सोमवार, 6 फ़रवरी 2012

गवाक्ष – फरवरी 2012


जनवरी 2008 “गवाक्ष” ब्लॉग के माध्यम से हम हिन्दी ब्लॉग-प्रेमियों को विदेशों में रह रहे हिन्दी/पंजाबी के उन लेखकों/कवियों की समकालीन रचनाओं से रू-ब-रू करवाने का प्रयास करते आ रहे हैं जो अपने वतन हिन्दुस्तान से कोसों दूर रहकर अपने समय और समाज के यथार्थ को अपनी रचनाओं में रेखांकित कर रहे हैं। “गवाक्ष” में अब तक विशाल (इटली), दिव्या माथुर (लंदन), अनिल जनविजय (मास्को), देवी नागरानी(यू.एस.ए.), तेजेन्द्र शर्मा(लंदन), रचना श्रीवास्तव(लंदन), पूर्णिमा वर्मन(दुबई), इला प्रसाद(यू एस ए), भगत धवन (डेनमार्क), चाँद शुक्ला (डेनमार्क), वेद प्रकाश ‘वटुक’(यू एस ए), रेखा मैत्र (यू एस ए), तनदीप तमन्ना (कनाडा), प्राण शर्मा (यू के), सुखिन्दर (कनाडा), सुरजीत(कनाडा), डॉ सुधा धींगरा(अमेरिका), मिन्नी ग्रेवाल(कनाडा), बलविंदर चहल (न्यूजीलैंड), बलबीर कौर संघेड़ा(कनाडा), शैल अग्रवाल (इंग्लैंड), श्रद्धा जैन (सिंगापुर), डा. सुखपाल(कनाडा), प्रेम मान(यू.एस.ए.), (स्व.) इकबाल अर्पण, सुश्री मीना चोपड़ा (कनाडा), डा. हरदीप कौर संधु(आस्ट्रेलिया), डा. भावना कुँअर(आस्ट्रेलिया), अनुपमा पाठक (स्वीडन), शिवचरण जग्गी कुस्सा(लंदन), जसबीर माहल(कनाडा), मंजु मिश्रा (अमेरिका), सुखिंदर (कनाडा), देविंदर कौर (यू के) और नीरू असीम(कैनेडा) आदि की रचनाएं और पंजाबी कथाकार-उपन्यासकार हरजीत अटवाल के उपन्यास “सवारी” के हिंदी अनुवाद की तेंतालीसवीं किस्त आपने पढ़ीं। “गवाक्ष” के फरवरी 12 अंक में प्रस्तुत हैं – मंजु मिश्र की कुछ कविताएँ तथा हरजीत अटवाल के धारावाहिक पंजाबी उपन्यास “सवारी” की चौवालीसवीं किस्त का हिंदी अनुवाद…

कैलिफोर्निया(यू।एस.ए.) से

मंजु मिश्रा की कुछ कविताएँ

ख्वाहिशें - कुछ अलग अलग रंग

1
मेरी ख्वाहिशों ने
रिश्ते जोड़ लिए आसमानों से
उगा लिए हैं पंख
और उड़ने लगी हैं हवाओं में
अब तो बस !
ख़ुदा ही ख़ैर करे !!
2
अल्लाह !
ये ख्वाहिशों की उड़ान
कहीं, दम ही न ले ले
ख़ुदा ही जाने,
पांव कहाँ तक साथ देंगे ?
3
रोशनी चुभती हैं
पांवों के छाले फूटते हैं
आँखों के ख़्वाब दम तोड़ते हैं
ऐसे में भी जीने की ख्वाहिश
वल्लाह ..
ज़िंदगी भी क्या चीज है !
4
कितनी ख्वाहिशों ने
दम तोड़े हैं
तब कहीं जा कर
यह तजुर्बे की चाँदी चढ़ी है
बाल धूप में नहीं पकते !!



क्षणिकाएं : चलो जुगनू बटोरें...



1
रिश्ते,
बुनी हुयी चादर
एक धागा टूटा
बस उधड़ गए…
2
देहरी के दिए की
लौ कांपती है,
बाहर आंधियां तेज हैं
3
हमेशा अनबन-सी रही,
आँखें और होठ
अलग-अलग राग अलापते रहे
4
चलो जुगनू बटोरें
चाँद तारे
मिलें न मिलें …

मुट्ठी भर सुख का पावना

समय
जब अपनी बही खोल कर बैठा
हिसाब करने,
तो मैं
सोच में पड़ गयी...

पता ही नहीं चला
कब
मुट्ठी भर सुख का पावना
इतना बढ़ गया, कि
सारी उम्र बीत गयी
सूद चुकाते चुकाते
मूल फिर भी
जस का तस



सन्नाटा : अलग-अलग अंदाज़

1
यूँ तो
ख़ामोश है रात
पर सन्नाटे का भी
अपना अलग राग है

सुनो तो कान देकर -
सुनाई देंगी
रात की सिसकियाँ
2
ख़ामोश सी फिजायें
चुप चुप -सा है समां
फ़िर भी रात
सन्नाटी नहीं
3
तोड़ लो
मगर ख़ामोशी से,
सितारों के फूल...
चाँद न जागे
सन्नाटे का जादू टूट जायेगा
००


मंजु मिश्रा
जन्म : 28 जून 1959, लखनऊ(उत्तर प्रदेश)।
शिक्षा : एम। ए.(हिन्दी)
सृजन : कविताएँ, हाइकु, क्षणिकाएँ, मुक्तक और ग़ज़ल।
सम्प्रति : व्यापार विकास प्रबंधक, कैलिफोर्निया (यू।एस.ए.)
ब्लॉग :
http://manukavya.wordpress.कॉम
ईमेल :
manjushishra@gmail.com

धारावाहिक पंजाबी उपन्यास(किस्त- 44)





