रविवार, 6 सितंबर 2009

गवाक्ष – सितम्बर 2009



“गवाक्ष” के माध्यम से हम हिन्दी ब्लॉग-प्रेमियों को हिन्दी/पंजाबी के उन प्रवासी लेखकों/कवियों की समकालीन रचनाओं से रू-ब-रू करवाने का प्रयास कर रहे हैं जो अपने वतन हिन्दुस्तान से कोसों दूर बैठकर अपने समय और समाज के यथार्थ को अपनी रचनाओं में रेखांकित कर रहे हैं। “गवाक्ष” के पिछ्ले तेरह अंकों में पंजाबी कवि विशाल (इटली) की कविताओं का हिन्दी अनुवाद, दिव्या माथुर (लंदन) की कहानी, अनिल जनविजय (मास्को) की कविताएं, न्यू जर्सी, यू.एस.ए. में रह रहीं देवी नागरानी की ग़ज़लें, लंदन निवासी कथाकार-कवि तेजेन्द्र शर्मा, रचना श्रीवास्तव, दिव्या माथुर की कविताएं, दुबई निवासी पूर्णिमा वर्मन की कविताएं, यू एस ए में रह रहीं हिन्दी कथाकार-कवयित्री इला प्रसाद, डेनमार्क निवासी कवि भगत धवन की कविताएँ और चाँद शुक्ला की ग़ज़लें, यू एस ए निवासी कवि वेद प्रकाश ‘वटुक’ तथा कवयित्री रेखा मैत्र की कविताएं, कनाडा अवस्थित पंजाबी कवयित्री तनदीप तमन्ना की कविताएं, यू के अवस्थित हिन्दी कवि-ग़ज़लकार प्राण शर्मा की ग़ज़लें, कैनेडा में अवस्थित पंजाबी कवि सुखिन्दर की कविताएं, कनाडा निवासी पंजाबी कवयित्री सुरजीत, अमेरिका अवस्थित डॉ सुधा धींगरा और पंजाबी कथाकार-उपन्यासकार हरजीत अटवाल के उपन्यास “सवारी” के हिंदी अनुवाद की सोलह किस्तें आपने पढ़ीं। “गवाक्ष” के सित्म्बर 2009 अंक में प्रस्तुत हैं – कनाडा में अवस्थित हिंदी- पंजाबी कथाकार - कवयित्री मिन्नी ग्रेवाल की कविताएं तथा यू के निवासी पंजाबी कथाकार-उपन्यासकार हरजीत अटवाल के धारावाहिक पंजाबी उपन्यास “सवारी” की सत्रहवीं किस्त का हिंदी अनुवाद…

कनाडा से
मिन्नी ग्रेवाल की कविताएँ
पंजाबी से अनुवाद : सुभाष नीरव
कविताओं के साथ चित्र : रुचिरा

(१)
तेरे साथ की प्रतीक्षा
तेरे साथ की प्रतीक्षा करते करते
मैं थक गयी हूँ
नज़रें धुंधला गयी हैं
और इस
धुंधलके के कारण
हर अँधेरे पर
तेरे नक्श उभर आते हैं
हर गले में
मैंने बांहें डाल दी हैं.

तेरे स्पर्श का अहसास
अभी तक है
प्यार गुनाह है
तेरा नाम ले नहीं सकती
इस प्यार के अहसास को
घर के पीछे
गड्ढा खोद कर
दबा दिया है
हाथों में कुछ मिटटी
फिर भी
लगी रह गयी है.

(२)
आज फिर
तड़पें लहरें
चीखे हवा
तूफानों से
घिरी यह फिजा
उम्र पुकारती
मंझदार मंझदार

आज फिर
तेरा ख्याल
आता है
बार बार

(३)
चाहतें
उम्र की भट्टी
मोहब्बत की आग
अरमानों के दानें
शर्म की झोली में से
भुन भुन कर
बाहर गिर रहे हैं.

लोक लज्जा के पैमानें
चाहतों की कब्र पर
छलकते ढुलकते
सांसों को दबोच रहे हैं.

(४)
साझा पल
चौराहे पर लोगों का शोर
खंभे की पीली रोशनी
शाम के साये ढल गए.

तेरी प्रतीक्षा में मैं खड़ी हूँ
कि चौराहे से घर तक के
कुछ पल साझे हो सकें

पुराने कपड़े गर्माहट नहीं देते
ठण्ड से दांत बज रहे हैं
काम के बाद बहुत थक गयी हूँ.

कुछ रुपये, ओवर टाइम
गरीबी का लालच, और तू
हमेशा देर से आता है.

अपनी उम्र की पता नहीं
कितनी जवान शामें
इस चौराहे पर ढल जाएँगी.


(५)
रात ने

रात ने आकाश की चादर ओढी
और सो रही
चादर के माथे पर चाँद चमका
और चांदनी बरस पड़ी
चांदनी ने आँखों के दीये जलाये
और लौ हंस पड़ी

उस रात, पर उस रात
न रात सोयी, न चाँद सोया, न सोये तारे
एक अजीब-सा सवाल मुझसे पूछते रहे सारे
जज्बों का मचलना
खुशबुओं का महकना
दूर कहीं किसी की आहट

पत्तों का सरकना, होठों का फड़कना
यह कैसी जिस्म की थरथराहट
थके भंवरे, मदहोश कलियाँ
यह फिजा
रह रह कर मुझको
राज़ कोई समझा रही है.
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पिछले ३० वर्षों से कैनेडा में रह रहीं सुश्री मिन्नी ग्रेवाल पंजाबी की जानी-मानी लेखिका हैं. इनके अबतक पंजाबी में तीन कहानी संग्रह "कैक्टस दे फुल्ल", "फानूस" और "चांदी डा गेट" तथा हिंदी में "दो आसमान" प्रकाशित हो चुके हैं. इसके अतिरिक्त पंजाबी में एक कविता संग्रह "फुल्ल-पत्तियां" प्रकाशित हो चूका है और एक पुस्तक "सरहदों पार मील" प्रकाशनाधीन है.
संपर्क : 5, Sylvid Court, Loretto On LoG ILO, CANADA
ई-मेल : minniegrewal@sympatico.ca

धारावाहिक पंजाबी उपन्यास(किस्त- 17)



सवारी
हरजीत अटवाल
हिंदी अनुवाद : सुभाष नीरव
चित्र : रुचिरा

॥ बाईस ॥
तीनों भाई ही शिन्दे को एअरपोर्ट से लेने गए थे. बलदेव की कार थी. सतनाम और बलदेव पब में जा बैठे और अजमेर हांक लगने की प्रतीक्षा करता रिसेप्शनिस्ट के पास खडा हो गया, जहाँ इमिग्रेशन ऑफिसर ने शिन्दे की शिनाख्त और जिम्मेवारी के लिए आना था. अजमेर थोडा नर्वस हो रहा था की कहीं लौटा ही न दें. अभी वीज़ा सिस्टम शुरू नहीं हुआ था. शोर था कि जल्द ही दिल्ली से ही वीज़ा लेकर आना पड़ा करेगा. अभी सिर्फ एंट्री ही हुआ करती थी और एंट्री में स्पांसरशिप भेजने वाले की जिम्मेवारी अहम् होती थी.

