सोमवार, 14 मार्च 2011

गवाक्ष – मार्च 2011

जनवरी 2008 “गवाक्ष” ब्लॉग के माध्यम से हम हिन्दी ब्लॉग-प्रेमियों को विदेशों में रह रहे हिन्दी/पंजाबी के उन लेखकों/कवियों की समकालीन रचनाओं से रू-ब-रू करवाने का प्रयास करते आ रहे हैं जो अपने वतन हिन्दुस्तान से कोसों दूर रहकर अपने समय और समाज के यथार्थ को अपनी रचनाओं में रेखांकित कर रहे हैं। “गवाक्ष” में अब तक विशाल (इटली), दिव्या माथुर (लंदन), अनिल जनविजय (मास्को), देवी नागरानी(यू.एस.ए.), तेजेन्द्र शर्मा(लंदन), रचना श्रीवास्तव(लंदन), पूर्णिमा वर्मन(दुबई), इला प्रसाद(यू एस ए), भगत धवन (डेनमार्क), चाँद शुक्ला (डेनमार्क), वेद प्रकाश ‘वटुक’(यू एस ए), रेखा मैत्र (यू एस ए), तनदीप तमन्ना (कनाडा), प्राण शर्मा (यू के), सुखिन्दर (कनाडा), सुरजीत(कनाडा), डॉ सुधा धींगरा(अमेरिका), मिन्नी ग्रेवाल(कनाडा), बलविंदर चहल (न्यूजीलैंड), बलबीर कौर संघेड़ा(कनाडा), शैल अग्रवाल (इंग्लैंड), श्रद्धा जैन (सिंगापुर), डा. सुखपाल(कनाडा), प्रेम मान(यू.एस.ए.), (स्व.) इकबाल अर्पण, सुश्री मीना चोपड़ा (कनाडा), डा. हरदीप कौर संधु(आस्ट्रेलिया), डा. भावना कुँअर(आस्ट्रेलिया), अनुपमा पाठक (स्वीडन), आदि की रचनाएं और पंजाबी कथाकार-उपन्यासकार हरजीत अटवाल के उपन्यास “सवारी” के हिंदी अनुवाद की चौंतिसवीं किस्त आपने पढ़ीं। “गवाक्ष” के मार्च 2011 अंक में प्रस्तुत हैं – लंदन से पंजाबी कवि-कथाकार शिवचरण जग्गी कुस्सा की कविताएँ तथा हरजीत अटवाल के धारावाहिक पंजाबी उपन्यास “सवारी” की पैंतीसवीं किस्त का हिंदी अनुवाद…


लंदन(यू के) से
पंजाबी कवि शिवचरण जग्गी कुस्सा की दो कविताएँ
हिंदी रूपान्तर : सुभाष नीरव

गर्व न कर तू

गर्व न कर तू
अपने बैंक में पड़े
लाखों डॉलरों और
गोल्डन क्रेडिट कार्डों का...

तेरे ये कार्ड
मेरे पंजाब के ढाबों
या रेहड़ियों पर नहीं चलते !

अंहकार न कर तू
अपने विशाल 'विले' का
इसका उत्तर तो
हमारे खेत वाला
अकेला ‘कोठा’ ही दे सकता है !
जहाँ पड़ती है, ट्यूबवैल की
अमृत जैसी धार
और रसभरा राग
गाती हैं लहलहाती फ़सलें !

और तो और
मेरे खेत की मूली-गाजरें भी
गीत गाती हैं
और मक्की भी ढाक पर छल्ली लटका
मजाजिण(नखरैल) बनी फिरती है !

और ‘मान’ न कर तू
अपनी नाजुक जवानी
और डोलते हुस्न का...
इसका उत्तर देने के लिए तो
हमारे खेतों का
एक सरसों का फूल ही काफ़ी है !
जिसपर बैठकर मधुमक्खी भी
मंत्रमुग्ध हो जाती है
तितलियाँ डालती हैं गिद्धे
और जुगनू रात में दीये बालते हैं !

तू गर्व न कर अपने बाग का
तेरे बाग में अब तक
किसी मोर ने नृत्य नहीं किया होगा
और न ही
'सुभान तेरी कुदरत' कहकर
किसी तीतर ने परवरदिगार का
शुक्राना ही किया होगा...!
नाचे नहीं होंगे खरगोश तेरे बाग में
और न ही कोयल ने कूक कर
कभी ‘शुभ-प्रभात’ का पैगाम दिया होगा !

न कर गर्व तू
अपने बेशक़ीमती लहंगों का
तुझे सुनहरी गीटियाँ गिनने से
फुर्सत मिले तो कभी हमारे गाँवों की
गड्डेवालियों का लिबास देखना !
तेरा भ्रम उतर जाएगा।
उनका पहरावा बता देगा
कि सुन्दरता सिर्फ़ अमीरों के पास ही नहीं
झुग्गियों में भी बसती है !

एक बात याद रखना
मोतियों जड़े पिंजरों में
मीठी चूरी खाने वाले
न तो चुग्गा चुगने का
न घोंसलों के मोह का
और न ही
बसंत ऋतुओं का अर्थ जानते हैं
वे तो सिर्फ़ भोगते हैं
बनावटी आलिंगनों की गरमाहट
और नलियों से पीते हैं दूध
और फिर लावारिसों की भाँति
मालिक की राह देखते हैं...

जो फाइव-स्टार होटलों में
डॉलरों की क़ीमत अदा कर
दूसरों के बनावटी आलिंगनों की
गरमाहट का आनन्द उठाता है
जिसे घोंसला बनाने की ढंग नहीं आया
जिसने हमउम्र आलिंगन की तपिश को नहीं भोगा
वो कैसा पंछी होगा ?
तेरे जैसा ?
वह भी तुले हुए हाड़-मांस का पुतला
रूह और रूहानियत से वंचित !
क्योंकि पिंजरे और महलों के माहौल में
अधिक फ़र्क़ नहीं होता।
अजब और ग़ज़ब

न तो मैं धनुष तोड़ने के काबिल हूँ
औ न, नीचे तेल के उबलते कड़ाहे में देख
ऊपर मछली की आँख बींधने के समर्थ !

न किसी कला में सम्पूर्ण
और न, किसी वेद का ज्ञाता हूँ मैं !
न त्रिभुवन का मालिक
और न ही, शक्ति का बली भीम सैन !
न सूरज जितनी तपिश है मेरे में
और न चन्द्रमा जितनी शीतलता !
न रात जैसी कालिमा है मेरे दिल में
और न दिन जैसा उजाला !

मैं तो ‘खाली’ वहंगी उठा भ्रमण करता हूँ
खुले आकाश के नीचे
चारों दिशाओं के तीर्थ स्थान !

न तो इच्छा है मुझे किसी स्वयंवर की
और न ही मैं कोई धर्मयुद्ध लड़ने की
रखता हूँ अभिलाषा !

मेरा बहरा दिल भी सुनता है
हर विरह-पीड़ा की ध्वनि
तब मित्तर-प्यारे को फ़कीरों का
हाल ही सुनाता हूँ
'तैं की दर्द न आया' का वास्ता देकर !

पर तुझ पर एक ग़िला है
मेरे श्रद्धाभरे
भीलनी के बेरों की तरह
चुनकर निकाले हुए मीठे शब्दों को भी
तू 'जूठा' कहकर दुत्कार देती है !

मैं तो अपने भगवान को जबरन
परसादा छकाने की जिद्द करता हूँ,
भोले ‘धन्ने भगत’ की भाँति
और लगाम पकड़कर रोकने का जिगरा रखता हूँ मैं
अपने गुरू का घोड़ा, ‘माता सुलक्खणी’ की तरह !

जंगल में खड़े होकर एक चमत्कार देखा
एक नदी पूछ रही थी मछेरों से
हीरे-जवाहरात की दास्तान !
...और वे मछली के भाव का ही
ढिंढोरा पीटने लग पड़े !

जब बदली ने सतरंगी पींग डाली मोर के संग
तब बिजली ने तड़क कर 'ग़ज़ब' का ग़िला किया
... तब बदली की आँख से टपके मोती
और धरती ने बाहें फैला लीं !
आसमान ने ताली बजाई
समूचा वायुमंडल सुर्ख़ हो मुस्करा उठा
तमाम आलौकिक नज़ारे देखता मैं आ बैठा
गाते हुए दरख्त और कामधेनु गाय के पास !