सवारी

हरजीत अटवाल
हिंदी अनुवाद : सुभाष नीरव


॥ उनचास ॥
सतनाम ने ड्रिंक डालकर हाथ में पकड़ी हुई थी। न पी रहा था और न ही मेज पर रख रहा था। नशे में होने की वजह से हाथ हिल जाता और शराब छलक जाती। दोनों बच्चे पास ही बैठे थे। मनजीत घर का काम करती इधर-उधर आ-जा रही थी। टेलीविज़न पर नया एशियन प्रोग्राम लगा रखा था। बच्चों ने देखा कि उसका ध्यान कहीं और था तो उन्होंने आहिस्ता से रिमोट दबाकर कार्टून लगा लिए। मनजीत ने पूछा -
''रोटी ले आऊँ कि हो गया ?''
''डिंपल कपाड़िया, प्रेम चोपड़ा ने मेरा साथ दिया, शिन्दे को तरीके से निकालकर ले गया जैसे मक्खन में से बाल निकालते हैं। इसका कोई तोड़ सोच, मेरी डिंपल कपाड़िया।''
''सोचना क्या है, दूसरा आदमी रख लो।''
''तूने बात कर दी न टुनटुन वाली। अरे, तुझे बताया तो है कि स्किल्ड बुच्चर दो ढाई सौ मांगते हैं।''
''और तुम तो कहते थे कि आर्थर है।''
''है, आर्थर भी, वह भी इससे कम में नहीं मानता।''
''इतना !''
''इसी तरह के योद्धे मिलते हैं सौ में, यह तो ऐसे होता है जैसे अमिताभ बच्चन के आगे रिशी कपूर।''
उसने गिलास में से छोटा-सा पैग भरा और बोला-
''प्रेम चोपड़ा सीधे ही सौ पोंड हफ्ते का बचा गया। टोनी लेता था दो सौ और ये मुकरी वही काम करेगा सौ में।''
''तुम कह देते, हमारा गुजारा नहीं होता शिन्दे के बिना।''
''तुझे पता है बिन्दू कि मैं उसके सामने बिना पिये बोल नहीं सकता।''
''पीकर बोल लो।''
''अब साँप निकल गया, लकीर को पीटता रहूँ ! उसके पास बहाना ही ऐसा था कि टोनी छुट्टियाँ पर जा रहा है। शिन्दे के कारण मैंने माइको को हटा दिया था।''
सतनाम जानता था कि अब माइको वापस आने के लिए नखरे दिखाएगा। तनख्वाह बढ़ाने के लिए भी ज़ोर डालेगा। माइको को वापस लाने का तरीका एक ही था कि आर्थर को काम पर रखने का भय दिखाया जाए। वैसे आर्थर को काम पर रखकर वह ज्यादा खुश नहीं होता, क्योंकि आर्थर भी विश्वसनीय व्यक्ति नहीं था कि कब काम छोड़कर चलता बने। शिन्दे का इस प्रकार जाना उसको एक धक्के की भाँति लगा। शिन्दे के सिर पर दुकान छोड़कर वह कहीं भी हो आता था। कई कई घंटे बाहर रह सकता था। शिन्दे का वापस लौटना अब इतना सरल नहीं था।
माइको पुन: उसके संग काम करने आ लगा। सब कुछ पहले की भाँति हो गया, पर शिन्दे वाला अभाव पूरा नहीं होता था। शिन्दे को सभी याद करते। सभी उसकी बातें करते रहते, खासतौर पर जुआइस। वह तो शिन्दे से मिलने अजमेर की दुकान पर भी हो आती। यदि अजमेर वहाँ होता तो उसे देखकर आँखें निकालने लग पड़ता। वह उसको देखते ही लौट पड़ती। कभी कभी मगील जुआइस से कहने लगता -
''मुझे तेरी बहुत चिंता है।''
''क्यों ?''
''सोचता हूँ कि शैनी(शिन्दे) के बिना तेरा दिल कैसे लगता होगा ?''
''तू फिक्र न कर बुङ्ढे, तेरी मुझे ज़रूरत नहीं पड़ने वाली।''
यह सच था कि वह शिन्दे की कमी महसूस करती थी। वह शिन्दे को प्यार करने लगी थी। वह सतनाम से कहने लगती-
''तेरा भाई बहुत अच्छा है। इस दुनिया में बुरे लोगों की चलती है, उसके जैसे शरीफों की नहीं।''
उसकी बात सुनकर सतनाम मन ही मन बोला कि यदि शरीफ़ होता तो साला पार्टियाँ न बदलता घूमता।
शिन्दे का चले जाना कुछ दिन तक तो उससे स्वीकार ही नहीं हुआ था। फिर वह सोचने लगा कि कोशिश जारी रखनी चाहिए कि किसी तरह वह वापस आ जाए। शिन्दे के होते जो फायदे थे, शिन्दे के चले जाने पर और अधिक उभर कर सामने आने लगे। वह हाईबरी पहले की तरह ही जाता। जब से उसने दुकान खोली थी, हफ्ते में दो-तीन बार ताज़ा स्प्रिंग लैम्ब अजमेर को देकर आता था। जिस दिन भी नई डिलीवरी आती तो वह गुजरते हुए दो पोंड मीट उधर दे जाता। अब भी जाता। उसका टोनी, शिन्दे और गुरिंदर के साथ भी हँसी-मजाक चलता रहता था। गुरिंदर उसकी कई बातों पर खीझ भी उठती, पर उसके आने पर लगता कि आसपास का वातावरण हरकत में आ रहा है। अजमेर के स्वभाव का तो पता ही नहीं था कि किस वक्त उसको चढ़ जाएगी और दूसरे की वह उतार कर रख देगा।
सतनाम शिन्दे को छेड़ता हुआ कहता-
''अच्छा भला मीट का काम सीख चला था, इंडिया जाकर बेशक गाँव के अड्डे पर मीट की दुकान खोल लेता।''
प्रत्युत्तर में शिन्दा कहता-
''तुम भाई भाई जैसा मर्जी करो, चाहे मुझे झटकाई बनाओ या ठेकेदार या फिर मुनीर वाला वांगलू।''
एक दिन गुरिंदर सतनाम से बोली-
''तेरे भाजी को तो पता ही नहीं चलता कुछ, देख बलदेव को गए कितना वक्त हो गया। बेचारा लौटकर नहीं आया। जा, तू ही बुला ला उसको।''
''जट्टिये, मुझे लगता है, वह अब इंटरवल के बाद ही आएगा।''
गुरिंदर को उसकी यह बात अच्छी न लगी और कहने लगी-
''इतने महीने हो गए, अभी तक तुम्हारा इंटरवल ही नहीं हुआ ? मैं तो कहती हूँ कि अजीब भाई हो तुम लोग, मुँह पर एक दूजे की तारीफ़ें करने लगते हो, ज़रा इधर-उधर हुए नहीं कि तू कौन, मैं कौन।''
''जट्टिये, सारी दुनिया ही ऐसी है।''
बियर का घूंट भरकर अजमेर कहने लगा-
''इसने तो भई लहू पी लिया।''
''किसने ?''
''ये शिन्दे के बच्चे ने।''
''क्या बात हो गई ?''
''कुछ न पूछ, न साला टोनी जाता, न यह जड़ों में बैठता। अब टोनी को साइन करके ज्यादा पैसे देने होंगे। वह फुल टाइम को मानता ही नहीं।''
उसकी बात सुनता सतनाम बिल्ली झपट्टे के लिए तैयार होता हुआ बोला-
''मैं भी सुनूँ, यह कहता क्या है ?''
''कहना क्या है, सवेरे उठता ही पीने लग पड़ता है। कुछ सामने पीता है और कुछ चोरी से। ऊपर से सिगरेटें भी पीता है।''
''अच्छा, सिगरेटों का तो मुझे नहीं पता।''
''मैंने तो पकड़ा है इसे। मैंने पूरा हिसाब लगाकर देखा कि इसका दस से पन्द्रह पोंड का फालतू खर्च है रोज़ का। लगाकर देख हिसाब, बात कहाँ पहुँचती है। मैं तो परेशान हुआ पड़ा हूँ।''
''यह तो बिलकुल गलत है, दुकानें इतना बोझ कहाँ झेलती हैं। इसे समझाना था।''
''समझाऊँ क्या !... अगर कुछ कहूँ तो गुस्सा हो जाता है। लहू पी रखा है। गुरिंदर अलग लड़ने लगती है।''
''गुस्सा होने का क्या मतलब हुआ। जब वह गलती करता है तो रोकना तो हुआ ही। चुरा कर पीने का क्या मतलब ! धमकाना था ज़रा।''
''क्या धमकाऊँ ! पहले बलदेव छोटी सी बात पर गुस्सा होकर चला गया जैसे कोई डंडा मारा हो... अब इसे कुछ कहा तो... इसे इतना समझ में नहीं आता कि इसकी तनख्वाह तो एडवांस में इसकी औरत को दे आया हूँ।''
''भाई, कोई बात नहीं। हौसला रख। मैं इसको समझाता हूँ, बात इसके खाने में डालता हूँ।”
''मैंने तो मज़बूर होकर ही बात तुझे बताई है, तू ही इसके साथ बात कर।''
पब में से उठकर वे दुकान पर आ गए। सतनाम ने शिन्दे की तरफ देखा। शिन्दे ने नज़रें झुका लीं। सतनाम ने कहा-
''आ भई गब्बर सिंह, एक दो बातें करें।''
शिन्दा गल्ला छोड़कर बाहर निकल आया। उसके हाथ काँप रहे थे। सतनाम ने चिंतित होकर पूछा-
''क्यूँ, क्या हुआ तुझे ?''
''कुछ नहीं, यूँ ही सिर सा दुखता है।''
सतनाम उसके कंधे पर हाथ रख उसको दुकान में से बाहर ले आया। शिन्दा कहने लगा-
''यार, भाजी मेरे साथ बहुत बुरा व्यवहार करता है। रात में जी भर कर पीता है और फिर मेरे पर ही बिगड़ता है। मुझे तो वापस इंडिया ही चढ़ा दो, यहाँ मेरी कुत्ते बराबर कदर नहीं।''
''इस मुल्क में कुत्तों के तो मेन रोल होते हें... तू यूँ न देवदास वाला रोल किए जा।''
''मेरी तो बस करवा दी इसने। लाख रुपया क्या दे आया है, अब बातों से मेरा खून पीना चाहता है।''
''बात यह है भई कि एक तो शराब कम कर और ध्यान से काम कर। जिसने तनख्वाह देनी है, वो काम तो चाहेगा ही।''
''मैं काम से कब इन्कार करता हूँ।''
''शराब तो पीता है न।''
''यह तो भाजी ने मुझे अपसेट ही इतना किया हुआ है कि रहा नहीं जाता।''
''सोच ले, अगर नहीं दिल लगता तो उधर आ जा, पर मेरा नाम न लेना।''
शिन्दा कुछ न बोला। वह पुन: दुकान में आ गए।
घर पहुँचकर सतनाम मनजीत से कहने लगा-
''ओ मेरी पूनम ढिल्लों, तेरा देवर आ रहा है, एक रूम सैट कर दे।''
''सच, बलदेव मान गया ?''
''अरी शर्मिला टैगोर, तेरा एक ही देवर है कहीं। उधर जट्टी को भी बलदेव की ही पड़ी हुई है, साला बलदेव ही संजय दत्त हो गया। सारा मूड ही खराब कर दिया।''
''और कौन आ रहा है ?''
''शिन्दा ! उधर प्रेम चोपड़ा की उसके साथ शूटिंग ठीक नहीं चल रही।''
''शिन्दे को हम नहीं रखेंगे। मैं तो किसी को भी नहीं रखना चाहती। पर शिन्दे को तो बिलकुल ही नहीं। जाकर बहन जी से पूछो, कितना गन्दा है वह।''
''ज़रा होश से काम ले, हमेशा बिन्दू ही न बनी रहा कर। अब हमें उसकी सख्त ज़रूरत है। सोच कर देख, उसके आने से हमारे कितने पैसे बचते हैं। और फिर घर में, मेरी भी चल लेने दिया कर। तू मुझे हीरो तो क्या, साइड हीरो भी नहीं समझती।''
(जारी…)
00