सतनाम अपनी मस्ती में बैठा बियर पीता रहा. बलदेव ने हाफ बियर ही ली थी. कुछ देर बाद शिन्दा अजमेर के पीछे रोता हुआ चला आ रहा था. उनके पास पहुँच कर उसका रोना और तेज़ हो गया. आस पास के लोगों ने उनकी तरफ देखना शुरू कर दिया. सतनाम गुस्से में बोला -
"गला क्यों फाड़ रहा है ?... साला राजिंदर कुमार !"
शिन्दा थोडा शांत हुआ. जब वह उनके गले मिला तो फिर उसने पुकारा -
"हाय भाइया !"
"ओय तू चुप कर, अपने हिस्से का ही रो, हमारा भी टैम न उठाये जा."
बलदेव ने उसका कन्धा थपथपा कर उसे हौसला दिया. कार में बैठने तक शिन्दा सिसकता रहा था. सतनाम ने कहा-
"शिन्दे, रुमाल है ?"
"हाँ, है. चाहिए ?"
"नहीं, अपना ही नाक साफ़ कर ले."
शिन्दा शर्मिंदा सा होकर मुस्कराया और नाक और आँखें साफ़ करने लगा. थोडा और आगे पहुंचे तो शिन्दा बलदेव से बोला-
"बलदेव, कहीं राह में रेहड़ी के पास रोकना, बच्चों के लिए केले ले चलें."
"साले, तूने लन्दन को चबेयाल का अड्डा समझ लिया है क्या ?"
सभी हंसने लगे. शिन्दा शर्मिंदा सा हो गया. फिर अजमेर ने मिन्दो और बच्चों का हाल चाल पूछा. शिन्दा राह में आयी मुश्किलों के बारे में बताने लगा. सतनाम उससे जहाज़ में बैठने के तजुर्बे के बारे में पूछ रहा था. बात घूम कर फिर सोहन सिंह पर आ गयी. शिन्दा फिर रोने लगा. सतनाम ने अजमेर से पूछा-
"भाई, मोर्चरी कितने बजे बंद करते हैं ?"
"मेरे हिसाब से तो चौबीस घंटे खुली रहती है. हम तो रात में आठ - नौ बजे ही जाया करते हैं."
“फिर शिन्दे पुत्त को भाइये के दर्शन करवा कर ही चलें. कहीं रो रो कर यह भी हार्ट अटैक न करा बैठे."
बलदेव ने कार अस्पताल की तरफ मोड़ ली. वो भी भाइये को देखना चाहता था. सिर्फ एकबार ही आया था. मन में खुद को बस यही दलील देता रहता की भाइया तो अब मिटटी है. मिटटी का क्या देखना ? मैरी ग्रांट को देख कर लौटने के बाद रोती रहती थी. उसे अधिक रोना बुरा लगता था. मैरी ग्रांट की देह को आयरलैंड लेकर गयी थी. सारी कागजी कारवाई के दौरान वह मैरी के संग रहा था इसी शर्त पर कि वह रोएगी नहीं. मैरी फिर भी अपना और ग्रांट का बचपन याद करके सिसकने लगती. भाइये का फ्यूनरल शिन्दे के इंतजार में बहुत लेट हो गया था. बलदेव को कोफ्त सी होने लगती थी कि इस कारण कितने ही काम रुके पड़े थे.

विटिंगटन हॉस्पिटल के ऐन पीछे बड़ी सी शैड नुमा ईमारत थी, जहाँ लाशें अंडरटेकर द्वारा ले जाने कि प्रतीक्षा कर रही होती थीं. और जहाँ आगे उनका संस्कार होना होता था.

उस दिन सभी जज्बाती हो गए जब वे सोहन सिंह को स्नान करवाने गए थे. अजमेर कहने लगा-
"तुम लोग जाओ, मुझे तो कुछ हो जायेगा, मेरा तो दिल है नहीं, कमज़ोर है."
"हमने कौन सा दिल को रिबटें लगवा रखी हैं."
सतनाम ने उसे संग ले जाते हुए कहा. अजमेर ने दिल मज़बूत करने के लिए एक पैग लगा लिया. फिर बाकी के भी पीछे न रहे. टोटनहैम हाई रोड पर अंडरटेकर का दफ्तर था. दफ्तर के पीछे कफ़न बनाने वालों का कारखाना था और उसके पीछे लाशों को नहलाने का प्रबंध था. प्लेटफोर्म के ऊपर देह को डाला हुआ था. साथ ही शावर लगा हुआ था.बिज़ली की शक्ति से प्लेटफोर्म आडा -तिरछा हो जाता था ताकि देह को इधर उधर पलटा जा सके. उन सबने सोहन सिंह की देह को दही से नहलाया. नए कपडे पहनाये. शिन्दे ने उसके सिर पर पगडी बाँधी. वे सभी ये सब काम चुपचाप करते रहे. शिन्दे के साथ साथ अजमेर भी हल्का-सा रोता रहा. सतनाम और बलदेव भी खुद को रोक न पाए. जब तैयार करके उसे कफ़न में लपेटा तब सभी रोने लग पड़े. आँखे पौंछते हुए सतनाम ने कहा-
"बच गए. कहीं भाइया वस्मा लगता होता तो इसकी दाढी भी काली करनी पड़ती."
वे सभी हंस पड़े. हँसे भी इतनी जोर से कि अंडरटेकर का एक कर्मचारी उन्हें देखने आ गया. उनका मूड अब कुछ बदला. शिन्दा बोला -
"यह तो भाई तुम्हारा सिस्टम बढ़िया है. वहां इंडिया में तो कुछ नहीं, ऊँचे खू (कुएं) वालों का बूढा मर गया, साले का सवा क्विंटल भार, दस बन्दों से भी ना संभाला जाए."
सतनाम ने अजमेर से कहा -
"भाई, आज तो हमें भाइये वाली ब्रांडी पीनी चाहिए थी, उसके नाम पर. और फिर ठण्ड भी है."
"अब जाकर पी लेते हैं."
अजमेर ने उत्तर दिया और कल के बारे में सोचने लगा. कल फ्यूनरल था. फ्यूनरल उसके लिए बहुत बड़े दिन की तरह था. इस दिन की उसने बहुत तैयारी कर रखी थी. दूर-दूर तक इसके खबर भेजी थी. पंजाबी की साप्ताहिक अख़बार में भी निकाला था. वह सबके कार्य व्यवहारों में पहुंचा करता था. उसे आस थी कि सभी आयेंगे और आये भी सब. मंजीत के रिश्तेदार, गुरिंदर की मौसी और दूर का लगता एक मामा. अजमेर के गाँव के लोग भी पहुंचे.

ग्यारह बजे लाश को लेकर काली लम्बी कार उनके घर आ पहुंची. सारा हाईबरी कोर्नर ही लोगों से भर गया. कारें खडीं करने के लिए तो जगह ही नहीं बची. ट्रैफिक रुक गया. पुलिस को आकर लोगों की मदद करनी पड़ी. आधा घंटा भर लाश घर में रही. बॉक्स को स्टैंड पर रखा हुआ था. इस काम के लिए उन्होंने पिछला स्टोर रूम खाली कर लिया था. एक एक करके लोग आते और सोहन सिंह का दर्शन करके आगे बढ़ जाते. भाई ने अरदास की. बॉक्स को कार में रखा. दो और लम्बी कारें थीं जिनमें परिवार और अन्य करीबी औरतें -बच्चे बैठे. यह काफिला साउथ गेट गुरूद्वारे की तरफ रवाना हो लिया. पूरे उत्तरी लन्दन को यही गुरुद्वारा लगता था. वहां पहुँच कर फिर बक्से को कार में से उतार कर स्टैंड पर टिकाया गया. अन्दर भाई ने अरदास की. बक्से का ढक्कन खोल दिया गया. जिन्होंने सोहन सिंह के दर्शन नहीं किये थे, उन्होंने भी कर लिए. आधा घंटा वहां रुके. यहाँ से फिर एक लम्बे काफिले के रूप में फिंचले कैरीटोरियम की ओर चल दिए. वे चारों भाई एक ही कार में थे. सतनाम कहने लगा-
"ले भाई भाइया खट गया . इतने लोग, इतनी कारें कि सडकों का ट्रैफिक जाम हो गया. मानो भाइया ना हुआ, कोई हीरो हो गया."
"यही तो मैं तुमसे कहा करता हूँ कि भाई बना कर रखो. अब इतने लोगों के आने से अपनी कितनी इज्ज़त बढ़ी. हम इक्कठे चलते हैं तो शोभा होती है."
"भा, ठीक है तेरी बात, पर यह सब तेरे कारण ही है. भाइया तो सांई लोक था. यह सब तेरे कारण ही आये हैं." सतनाम ने कहा. अजमेर यही सुनना चाहता था. बलदेव को चुप देख कर सतनाम ने उसे छुआ. वह भी सतनाम की हाँ में हाँ मिलाने लगा. कार में से निकल कर सतनाम बलदेव से धीमे से बोला-
"तूने मुंह को क्यों ताला लगा रखा था, अगर प्रेम चोपडा की बडाई हो जाती है तो फ्युनरल पर खर्च किये गए उसके पैसे हरे हो जायेंगे."
"सारा टब्बर ही मरासियों का हो जाए तो अच्छी बात नहीं."
"बाहर जाकर तो नहीं करते हम किसी की चमचागिरी. बड़े भाई की ही करते हैं. और एक बात तुझे भी बताऊँ, तू कुछ ज्यादा ही चुप रहने लगा है, जल्दी ही कोई औरत ढूंढ ले अपने लिए."
औरत के नाम पर शिन्दा भी उनके पास आ खडा हुआ. सतनाम ने कहा-
"इसे देख कैसे टोह लेता फिरता है कुत्ते की तरह."