प्रकृति के आगोश में बैठा
'अज़ब' और 'ग़ज़ब' के चक्करों में पड़ गया मैं !
००
शिवचरण जग्गी कुस्सा
गाँव : कुस्सा, ज़िला-मोगा(पंजाब)
वर्तमान निवास : लंदन(इंग्लैंड)
शिक्षा : मैट्रिक(पंजाब), आई.एफ़.के. यूनिवर्सिटी ऑस्ट्रिया।
सम्प्रति : 1986 से 2006 तक ज़र्मन और ऑस्ट्रियन बार्डर पुलिस में और आजकल एस.आई.जी.(सिक्युरिटी)।
प्रकाशित कृतियाँ :
जट्ट वढिया बोहड़ दी छावें, कोई लभो सन्त सिपाही नूं, लग्गी वाले कदे ना सौंदे, बाझ भरावों मारिया, ऐती मार पई कुरलाणे, पुरजा पुरता कटि मरै, तवी तों तलवार तक, उजड़ गए गरां, बारीं कोहीं बलदा दीवा, तरकश टंगिया जंड, गोरख दा टिल्ला, हाजी लोक मक्के वल्ल जांदे, सजरी पैड़ दा रेता, रूह लै गिया दिलां दा जानी, डाची वालिया मोड़ मुहार वे(१५ उपन्यास पंजाबी में)। एक उपन्यास 'जोगी उतर पहाड़ों आए' प्रकाशनाधीन।
तू सुत्तां रब जागदा, ऊँठां वाले बलोच, राजे शींह मुक्कदम कुत्ते, बुड्ढ़े दरिया दी जूह(चार कहानी संग्रह)।
चारे कूटां सून्नीयां(आत्मकथ्य)।
बोदे वाला भलवान, कुल्ली नी फकीर दी विच्चों(व्यंग्य संग्रह)
सच आक्खां ता भांबड़ मचदै(लेख संग्रह)

पुरस्कार/सम्मान
सात गोल्ड मैडल के अलावा 17 भिन्न-भिन्न संस्थाओं की ओर से अचीवमेंट अवार्ड और पंजाबी सथ लांबड़ा की ओर से 'नानक सिंह नावलिस्ट पुरस्कार' से सम्मानित।
ब्लॉग : www.shivcharanjaggikussa.com
ई मेल : jaggikussa65@gmail.com

धारावाहिक पंजाबी उपन्यास(किस्त- 35)


सवारी
हरजीत अटवाल
हिंदी अनुवाद : सुभाष नीरव


॥ चालीस ॥
रात में महिमत का फोन आया था कि सवेरे बियर डिलीवर करके जाएगा। आठ-नौ बजे से पहले पहले। उस वक्त ट्रैफ़िक वार्डन भी नहीं होते और बियर भी छिपाकर अन्दर रख ली जाती थी। महिमत यूरोप से स्मगल करके बियर लाता था। यूरोपकी साझी मंडी बन जाने के कारण उस तरफ से ब्रिटेन को काफ़ी मात्रा में बियर, वाइन और व्हिस्की सप्लाई हो रही थी। कैश एंड कैरी से कहीं सस्ता माल मिलता। नहीं तो बड़े-बड़े स्टोरों ने छोटे दुकानदारों की टें बुलवा दी थी। यह दो नंबर का माल ही था जो उन्हें साँस दिला रहा था। माल तो वही था जो कैश एंड कैरी से मिलता था, पर स्मगलर टैक्स पर भी ए.टी. बचाकर उधर से ले आते। अभी इसे रोकने के लिए बहुत सख्त कानून भी नहीं बने थे। यूरोपियन साझी मंडी के अपवाद से निबटने के लिए गवर्नमेंट अभी तैयार जो नहीं थी। अजमेर दो नंबर का माल लेने से बहुत झिझकता था। वह करीब आधी बियर ऐसे खरीद कर बाकी की कैश एंड कैरी से लेकर आता ताकि रसीदें भी पास में सबूत के तौर पर रह सकें। महिमत से वह सौ केस बियर का इकट्ठा फिकवा लेता। जिसमें स्टैला, बडवाइज़र, पिल्ज़ और फौस्टर होंती। एकसाथ सौ केस लेने पर महिमत उसे पच्चीस पैंस एक केस के पीछे और सस्ती दे जाता।
महिमत जल्दी से माल उतारकर पैसे खरे करके चला गया। अजमेर ने अकेले ही सारे केस पीछे वाले स्टोर रूम में टिका दिए। वह पसीने में भीगा पड़ा था। उसको शिन्दे पर रह रहकर गुस्सा आ रहा था कि सतनाम के साथ काम करने जा लगा। इसमें दोष हालांकि सतनाम का अधिक था जो कि उसे यहाँ से ले गया था। शिन्दा भी पहले से ही तैयार बैठा था। शिन्दे को उसके अहसान की कोई कद्र नहीं थी। वह सोच रहा था कि अवसर मिलेगा तो वह उन दोनों को सबक अवश्य सिखाएगा। उसको लगता कि उसके सभी भाई ही अहसान फ़रामोश थे। सब उसके किए को भुलाये बैठे थे।
काम समाप्त करके वह ऊपर चला गया। बच्चे स्कूल जा चुके थे। गुरिंदर शायद नहा रही थी। वह टेलीविज़न के सामने बैठ गया पर दिल नहीं लगा। उसके अन्दर बेचैनी-सी हो रही थी। सौ केस बियर के उठाकर अन्दर रखने ने उसके शरीर को यद्यपि थका दिया था, पर मन स्थिर नहीं था। उसने दस बजने से पहले ही नीचे आकर दुकान खोल ली।
डिंगूमल जैसे दुकान के बाहर खड़ा इसके खुलने का ही इंतज़ार कर रहा था। वैस्ट इंडियन डिंगूमल उसका पुराना ग्राहक था। वह अक्सर उधार ले जाता और पैसे समय से लौटा देता था। अजमेर उधार बहुत कम करता था। यदि करता भी था तो दस पौंड तक का ही करता। वह भी इस प्रकार कि ग्राहक को हर बार दस पैनियाँ अधिक लगा लगाकर उसने अपने दस पौंड पूरे कर लिए होते ताकि यदि ग्राहक भाग भी जाए तो उसको बहुत फ़र्क न पड़े। लेकिन डिंगूमल ऐसा था कि जिसकी सीमा बीस-पच्चीस पौंड तक भी पहुँच जाया करती। डिंगूमल अन्दर घुसा और चार डिब्बे टेनंट के उठाता हुआ बोला-
''ऐंडी, ये लिख लेना।''
''नहीं डिंगूमल अभी मैं उधार नहीं दूँगा।''
''क्यों ?''
''क्योंकि तू मेरा पहला ग्राहक है। पहले कुछ ग्राहक मुझे नकद वाले चाहिएँ।''
''ऐंडी, तेरा उधार लौटाने वाला भी तो मैं ही पहला ग्राहक होता हूँ।''
''लिए हुए माल के ही पैसे देकर जाता है, कोई मुफ्त में तो नहीं पकड़ा जाता।''
''ऐंडी, तू बहुत खराब आदमी है। तू अपने मूड का कैदी है।''
''जो भी है, तू डिब्बे वापस रख दे।''
डिब्बे फेंकता हुआ सा डिंगूमल उसको गालियाँ बकता चला गया। अजमेर दाँत पीसता रहा गया और दुकानदारी के धंधे को कोसने लगा। खराब दिन की शुरूआत के बारे में भी चिंता करने लगा। व्यापारियों वाले छोटे-छोटे वहम वो करने लगता था।
करीब आधे घंटे बाद एक औरत आई। यह परिचित-से चेहरे वाली ग्राहक थी। वह हैलो करते हुए बोली-
''दो बोतलें ब्लैक लेबल और एक सौ रौथमन।''
अजमेर ने दो बोतलें और पाँच डिब्बियाँ सिगरेट की काउंटर पर रख दीं। उस औरत ने क्रेडिट कार्ड निकालकर उसके सामने कर दिया। अजमेर बोला-
''सॉरी मैडम, हम स्प्रिट और सिगरेट पर कार्ड नहीं लेते। बाहर विंडो में भी लिखकर लगा रखा है।''
''क्यों नहीं लेते ?''
''क्योंकि इनमें हमें बचता कुछ नहीं। पाँच परसेंट तो हमारे बैंक वाले ले जाते हैं। हमें इतने भी नहीं बचते और अन्त में पल्ले से पैसे डालकर छूटते हैं।''
''मिस्टर यह तो गैर-कानूनी है।''
''हो सकता है पर यहाँ हम अपने लिए काम करते हैं, न कि लोगों के लिए..., हाँ, यदि वाइन ग्रौसरी चाहिए तो ले जा, बियर भी। पर व्हिस्की-सिगरेटों पर नहीं।''
''पर मुझे तो यही चाहिएँ।''
''सॉरी मैडम।''
''तुझे किस बात की सॉरी। सॉरी तो मुझे है कि जिसके मुल्क में आकर तू मालिक बना बैठा है और मन मर्जी के कानून बना रहा है।'' कहकर वह औरत चल पड़ी और दरवाजे से बाहर निकलते हुए बोली-
''पाकि हरामी, वापस जा।''
यह सुनकर अजमेर भी गालियाँ बकने लगा। औरत तो चली गई पर अजमेर ठगा-सा खड़ा-खड़ा सोचने लगा कि वह कहाँ गलत था। उसने बियर का डिब्बा खोला और बड़े-बड़े कुछ घूंट भरकर एक तरफ रख दिया। बियर ने उसके निराश मन को स्थिर किया। डिब्बा खत्म करते हुए वह सोच रहा था कि यदि बिजनेस करना है तो ऐसे लोगों का सामना भी करना ही पड़ेगा। वह काउंटर के पीछे रखे स्टूल पर बैठा था। उसका दिल करता था कि कुछ बियर और पिये, पर वह जानता था कि बियर उसके जिस्म को निढाल कर देगी। उसके लिए काम करना भी कठिन हो जाएगा। टोनी को अभी ठहर कर आना था। गुरिंदर भी ऊपर घर के काम में लगी हुई थी। उसको फुर्सत नहीं थी। एक ग्राहक दुकान का दरवाजा पार करके अन्दर आया। अजमेर बांहें मारता हुआ इस प्रकार उठा मानो सघन जंगल में से निकल रहा हो। कुछ ग्राहक और आए। अजमेर का मूड कुछ-कुछ बदला, पर पूरी तरह नहीं।
रोटी का वक्त हुआ। गुरिंदर नीचे आई। जैसा कि वह किया ही करती थी कि वह दुकान देखती और अजमेर ऊपर जाकर रोटी खा आता। उसका चेहरा देखकर गुरां कुछ न बोली। संक्षिप्त से शब्दों में सिर्फ इतना कहा कि रोटी किचन में रखी है। अजमेर चला गया।
रोटी खाते हुए अजमेर शॉपिंग के विषय में सोचने लगा कि अगले दिन क्या-क्या चाहिए था। बियर तो आज आ ही गई थी। कल वैन ओवरलोड करने की ज़रूरत नहीं पड़नी थी। फिर लोड, अनलोड करने में भी आसानी रहती। वह नीचे आया तो गुरिंदर फिर भी न बोली और वापस ऊपर चढ़ गई। अजमेर ने स्टॉक रूम में जाकर शीशा देखा। उसको सब बुरा-बुरा लग रहा था। उसने दुकान का चक्कर लगाया और फिर काउंटर पर जा बैठा।
कुछ देर बाद बर्नी आया। बर्नी अजमेर का ऐसा ग्राहक था जो चोरी के क्रेडिट कार्डों पर शॉपिंग करता था। अजमेर दुगने पैसे चार्ज क़र लेता और अपने नफ़े को आसानी से दुगना-तिगना कर लेता। कई बार वह नकद पैसे भी अगले को दे देता। बर्नी जैसे कुछ विश्वसनीय ग्राहक थे जिनके साथ अजमेर ऐसा कर लेता था। क्रेडिट कार्ड वाले बैंक हर दुकानदार की एक सीमा बना देते थे कि उस सीमा से ऊपर की शॉपिंग के लिए दुकानदार बैंक को फोन करके एक रेफ्रेंस नंबर लेता, जिस कारण भुगतान यकीनी बन जाता। बहुत से कार्ड ऐसे ही होते कि चोरी होने के बाद एकदम ही उपयोग में लाए जा सकते थे जब तक कि उनके मालिक चोरी या गुम होने की बैंक के पास शिकायत न कर देते। इसके बाद तो बैंक उस कार्ड के हर भुगतान पर रोक लगा देता था। चोर और दुकानदार की मिली भगत से ही हेराफेरी परवान चढ़ती थी। अजमेर काफ़ी देर तक करता रहा था यह काम, तब तक जब तक बैंक का एक कर्मचारी आकर उसे यह चेतावनी नहीं दिया गया था कि उसकी दुकान से संबंधित बड़े भुगतान अधिकतर चोरी वाले ही होते हैं। अगर दुबारा ऐसा हुआ तो इसकी इन्क्वारी हो सकती थी। अजमेर अपना नाम बदनाम तो किसी भी कीमत पर नहीं होने देना चाहता था। उसने चोरी के क्रेडिट कार्ड लेने एकदम बन्द कर दिए।
बर्नी आया। उसने एक क्रेडिट कार्ड निकालकर अजमेर के सामने रख दिया। अजमेर तुरन्त बोला-
''बनी, नहीं यह कार्ड मैं मंजूर नहीं कर सकता। तू तो जानता ही है कि मेरी इन्क्वारी होने को फिरती है।''
''ऐंडी, मुझे सब पता है। तू मेरा साथी है, मैं तेरे लिए कोई मुसीबत थोड़ा खड़ी करूँगा। यह कार्ड मेरा अपना है।''
''तेरा कार्ड किस बैंक ने बना दिया ?''
''इस बात से तुझे क्या ? फिर मुझे शॉपिंग भी तेरी लिमिट में रहकर ही करनी है।''
''नहीं बर्नी, मैं अब कोई रिस्क नहीं ले सकता।''
''क्यों ?''
''क्योंकि अन्दर जाने का मेरा कोई शौक नहीं है।''
''सेफ मैन सेफ।''
''सॉरी बर्नी, बिलकुल नहीं।''
''यू श्योर ?''
''हाँ।''
''ऐंडी, तूने मेरे कारण हजारों पौंड कमाये हैं। तू अगर बग़ैर पैसे लिए ही कुछ सामान मुझे दे दे तो भी तू घाटे में नहीं।''
''यह भी ठीक है। मैंने बहुत चांस ले लिए, अब नहीं।''
''ऐंडी, तू बहुत बड़ा हरामी है।''
''बर्नी, तेरे से अभी भी छोटा हूँ।''
बर्नी आगे बढ़ा और काउंटर के ऊपर से अपनी लम्बी बांह बढ़ाकर उसने अजमेर की कमीज़ का गला पकड़ लिया। पूरे ज़ोर से उसे हिलाते हुए धक्का मारकर पीछे फेंक दिया और गंदी गालियाँ बकता हुआ बाहर निकल गया।
अजमेर पगड़ी संभालता हुआ उठा और कोने में पड़ी हॉकी जो ऐसे अवसरों के लिए रखी हुई थी, लेकर बाहर निकला। बर्नी दूर जा चुका था। अजमेर फटी हुई कमीज़ को ठीक करता हुआ काउंटर के पीछे आ खड़ा हुआ।
(जारी…)
00