लेखक संपर्क :
67, हिल साइड रोड,साउथाल,

मिडिलसेक्स, इंग्लैंड

दूरभाष : 020-85780393,07782-265726(मोबाइल)

बुधवार, 18 जनवरी 2012

गवाक्ष – जनवरी 2012




जनवरी 2008 “गवाक्ष” ब्लॉग के माध्यम से हम हिन्दी ब्लॉग-प्रेमियों को विदेशों में रह रहे हिन्दी/पंजाबी के उन लेखकों/कवियों की समकालीन रचनाओं से रू-ब-रू करवाने का प्रयास करते आ रहे हैं जो अपने वतन हिन्दुस्तान से कोसों दूर रहकर अपने समय और समाज के यथार्थ को अपनी रचनाओं में रेखांकित कर रहे हैं। “गवाक्ष” में अब तक विशाल (इटली), दिव्या माथुर (लंदन), अनिल जनविजय (मास्को), देवी नागरानी(यू।एस.ए.), तेजेन्द्र शर्मा(लंदन), रचना श्रीवास्तव(लंदन), पूर्णिमा वर्मन(दुबई), इला प्रसाद(यू एस ए), भगत धवन (डेनमार्क), चाँद शुक्ला (डेनमार्क), वेद प्रकाश ‘वटुक’(यू एस ए), रेखा मैत्र (यू एस ए), तनदीप तमन्ना (कनाडा), प्राण शर्मा (यू के), सुखिन्दर (कनाडा), सुरजीत(कनाडा), डॉ सुधा धींगरा(अमेरिका), मिन्नी ग्रेवाल(कनाडा), बलविंदर चहल (न्यूजीलैंड), बलबीर कौर संघेड़ा(कनाडा), शैल अग्रवाल (इंग्लैंड), श्रद्धा जैन (सिंगापुर), डा. सुखपाल(कनाडा), प्रेम मान(यू.एस.ए.), (स्व.) इकबाल अर्पण, सुश्री मीना चोपड़ा (कनाडा), डा. हरदीप कौर संधु(आस्ट्रेलिया), डा. भावना कुँअर(आस्ट्रेलिया), अनुपमा पाठक (स्वीडन), शिवचरण जग्गी कुस्सा(लंदन), जसबीर माहल(कनाडा), मंजु मिश्रा (अमेरिका), सुखिंदर (कनाडा) और देविंदर कौर (यू के) आदि की रचनाएं और पंजाबी कथाकार-उपन्यासकार हरजीत अटवाल के उपन्यास “सवारी” के हिंदी अनुवाद की इकतालीसवीं किस्त आपने पढ़ीं। “गवाक्ष” के जनवरी अंक में प्रस्तुत हैं – नीरू असीम(कैनेडा) की पंजाबी कविता तथा हरजीत अटवाल के धारावाहिक पंजाबी उपन्यास “सवारी” की बयालीसवीं किस्त का हिंदी अनुवाद…


कैनेडा से
नीरू असीम की कविता
पंजाबी से अनुवाद : सुभाष नीरव

लड़की

उसने लड़की को कहा
तू चिड़िया, तू हवा
लड़की उड़ती रही
और समझती रही
वह चिड़िया, वह हवा

उसने लड़की से कहा
तू तो अबला बहुत
लड़की हैरान थी
फिर भी चुप ही रही
मान गई सहज भाव से
लगी प्रतीक्षा करने
सुर्ख उजाले के राह

उसने लड़की से कहा
जाग ऐ दुर्गा माँ
लड़की ने ज़िन्दगी को
मोर्चा बना लिया
कदम कदम पर
युद्ध का
बिगुल बजा लिया
और लड़की लड़ती रही
खत्म होती रही
मरती रही

फिर लड़की ने कहा
मैं सहज रूह हूँ
मैं सहज प्राण हूँ
मैं कुछ और नहीं

न मेरे लिए
कोई अलग निज़ाम
न मेरे अन्य नाम
न न्यारे पैगाम
मैं वही हूँ जो हूँ

मैं युगों से युगों तक
एक सिलसिला

मैं सहज रूह हूँ
मैं सहज प्राण हूँ
फिर लड़की ने कहा
मैं कोई और नहीं...
00
(यह कविता पंजाबी कवयित्री सुरजीत के ब्लॉग 'सृजनहारी' में पंजाबी में प्रकाशित हुई है)

कवयित्री का ई मेलjindal_neeru@yahoo.ca

धारावाहिक पंजाबी उपन्यास(किस्त- 43)