बातें करते हुए वे हाल के अन्दर जा घुसे. हाल बहुत छोटा रह गया था. इतनी भीड़ के आगे. सोहन सिंह का बक्सा मंच पर रखा गया. भाई ने फिर अरदास की. अजमेर ने बटन दबाया. बॉक्स धीरे धीरे अन्दर जाने लगा. फिर परदे की ओट हो गया. कुछेक लोग सबूत के लिए बॉक्स को बिजली से जलता देखने के लिए अन्दर चले गए. शेष लोग बाहर निकल कर चिमनी की ओर देखने लगे, जहाँ से धुंआ निकलना था.
कैरीटोरियम से सब लोग गुरूद्वारे में आ गए. जहाँ भोग पड़ना था. लोगों ने रोटी खाकर अपने घरों को वापस लौट जाना था. कुछ लोग पब को जाने वाले थे, ख़ास तौर पर पैट्रो, माइको, जुआइस, मगील आदि. कुछ और अजमेर के गौरे ग्राहक भी थे, जिन्होंने रस्म के बाद बियर पीनी थी. साउथ गेट के गुरूद्वारे के साथ ही पब था. बलदेव की ड्यूटी सब को पब में ले जाने की लगी हुई थी. शौन और गैरथ के आने के कारण उसे पब में वैसे भी जाना ही था.
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(क्रमश: जारी…)

लेखक संपर्क :
67, हिल साइड रोड,
साउथहाल, मिडिलसेक्स
इंग्लैंड
दूरभाष : 020-85780393
07782-265726(मोबाइल)

शुक्रवार, 24 जुलाई 2009

गवाक्ष – जुलाई 2009


“गवाक्ष” के माध्यम से हम हिन्दी ब्लॉग-प्रेमियों को हिन्दी/पंजाबी के उन प्रवासी लेखकों/कवियों की समकालीन रचनाओं से रू-ब-रू करवाने का प्रयास कर रहे हैं जो अपने वतन हिन्दुस्तान से कोसों दूर बैठकर अपने समय और समाज के यथार्थ को अपनी रचनाओं में रेखांकित कर रहे हैं। “गवाक्ष” के पिछ्ले तेरह अंकों में पंजाबी कवि विशाल (इटली) की कविताओं का हिन्दी अनुवाद, दिव्या माथुर (लंदन) की कहानी, अनिल जनविजय (मास्को) की कविताएं, न्यू जर्सी, यू.एस.ए. में रह रहीं देवी नागरानी की ग़ज़लें, लंदन निवासी कथाकार-कवि तेजेन्द्र शर्मा, रचना श्रीवास्तव, दिव्या माथुर की कविताएं, दुबई निवासी पूर्णिमा वर्मन की कविताएं, यू एस ए में रह रहीं हिन्दी कथाकार-कवयित्री इला प्रसाद, डेनमार्क निवासी कवि भगत धवन की कविताएं, डेनमार्क निवासी चाँद शुक्ला की ग़ज़लें, यू एस ए निवासी कवि वेद प्रकाश ‘वटुक’ तथा कवयित्री रेखा मैत्र की कविताएं, कनाडा अवस्थित पंजाबी कवयित्री तनदीप तमन्ना की कविताएं, यू के अवस्थित हिन्दी कवि-ग़ज़लकार प्राण शर्मा की ग़ज़लें, कैनेडा में अवस्थित पंजाबी कवि सुखिन्दर की कविताएं, कैनडा निवासी पंजाबी कवयित्री सुरजीत की कविताएं और पंजाबी कथाकार-उपन्यासकार हरजीत अटवाल के उपन्यास “सवारी” के हिंदी अनुवाद की पन्द्रह किस्तें आपने पढ़ीं। “गवाक्ष” के जुलाई 2009 अंक में प्रस्तुत हैं – अमेरिका में अवस्थित हिंदी- पंजाबी कथाकार - कवयित्री सुधा ओम ढींगरा की कविताएं तथा यू के निवासी पंजाबी कथाकार-उपन्यासकार हरजीत अटवाल के धारावाहिक पंजाबी उपन्यास “सवारी” की सोलहवीं किस्त का हिंदी अनुवाद…


अमेरिका से
डॉ0 सुधा ओम ढींगरा की दो पंजाबी कविताएं
हिंदी रूपांतर : सुभाष नीरव


(1) माँ मैं खुश हूँ

परदेस से चिट्ठी आई
माँ की आँख भर आई
बेटी ब्याही
परदेस गई
बरस बीते, लौट कर न आई
चिट्ठी खोली,
पढ़ न पाई
ऑंसुओं ने झड़ी लगाई।

लिखा था-
माँ, मैं खुश हूँ
चिंता न करना
घर ले लिया है किस्तों पर
कार ले ली है किस्तों पर
फर्नीचर ले लिया किस्तों पर
यहाँ तो सब कुछ
खरीदा जाता है किस्तों पर।

आगे लिखा था-
घर के सारे काम
मैं करती हूँ
खानसामा यहाँ मैं
सफाईवाली यहाँ मैं
हलवाई यहाँ मैं
सब कुछ मैं ही हूँ माँ।
न रोक, न टोक
सवेर से शाम तक बिजी।

और लिखा था-
ना शोर, ना शराबा
हवा तक न कुसकती
परिन्दों की आवाज़
भी नहीं आती
साफ-सुथरा है यह देश
मुझे भाता है इसका वेश
लम्बा पहनो या छोटा पहनो
कुछ भी पहनो या ना पहनो
कोई परवाह नहीं किया करते।

माँ तू कहा करती थी
चादर देख पैर पसारो
पर यहाँ रिवाज निराला
चादर के बाहर पैर पसारो
इसी में देश की खुशहाली है
क्रैडिट कार्ड पर खर्चा करो
बैंकों से कर्ज़ा लो...

माँ पढ़ती गई...

पाँच दिन खूब काम करते हैं
रात में जल्दी सो जाते हैं
हफ्ते के अन्त में
पार्टियाँ किया करते हैं
बात बात पर बस
देश को याद करते हैं।

यह पढ़ माँ उदास हो गई...

देश बहुत याद आता है माँ
यहाँ की खुशहाली
सजावट, दिखावट में
वह रस नहीं
जो अभावों के मारे
अपने देश में है
यहाँ की रंगीनी में
वे रंग नहीं जो
अपने सरल देश में हैं
यहाँ की सुन्दरता, तरक्की में
वो प्यार अपनापन नहीं
जो मेरे गरीब देश में है
माँ मैं खुश हूँ
तुम चिंता न करना
दो बरस और नहीं आ पाऊँगी
ग्रीन कार्ड मिलने में
अभी टाइम है।

(2) दिल

अनेक भावों को इकट्ठा करके
कुदरत ने जब
नौ रस में मिलाया
फिर नौ रसों को एक रस करके
एक आकार बनाया
जब आई प्रियतम की याद
लगा वह फड़कने
यह फड़कन जब बन गई धड़कन
तब यह ‘दिल’ कहलाया।
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सुधा ओम ढींगरा
जन्मस्थान : जालंधर, पंजाब (भारत)
शिक्षा : बी.ए.आनर्ज़, एम.ए. ,पीएच.डी ( हिंदी ), पत्रकारिता में डिप्लोमा.
विधायें : कविता, कहानी, उपन्यास, इंटरव्यू, लेख एवं रिपोतार्ज.

प्रकाशित साहित्य : मेरा दावा है (काव्य संग्रह-अमेरिका के कवियों का संपादन),तलाश पहचान की (काव्य संग्रह) ,परिक्रमा (पंजाबी से अनुवादित हिन्दी उपन्यास), वसूली (कथा- संग्रह हिन्दी एवं पंजाबी), सफर यादों का (काव्य संग्रह हिन्दी एवं पंजाबी), माँ ने कहा था (काव्य सी .डी ). पैरां दे पड़ाह , (पंजाबी में काव्य संग्रह), संदली बूआ (पंजाबी में संस्मरण). १२ प्रवासी संग्रहों में कविताएँ, कहानियाँ प्रकाशित.