लेखक संपर्क :
67, हिल साइड रोड,
साउथाल, मिडिलसेक्स, इंग्लैंड
दूरभाष : 020-85780393,
07782-265726(मोबाइल)

शुक्रवार, 11 फ़रवरी 2011

गवाक्ष – फरवरी 2011


जनवरी 2008 “गवाक्ष” ब्लॉग के माध्यम से हम हिन्दी ब्लॉग-प्रेमियों को विदेशों में रह रहे हिन्दी/पंजाबी के उन लेखकों/कवियों की समकालीन रचनाओं से रू-ब-रू करवाने का प्रयास करते आ रहे हैं जो अपने वतन हिन्दुस्तान से कोसों दूर रहकर अपने समय और समाज के यथार्थ को अपनी रचनाओं में रेखांकित कर रहे हैं। “गवाक्ष” में अब तक विशाल (इटली), दिव्या माथुर (लंदन), अनिल जनविजय (मास्को), देवी नागरानी(यू.एस.ए.), तेजेन्द्र शर्मा(लंदन), रचना श्रीवास्तव(लंदन), पूर्णिमा वर्मन(दुबई), इला प्रसाद(यू एस ए), भगत धवन (डेनमार्क), चाँद शुक्ला (डेनमार्क), वेद प्रकाश ‘वटुक’(यू एस ए), रेखा मैत्र (यू एस ए), तनदीप तमन्ना (कनाडा), प्राण शर्मा (यू के), सुखिन्दर (कनाडा), सुरजीत(कनाडा), डॉ सुधा धींगरा(अमेरिका), मिन्नी ग्रेवाल(कनाडा), बलविंदर चहल (न्यूजीलैंड), बलबीर कौर संघेड़ा(कनाडा), शैल अग्रवाल (इंग्लैंड), श्रद्धा जैन (सिंगापुर), डा. सुखपाल(कनाडा), प्रेम मान(यू.एस.ए.), (स्व.) इकबाल अर्पण, सुश्री मीना चोपड़ा (कनाडा), डा. हरदीप कौर संधु(आस्ट्रेलिया), डा. भावना कुँअर(आस्ट्रेलिया), अनुपमा पाठक (स्वीडन) आदि की रचनाएं और पंजाबी कथाकार-उपन्यासकार हरजीत अटवाल के उपन्यास “सवारी” के हिंदी अनुवाद की तैंतीसवीं किस्त आपने पढ़ीं। “गवाक्ष” के फरवरी 2011 अंक में प्रस्तुत हैं – संयुक्त अरब इमारात से पूर्णिमा वर्मन की कविताएं तथा हरजीत अटवाल के धारावाहिक पंजाबी उपन्यास “सवारी” की चौंतिसवीं किस्त का हिंदी अनुवाद…

यू.एस.ए. से
सुदर्शन 'प्रियदर्शिनी' की कविताएँ

जीवन

वह भीड़ भरी
जिंदगी
वह कन्धे से कन्धे
छिलते हुये तन
वह उठे हुये भीड़ में चेहरे
वह असंख्य
हिलती हुई
मुंडियां
वे अभावों में
घिरे हुये घर
वह पँक्तियों में
लगी हुई
राशन की दुकानों
पर भीड़
वह जीने के
संघर्ष में की गई
एक एक दौड़
वह सुबह से सांझ तक
कुछ नया कर आने का
पूरा पन
मुझे आज भी भरता है…