सवारी
हरजीत अटवाल
हिंदी अनुवाद : सुभाष नीरव


॥ अड़तालीस ॥
बलदेव सुबह उठा तो लिज़ ज़ागी बैठी थी। उसने टेक लगाकर सिर पीछे की ओर किया हुआ था। बलदेव ने पूछा-
''तू ठीक है ?''
''हाँ, सिगरेट की तलब हो रही है, पर सिगरेट है नहीं।''
बलदेव भी उठकर बैठ गया। उसने लिज़ क़ी ओर देखा। उसकी लम्बी गर्दन जानी-पहचानी लगी। उसने आगे बढ़कर उसकी गर्दन पर चुम्बन दिया। एक पल के लिए उसको लगा कि मानो यह गर्दन गुरां की हो। फिर उसको याद आया कि गुरां उस दिन इसी जगह पर बैठी गा रही थी, पर उसने तो उसकी गर्दन को चूमा ही नहीं था। उसने गुरां को छुआ तक नहीं था। वह पूरी रात एलीसन के साथ जागकर लौटा जो था। उसको अपने गुनाह का एकदम अहसास हो गया। वह समझ गया कि गुरां उस दिन गीत बीच में क्यों छोड़ गई थी। लिज़ ने उसको हिला कर कहा-
''डेव, तू कहाँ गुम हो गया ?''
''कहीं नहीं।''
''फिर मेरी बात का जवाब क्यों नहीं देता ?''
''कौन सी बात ?''
''तूने मेरे साथ सोने की गलती क्यों की ?''
''लिज़, यह तेरी ही इच्छा थी, मैंने तो बस पूछा था।''
''फिर कंडोम क्यों नहीं इस्तेमाल किया ?''
''मैं कभी रखता नहीं ऐसी चीज़ें।''
''वहाँ डिस्को की टॉयलट में मशीन थी।''
''डार्लिंग, डोंट वरी, कोई गोली खा ले।''
''यह बात नहीं डेव, मैं कभी उस मर्द के साथ नहीं सोती जिसको जानती न होऊँ, कल तेरे साथ डिस्को पर गई तो...।''
बलदेव उसकी बात से ध्यान हटाकर गुरां के विषय में सोचने लगा। लिज़ उठकर बाथरूम में चली गई। कल शाम लिज़ ने ही कहा था कि चल, डिस्को चलें और बलदेव तैयार हो गया था। इसमें उसकी कोई गलती नहीं थी। लिज़ क़ी सोच से अपने आप को मुक्त करके वह गुरां को फोन लगाने या किसी तरह से मिलने जाने की योजना बनाने लगा।
जब काम के लिए आदमी रखने का सवाल आया तो उसके मन में शिन्दे का नाम उभरा। क्यों न उसको ले आए। सौ पौंड में सातों दिन काम करेगा। पर लाएगा कैसे, यह उसकी समझ में नहीं आ रहा था। अजमेर के वह सामने नहीं पड़ना चाहता था। फिर उसके मन में आया कि सीज़न खत्म होने के बाद शिन्दे को तनख्वाह कहाँ से देगा। शिन्दे के बाद गैरथ का नाम उसके पास था। उसने गैरथ से जाकर बात की लेकिन वह अपनी बिल्ली को लेकर बहुत चिंतित था। बैटरसी फर्नपार्क से इतनी दूर पड़ता था कि आने में ही दो घंटे लग जाने थे। गैरथ खाली रहने का अभ्यस्त हो गया था। उसका काम के लिए मन कहाँ करना था।
जिस दिन गैरथ को मिलने गया तो उसने सतनाम की दुकान का चक्कर काटा। सतनाम वर्क-टेबल पर झुका मीट काट रहा था। बलदेव दूर से देखकर आगे बढ़ गया। फिर उसने स्टेयरिंग हाईबरी की ओर घुमा लिया। इस पिकअप में पहचाने जाने का डर भी कम था। हाईबरी जाकर उसका दिल गुरां से मिलने को उतावला पड़ने लगा। शिन्दा गल्ले पर खड़ा था, टोनी साथ था। इसका अर्थ था कि अजमेर और गुरां ऊपर होंगे। उसने राउंड अबाउट के दो चक्कर लगाए। दूसरे चक्कर में अजमेर की पगड़ी पब की खिड़की में दिखाई पड़ी। गुरां ऊपर अकेली ही होगी, बच्चों के साथ। यदि वह फोन करे तो गुरां ही उठाएगी। उसको पता था कि फोन बच्चे या शिन्दा नहीं उठाते। यह उसके घर का एक सिस्टम था। बलदेव ने गाड़ी एक तरफ खड़ी की। सामने ही फोन बॉक्स था। फोन बॉक्स में से गुरां की खिड़की दिखती थी। उसने फोन किया। गुरां की आवाज़ सुनकर उसका मन भर आया। उसने बहुत मुश्किल से 'हैलो' कहा। उधर से गुरां बोली-
''तू कहाँ है ? तू नाराज तो अपनी भाजी से था, पर हमें किस बात की सज़ा। शैरन कितनी बार तेरे बारे में पूछ चुकी है।''
''आइ एम सॉरी गुरां, मैं अपने कारोबार के चक्कर में था।''
''क्या हाल है तेरा ?''
''मैं ठीक हूँ, तू मेरे फ्लैट में आकर वहाँ से ठीक नहीं लौटी थी। मुझे चिंता था। दुबारा इस बारे में बात भी नहीं हुई। उस दिन मुझसे जल्दबाजी में गलती हो गई। मैं अब समझ गया। मैं उस दिन तुझे ठीक से ट्रीट नहीं कर सका...।''
''नहीं बलदेव, तेरे से कोई गलती नहीं हुई, सब ठीक था, मैं ही कुछ...।''
''गुरां, मैं जानता हूँ, मैं पूरी तरह इन्वोल्व नहीं हो सका था। मेरा माइंड पता नहीं कहाँ चला गया था।''
''छोड़ इस बात को, तू हमें मिलने कब आ रहा है ?''
''तू एक बार फोन रखकर विंडो मे आ जरा, एक नज़र मैं तुझे देखना चाहता हूँ।''
''कहाँ है तू ?''
''कहीं भी, विंडो में आ।''
गुरां खिड़की में आई। बलदेव ने दूर से हाथ हिलाया। गुरां ने भी। दोनों कितनी देर तक ज्यों के त्यों खड़े रहे। फिर बलदेव जल्दी से अपनी गाड़ी में आ बैठा।
अगले दिन फिर लिज़ क़ी गर्दन को देखते हुए गुरां को याद करता रहा था। डिस्को जाने के बाद लिज़ से उसकी निकटता बढ़ गई थी। लिज़ टी.वी. के चैनल फोर पर रिर्सच स्कॉलर थी। उसने आगे चलकर किसी न्यूज़ टीम का हिस्सा बनना था अथवा डाक्यूमेंटरी तैयार करने वाले विभाग का। सारा दिन वह इधर-उधर घूमती रहती। शाम को उसकी क्लासें लगती थीं। वह क्या करती थी या कहाँ जाती थी, बलदेव ने कभी जानने का यत्न नहीं किया था। एक दिन लिज़ क़हने लगी-
''कैसा शहर है यह लंदन, जब चाहो तो काम नहीं मिलता। वैसे कहते हैं कि यहाँ काम की कमी नहीं।''
''तू काम तलाशती फिरती है ?''
''हाँ ?''
''तूने बताया क्यों नहीं ? मेरे साथ आ जा, सौ पौंड दूँगा हफ्ते के।''
''सौ पौंड ! इतना तो मैं तुझे किराया ही देती हूँ।''
बलदेव को अहसास हुआ कि वह गलत कह गया था। वह शिन्दे वाले रेट पर ही टिका हुआ था। लिज़ क़े साथ डेढ़ सौ पौंड पर बात तय हो गई। अगली सुबह ही वह उसके साथ काम पर जाने लग पड़ी।
लिज़ को खुशी थी कि इसका काम बहुत सरल था। आम तौर पर फोन सुनना ही या फिर आए हुए ग्राहक को सिलेंडर देना। ग्राहक खाली सिलेंडर एक तरफ रखता और भरा हुआ सिलेंडर दूसरी तरफ से उठा लेता। सिलेंडरों के दो हिस्सों में बंटे थे - एक हिस्से में खाली सिलेंडर थे और दूसरे में भरे हुए सिलेंडर। सिलेंडर भारी थी और उन्हें छेड़ना तक भी उसके बूते से बाहर था। अधिकतर ग्राहक मर्द ही होते थे। कभी कभार कोई औरत आ जाती। लिज़ को उसकी मदद करनी पड़ती और उसे बहुत परेशानी होती। उसको बलदेव की या किसी मर्द ग्राहक की प्रतीक्षा करनी पड़ती। ठंड बढ़ जाने से काम भी बढ़ गया था।
लिज़ शीघ्र ही बोर होने लगी। वह इतनी देर तक खाली बैठ नहीं सकती थी। रेडियो और टेलीविज़न उसको जल्दी ही फिज़ूल प्रतीत होने लग पड़े। लिज़ के यार्ड में रहने से बलदेव का काम बहुत आसान हो गया था। वह बाहर डिलीवरी का काम करता रहता। लिज़ का रुख देखकर उसे रिझाकर रखने के तरीके ढूँढ़ता रहता। वह चाहता था कि किसी तरह लिज़ उसके साथ पूरा सीज़न काम करे। उसने लिज़ के सभी ऊपरी खर्च उठा लिए थे। शनिवार की रात उसको डिस्को लेकर जाता, बेशक वह कितना ही थका हुआ क्यों न होता।
कई बार उसके मन में एलीसन का नाम भी आता। एलीसन जिस कैफ़े में काम करती थी, वहाँ उसको कई सुविधाएँ थीं। बलदेव को पता था कि वह वहाँ से काम नहीं छोड़ेगी। उसको याद आया कि उसने एलीसन को फोन भी नहीं किया था। कितने ही हफ्ते हो गए थे, न तो वह एलीसन की तरफ गया था और न ही फोन कर सका था। शाम को उसने एलीसन का फोन घुमाया। ‘हैलो’ कहते हुए वह बोली -
''डेव क्या हाल है ? शौन का फोन आया कोई ?''
''हाँ, शौन का फोन आता रहता है। एलीसन, तू सुना, तू कैसी है ?''
''मैं ठीक हूँ।''
''सॉरी, मैं इतने दिन हो गए, आ नहीं सका।''
''डेव, कोई बात नहीं। मुझे पता है, तू बहुत व्यस्त है। जब फुरसत मिले, आ जाना।''
''आज आ जाऊँ ?... एक-दो बातें करना चाहता हूँ।''
''डेव, आज तो मेरे ब्वॉय फ्रेंड ने आना है।''
''कोई नया है ?''
''हाँ, तेरी मैं अधिक प्रतीक्षा नहीं कर सकती।''
बलदेव का एकबार तो दिल बैठ गया, पर फिर ठीक होकर वह नील का हालचाल पूछने लगा।
बलदेव को किसी न किसी तरह लिज़ के साथ ही अपना काम चलाना पड़ा। वे दोनों ही एक दूसरे के साथ में खुश होने की कोशिश करते, जब कि दोनों के बीच कुछ भी साझा नहीं था। लिज़ तनख्वाह के कारण उसके साथ जुड़ती थी और वह काम करवाने की खातिर, नहीं तो दोनों का स्वभाव एक दूसरे से उलट था। लिज़ को डिस्को जाना पसंद था और बलदेव को पब में बैठकर रिलैक्स होना अच्छा लगता। बलदेव रेस्ट्रोरेंट में या घर में बैठकर आराम से खाना खाना चाहता तो लिज़ चलते चलते चिप्स खाने को तरजीह देती। लिज़ को राजनीति से कोई वास्ता नहीं था। जो कुछ भी हो, दोनों ही एक दूसरे को दिलों के किसी कोने से पसंद भी करते थे।
लिज़ कई बार अपने पढ़ाई की बातें बलदेव के साथ करने लगती। उन दिनों में भारतीय विवाहों पर तैयार हो रही डोक्युमेंटरी पर उसका काम चल रहा था। वह बलदेव से पूछने लगी -
''मैं तुम्हारे विवाहों के बारे में आजकल बहुत कुछ देख रही हूँ। क्या सचमुच ही इतनी बुरी हालत है तुम्हारे समाज में लड़के-लड़कियों की ?''
''क्या मतलब ?''
''यही कि विवाह में उनकी कोई मर्ज़ी नहीं होती, जिसके साथ तुम विवाह करते हो, उसको जानते तक नहीं होते, तुम्हारे माँ-पिता तुम्हारा विवाह अनजान व्यक्ति से करके कह देते हैं कि चल, सो उसके साथ। क्या यह सच है ?''
''हाँ, यह सच है, पर इसको समझने के लिए भारतीय सामाजिक ढांचे को समझने की ज़रूरत पड़ेगी। पूरे समाज में से सिर्फ़ एक अंग को निकालकर मेज़ पर रखकर उसका निरीक्षण नहीं कर सकते।''
''मैं विवाह की संस्था के बारे में बात कर रही हूँ। यह एक अंग नहीं एक सिस्टम है जो कि गलत है।''
''नहीं, इतना गलत नहीं शायद, तुम्हारे सामने रखा ही गलत तरीके से जाता है।''
''चल, तू ही बता, तेरा विवाह कैसे हुआ ?''
''इसी तरह, मैं उसको पहले नहीं जानता था।''
''तुझे नहीं लगता कि यह जुर्म है...मेरे साथ एक स्टुडेंट हैं - आशा। कहती है कि उसके भाई के पास गर्ल फ्रेंड है, परन्तु उसके घरवाले उसको ब्वॉय फ्रेंड रखने की इजाज़त नहीं देते। तू बता, यह हिपोक्रेसी है कि नहीं ?''
''भारतीय समाज भारत में बखूबी चल रहा है। यहाँ से बढ़िया चल रहा है। ये आशा जैसे थोड़े से अपवाद तो हर समाज में हुआ करते हैं।''
''ठीक है, तू बता कि कल को तेरी बेटी ब्वॉय फ्रेंड रख सकेगी ?''
''क्यों नहीं ? वह अब इंडियन नहीं ब्रिटिश है।''
''कितने इंडियन तेरी तरह सोचते होंगे ?''
बलदेव को इस सारी बातचीत से तकलीफ़ हो रही थी। उसने बहुत कठिनाई से लिज़ का ध्यान इन सवालों से हटाया।
मार्च में आकर ठंड कम हो गई और सीज़न खत्म हो गया। लिज़ ने एक हेयर-ड्रैसर की दुकान पर काम खोज लिया। बलदेव से उसका साथ छूट गया। दिन में वह काम करती और शाम को कालेज चली जाती। कभी बलदेव के जागते ही लौट आती और कभी वह सो चुका होता। एक शाम लिज़ आई। उसके साथ एक सूटेड-बूटेड व्यक्ति था। बलदेव से उसको मिलवाते हुए वह कहने लगी -
''डेव, यह मेरा ब्वॉय फ्रेंड है, डौमनिक चिज़नी।''
(जारी…)
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बुधवार, 21 दिसंबर 2011