अन्य गतिविधियाँ एवं विशेष : विभौम एंटर प्राईसिस की अध्यक्ष, हिन्दी विकास मंडल (नार्थ कैरोलाइना) के न्यास मंडल में हैं. अंतर्राष्ट्रीय हिन्दी समिति (अमेरिका) के कवि सम्मेलनों की राष्ट्रीय संयोजक हैं. 'प्रथम' शिक्षण संस्थान की कार्यकारिणी सदस्या एवं उत्पीड़ित नारियों की सहायक संस्था 'विभूति' की सलाहकार हैं. हिन्दी चेतना (उत्तरी अमेरिका की त्रैमासिक पत्रिका) की सह- संपादक हैं. पत्रकार हैं -अमेरिका से भारत के बहुत से पत्र -पत्रिकाओं एवं वेब पत्रिकाओं के लिए लिखतीं हैं. अमेरिका में हिन्दी के प्रचार-प्रसार के लिए अनगिनत कार्य किये हैं. हिन्दी पाठशालाएं खोलने से ले कर यूनिवर्सिटी में हिन्दी पढ़ाई. इंडिया आर्ट्स ग्रुप की स्थापना कर हिन्दी के बहुत से नाटकों का मंचन कर लोगों को हिन्दी भाषा के प्रति प्रोत्साहित कर अमेरिका में हिन्दी भाषा की गरिमा को बढ़ाया है. अनगिनत कवि सम्मेलनों का सफल संयोजन एवं संचालन किया है. रेडियो सबरंग (डेनमार्क) की संयोजक. टी.वी , रेडियो एवं रंगमंच की प्रतिष्ठित कलाकार. पंजाबी एवं हिन्दी में लेखन.
पुरस्कार- सम्मान : १) अमेरिका में हिन्दी के प्रचार -प्रसार एवं सामाजिक कार्यों के लिए वाशिंगटन डी.सी में तत्कालीन राजदूत श्री नरेश चंदर द्वारा सम्मानित. २) चतुर्थ प्रवासी हिन्दी उत्सव २००६ में ''अक्षरम प्रवासी मीडिया सम्मान.'' ३) हैरिटेज सोसाइटी नार्थ कैरोलाईना (अमेरिका ) द्वारा ''सर्वोतम कवियत्री २००६'' से सम्मानित , ४) ट्राईएंगल इंडियन कम्युनिटी, नार्थ - कैरोलाईना (अमेरिका) द्वारा ''२००३ नागरिक अभिनन्दन''. हिन्दी विकास मंडल , नार्थ -कैरोलाईना(अमेरिका), हिंदू- सोसईटी , नार्थ कैरोलाईना (अमेरिका), अंतर्राष्ट्रीय हिन्दी समिति (अमेरिका) द्वारा हिन्दी के प्रचार-प्रसार एवं सामाजिक कार्यों के लिए कई बार सम्मानित.
संपर्क--101 Guymon Ct., Morrisville, NC-27560. U.S.A.
E-mail-sudhaom9@gmail .com
Phone-(919) 678-9056

धारावाहिक पंजाबी उपन्यास(किस्त- 16)


सवारी
हरजीत अटवाल
हिंदी अनुवाद : सुभाष नीरव

॥ इक्कीस ॥

दुकान में से निकलकर उसने पीछे की ओर देखा। उसे लगा मानो वहाँ भाइया खड़ा हो और उसने हँसते हुए उससे कुछ कहने के लिए मुँह खोला हो। वह सोचने लगा कि वह अभी पत्थर नहीं हुआ जैसा कि सभी कह रहे थे। उसके अन्दर अभी भी भावनाएँ जिन्दा थीं। वह पिता को याद करता हुआ कार की तरफ चल पड़ा। न-न करने के बावजूद सतनाम ने उसे दो भारी पैग पिला ही दिए थे। उसके लिए ये काफी थे। कार चलाने के लिए भी खतरनाक थे। वह अपने लायसेंस को लेकर बहुत भयभीत रहता था। आजकल रोका भी बहुत जाता था। राहों में पुलिसवाले स्पॉट चैक के लिए खड़े हो जाते थे। उसने डरते हुए ही कार स्टार्ट की। कार आगे बढ़ी तो उसे यकीन हो गया कि वह कार ठीक चला रहा था, कोई खतरा नहीं था। हौलो वे रोड तक वह बिलकुल ठीक आया। आगे सिनेमा के पास से सीधी टफनल पार्क की ओर मोड़ ली। सामने से पुलिस की कार आ रही थी। एक बार तो वह सिर से पांव तक कांप उठा। लेकिन पुलिस आगे बढ़ गई। उसकी सांस में सांस आया। जब से उसके एक परिचित का लायसेंस गया था, वह स्वयं डर-डर कर कार चलाने लगा था।
स्टेशन के साथ लगने वाले ऑफ़ लायसेंस के सामने कार रोक ली। घर के लिए उसे ड्रिंक चाहिए थी। वह मैरी का खर्चा नहीं करवाना चाहता था इसलिए घर का सारा सामान स्वयं ही लाता। मैरी के नाम पर फोन भी लगवा दिया था। घर की कुछ और भी वस्तुएं ली थीं। उसने वोदका की बड़ी बोतल और जूस के डिब्बे लिए। वह व्हिस्की पीता आया था, पर मैरी वोदका पसंद करती थी। दुकान का मालिक शाम देसाई कुछ ही दिनों में उसका परिचित बन गया था। वह उसका बड़ा ग्राहक था। पन्द्रह बीस पौंड की शॉपिंग कर लेता। शाम देसाई उसको देखते ही खुश हो जाता, पर आज बलदेव की आँखें चढ़ी होने के कारण चुप रहा। उसे अनुभव था कि शराबी आदमी के साथ अधिक बात नहीं करते।
दुकान में खड़े एक अन्य ग्राहक ने उससे कहा-
''हैलो मिस्टर, हाउ आर यू ?''
''फाइन...फाइन।'' कह कर बलदेव ने उसकी तरफ देखा। वह व्यक्ति न तो काला था, न ही इंडियन। वह उसे पहचानने की कोशिश करने लगा कि उसने हैलो क्यों कहा होगा। उस व्यक्ति ने बलदेव के मन की बात समझते हुए कहा-
''मेरा नाम डूडू है। मैं पैंतीस नंबर में रहता हूँ। तू ग्रांट वाले फ्लैट में आया है ना ?''
''नहीं डूडू, वहाँ मेरी गर्ल फ्रेंड मैरी रहती है।''
''उसका तो मुझे पता है, पर सभी कहते हैं कि तू ही रहता है।''
''नहीं डूडू, मेरा कुछ पता नहीं। पर तू क्यों फिक्र कर रहा है ?''
''क्योंकि मैं तेरा शुभचिंतक हूँ, तेरा भला सोचता हूँ। इस जगह तू नया है, मैं बहुत समय से रह रहा हूँ। अगर कोई ज़रूरत पड़े तो पैंतीस नंबर याद रखना।''
''शुक्रिया डूडू, जो भी तुझे हमदर्दी मेरे साथ है, उसके लिए शुक्रिया।''
''पाकिस्तानी है ?''
''नहीं, इंडियन।''
''मैंने तो यूँ ही मूंछें देख कर पूछ लिया... मैं भी इंडियन ही हूँ, पर मेरे बड़े बुजुर्ग़ वैस्ट इंडीज जा कर बस गए थे, अब वैस्ट इंडियन ही हूँ।''
बलदेव उसे बॉय-बॉय कह कर चल पड़ा। उसने पैंतीस नंबर एक बार फिर याद करवाया। बलदेव कार में बैठा डूडू के बारे में सोचने लगा कि उसने ऐसा क्यों कहा। शायद लोग उसके बारे में बातें करते हों। नये आए व्यक्ति के बारे में किया ही करते हैं। लोग सोचते होंगे कि मैं ग्रांट वाला फ्लैट हथियाना चाहता हूँ। अपनी ओर अजीब नज़रों से झांकते लोग तो उसने कई बार देखे थे। कोई उसे खतरा समझेगा, ऐसा उसने कभी नहीं सोचा था। उसने कार खड़ी की। बैग उठा कर फ्लैट की सीढ़ियाँ चढ़ने के लिए आगे बढ़ा। ग्राउंड फ्लोर वाले फ्लैट में हमेशा की तरह कुत्ते के भौंकने की आवाज़ आई। यहाँ एक स्कॉटिश परिवार रहता था। माँ और चार जवान बच्चे। दो लड़कियाँ और दो लड़के। कई बार उनसे हैलो-हैलो हो जाया करती थी। दरवाजा खुला होने के कारण कुत्ता बाहर की ओर दौड़ा आया। बलदेव की ओर झपटने ही लगा था कि बलदेव ने उसे डांटा और उंगली दिखाते हुए कहा-
''क्वाइट एंड सिट डाउन।''
कुत्ता पूंछ हिलाता हुआ बैठ गया। फिर उसने इशारा करते हुए कहा- ''गो इन साइड।''
कुत्ता अन्दर की ओर दौड़ गया। कुत्ते को काबू में करने का यह गुर उसे गैरथ डेवी ने सिखाया था। उसने कहा था, ''कुत्ता तुम्हें अजनबी समझ कर भौंकेगा, हुक्म मानेगा अपना समझ कर। कुत्ते को आर्डर दो, वह तुम्हें अपना नया मालिक समझ कर कहना मानेगा। कुत्ते के दो ही प्रमुख काम होते हैं, एक भौंकना और दूसरा कहना मानना।''
गैरथ की बातें सुन कर बलदेव कह उठा था-
''वाह गैरथ ! क्या साइंटेफिक उदाहरण दी है, बहुत सारी फिलॉसफी से भरी हुई। कुत्ता भले ही आदमी के भेस में ही क्यों न हो, उसके दो ही काम है- भौंकना और सुनना।''
वह गैरथ के विषय में सोच रहा था कि बूढ़ी बलिंडा का छोटा बेटा डगलस दरवाजे में आ खड़ा हुआ। वह भी कुत्ते को झिड़कता हुआ बोला-
''सॉरी डेव, यह खतरनाक नहीं है।''
''कोई बात नहीं डग्गी, खतरनाक भी हो तो कोई बात नहीं, कुत्तों को संभालना मुझे आता है।''
कह कर वह हँसा। डगलस उससे बातें करना चाहता था, पर बलदेव अलविदा कहते हुए सीढ़ियाँ चढ़ गया। वह सोच रहा था कि अब तक तो सारी एस्टेट ही उसका नाम जान गई होगी। इस कम्युनिटी का हिस्सा ही बन गया था वह हालांकि कई लोग उसे पसंद भी नहीं करते होंगे। उसे इस बात की खुशी थी कि मैरी के साथ उसकी ठीक ठाक निभ रही थी। इतने दिन हो गए थे एक साथ रहते, वे खुश थे। कितने दिन और खुश रहेंगे, इसका उसे पता नहीं था। फिर उसे चिंता सताने लगी कि अपना फ्लैट खरीदने के बारे में वह देर किए जा रहा था। उसे चाहिए था कि जल्दी ही कुछ करे।
उसने दरवाजा खोला। मैरी अभी तक लौटी नहीं थी। अवश्य कहीं बैठ गई होगी। अस्पताल का विजिटिंग टाइम आठ बजे तक का था। वह आठ बजे तक बैठने वाली नहीं थी और अब नौ बजने को थे। उसने बोतल, जूस और गिलास मेज पर रखे और मैरी का इंतज़ार करने लगा। मैरी की प्रतीक्षा करते हुए वह सोच रहा था कि उसे उसके साथ मोह हो गया था। उसके अन्दर मोह की भावना बहुत प्रबल थी। उसे गुरां के साथ कितना मोह था, फिर शैरन के साथ, फिर अपनी दोनों बेटियों के साथ। सिमरन ही थी जिससे उसका मोह नहीं हो सका था। भाइये के साथ भी उसका बहुत प्यार था। भाइया भी उसकी तरह बहुत खुल कर बात नहीं करता था। उसे पहले ताया ने दबाये रखा और फिर अजमेर ने। उसे अपने फैसले करने का अवसर ही नहीं मिला। यही हालत उसकी अपनी थी। भाइये की तरह उसमें भी कहीं आत्म-विश्वास की कमी रह गई होगी। उसे भाइया अपने आस पास महसूस होने लगा।
उसने उठ कर अपने लिए पैग बना लिया। मैरी जब आएगी, तब आएगी। वह क्यों ऐसे ही बैठा रहे। मैरी के साथ बैठ कर उसे शराब पीना अच्छा लगता था। मैरी के साथ वह बहुत सारी बातें खुल कर करता। वह जल्दी ही समझ गया था कि एक मुद्दत से ढकी हुई रूह को वह मैरी के सामने किसी भी हद तक नंगा कर सकता था। कभी कभी वह हैरान भी होने लगता कि जो अपने हैं, उनसे पर्दे रखने पड़ते हैं, पर बेगानों से कैसा पर्दा !
उसे फिर भाइया की याद आने लगी। उसे लग रहा था कि वह कहीं अनावश्यक रूप से भावुक न हो बैठे। भावुक होना उसे अच्छा नहीं लगता था।
वह फिर से मैरी के विषय में सोचने लगा कि कहाँ रह गई वह। एक बार तो दिल किया कि उठ कर नॉर्थ स्टार पब में ही देख आए, पर वह बैठा रहा।
उसे पता था कि मैरी अभी आ जाएगी। अपने कपड़े इस तरह उतार कर फेंकेगी मानो वे उसके लिए जंजीरें हों और आस पास इस तरह फेंकेगी मानो दुबारा उनकी ज़रूरत ही नहीं पडेग़ी। वैसे भी घर में वह अधिकांश समय अंडी में ही रहती। उसकी छातियाँ बहुत खूबसूरत थीं। बलदेव तारीफ करने लगता तो वह कहती-
''अभी तो मिच ने इन्हें चूसा है, टैंड ने भी शेप खराब की है, नहीं तो मेरी छातियों की सही शेप और सही जगह...।''
वह सोच ही रहा था कि वह आ गई। बलदेव ने मैरी की ओर गौर से देखा। उसका चेहरा उतरा हुआ था। वह नशे में थी। बलदेव ने उसकी तरफ देख कर मुस्कराने की कोशिश की और कहा -
''बहुत लेट हो गई ?''
''हाँ, पीने बैठ गई थी।''
कह कर वह कपड़े उतारने लगी जैसे वह प्राय: उतारा करती थी और फिर बलदेव के पास आ बैठी। बलदेव ने उसे पैग पकड़ाया और पूछा-
''आज का दिन कैसा रहा ?''
''ठीक था।'' उसने अपने पैग में से बड़ा सा घूंट भरा और एक ओर रख दिया। उसने बलदेव को चूमा और कहा-
''डेव, आय लव यू।''
''मी टू डार्लिंग।''
बलदेव ने कहा। मैरी उसकी कमीज के बटन खोलने लगी और बैड पर ले गई। उसके अंगों को सहलाते हुए उसने उसे कस कर आलिंगन में भर लिया और रोने लगी। बोली-
''डेव, ग्रांट मर गया है।'' और फिर उसे बेतहाशा चूमते हुए कहने लगी-
''कम ऑन माई लव ! कम ऑन !''
00
(क्रमश: जारी…)