वह शिद्दत के बाद
मिली हुई
थोड़ी- सी रहमत
वह ब्याही दुल्हन की
पहली रात का
नया नवेला आभास
वह उम्र भर
एक तार में बंध कर
उम्र भर की
चादर बुन
जाने का भरापन
वे छोटे छोटे
घरों में होने वाले तर्क
वह अधिकार एवं स्नेह
के बीच लड़े हुये
खेलों की तरह
जीत और हार
की अनुभूति
वह बसों में चढ़ते उतरते
भीड़ की रेल-पेल
जीवन को जीने की
पूरी चाहत से
भर देते हैं…

इस सागर की
तरह भरे हुये
पर ठहरे हुये
जीवन
जिस में छोटी-छोटी
मछलियों का
क्रिया-कलाप नहीं
जिस में चांदनी रात में
अनबिछी खाट पर
पढ़े हुए चांद को
साथ-साथ ताकने का
सुख नहीं
जिस में छोटी-छोटी
बातों का नहीं
बड़ी- बड़ी प्रलयों का
अहसास भरा हो
ऐसा सुख अन्दर कहीं
गहरे अभावों से
भर देता है …

धीरे-धीरे
स्वयं फल को
पकते देख कर
जीवन के आगे
बढ़ने का सुख
इन छलांगों के
सुख से
कहीं बड़ा लगता है
आज फिर न जाने क्यों
उन धूल-धूसरित
अपने से चेहरों में
खो जाने
का मन करता है।
0

बुत

कहते हैं
शरीर नहीं
रहता
पार्थिव है
जल, वायु, व्योम
अग्नि और
मिट्टी से बना है

पर
कहीं न कहीं
एक बुत
रह जाता है

एक अशरीरी
छवि-सा
तुम्हारी प्रकृति
तुम्हारे
आचार विचार
व्यवहार से
लिपा-पुता
किन्हीं
आँखों में…
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अकेले

मैंने
अपने से अलग
अपने घावों
अपनी रिसती
बिवाइयों
गले की फाँस बनी
विसंगतियों
दम घोंट
देने वाली
वे सारी
व्यथाओं की
एक पोटली बांध कर
अलग अलगनी पर
टांग दी है
ताकि जब तुम
आओ तो
ले चलो
मुझे अकेले
निःसग
उन सब से
परे
निःस्वच्छ
स्फटिक लोक
में अकेले…
0

सुदर्शन 'प्रियदर्शिनी'
जन्म - लाहौर अविभाजित भारत. शिक्षा पी.एचड़ी हिन्दी. अनेक वषों तक भारत में शिक्षण कार्य किया.
अमरीका में 1982 में आई तब से लेखन लगभग बंद रहा. अब पिछले दो तीन सालों से भारत की पत्रिकाओं में छपने लगी हूं.अमरीका में रह कर भारतीय संस्कृति पर आधारित लगभग दस साल तक पत्रिका निकाली. टी वी प्रोग्राम एंव रडियो प्रसारण भी किया. अब केवल स्वतंत्र लेखन.
पुरस्कार
महादेवी पुरस्कार - हिन्दी परिषद टोरंटो, कनाडा
महानता पुरस्कार - फ़ेडरेशन ऑफ इंडिया, ओहायो
गर्वनस मीडिया पुरस्कार- ओहायो,यू एस ए
प्रकाशित रचनायें - उपन्यास -रेत के घर(भावना प्रकाशन), जलाक (आधारशिला प्रकाशन), सूरज नही उगेगा (बिशन चंद एंड संस)
कविता संग्रह - शिखंडी युग (अर्चना प्रकाशन), बराह (वाणी प्रकाशन), यह युग रावण है (अयन प्रकाशन), मैं कौण हां (पंजाबी में-चेतना प्रकाशन)
कहानी संग्रह - उत्तरायण (प्रकानाधीन)
सम्पर्क :
सुदर्शन प्रियदर्शिनी
246 Stratford Drive
Broadview Hts, Ohio 44147
USA
(440)717-1699
Sudarshansuneja@yahoo.com

धारावाहिक पंजाबी उपन्यास(किस्त- 34)