गवाक्ष – दिसंबर, 2011


जनवरी 2008 “गवाक्ष” ब्लॉग के माध्यम से हम हिन्दी ब्लॉग-प्रेमियों को विदेशों में रह रहे हिन्दी/पंजाबी के उन लेखकों/कवियों की समकालीन रचनाओं से रू-ब-रू करवाने का प्रयास करते आ रहे हैं जो अपने वतन हिन्दुस्तान से कोसों दूर रहकर अपने समय और समाज के यथार्थ को अपनी रचनाओं में रेखांकित कर रहे हैं। “गवाक्ष” में अब तक विशाल (इटली), दिव्या माथुर (लंदन), अनिल जनविजय (मास्को), देवी नागरानी(यू।एस.ए.), तेजेन्द्र शर्मा(लंदन), रचना श्रीवास्तव(लंदन), पूर्णिमा वर्मन(दुबई), इला प्रसाद(यू एस ए), भगत धवन (डेनमार्क), चाँद शुक्ला (डेनमार्क), वेद प्रकाश ‘वटुक’(यू एस ए), रेखा मैत्र (यू एस ए), तनदीप तमन्ना (कनाडा), प्राण शर्मा (यू के), सुखिन्दर (कनाडा), सुरजीत(कनाडा), डॉ सुधा धींगरा(अमेरिका), मिन्नी ग्रेवाल(कनाडा), बलविंदर चहल (न्यूजीलैंड), बलबीर कौर संघेड़ा(कनाडा), शैल अग्रवाल (इंग्लैंड), श्रद्धा जैन (सिंगापुर), डा. सुखपाल(कनाडा), प्रेम मान(यू.एस.ए.), (स्व.) इकबाल अर्पण, सुश्री मीना चोपड़ा (कनाडा), डा. हरदीप कौर संधु(आस्ट्रेलिया), डा. भावना कुँअर(आस्ट्रेलिया), अनुपमा पाठक (स्वीडन), शिवचरण जग्गी कुस्सा(लंदन), जसबीर माहल(कनाडा), मंजु मिश्रा (अमेरिका), सुखिंदर (कनाडा) और देविंदर कौर (यू के) आदि की रचनाएं और पंजाबी कथाकार-उपन्यासकार हरजीत अटवाल के उपन्यास “सवारी” के हिंदी अनुवाद की इकतालीसवीं किस्त आपने पढ़ीं। “गवाक्ष” के दिसंबर, 2011 अंक में प्रस्तुत हैं – कनाडा में रह रहीं पंजाबी कवयित्री सुरजीत की कविताएं तथा हरजीत अटवाल के धारावाहिक पंजाबी उपन्यास “सवारी” की बयालीसवीं किस्त का हिंदी अनुवाद…


टोरंटो, कनाडा से
सुरजीत की तीन पंजाबी कविताएं
पंजाबी से अनुवाद : सुभाष नीरव

पागल मुहब्बत

मेरी मुहब्बत को ही
यह पागलपन क्यों है
कि तू रहे मेरे संग
जैसे रहते है मेरे साथ
मेरे साँस

तसव्वुर में तू है
इंतज़ार में तू है
नज़र में तू है
अस्तित्व में भी तू !

मेरी मुहब्बत को
यह कैसा पागलपन है
कि मेरे दुपट्टे की छोर में
तू चाबियों के गुच्छे की तरह बंधा रहे !

मेरे पर्स की तनी की भाँति
मेरे कंधे पर लटका रहे !

मैंने ही क्यूँ ऐसे इंतज़ार किया तेरा
जैसे बादवान
हवा की प्रतीक्षा करते है
जैसे बेड़े
मल्लाहों का इंतज़ार करते हैं!

मेरी ही सोच क्यूँ
तेरे दर पर खड़ी हो गई है
मेरी नज़र ही क्यूँ
तेरी तलाश के बाद
पत्थर हो गई है !

तस्वीरें और परछाइयाँ

मैं जो
मैं नहीं हूँ
किसी शो-विंडों में
एक पुतले की तरह
ख़ामोश खड़ी हूँ !
कुछ रिश्तों
कुछ रिवायतों से मोहताज !

बाहर से ख़ामोश हूँ
अन्दर ज़लज़ला है
तुफ़ान है
अस्तित्व और अनस्तित्व के

इस पार, उस पार खड़ा एक सवाल है-
कि मैं जो मैं हूँ
मैं क्या हूँ ?

पु्स्तकालय से समाधी तक
इस सच को तलाशते हुए
सोचती हूँ
मैं जिस्म हूँ
कि जान हूँ !
मेजबान हूँ
कि मेहमान हूँ !!

ज़िन्दगी
मौत
रूह
और मोक्ष
शब्दों के अर्थ तलाशती
सोचती हूँ
आख़िर मैं कौन हूँ !

तस्वीरों की जून में पड़कर
ख़ामोश ज़िन्दगी को व्यतीत करते
कई बार
अहसास होता है
कि मैं केवल
हारे-थके रिश्तों की
मर्यादा हूँ !!

