.co.in