सवारी
हरजीत अटवाल
हिंदी अनुवाद : सुभाष नीरव

॥ उन्तालीस ॥
शिन्दा सतनाम की दुकान पर सवेरे आठ बजे पहुँच जाता। उसी समय पैट्रो आता और मगील भी। सतनाम कईबार पहले भी आ जाता और कई बार लेट भी हो जाता। उसने शिन्दे को एक चाबी दे दी थी ताकि यदि सतनाम लेट भी हो जाए तो दुकान शिन्दा ही खोल ले। जिस दिन डिलीवरी आनी होती तो शिन्दा जल्दी आ जाता। अजमेर के घर से सतनाम की दुकान का करीब पन्द्रह मिनट का पैदल सफ़र था। मौसम ठीक होता तो यह पन्द्रह मिनट तुरन्त बीत जाते। बारिश हो रही होती तो उसके लिए पैदल चलना कठिन हो जाता। बर्फ़ तो अब पड़ने के आसार नहीं दीख रहे थे पर ठंड बहुत रहती थी। शीत हवा कान चीरती गुजर जाती। अजमेर की दुकान में यह ठंड मालूम नहीं होती थी। अन्दर ही जो रहना होता था। शॉपिंग वाले दिन ही वह बाहर निकलता था।
अब राह की ठंड ही नहीं थी, दुकान में भी कोल्ड रूम्स में आना-जाना पड़ता था शिन्दे को। इस वजह से नाक बहने लगता। बहते नाक का इलाज व्हिस्की है इसका शिन्दे को पता था। अजमेर की दुकान में व्हिस्की की खुली छूट थी। सतनाम की दुकान में ऐसा नहीं था। यहाँ व्हिस्की शाम को निश्चित समय पर मिलती। तभी बोतल खोली जाती। सतनाम की दुकान पर काम से भी उसे घिन्न-सी आती रहती थी। लेकिन यहाँ उसे सौ पौंड मिलने थे, वह भी छह दिन के। वह खुश था।
पर शिन्दे के तो सात दिन ही लग जाते थे। इतवार वाले दिन वह अजमेर की दुकान संभालता। शाम को सतनाम उसे हाईबरी उतार जाया करता। वह दुकान में घुसते ही काम में लग जाता। काम बन्द करवाकर अजमेर के संग ही ऊपर जाता। सवेरे जल्दी उठता। जिस दिन कभी सतनाम के साथ मीट मार्किट में जाना हाता तो तड़के ही उठ बैठता। इस तरह नींद के घंटे कम हो जाते और थकावट-सी रहती। इस थकावट का इलाज भी बियर या व्हिस्की ही होता।
वैसे सवेरे उठकर शिन्दा किसी को जगाता नहीं था। चाय बनानी उसने सीख ली थी। उसे देसी तरीके की चाय ही अच्छी लगती थी। सतनाम की दुकान पर गोरों वाली कच्ची-सी चाय बनती थी जो उसे अच्छी नहीं लगती थी। सतनाम की दुकान में दोपहर में सभी चिप्स-से ही खाते थे। कभी-कभी मीट भी भून लिया जाता। अजमेर की दुकान में गुरिंदर रोटी बना देती थी। अब वह गोरों वाला खाना खाकर अपना स्वाद बनाने की कोशिश करता। कई बार उससे खाया न जाता और भूखा-सा ही रह लेता।
बलदेव को वह खूब याद करता रहता पर वह अब काफी समय से नहीं आया था। अजमेर ने उसे कुछ गलत कह दिया था। अजमेर की तो यह आदत थी कि कहते समय कुछ सोचता ही नहीं था, पर बलदेव को इतना गुस्सा नहीं करना चाहिए था। आख़िर उसका बड़ा भाई था। फिर गुरां को मिलने ही आ जाता। उसे सभी की बात सच प्रतीत होती कि बलदेव निर्मोही हो गया था। उसे किसी से भी प्यार नहीं रहा था।
कई बातों के बावजूद उसका दिल सतनाम की दुकान पर लग गया था। सारा दिन रौनक रहती। कोई न कोई शुगल चलता ही रहता। जुआइस आती तो अपना ही झगड़ा लेकर बैठ जाती। शिन्दे से वह अधिक मोह दिखाने लगी थी। अब शिन्दे को काला रंग पहले जितना पराया नहीं लगता था। पहले दिन टोनी को देखकर हैरान हो गया था। इंडिया में उसने कोई अफ्रीकन नहीं देखा था। जुआइस भी पहले पहले बहुत ही अजीब लगती थी। परन्तु अब वह भिन्न नस्ल के शरीरों की भिन्न बनावट को समझने लग पड़ा था।
उस दिन शिन्दा अपने खाने से इन्कार-सा कर रहा था। जुआइस ने उसकी ओर देखा और पूछने लगी-
''अच्छा नहीं लगता ?''
''नहीं, आदत नहीं बन पा रही।''
''गोट करी-राइस खाएगा ?''
''क्यों नहीं, गोट का मीट मिल जाता है ?''
''मिल जाता है पर यह सैम नहीं लाता, उसके लिए मुझे टोटन हैम जाना पड़ता है।''
''मुझे नहीं पता था। मैंने सैम से पूछा भी था पर वह कहता था कि नहीं मिलता। मैं मार्किट भी जाता हूँ, वहाँ भी नहीं देखा।''
''खास दुकानों पर ही मिलता है। यहाँ यह बिकता नहीं, इसलिए नहीं रखते।''
करीब खड़ा पैट्रो उनकी बातें सुन रहा था। वह बकरे के मीट के बारे में तफ़सील से समझाने लगा। बकरे को गोरे तो खाते ही नहीं थे। भारतीय भी अब भेड़ का मीट ही पसन्द करने लगे हैं। शिन्दा कहने लगा-
''मुझे तो यहाँ का मीट पसन्द ही नहीं। मुर्गा स्किन समेत खाते हैं लोग। भेड़ का मीट भी और तरह का ही है।''
''शैनी, तू मेरे हाथ की बनी गोट करी खाकर देखना, घर के पकवान भूल जाएगा।''
शिन्दे ने कुछ नहीं कहा। जुआइस ने फिर पूछा-
''चलेगा मेरे साथ मेरे घर ?''
शिन्दा हँसा और सतनाम की तरफ देखने लगा। मीट काटते हुए सतनाम बोला-
''इतने प्यार से कह रही है, जा हो आ।''
''हाँ, छोड़ परे।''
''तेरी मर्जी है, जाकर देख ले। शायद तू भी गोता लगा ले।''
कहकर सतनाम ने बीफ के बड़े पीस पर ज़ोरदार गंडासा मारा और एक ही वार से सही काट डाला। मगील के कान उनकी बातों की ओर ही थे। लेकिन उसे पूरी तरह समझ में नहीं आ रहा था। वह कहने लगा-
''शैनी, रहने दे गोट करी। मैं तुझे किसी दिन पायऐला खिलाऊँगा।''
''तू भी कुक है ?''
''और क्या, मैं तो हूँ ही कुक। यह तो सैम की मदद के लिए बुच्चर बना हूँ। मेरे हाथ का बना कुछ खाएगा तो उम्र भर याद रखेगा।''
जुआइस ने अपना काम खत्म किया और शिन्दे को हाथ से पकड़ कर खींचते हुई ले चली। शिन्दे ने एक-दो बार न की और फिर चल पड़ा। जुआइस बताने लगी-
''बस, इसी रोड में से निकलती है मेरी रोड, रेलवे पुल के बाद।''
शिन्दा उसके बराबर चलता जा रहा था। उसे अच्छा-अच्छा लग रहा था। उसने पूछा-
''जुआइस, घर में तेरे कौन-कौन हैं ?''
''मेरे दो बच्चे हैं, बड़ी बेटी क्लेयर और छोटा बेटा मार्क। दस और नौ साल के।''
''तेरा पति ?''
''विक्टर को मैंने घर से निकाल दिया था। बहुत हरामी था। गोरा जो था। उसने सोचा, मैं काली हूँ, वह जितनी चाहे औरतों के साथ जाए, मैं कौन-सा बोलने वाली हूँ। अफ्रीका जाने वाले कई गोरे इसी सोच के तहत विवाह करवाते रहते हैं पर मैंने विक्टर को सबक सिखा दिया।''
''अब कहाँ है ?''
''पूरबी लंडन में कहीं रहता है। आता है कभी कभी। उसकी गर्ल-फ्रेंड भी होती है साथ। वह बहुत अच्छी है। मुझसे बहुत प्यार करती है। क्लेयर और मार्क से भी।
जुआइस का घर आ गया। अन्दर से कुत्ते के भौंकने की आवाज़ आई। उसने दरवाजा खोला तो गंदी-सी गंध का एक झोंका उसके मुँह पर आकर बजा और दौड़ता आता कुत्ता उनके पैरों में लेटने लगा। जुआइस बोली-
''यह मिल्की है। बहुत अक्लमंद जानवर है। मेरा तो यह बच्चा है।''
फिर दौड़ती हुई दो बिल्लियाँ उनके सामने से गुजरीं और सीढ़ियाँ चढ़ गईं। शिन्दे ने नाक पर हाथ रख लिया। जुआइस पूछने लगी-
''तुझे पालतू जानवरी अच्छे नहीं लगते ?''
''लगते हैं, पर अगर जगह खुली हो तो।''
''हाँ, वैसे मेरा गार्डन भी बड़ा है। बाहर मैंने खरगोशों का दरबा बनाया हुआ है। मेरे पास दस खरगोश होंगे कुल।''
शिन्दे ने खरगोशों में कोई उत्साह नहीं दिखाया कि कहीं वह उसे उनका दरबा दिखाने ही न ले जाए। गोट करी खाने का अब मूड ही नहीं रहा था। वह सोच रहा था कि इतने गंद में तो कुछ भी नहीं खाया जा सकता। जुआइस ने कहा-
''तू सैटी पर बैठ, मैं खाना गरम करती हूँ।''
''जुआइस, सच बात तो यह है कि मुझे बिलकुल भी भूख नहीं है। तेरे आने से पहले ही खाना खाया था। मैं तो टाइम पास करने के लिए तेरे संग आ गया।''
''सच कहता है ?''
''बिलकुल सच।''
''कुछ पियेगा ?''
''हाँ, पी लूँगा।'' शिन्दे ने ज़रा सोचते हुए कहा।
शिन्दा सैटी पर बैठने को हुआ लेकिन वह तो कुत्ते के बालों से भरी पड़ी थी। इसलिए वह खड़ा ही रहा। जुआइस रम और कोक गिलासों में डालकर ले आई। एक गिलास शिन्दे को थमाया। उसने एक ही साँस में गिलास खाली करके वापस कर दिया। जुआइस बोली-
''जल्दी किस बात की है ! बैठ ज़रा दस मिनट।''
शिन्दा सैटी पर बैठने से झिझक रहा था। जुआइस समझ गई। वह सैटी झाड़ते हुए बोली-
''ये मिल्की के बाल ही हैं, सुइयाँ तो नहीं।''
शिन्दा सैटी पर बैठ गया। उसने टांगें मेज पर रख लीं। जुआइस एक पैग और उसके लिए बना लाई। शिन्दे ने आँखें मूंद लीं। इस तरह वह इंग्लैंड में आकर पहली बार बैठा था। जुआइस उसके समीप बैठ गई। उसके कंधे पर हाथ फेरते हुए कहने लगी-
''घर कितना याद आता है ?''
''बहुत ज्यादा।''
''कितने बच्चे हैं तेरे ?''
''तीन, बहुत ही प्यारे।''
''फोन करता है ?''
''थोड़ा-बहुत ही, पर चिट्ठियाँ आती जाती रहती हैं।''
''तेरी पत्नी कैसी है ?''
''बहुत सुन्दर, बहुत प्यारी।''
कहकर शिन्दे ने जुआइस की तरफ देखा। उसके मोटे-मोटे काले होंठ अब उसे सुन्दर लगने लगे थे। जुआइस की आँखों में मिन्दो की आँखों जैसा कुछ था। शिन्दे के दिल ने चाहा कि काश आज मिन्दो यहाँ होती। उसे उसका कितना सहारा होता। जुआइस उसकी ओर लगातार देखे जा रही थी। शिन्दे से भी नज़रें हटाना नहीं हुआ। इतने मोह से तो उसे सिर्फ़ मिन्दो ही देख सकती थी। शिन्दे की आँखें भर आईं। जुआइस उसके आँसू पोंछती हुई बोली-
''घबरा मत शैनी, इस मुल्क में सारी दुनिया ही अकेली है, मैं भी...। देख, यहाँ मेरा कोई भी नहीं। मैं अकेली पराये देश में और पराये लोगों के बीच बैठी बच्चे पाल रही हूँ।''
कहकर उसने शिन्दे की छाती पर अपना सिर रख दिया। शिन्दे ने उसे अपने साथ कस लिया।
शिन्दा वापस आया तो सारे ही उससे मजाक करने लगे। सतनाम ने पूछा-
''क्यों भई... कैसे कुछ... ?''
''न, वहाँ तो बदबू ही बहुत आती है।''
संध्या समय जुआइस सफाई करने के लिए समय से आ गई और चुपचाप काम करने लग पड़ी। सतनाम कुछ देर उसकी ओर देखता रहा और फिर बुदबुदाया, ''यह तो भाई शिन्दे ने लगा दी...।''
(जारी…)
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शनिवार, 1 जनवरी 2011

गवाक्ष – जनवरी 2011



मित्रो, सर्वप्रथम आप सभी को नव वर्ष 2011 की बहुत बहुत शुभकामनाएँ ! हर वर्ष की भाँति इस वर्ष भी हम सबको यही कामना और प्रार्थना करनी चाहिए कि यह नया साल घृणा, द्बेष, नफ़रत, आतंक, विध्वंश से रहित हो और इसके स्थान पर प्रेम, सौहार्द, अमन-चैन और खुशहाली को स्थापित करने वाला हो। इस नये वर्ष में हम सब मिलकर प्रकृति और जीवन को नष्ट करने वाली हर गतिविधि का विरोध करें और इन्हें और अधिक बेहतर और खुशहाल बनाने की प्रक्रिया में संलग्न हों…