या शायद
मैं कुछा भी नहीं
न रूह, न जिस्म
न कोई मर्यादा-
केवल एक
जीता जागता धड़कता
दिल ही हूँ !

तभी तो जब
रिश्ते टूटने का अहसास होता है
तो निगल जाता है
मेरा दिल
मेरा विवेक !!

मैं जो मैं नहीं हूँ
अपने आप को
रिश्तों की दीवार पर
टिका रखा है !

मैं जो मैं हूँ
इन तस्वीरों के
तिड़के शीशों में से निकल कर
परछाइयों की जून पड़ गई हूँ !!

फाइलों से जूझता शख्स

रोज़ सूरज
समुन्दर में जा गिरता है
रोज़ चन्द्रमा
रात से मिलता है
रोज़ पखेरू
पंख फड़फड़ाता हुआ
घर को लौटता है !

एक शख्स
अभी भी
दफ्तर की
फाइलों से जूझता
भूल गया घर का रास्ता।
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पंजाबी की चर्चित कवयित्री।

प्रकाशित कविता संग्रह –‘शिरकत रंग’

वर्तमान निवास : टोरोंटो (कनैडा)

संप्रति : टीचिंग।

ब्लॉग – सुरजीत (http://surjitkaur।blogspot.com)

ई मेल : surjit.sound@gmail.com

धारावाहिक पंजाबी उपन्यास(किस्त- 42)