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अनुरोध
“गवाक्ष” में उन सभी प्रवासी लेखकों/कवियों की समकालीन रचनाओं का स्वागत है जो अपने वतन हिंदुस्तान की मिट्टी से कोसों दूर बैठ अपने समय और समाज के यथार्थ को हिंदी अथवा पंजाबी भाषा में अपनी रचनाओं के माध्यम से रेखांकित कर रहे हैं। रचनाएं ‘कृतिदेव’ अथवा ‘शुषा’ फोन्ट में हों या फिर यूनीकोड में। रचना के साथ अपना परिचय, फोटो, पूरा पता, टेलीफोन नंबर और ई-मेल आई डी भी भेजें। रचनाएं ई-मेल से भेजने के लिए हमारा ई-मेल आई डी है- gavaaksh@gmail.com

शनिवार, 27 जून 2009

गवाक्ष –जून 2009



गवाक्ष” के माध्यम से हम हिन्दी ब्लॉग-प्रेमियों को हिन्दी/पंजाबी के उन प्रवासी लेखकों/कवियों की समकालीन रचनाओं से रू-ब-रू करवाने का प्रयास कर रहे हैं जो अपने वतन हिन्दुस्तान से कोसों दूर बैठकर अपने समय और समाज के यथार्थ को अपनी रचनाओं में रेखांकित कर रहे हैं। “गवाक्ष” के पिछ्ले तेरह अंकों में पंजाबी कवि विशाल (इटली) की कविताओं का हिन्दी अनुवाद, दिव्या माथुर (लंदन) की कहानी, अनिल जनविजय (मास्को) की कविताएं, न्यू जर्सी, यू.एस.ए. में रह रहीं देवी नागरानी की ग़ज़लें, लंदन निवासी कथाकार-कवि तेजेन्द्र शर्मा, रचना श्रीवास्तव, दिव्या माथुर की कविताएं, दुबई निवासी पूर्णिमा वर्मन की कविताएं, यू एस ए में रह रहीं हिन्दी कथाकार-कवयित्री इला प्रसाद, डेनमार्क निवासी कवि भगत धवन की कविताएं, डेनमार्क निवासी चाँद शुक्ला की ग़ज़लें, यू एस ए निवासी कवि वेद प्रकाश ‘वटुक’ तथा कवयित्री रेखा मैत्र की कविताएं, कनाडा अवस्थित पंजाबी कवयित्री तनदीप तमन्ना की कविताएं, यू के अवस्थित हिन्दी कवि-ग़ज़लकार प्राण शर्मा की ग़ज़लें, कैनेडा में अवस्थित पंजाबी कवि सुखिन्दर की कविताएं और पंजाबी कथाकार-उपन्यासकार हरजीत अटवाल के उपन्यास “सवारी” के हिंदी अनुवाद की चौदह किस्तें आपने पढ़ीं। “गवाक्ष” के जून 2009 अंक में प्रस्तुत हैं – टोरंटो, कैनेडा में अवस्थित पंजाबी कवयित्री सुरजीत की कविताएं तथा यू के निवासी पंजाबी कथाकार-उपन्यासकार हरजीत अटवाल के धारावाहिक पंजाबी उपन्यास “सवारी” की पन्द्रहवीं किस्त का हिंदी अनुवाद…