जनवरी 2008 में मैंने “गवाक्ष” ब्लॉग की शुरूआत की थी। दो वर्ष का सफ़र पूरा करके यह तीसरे वर्ष की यात्रा में प्रवेश कर रहा है। “गवाक्ष” ब्लॉग के पीछे मेरी मंशा यह थी कि इस ब्लॉग के माध्यम से हिन्दी ब्लॉग-प्रेमियों को हिन्दी/पंजाबी के उन प्रवासी लेखकों/कवियों की समकालीन रचनाओं से रू-ब-रू करवाया जाए जो अपने वतन हिन्दुस्तान से कोसों दूर बैठकर अपने समय और समाज के यथार्थ को अपनी रचनाओं में ईमानदारी से रेखांकित में लगे हुए हैं। “गवाक्ष” का यही उद्देश्य आगे भी जारी रहेगा। इसमें केवल उन्हीं रचनाकारों की रचनाएं प्रकाशित होंगी जो अपने वतन की मिट्टी से कोसों दूर बैठकर सृजनरत हैं। “गवाक्ष” में अब तक विशाल (इटली), दिव्या माथुर (लंदन), अनिल जनविजय (मास्को), देवी नागरानी(यू.एस.ए.), तेजेन्द्र शर्मा(लंदन), रचना श्रीवास्तव(लंदन), पूर्णिमा वर्मन(दुबई), इला प्रसाद(यू एस ए), भगत धवन (डेनमार्क), चाँद शुक्ला (डेनमार्क), वेद प्रकाश ‘वटुक’(यू एस ए), रेखा मैत्र (यू एस ए), तनदीप तमन्ना (कनाडा), प्राण शर्मा (यू के), सुखिन्दर (कनाडा), सुरजीत(कनाडा), डॉ सुधा धींगरा(अमेरिका), मिन्नी ग्रेवाल(कनाडा), बलविंदर चहल (न्यूजीलैंड), बलबीर कौर संघेड़ा(कनाडा), शैल अग्रवाल (इंग्लैंड), श्रद्धा जैन (सिंगापुर), डा. सुखपाल(कनाडा), प्रेम मान(यू.एस.ए.), (स्व.) इकबाल अर्पण, सुश्री मीना चोपड़ा (कनाडा), डा. हरदीप कौर संधु(आस्ट्रेलिया), डा. भावना कुँअर(आस्ट्रेलिया), अनुपमा पाठक (स्वीडन) आदि की रचनाएं और पंजाबी कथाकार-उपन्यासकार हरजीत अटवाल के उपन्यास “सवारी” के हिंदी अनुवाद की बत्तीसवीं किस्त आपने पढ़ीं। “गवाक्ष” के जनवरी 2011 अंक में प्रस्तुत हैं – संयुक्त अरब इमारात से पूर्णिमा वर्मन की कविताएं तथा हरजीत अटवाल के धारावाहिक पंजाबी उपन्यास “सवारी” की तैंतीसवीं किस्त का हिंदी अनुवाद…

संयुक्त अरब इमारात से
पूर्णिमा वर्मन की कविताएँ

सर्द मौसम- बारह क्षणिकाएँ
कविताओं के साथ सभी चित्र : पूर्णिमा वर्मन
1

धुंध बादल
और ये पेड़ों पे पतझड़
सर्दियों में डूबते दिखते हैं
दिन भी

2

एक हिम सागर
धरा पर
और पत्तों को उतारे
एक तरुवर
दूधिया सूरज नहाता

3

इस अकेली शाम का
मतलब न पूछो
सर्द मौसम
और फैला दूर तक
एकांत सागर
एक पुल
थामे हुए हमको हमेशा

4

धूप की खिड़की
और सर्दी से भरा दिन
बंद अलमारी दुखों की
और पर्दों से बरसती
आस खुशियों की

5

आज
फुर्सत का कोई पल
दूर सूरज गुनगुनाए
सर्द मौसम को थपक
जैसे सुलाए

6

हरी छाँहों में बसी है
गंध सर्दी की
बहुत नम
पारदर्शी याद जैसे
कनक शबनम

7

एक मेपल पात
पियरा
देस से परदेस तक
सर्दी का मौसम जोड़ता है
मुदित जियरा

8

खुशनुमा
सर्दी का मौसम
धरा सागर
और
हिम लिपटी ये बटियाँ
दूर खुलता बादलों में से उजाला

9

पाँव में पायल या सिर पर बोझ
मौसमों से
नहीं रुकते काम
समय को साँटना भी और
जीवन साधना भी है

10

आग है तो आस है
सर्द मौसम
पार करने की
जो मन में चाह है
एक प्याली चाह में वह ताप है

11

धूप नहाया शहर और
मौसम जाड़े का
आतप झरती काँच
और खिड़की मनभावन

12

देवदारों से
ढँकी यह राह
धुँध में घिरता हुआ दिन
सर्द सन्नाटा
और झरती डालियाँ धीमे
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जन्म : 27 जून 1955
शिक्षा : संस्कृत साहित्य में स्नातकोत्तर उपाधि, स्वातंत्र्योत्तर संस्कृत साहित्य पर शोध, पत्रकारिता और वेब डिज़ायनिंग में डिप्लोमा।
कार्यक्षेत्र : पीलीभीत (उत्तर प्रदेश, भारत) की सुंदर घाटियों जन्मी पूर्णिमा वर्मन को प्रकृति प्रेम और कला के प्रति बचपन से अनुराग रहा। मिर्ज़ापुर और इलाहाबाद में निवास के दौरान इसमें साहित्य और संस्कृति का रंग आ मिला। पत्रकारिता जीवन का पहला लगाव था जो आजतक साथ है। खाली समय में जलरंगों, रंगमंच, संगीत और स्वाध्याय से दोस्ती।
संप्रतिपिछले बीस-पचीस सालों में लेखन, संपादन, स्वतंत्र पत्रकारिता, अध्यापन, कलाकार, ग्राफ़िक डिज़ायनिंग और जाल प्रकाशन के अनेक रास्तों से गुज़रते हुए फिलहाल संयुक्त अरब इमारात के शारजाह नगर में साहित्यिक जाल पत्रिकाओं 'अभिव्यक्ति' और 'अनुभूति' के संपादन और कलाकर्म में व्यस्त।
प्रकाशित कृतियाँ : कविता संग्रह : वक्त के साथ (वेब पर उपलब्ध)ई मेल: abhi_vyakti@hotmail.com

धारावाहिक पंजाबी उपन्यास(किस्त- 33)