सवारी

हरजीत अटवाल
हिंदी अनुवाद : सुभाष नीरव

॥ सैंतालीस ॥
बलदेव ने दरवाज़ा खोला। सामने एक नौजवान खूबसूरत हल्की हैसियत वाली गोरी लड़की खड़ी थी। उसको देखते ही बोली-
''तुम डेव बेंज हो ?''
''हाँ, और तुम लिज़ क़ैंट ?''
''हाँ, मैंने कमरे के लिए फोन किया था।''
''और मैं तेरा ही इंतज़ार कर रहा था। अन्दर आ जाओ।''
लिज़ क़ैंट बलदेव के पीछे-पीछे कमरे में आ गई। वह उसको फ्लैट दिखाने लगा। पहले उसने कमरा दिखाया जिसे किराये पर देना था। अन्दर घुसते ही बायीं ओर बड़ा कमरा था। साथ ही, बलदेव का अपना कमरा और फिर लिविंग रूम, किचन, बाथ और डायनिंग रूम। फ्लैट दिखलाता वह सोच रहा था कि वह इसको कमरा नहीं देगा। यह नौजवान थी और खूबसूरत भी। मुरली भाई की हिदायत थी कि खूबसूरत लड़की को कमरा देने से गुरेज करना, क्योंकि इन्हें कमरा देने से कई प्रकार की मुश्किलें खड़ी हो सकती थीं। जिस दिन से कमरा किराये पर लगाया था, तब से कई लोग इसे देखने आ चुके थे। कोई बच्चे वाला जोड़ा था, कोई एडवांस देने को तैयार नहीं था और कोई हिप्पी-सा दिखाई देता लड़का था। बलदेव इन सबको तरीके से मना करता आया था। किरायेदार की पृष्ठभूमि जानने के लिए उसके पास रेफ्रेंसिस का होना ज़रूरी था। मुरली भाई की सलाह के अनुसार इसके बग़ैर किरायेदार का कुछ पता नहीं चलता था कि वह किस तरह का व्यक्ति होगा।
लिज़ क़ैंट ने पूरा फ्लैट देखा और फिर उस कमरे में आ खड़ी हुई जो किराये के लिए उपलब्ध था। बोली-
''किराया बहुत मांग रहे हो।''
''कमरा भी तो देख कितना बड़ा है। और फिर दुकानें नज़दीक हैं, ट्यूब स्टेशन करीब है और यह रहा थेम्ज़... इससे बड़ी सुविधाएँ तुम्हें कहीं नहीं मिल सकतीं और वह भी सिर्फ ढ़ाई सौ पौंड महीने में। पूरे फुल्हम में ऐसा कमरा नहीं मिलेगा।''
लिज़ क़ैंट ने बलदेव की बात सुनकर मजबूरी-सी में कंधे उचकाये और कुछ पेपर बलदेव को देते हुए बोली-
ये मेरे क्रेडिट कार्ड्स हैं, यह मेरे घर का पता, यह मेरे कालेज का एडमिशन लैटर, यह मेरे डैडी का बिजनेस कार्ड, और बताओ क्या चाहिए।''
बलदेव पेपरों को उलट-पलट कर देख रहा था तो लिज़ ने जेब में से पौंड निकाले और कहा-
''पूरे पाँच सौ हैं, महीने का एडवांस और महीने का डिपोज़िट।''
बलदेव ने नोट देखे तो मानो उसको गरमी-सी आ गई। पाँच सौ पौंड ही उसको यार्ड के डिपोज़िट के लिए चाहिए था। उसने पैसे एकदम जेब में डाल लिए। लिज़ क़हने लगी-
''खुश है न !... अब मेरी कुछ बातें ध्यान से सुनो।''
''तुमने मेरी कुछ कंडीसन्स तो सुनी ही नहीं।''
''चलो, पहले तुम बताओ।''
''कितने जने होंगे यहाँ ?''
''मुझे पार्टनर तो ढूँढ़ना ही होगा, इतना किराया मेरे से नहीं दिया जाएगा।''
''सिर्फ एक पार्टनर ही, कोई दूसरा मेहमान रात में नहीं रह सकेगा।''
''ठीक है, कुछ और ?''
''रसोई, लिविंग रूम साझा है, इस्तेमाल करोगी तो सफाई करनी होगी।''
''यह तो आम बात है, पर तू मेरी बात सुन... मैं कमरे में अपनी मर्जी के पोस्टर लगाऊँगी और मैं कभी भी कमरे की सफाई नहीं करूँगी। जब छोड़ूंगी, तभी करूँगी।''
''तुझे गंद में रहना अच्छा लगता है ?''
''नहीं, पर सफाई करनी अच्छी नहीं लगती, कुक करना भी पसन्द नहीं, छह महीने रहूँगी, उसके बाद अगर मुझे पसन्द नहीं होगा तो मैं बदल लूँगी। अगर तुझे मेरा रहना पसन्द नहीं आया तो बता देना। अब ला, कंट्रेक्ट साइन कर दूँ।''
''मैं कंट्रेक्ट फार्म तो अभी लाया ही नहीं, कल ले आऊँगा। तुमने तो बहुत ही जल्दी कर दी।''
''मेरा यही तरीका है जीने का, धीमापन मुझे पसन्द नहीं। इसीलिए लंदन, न्यूयार्क, टोक्यो मुझे पसन्द है और आस्ट्रेलिया को मैं नफ़रत करती हूँ। एक साल रहकर आई हूँ, जैसे जेल में रही होऊँ।''
कहते हुए इतवार को मूव हो जाने का कहकर वह चल पड़ी। दरवाजे में जाकर बोली-
''एक बात बता, मालिक तुम ही हो ?''
''हाँ।''
''लगता नहीं, मकान मालिक तो बूढ़े होते हैं।''
बलदेव ने कोई उत्तर नहीं दिया, बस मुस्कराया। लिज़ क़े जाने के बाद सोचने लगा कि वह लड़की थी या आंधी। उसने जेब में पड़े पाँच सौ पौंड पर हाथ रखकर उन्हें महसूस करके देखा। उसको एजेंट ने पाँच सौ पौंड जमा करवाकर यार्ड की चाबी ले जाने के लिए कहा हुआ था। वह सोच रहा था कि सवेरे जल्दी ही एजेंट की तरफ निकल जाएगा।
बैटरसी रेलवे स्टेशन की इंडस्ट्रीयल एस्टेट में उसको यार्ड मिल गया। पहले यहाँ कारें बेचने का काम होता था। वह कम्पनी बन्द हो जाने के कारण जगह खाली पड़ी थी। बीस फुट चौड़ा और साठ फुट लम्बा यह यार्ड गैस के सिलेंडरों के लिए बहुत उपयुक्त था। सुरक्षा के लिहाज से भी ठीक था। चारों ओर लोहे की तार थी। आगे बड़ा-सा गेट। छह बाई छह का उठा हुआ दफ्तर था। बलदेव ने गेट में अपना ताला लगा दिया। सेंट्रल गैस का नुमाइंदा आकर अपनी मापजोख करके चला गया। उसको काउंसलर की ओर से डेढ़ सौ सिलेंडर रखने की इजाज़त मिल गई, मतलब - दो टन गैस। अगले दिन ही सिलेंडरों की भरी हुई लॉरी आ गई। लॉरी पूरी की पूरी यार्ड के अन्दर चली जाती थी।
बलदेव द्वारा यार्ड खोलने पर सेंट्रल गैस वाले बहुत प्रसन्न थे। यहाँ उनका कोई विक्रेता नहीं था जबकि अन्य सभी गैसों जैसे कि नॉर्थ गैस, कैलर गैस, सी-गैस आदि के एजेंट यहाँ पर थे। इसलिए उन्होंने अधिक लिखत-पढ़त में पड़ने की बजाय गैस ला धरी थी। उनका मकसद दूसरी कम्पनियों से मुकाबला करना था। एक दिन एक रैप आकर कह भी गया-
''डेव, तू तैयार हो जा, हम तेरी पूरी मदद करेंगे।''
बलदेव को तीन महीने के उधार की सुविधा मिल गई। अर्थ यह कि गैस बेचकर पैसे दे, लोकल अखबारों में उसकी मशहूरी थोड़े-से शब्दों में करवा दी, उसको बिजनेस कार्ड छपवा कर दे दिए गए। सिलेंडरों के कम-ज्यादा की सहूलियत भी दे दी। नहीं तो कम्पनी वाले खाली सिलेंडरों के बदले ही भरे हुए सिलेंडर देते थे, अगर कम हो जाएँ तो आपको पैसे देने पड़ सकते थे। उसने सिलेंडरों की सप्लाई वाले दफ्तर में दो कुर्सियाँ लाकर डाल दीं। फोन लगवा लिया और पूरा बिजनेस-मैन बनकर बैठ गया। यह सब जैसे पलक झपकते ही हो गया हो।
सेंट्रल गैस की डिपो में जाकर पता चला कि जैरी स्टोन तो उनका बड़ा बॉस था। उसके अधीन साउथ ईस्ट के सारे डिपो आते थे। एक बार तो बलदेव को अपना आप छोटा लगने लगा, पर जैरी की ओर से उसको कभी ऐसा व्यवहार देखने को नहीं मिला। वह वैसे ही शाम के वक्त पब में मिला करते। खबरों को लेकर बहसें करते। जैरी अब उसके फ्लैट में भी आने लगा था। उसको सेंट्रल गैस की राजनीति से भी परिचित करवाने लगा था।
जिस कारोबार को बलदेव बहुत आसान समझे बैठा था, उसे करने पर पता चला कि वह तो बहुत कठिन था। पहली बात तो सिलेंडर भारी ही बहुत थे। खाली सिलेंडर पन्द्रह किलो का होता और भरा हुआ तीस का। लॉरी भरी हुई आती तो सौ सिलेंडर उतार कर सौ खाली सिलेंडर ऊपर चढ़ाने होते। उसकी टें बोल जाती। कई सिलेंडर इससे भी भारी थे, पर वह गिनती में अधिक न होते।
फिर दो सप्ताह तक कोई ग्राहक गैस लेने भी नहीं आया। वह सवेरे जाकर यार्ड खोलकर फोन के सामने बैठ जाता और पूरी तरह बोर होकर शाम को लौट आता। उसको लगता कि वह फंस गया था। वह तो यहाँ तक सोचने लगता कि इससे छुटकारा पाने में कितना नुकसान झेलना पड़ेगा। जिस दिन सिलेंडर डिलीवर करने का पहला आर्डर आया तो उसकी खुशी का कोई अन्त नहीं था। चलो, कुछ करने के लिए तो हुआ। फिर कुछ और फोन आ गए। वह कार में सिलेंडर रखता और छोड़ आता। लौटकर ऑनसरिंग मशीन चैक करता कि कोई फोन तो नहीं आया था पीछे से।
कुछेक दिन मौसम ठंडा हुआ था और फिर धूप पड़ने लगी थी। अक्तूबर का महीना था और तापमान बीस डिगरी तक पहुँच रहा था। वह फिर से खाली बैठने लगा। वह डिपो में गया और दिल की बात मैनेजर मैलकम हाईंड से साझा की। मैलकम कहने लगा -
''डेव, उतावला न हो, देख हम भी खाली बैठे हैं। यह बिजनेस मौसम के साथ जुड़ा हुआ है, सो ठंड का इंतज़ार कर।''
''मैलकम, मेरा तो किराया भी नहीं निकल रहा।''
''मैं कल ही फिलिप को तेरे पास भेजता हूँ, सेल्ज़ मैनेजर है। तुझे कोई न कोई सलाह देगा।''
अगले दिन फिलिप आया और यार्ड देखकर कहने लगा-
''डेव, तू तो लक्की है। इतनी बढ़िया जगह किसी के पास नहीं होगी।''
''फिलिप, तू शायद ठीक कहता है, पर यह ठिकाना लोग खोज नहीं पाते। एक दिन एक आदमी कई बार फोन करके यह जगह ढूँढ़ पाया।''
''ठीक है, तू काम शुरू कर, फिर जगह बदल लेना।''
फिर वह आसपास देखते हुए कहने लगा-
''डेव, तेरी पिकअप कहाँ है ?''
''पिकअप तो मेरे पास है नहीं।''
''फिर डिलीवर कैसे करता है ?''
''कार में ही।''
''ऐसे ठीक नहीं... यह सही ढंग नहीं। सही ढंग यह है कि एक पिकअप खुद खरीद, छह फुट चौड़ी वाली बहुत है। उस पर अपना नाम लिखवा, उसको सिलेंडरों से हमेशा भर कर रख, लोग तुझे गाड़ी चलाते हुए आते-जाते देखें, तेरा फोन नंबर नोट करके तुझे रिंग करें। एक आदमी भी रख काम पर। तेरी गर्ल फ्रेंड या वाइफ़ है तो उसे ही बिठा दे और खुद डिलीवर करने पर रह।''
''फिलिप, यह तो सिरदर्दी बहुत बढ़ जाएगी।''
''डेव, बिजनेस का दूसरा नाम सिरदर्दी ही है, अगर काम चलाना है तो सिरदर्दी लेकर ही चलेगा। फुल्हम हाई रोड पर देख कितनी दुकानें हैं, सभी पर अपना कार्ड छोड़कर आ, देखना, ज़रा ठंड बढ़ी नहीं कि तेरा फोन पर फोन बजा नहीं। उधर चैलसी रोड पर सैनुअल की दुकान है, उससे मिल, वह कोई टिप देगा।''
बलदेव ने कठिन से कठिन काम के लिए खुद को तैयार कर लिया। सबसे पहले बात पिकअप खरीदने की थी। फिलिप की बात सही थी। कार कोई गैस के सिलेंडर ढोने वाली गाड़ी है क्या? इसके लिए तो पिकअप ही चाहिए थी। पिकअप कैसे खरीदे। पास में जो पैसे थे, सब खर्च हो चुके थे। जो बचे थे, वे पिकअप लायक नहीं थे। उसने कार बेच दी और टोयटा पिकअप खरीद लाया। कार को उसने बहुत भारी मन से बेचा। यह सिमरन ने उसको जन्मदिन के तोहफे के तौर पर दी थी। पिकअप में एक सवारी और ड्राइवर की सीटें थीं। पीछे पैंतालीस सिलेंडर आ जाते थे। नौ सिलेंडर लम्बाई में और पाँच चौड़ाई में। डाले तीन तरफ खुलते थे। तीनों तरफ ही उसने कम्पनी का नाम लिखवा लिया - 'ए.एस. गैस'। उसने 'ए' एनैबल से लिया था और 'एस' शूगर से। इसी नाम का बैंक में अकाउंट भी खुलवाया था। पहले दिन ही गाड़ी सिलेंडर से भरकर निकला तो दस सिलेंडर बेच आया। सभी मेन रोड पर पड़ने वाली दुकानों पर अपने कार्ड भी छोड़ता गया। वापस यार्ड में लौटा तो पाँच आर्डर डिलीवरी के आए पड़े थे। दो ग्राहक भी गैस लेने आ गए। उसकी दिहाड़ी बन गई थी। उसको उम्मीद बंध गई थी कि काम चल पड़ेगा।
अगले दिन मौसम कुछ ठंडा था। उसको उम्मीद थी कि कल की तरह ही उसकी दिहाड़ी बन जाएगी। वह पिकअप पर सिलेंडर रख रहा था कि फिलिप आ गया। उसकी तरफ देखता हुआ बोला-
''अब लगता है असली गैस मैन, परन्तु तेरे कारोबार में अभी भी बहुत बड़ी कमी है।''
''वह क्या ?''
''कल मैं दो बार आया था, तेरा यार्ड बन्द मिला। मेरे खड़े खड़े कई ग्राहक आकर लौट गए। तू दो काम एक साथ नहीं कर सकता। या तो गैस डिलीवर करेगा या यहाँ यार्ड में बैठेगा। इसके लिए जैसे मैंने पहले कहा था, किसी को काम पर रख।''
(जारी…)