टोरंटो, कैनेडा से
पंजाबी कवयित्री सुरजीत की दो कविताएं
हिंदी अनुवाद : सुभाष नीरव


गुमशुदा

बहुत सरल लगता था
कभी
चुम्बकीय मुस्कराहट से
मौसमों में रंग भर लेना

सहज ही
पलट कर
इठलाती हवा का
हाथ थाम लेना

गुनगुने शब्दों का
जादू बिखेर
उठते तुफानों को
रोक लेना

और बड़ा सरल लगता था
ज़िन्दगी के पास बैठ
छोटी-छोटी बातें करना
कहकहे मार कर हँसना
शिकायतें करना
रूठना और
मान जाना…

बड़ा मुश्किल लगता है
अब
फलसफों के द्वंद में से
ज़िन्दगी के अर्थों को खोजना
पता नहीं क्यों
बड़ा मुश्किल लगता है…
00

दहलीज़

पहली उम्र के
वे अहसास
वे विश्वास
वे चेहरे
वे रिश्ते
अभी भी चल रहे हैं
मेरे साथ-साथ।

यादों के कुछ कंवल
अभी भी मन की झील में
तैर रहे हैं ज्यों के त्यों।

सुन्दर-सलौने सपने
अभी भी पलकों के नीचे
अंकुरित हो रहे हैं
उसी तरह।

तितलियों को पकड़ने की
उम्र के चाव
अभी भी मेरी हथेलियों पर
फुदक-फुदक कर नाच रहे हैं।
इन्द्र्धनुष के सातों रंग
अभी भी मेरी आँखों में
खिलखिलाकर हँस रहे हैं।

मेरे अन्दर की सरल-सी लड़की
अभी भी दो चुटियाँ करके
हाथ में किताबें थामे
कालेज में सखियों के संग
ज़िन्दगी के स्टेज पर
‘गिद्धा’ डालती है।

हैरान हूँ कि
मन के धरातल पर
कुछ भी नहीं बदलता
पर आहिस्ता-आहिस्ता
शीशे में अपना अक्स
बेपहचान हुआ जाता है।
00
(सुरजीत जी की उक्त दोनों कविताओं का हिन्दी अनुवाद तनदीप तमन्ना के पंजाबी ब्लॉग “आरसी” में छपी उनकी पंजाबी कविताओं से किया गया है।)

धारावाहिक पंजाबी उपन्यास(किस्त- 15)