सवारी
हरजीत अटवाल
हिंदी अनुवाद : सुभाष नीरव

॥ अड़तीस ॥
इंडिया में बैठा शिन्दा भाइयों के पास इंग्लैंड आने के लिए उतावला होता। पिता की मृत्यु पर जब आने की तैयारी कर रहा था तो उसका मन पूरी तरह उमंग से भरा हुआ था। घर में अफ़सोस करने आए लोगों की परवाह भी वह भूल जाता। यहाँ पहुँचकर भी वह खुश था। पिता की मृत्यु का दुख था जो शीघ्र ही खत्म हो गया और अंतिम संस्कार के बाद शिन्दा इंग्लैंड के आनन्द को महसूस करने की रौ में आ गया। उसका आनन्द पौंड कमाने में ही था। पौंडों के लिए काम ज़रूरी था।
दुकान में तो वह आते ही काम में हाथ डालने लगा था। दुकान का काम उसको बहुत बढ़िया लगा। इंडिया गए लोग अपने भारी कामों की कहानियाँ सुना सुनाकर यूँ ही डराते रहते थे। दुकान का काम कहीं से भी भारी नहीं था। घंटे ही ज्यादा होते, और कुछ नहीं। सोहन सिंह के संस्कार तक तो शिन्दा जैसे भीड़ में घिरा रहा। बलदेव आ जाता और सतनाम भी। दूसरे गाँवों के लोग अफ़सोस प्रकट करने के लिए आते और मिलते रहते। गाँवों की बातें चल पड़तीं। सब अच्छा लगता। संस्कार के बाद वह एकदम अकेला हो गया। बलदेव तो अब जैसे आता ही नहीं था। सतनाम भी इतवार को आता और अजमेर के संग पब में जा घुसता। गुरिंदर भी अधिक बात न करती। वह बच्चों के संग अपने बच्चों की तरह खेलना चाहता, पर वे उसे बुलाते ही नहीं थे। अपितु उसकी बात पर मजाकिया लहजे में हँसने लग पड़ते।
उसे शीघ्र ही महसूस होने लग पड़ा था कि वह घर का तुच्छ-सा जीव था जबकि इंडिया में वह घर का मुखिया था। उसे गागू बहुत याद आने लगता जो कि उसका बहुत कहना मानता था। इसी तरह दोनों बेटियाँ भी। मिन्दो कभी रूठती तो कभी मान जाती, पर वह एक दबका मारता तो पानी की तरह उसके आगे घूमती फिरती। कभी कभी सक्क का दातुन करती तो गोरे रंग पर लाल अधर बहुत उभरते। यदि कभी शिन्दा रूठ जाता तो उसे सौ सौ नखरे करके मनाती। अब यह सब बहुत पीछे रह गया था। हज़ारों मील दूर। पर वह सारे फ्रीज हुए क्षण उसके सपनों में या ख़यालों में पिघल कर बहते और उसको तंग करते। उसकी नींद टूट जाती। जागता होता तो मन उचाट हो जाता।
उसे अपना रोजाना का रूटीन जो उसे पहले अच्छा लगता था, अब उबाऊ लगने लग गया था। सवेरे उठकर दुकान खोलता और रात के ग्यारह बजे तक खड़ी टांग रहता। ज्यादातर वास्ता उसका टोनी के साथ पड़ता था। टोनी से वास्ता पड़ने के कारण ही अंग्रेजी भी जल्दी सीख गया। उसके रूटीन में उसकी अपनी कोई मर्जी नहीं होती थी। वह फिल्मों का शौकीन था। इंडिया में होता था तो वीडियो घर मंगवा कर फिल्म देखता। नई लगी फिल्म का पहला शो देखने जालंधर या होशियारपुर जा पहुँचता। लेकिन यहाँ कभी टेलीविज़न के आगे बैठ ही नहीं सका था। यदि कभी बैठता तो बच्चे अपना प्रोग्राम देख रहे होते। यदि कभी कुछ देख भी रहा होता तो बच्चे एकदम चैनल बदल देते।
इंडिया में उसे बढ़िया कपड़े पहनने का बहुत शौक था। कभी क्रीज़ नहीं मरने देता था। पर अब वही ट्राउजर सवेरे उठकर टांगों में फंसाता और दुकान में आ घुसता। इंडिया से आते वक्त वह सोचा करता कि इंग्लैंड में आकर अजमेर की तरह पगड़ी ही बांधा करेगा। जब से सिगरेट की लत पड़ी तो उसने बाल कटवा दिए थे। वैसे ही कभी कभी शौकिया पगड़ी बांध लेता। उसका पासपोर्ट भी पगड़ी वाला था, पर यहाँ आकर उसे सतनाम का चेहरा पसंद था, बिलकुल क्लीन शेव्ड। एक दिन उसने भी कुछ वक्त लगाकर शेव कर मारी। उस दिन सतनाम और बलदेव भी संयोग से आए हुए थे। सतनाम का स्वभाव पहले ही मखौल करने वाला था। वह कहने लगा-
''ओए, यह क्या खुसरे की ऐड़ी जैसा मुँह निकाले फिरता है।''
''क्यों, अच्छा नहीं लगता ?''
''अच्छा तो लगता है, बल्कि बहुत अच्छा लगता है, पर अगर किसी गोरे ने पप्पी मांग ली तो हमारी बेइज्ज़ती तो हो जाएगी न।''
उसकी बात सुनकर सभी हँस पड़े। बलदेव बोला-
''अगर गोरे ने मांग ली तो निभ जाएगा, पर अगर कोई काला पीछे पड़ गया तो इसका क्या बनेगा।''
इस बात पर सब तरफ हँसी दौड़ गई। शिन्दा शर्मिन्दा सा हो गया और उसने फिर से पहले जैसी चोंच दाढ़ी रख ली। इंडिया में वह ड्राइवरों जैसा चेहरा-मोहरा बनाकर रखता था। खड़े बाल और चोंचवाली दाढ़ी। खैणी भी खा लेता था और सिगरेटें भी पी लेता, पर जब धार्मिक लहर चली तो सब छोड़ दिया था। अब टोनी को पीते देख उसका दिल करने लगता था। अजमेर सिगरेटों के बहुत खिलाफ़ था। इसलिए शिन्दे की हिम्मत न पड़ती। उस दिन बलदेव की कार में भी डरते हुए ही स्मोक किया था कि घर जाने पर किसी किस्म की गंध के कारण कोई मुसीबत ही न खड़ी हो जाए।
बलदेव भी बहुत बदल गया था। उसे कभी बलदेव अपने बहुत करीब प्रतीत होता था। पर अब वह पहले जैसा नहीं रहा था। वैसे भी उसकी हरकतें शिन्दे को अजीब लगतीं। वह दरियाओं के बारे में ही बातें करता रहता। शिन्दे को लगता कि विवाह के टूट जाने के कारण वह मानसिक तौर पर हिल गया था। बलदेव का गोरी के साथ रहना भी उसको अच्छा नहीं लगा था। फिर जब वह गोरी किसी दूसरे आदमी के साथ दुकान में कुछ खरीदने आई तो शिन्दा बहुत दुखी हुआ था। लोगों का यह कहना था कि गोरी औरतें भरोसेवाली नहीं होतीं, बहुत सच लगा था। इस बात से सतनाम ठीक था। बाहर कहीं मुँह नहीं मारता था। जहाँ सतनाम हर वक्त मजाक के मूड में रहता, वहीं अजमेर सदैव रौब डालता रहता। उसका स्व उसे सजग करता रहता कि मैं ही मैं हूँ।
अजमेर जो कहता, वह सत्य वचन कहकर मान लेता था। उसकी बातें शिन्दे को तंग भी करती, पर वह उफ्फ नहीं करता था। जिस दिन उसने पचास पौंड हफ्ता देने की बात सुनाई, वह भी उस दिन से जबसे शिन्दा आया था तो उसे अजमेर से सारे गिले भूल गए।
अजमेर ने पूछा, ''तू खुश भी है... ये पचास तेरे बचेंगे ही, बाकी का तेरा सारा खर्चा मैंने ही करना है।''
''भाजी, जैसा आपने कर दिया, ठीक ही है। मुझे तुम्हारी बात पसन्द है। तुमने सदा मेरा भला ही सोचना है।''
सतनाम ने बताया हुआ था कि इसे मान देता रहा कर। अजमेर ने आगे कहा, ''यह अब तू देख कि पैसे तूने लेने हैं या सीधे मिन्दो को भेजें।''
''भाजी, उसे ही भेज दो।''
''ऐसा न हो कि यहाँ से पैसे जाते रहें और वो वहाँ खर्च करती रहे। मुझे पता है कि उसका हाथ ज़रा खुला है।''
''नहीं भाजी, वह ऐसी नहीं है। घर के खर्चे ही बहुत हैं। तीन बच्चे पढ़ते हैं। ज़मीन तुम्हें पता ही है कि कितनी है। हमारा घर तो तुम्हारे सिर पर ही चलता था, पहले भी और अब भी।''
अजमेर खुश हो गया। वह मिन्दो को पैसे भेजने के बारे में सोचने लगा। मिन्दो की चिट्ठी भी आई हुई थी। पैसों की मांग की थी।
शिन्दे को ख़त आते रहते थे। वह भी जवाब देता रहता। गागू उसे अलग चिट्ठी लिखता और दोनों लड़कियाँ अलग। कभी कभी शिन्दा फोन भी कर लेता। फोन मंहगा पड़ता था। अजमेर आँखें निकालने लगता था। फिर फोन करने -सुनने के लिए मिन्दो को बाहर आना पड़ता था। यह भी शिन्दे को पसन्द नहीं था।
अजमेर की अन्य किसी बात का तो वह बुरा न मनाता, पर उसका शकी स्वभाव उसे बहुत बुरा लगता था। टोनी पर शक करता, उसे अकेले गल्ले पर अकेला न छोड़ता। ऐसे ही बलदेव भी उससे खफ़ा था। शिन्दा गल्ले पर खड़ा होता तो टोनी के कान में कुछ कहने लगता। शिन्दा जला-भुना बियर का डिब्बा खोल लेता। कई बार बाहर से लौटा अजमेर पूछता कि उसके पीछे कौन कौन दुकान में आए थे। उसका अर्थ यह होता कि कहीं शिन्दा पैसे निकालकर ही न किसी को पकड़ाता रहा हो। बलदेव तो दुकान में आता ही कम था। उसका इशारा सतनाम की तरफ ही अधिक होता।
उस दिन शिन्दे को बहुत तकलीफ़ हुई थी जिस दिन बियर की छोटी सी बोतल की चोरी के कारण अजमेर ने उसे अपमानित किया था। दुकान में वह अकेला किधर किधर हो सकता था। उस दिन के बाद शिन्दे ने सोच लिया था कि छोटी मोटी चोरी के बारे में वह अजमेर को बताएगा ही नहीं। कई बार टोनी की गर्ल फ्रेण्ड आती तो टोनी बियर उसे देकर शिन्दे को पैसे देने लगता। शिन्दा अब लेने से इन्कार करने लगा था। ऐसे ही टोनी की बेटी भी अपने किसी न किसी ब्वॉय फ्रेण्ड को लेकर आ जाती, अब शिन्दा उसको थोड़ी-बहुत रियायत कर देता।
मुनीर और प्रेम शर्मा का दुकान में आना उसे अच्छा लगता था। मुनीर उससे खालिस्तान की बातें करने लगता। इस लहर के बारे में बात छेड़ते हुए मुनीर कहता-
''इसी तहरीक से सिक्खों का भला होसी।''
''भला तो पता नहीं किसका होगा, पर पंजाब मे आम बंदे की हालत बहुत बुरी है, अंधी को बहरा घसीटे फिरता है।''
''जो भी होसी, पर खालिस्तान तो बणसी।''
''मीआं, सब अखबारी रौले हैं।''
''शिन्दे, तुझे पता ना होसी, कभी साउथाल जाके देख, पूरा खालिस्तान बना है।''
''ये साउथाल कहाँ है ?''
शिन्दा कहता और फिर सोचने लगता कि अब बलदेव आया तो कहूँगा कि साउथाल लेकर चले। पर बलदेव लौटकर उसे चक्कर लगवाने के लिए लेकर ही न गया।
एक दिन प्रेम शर्मा उससे पूछने लगा-
''शिन्दे, कैसे स्टे मिल गई।''
''कैसी स्टे ?''
''यही, पुलिटिकल असाईलम की।''
''पता नहीं, भाजी को पता है।''
''अप्लाई तो कर रखा है ?''
''यह भी भाजी को ही पता है।''
''देखना कहीं....। यह तो जल्दी से जल्दी कर देना चाहिए।''
रात में उसने अजमेर से बात करते हुए कहा-
''आज प्रेम पूछ रहा था कि असाईलम के लिए अप्लाई किया कि नहीं। पक्के होने के बहुत चांस हैं।''
उसकी बात सुनकर अजमेर गुस्से में आकर बोला-
''जब हम खालिस्तानी है ही नहीं तो.... इस बामण की टांगें तो मैं चीरूंगा।''
(जारी…)
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मंगलवार, 7 दिसंबर 2010