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बुधवार, 2 नवंबर 2011

गवाक्ष – नवंबर 2011



जनवरी 2008 “गवाक्ष” ब्लॉग के माध्यम से हम हिन्दी ब्लॉग-प्रेमियों को विदेशों में रह रहे हिन्दी/पंजाबी के उन लेखकों/कवियों की समकालीन रचनाओं से रू-ब-रू करवाने का प्रयास करते आ रहे हैं जो अपने वतन हिन्दुस्तान से कोसों दूर रहकर अपने समय और समाज के यथार्थ को अपनी रचनाओं में रेखांकित कर रहे हैं। “गवाक्ष” में अब तक विशाल (इटली), दिव्या माथुर (लंदन), अनिल जनविजय (मास्को), देवी नागरानी(यू.एस.ए.), तेजेन्द्र शर्मा(लंदन), रचना श्रीवास्तव(लंदन), पूर्णिमा वर्मन(दुबई), इला प्रसाद(यू एस ए), भगत धवन (डेनमार्क), चाँद शुक्ला (डेनमार्क), वेद प्रकाश ‘वटुक’(यू एस ए), रेखा मैत्र (यू एस ए), तनदीप तमन्ना (कनाडा), प्राण शर्मा (यू के), सुखिन्दर (कनाडा), सुरजीत(कनाडा), डॉ सुधा धींगरा(अमेरिका), मिन्नी ग्रेवाल(कनाडा), बलविंदर चहल (न्यूजीलैंड), बलबीर कौर संघेड़ा(कनाडा), शैल अग्रवाल (इंग्लैंड), श्रद्धा जैन (सिंगापुर), डा. सुखपाल(कनाडा), प्रेम मान(यू.एस.ए.), (स्व.) इकबाल अर्पण, सुश्री मीना चोपड़ा (कनाडा), डा. हरदीप कौर संधु(आस्ट्रेलिया), डा. भावना कुँअर(आस्ट्रेलिया), अनुपमा पाठक (स्वीडन), शिवचरण जग्गी कुस्सा(लंदन), जसबीर माहल(कनाडा), मंजु मिश्रा (अमेरिका), सुखिंदर (कनाडा) आदि की रचनाएं और पंजाबी कथाकार-उपन्यासकार हरजीत अटवाल के उपन्यास “सवारी” के हिंदी अनुवाद की चालीसवीं किस्त आपने पढ़ीं। “गवाक्ष” के नवंबर 2011 अंक में प्रस्तुत हैं – यू के से पंजाबी कवयित्री डा. देविंदर कौर की कविताएं तथा हरजीत अटवाल के धारावाहिक पंजाबी उपन्यास “सवारी” की इकतालीसवीं किस्त का हिंदी अनुवाद…

यू.के. से
डा. देविंदर कौर की कविताएं
पंजाबी से अनुवाद : सुभाष नीरव

पंजाब के कपूरथला ज़िले में 20 अक्तूबर 1948 को जन्मी डा. देविंदर कौर पंजाबी की चर्चित कवयित्री-लेखिका हैं। ये अंग्रेजी और पंजाबी साहितय में एम.ए. हैं और पंजाबी कविता पर इन्होंने पी.एच.डी. की है। दिल्ली यूनिवर्सिटी कालेज से सन् 1970 में अध्यापन शुरू करके यू.के. में बिलस्टन कम्युनिटी और वुलवरहैम्पटन कालेज में लेक्चरर पदों पर रहीं। इनकी प्रकाशित पुस्तकों में 'इस तों पहिलां कि', 'नंगियां सड़कां दी दास्तान', 'अगन चोला'(काव्य संग्रह), 'क्रिया-प्रतिक्रिया', 'पंजवा चिराग़', 'वीरसिंह काव्य दा रूप-विज्ञानक अध्ययन', 'विविधा', 'युकलिप्टस ते हैमिंगवे', 'अमृता प्रीतम दी गल्प ते काव्य चेतना', 'ब्रितानवी पंजाबी साहित दे मसले', 'देव', 'शब्द ते सिरजना' आदि(साहित्यिक आलोचना संबंधी पुस्तकें) हैं। इसके अतिरिक्त वर्ष 1990 से 1993 तक पंजाबी की साहित्यिक पत्रिका ‘साहित्यिक सूरज’ का संपादन तथा आजकल पंजाबी की त्रैमासिक पत्रिका 'प्रवचन' का सम्पादन। पंजाबी अकादमी, दिल्ली से वार्तक अवार्ड, हरियाणा अकादमी और कलाकार लेखक मंडल की ओर से 'साहित्य सेवा अवार्ड', इंडो-कैनेडियन टाइम्ज़ ट्रस्ट तथा केन्द्रीय लेखक सभा की ओर से आलोचना के क्षेत्र में अवार्ड के साथ-साथ अनेक अन्य अवार्डों से सम्मानित। वर्तमान में यू.के. में रह कर पंजाबी साहित्य की श्रीवृद्धि में अपना अमूल्य योगदान दे रही हैं। डा.देविंदर कौर की यहां प्रस्तुत कविताएं तनदीप तमन्ना के बहुचर्चित पंजाबी ब्लॉग 'आरसी' पर पंजाबी में प्रकाशित हैं, वहीं से लेकर इनका हिंदी अनुवाद किया गया है और 'गवाक्ष' के हिंदी पाठकों को उपलब्ध कराया जा रहा है।


समर्पण
वह बहुत कुछ कह सकती थी
शायर को खोजते-खोजते
शायरी को लिखते-लिखते
पर वह कुछ नहीं उच्चारती...

वे उससे पूछते हैं
तेरी सोच
तेरा मिज़ाज कहाँ है ?
वह बताती है-
वह गवां आई है
अपने आप की तलाश में

शायर को
खोजते-खोजते
शायरी को
लिखते-लिखते
अपने आप को तलाशते
वह बेगानी हो गई एक दिन
और
शायरी के देश में से
पता नहीं किस वक्त
चल पड़ी
बच्चों के देश
फूलों, पत्तियों के देश
जहाँ फूलों जैसी हँसी
मासूम आँखों में से
उड़ती फाख्ताएं
उसको मिलने आईं
और वह हो गई
सारी की सारी
उन फाख्ताओं के हवाले

धड़कन
अरदास उदास है
उसमें बोले जा रहे शब्द
उसको स्मरण कराते हैं
अपनी माँ की
बेरहमी के साथ
मर रही हसरतें
अपनी नानी के
सिकुड़ रहे शरीर में से
घुट-घुट जाती रूह

कभी कभी जब वह
मन के गुरुद्वारे में बैठकर
‘कीर्तन सोहिले' का
पाठ करती है
कर लेती है मन शांत

फिर भी...
उसको लगता है
शांति में से निकल रहे
सेक की भाप
वह अपनी अन्दर ही
कहीं भरती रहती है

कितना कुछ
सह सकती है वह
अपने हिस्से की उदासी
या सारे गाँव की अरदास में से
फैल रही धुएं से भरी हवा

शांति तो बस
निरी 'ओम शांति' है
अरदास तो निरी शांति है
और
वह...
रूह की धड़कन
तलाश रही है !

जश्न
न ख़त की प्रतीक्षा
न किसी आमद का इंतज़ार
न मिलन-बेला की सतरंगी पींग के झूले
न बिछुड़ने के समय की कौल-करारों की मिठास...

वह होता है...
रौनक ही रौनक होती है
वह नहीं होता तो
सुनसान रौनक होती है
रौनक मेरी सांसों में धड़कती है

मेरी मिट्टी में से एक सुगंध
निरंतर उठती रहती है
मैं उस सुगंध में मुग्ध
सारे कार्य-कलाप पूरे कर
घर लौटती हूँ

लक्ष्मी का बस्ता खूंटी पर टांगती हूँ
मेनका की आह से गीत लिखती हूँ
पार्वती के चरणों में अगरबत्ती जलाती हूँ
सरस्वती के शब्दों के संग टेर लगाती हूँ

इस तरह
अपने होने का जश्न मनाती हूँ।
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