सवारी
हरजीत अटवाल
हिंदी अनुवाद : सुभाष नीरव

॥ बीस ॥

सतनाम और मनजीत हाईबरी पहुँचे तो दुकान बन्द देख कर थोड़ा हैरान हो गए। सतनाम ने कहा-
''ये प्रेम चोपड़ा तो कहता था कि दुकान बंद नहीं करनी, कहीं साला टोनी भी पैट्रो न बन गया हो।''
मनजीत ने घंटी बजाई। गुरिंदर ने आकर दरवाजा खोला। सतनाम पूछने लगा-
''शॉप नहीं खोली ?''
''अभी टोनी नहीं आया। तू पहले ऊपर आ, तेरी खबर लेती हूँ।''
''जट्टिये, सुख तो है। हमें तो भाइये की मौत ने ही मारा हुआ है, ऊपर से तू डराने लगी है।''
ऊपर अजमेर शराबी हुआ बैठा था। गुरिंदर गुस्से में भरी कहने लगी-
''देख, इनको तूने पिलाई है, सवेरे-सवेरे शुरू कर दी। कोई शर्म है कि नहीं ? भाइये का जिसे भी पता चलेगा, दौड़ा चला आएगा तो बताओ तुम्हारी क्या इज्जत रह जाएगी ?''
सतनाम हँसने लगा। उसे हँसता देख मनजीत भी गुस्से में आ गई और बोली-
''बेशरमी की भी कोई हद होती है !''
सतनाम गंभीर होकर बोला-
''सीता और गीता, मेरी बात सुनो, तुम जानती हो कि गोरे मरने पर शराब पीते हैं।''
''पर हम तो गोरे नहीं।''
''पैट्रो एंड पार्टी ने मजबूर कर दिया, चलो सॉरी कर दो।''
''देख तो, सॉरी भी ऐसे मांगता है जैसे चाय मांग रहा हो।”
गुरिंदर ने हाथ मारते हुए कहा। सतनाम फिर हँस पड़ा। मनजीत भी हँसी और पीछे से गुरिंदर भी। अजमेर इतना शराबी हुआ पड़ा था कि उससे बोला तक नहीं जा रहा था। गुरिंदर ने कहा-
''देखो अजीब बात ! बाप मरा पड़ा है, अभी तक इस बारे में किसी को फोन तक नहीं किया। यहाँ पुत्त नशे में धुत्त है।''
''ला फोन, इंडिया में तो कर दें। जट्टिये, तू घबरा मत।''
''वहाँ मैंने कर दिया है, बहन को भी और शिन्दे को भी।''
''जट्टिये, एक बात सोच रहा हूँ कि क्यों न शिन्दे को भाइये के फ्यूनरल पर यहाँ बुला लें। इस बहाने उसका इधर आना भी हो जाएगा।''
''पर उसके पास पासपोर्ट भी होगा ?''
''पासपोर्ट तो सारा इंडिया ही बनवा कर जेब में लिए घूमता है, जैसे पासपोर्ट न हो, शोले फिल्म की टिकटें हों।''
तभी घंटी बजी। गुरिंदर दौड़कर सीढ़ियाँ उतरी। टोनी था। किसी कारण से लेट हो गया था। उसे सोहन सिंह के निधन का पता चला तो वह रोने लगा और रोते-रोते नीचे फर्श पर ही बैठ गया। गुरिंदर उसे हौसला देते हुए उठाने लगी। फिर उसके साथ लगकर दुकान खुलवाई। टोनी बोला-
''सिस्टर, मेरा काम करने को मन नहीं कर रहा। इतना अच्छा बन्दा, मेरा तो जैसे बाप था, मुझ से तो खड़ा ही नहीं हुआ जा रहा, मैं घर को जा रहा हूँ। शाम को आ जाऊँगा। ऐंडी कहाँ है?''
''वह बाहर गया है।'' गुरिंदर को भय था कि टोनी अपना ही रोना लेकर बैठ जाएगा।
''उसे बता देना, मैं चारेक बजे आ जाऊँगा।''
टोनी चला गया। टोनी ने काम पर तो शाम को ही आना होता था। उसे सुबह अजमेर ने फोन करके बुला लिया था लेकिन फोन पर सोहन सिंह के बारे में कुछ नहीं बताया था कि कहीं पैट्रो की तरह दुकान पर काला कपड़ा ही न डलवा दे। उसने सोचा था, टोनी यहाँ आएगा तो उसे समझा देगा। पर वही हो गया।
सतनाम अजमेर की शराब उतारने के लिए नींबू-पानी पिलाने लगा। मनजीत को कहकर लस्सी बनवाई। जब तक गुरिंदर भी आ गई। वह भुनभुनाती हुई बोली-
''घरवालों से ज्यादा तो बाहर वालों को दुख है। टोनी दहाड़ें मारता हुआ लौट गया है कि उससे खड़ा नहीं हुआ जाता।''
''पाखंड करता है साला।''
''तुझे पाखंड ही दिखाई देता है।”
''जट्टिये, बता भला, भाइया इसके लिए गड्डा और बैलों की जोड़ी छोड़ गया है जिन्हें देखकर वो रोए जाता है।''
गुरिंदर ने गुस्से में कोई उत्तर नहीं दिया और दूसरे कमरे में चली गई।
फिर उसने मनजीत से कहा-
''बलदेव को भी बुला लेते तो वो भी इनके ड्रामे में शामिल हो जाता।''
''फोन नहीं किया ?''
''मिला नहीं। पता नहीं कहाँ है। अजीब टब्बर है। कई बार तो इस तरह बिहेव करने लग पड़ेंगे, मानो एक दूजे को जानते तक न हों।''
अजमेर का नशा उतरने में तीन घंटे लग गए। फिर भी पूरी तरह ठीक नहीं था। मुँह धोया, सिर में पानी डाला, खट्टी चीजें खाईं। फिर उन्होंने भाइये की मौत की खबर लोगों तक पहुँचानी आरंभ कर दी। शिन्दे को बुलाने की सलाह भी बन गई। सैटियों को एक तरफ करके चादरें बिछा दी गईं। मनजीत कहीं से गुरबाणी की टेपें ले आई और लगा दीं। टेप सुनते ही सतनाम बोला-
''यह कामरेड परगट सिंह का घर है, यह टेप ठीक नहीं।''
''यह घर हमारा भी है, हमें पसंद है और ठीक भी लगती है।''
मनजीत ने कहा। सतनाम कुछ न बोल सका। गुरिंदर आँखें फाड़कर उसकी तरफ देखने लगी कि दे जवाब अब। सतनाम ने धीमे से कहा-
''यह अब मैडम एक्स बनी घूमती है।''
जब सभी काम हो गए तो वे बलदेव को खोजने लगे, पर उसका किसी को पता हो तो वह मिले। शोन के घर से वह जा चुका था। वे बैठते-उठते यह बात करते रहते कि बलदेव को कहाँ ढूँढ़ें। हालांकि फ्यूनरल में अभी कई दिन लग सकते थे क्योंकि शिन्दे के आने पर ही तारीख पक्की करनी थी। फिर भी बलदेव का उनमें शामिल होना ज़रूरी था। अफसोस करने के लिए आने वाले लोग क्या कहेंगे। लोग तो आने भी लग पड़े थे। मिडलैंड से कारें भर कर आ बैठते। सतनाम कहता कि इनके लिए तो यह अफसोस की घड़ी जैसे मुश्किल से नसीब हुई हो।
तीसरे दिन बलदेव का फोन आया। अजमेर ने ही उठाया और झिड़कते हुए कहने लगा-
''कहाँ है तू ? तुझे मालूम भी है कि इधर क्या हो गया है?''
''क्या हुआ ? मैंने सतनाम की दुकान पर काला कपड़ा टंगा हुआ अभी अभी देखा है।''
''भाइया पूरा हो गया, जल्दी आ जा।''
बलदेव एकदम ही चल पड़ा। मैरी अस्पताल गई हुई थी। उसे आठ बजे के करीब लौटना था। उसने मैरी के लिए नोट लिखकर छोड़ दिया कि वह किसी ज़रूरी काम से जा रहा है, शायद लौटने में देर हो जाए। हाईबरी आया तो सभी वहीं पर थे। सतनाम, मनजीत और बच्चे भी। सतनाम उसे देखते ही बोला-
''क्यों भई ऐंनक बाबू, तुझे किसी की फिक्र है कि नहीं ?... इधर दिल एक मंदिर हुआ पड़ा है और तू पता नहीं कहाँ ईद का चाँद बना घूम रहा है।''
''ईद का चाँद बनने लायक होता तो वहीं क्यों छोड़ती।''
अजमेर ने ताना मारा। आमतौर पर वह ऐसी बात करता नहीं था, पर वह बलदेव से बहुत खीझा पड़ा था और इस ताने के जरिये उसने सारी खीझ निकाल ली। बलदेव कुछ न बोला, पर उसे बात चुभी बहुत। सतनाम की बात का उसे कभी दुख नहीं लगता था। अजमेर की यह बात उसे दिल से कहीं हुई प्रतीत हुई थी। उसने कहा -
''इसमें घबराने वाली कौन सी बात है... मैं काम पर जाने लग पड़ा हूँ इसलिए चक्कर नहीं लगा।''
फिर वह भाइये के अन्तिम समय के बारे में पूछने लगा। कुछ दूसरी भी बातें हुई। फिर अजमेर ने कहा-
''फ्यूनरल पर पन्द्रह सौ खर्च हो रहा है, अपने हिस्से का पाँच सौ निकाल दे।''
''मेरे पास तो पाँच सौ हैं नहीं।''
''तू तो कहता है कि मैं काम पर जाने लगा हूँ।''
''हाँ, वेजज़ मंथली मिलती है, और मेरे सिर पर कर्ज भी बहुत हुआ पड़ा है।''
''सीधे सीधे कह कि तू हिस्सा नहीं देगा। तू क्या समझता है कि वह अकेले हमारा ही बाप था।''
''बात तो बेशक साझा था पर वह कौन-सा कंगाल था, पेंशन...।''
उसने बात बीत में ही छोड़ दी। कहने को तो वह कहना चाहता था कि वह तो दुकान में भी काम करता था। अजमेर पेंशन की बात सुन कर ही बौखला उठा और कहने लगा-
''तुम्हें उसकी पेंशन बहुत चुभती है। कितनी पेंशन लेता था वह भला... किसी ने कभी बूढ़े का हाल आकर तो पूछा नहीं, कोई दो रातें तो उसे अपने पास रख नहीं सका, बातें करते हैं पेंशन की...।''
सतनाम बलदेव की बात पर दिल से खुश था लेकिन जब उसने बात बिगड़ती देखी तो अजमेर को शान्त करने के लिए बोला-
''भाई, इसके कहने के पीछे कोई बैड फीलिंग नहीं... यह तो यूँ ही ज़रा हाथ तंग होने के कारण कह रहा है... अब सारे काम भी तो तू बाप की जगह पर करता है, सारे काम काज...अब शिन्दे ने आना है तो इसकी भी तुझे ही फिक्र है...।''
अजमेर कुछ ठंडा पड़ा। वह थोड़ी नरम आवाज में सतनाम से बोला-
''तू इससे पूछ जरा। भाइये को लेकर इसे कभी बाप जैसी फीलिंग हुई ? पूछ तो जरा...।''
''इसका जवाब भाई मैं देता हूँ। असल में इसने तो बाप का प्यार तेरे में ही देखा है, छोटा-सा था जब भाइया इधर आ गया। वैसे भी भाइया सीधा सा बन्दा था, अपने अस्तित्व को पहचानता ही नहीं था कभी, एक्सट्रा की तरह एक ओर खड़े रह कर ही खुश था। हम तुझमें ही बाप को देखते रहे हैं। और फिर माँ के चले जाने के बाद भी इसका स्वभाव कुछ बदल गया, अभी बाल कलाकार के रूप में था उस समय यह।''
सतनाम की बातों से अजमेर की आँखें भर आईं। गुरिंदर और मनजीत भी उनके पास आकर खड़ी हो गई थीं। वे भी उदास हो उठी थीं। सतनाम ने सब की ओर देखकर कहा-
''मुझे लगता है, मैं गलती से 'मैं चुप रहूँगी' का डायलॉग बोल गया हूँ।''
अजमेर ने सैटी पर से उठते हुए कहा-
''अगर किसी ने हिस्सा नहीं डालना, तो तुम्हारी मर्जी, मुझे तो फ्यूनरल अच्छी तरह करना है। गाजे-बाजे के साथ। गाँव वाले क्या कहेंगे !''
अजमेर के उठ खड़े को अर्थ था कि अब पब में चलें। गुरिंदर ने खीझते हुए कहा-
''नीचे, दुकान में टोनी अकेला है, अगर तुम्हें ज्यादा ही हुड़क उठ रही है तो शॉप में कुछ नहीं है क्या ?''
''जट्टी तो भाई अब ध्यान चन्द की तरह ज्यादा ही गोल मारे जा रही है।''
कहकर सतनाम अजमेर के संग नीचे उतरने लगा। बलदेव ने शैरन को अपने पास बुला कर गोदी में बिठा लिया। गुरां भी उसके पास ही बैठ गई और मनजीत भी। मनजीत कहने लगी-
''भाजी, तुम्हें शैरन सबसे अच्छी लगती है। कभी हमारे बच्चे नहीं उठाये। कभी हरविंदर को पास नहीं बुलाया।''
बलदेव को लगा मानो उसकी चोरी पकड़ी गई हो। उसने अवसर को संभालते हुए कहा-
''असल में बात यह है कि मैं बच्चों के साथ बात नहीं कर पाता। ये शैरन ज़रा बड़ी है और मेरी बात सुन लेती है।''
गुरिंदर ने बात बदलते हुए कहा-
''सुन बलदेव, अब तू अपनी भाजी की मदद करा दे शॉप में, अफसोस करने वाले आ जाते हैं तो टोनी को अकेला छोड़ना पड़ता है। रात में रश भी हो जाता है।''
''गुरां, मैं वीक एंड पर ही आ सकता हूँ, पाँच बजे तो काम छोड़ता हूँ।''
''काम पर यहीं से चला जाया कर और रात में ही हैल्प करा दिया कर।''
''तू फिक्र न कर गुरां, मैं कोशिश करता हूँ।''
कहते हुए बलदेव ने शैरन को अपनी बांहों में कसा और उठ खड़ा हुआ। मनजीत के पास होने के कारण गुरां ने उसे रुकने के लिए भी नहीं कहा।
बलदेव जाने के लिए नीचे शॉप में आया तो सतनाम और अजमेर बोतल खोले बैठे थे। न-न करते भी उन्होंने बलदेव के लिए पैग बना दिया और सतनाम कहने लगा-
''बात सुन ओए, कोई सहेली भी है कि फांग (अकेला) ही है।''
''फांग ही समझ ले।''
कहकर उसने अजमेर की तरफ देखा। सतनाम ने फिर कहा-
''अपना मगील है न, बहुत बढ़िया शै है, बात करवाऊँ।''
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(क्रमश: जारी…)