गवाक्ष – दिसंबर 2010



“गवाक्ष” ब्लॉग के माध्यम से हम हिन्दी ब्लॉग-प्रेमियों को हिन्दी/पंजाबी के उन प्रवासी लेखकों/कवियों की समकालीन रचनाओं से रू-ब-रू करवाने का प्रयास करते आ रहे हैं जो अपने वतन हिन्दुस्तान से कोसों दूर बैठकर अपने समय और समाज के यथार्थ को अपनी रचनाओं में रेखांकित कर रहे हैं। “गवाक्ष” में अब तक विशाल (इटली), दिव्या माथुर (लंदन), अनिल जनविजय (मास्को), देवी नागरानी(यू.एस.ए.), तेजेन्द्र शर्मा(लंदन), रचना श्रीवास्तव(लंदन), पूर्णिमा वर्मन(दुबई), इला प्रसाद(यू एस ए), भगत धवन (डेनमार्क), चाँद शुक्ला (डेनमार्क), वेद प्रकाश ‘वटुक’(यू एस ए), रेखा मैत्र (यू एस ए), तनदीप तमन्ना (कनाडा), प्राण शर्मा (यू के), सुखिन्दर (कनाडा), सुरजीत(कनाडा), डॉ सुधा धींगरा(अमेरिका), मिन्नी ग्रेवाल(कनाडा), बलविंदर चहल (न्यूजीलैंड), बलबीर कौर संघेड़ा(कनाडा), शैल अग्रवाल (इंग्लैंड), श्रद्धा जैन (सिंगापुर), डा. सुखपाल(कनाडा), प्रेम मान(यू.एस.ए.), (स्व.) इकबाल अर्पण, सुश्री मीना चोपड़ा (कनाडा), डा. हरदीप कौर संधु(आस्ट्रेलिया), डा. भावना कुँअर(आस्ट्रेलिया) आदि की रचनाएं और पंजाबी कथाकार-उपन्यासकार हरजीत अटवाल के उपन्यास “सवारी” के हिंदी अनुवाद की इकत्तीसवीं किस्त आपने पढ़ीं। “गवाक्ष” के दिसंबर 2010 अंक में प्रस्तुत हैं – स्वीडन से अनुपमा पाठक की कविताएं तथा हरजीत अटवाल के धारावाहिक पंजाबी उपन्यास “सवारी” की बत्तीसवीं किस्त का हिंदी अनुवाद…

स्वीडन से
अनुपमा पाठक की कविताएँ


॥एक॥
इंसानियत का आत्मकथ्य


गुजरती रही सदियाँ
बीतते रहे पल
आये
कितने ही दलदल
पर झेल सबकुछ
अब तक अड़ी हूँ मैं!
अटल खड़ी हूँ मैं!

अट्टालिकाएं करें अट्टहास
गर्वित उनका हर उच्छ्वास
अनजान इस बात से कि
नींव बन पड़ी हूँ मैं!
अटल खड़ी हूँ मैं!

देख नहीं पाते तुम
दामन छुड़ा हो जाते हो गुम
पर मैं कैसे बिसार दूं
इंसानियत की कड़ी हूँ मैं!
अटल खड़ी हूँ मैं!

जब जब हारा तुम्हारा विवेक
आये राह में रोड़े अनेक
तब तब कोमल एहसास बन
परिस्थितियों सेलड़ी हूँ मैं!
अटल खड़ी हूँ मैं!

भूलते हो जब राह तुम
घेर लेते हैं जब सारे अवगुण
तब जो चोट कर होश में लाती है
वो मार्गदर्शिका छड़ी हूँ मैं!
अटल खड़ी हूँ मैं!

मैं नहीं खोयी खोया है तुमने वजूद
इंसान बनो इंसानियत हो तुममें मौजूद
फिर धरा पर ही स्वर्ग होगा
प्रभुप्रदत्त नेयमतों में, सबसे बड़ी हूँ मैं!
अटल खड़ी हूँ मैं!
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॥दो॥
ऐसा हो...!!!


मान-अभिमान से परे
रूठने-मनाने के सिलसिले सा
कुछ तो भावुक आकर्षण हो!

किनारे पर रेत से घर बनाता
और अगले पल उसे तोड़ छोड़
आगे बढ़ता सा
भोला भाला जीवन दर्शन हो!

नमी सुखाती हुई
रुखी हवा के विरुद्ध
नयनो से बहता निर्झर हो!

परिस्थितियों की दुहाई न देकर
अन्तःस्थिति की बात हो
शाश्वत संघर्ष
आत्मशक्ति पर ही निर्भर हो!

भीतर बाहर
एक से...
कोई दुराव-छिपाव नहीं
व्यवहारगत सच्चाइयां
मन प्राण का दर्पण हो!

सच के लिए
लड़ाई में
निजी स्वार्थों के हाथों
कभी न आत्मसमर्पण हो!
॥तीन॥
कविता
बनती रहे कविता
शब्द थिरकते रहे अपनी लय में
भाव नित परिमार्जित होता रहे अपने वेग से
लेखक और पाठक...संवेदना के एक ही धरातल पर हो खड़े
भेद ही मिट जाये...
फिर सौंदर्य ही सौंदर्य है इस विलय में!!!!

जीने के लिए जमीन के साथ-साथ
आसमान का होना भी जरूरी है
धरती पे रोपे कदम...सपने फ़लक पे भाग सकें
फिर सृजन की संभावनाएं पूरी हैं
हो विश्वास का आधार...हो स्नेह का अवलंब
नहीं तो नैया डूब जाती है संशय में!!!!

बहती रहे कविता सरिता की तरह
शब्द थिरकते रहे अपनी लय में
जीवन की आपाधापी में कुछ क्षणों का अवकाश हो
कुछ लम्हे एकाकी से पास हो
निहारने को आसपास बिखरी अद्भुत रश्मियाँ...
और डूब जाने को विष्मय में!!!!

यही तो सहेजा जायेगा...
और शब्दों में सजकर नयी आभा में प्रगट हो पायेगा
एक पल की अनुभूति का मर्म
विस्तार को प्राप्त हो नीलगगन की गरिमा पायेगा
ये कालजयी भावनाएं ही बच जाएँगी...
नहीं तो...यहाँ कहाँ कुछ भी बच पाता है प्रलय में!!!!
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अनुपमा पाठक जमशेदपुर से हैं और बचपन से कविताएँ लिखती रही हैं। रचनाओं का संकलन नहीं हो पाया। अभी कुछ समय से अपनी वेबसाइट “अनुशील” http://www.anusheel.in/ पर लिख रही हैं। शिक्षा जमशेदपुर में ही हुई, फिर वाराणसी से बोटनी में स्नातक की डिग्री ली और फिर बॉयो-इनफॉर्मेटिक में परास्नातक। एक वर्ष विद्यालय में अध्यापन कार्य भी किया। अध्ययन –अध्यापन में रूचि है। बॉयो-इनफार्मेटिक में पी.एचडी के लिए प्रयासरत। फिलहाल, गत एक वर्ष से स्टॉकहॉम ( स्वीडन ) में रह रही हैं।
ईमेल : anupama623@gmail.com
anushil623@rediffmail.com
वेब साइट : http://www.anusheel.in/