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गुरुवार, 7 मई 2009

गवाक्ष – मई 2009


“गवाक्ष” के माध्यम से हम हिन्दी ब्लॉग-प्रेमियों को हिन्दी/पंजाबी के उन प्रवासी लेखकों/कवियों की समकालीन रचनाओं से रू-ब-रू करवाने का प्रयास कर रहे हैं जो अपने वतन हिन्दुस्तान से कोसों दूर बैठकर अपने समय और समाज के यथार्थ को अपनी रचनाओं में रेखांकित कर रहे हैं। “गवाक्ष” के पिछ्ले तेरह अंकों में पंजाबी कवि विशाल (इटली) की कविताओं का हिन्दी अनुवाद, दिव्या माथुर (लंदन) की कहानी, अनिल जनविजय (मास्को) की कविताएं, न्यू जर्सी, यू.एस.ए. में रह रहीं देवी नागरानी की ग़ज़लें, लंदन निवासी कथाकार-कवि तेजेन्द्र शर्मा, रचना श्रीवास्तव, दिव्या माथुर की कविताएं, दुबई निवासी पूर्णिमा वर्मन की कविताएं, यू एस ए में रह रहीं हिन्दी कथाकार-कवयित्री इला प्रसाद, डेनमार्क निवासी कवि भगत धवन की कविताएं, डेनमार्क निवासी चाँद शुक्ला की ग़ज़लें, यू एस ए निवासी कवि वेद प्रकाश ‘वटुक’ तथा कवयित्री रेखा मैत्र की कविताएं, कनाडा अवस्थित पंजाबी कवयित्री तनदीप तमन्ना की कविताएं, यू के अवस्थित हिन्दी कवि-ग़ज़लकार प्राण शर्मा की ग़ज़लें और पंजाबी कथाकार-उपन्यासकार हरजीत अटवाल के उपन्यास “सवारी” के हिंदी अनुवाद की तेरह किस्तें आपने पढ़ीं। “गवाक्ष” के मई 2009 अंक में प्रस्तुत हैं – कैनेडा में अवस्थित पंजाबी कवि सुखिन्दर की तीन खूबसूरत कविताएं तथा पंजाबी कथाकार-उपन्यासकार हरजीत अटवाल के धारावाहिक पंजाबी उपन्यास “सवारी” की चौहदवीं किस्त का हिंदी अनुवाद…


कैनेडा से
सुखिन्दर की तीन कविताएँ
हिन्दी रूपांतर : सुभाष नीरव


बेटियों को हँसने दो

बेटियों को हँसने दो
हँसती हुई अच्छी लगती हैं वे
हँसती हुई बेटियों को देख याद आएगा
चिड़ियों का चहकना
चिड़ियों के चहकने के साथ याद आएगी
सुबह की ताज़गी
सुबह की ताज़गी के साथ याद आएगा
फूलों का खिलना
फूलों के खिलने के साथ याद आएगी
चारों ओर फैली महक
महक के साथ याद आएगा
तुम्हारा अपना ही मुस्कराता हुआ चेहरा
मुस्कराते हुए चेहरे के साथ याद आएगा
कितने ही ख़ुशगवार मौसमों का इतिहास।

बेटियों को हँसने दो
हँसती-खिलखिलाती ही अच्छी लगती हैं वे
हँसने दो उन्हें
घरों, बज़ारों, चौ-रास्तों पर
स्कूलों, कालेजों, विश्वविद्यालयों में।

हँसने दो उन्हें
मैगज़ीनों, अख़बारों, किताबों के पन्नों पर
रेडियो की ख़बरों में
टेलीविज़नों के स्क्रीनों पर।

हँसने दो उन्हें-
कविताओं, कहानियों, उपन्यासों, नाटकों में
शब्दों, वाक्यों, अर्थों में।

हँसने दो उन्हें-
एकांत में
महफ़िलों में

हँसने दो उन्हें
बहसों में
मुलाकातों में

हँसने दो उन्हें-
साज़ों में
आवाज़ों में

हँसने दो उन्हें-
शब्दों की ध्वनियों में
गायकों की अलापों में

बेटियों को हँसने-खिलखिलाने दो-
हँसती-खिलखिलाती ही अच्छी लगती हैं वे
सदियों से उनके मनों के अंदर
क़ैद हुए परिंदों को उड़ने दो
खुले आसमानों में, खुली हवाओं में
पूरब से पश्चिम
उत्तर से दक्खिन तक उड़ने दो

बेटियाँ घर की खुशबू होती हैं
बेटियों की हँसी से घर महक उठते हैं
बेटियों के चहकने से
उदासी में डूबे चेहरों पर
रौनक लौट आती है

धर्मों, सभ्यताओं की समय बिता चुके
सड़ांध मारते
मनुष्य की चेतना पर निरर्थक बोझ बने
कद्रों-कीमतों की मानसिक क़ैद में जकड़े
बात-बात पर कोबरा साँप की तरह फन फैलाए
मुँहों से ज़हर की पिचकारियाँ छोड़ते
मानवीय भावनाओं, अहसासों से रिक्त
बेटियों की हँसी को क़त्ल करने वाले
धरती पर मानवी जामों में
घूमते-फिरते लोग
हक़ीकत में
हैवानियत की तस्वीर बने
पत्थरों के बुत होते हैं।
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लड़कियाँ कब हँसती हैं

हत्यारों की तरह जिद्द न करो
चिड़ियों को कमरों में क़ैद करोगे
तड़फ-तड़फ
वे मर जाएँगी

वे उड़ना चाहती हैं
खुले आसमान में
वे बड़े घूँट भरना चाहती हैं
ताज़गी भरी हवा के

वे चहकना चाहती हैं
खुशबुओं भरे मौसम में
वे खिलखिलाना चाहती हैं
खुशबू भरे फूलों की तरह

उमस भरी ज़िंदगी में
लंबी दौड़ के बाद
जब
बरखा रुत आती है
बरसों से होंठों पर लगे ताले
जब
अचानक टूटने लगते हैं
मन के दर्पण में देखने पर
अपना ही चेहरा
गुलाब के फूल की तरह
जब खिल उठता है

लड़कियाँ
तब हँसती है… ।
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वो सारी औरतें

वो सारी औरतें
जो मेरा नाम सुनते ही
गुलाब के फूलों की तरह
खिलखिला उठती हैं

वो सारी औरतें
जो मेरे कंधों पर
अपने सिर रख
वे सारे भूले-बिसरे
गीत गुनगुनाने लगती हैं
जो गीत उन्होंने
बरसों से नहीं गाए

वो सारी औरतें
जो मेरा नाम सुनते ही
कोयल की भाँति
कू-कू करने लगती हैं
वो भूली-बिसरी आवाज़ें
जो बरसों की दहशत ने
उनके अवचेतन के
किसी कोने में
दबा दी थीं…

वो सारी औरतें
जो मुझे देखते ही
कहने लगतीं-
तू तो ‘अपना-सा’ लगता है

वो सारी औरतें
जो समयों की आवारगी में
मदमस्त हाथियों के पैरों तले
कुचली जाने के कारण
‘अपना-सा’ शब्द के
अर्थ ही भूल गई थीं

कुछ तो होता ही होगा
फूलों की सुगंध में
हवा की ताज़गी में
शब्दों के अर्थों में
रंगों के असर में
आवाज़ों की ध्वनियों में
यूँ ही तो नहीं
करोड़ों वर्षों से
नक्षत्र घूम रहे हैं
इस चुम्बकीय गर्दिश में
बंधे हुए !
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सुखिन्दर
कैनेडा में एक कैनेडियन पंजाबी लेखक के तौर पर सन् 1975 से सक्रिय। कैनेडा से पंजाबी में छपने वाले खूबसूरत मैगज़ीन “संवाद” के सन् 1989 से संपादक। टोरंटो (कैनेडा) के पंजाबी रेडियो प्रोग्राम “जागते रहो” के प्रोड्यूसर, डायरेक्टर और होस्ट। कविता, फिक्शन और विज्ञान विषयों पर अब तक 20 से अधिक पुस्तकें प्रकाशित। सन् 1975 में हरियाणा भाषा विभाग द्वारा ‘बेस्ट बुक अवार्ड’ से सम्मानित। इसके अतिरिक्त ऑन्टारियो आर्टस कौंसल ग्रांट, कैनेडा (1986 और 1988 ), द कैनेडा कौंसल ग्रांट(1995), इंटरनेशल अवार्ड (1993 और 1996) प्राप्त।
सम्पर्क : Box 67089, 2300 Yonge St.,
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